Author: bharati

  • देश में 1,800 किलोमीटर नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क को मंजूरी, 7,000 करोड़ रुपये के निवेश से मजबूत होगी गैस आपूर्ति

    देश में 1,800 किलोमीटर नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क को मंजूरी, 7,000 करोड़ रुपये के निवेश से मजबूत होगी गैस आपूर्ति

    नई दिल्ली । देश में रसोई गैस की आपूर्ति व्यवस्था को अधिक मजबूत, सुरक्षित और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड ने लगभग 1,800 किलोमीटर लंबे नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क के विकास को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं पर करीब 7,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। नई पाइपलाइनों के जरिए एलपीजी की लंबी दूरी तक आपूर्ति को सड़क परिवहन की तुलना में अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जाएगा।

    स्वीकृत परियोजनाएं तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक और गोवा में विकसित की जाएंगी। इनका उद्देश्य देश के एलपीजी परिवहन ढांचे का विस्तार करना और विभिन्न क्षेत्रों में रसोई गैस की आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाना है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, जिसके बाद इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाया जाता है।

    नई पाइपलाइन परियोजनाओं के पूरा होने से आयातित एलपीजी को संबंधित क्षेत्रों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। पाइपलाइन के जरिए परिवहन से सड़क मार्ग पर निर्भरता कम होगी और एलपीजी की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाले टैंकरों की संख्या में भी कमी आ सकती है।

    स्वीकृत प्रमुख परियोजनाओं में तेलंगाना के चेरलापल्ली से महाराष्ट्र के नागपुर तक 556 किलोमीटर लंबी एलपीजी पाइपलाइन शामिल है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के झांसी से उत्तराखंड के सितारगंज तक 611 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन विकसित की जाएगी। महाराष्ट्र के शिकरापुर से गोवा और कर्नाटक के हुबली तक 633 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन परियोजना को भी मंजूरी दी गई है।

    इन सभी परियोजनाओं के निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी गेल इंडिया लिमिटेड संभालेगी। परियोजनाओं के पूरा होने के बाद पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड द्वारा अधिकृत सामान्य वाहक एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क की कुल लंबाई करीब 7,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 9,500 किलोमीटर हो जाएगी। इस तरह देश के अधिकृत एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क में लगभग 23.5 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

    यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब देश में एलपीजी के सुरक्षित और कम लागत वाले परिवहन के लिए पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। इससे पहले कांडला-गोरखपुर एलपीजी पाइपलाइन परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है। लगभग 2,757 किलोमीटर लंबी यह परियोजना देश की सबसे लंबी एलपीजी पाइपलाइन परियोजना मानी जाती है।

    नियामक के अनुसार, एलपीजी को पाइपलाइन के माध्यम से परिवहन करना सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर विकल्प है। सड़क परिवहन में बड़ी संख्या में टैंकरों की आवाजाही होती है, जबकि पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार से इस निर्भरता को कम किया जा सकता है।

    टैंकरों की आवाजाही घटने से सड़क सुरक्षा में सुधार और परिवहन व्यवस्था पर दबाव कम होने की उम्मीद है। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स लागत और ईंधन खपत में कमी आ सकती है। पाइपलाइन आधारित परिवहन से कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है।

    नियामक बोर्ड का दीर्घकालिक लक्ष्य एलपीजी को बॉटलिंग संयंत्रों तक पहुंचाने में सड़क परिवहन पर निर्भरता को न्यूनतम करना है। छह राज्यों में प्रस्तावित नई परियोजनाओं को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इनके पूरा होने से देश के एलपीजी परिवहन ढांचे का विस्तार होने के साथ ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और कुशल बनाने में मदद मिल सकती है।

  • बाढ़ ने VIP ठिकाने को भी नहीं छोड़ा, दूसरी मंजिल पर गुजरी रात; पानी उतरते ही कीचड़ का कहर

    बाढ़ ने VIP ठिकाने को भी नहीं छोड़ा, दूसरी मंजिल पर गुजरी रात; पानी उतरते ही कीचड़ का कहर


    रीवा।
    मध्य प्रदेश के रीवा में लगातार बारिश के बाद बीहर नदी का जलस्तर बढ़ने से शहर के कई हिस्सों में बाढ़ जैसे हालात बन गए। इस बाढ़ का असर आम लोगों के साथ जनप्रतिनिधियों के घरों तक भी पहुंचा। गुढ़ विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक नागेंद्र सिंह का निजी निवास भी बाढ़ के पानी की चपेट में आ गया। नदी किनारे स्थित उनके घर के निचले हिस्से में पानी भर जाने के कारण उन्हें करीब 18 घंटे से ज्यादा समय तक घर की दूसरी मंजिल पर रहना पड़ा। बारिश और नदी के बढ़े जलस्तर के कारण स्थिति ऐसी बन गई थी कि घर से नीचे उतरना मुश्किल था।

