Author: bharati

  • जब सीएम को याद आया पूर्व जन्म, जीतू पटवारी ने बताया भ्रष्टाचार का रेट, नरोत्तम मिश्रा ने कार्यकर्ता को पहनाए जूते

    जब सीएम को याद आया पूर्व जन्म, जीतू पटवारी ने बताया भ्रष्टाचार का रेट, नरोत्तम मिश्रा ने कार्यकर्ता को पहनाए जूते


    कटनी । मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों नेताओं के अलग अलग अंदाज चर्चा का विषय बने हुए हैं। कहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी सरकार पर भ्रष्टाचार को लेकर निशाना साधते नजर आए तो कहीं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पूर्व जन्म का जिक्र कर लोगों का ध्यान खींचा। पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपने कार्यकर्ता को खुद जूते पहनाए जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान आदिवासी ग्रामीणों के साथ थिरकते दिखाई दिए। इन घटनाओं ने प्रदेश की राजनीति में जनसंपर्क और नेताओं की सार्वजनिक छवि को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

    जीतू पटवारी ने मंच से दिखाया भ्रष्टाचार का कथित रेट कार्ड

    कटनी जिले के बरही में पहुंचे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने एक कार्यक्रम के दौरान सरकार पर भ्रष्टाचार को लेकर हमला बोला। हाल ही में एक अधिकारी का वीडियो सामने आया था जिसमें नगरीय निकायों में भ्रष्टाचार को लेकर बातें कही गई थीं। इसी मुद्दे को उठाते हुए पटवारी मंच पर डस्टबिन फिनाइल की कैन और बल्ब लेकर पहुंचे। उन्होंने इन वस्तुओं की कीमतों का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि एक बाल्टी की कीमत एक लाख रुपये फिनाइल की बोतल की कीमत 36 हजार रुपये और बल्ब की कीमत 11 हजार रुपये बताई जा रही है। इन उदाहरणों के जरिए उन्होंने सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाए। हालांकि इन कीमतों और आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही की जा सकती है।

    पटवारी ने उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के कार्यालय से जुड़े एक अधिकारी पर रिश्वत लेने के मामले को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए सरकार को घेरने की कोशिश की। इसी दौरान बरही में उनकी बाइक रैली भी चर्चा में रही। पटवारी खुद बुलेट चलाते नजर आए लेकिन उनके सिर पर हेलमेट नहीं था। रैली में दूसरे कार्यकर्ताओं के भी बिना हेलमेट होने की बात सामने आई। इस घटना को लेकर यातायात नियमों के पालन पर सवाल उठे।

    दिग्विजय सिंह की यात्रा में राम भजन के साथ सियासी नारे

    पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह दशहरे पर उज्जैन से राम नाम के साथ सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा लेकर निकले थे। यह यात्रा अयोध्या तक जाने वाली है। शाजापुर पहुंचने पर दिग्विजय सिंह एक राम भजन पर थिरकते नजर आए। लेकिन यात्रा के दौरान राजनीतिक नारे भी सुनाई दिए। रिपोर्ट के मुताबिक वहां भाजपा के खिलाफ चंदा चोरी और वोट चोरी से जुड़े नारे लगाए गए। दिग्विजय सिंह ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली इंडिया गठबंधन की रैली के लिए लोगों को आमंत्रित भी किया। इससे यात्रा के गैरराजनीतिक होने के दावे और उसके दौरान दिखे राजनीतिक संदेशों को लेकर चर्चा शुरू हो गई।

    नरोत्तम मिश्रा ने कार्यकर्ता को पहनाए जूते

    दतिया के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा अपने एक कार्यकर्ता को जूते पहनाने के कारण चर्चा में आए। बताया गया कि 2023 के विधानसभा चुनाव में कार्यकर्ता के बूथ पर भाजपा को हार मिली थी। इसके बाद उसने प्रण लिया था कि जब तक वह अपने बूथ पर पार्टी को जीत नहीं दिलाएगा तब तक जूते चप्पल नहीं पहनेगा। हालिया उपचुनाव में उसके बूथ पर भाजपा को अधिक वोट मिलने के बाद जूते पहनने का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान नरोत्तम मिश्रा ने खुद कार्यकर्ता को जूते पहनाए और उसके लेस बांधे। यह दृश्य पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ नेताओं के जुड़ाव के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

    सीएम मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के अलग अंदाज

    बड़वानी जिले के सेंधवा दौरे के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मलखंब का प्रदर्शन देखा और प्रभावित होकर एक बच्चे को अपने कंधे पर बैठा लिया। एक कार्यक्रम में बारेली बोली का जिक्र होने पर उन्होंने इसे सीखने की बात कही और अपने पूर्व जन्म में बारेला होने का उल्लेख किया। उनके इस बयान की चर्चा जनसंपर्क के संदर्भ में हुई।

    वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने संसदीय क्षेत्र के नीलगढ़ गांव पहुंचे जहां विस्थापन से जुड़े मुद्दों के बीच वे आदिवासी ग्रामीणों के साथ बैठे और भोजन किया। वे ग्रामीणों के साथ नाचते थिरकते भी दिखाई दिए। उन्होंने वनों और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए गांव छोड़ने के फैसले को त्याग और प्रकृति के प्रति प्रेम का उदाहरण बताया।

    प्रदेश की इन घटनाओं से साफ है कि राजनीतिक गतिविधियों में भाषणों के साथ नेताओं के व्यवहार और सार्वजनिक कार्यक्रमों की तस्वीरें भी चर्चा का हिस्सा बन रही हैं। कहीं आरोपों के जरिए सरकार को घेरा जा रहा है तो कहीं भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए जनता तक पहुंचने की कोशिश दिखाई दे रही है।

  • रेल यात्रियों के सफर को आरामदायक बनाने की पहल, भोपाल में विशेष उपकरण से बदली गई बोगी की तकनीक

    रेल यात्रियों के सफर को आरामदायक बनाने की पहल, भोपाल में विशेष उपकरण से बदली गई बोगी की तकनीक


