Author: bharati

  • ट्रंप के बाद अब पाकिस्तानी PM शहबाज शरीफ करेंगे चीन की यात्रा…. जानें क्या है एजेंडा?

    ट्रंप के बाद अब पाकिस्तानी PM शहबाज शरीफ करेंगे चीन की यात्रा…. जानें क्या है एजेंडा?


    बीजिंग।
    पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Prime Minister Shahbaz Sharif) चीन की यात्रा (China Tour) करने वाले हैं। चीन (China) के प्रधानमंत्री ली क्वियांग (Prime Minister Li Keqiang) ने उन्हें बुलावा भेजा है। शरीफ की चीन यात्रा 23 से 26 मई के बीच होगी। इस दौरान वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनिपिंग (Chinese President Xi Jinping) और प्रधानमंत्री ली क्वियांग से मिलेंगे। बता दें कि हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) चीन की यात्रा से लौटे हैं। चीन यात्रा के दौरान ट्रंप और जिनपिंग ने ईरान युद्ध और ताइवान समेत विभिन्न मुद्दों पर बात हुई। अब देखने वाली बात यह है कि शरीफ चीन पहुंचकर क्या खिचड़ी पकाते हैं।


    यात्रा के क्या हो सकते हैं मायने

    चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, गुओ जियाकुन ने कहाकि शरीफ का दौरा दोनों देशों के बीच काफी अहम होने वाला है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर करीबी संवाद और समन्वय बनाए रखा है। साथ ही अपने साझा हितों की प्रभावी रूप से सुरक्षा की है। उन्होंने कहाकि इसके अलावा हमने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास को बढ़ावा दिया है। चीन को उम्मीद है कि इस अवसर का इस्तेमाल करते हुए दोनों देश, परंपरागत दोस्ती, सभी स्तर के सहयोग और एकता का नया अध्याय लिखेंगे। गुओ ने कहाकि हमारी कोशिश है कि चीन-पाकिस्तान समुदाय नए समय में एक साझा भविष्य की नींव रखे।


    जिनपिंग ने जरदारी से की थी बात

    बता दें कि गुरुवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष आसिफ अली जरदारी को दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ पर भी शुभकामनाएं दीं। सरकारी समाचार एजेंसी, शिन्हुआ मुताबिक, शी ने इस संदेश में कहाकि चीन और पाकिस्तान अच्छे दोस्त। साथ ही सभी मौसमों में सहयोगी रणनीतिक साझीदार हैं। हम पहाड़ों और नदियों से जुड़े हैं और सुख-दुःख साझा करते हैं। चीनी नेता ने कहाकि कूटनीतिक संबंध बनने के 75 साल के बाद से चीन और पाकिस्तान के बीच दोस्ती हमेशा से मजबूत और अटूट रही है।


    सुरक्षा और सहयोग बढ़ाने पर जोर

    चीनी राष्ट्रपति ने आगे कहाकि दोनों देशों ने लंबे समय से उच्च-स्तरीय आपसी राजनीतिक विश्वास, व्यावहारिक सहयोग, सुरक्षा सहयोग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बनाए रखा है। यह दोनों देशों के बीच संबंधों को आदर्श रूप में दिखाता है। जिनपिंग ने कहाकि वे चीन-पाकिस्तान संबंधों को महत्वपूर्ण मानते हैं। साथ ही जरदारी के साथ मिलकर इस वर्षगांठ को एक अवसर के रूप में इस्तेमाल करने को तैयार हैं ताकि संबंधों को और बेहतर बनाया जा सके। साथ ही जिनपिंग ने पारंपरिक दोस्ती को बढ़ाने, सभी पहलुओं के सहयोग को और बेहतर करने पर जोर दिया।

  • पनगढ़िया ने दी रुपये की गिरावट में हस्तक्षेप न करने की सलाह, बोले- 100 सिर्फ एक संख्या

    पनगढ़िया ने दी रुपये की गिरावट में हस्तक्षेप न करने की सलाह, बोले- 100 सिर्फ एक संख्या


    नई दिल्ली।
    नीति आयोग (Policy Commission) के पूर्व उपाध्यक्ष और प्रमुख अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India.- RBI) को रुपये के गिरावट (Decline of Rs) पर हस्तक्षेप न करने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि एक डॉलर के बराबर 100 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को नीति निर्धारण का आधार न बनाएं। पनगढ़िया ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि 100 भी बस एक संख्या है, ठीक 99 और 101 की तरह। उन्होंने साफ कहा कि कच्चे तेल (Crude oil) की कमी अल्पकालिक हो या दीर्घकालिक, इस समय रुपये को अपने स्तर पर गिरने देना ही सही नीति है।

