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  • क्या अमेरिका भारतीय सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकता है? LEMOA समझौते को लेकर उठे सवाल

    क्या अमेरिका भारतीय सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकता है? LEMOA समझौते को लेकर उठे सवाल



    नई दिल्ली। हिंद महासागर में IRIS डेना युद्धपोत के डूबने के बाद ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि अमेरिका सैन्य अभियानों के लिए भारतीय बेस पर निर्भर हो सकता है। हालांकि इन दावों को खारिज कर दिया गया है। दरअसल भारत और अमेरिका के बीच वर्ष 2016 में एक अहम समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की कुछ सैन्य सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस समझौते के आधार पर अमेरिका भारत के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किसी हमले के लिए कर सकता है।

    सैन्य सुविधाओं के सीमित इस्तेमाल की अनुमति

    इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं जैसे नौसैनिक बेस, एयरफील्ड और मिलिट्री बेस का सीमित उपयोग कर सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस और जरूरी साजो-सामान की आपूर्ति जैसी लॉजिस्टिक सेवाएं शामिल हैं। हालांकि समझौते में यह स्पष्ट किया गया है कि हर मामले में संबंधित देश से पहले अनुमति लेना जरूरी होगा। यानी यह पूरी तरह संबंधित सरकार के निर्णय पर निर्भर करता है कि वह किस स्थिति में अनुमति देती है और किस मामले में नहीं।

    क्या है LEMOA समझौता

    भारत और अमेरिका के बीच Logistics Exchange Memorandum of Agreement यानी LEMOA पर 29 अगस्त 2016 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में हुआ था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट, सप्लाई और सेवाओं के आदान-प्रदान के लिए नियम और शर्तें तय करना है। माना जाता है कि यह अमेरिका के लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) का भारतीय संस्करण है, जैसा कि अमेरिका ने कई अन्य देशों के साथ भी किया हुआ है।

    किन गतिविधियों को कवर करता है समझौता

    यह समझौता मुख्य रूप से चार प्रमुख क्षेत्रों को कवर करता है, जिनमें बंदरगाहों पर जहाजों का रुकना यानी पोर्ट कॉल्स, संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण गतिविधियां तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) शामिल हैं। इसके अलावा किसी अन्य जरूरत के लिए दोनों देशों के बीच अलग से आपसी सहमति जरूरी होती है। समझौते के तहत दी जाने वाली सेवाओं के बदले संबंधित देश को या तो नकद भुगतान करना होता है या फिर समान लॉजिस्टिक सेवाएं उपलब्ध करानी होती हैं।

    लॉजिस्टिक सपोर्ट में क्या-क्या शामिल

    LEMOA के तहत मिलने वाली लॉजिस्टिक सेवाओं में भोजन, पानी, रहने की व्यवस्था, परिवहन, पेट्रोलियम, तेल और लुब्रिकेंट्स, कपड़े, संचार सेवाएं, चिकित्सा सुविधाएं, स्टोरेज, प्रशिक्षण सेवाएं, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और रखरखाव, कैलिब्रेशन सेवाएं और पोर्ट सेवाएं शामिल हैं। खास बात यह है कि यह समझौता किसी भी देश को संयुक्त सैन्य गतिविधि करने के लिए बाध्य नहीं करता। साथ ही इसमें किसी भी प्रकार का सैन्य बेस स्थापित करने या स्थायी बेसिंग की व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है। इसे पूरी तरह से लॉजिस्टिक सहयोग का समझौता माना जाता है।

    भारत के लिए क्यों अहम है यह घटना

    IRIS डेना पोत के डूबने की घटना भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जिस क्षेत्र में यह घटना हुई वह भारत के समुद्री पड़ोस में आता है। हिंद महासागर में श्रीलंका के दक्षिण का इलाका वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्गों में गिना जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य टकराव समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

    भारत में नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुआ था पोत

    बताया जा रहा है कि IRIS डेना युद्धपोत भारत में आयोजित ‘मिलन’ नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने आया था। यह अभ्यास 18 से 25 फरवरी के बीच आयोजित हुआ था, जिसमें दुनिया के कई देशों की नौसेनाओं ने भाग लिया। इस दौरान 80 से अधिक युद्धपोत समुद्र में एक साथ दिखाई दिए थे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समुद्री सहयोग और नौसैनिक कूटनीति को मजबूत करना था। नौसैनिक परेड की समीक्षा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की थी।

    हमले को लेकर भारत की क्या है नीति

    रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डेना पोत भारत के निमंत्रण पर अभ्यास में शामिल होने जरूर आया था, लेकिन घटना के समय वह भारत की समुद्री सीमा से बाहर जा चुका था। ऐसे में इस घटना के लिए सीधे तौर पर भारत की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अपनी स्पष्ट नीति पर कायम है कि वह किसी भी देश को हमले के लिए अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर यह भी देखा जाएगा कि ईरान इसे किस नजर से देखता है।