    भोपाल । भोपाल स्थित सवारी डिब्बा पुनर्वास कारखाने यानी सीआरडब्ल्यूएस ने रेलवे के तकनीकी कामकाज में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। कारखाने में पहली बार कॉइल स्प्रिंग बोगी को एयर सस्पेंशन बोगी में बदलने का काम सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। इस बदलाव का उद्देश्य रेल यात्रा के दौरान कोच में महसूस होने वाले झटकों और कंपन के प्रभाव को कम करना है। इससे यात्रियों को अपेक्षाकृत आरामदायक सफर का अनुभव मिल सकता है। खासकर लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए यह तकनीकी सुधार उपयोगी साबित हो सकता है।

    पश्चिम मध्य रेलवे के अंतर्गत आने वाले इस कारखाने में बोगी के निचले ढांचे में एयर सस्पेंशन प्रणाली लगाने के लिए विशेष उपकरण तैयार किया गया। इस काम की खास बात यह रही कि कारखाने में उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए तकनीकी जरूरत के अनुसार उपकरण बनाया गया। इसकी सहायता से बोगी में चारों कंसोल को निर्धारित स्थान पर सटीकता के साथ लगाने की प्रक्रिया पूरी की गई। इस तरह के तकनीकी बदलाव में सटीक माप और सही फिटिंग का विशेष महत्व होता है क्योंकि बोगी के विभिन्न हिस्सों की स्थिति और उनकी कार्यप्रणाली का असर कोच के संचालन पर पड़ता है।

    इस प्रक्रिया के दौरान पुराने कंसोल को हटाकर उनकी जगह नए कंसोल और ब्रैकेट लगाए गए। यह काम तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मौजूदा ढांचे में बदलाव करते हुए नए सस्पेंशन सिस्टम के अनुरूप व्यवस्था तैयार करनी थी। कारखाने के कर्मचारियों ने विशेष उपकरण की मदद से इस काम को पूरा किया। इससे यह भी सामने आया कि जरूरत के अनुसार स्थानीय स्तर पर उपकरण विकसित करके तकनीकी कार्यों को अधिक सटीकता के साथ अंजाम दिया जा सकता है।

    कॉइल स्प्रिंग और एयर सस्पेंशन प्रणाली में मुख्य अंतर उनके काम करने के तरीके का है। कॉइल स्प्रिंग में धातु की स्प्रिंग के माध्यम से झटकों को संभालने में मदद मिलती है जबकि एयर सस्पेंशन में हवा के दबाव पर काम करने वाली व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है। एयर सस्पेंशन प्रणाली का उद्देश्य कोच को मिलने वाले झटकों और कंपन के असर को कम करना है। हालांकि वास्तविक आराम और प्रदर्शन का आकलन संबंधित तकनीकी परीक्षणों और परिचालन परिणामों के आधार पर ही किया जा सकता है।

    रेलवे में यात्रियों की सुविधा के साथ कोचों की गुणवत्ता और तकनीकी दक्षता पर भी लगातार ध्यान दिया जा रहा है। भोपाल के सीआरडब्ल्यूएस में किया गया यह काम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। विशेष उपकरण तैयार करने और मौजूदा बोगी के ढांचे में जरूरी बदलाव करने का अनुभव भविष्य में इस तरह के अन्य तकनीकी कार्यों में भी मददगार हो सकता है।

    इस उपलब्धि से कारखाने के कर्मचारियों की तकनीकी क्षमता और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग की भूमिका भी सामने आई है। एयर सस्पेंशन प्रणाली से लैस बोगी का वास्तविक लाभ उसके परीक्षण और संचालन के बाद स्पष्ट होगा। फिर भी इस तरह के प्रयोग रेलवे को कोचों की तकनीक में सुधार करने और यात्रियों के सफर को अधिक सुविधाजनक बनाने की दिशा में नए विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं।

  • मध्यप्रदेश की योजनाओं को रफ्तार देने की तैयारी, हर भाजपा सांसद बनेगा केंद्रीय मंत्रालय का कॉर्डिनेटर

    मध्यप्रदेश की योजनाओं को रफ्तार देने की तैयारी, हर भाजपा सांसद बनेगा केंद्रीय मंत्रालय का कॉर्डिनेटर


    भोपाल । मध्यप्रदेश में केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय को मजबूत बनाने के लिए भाजपा एक नई व्यवस्था शुरू करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत प्रदेश के प्रत्येक भाजपा सांसद को केंद्र सरकार के एक मंत्रालय के साथ समन्वय की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव सामने आया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मध्यप्रदेश से जुड़ी केंद्रीय योजनाओं परियोजनाओं और लंबित स्वीकृतियों के मामलों को तेजी से आगे बढ़ाना है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित पार्टी की कोर ग्रुप बैठक में यह सुझाव रखा। प्रस्ताव के अनुसार सांसद अपने निर्धारित मंत्रालय से संबंधित प्रदेश के मामलों की निगरानी करेंगे और जरूरत पड़ने पर केंद्रीय स्तर पर उनकी पैरवी करेंगे।

    इस प्रस्ताव के तहत सांसदों की भूमिका केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि उन्हें केंद्र और राज्य के बीच संपर्क की एक अतिरिक्त कड़ी के रूप में इस्तेमाल करने की योजना है। मध्यप्रदेश के अलग-अलग विभागों को केंद्र सरकार की योजनाओं के लिए वित्तीय मंजूरी परियोजनाओं की स्वीकृति और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों से लगातार संपर्क करना पड़ता है। कई बार इन मामलों में जानकारी जुटाने और निर्णय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में समय लगता है। ऐसे में यदि प्रत्येक मंत्रालय के लिए एक सांसद की जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित विभागों को अपने मुद्दे उठाने के लिए एक निर्धारित माध्यम मिल सकता है।

    प्रस्ताव के मुताबिक संबंधित सांसद मुख्यमंत्री मुख्य सचिव और मध्यप्रदेश के संबंधित विभाग के अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव के साथ समन्वय करेंगे। प्रदेश में किसी योजना या परियोजना से जुड़ा मामला केंद्रीय मंत्रालय में लंबित होने पर सांसद उसकी स्थिति की जानकारी लेकर दिल्ली में संबंधित अधिकारियों के सामने विषय रख सकेंगे। इससे राज्य सरकार की प्राथमिकताओं को केंद्र तक पहुंचाने और आवश्यक मंजूरियों के लिए नियमित संपर्क बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि इस व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जिम्मेदारियां किस तरह बांटी जाती हैं और मामलों की समीक्षा कितनी नियमित होती है।