    अर्थशास्त्री ने कहा कि यदि कच्चे तेल की कमी तीन महीने से एक साल तक की है तो रुपये में शुरुआती कमजोरी आएगी, लेकिन बाद में तेल कीमतों में नरमी आने पर रुपये में मजबूत वापसी होगी। इस दौरान विदेशी निवेशक ‘सस्ते’ रुपये का फायदा उठाकर भारत में निवेश बढ़ा सकते हैं। दीर्घकालिक तेल संकट की स्थिति में पनगढ़िया का मत है कि रुपये के अवमूल्यन के अलावा कोई विकल्प घाटे का सौदा साबित होगा। विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करके रुपये बचाने की कोशिश बेकार होगी, क्योंकि इससे कोई स्थायी फायदा नहीं होगा।

    उन्होंने डॉलर में बॉन्ड जारी करने या प्रवासी भारतीयों से ऊंची ब्याज दर पर जमा स्वीकार करने जैसे उपायों को अस्थायी राहत बताते हुए खारिज किया। पनगढ़िया ने चेतावनी दी कि इनसे प्राप्त विदेशी मुद्रा पर चुकाए जाने वाले ब्याज की लागत, मिलने वाले लाभ से ज्यादा होगी। पनगढ़िया ने आगे कहा कि मौजूदा समय 2013 जैसा नहीं है, जब मुद्रास्फीति दोहरे अंकों में थी। आज भारतीय अर्थव्यवस्था रुपये के कुछ अवमूल्यन से आने वाले मुद्रास्फीति दबाव को सहन करने की क्षमता रखती है।


    गुरुवार को रुपये में उछाल

    इस बीच, विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये ने गुरुवार को अपने सर्वकालिक निचले स्तर से उबरते हुए 50 पैसे की तेजी दर्ज की। अंतरबैंक बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये 96.36 पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान रुपये ने 96.05 के उच्चतम और 96.60 के निम्नतम स्तर को छुआ। बुधवार को रुपये ने 96.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद होने के बाद गुरुवार को मजबूती दिखाई। भू-राजनीतिक तनाव में कमी के संकेत और केंद्रीय बैंक के संभावित हस्तक्षेप की उम्मीद ने रुपये को सहारा दिया।


    क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?

    एचडीएफसी सिक्योरिटीज के शोध विश्लेषक दिलीप परमार ने कहा कि भू-राजनीतिक तनाव कम होने के शुरुआती संकेत और आरबीआई के सक्रिय हस्तक्षेप से रुपये संभला है। आगे निवेशकों का ध्यान भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और मौद्रिक नीति समीक्षा पर रहेगा। उन्होंने अनुमान जताया कि रुपये 95.74 से 96.50 के दायरे में रह सकता है। मिराए एसेट शेयरखान के अनुज चौधरी ने कहा कि आरबीआई के दखल और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से रुपये में मजबूती आई है।

  • ट्रंप को बड़ा झटका… ईरान के सुप्रीम लीडर बोले- विदेश नहीं भेजेंगे देश का यूरेनियम भंडार

    ट्रंप को बड़ा झटका… ईरान के सुप्रीम लीडर बोले- विदेश नहीं भेजेंगे देश का यूरेनियम भंडार


    तेहरान।
    अमेरिका (America) के साथ यूरेनियम (Uranium) को लेकर चल रही तीखी तकरार के बीच ईरान (Iran) ने बड़ा फैसला लिया है। दो वरिष्ठ ईरानी सूत्रों के मुताबिक, देश के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाखा मोजतबा मेनेई (Supreme Leader Ayatollah Mojtaba Menei) ने निर्देश जारी कर दिया है कि ईरान का लगभग हथियार-योग्य समृद्ध यूरेनियम भंडार विदेश नहीं भेजा जाएगा। इससे अमेरिका की प्रमुख मांग पर तेहरान का रुख और सख्त हो गया है। यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इजरायल के साथ मिलकर चल रही शांति वार्ता अब और जटिल हो सकती है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप ने इजरायल को आश्वासन दिया था कि ईरान का अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार देश से बाहर भेज दिया जाएगा और किसी भी शांति समझौते में इसे अनिवार्य शर्त बनाया जाएगा। नाम न छापने की शर्त पर बात करने वाले ईरानी सूत्रों ने बताया कि सर्वोच्च नेता का यह निर्देश और सत्ता के अंदरूनी हलकों में आम सहमति है कि समृद्ध यूरेनियम को देश से बाहर नहीं जाना चाहिए। अधिकारियों का मानना है कि ऐसा करने से ईरान भविष्य में अमेरिका-इजरायल हमलों के प्रति और अधिक कमजोर हो जाएगा।