  • ईरान ने अमेरिका को दिया बड़ा झटका, कतर में मिसाइल चेतावनी रडार सिस्टम को पहुंचाया नुकसान

    ईरान ने अमेरिका को दिया बड़ा झटका, कतर में मिसाइल चेतावनी रडार सिस्टम को पहुंचाया नुकसान



    नई दिल्ली। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष और ज्यादा गंभीर होता जा रहा है। हालात अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गए हैं जहां दोनों पक्षों की ओर से लगातार सैन्य कार्रवाई हो रही है। एक तरफ ईरान खाड़ी क्षेत्र में हमले कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने हिंद महासागर में एक ईरानी पोत को डुबो दिया, जिसमें 80 से अधिक लोगों की मौत होने की खबर है। इसी बीच खबर सामने आई है कि ईरान के हमले में कतर में मौजूद अमेरिका की एक अहम मिसाइल चेतावनी प्रणाली को नुकसान पहुंचा है, जिसे इस क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा तंत्र की “आंख” माना जाता था।

    1.1 अरब डॉलर के रडार सिस्टम को नुकसान

    मिली जानकारी के अनुसार लगभग 1.1 अरब डॉलर की लागत से तैयार यह रडार सिस्टम अमेरिकी सेना के मिसाइल रक्षा नेटवर्क का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस पर हुए हमले से क्षेत्र में तैनात मिसाइल रक्षा तंत्र को बड़ा झटका लगा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संभावित मिसाइल हमलों का समय रहते पता लगाने की क्षमता कमजोर हो सकती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

    सैटेलाइट तस्वीरों से हुई नुकसान की पुष्टि

    अमेरिकी सैन्य ढांचे को हुए नुकसान की पुष्टि सैटेलाइट तस्वीरों से भी हुई है। प्लैनेट लैब्स द्वारा जारी इमेज में अमेरिकी स्पेस फोर्स के AN/FPS-132 (ब्लॉक 5) बैलिस्टिक मिसाइल अर्ली वार्निंग रडार सिस्टम के आसपास क्षति और आग बुझाने की गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। यह रडार सिस्टम मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना द्वारा संचालित सबसे बड़े मिसाइल चेतावनी रडारों में से एक माना जाता है।

    ईरान ने कैसे किया हमला

    ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस हमले को सटीक मिसाइल स्ट्राइक बताया है। हालांकि कुछ सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला कम लागत वाले हमलावर ड्रोन से भी किया गया हो सकता है, जो संभवतः शाहेद श्रेणी का था। रिपोर्ट्स के मुताबिक मिसाइलों और ड्रोन के संयुक्त बड़े हमले के दौरान यह ड्रोन रक्षा तंत्र को भेदने में सफल रहा और रडार सिस्टम को नुकसान पहुंचा गया।

    क्यों महत्वपूर्ण है यह रडार सिस्टम

    इस रडार सिस्टम को अमेरिकी रक्षा कंपनी रेथियॉन ने अपग्रेडेड अर्ली वार्निंग रडार (UEWR) कार्यक्रम के तहत विकसित किया था। यह प्रणाली लगभग 5000 किलोमीटर तक की दूरी पर बैलिस्टिक मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों को ट्रैक करने में सक्षम है। साथ ही यह पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में मिसाइल लॉन्च का शुरुआती अलर्ट देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कतर में इसकी लोकेशन रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जाती है क्योंकि यहां से यह रडार ईरान, इराक, सीरिया, तुर्किये, मध्य एशिया के कुछ हिस्सों और हिंद महासागर तक की गतिविधियों पर नजर रख सकता है।

    रणनीतिक असर की आशंका

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले का असर केवल एक सैन्य ठिकाने को हुए नुकसान तक सीमित नहीं है। अमेरिका के पूर्व सैन्य अधिकारी और पेंटागन के पूर्व सलाहकार कर्नल डगलस मैकग्रेगर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि इस हमले में अमेरिका की “आंखें” निशाना बनी हैं। वहीं भू-राजनीति विशेषज्ञ ब्रायन एलन के अनुसार इस घटना के दूरगामी रणनीतिक प्रभाव भी हो सकते हैं।

    सिस्टम को बदलना आसान नहीं

    सैन्य विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका के पास सैटेलाइट और अन्य रडार सहित वैश्विक सेंसर नेटवर्क मौजूद है, लेकिन AN/FPS-132 जैसे बड़े और स्थायी रडार सिस्टम को नुकसान पहुंचने से क्षेत्रीय निगरानी में अंतर आ सकता है। ऐसे बड़े सिस्टम को जल्दी बदलना या दोबारा स्थापित करना आसान नहीं होता। इसलिए कुछ समय के लिए मिसाइल निगरानी और ट्रैकिंग क्षमता कमजोर पड़ सकती है। यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि इस क्षेत्र में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकाने मौजूद हैं और यहीं से दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े प्रमुख समुद्री मार्ग भी गुजरते हैं।