    मध्यप्रदेश में लोकसभा की सभी 29 सीटों पर भाजपा के सांसद हैं। ऐसे में पार्टी के पास इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए सांसदों का व्यापक समूह उपलब्ध है। सांसदों के अनुभव उनकी प्रशासनिक समझ और संबंधित क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी का उपयोग प्रदेश की योजनाओं को आगे बढ़ाने में किया जा सकता है। केंद्र सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों में सड़क परिवहन ग्रामीण विकास कृषि ऊर्जा आवास स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय होते हैं। इनसे संबंधित मध्यप्रदेश के प्रस्तावों पर समन्वय की जिम्मेदारी तय होने से विभागों को अपने मामलों की स्थिति पर नजर रखने में सुविधा मिल सकती है।

    इस व्यवस्था से लंबित परियोजनाओं की पैरवी और केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी को व्यवस्थित करने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि किसी परियोजना के लिए वित्तीय सहायता या प्रशासनिक मंजूरी जरूरी है तो संबंधित सांसद विभागीय अधिकारियों से जानकारी लेकर केंद्रीय मंत्रालय के साथ संपर्क कर सकेंगे। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के स्तर पर प्राथमिकता वाले मामलों की समीक्षा होने से राज्य सरकार की जरूरतों और केंद्र के निर्णयों के बीच तालमेल बेहतर करने का प्रयास किया जा सकता है।

    प्रस्तावित व्यवस्था का एक अहम पहलू जवाबदेही भी है। मंत्रालयवार जिम्मेदारी तय होने पर यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि किस केंद्रीय मंत्रालय से जुड़े मामलों की पैरवी कौन-सा सांसद कर रहा है और उन पर कितनी प्रगति हुई है। इससे लंबित प्रस्तावों की स्थिति की समीक्षा करना आसान हो सकता है। साथ ही अधिकारियों को विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग संपर्क करने के बजाय सांसद के माध्यम से समन्वय का एक अतिरिक्त रास्ता मिलेगा।

    फिलहाल यह व्यवस्था प्रस्ताव के स्तर पर है। इसे किस रूप में लागू किया जाएगा और सांसदों को कौन-कौन से मंत्रालय सौंपे जाएंगे इस बारे में विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है। यदि योजना को व्यवस्थित तरीके से लागू किया जाता है तो इससे मध्यप्रदेश की केंद्रीय योजनाओं और परियोजनाओं से जुड़े मामलों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

  • रिटायर्ड IAS की हत्या के 26 दिन बाद भी फरार वरुण का सुराग नहीं, मोबाइल की सर्च हिस्ट्री और कॉल रिकॉर्ड खंगाल रही SIT

    रिटायर्ड IAS की हत्या के 26 दिन बाद भी फरार वरुण का सुराग नहीं, मोबाइल की सर्च हिस्ट्री और कॉल रिकॉर्ड खंगाल रही SIT


    भोपाल । भोपाल में रिटायर्ड आईएएस अधिकारी राकेश अग्रवाल की हत्या के मामले में फरार केयरटेकर वरुण कुमार को लेकर कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। पुलिस की जांच में उसके पुराने पारिवारिक विवादों और आक्रामक व्यवहार से जुड़े तथ्य सामने आए हैं। जांच से जुड़े इनपुट के मुताबिक वरुण अपने पिता की दूसरी शादी से नाराज था और इस वजह से उन पर हमला भी कर चुका था। इसके अलावा पंजाब में रहने वाली अपनी नाबालिग गर्लफ्रेंड के साथ मारपीट के मामले में भी उसका नाम सामने आया है। हालांकि पुलिस के अनुसार इन पुराने विवादों का राकेश अग्रवाल की हत्या से सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है। फिलहाल पुलिस का मुख्य फोकस आरोपी की तलाश और हत्या से जुड़े सबूतों की पड़ताल पर है।

    राकेश अग्रवाल की हत्या 30 सितंबर को भोपाल के रातीबड़ इलाके के सूरज नगर स्थित उनके घर में हुई थी। वारदात के बाद से केयरटेकर वरुण कुमार फरार है। मामले में गठित विशेष जांच टीम यानी एसआईटी अब नए सिरे से जांच कर रही है। पुलिस अलग-अलग शहरों में आरोपी के संपर्कों और संभावित ठिकानों का पता लगाने में जुटी है। जांच के दौरान सामने आया है कि वरुण ग्वालियर आगरा दिल्ली और भोपाल जैसे शहरों में केयरटेकर के तौर पर काम कर चुका है। वह करीब छह साल से अपने परिवार से अलग रह रहा था। उसके परिजनों और करीबी लोगों से पूछताछ के दौरान पुराने विवादों और उसके व्यवहार से संबंधित जानकारियां मिली हैं।

    इस हत्याकांड की जांच में एक महत्वपूर्ण सुराग मृतक का मोबाइल फोन भी है। पुलिस के मुताबिक हत्या के बाद वरुण राकेश अग्रवाल का मोबाइल अपने साथ ले गया था। क्राइम ब्रांच ने बाद में फोन बरामद कर लिया। जांच से जुड़े इनपुट के अनुसार आरोपी ने करीब दो दिन तक इस मोबाइल का इस्तेमाल किया था। अब पुलिस फोन की सर्च हिस्ट्री कॉल रिकॉर्ड मैसेज और बैंकिंग ट्रांजैक्शन की पड़ताल कर रही है। जांच अधिकारियों को उम्मीद है कि इन डिजिटल साक्ष्यों से वारदात के बाद आरोपी की गतिविधियों और उसके संपर्क में रहे लोगों के बारे में जानकारी मिल सकती है।

    पुलिस ने वरुण की तलाश में कई जगहों पर जांच की है। उसकी आखिरी लोकेशन आगरा-वृंदावन रोड पर ट्रेस किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद से उसका कोई पुख्ता सुराग नहीं मिल सका है। पुलिस पंजाब में रहने वाली उसकी बहन आगरा में उसके दोस्तों और ग्वालियर में रहने वाले पिता से भी पूछताछ कर चुकी है। अलग-अलग शहरों में उसके पुराने संपर्कों की जानकारी जुटाई जा रही है ताकि फरारी के दौरान उसे मदद मिलने की संभावनाओं की जांच की जा सके।