    नेतन्याहू की सख्ती

    दूसरी ओर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा है कि जब तक ईरान से समृद्ध यूरेनियम हटाया नहीं जाता, उसके प्रॉक्सी मिलिशिया समर्थन बंद नहीं होते और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता समाप्त नहीं की जाती, तब तक युद्ध समाप्त नहीं माना जाएगा।


    ईरान को विश्वास नहीं

    28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमलों से शुरू हुए युद्ध के बाद अस्थिर युद्धविराम लागू है। इस दौरान ईरान ने खाड़ी राज्यों में अमेरिकी ठिकानों पर गोलीबारी की और लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ लड़ाई तेज हुई। हालांकि शांति प्रयास अभी तक नाकाम रहे हैं। ईरानी सूत्रों ने कहा कि तेहरान को आशंका है कि युद्धविराम वाशिंगटन का सिर्फ रणनीतिक धोखा है, ताकि नए हमलों की तैयारी की जा सके। ईरान के शीर्ष शांति वार्ताकार मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने बुधवार को कहा कि दुश्मन की गतिविधियां नए हमलों की तैयारी का संकेत दे रही हैं।


    अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्या कहा?

    ट्रंप ने बुधवार को कहा कि यदि ईरान शांति समझौते के लिए तैयार नहीं हुआ तो अमेरिका नए हमलों के लिए तैयार है, हालांकि उन्होंने कुछ दिनों का इंतजार करने का भी संकेत दिया। दोनों पक्षों ने कुछ मुद्दों पर समझौता शुरू कर दिया है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहरे मतभेद बरकरार हैं, खासकर समृद्ध यूरेनियम के भविष्य और संवर्धन अधिकार पर।


    ईरान का रुख सख्त

    ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि उनकी प्राथमिकता युद्ध का स्थायी समाधान और अमेरिका-इजरायल से कोई हमला न होने की विश्वसनीय गारंटी है। इसके बाद ही वे परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत बातचीत के लिए तैयार होंगे। ईरान लंबे समय से परमाणु बम बनाने से इनकार करता रहा है। युद्ध से पहले ईरान ने अपने 60% समृद्ध यूरेनियम भंडार का आधा हिस्सा बाहर भेजने पर सहमति जताई थी, लेकिन ट्रंप की लगातार धमकियों के बाद यह रुख बदल गया, जिसका परिणाम अब सबके सामने है।


    क्या कह रहे आईएईए के आंकड़े?

    अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, जून 2025 के हमलों के समय ईरान के पास 440.9 किलोग्राम 60% समृद्ध यूरेनियम था। हमलों के बाद बचा हुआ भंडार मुख्य रूप से इस्फहान और नतांज के परमाणु केंद्रों में सुरक्षित है। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि उसे चिकित्सा और अनुसंधान रिएक्टर के लिए सीमित मात्रा में अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम की जरूरत है।

  • इस दिन रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे सूर्य देव…. नौतपा में पड़ेगी प्रचंड गर्मी

    इस दिन रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे सूर्य देव…. नौतपा में पड़ेगी प्रचंड गर्मी


    नई दिल्ली।
    ज्येष्ठ महीने (Jyeshtha month) के शुरू होते ही गर्मी अपना प्रचंड (Extreme Heat) रूप दिखाने लगी है. लेकिन अब नौतपा (Nautapa) के चलते सूरज आग के गोले की तरह तपने वाला है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, 25 मई 2026 को दोपहर 03:37 बजे ग्रहों के राजा सूर्य देव अपने मित्र चंद्रमा के नक्षत्र ‘रोहिणी’ (Nakshatra ‘Rohini’) में प्रवेश कर रहे हैं. सूर्य का यह नक्षत्र परिवर्तन (Surya Nakshatra Parivartan 2026) प्रकृति और मानव जीवन पर बड़ा असर डालेगा. सूर्य के रोहिणी में आते ही 25 मई से 2 जून 2026 तक ‘नौतपा’ रहेगा, जिसके कारण उत्तर और मध्य भारत में भीषण हीटवेव (लू) की स्थिति बनेगी।