  • अमेरिका नहीं चाहता भारत बने ताकतवर, ईरानी अधिकारी का बड़ा आरोप

    अमेरिका नहीं चाहता भारत बने ताकतवर, ईरानी अधिकारी का बड़ा आरोप

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भारत में ईरानी सुप्रीम लीडर के विशेष प्रतिनिधि Abdul Majid Hakim Elahi ने कहा कि अमेरिका अपने वैश्विक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए दुनिया में जानबूझकर युद्ध जैसी स्थितियां पैदा करता है। उनका दावा है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष के पीछे भी अमेरिका की यही रणनीति है, ताकि भारत और चीन जैसे देशों को उभरने से रोका जा सके।

    खास बातचीत में इलाही ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत या चीन जैसे देश वैश्विक ताकत के रूप में सामने आएं। उनके मुताबिक, अमेरिका की कोशिश रहती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी ताकत को कोई चुनौती न दे और इसी वजह से वह विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध की स्थितियां पैदा करता है।

    भविष्य में भारत भी होगा बड़ी ताकत

    इलाही ने कहा कि आने वाले समय में भारत, चीन, रूस और अमेरिका दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों में शामिल होंगे। हालांकि, उनका आरोप है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर अपनी ताकत को साझा नहीं करना चाहता और इसी कारण वह वैश्विक स्तर पर टकराव की स्थितियां बनाए रखता है।

    ईरान ने नहीं, अमेरिका ने शुरू किया संघर्ष

    ईरानी अधिकारी ने यह भी कहा कि मौजूदा युद्ध की शुरुआत ईरान ने नहीं की, बल्कि अमेरिका और इजरायल ने सैन्य कार्रवाई कर इसे शुरू किया। इससे पहले ईरान के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी Ali Larijani ने भी कहा था कि ईरान केवल अपनी रक्षा कर रहा है। उनके अनुसार अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरानी नागरिकों और ठिकानों को निशाना बनाया गया है, जिसके जवाब में ईरान प्रतिक्रिया दे रहा है।

    लारिजानी ने यह भी कहा कि चूंकि संघर्ष की शुरुआत अमेरिका की ओर से हुई है, इसलिए इसे खत्म करने की जिम्मेदारी भी उसी की है।

    लंबा खिंच सकता है संघर्ष

    इस बीच विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य ढांचे और नौसैनिक अड्डों पर किए गए हमलों के बाद यह संघर्ष लंबा चल सकता है। इन हमलों में ईरान के कुछ वरिष्ठ नेताओं के मारे जाने की खबरें भी सामने आई हैं।

    जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन हमलों में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत होने और कई अन्य के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

  • अमेरिका ने भारत की तरफ आ रहे ईरानी 'विध्वंसक' पोत को श्रीलंका के तट पर डुबोया, 87 लोगों की मौत

    अमेरिका ने भारत की तरफ आ रहे ईरानी 'विध्वंसक' पोत को श्रीलंका के तट पर डुबोया, 87 लोगों की मौत


    कोलंबो।
    अमेरिका (America) ने बुधवार (4 मार्च) को श्रीलंका (Sri Lanka) के तट के पास एक पनडुब्बी हमले की जिम्मेदारी ली है, जिसमें एक ईरानी नौसैनिक युद्धपोत (फ्रिगेट) (Iranian Naval Frigate) डूब गया। श्रीलंका के उप विदेश मंत्री ने बताया कि हिंद महासागर (Indian Ocean) में हुए इस हमले में कम से कम 87 लोगों की मौत हो गई है। ईरानी युद्धपोत ‘IRIS देना’ गैले के तटीय शहर से लगभग 40 समुद्री मील दूर, श्रीलंकाई क्षेत्र के बाहर लेकिन उसके आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर था। स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग 5:30 बजे जहाज से खतरे का सिग्नल भेजा गया।

    श्रीलंकाई नौसेना ने बीबीसी को बताया कि जहाज पर मौजूद अनुमानित 180 लोगों में से 32 को बचा लिया गया है। लापता लोगों की सटीक संख्या अभी अज्ञात है। श्रीलंका के पोर्ट शहर गाले के हॉस्पिटल अधिकारियों ने कहा कि 87 शव लाए गए हैं। श्रीलंकाई अधिकारियों ने कहा कि 32 और लोगों को बचा लिया गया और उनका हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है, और जहाज पर सवार लगभग 180 लोगों में से लगभग 60 लोगों का शायद कोई पता नहीं है।

    अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि एक अमेरिकी पनडुब्बी ने उस ईरानी युद्धपोत को टारपीडो से डुबा दिया, जो सोचता था कि वह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित है। उन्होंने इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से टारपीडो द्वारा किसी दुश्मन जहाज को डुबाने की पहली घटना करार दिया है। इस जहाज का डूबना ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका और इजरायल के एक समन्वित सैन्य अभियान में ईरानी सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया है और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ-साथ कई वरिष्ठ अधिकारियों को मार गिराया गया है। जवाबी कार्रवाई में, ईरान ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य संपत्तियों पर हमले किए हैं।