    एसआईटी अब सीसीटीवी फुटेज और दूसरे तकनीकी साक्ष्यों का दोबारा विश्लेषण कर रही है। वारदात के बाद आरोपी के भागने के रास्ते और उसकी गतिविधियों को समझने के लिए उपलब्ध फुटेज की जांच की जा रही है। पहले सामने आई जानकारी के अनुसार हत्या के बाद वरुण घर से निकलकर करीब दो किलोमीटर तक गया था और फिर ट्रेन से फरार होने की आशंका जताई गई थी। पुलिस डिजिटल साक्ष्यों को अन्य तथ्यों से मिलाकर घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने का प्रयास कर रही है।

    इस मामले में पुराने आर्थिक विवाद का पहलू भी जांच के दायरे में बताया गया है। सामने आई जानकारी के अनुसार राकेश अग्रवाल ने करीब 11 महीने पहले अपने पूर्व परिचित अजीत पाटनी के खिलाफ एक करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी को लेकर शिकायत की थी। पुलिस जांच में इस पहलू की क्या भूमिका है यह अभी स्पष्ट नहीं है। फिलहाल वरुण की गिरफ्तारी इस मामले की जांच के लिए अहम बनी हुई है। पुलिस के सामने चुनौती यह है कि फरार आरोपी का पता लगाकर हत्या के पीछे की परिस्थितियों और घटनाक्रम को साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किया जाए।

  • जावेद अख्तर सोशल मीडिया से क्यों हुए दूर, बेईमान और मूर्खतापूर्ण रवैये पर जताई नाराजगी

    जावेद अख्तर सोशल मीडिया से क्यों हुए दूर, बेईमान और मूर्खतापूर्ण रवैये पर जताई नाराजगी

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से कुछ दिनों का ब्रेक लेने का ऐलान किया है। उनके इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई है। जावेद अख्तर ने अपनी पोस्ट में कहा कि वह कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनाकर सकारात्मक कामों पर ध्यान देना चाहते हैं। उन्होंने कुछ लोगों के व्यवहार को निराशाजनक बताते हुए कहा कि मूर्खतापूर्ण और बेईमानी भरा रवैया देखकर उन्हें परेशानी होती है। हालांकि उन्होंने अपनी पोस्ट में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया है लेकिन उनके बयान को लेकर यूजर्स अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

    जावेद अख्तर ने एक्स पर लिखा कि वह कुछ दिनों का ब्रेक ले रहे हैं ताकि कुछ सकारात्मक काम कर सकें। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का मूर्खतापूर्ण और बेईमानी से भरा रवैया देखना काफी निराशाजनक है। उन्हें इस बात पर भी हैरानी होती है कि ऐसे लोग भी बाकी इंसानों की तरह ही होमो सेपियन्स यानी मानव प्रजाति का हिस्सा हैं। उनके इस बयान से जाहिर होता है कि सोशल मीडिया पर होने वाली कुछ चर्चाओं और लोगों के व्यवहार से वह असहज महसूस कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका यह फैसला किसी एक घटना की वजह से है या लगातार मिल रही प्रतिक्रियाओं के कारण उन्होंने कुछ समय दूर रहने का निर्णय लिया है।

    जावेद अख्तर की पोस्ट सामने आने के बाद कई यूजर्स ने उनका समर्थन किया। एक यूजर ने उन्हें सलाह दी कि वह बेवजह लोगों की बातों पर अपनी ऊर्जा खर्च न करें और मानसिक शांति को प्राथमिकता दें। वहीं एक अन्य यूजर ने उनसे अपील की कि वह नसीरुद्दीन शाह की वजह से नाराज या परेशान न हों। इस टिप्पणी के बाद लोगों के बीच यह सवाल भी उठा कि क्या जावेद अख्तर के ब्रेक का किसी हालिया विवाद से संबंध है। हालांकि जावेद अख्तर ने अपनी पोस्ट में नसीरुद्दीन शाह का नाम नहीं लिया है इसलिए इस तरह की प्रतिक्रियाओं को यूजर्स की अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

    जावेद अख्तर हाल के दिनों में रश्मिका मंदाना के हिंदी उच्चारण को लेकर चल रही ऑनलाइन बहस पर अपनी राय देने के कारण भी चर्चा में रहे थे। उन्होंने अभिनेत्री के हिंदी बोलने के अंदाज का मजाक उड़ाने वालों की आलोचना की थी। उनका कहना था कि किसी की भाषा या उच्चारण के आधार पर उसका मजाक उड़ाना उचित नहीं है। इस दौरान उन्होंने रश्मिका को गलती से तमिल अभिनेत्री कह दिया था जबकि वह कन्नड़ भाषी हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने जावेद अख्तर की इस गलती को लेकर सवाल उठाए। बाद में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी भी मांगी थी।

    जावेद अख्तर लंबे समय से अपने विचारों और बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। वह सामाजिक मुद्दों और धर्म से जुड़े विषयों पर खुलकर अपनी राय रखते रहे हैं। उनकी टिप्पणियों पर कभी समर्थन मिलता है तो कभी सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना भी देखने को मिलती है। उनकी पत्नी और अभिनेत्री शबाना आजमी के साथ धर्म और रोजमर्रा की अभिव्यक्तियों को लेकर हुई बातचीत भी पहले चर्चा का विषय बन चुकी है। ऐसे मामलों में उनके विचारों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस होती रही है।

    इस बार एक्स से ब्रेक लेने के उनके फैसले ने फिर से यह सवाल खड़ा किया है कि सोशल मीडिया की लगातार चलने वाली बहसें सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को किस तरह प्रभावित करती हैं। जावेद अख्तर ने फिलहाल केवल कुछ दिनों की दूरी बनाने की बात कही है। उन्होंने यह नहीं बताया कि वह दोबारा कब सक्रिय होंगे। फिलहाल उनका कहना है कि वह अपना समय सकारात्मक कामों में लगाना चाहते हैं। उनके प्रशंसक उम्मीद कर रहे हैं कि वह जल्द लौटेंगे और अपने विचारों को पहले की तरह साझा करेंगे।

  • SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए…. SC में चुनाव आयोग ने किया अपना बचाव!

    SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए…. SC में चुनाव आयोग ने किया अपना बचाव!


    नई दिल्ली।
    चुनाव आयोग ( Election Commission) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अपने कामकाज और फैसले लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची (Electoral Roll) के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special In-depth Review- SIR) से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे। आयोग के तीनों सदस्यों ने हलफनामा दाखिल करने को भी सर्वसम्मति से मंजूरी दी।

    हालांकि, आयोग के इस जवाब से उसके कामकाज को लेकर उठे सभी सवालों का समाधान नहीं हुआ है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं। इनमें कई मामलों में उन्होंने फैसले लिए जाने के बाद इसकी जानकारी मिलने की बात कही थी। यही इस पूरे विवाद का अहम पहलू है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आयोग ने आखिरकार किसी फैसले को मंजूरी दी या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उसके दोनों अन्य सदस्यों को आयोग के नाम पर की जा रही कार्रवाई की जानकारी और उसमें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला। आरोप ये लग रहे हैं कि सभी फैसले ज्ञानेश कुमार खुद ले रहे थे।


    फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर क्या विवाद है?

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 को लेकर भी आयोग के हलफनामे में सफाई दी गई है। मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म 6 में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन जरूरी है। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बात से सहमति जताई थी।

    इसके बावजूद जुलाई में फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में बदलाव दिखाई दिया। संधू को इसकी जानकारी एक अखबार की रिपोर्ट से मिली। अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ी गई घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताया था।

    अब आयोग ने हलफनामे में कहा है कि SIR के दौरान जोड़ी गई घोषणा फॉर्म 6 में संशोधन नहीं थी, बल्कि एक अलग दस्तावेज था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में घोषणा को जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव किया गया है।

    आयोग ने माना कि अधिकारियों की ओर से उठाए गए कुछ कदमों में सुधार की जरूरत थी। इसके बाद आयोग के निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण प्रभाग ने 21 अक्टूबर को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 और SIR से जुड़ी घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला लिया।

    लेकिन हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में घोषणा जोड़ने की मंजूरी किसने दी थी। यह भी नहीं बताया गया कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से इस संबंध में लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने के बावजूद यह बदलाव कैसे लागू हुआ।


    ECINet के कामकाज पर भी उठे सवाल

    चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। इस प्लेटफॉर्म के जरिये मतदाता सूची से जुड़े कई काम किए जाते हैं। हलफनामे में आयोग ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की वैधानिक जिम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की होती है। आयोग के मुताबिक, ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या संशोधित नहीं किया जाता। सॉफ्टवेयर का उद्देश्य अधिकारियों को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने में मदद करना है।

    आयोग ने प्लेटफॉर्म की कानूनी अनुपालन प्रक्रिया की समीक्षा और नए आईटी मॉड्यूल की जांच के लिए भी नई व्यवस्था का उल्लेख किया। इसके तहत आईआईटी मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विशेषज्ञों वाली समिति का प्रावधान किया गया है।

    हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी ही व्यवस्था का सुझाव विवेक जोशी ने 29 मई को दिया था। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस में अधिकारों के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि आईआईटी के किसी बाहरी विशेषज्ञ की मदद से यह प्रमाणित कराया जाए कि डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।

    सुखबीर सिंह संधू ने भी जुलाई में इस सुझाव का समर्थन किया था। लेकिन 14 अगस्त को दर्ज अपनी टिप्पणी में संधू ने कहा था कि उनके पहले के सुझावों पर क्या हुआ, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। आयोग के हलफनामे में समिति बनाने के फैसले का जिक्र है, लेकिन मई में दिए गए इस सुझाव का उल्लेख नहीं किया गया है।


    गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का मामला

    गोवा में मतदाता सूची से जुड़े मामले का भी हलफनामे में उल्लेख है। आयोग के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में फॉर्म 6 के जरिए आवेदन किया। हालांकि, इससे पहले फरवरी में सामने आई समस्या का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के निर्वाचन अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया था, ताकि हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के उनके फैसलों को लागू किया जा सके।

    आयोग के एक उप निर्वाचन आयुक्त ने भी टिप्पणी की थी कि आईटी सिस्टम जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकता। हलफनामे में बाद में 88 मतदाताओं के आवेदन करने की जानकारी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि फरवरी में अधिकारियों को अपने फैसले लागू करने में परेशानी क्यों हुई थी।


    पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर भी सवाल

    पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों का मामला भी हलफनामे में उठाया गया है। आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और इस मामले को आयोग के सामने नहीं लाया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को अपील दाखिल करने का अधिकार था। हालांकि, इस मामले में भी कुछ सवाल बिना जवाब के ही रहे।

  • Ethiopia: ओरोमिया में ईसाई चर्चों और आसपास के गांवों में खूनी हमला… 40 से ज्यादा लोगों की मौत

    Ethiopia: ओरोमिया में ईसाई चर्चों और आसपास के गांवों में खूनी हमला… 40 से ज्यादा लोगों की मौत


    अदीस अबाबा।
    इथियोपिया (Ethiopia) के ओरोमिया राज्य (Oromia State) में ऑर्थोडॉक्स ईसाई चर्चों (Orthodox Christian churches) और आसपास के गांवों पर हमले होने की खबर है। इन हमलों में 40 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। दो स्थानीय निवासियों और एक पादरी के हवाले से एक न्यूज में यह जानकारी दी गई है। बता दें कि ओरोमिया इथियोपिया का सबसे बड़ा राज्य है। यहां लंबे समय से विद्रोह, सशस्त्र संघर्ष और जातीय तनाव की स्थिति बनी हुई है। हथियारबंद समूह अक्सर धर्म का इस्तेमाल कर समुदायों के बीच फूट डालने और लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं।

