दिवाली पर गणपति के सामने क्यों जलाया जाता है सरसों के तेल का दीपक, जानिए धार्मिक मान्यता और परंपरा..

नई दिल्ली । दीपावली का त्योहार कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 8 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा। इस अवसर पर घरों में भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की संयुक्त रूप से पूजा की जाती है। श्रद्धालु सुख-समृद्धि, धन-वैभव और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ दोनों देवताओं का पूजन करते हैं। दीपावली की पूजा में खील-बताशे का भोग लगाने के साथ भगवान गणेश के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाने की भी विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा के पीछे शुभता, समृद्धि और परिवार की रक्षा से जुड़ी भावनाएं मानी जाती हैं।

सामान्य पूजा-पाठ में देवताओं को रोली अर्पित करने के साथ अक्षत यानी चावल का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन के दौरान चावल के स्थान पर खील चढ़ाने की परंपरा विशेष मानी जाती है। खील का अर्थ है धान का खिलकर तैयार हुआ रूप। इसे घर में सुख-समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिस तरह धान से खील तैयार होती है, उसी तरह परिवार में धन-धान्य और खुशहाली बनी रहे। इसी कामना के साथ दीपावली पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी को खील अर्पित की जाती है।

पूजा में खील के साथ बताशे भी चढ़ाए जाते हैं। धार्मिक परंपरा में बताशों को मिठास का प्रतीक माना गया है। इन्हें भोग लगाने के पीछे परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम, सौहार्द और मधुरता बनाए रखने की कामना जुड़ी हुई है। इस तरह खील और बताशे का भोग केवल पूजा की सामग्री नहीं, बल्कि घर में संपन्नता और आपसी सद्भाव की कामना का प्रतीक भी माना जाता है।

दीपावली के दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश के सामने अलग-अलग प्रकार के दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित किया जाता है, जबकि भगवान गणेश के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है। पूजा में माता लक्ष्मी के बाईं ओर विराजमान गणपति के सामने इस दीपक को विशेष रूप से रखा जाता है। इसे जलाने के पीछे धार्मिक रूप से बाधाओं को दूर करने, परिवार में सुख-शांति बनाए रखने और गणेश जी की कृपा प्राप्त करने की कामना जुड़ी हुई है।

इस परंपरा से एक और मान्यता जुड़ी है। पूजा पूरी होने के बाद गणपति के सामने जलाए गए सरसों के तेल के दीपक की लौ से मिट्टी के कच्चे दीपक में काजल तैयार किया जाता है। परिवार के सदस्य अगले दिन सुबह उठकर इस काजल को अपनी आंखों में लगाते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार, पूजा के दीपक से तैयार काजल शुभता का प्रतीक होता है। इसे लगाने से बुरी नजर का प्रभाव दूर रहने और परिवार पर भगवान गणेश की कृपा बने रहने की मान्यता है। कई क्षेत्रों में बच्चों को भी यह काजल लगाने की परंपरा प्रचलित रही है।

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का देवता माना जाता है। दीपावली पर माता लक्ष्मी के साथ उनकी पूजा किए जाने के पीछे भी धार्मिक मान्यता है। माता लक्ष्मी को धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है, जबकि भगवान गणेश बुद्धि और विवेक प्रदान करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि धन के साथ सही निर्णय लेने की क्षमता और उसका उचित उपयोग करने के लिए बुद्धि भी आवश्यक है। इसी भाव के साथ लक्ष्मी-गणेश का संयुक्त पूजन किया जाता है।

गणपति के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाना भी इसी धार्मिक भावना से जुड़ा है। इसे जीवन की परेशानियों और बाधाओं से मुक्ति तथा घर में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार दीपावली पर खील-बताशे का भोग, लक्ष्मी जी के सामने घी का दीपक और गणेश जी के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपराएं त्योहार की पूजा-विधि का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।