    भारत के ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू’ से लौट रहा था जहाज

    IRIS देना 17 और 18 फरवरी को विशाखापत्तनम में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 (IFR 2026) से वापस लौट रहा था। इस अभ्यास में 19 विदेशी युद्धपोतों सहित कुल 85 जहाजों ने हिस्सा लिया था। भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वदेश निर्मित अपतटीय गश्ती पोत INS सुमेधा से फ्लीट की समीक्षा की थी, जिसने इस अवसर पर ‘प्रेसिडेंशियल यॉट’ के रूप में काम किया। यह आयोजन भारतीय नौसेना के मेगा द्विवार्षिक अभ्यास ‘मिलन’ (MILAN) और ‘हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी’ (IONS) से जुड़ा हुआ था।

    इसे 2021 में ईरान के स्वदेश निर्मित ‘मौज क्लास’ मल्टी-रोल गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट के हिस्से के रूप में कमीशन किया गया था। ईरान इसे विध्वंसक कहता है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लाइट फ्रिगेट माना जाता है। यह युद्धपोत सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों, तोप, मशीनगनों और टारपीडो लॉन्चर से लैस था।

    यह स्वदेश निर्मित चार ‘बोनयान 4’ इंजनों (प्रत्येक 5,000 हॉर्सपावर) और बेहतर गतिशीलता के लिए बो-थ्रस्टर सिस्टम से लैस ईरान का पहला जहाज था। 2023 में, इसने IRIS मकरान (एक ऑयल टैंकर जिसे सपोर्ट शिप में बदला गया था) के साथ दुनिया का 360-डिग्री चक्कर लगाया था। फरवरी 2023 में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने इन दोनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।


    अंतरराष्ट्रीय कानून और हमले की वैधता पर सवाल

    श्रीलंका के पास हुए इस ताजा हमले ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सैन्य हमलों की वैधता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (UNCLOS) के अनुच्छेद 88 के तहत अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए आरक्षित माना जाता है, इसलिए वहां सैन्य हमले आमतौर पर प्रतिबंधित हैं। 2022 के ‘लीडेन जर्नल ऑफ इंटरनेशनल लॉ’ के अनुसार, कोई देश आत्मरक्षा में बल प्रयोग कर सकता है। इसके अलावा, रेड क्रॉस (ICRC) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति को भी एक आधार मानता है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ‘देना’ सीधे तौर पर किसी शत्रुतापूर्ण गतिविधि में शामिल था या नहीं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून UNCLOS के तहत आता है, जिसे ‘महासागरों का संविधान’ माना जाता है, लेकिन अमेरिका इसका हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।

  • ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच संघर्ष चौथे दिन भी जारी, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, खेल और तेल रूट भी प्रभावित

    ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच संघर्ष चौथे दिन भी जारी, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, खेल और तेल रूट भी प्रभावित


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया से बड़ी खबर है, जहाँ एशियाई महिला फुटबॉल कप के उद्घाटन मैच में ईरानी महिला फुटबॉल टीम ने राष्ट्रगान नहीं गाया। खिलाड़ी लाइन में खड़ी रहीं, लेकिन चुप रहीं। कोच मारजियेह जाफरी मुस्कुराती रहीं। यह कदम हाल के अमेरिका और इजराइल के हमलों और ईरान के नेताओं की मौत के विरोध का प्रतीक माना जा रहा है। कप्तान जहरा घानबरी और कोच से खामेनेई की मौत पर सवाल किए गए, लेकिन उन्हें जवाब नहीं देने दिया गया।

    हार्मुज स्ट्रेट बंद: ईरान ने चेतावनी दी है कि इस रणनीतिक तेल रूट से गुजरने वाले जहाजों पर हमला किया जाएगा। भारत का करीब 50% तेल इसी मार्ग से आता है। अगर इस मार्ग को अवरुद्ध रखा गया, तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों में तेजी आने की संभावना है और भारत सहित तेल आयातक देशों पर दबाव बढ़ सकता है।

    जंग का हाल: चार दिन में 787 लोग मारे गए हैं। 153 शहरों को निशाना बनाया गया और कुल 1,039 हमले हुए। यह जानकारी ईरानियन रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने दी। बढ़ता हिंसक संघर्ष क्षेत्रीय सुरक्षा और मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन गया है।

    लेबनान में हिजबुल्लाह पर प्रतिबंध: राष्ट्रपति मिशेल औन ने घोषणा की कि हिजबुल्लाह को अपने हथियार सरकार को सौंपने होंगे। यह कदम लेबनान-इजराइल सीमा पर हालिया रॉकेट हमलों और बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया। उनका कहना है कि अब युद्ध और शांति का निर्णय केवल लेबनानी राज्य के हाथ में होगा।