    एक न्यूज में स्थानीय लोगों के हवाले से बताया गया कि इस घटना में कुल 44 लोगों की मौत हुई है। एक अन्य निवासी ने मरने वालों की संख्या 51 बताई। दोनों ने हमले की पुष्टि की, लेकिन आंकड़ों में थोड़ा अंतर रहा। मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों पर इथियोपिया में भारी पाबंदियां होने के कारण इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। सरकारी इथियोपिया ह्यूमन राइट्स कमीशन ने इस मामले पर ज्यादा कुछ नहीं कहा। उसने केवल इतना कहा कि वह हालात पर नजर रख रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इलाके में धार्मिक तनाव बहुत ज्यादा है। अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह बड़ा संकट बन सकता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके के दो चर्चों पर हमला हुआ। लोगों के कई घर भी तबाह कर दिए गए।

    बता दें कि इथियोपिया हॉर्न ऑफ अफ्रीका का देश है, जो कई आंतरिक संघर्षों से जूझ रहा है। पिछले महीने उत्तरी टिग्रे राज्य में भी भारी लड़ाई हुई थी। देश के बीचों-बीच स्थित ओरोमिया राज्य में करीब 4 करोड़ लोग रहते हैं। यहां मुस्लिम, प्रोटेस्टेंट और ऑर्थोडॉक्स समुदाय साथ रहते हैं। झगड़े की मुख्य वजह राजनीतिक और जातीय प्रतिनिधित्व की शिकायतें रही हैं, लेकिन लड़ाकों को इकट्ठा करने के लिए धर्म का भी इस्तेमाल किया जाता रहा है।

    हमला किए गए चर्चों में से एक के डीकन ने कहा कि वे इन दुखद हत्याओं से बहुत सदमे में हैं। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह तुरंत दखल दे और इलाके में सुरक्षा बहाल करे। डीकन के अनुसार मरने वालों की संख्या 46 है।

    हालांकि अभी तक सरकार की तरफ से हमले की विस्तृत पुष्टि या कार्रवाई की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। स्थानीय लोग सुरक्षा की मांग कर रहे हैं और चर्चों की सुरक्षा बढ़ाने की अपील कर रहे हैं।

  • MP: भारी घाटे में चल रही भोपाल मेट्रो…. जितनी महीने की कमाई, उतना एक दिन का खर्च!

    MP: भारी घाटे में चल रही भोपाल मेट्रो…. जितनी महीने की कमाई, उतना एक दिन का खर्च!


    भोपाल।
    राजधानी भोपाल (Bhopal) में मेट्रो (Metro) की चमक तो दिखाई दे रही है, लेकिन यात्रियों की संख्या और कमाई के आंकड़े इसकी रफ्तार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. आधुनिक सफर का सपना लेकर शुरू हुई मेट्रो फिलहाल सीमित यात्रियों के सहारे दौड़ रही है. हर दिन करीब 5 लाख रुपये के संचालन खर्च के मुकाबले पूरे महीने में टिकटों से महज 4 से 5 लाख रुपये की आय हो रही है. यानी एक दिन के संचालन पर जितनी रकम खर्च हो रही है, उतनी कमाई जुटाने में मेट्रो को पूरा महीना लग रहा है. हालांकि, मेट्रो प्रबंधन (Metro Management) का कहना है कि इसे केवल मुनाफे के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि यह शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था (Public Transport System) का अहम हिस्सा है।


    सात किलोमीटर के ट्रैक पर सवारी का इंतजार

    भोपाल में एम्स से सुभाष नगर के बीच करीब सात किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर दिसंबर 2025 में मेट्रो सेवा शुरू हुई थी. शुरुआत में उम्मीद जताई गई थी कि मेट्रो शहर के यातायात को नई दिशा देगी और लोगों को जाम से राहत दिलाने में मदद करेगी. लेकिन फिलहाल आठ स्टेशनों तक सीमित इस रूट पर यात्रियों की संख्या उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ सकी है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, महीनेभर में करीब 13 से 15 हजार यात्री मेट्रो से सफर कर रहे हैं. सीमित नेटवर्क के चलते मेट्रो अभी शहर के बड़े हिस्से को सीधे जोड़ने में सक्षम नहीं हैं, जिसका असर इसकी उपयोगिता और कमाई दोनों पर पड़ रहा है।


    एक दिन का खर्च पांच लाख, महीने की कमाई भी इतनी नहीं

    मेट्रो के संचालन पर प्रतिदिन करीब पांच लाख रुपये खर्च हो रहे हैं. इस हिसाब से मासिक संचालन खर्च लगभग डेढ़ करोड़ रुपये तक पहुंचता है. वहीं, यात्रियों से मिलने वाला किराया पूरे महीने में केवल 4 से 5 लाख रुपये के आसपास है. इन आंकड़ों के बीच का अंतर मेट्रो के सामने खड़ी आर्थिक चुनौती को साफ तौर पर दिखाता है. हालांकि, यह गणना संचालन खर्च और टिकटों से होने वाली आय पर आधारित है. मेट्रो को विज्ञापन और दूसरी व्यावसायिक गतिविधियों से मिलने वाला राजस्व अलग है, इसलिए कुल आय का आकलन करने के लिए सभी स्रोतों के आंकड़े जरूरी हैं।


    जनसंपर्क अधिकारी धीरज शुक्ला क्या बोले ?

    मेट्रो के खर्च और कमाई के बीच बड़े अंतर पर मेट्रो के जनसंपर्क अधिकारी धीरज शुक्ला का कहना है कि भोपाल मेट्रो लगातार यात्री सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रही है. उनके मुताबिक मेट्रो का एक दिन का संचालन खर्च करीब पांच लाख रुपये है, जबकि महीनेभर में 13 से 15 हजार यात्री सफर करते हैं. इन यात्रियों से लगभग 4 से 5 लाख रुपये की आय होती है।

    धीरज शुक्ला का कहना है कि मेट्रो सार्वजनिक परिवहन का साधन है, इसलिए इसे केवल मौजूदा कमाई के आधार पर नहीं देखा जा सकता. फिलहाल नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है. जब शहर के अलग-अलग हिस्सों तक मेट्रो की कनेक्टिविटी पहुंचेगी, तब यात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ आय में भी इजाफा होने की उम्मीद है. उन्होंने कहा कि यात्री सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और मेट्रो को ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए उपयोगी बनाने के प्रयास लगातार जारी हैं।


    जन्मदिन, प्री-वेडिंग शूट और विज्ञापन से कमाई की कोशिश

    टिकटों से सीमित आय के बीच मेट्रो प्रबंधन गैर-किराया राजस्व बढ़ाने के विकल्पों पर भी काम कर रहा है. इसके तहत मेट्रो के अंदर जन्मदिन मनाने, किटी पार्टी और प्री-वेडिंग शूट जैसे आयोजनों की सुविधा दी जा रही है. इसके अलावा विज्ञापनों के जरिए भी राजस्व जुटाने की कोशिश की जा रही है. प्रबंधन का मानना है कि ऐसी गतिविधियां मेट्रो की कमाई बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं. हालांकि, इन माध्यमों से अब तक कितनी अतिरिक्त आय हुई है, इसका विस्तृत आंकड़ा सामने आना बाकी है।


    स्टेशन तक पहुंच आसान नहीं, तो यात्री क्यों चुनेंगे मेट्रो?