    वैदिक ज्योतिष के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा हैं, जो शीतलता के प्रतीक हैं. जब अग्नि तत्व सूर्य देव इस नक्षत्र में आते हैं, तो वे इसकी शीतलता को सोख लेते हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाता है. सूर्य का यह उग्र रूप 8 जून 2026 तक रहेगा, लेकिन शुरुआती 9 दिन यानी नौतपा का समय सबसे ज्यादा कष्टप्रद होगा. सूर्य के इस गोचर से जहां कुछ राशियों को लाभ होगा, वहीं 4 विशेष राशियां ऐसी हैं जिन्हें इस दौरान आर्थिक, मानसिक और स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारी नुकसान और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।


    1. वृषभ राशि (Taurus)

    चूंकि सूर्य देव आपकी ही राशि में रहते हुए रोहिणी नक्षत्र में गोचर कर रहे हैं, इसलिए इसका सबसे सीधा और गहरा प्रभाव आप पर पड़ेगा. इस अवधि में आपके स्वभाव में बेवजह का गुस्सा, अहंकार और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है. कार्यस्थल पर सहकर्मियों या बिजनेस में पार्टनर के साथ गंभीर विवाद हो सकते हैं. 25 मई से 8 जून के बीच पार्टनरशिप के कामों में कोई भी बड़ा फैसला जल्दबाजी में न लें. अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें, अन्यथा बनते काम बिगड़ सकते हैं.


    2. मिथुन राशि (Gemini)

    मिथुन राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर आपकी राशि से बारहवें भाव यानी व्यय और हानि के भाव में होने जा रहा है. इस दौरान आपके खर्चों में अप्रत्याशित रूप से भारी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे बजट पूरी तरह बिगड़ जाएगा. धन हानि के प्रबल योग बन रहे हैं. किसी कानूनी मामले या कोर्ट-कचहरी के चक्कर में दौड़भाग और मानसिक तनाव बढ़ सकता है. इस समय अवधि में किसी को भी बड़ा कर्ज या उधार देने से बचें. पैसों के लेनदेन में पूरी सतर्कता बरतें.


    3. वृश्चिक राशि (Scorpio)

    सूर्य देव आपकी राशि से सातवें भाव (साझेदारी और वैवाहिक जीवन) में गोचर करेंगे, जो सीधे आपके रिश्तों को प्रभावित करेगा. दांपत्य जीवन में जीवनसाथी के साथ गलतफहमियां और तनाव बढ़ सकता है. व्यापार में यदि पार्टनरशिप है, तो वहां भी मतभेद उभर सकते हैं. कार्यक्षेत्र में आपकी प्रतिष्ठा को थोड़ी ठेस पहुंचने की आशंका है. जीवनसाथी के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें. किसी भी व्यावसायिक दस्तावेज पर बिना अच्छी तरह पढ़े हस्ताक्षर न करें.


    4. कुंभ राशि (Aquarius)

    कुंभ राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर चौथे भाव में होने जा रहा है, जिसे सुख, संपत्ति और माता का भाव माना जाता है. पारिवारिक सुख-शांति में कमी आ सकती है और घरेलू मोर्चे पर वाद-विवाद की स्थिति बन सकती है. भूमि, मकान या वाहन से जुड़े मामलों में अचानक रुकावटें आ सकती हैं. इसके अलावा, सेहत में गिरावट आ सकती है. अपनी माता के स्वास्थ्य को लेकर बिल्कुल भी लापरवाही न बरतें. सीने में तकलीफ या हाई ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) के मरीज इस दौरान अपनी दवाइयां समय पर लें और धूप में निकलने से बचें.

  • चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास

    चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास


    नई दिल्ली ।भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना एक बड़ी जरूरत बन जाता है। ऐसे समय में लोग आमतौर पर छाछ, लस्सी और नींबू पानी का सहारा लेते हैं, लेकिन रोज एक ही स्वाद से मन ऊब जाता है। इसी वजह से फालसा छाछ एक बेहतरीन और पारंपरिक विकल्प के रूप में सामने आती है, जो न केवल शरीर को ठंडक देती है बल्कि अपने खट्टे-मीठे स्वाद से ताजगी का नया अनुभव भी कराती है। यह पेय गर्मियों में शरीर को अंदर से ठंडा रखने और लू के असर को कम करने में मददगार माना जाता है।