    इजराइल पर ईरान का मिसाइल हमला: ईरान की मिसाइल ने इजराइल के सेंट्रल शहर पेटाह टिकवा को निशाना बनाया। मिसाइल के टुकड़े शहर में गिरे, जिससे कुछ नुकसान हुआ। इजराइली मीडिया के अनुसार यह हमला अमेरिका और इजराइल की ईरान विरोधी सैन्य कार्रवाइयों के जवाब में किया गया।

    पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि ईरान पर चल रही जंग पाकिस्तान के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा कर रही है। उन्होंने जायनिस्ट विचारधारा और इजराइल की गतिविधियों को मुस्लिम दुनिया में अस्थिरता का मुख्य कारण बताया। पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने भी कहा कि पाकिस्तान को ट्रम्प द्वारा बनाए “बोर्ड ऑफ पीस” से बाहर निकलना चाहिए।

    फ्रांस तैयार: विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा कि अगर फ्रांस के सहयोगी देशों को मदद की जरूरत पड़ी, तो फ्रांस रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। करीब 4 लाख फ्रांसीसी नागरिक प्रभावित देशों में मौजूद हैं, जिन्हें सुरक्षित लाने के लिए कमर्शियल और सैन्य उड़ानों की व्यवस्था की जाएगी।

    अंतरराष्ट्रीय असर: हार्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, क्षेत्रीय तनाव और ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।

  • अमेरिका-इजराइल का संयुक्त हमला, ईरान परमाणु विवाद में 742 मौतों के बाद सुरक्षा अलर्ट

    अमेरिका-इजराइल का संयुक्त हमला, ईरान परमाणु विवाद में 742 मौतों के बाद सुरक्षा अलर्ट



    नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों के बीच ईरान में संकट गहराता जा रहा है। यह संघर्ष अब चौथे दिन में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका के स्पेशल प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ परमाणु समझौते की अंतिम कोशिश भी नाकाम रही। अमेरिका ने ईरान को प्रस्ताव दिया था कि वह अगले 10 साल तक यूरेनियम इनरिचमेंट पूरी तरह बंद कर दे, और बदले में अमेरिका न्यूक्लियर फ्यूल उपलब्ध कराने को तैयार था। हालांकि, ईरान ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बातचीत टूटते ही अमेरिका और इजराइल ने मिलकर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी।

    इस संघर्ष में अब तक ईरान में 742 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 176 बच्चे शामिल हैं। घायल हुए लोगों की संख्या 750 से अधिक है। इस हिंसा ने पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा की स्थिति पैदा कर दी है। लेबनान के बेरूत में इजराइली सेना ने हिज्बुल्लाह से जुड़े अल-मनार टीवी स्टेशन की इमारत को निशाना बनाया, जिससे प्रसारण कुछ समय के लिए बाधित हुआ। हालांकि, हमले के बाद प्रसारण फिर से शुरू कर दिया गया।

    ईरान के मिनाब शहर में गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले में मारी गई 165 लड़कियों का अंतिम संस्कार भी हुआ। इस दौरान हजारों लोग इकट्ठा हुए, और एक मां ने मंच से अमेरिका पर हमले का आरोप लगाया। भीड़ ने ‘अमेरिका मुर्दाबाद’, ‘इजराइल मुर्दाबाद’ और ‘नो सरेंडर’ जैसे नारे लगाए। ईरानी मीडिया ने हमले का आरोप इजराइल पर लगाया, जबकि इजराइली सेना ने इसे नकारा।

    इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध लंबा और अंतहीन नहीं होगा। उनका कहना है कि यह संघर्ष क्षेत्र में स्थायी शांति लाने का अवसर बन सकता है। उन्होंने पहले हुए अब्राहम अकॉर्ड्स का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका के साथ मिलकर अब और देशों के साथ शांति समझौते भी संभव हैं।

    अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रम्प अमेरिका को लंबी और अनिश्चित लड़ाई में नहीं फंसने देंगे। उन्होंने कहा कि ईरान पर हमला विशेष रणनीति के तहत किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों। ट्रम्प की अनुमति के बिना कोई युद्ध लंबे समय तक जारी नहीं रहेगा, जिससे अमेरिका को इराक और अफगानिस्तान जैसी लंबी लड़ाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    सुरक्षा के मद्देनजर अमेरिका ने जॉर्डन, बहरीन और इराक से गैर-जरूरी सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की चेतावनी दी है। जॉर्डन और बहरीन में ईरान से ड्रोन और मिसाइल हमले का खतरा है, जबकि इराक में हिंसा और अपहरण का भी जोखिम बना हुआ है। अमेरिकी दूतावासों में केवल आवश्यक स्टाफ ही रहेंगे, और फ्लाइट्स रद्द होने के कारण नागरिकों को सुरक्षित निकासी का निर्देश दिया गया है।

    अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा स्थिति को गंभीर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने शांति बहाल करने और संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। इस बीच अमेरिका और इजराइल की मिलीजुली कार्रवाई, ईरानी नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नए संकट की घंटी साबित हो रही है।

  • US के लिए लंबी और महंगी चुनौती साबित हो सकता है ईरान युद्ध… अमेरिकी रणनीतिकार नहीं लगा पाए अंदाजा

    US के लिए लंबी और महंगी चुनौती साबित हो सकता है ईरान युद्ध… अमेरिकी रणनीतिकार नहीं लगा पाए अंदाजा


    तेहरान।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में छिड़ा संघर्ष अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जिसकी कल्पना शायद अमेरिकी युद्ध नीतिकारों (American War Policymakers) ने नहीं की थी। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) के जरिये खामनेई के खात्मे के बाद यह युद्ध अमेरिका के लिए किसी त्वरित जीत के बजाय एक लंबी और महंगी चुनौती साबित हो सकता है। ईरान की रणनीति अमेरिका को लंबे और थका देने वाले युद्ध की ओर धकेलने की दिख रही है। अमेरिकी अड्डों पर हुए मिसाइल हमलों और कुवैत में कई लड़ाकू विमान गिराए जाने की सूचनाओं ने वाशिंगटन की वॉर गेमिंग पर सवाल खड़े किए हैं। अमेरिका सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों और व्यापारिक केंद्रों की सुरक्षा ढाल बनने में नाकाम रहा है। यह अमेरिकी योजना के बिल्कुल विपरीत है।


    ईरान की रणनीति

    ईरान की रणनीति वॉर ऑफ एट्रिशन यानी लंबे और थकाऊ युद्ध की है। अमेरिका और इस्राइल की बेहतर एयरपावर से बचाव के लिए उसने अपने अहम हथियार भूमिगत बंकरों में सुरक्षित कर लिए हैं। उसका इरादा ड्रोन एवं मिसाइलों से अमेरिका के प्रतिष्ठित ठिकानों पर निशाना साधने का है। इससे दुश्मन के अजेय होने की छवि को नुकसान पहुंचेगा और घरेलू मोर्चे पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ेगा।

    जमीनी हमला: विशेषज्ञों की राय में ईरान की कोशिश दुश्मन को जमीनी आक्रमण के लिए उकसाने की दिख रही है। युद्ध जमीन पर आने पर ईरान की बड़ी सेना व दुर्गम भौगोलिक परिस्थितयां अमेरिका व इस्राइल के लिए इसे अफगानिस्तान या वियतनाम जैसा अंतहीन युद्ध भी बना सकते हैं।

    अराघची का बयान: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया कि शीर्ष कमांडरों को खोने के बाद उन्हें फौरन रिप्लेस कर लिया गया है। उन्होंने दावा किया कि इस युद्ध में दूसरे पक्ष के लिए कोई विजय नहीं है। विकेंद्रीकृत कमान के कारण ईरान का मिसाइल नेटवर्क नेतृत्व की कमी के बावजूद सक्रिय है।

    इस्राइल पर प्रभाव: छोटा देश होने के नाते इस्राइल की अर्थव्यवस्था तेज और निर्णायक युद्ध के लिए बनी है, लंबे युद्ध के लिए नहीं। लाखों नागरिक (रिजर्विस्ट) दफ्तर छोड़कर मोर्चे पर तैनात हैं, जिससे हाई-टेक और उत्पादन क्षेत्र प्रभावित रहेगा। ईरान युद्ध को लंबा खींचने में कामयाब रहा तो इस्राइल की अर्थव्यवस्था पतली हो सकती है, इसलिए इस्राइल युद्ध को जल्द खत्म करने के लिए आक्रामक रुख अपनाता है।


    विशेषज्ञ की राय

    रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल जीडी बख्शी ने कहा कि ट्रंप ने बहुत बड़ी गलती की है। पहली ही स्ट्राइक में ईरान का शीर्ष नेतृत्व साफ कर दिया। अब इस युद्ध पर नियंत्रण नहीं रह गया है। इससे वैश्विक मंदी आ सकती है, जिससे अमेरिका भी अछूता नहीं रहेगा। ईरान ने इनका युद्धपोत हिट किया तो 250 सैनिक मारे जाएंगे। अब यह अपना एयरक्राफ्ट कैरियर लिंकन छुपाते फिर रहे हैं। ट्रंप बुरी तरह फंसने वाले हैं। उनके खिलाफ महाभियोग भी चलाया जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।

  • ईरान में तबाही: खामनेई की मौत के बाद अयातुल्ला आराफी बने अंतरिम सुप्रीम लीडर, अमेरिका-इजराइल पर ईरानी पलटवार