    मेट्रो में कम यात्रियों की एक बड़ी वजह सीमित रूट के साथ-साथ लास्ट माइल कनेक्टिविटी की चुनौती भी मानी जा रही है. किसी भी मेट्रो सेवा की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि यात्री अपने घर से स्टेशन तक और स्टेशन से अंतिम गंतव्य तक कितनी आसानी से पहुंच पाते हैं. यदि स्टेशन तक पहुंचने के लिए पर्याप्त फीडर बसें, ई-रिक्शा या दूसरे साधन उपलब्ध नहीं होंगे, तो लोग निजी वाहनों और पारंपरिक सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दे सकते हैं।

    इसके अलावा रोजाना कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, विद्यार्थियों और दूसरे नियमित यात्रियों के लिए मेट्रो तभी सुविधाजनक विकल्प बनेगी, जब उसका नेटवर्क शहर के प्रमुख व्यावसायिक, शैक्षणिक और रिहायशी इलाकों से बेहतर तरीके से जुड़ेगा।


    विस्तार से उम्मीद, लेकिन फिलहाल घाटे का दबाव

    भोपाल मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार भविष्य में यात्रियों की संख्या बढ़ाने की उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन तब तक संचालन खर्च और सीमित आय के बीच संतुलन बनाना प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती रहेगा. बेहतर कनेक्टिविटी, नियमित यात्रियों के लिए सुविधाजनक योजनाएं, स्टेशनों तक पहुंचने के साधन और विज्ञापन जैसी गतिविधियों से होने वाली आय इस चुनौती को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

    फिलहाल भोपाल मेट्रो के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ट्रेनें कितनी रफ्तार से दौड़ रही हैं, बल्कि यह भी है कि उनमें सफर करने वालों की संख्या कब बढ़ेगी. प्रबंधन को उम्मीद है कि पूरे शहर में नेटवर्क फैलने के बाद तस्वीर बदलेगी. लेकिन मौजूदा स्थिति यही बताती है कि मेट्रो को शहर की रोजमर्रा की जरूरत बनाने के लिए अभी यात्रियों का भरोसा जीतना होगा. अब देखना होगा कि विस्तार की योजनाएं कब तक मेट्रो को खाली सीटों से आगे बढ़ाकर आम लोगों की पहली पसंद बना पाती हैं।

  • केन्द्रीय कर्मचारियों को जल्द मिल सकता है बड़ा तोहफा… 3% तक DA बढ़ा सकती है सरकार

    केन्द्रीय कर्मचारियों को जल्द मिल सकता है बड़ा तोहफा… 3% तक DA बढ़ा सकती है सरकार


    नई दिल्ली।
    डीए (DA) में बढ़ोतरी (Hike) को लेकर कर्मचारियों के मन में यह सवाल भी है कि क्या सरकार को इसके लिए कैबिनेट (Cabinet) की बैठक का इंतजार करना होगा? इस सवाल का जवाब आगे जानेंगे, लेकिन सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि DA में 3 फीसदी बढ़ोतरी हो सकती है। अगर केंद्र सरकार (Central Government) इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) मौजूदा 60% से बढ़कर 63% हो जाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय कर्मचारियों को जुलाई 2026 से लागू होने वाले महंगाई भत्ते (DA) में बढ़ोतरी का ऐलान कब होगा? आज 27 अक्टूबर तक केंद्र सरकार ने इसका ऐलान नहीं किया है।

    बता दें डीए में इजाफे से कर्मचारियों की हर महीने मिलने वाली सैलरी बढ़ेगी, जबकि पेंशनर्स को भी महंगाई राहत (DR) में बढ़ोतरी का फायदा मिल सकता है। हालांकि, सरकार ने अभी तक बढ़ोतरी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।


    DA Hike 2026: आखिर क्यों हो रही है देरी?

    केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। जुलाई 2026 के DA संशोधन के लिए जरूरी महंगाई के आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक नई दर घोषित नहीं की है।

    कर्मचारियों को उम्मीद थी कि अक्टूबर में सरकार की ओर से महंगाई भत्ते पर फैसला आ सकता है। खासकर 14 अक्टूबर को रेलवे कर्मचारियों के लिए बोनस और 16 अक्टूबर को केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बोनस की घोषणा के बाद DA बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़ गई थीं। हालांकि, दोनों ही घोषणाओं में महंगाई भत्ते को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ।

    इसके बाद 21 अक्टूबर को भी कर्मचारियों को निराशा हाथ लगी। उस दिन केंद्रीय कैबिनेट की बैठक ही नहीं हुई। फिलहाल सरकार ने DA बढ़ाने में हो रही देरी की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई है।


    क्या DA बढ़ाने के लिए कैबिनेट की बैठक जरूरी है?

    महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी को लेकर कर्मचारियों के मन में यह सवाल भी है कि क्या सरकार को इसके लिए कैबिनेट की बैठक का इंतजार करना होगा? रिपोर्ट के मुताबिक, DA में संशोधन की घोषणा के लिए हर बार नियमित कैबिनेट बैठक का इंतजार करना जरूरी नहीं है। वित्त मंत्रालय भी इस संबंध में घोषणा कर सकता है।

    इसलिए कर्मचारियों को अगली कैबिनेट बैठक के अलावा वित्त मंत्रालय की ओर से आने वाले आधिकारिक आदेश पर भी नजर रखनी चाहिए। हालांकि, घोषणा कब होगी और DA कितने प्रतिशत बढ़ेगा, इसका फैसला सरकार को ही करना है।


    3% बढ़ोतरी का अनुमान क्यों लगाया जा रहा है?

    केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते की गणना औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी CPI-IW के आधार पर की जाती है। जुलाई 2026 से लागू होने वाले DA संशोधन की गणना के लिए जुलाई 2025 से जून 2026 तक के 12 महीनों के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाता है।

    इन आंकड़ों के आधार पर DA की गणना लगभग 63.75% बैठने की रिपोर्ट है। मौजूदा गणना पद्धति के अनुसार, दशमलव के बाद के हिस्से को छोड़कर दर 63% रहने का अनुमान है। यही वजह है कि इस बार महंगाई भत्ते में 3 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है। ध्यान रखें कि 63% DA अभी संभावित दर है। सरकार की मंजूरी और आधिकारिक आदेश के बाद ही नई दर की पुष्टि होगी।


    DA Arrears: जुलाई से मिल सकता है एरियर

    केंद्र सरकार अगर जुलाई 2026 से महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी को मंजूरी देती है, तो पात्र कर्मचारियों को नई दर के अनुसार एरियर भी मिल सकता है। उदाहरण के लिए, ₹50,000 बेसिक सैलरी वाले कर्मचारी का DA 60% से बढ़कर 63% होने पर हर महीने ₹1,500 ज्यादा बनेगा।

    अगर नई दर 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होती है, तो जुलाई से वास्तविक भुगतान शुरू होने तक की अवधि का एरियर भी देय हो सकता है। हालांकि, एरियर की वास्तविक रकम इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार संशोधित DA का भुगतान किस महीने से करती है। पेंशनर्स को भी इसी तरह महंगाई राहत (DR) में संशोधन का फायदा मिल सकता है।

  • रामायण के गानों को लेकर छिड़ी बहस पर एआर रहमान ने तोड़ी चुप्पी, रणबीर कपूर की फिल्म रिलीज से पहले बढ़ा विवाद

    रामायण के गानों को लेकर छिड़ी बहस पर एआर रहमान ने तोड़ी चुप्पी, रणबीर कपूर की फिल्म रिलीज से पहले बढ़ा विवाद


    नई दिल्ली । रणबीर कपूर की बहुप्रतीक्षित फिल्म रामायण रिलीज से पहले ही अपने गानों को लेकर चर्चा में आ गई है। फिल्म के संगीतकार एआर रहमान को मंगल रंग और रावण तांडव जैसे गानों के लिए सोशल मीडिया पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ दर्शकों को फिल्म का संगीत पसंद आ रहा है तो कुछ लोग इसकी धुन और प्रस्तुति पर सवाल उठा रहे हैं। इस बीच एआर रहमान ने अपनी प्रतिक्रिया देकर साफ कर दिया है कि वह दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को लेकर ज्यादा परेशान नहीं हैं और उन्हें अपने काम पर पूरा भरोसा है।

    हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में एआर रहमान ने कहा कि किसी भी संगीत को तैयार करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। नए विचारों पर काम करने से लेकर धुनों को बार बार सुधारने और पूरी रचना को परखने तक संगीतकार को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। उनके मुताबिक जब कोई काम दर्शकों के सामने पहुंचता है तब तक उसे कई बार जांचा और सुधारा जा चुका होता है। ऐसे में हर प्रतिक्रिया को देखने और उस पर लगातार विचार करने के लिए ऊर्जा नहीं बचती। उन्होंने कहा कि वह अपना काम लोगों के सामने रख देते हैं और उम्मीद करते हैं कि दर्शक उसे पसंद करेंगे।

    रहमान ने यह भी बताया कि उनका बेटा उन्हें सोशल मीडिया पर होने वाली चर्चाओं के बारे में जानकारी देता रहता है। उनके बेटे के अनुसार कभी लोग किसी बात की आलोचना करते हैं तो कभी वही लोग अपनी राय बदल लेते हैं या माफी मांग लेते हैं। इस पर रहमान का नजरिया सहज है। उनका कहना है कि उन्होंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है और उन्हें उम्मीद है कि लोग उनके प्रयास की सराहना करेंगे। उनके बयान से यह साफ है कि वह सोशल मीडिया पर होने वाली हर टिप्पणी को अपने काम का अंतिम मूल्यांकन नहीं मानते।

    दरअसल रामायण का गाना मंगल रंग रिलीज होने के बाद से ही चर्चा में है। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इसकी तुलना साल 2012 में आई फिल्म रॉकस्टार के लोकप्रिय गीत कुन फाया कुन से की है। इस गाने को अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल ने अपनी आवाज दी है। वहीं कुछ दर्शकों ने मंगल रंग की प्रस्तुति को कव्वाली जैसा बताते हुए सवाल उठाए हैं। गाने की धुन और संगीत की शैली को लेकर अलग अलग राय सामने आ रही हैं। हालांकि किसी फिल्म के संगीत को लेकर दर्शकों की पसंद अलग होना सामान्य बात है और अंतिम प्रतिक्रिया फिल्म देखने के बाद भी बदल सकती है।

    गाने के वीडियो में दिखाए गए एक दृश्य को लेकर भी बहस हुई है। इसमें रणबीर कपूर के राम वाले किरदार के साथ सीता की भूमिका में दिखाई गई अभिनेत्री को हल्दी की रस्म के दौरान दिखाया गया है। कुछ यूजर्स ने इस दृश्य पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इसे पारंपरिक हिंदू रीति रिवाजों के अनुरूप दिखाया जाना चाहिए था। इस मुद्दे पर फिल्म के निर्माताओं की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। ऐसे में यह विवाद फिलहाल सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं तक ही सीमित है।

    नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी रामायण को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता है। फिल्म पर कई वर्षों से काम चल रहा है और इसके कलाकारों तथा तकनीकी टीम की मेहनत को लेकर भी चर्चा हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म को अमेरिका ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में एडवांस बुकिंग के दौरान अच्छा शुरुआती प्रतिसाद मिल रहा है। हालांकि फिल्म की वास्तविक सफलता का आकलन रिलीज के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया और बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन से ही हो सकेगा। फिलहाल एआर रहमान का बयान और गानों को लेकर जारी बहस ने फिल्म की रिलीज से पहले इसकी चर्चा और तेज कर दी है।