    फालसा एक मौसमी फल है जिसमें प्राकृतिक रूप से ठंडक देने वाले गुण पाए जाते हैं। जब इसे दही और मसालों के साथ मिलाकर छाछ के रूप में तैयार किया जाता है तो यह एक सुपर समर ड्रिंक बन जाता है। यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के साथ-साथ ऊर्जा भी प्रदान करता है और पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।

    फालसा छाछ बनाने के लिए सबसे पहले ताजे फालसा को अच्छी तरह धोकर एक बर्तन में लिया जाता है। इसमें हल्की मात्रा में चीनी या मिश्री और थोड़ा पानी मिलाकर इसे हाथों से अच्छे से मसल लिया जाता है ताकि इसका गूदा अलग हो जाए और स्वाद पूरी तरह निकल आए। इसके बाद इस मिश्रण को छानकर बीज अलग कर दिए जाते हैं और एक गाढ़ा खट्टा-मीठा जूस तैयार किया जाता है।

    इसके बाद एक बड़े बर्तन में ताजा दही लिया जाता है और उसमें ठंडा पानी मिलाया जाता है। इसी में तैयार फालसा जूस डाला जाता है। स्वाद को संतुलित बनाने के लिए काला नमक और भुना जीरा पाउडर मिलाया जाता है। इन सभी चीजों को अच्छे से मथकर तब तक फेंटा जाता है जब तक मिश्रण हल्का झागदार और स्मूद न हो जाए। यह प्रक्रिया छाछ को और अधिक स्वादिष्ट और पाचक बना देती है।

    तैयार छाछ को सर्व करने के लिए गिलास में बर्फ के टुकड़े डाले जाते हैं और ऊपर से यह ठंडी फालसा छाछ डाली जाती है। इसे पुदीने की पत्तियों और भुने जीरे से सजाकर परोसा जाता है। इसका स्वाद न केवल शरीर को ठंडक देता है बल्कि मानसिक रूप से भी ताजगी का अहसास कराता है।

    गर्मी के मौसम में यह पेय शरीर के लिए कई तरह से फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद दही के प्रोबायोटिक्स पाचन को सुधारते हैं और पेट की जलन को कम करते हैं। वहीं फालसा में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन C शरीर को लू और तेज धूप के असर से बचाने में मदद करते हैं। यह ड्रिंक शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखकर डिहाइड्रेशन से भी राहत दिलाती है।

    इस तरह फालसा छाछ सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि गर्मियों में शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने का एक आसान और स्वादिष्ट उपाय है, जिसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और रोजाना सेवन किया जा सकता है।

  • ग्रामीण और शहरी भारत के लिए बड़ा बदलाव, डाक विभाग की नई सर्विस से घर बैठे लोन और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध

    ग्रामीण और शहरी भारत के लिए बड़ा बदलाव, डाक विभाग की नई सर्विस से घर बैठे लोन और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध

    नई दिल्ली ।भारतीय वित्तीय सेवाओं के डिजिटल विस्तार में एक नया अध्याय जुड़ गया है, जहां अब बैंकिंग सुविधाएं सिर्फ शाखाओं तक सीमित नहीं रहेंगी बल्कि सीधे आम नागरिकों के घर तक पहुंचेंगी। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक द्वारा शुरू की गई नई स्मार्ट पोस्टमैन सेवा के तहत अब डाकिया केवल पत्र या पार्सल ही नहीं, बल्कि वित्तीय सेवाओं का पूरा पैकेज लेकर लोगों के दरवाजे तक पहुंचेगा। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं को और अधिक सरल, तेज और सुलभ बनाना बताया जा रहा है।

    नई व्यवस्था के तहत डाकिया अब बायोमेट्रिक डिवाइस और डिजिटल टैबलेट के माध्यम से लोगों को पर्सनल लोन, माइक्रो इंश्योरेंस और डिजिटल लॉकर जैसी सेवाएं उपलब्ध कराने में सक्षम होगा। इसका सीधा लाभ उन लोगों को मिलेगा जो बैंक शाखाओं तक पहुंचने में असमर्थ हैं या जिनके लिए बैंकिंग प्रक्रियाएं जटिल और समय लेने वाली साबित होती हैं। इस पहल से वित्तीय समावेशन को भी नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    सेवा के तहत ग्राहक घर बैठे ही लोन के लिए आवेदन कर सकेंगे और डाकिया उनके घर पहुंचकर आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन करेगा। सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद पात्रता के आधार पर लोन की राशि सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर की जा सकेगी। इसी तरह माइक्रो इंश्योरेंस की सुविधा भी सरल प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे छोटे प्रीमियम पर बीमा कवरेज हासिल किया जा सकेगा।