    ईरान में तबाही: खामनेई की मौत के बाद अयातुल्ला आराफी बने अंतरिम सुप्रीम लीडर, अमेरिका-इजराइल पर ईरानी पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई की मौत के अगले दिन ही देश के राजनीतिक और धार्मिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। 67 वर्षीय अयातुल्ला अलीरेजा आराफी को अंतरिम सुप्रीम लीडर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आराफी लंबे समय से ईरान की धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहे हैं। वे असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के उपाध्यक्ष हैं और गार्जियन काउंसिल के सदस्य रह चुके हैं। वर्तमान में वे ईरान की सेमिनरी प्रणाली का नेतृत्व कर रहे हैं। अब असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स स्थायी सुप्रीम लीडर का चयन करेगी।

    खामनेई की मौत के बाद ईरान में 40 दिन का राजकीय शोक और सात दिन की छुट्टी घोषित की गई। ईरानी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि देश ने एक महान नेता खो दिया है। वहीं, ईरानी सेना ने खतरनाक अभियान की चेतावनी दी और अमेरिकी ठिकानों पर हमले की योजना बनाई।

    अमेरिका-इजराइल ने किया आक्रमण

    इजराइल और अमेरिका ने संयुक्त हमले में ईरान पर 24 घंटे में 1,200 से अधिक बम गिराए। इस हमले में सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत हुई। उनके ऑफिस कॉम्प्लेक्स पर 30 मिसाइलों से हमला हुआ। हमले में उनके परिवार के सदस्य और 40 कमांडर्स भी मारे गए। इजराइल के पीएम नेतन्याहू और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने खामनेई की मौत की पुष्टि की।

    इस हमले में 200 से अधिक लोग मारे गए और 740 से ज्यादा घायल हुए। एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 148 छात्राओं की मौत हो गई।

    ईरान का जवाबी हमला

    ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों का जवाब देते हुए 9 देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमला किया। इसमें इजराइल पर करीब 400 मिसाइलें दागी गईं। इसके अलावा कतर, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, UAE में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। दुबई में पाम होटल एंड रिसॉर्ट और बुर्ज खलीफा के पास ड्रोन हमला हुआ।

    पृष्ठभूमि और विवाद

    ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच विवाद के मुख्य कारण हैं: न्यूक्लियर प्रोग्राम पर शक, बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास, क्षेत्रीय अस्थिरता और मिडिल ईस्ट में राजनीतिक दखल। अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इसके जवाब में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज करने और कठोर बयान देने जैसे कदम उठाए।

    अयातुल्ला अली खामनेई का जीवन

    खामनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को मशहद में हुआ। उन्होंने 1963 में शाह के खिलाफ भाषण दिया और गिरफ्तार हुए। 1979 की इस्लामी क्रांति में वे प्रमुख आंदोलनकारी बने। 1981 में उन पर बम हमले हुए, उसी वर्ष वे ईरान के राष्ट्रपति बने। 1989 में खोमैनी की मौत के बाद उन्हें सुप्रीम लीडर बनाया गया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का मजबूत रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक कट्टर शासन का आरोप लगाते हैं।

  • दुनिया पर कर्ज के बोझ बढ़कर रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर पहुंचा, US-चीन सबसे आगे

    दुनिया पर कर्ज के बोझ बढ़कर रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर पहुंचा, US-चीन सबसे आगे


    वॉशिंगटन।
    वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। वॉशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान Institute of International Finance (IIF) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के अंत तक दुनिया का कुल कर्ज बढ़कर रिकॉर्ड 348 ट्रिलियन डॉलर (Record $348 trillion) तक पहुंच गया है। यह वृद्धि कोविड-19 महामारी (COVID-19 Pandemic) के बाद सबसे तेज मानी जा रही है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन का सबसे बड़ा योगदान रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और चीन के तेजी से कर्ज बढ़ाने से ग्लोबल कर्ज में सिर्फ एक साल में करीब 29 ट्रिलियन डॉलर का नया कर्ज जुड़ा है। इसमें 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक सरकारी उधारी रही। अमेरिका, चीन और यूरो जोन ने मिलकर कुल कर्ज वृद्धि में लगभग तीन-चौथाई हिस्सा जोड़ा है, जिससे वैश्विक वित्तीय संतुलन पर दबाव और बढ़ गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन से निपटने और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश के कारण कर्ज तेजी से बढ़ रहा है। यह “कैपिटल एक्सपेंडिचर सुपर साइकिल” आने वाले वर्षों में भी कर्ज बढ़ाने वाला प्रमुख कारक बना रह सकता है। इस रिपोर्ट में चीन की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया गया है, जहां सरकारी कर्ज GDP के 88.4% से बढ़कर 96.8% तक पहुंच गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका अकेले वैश्विक सार्वजनिक ऋण (Global Public Debt) के एक-तिहाई से अधिक हिस्से के लिए जिम्मेदार है। चीन इस सूची में दूसरे स्थान पर है, जिसका सरकारी कर्ज लगभग 18.68 ट्रिलियन डॉलर है।