    डिजिटल लॉकर सेवा के माध्यम से नागरिक अपने महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संरक्षित कर सकेंगे। डाकिया इस प्रक्रिया में दस्तावेजों को स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित करने में सहायता करेगा, जिससे कागजी दस्तावेजों के खोने या खराब होने की समस्या से राहत मिलने की संभावना है। यह कदम विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जो अपने दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं।

    इस पूरी व्यवस्था को सरकार के वित्तीय समावेशन अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य देश के अंतिम व्यक्ति तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाना है। विशेषज्ञों के अनुसार इस पहल से छोटे व्यवसायियों, किसानों और निम्न आय वर्ग के परिवारों को काफी राहत मिल सकती है, क्योंकि उन्हें छोटे-छोटे वित्तीय कार्यों के लिए अब बैंक शाखाओं के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

    हालांकि, इस नई व्यवस्था के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या और डिजिटल साक्षरता की कमी इस सेवा के प्रभावी संचालन में बाधा बन सकती है। इसके अलावा डाक कर्मचारियों पर बढ़ती जिम्मेदारियों के चलते उन्हें विशेष प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी ताकि सेवा की गुणवत्ता प्रभावित न हो।

    इसके बावजूद यह पहल भारतीय डाक प्रणाली को एक नए डिजिटल वित्तीय ढांचे में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल बैंकिंग व्यवस्था को सरल बनाएगा बल्कि देश के आर्थिक ढांचे में भी व्यापक बदलाव ला सकता है।

  • चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी

    चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी


    नई दिल्ली। चंदन यानी सैंडलवुड आयुर्वेद में सदियों से त्वचा की देखभाल के लिए उपयोग किया जाता रहा है। इसे फेस पैक या लेप के रूप में लगाने से त्वचा को ठंडक, निखार और कई प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है। खासकर गर्मी के मौसम में चंदन फेस केयर लेप को बेहद फायदेमंद माना जाता है।

    चंदन फेस पैक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह त्वचा की जलन और सनबर्न को शांत करता है। गर्मी या धूप के कारण होने वाली त्वचा की लालिमा को यह कम करने में मदद करता है। इसके नियमित उपयोग से त्वचा का रंग साफ और चमकदार दिखाई देने लगता है। साथ ही यह मुंहासों (acne) और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक माना जाता है।

    चंदन में मौजूद प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण त्वचा को संक्रमण से बचाते हैं। यह अतिरिक्त तेल (excess oil) को नियंत्रित करने में भी मदद करता है, जिससे ऑयली स्किन वालों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। कई लोग इसे बेसन, हल्दी या गुलाब जल के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में उपयोग करते हैं।

    हालांकि, चंदन फेस पैक के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। संवेदनशील त्वचा (sensitive skin) वाले लोगों को इससे एलर्जी, खुजली या रैशेज की समस्या हो सकती है। यदि चंदन की गुणवत्ता शुद्ध न हो या उसमें केमिकल मिले हों, तो यह त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है।

    कुछ लोगों में इसका अधिक उपयोग त्वचा को अत्यधिक सूखा (dry) बना सकता है। इसलिए इसे हफ्ते में 2–3 बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उपयोग से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी माना जाता है ताकि किसी भी तरह की एलर्जी से बचा जा सके।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सैंडलवुड का सही और सीमित उपयोग त्वचा के लिए लाभकारी है, लेकिन गलत तरीके से या अधिक मात्रा में उपयोग नुकसानदेह भी हो सकता है। इसलिए हमेशा प्राकृतिक और शुद्ध चंदन पाउडर का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो चंदन फेस केयर लेप एक पारंपरिक और प्रभावी स्किन केयर उपाय है, जो सही तरीके से इस्तेमाल करने पर त्वचा को प्राकृतिक निखार और ठंडक प्रदान करता है। लेकिन सावधानी और संतुलन इसके उपयोग की सबसे बड़ी जरूरत है।

  • बाजार में क्या रहेगा ट्रेंड? जानें 22 मई का शेयर मार्केट और गोल्ड आउटलुक

    बाजार में क्या रहेगा ट्रेंड? जानें 22 मई का शेयर मार्केट और गोल्ड आउटलुक


    नई दिल्ली। 22 मई 2026 को भारतीय शेयर बाजार और सर्राफा बाजार दोनों में हलचल देखने को मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों के संकेत, डॉलर की चाल, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां शुक्रवार के कारोबार की दिशा तय करेंगी। विशेषज्ञों के अनुसार, शेयर बाजार में जहां उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, वहीं सोने की कीमतों में हल्की तेजी देखने को मिल सकती है।

    भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक BSE Sensex और NIFTY 50 में शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में दबाव और खरीदारी दोनों का मिश्रित असर देखने को मिल सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और वैश्विक बाजारों का रुख निवेशकों की धारणा को प्रभावित करेगा।

    आईटी, बैंकिंग और ऑटो सेक्टर के शेयरों में हल्की मजबूती देखने को मिल सकती है, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में मुनाफावसूली का दबाव रह सकता है। पिछले कुछ दिनों से बाजार में जारी तेजी के बाद निवेशक अब सतर्क नजर आ रहे हैं। ऐसे में ट्रेडिंग के दौरान उतार-चढ़ाव अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी जारी रहती है तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। वहीं अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक आर्थिक संकेतकों का असर भी भारतीय बाजार पर दिखाई देगा। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे बिना रणनीति के बड़े निवेश से बचें और स्टॉप लॉस के साथ ट्रेडिंग करें।

    दूसरी ओर, सर्राफा बाजार में सोना की कीमतों में तेजी के संकेत मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की कमजोरी और सुरक्षित निवेश के बढ़ते रुझान के कारण सोने की मांग बढ़ सकती है। अनुमान है कि 24 कैरेट सोना 98 हजार से 99 हजार 500 रुपए प्रति 10 ग्राम के बीच कारोबार कर सकता है, जबकि 22 कैरेट सोने का भाव 89 हजार 500 से 91 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम तक रह सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव के माहौल में निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं। यही वजह है कि गोल्ड में लगातार निवेश बढ़ रहा है। हालांकि शहरों और राज्यों के हिसाब से टैक्स और मेकिंग चार्ज के कारण कीमतों में थोड़ा अंतर हो सकता है।

    आर्थिक जानकारों के अनुसार, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बाजार में गिरावट के दौरान अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदना फायदेमंद हो सकता है। वहीं सोने में निवेश करने वालों के लिए डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF भी अच्छे विकल्प बनकर उभर रहे हैं।

    कुल मिलाकर 22 मई का दिन निवेशकों के लिए काफी अहम रहने वाला है। शेयर बाजार में जहां सावधानी के साथ निवेश की जरूरत होगी, वहीं सोने की चमक निवेशकों को आकर्षित कर सकती है।

  • गोवा की बेकरी परंपरा को नई उड़ान, GI टैग से बढ़ेगा पारंपरिक ब्रेड्स का अंतरराष्ट्रीय बाजार

    गोवा की बेकरी परंपरा को नई उड़ान, GI टैग से बढ़ेगा पारंपरिक ब्रेड्स का अंतरराष्ट्रीय बाजार

    नई दिल्ली । गोवा की समृद्ध पाक परंपरा में शामिल पारंपरिक ब्रेड्स पोई, पाओ और उंडो को जल्द ही भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिलने की संभावना है। यह कदम न केवल इन पारंपरिक व्यंजनों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि इससे स्थानीय बेकरी उद्योग को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने इन ब्रेड्स के लिए संयुक्त रूप से GI टैग के लिए आवेदन प्रस्तुत किया है, जिससे गोवा की सदियों पुरानी बेकरी परंपरा को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

    गोवा की इन पारंपरिक ब्रेड्स की जड़ें पुर्तगाली शासनकाल से जुड़ी हुई मानी जाती हैं, जब पाओ बनाने की तकनीक राज्य में आई थी। समय के साथ यह परंपरा गोवा की स्थानीय संस्कृति में इस तरह रच-बस गई कि आज यह वहां के दैनिक भोजन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। पोई, पाओ और उंडो न केवल स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि इनकी खास सुगंध और बनावट इन्हें अन्य ब्रेड्स से अलग पहचान देती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की पारंपरिक विधियों को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इनके असली स्वरूप को बनाए रखने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे मार्केटिंग और ब्रांडिंग को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे इन ब्रेड्स की मांग राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ सकती है।

    स्थानीय बेकरी उद्योग लंबे समय से कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनमें पारंपरिक सामग्री की कमी और बदलती उत्पादन प्रक्रियाएं प्रमुख हैं। पहले जहां इन ब्रेड्स को पारंपरिक तरीकों और प्राकृतिक खमीर जैसी विधियों से तैयार किया जाता था, वहीं अब कई जगहों पर व्यावसायिक खमीर का उपयोग बढ़ गया है, जिससे इनके मूल स्वाद और गुणवत्ता में बदलाव देखा जा रहा है।

    इसके बावजूद गोवा में आज भी सैकड़ों बेकरी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं और पीढ़ियों से चली आ रही विधियों का पालन कर रही हैं। अनुमान है कि राज्य की अधिकांश बेकरी अभी भी इन पारंपरिक ब्रेड्स का उत्पादन करती हैं, जो स्थानीय लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा हैं।

    GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ने की उम्मीद है, खासकर उन देशों में जहां गोवा के प्रवासी समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं। इससे न केवल स्थानीय उत्पादकों को बेहतर मूल्य मिलेगा बल्कि गोवा की सांस्कृतिक पहचान भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर और मजबूत होगी।

    राज्य पहले से ही कई कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए GI टैग प्राप्त कर चुका है और अब पारंपरिक ब्रेड्स का यह कदम इस सूची को और समृद्ध कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल गोवा की खाद्य विरासत को वैश्विक मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाएगी।

  • यूपी पंचायतों में बड़ा बदलाव या राजनीतिक रणनीति? कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक बनाने की तैयारी से सियासी हलचल तेज

    यूपी पंचायतों में बड़ा बदलाव या राजनीतिक रणनीति? कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक बनाने की तैयारी से सियासी हलचल तेज

    नई दिल्ली  /उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासनिक ढांचे को लेकर एक नए संभावित प्रयोग ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में गहरी बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार इस विकल्प पर विचार कर रही है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी दी जा सकती है। अगर यह फैसला लागू होता है तो यह प्रदेश के पंचायत इतिहास में एक अभूतपूर्व कदम माना जाएगा, क्योंकि अब तक इस तरह की व्यवस्था कभी नहीं अपनाई गई है।

    परंपरागत रूप से पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने और नए चुनाव होने तक की अवधि में प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों के पास रहती रही है, लेकिन इस बार तस्वीर बदलती नजर आ रही है। प्रस्ताव के तहत पंचायतों का कामकाज उन्हीं चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में रहने की संभावना है, जिनका कार्यकाल पूरा हो चुका होगा। इस संभावित बदलाव को लेकर जहां एक ओर इसे प्रशासनिक निरंतरता का कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे ग्रामीण राजनीति में सत्ता संतुलन से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ग्रामीण स्तर पर संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने की रणनीति भी हो सकती है। उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में ग्राम प्रधान होते हैं, जो स्थानीय स्तर पर जनता और शासन के बीच सबसे अहम कड़ी माने जाते हैं। गांवों में विकास कार्यों से लेकर जनकल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन तक में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में इनका प्रशासनिक रूप से सक्रिय रहना ग्रामीण राजनीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।

    इस पूरे मुद्दे के केंद्र में पंचायत चुनावों की संभावित देरी भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। ओबीसी आरक्षण से जुड़ी प्रक्रियाओं और आयोग की रिपोर्ट के चलते पंचायत चुनावों के समय पर होने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसी वजह से यह संभावना जताई जा रही है कि मौजूदा व्यवस्था को कुछ समय तक जारी रखने के लिए प्रशासनिक विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

    वहीं विपक्ष इस संभावित फैसले पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव टालकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर किया जा रहा है और इससे ग्रामीण स्तर पर सत्ता का संतुलन प्रभावित हो सकता है। उनका तर्क है कि अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को ही प्रशासक बना दिया गया तो निष्पक्ष प्रशासन की अवधारणा पर असर पड़ सकता है और यह राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा कानून में सरकार को असाधारण परिस्थितियों में प्रशासक नियुक्त करने का अधिकार जरूर दिया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों को दी जा सकती है या नहीं। इसी कारण इस प्रस्ताव को लेकर भविष्य में कानूनी चुनौती की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।

    प्रशासनिक स्तर पर यह भी चर्चा है कि अगर ग्राम पंचायतों में यह मॉडल लागू होता है तो इसका असर क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर तक भी जा सकता है, जहां पहले से ही सरकारी अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता रहा है। ऐसे में पूरे पंचायत ढांचे में एक नया प्रशासनिक और राजनीतिक मॉडल आकार ले सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण राजनीति की दिशा तय करने वाले संभावित कदम के रूप में भी समझा जा रहा है। गांवों में राजनीतिक पकड़ और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले समय में और अधिक चर्चा में रहने की संभावना है।