    2031 तक US का कर्ज GDP का 140% तक पहुंच सकता है

    रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका में यह आंकड़ा और अधिक है, जो जीडीपी के 122% से भी ऊपर चला गया है। इसके अलावा International Monetary Fund (IMF) ने भी चेतावनी दी है कि अमेरिका का बढ़ता सार्वजनिक कर्ज वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम बन सकता है। IMF के अनुसार, यदि यही रुझान जारी रहा तो 2031 तक अमेरिका का कर्ज GDP के 140% तक पहुंच सकता है। संस्था ने अमेरिकी सरकार को तत्काल और ठोस वित्तीय सुधार (fiscal consolidation) लागू करने की सलाह दी है।


    ट्रंप का टैरिफ दांव भी बेअसर

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक, वॉशिंगटन स्थित संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ से कर्ज के बढ़ते ट्रेंड को पलटने के लिए कोई उल्लेखनीय आमदनी नहीं हो पायी है और इससे “अफ़ोर्डेबिलिटी की चिंताएँ बढ़ गई हैं। इसमें आगे कहा गया है कि 2036 तक जनता पर मौजूद US फ़ेडरल कर्ज में और 20 परसेंट पॉइंट की बढ़ोतरी होने की संभावना है, जो GDP के 120 परसेंट से ज़्यादा हो जाएगा।


    वैश्विक स्तर पर अमेरिकी बॉन्ड्स में भरोसा कायम

    हालांकि, बढ़ते कर्ज के बावजूद अमेरिकी ट्रेजरी बाजार अब भी निवेशकों के लिए सुरक्षित विकल्प बना हुआ है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी बॉन्ड्स में भरोसा कायम है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि वैश्विक स्तर पर कर्ज-से-GDP अनुपात लगातार पांचवें साल घटकर 308% पर आ गया है, लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात रिकॉर्ड 235% से अधिक पहुंच गया है, जो भविष्य में वित्तीय अस्थिरता का संकेत दे सकता है।

  • बिकिनी पहनी दो महिलाओं के बीच लेटे दिखे स्टीफन हॉकिंग

    बिकिनी पहनी दो महिलाओं के बीच लेटे दिखे स्टीफन हॉकिंग

    वॉशिंगटन। अमेरिकी फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों के एक नए बैच के सार्वजनिक होने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर बहस छिड़ गई है। इन दस्तावेजों के साथ सामने आई एक तस्वीर में प्रख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग दिखाई दे रहे हैं, जिससे सोशल मीडिया और मीडिया जगत में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

    तस्वीर में हॉकिंग दो महिलाओं के बीच लेटे हुए नजर आते हैं। दोनों महिलाओं ने स्विमवियर पहन रखा है और उनकी पहचान छिपाने के लिए चेहरों को काले रंग से ढका गया है। तीनों के हाथों में पेय पदार्थ दिखाई दे रहे हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि फोटो कब और किस संदर्भ में ली गई थी।

    अमेरिकी मीडिया, जिनमें New York Post भी शामिल है, ने इस तस्वीर का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी पृष्ठभूमि और परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है।

    परिवार ने आरोपों को बताया निराधार
    हॉकिंग के परिवार की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्रोफेसर हॉकिंग ने 20वीं सदी में भौतिकी के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया और वे मोटर न्यूरॉन बीमारी से दशकों तक जूझते रहे। बयान में किसी भी प्रकार के अनुचित व्यवहार के संकेतों को “पूरी तरह गलत” बताया गया।


    स्टीफन हॉकिंग का 2018 में 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। वे लंबे समय तक गंभीर बीमारी के बावजूद वैज्ञानिक अनुसंधान और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे।

    2006 के सम्मेलन से जुड़ा संदर्भ
    रिपोर्ट्स के अनुसार, हॉकिंग उन वैज्ञानिकों के समूह में शामिल थे जिन्होंने मार्च 2006 में कैरिबियन क्षेत्र के सेंट थॉमस द्वीप पर आयोजित एक सम्मेलन में भाग लिया था। यह कार्यक्रम एपस्टीन द्वारा वित्तपोषित बताया जाता है और उस समय हुआ था जब उनके खिलाफ बाद में सामने आए आपराधिक आरोप सार्वजनिक नहीं हुए थे।

    पुराने आरोपों का भी हुआ जिक्र
    दस्तावेजों में अमेरिकी नागरिक वर्जीनिया गिउफ्रे के पूर्व आरोपों का भी उल्लेख मिलता है, जिनमें उन्होंने एपस्टीन नेटवर्क से जुड़े कई प्रभावशाली लोगों पर सवाल उठाए थे। हालांकि, हॉकिंग के खिलाफ किसी भी आपराधिक कृत्य का आधिकारिक आरोप कभी सिद्ध नहीं हुआ।