    बीहर नदी के जलस्तर में बढ़ोतरी के साथ ही विधायक के घर के ग्राउंड फ्लोर और आसपास के हिस्सों में पानी पहुंच गया। हालात को देखते हुए नागेंद्र सिंह ने घर की दूसरी मंजिल पर ही रहकर पानी कम होने का इंतजार किया। लंबे समय तक बाढ़ का पानी घर के आसपास जमा रहने से निचले हिस्से में भारी गंदगी और कीचड़ फैल गया। बारिश का दौर कमजोर पड़ने के बाद जब नदी का जलस्तर नीचे आया तो विधायक घर के निचले हिस्से में पहुंचे। इसके बाद वहां सफाई का काम शुरू कराया गया।

    पानी उतरने के बाद घर के भीतर और आसपास की स्थिति ने बाढ़ की भयावहता को साफ दिखा दिया। कई हिस्सों में कीचड़ और गंदगी जमा हो गई थी। बाढ़ का पानी अपने साथ गाद और दूसरी गंदगी भी लेकर आया जिससे घर के निचले हिस्से को साफ करने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। फिलहाल सफाई का काम जारी है।

    बाढ़ के बाद भाजपा विधायक नागेंद्र सिंह ने शहर में जलभराव और बाढ़ की स्थिति को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने नदी और उसके आसपास बढ़ते अतिक्रमण को बाढ़ की गंभीर वजहों में से एक बताया। विधायक का कहना है कि नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण होने से पानी के निकलने का रास्ता प्रभावित होता है। जब बारिश के दौरान नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ता है तो पानी को पर्याप्त जगह नहीं मिलती और आसपास के क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है।

    नागेंद्र सिंह ने रीवा में हाल के वर्षों में बनाए गए कुछ नए पुलों की ऊंचाई और डिजाइन को लेकर भी सवाल खड़े किए। उनके अनुसार नए पुलों की ऊंचाई पुराने पुलों की तुलना में कम दिखाई देती है। उनका दावा है कि पुलों की संरचना और कम ऊंचाई के कारण बीहर नदी के पानी के प्रवाह में रुकावट पैदा हो सकती है। इसका असर बाढ़ के दौरान आसपास के इलाकों में दिखाई देता है।

    विधायक के मुताबिक इस बार नदी का जलस्तर बढ़ने और पानी के बहाव में रुकावट के चलते हालात ज्यादा गंभीर हुए। इसका असर उनके खुद के घर पर भी पड़ा और उन्हें लंबे समय तक दूसरी मंजिल पर रहना पड़ा। हालांकि अब नदी का जलस्तर घटने लगा है और घर में सफाई का काम चल रहा है।

    रीवा में आई इस बाढ़ ने एक बार फिर नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र अतिक्रमण और पुलों के निर्माण की गुणवत्ता व डिजाइन को लेकर चर्चा तेज कर दी है। विधायक ने जिन मुद्दों को उठाया है उन पर प्रशासनिक स्तर पर जांच और तकनीकी समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है ताकि भविष्य में भारी बारिश के दौरान शहर और नदी किनारे रहने वाले लोगों को ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

  • निफ्टी में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट, एफआईआई ने 1,602 करोड़ रुपये निकाले, डीआईआई की खरीदारी ने बाजार को संभाला

    निफ्टी में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट, एफआईआई ने 1,602 करोड़ रुपये निकाले, डीआईआई की खरीदारी ने बाजार को संभाला

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे सप्ताह दबाव देखने को मिला। ऊंची कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिका ईरान तनाव के बीच निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई। इस दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई ने भारतीय बाजार से 1,602 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने मजबूत खरीदारी जारी रखते हुए बाजार को सहारा दिया।

    सप्ताह के दौरान एफआईआई का निवेश व्यवहार उतार चढ़ाव वाला रहा। कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में विदेशी निवेशकों ने बिकवाली की। इसके बाद लगातार दो कारोबारी सत्रों में उन्होंने खरीदारी की, लेकिन सप्ताह के अंतिम दो सत्रों में फिर से बिकवाली का रुख अपनाया। इससे बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर सतर्कता बढ़ी है।

    20 जुलाई से 21 अगस्त के बीच एफआईआई की गतिविधियों पर नजर डालें तो शुरुआती सप्ताह में वे शुद्ध विक्रेता रहे। इसके बाद लगातार तीन सप्ताह तक उन्होंने खरीदारी की। हालांकि मौजूदा सप्ताह में उनका रुख फिर बदल गया और उन्होंने शुद्ध निकासी की। इसके बावजूद पिछले एक महीने की कुल अवधि में एफआईआई अभी भी 1,282 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार रहे हैं।

    दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार में लगातार मजबूती दिखाई। पिछले एक महीने के दौरान डीआईआई ने प्रत्येक सप्ताह शुद्ध खरीदारी की। इस अवधि में उनका कुल निवेश 48,390 करोड़ रुपये रहा। केवल मौजूदा सप्ताह में ही घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 17,320 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की, जिससे विदेशी बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संतुलित करने में मदद मिली।

    अगस्त महीने के अब तक के आंकड़ों से भी घरेलू निवेशकों की मजबूत भूमिका सामने आती है। इस अवधि में एफआईआई ने कुल 2,510 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जबकि डीआईआई का निवेश 34,370 करोड़ रुपये रहा है। इससे संकेत मिलता है कि घरेलू संस्थागत पूंजी बाजार की स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

    प्रमुख सूचकांकों की बात करें तो निफ्टी ने सप्ताह की शुरुआत कमजोरी के साथ की। मध्य सप्ताह में सूचकांक 24,026 के स्तर तक फिसल गया। हालांकि सप्ताह के अंतिम दो कारोबारी सत्रों में इसमें सुधार देखने को मिला और निफ्टी अपने निचले स्तर से ऊपर आया। इसके बावजूद सप्ताह के अंत में यह 24,252 के स्तर पर बंद हुआ, जो पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब 0.5 प्रतिशत की गिरावट है।

    व्यापक बाजार में तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर रही। निफ्टी मिडकैप 100 लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 ने नया सर्वकालिक उच्च स्तर बनाया और सप्ताह के दौरान एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों की दिलचस्पी छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों में बनी हुई है।

    बाजार के लिए आगे कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिका ईरान के बीच भू राजनीतिक घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेंगे। कच्चे तेल की कीमत 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने से भारतीय बाजार पर दबाव की आशंका है। आने वाले दिनों में एफआईआई की दिशा भी बाजार की चाल तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगी। वहीं डीआईआई की मजबूत खरीदारी बाजार को समर्थन देती रह सकती है।

  • चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    नई दिल्ली । देश में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने अलग तस्वीर पेश की है। विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा तेजी की मुख्य वजह एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन, गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में आई कमी है। उनका कहना है कि सरकार चीनी की घरेलू जरूरत, एथेनॉल उत्पादन और निर्यात के बीच लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।

    नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार देश में हर वर्ष घरेलू खपत के लिए करीब 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा में से ही एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए चीनी के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। चालू वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई, जबकि लगभग सात लाख टन चीनी का निर्यात हुआ है।

    विशेषज्ञ के मुताबिक चालू वर्ष में देश का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहा है और इसके साथ पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में देश में पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाता है, ताकि उत्पादन या आपूर्ति में अचानक कमी आने की स्थिति में घरेलू बाजार प्रभावित न हो। इसलिए केवल एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को मौजूदा कीमत वृद्धि का सीधा कारण मानना उचित नहीं है।

    प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने एथेनॉल को चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव वाला क्षेत्र बताया। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन घरेलू मांग से काफी अधिक हो जाता था, तब अतिरिक्त चीनी की वजह से बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ता था। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी और किसानों को गन्ने का भुगतान मिलने में भी परेशानी पैदा होती थी। निर्यात एक विकल्प जरूर था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और प्रतिस्पर्धा के कारण यह हमेशा लाभदायक नहीं रहता था।

    ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार दिया। इससे चीनी की अधिकता को नियंत्रित करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिला और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार उत्पादन के अनुमान और घरेलू जरूरतों को देखते हुए समय-समय पर एथेनॉल डायवर्जन तथा चीनी निर्यात से जुड़े फैसले ले सकती है।

    बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने मौजूदा स्थिति में गुणवत्तापूर्ण गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी को महत्वपूर्ण कारक बताया। उनके अनुसार उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का अपेक्षाकृत कमजोर दौर चल रहा है। मुख्य पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ने की संभावना है, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

    गन्ने की फसल अवधि और रिकवरी में राज्यों के बीच अंतर भी चीनी उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्तर भारत में किसान सामान्यतः करीब 10 से 11 महीने में तैयार होने वाली फसल लेते हैं, जबकि महाराष्ट्र में गन्ना लगभग 13 से 14 महीने और तमिलनाडु में कुछ परिस्थितियों में 18 महीने तक खेत में रहता है। लंबी अवधि से गन्ने में चीनी संचय और रिकवरी बेहतर हो सकती है।

    डॉ. हरिओम के अनुसार उत्तर भारत में किसान धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करने के साथ गेहूं, सरसों, मसूर, चना और सब्जियों जैसी अंतरवर्ती फसलों का विकल्प अपना सकते हैं। इससे अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ सकते हैं और गन्ने की खेती की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार की संभावना बन सकती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन पर ध्यान देने के बजाय गन्ने के उत्पादन, रिकवरी, पेराई चक्र और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को भी समान रूप से देखना जरूरी है।

  • आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार अधिकृत डीलर बैंकों ने केंद्रीय बैंक की विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत 21 अगस्त 2026 तक कुल 72.848 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है। इसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा गैर-निवासी बैंक यानी एफसीएनआर(बी) जमा के जरिए आया है। इस माध्यम से बैंकों ने 65.397 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है।

    आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक विशेष स्वैप सुविधा के तहत बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी और विदेशी मुद्रा उधारी ओएफसीबी के माध्यम से भी 7.451 अरब डॉलर की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है। इस तरह दोनों माध्यमों से आने वाला कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह 72.848 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

    केंद्रीय बैंक ने 8 जून 2026 को एफसीएनआर(बी) जमा, ईसीबी और ओएफसीबी से आने वाली विदेशी मुद्रा के लिए विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य घरेलू वित्तीय प्रणाली में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाना और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को कम करना था।

    योजना के तहत एफसीएनआर(बी) जमा के लिए सुविधा 31 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ईसीबी और ओएफसीबी से जुड़ी स्वैप सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। आरबीआई ने पहले एफसीएनआर(बी) योजना की अंतिम तारीख 30 सितंबर निर्धारित की थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 31 अगस्त कर दिया गया।

    केंद्रीय बैंक ने समयसीमा में बदलाव का कारण योजना को मिली बेहतर प्रतिक्रिया और विदेशी मुद्रा जुटाने की तेज गति को बताया था। बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए एफसीएनआर(बी) खातों पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की, जिससे इस योजना के तहत डॉलर प्रवाह को गति मिली।

    एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि एफसीएनआर(बी) योजना के तहत निर्धारित विदेशी मुद्रा जुटाने का लक्ष्य काफी हद तक पहले ही हासिल हो चुका है। रिपोर्ट में यह संभावना भी जताई गई थी कि अगस्त के बाकी दिनों में 25 से 30 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह आ सकता है। ऐसे में कुल विदेशी मुद्रा संग्रह लगभग 85 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक स्वैप सुविधा की लागत को भी बड़ी बाधा नहीं माना गया है। अनुमान के अनुसार योजना की कुल लागत करीब 10.5 अरब डॉलर या जुटाई गई कुल राशि का लगभग 15 प्रतिशत हो सकती है। हालांकि इस लागत को देश के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी हाल के सप्ताहों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 14 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 9.905 अरब डॉलर बढ़कर 716.90 अरब डॉलर हो गया। इससे पिछले सप्ताह भी भंडार में 14.1 अरब डॉलर की वृद्धि हुई थी।

    एफसीएनआर(बी) योजना के जरिए आई विदेशी मुद्रा ने बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति को मजबूत करने के साथ रुपये को भी सहारा दिया है। इसके अलावा बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार से भारत की बाहरी आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता बेहतर होती है। आने वाले दिनों में एफसीएनआर(बी) योजना के तहत होने वाली अतिरिक्त जमा और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

  • केन-बेतवा लिंक परियोजना पर CM मोहन यादव का बड़ा फोकस, 5,039 प्रभावित परिवारों के सम्मानजनक पुनर्वास के दिए निर्देश

    केन-बेतवा लिंक परियोजना पर CM मोहन यादव का बड़ा फोकस, 5,039 प्रभावित परिवारों के सम्मानजनक पुनर्वास के दिए निर्देश


    खजुराहो। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खजुराहो में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक में परियोजना की वर्तमान प्रगति के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन पर विशेष चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने साफ किया कि विकास की इस बड़ी परियोजना में प्रभावित परिवारों के हितों की अनदेखी किसी भी स्थिति में नहीं होनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि पुनर्वास की प्रक्रिया संवेदनशीलता और पारदर्शिता के साथ पूरी की जाए और पात्र परिवारों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिले।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड के विकास के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। परियोजना पूरी होने के बाद क्षेत्र में सिंचाई के साथ पेयजल और ऊर्जा की उपलब्धता में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। उन्होंने पन्ना और छतरपुर जिला प्रशासन को निर्देश दिए कि परियोजना से प्रभावित गांवों में अधिकारी घर-घर जाकर परिवारों की समस्याओं और वास्तविक जरूरतों की जानकारी लें। खासकर जनजातीय परिवारों की समस्याओं को प्राथमिकता के साथ सुनकर उनका समाधान करने पर जोर दिया गया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि नए पुनर्वास स्थलों पर केवल मकान उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। वहां स्कूल आंगनवाड़ी केंद्र स्वास्थ्य सुविधाएं सामुदायिक भवन और दूसरी जरूरी मूलभूत सुविधाएं भी विकसित की जानी चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि विस्थापित परिवारों को नए स्थान पर बेहतर जीवन और रोजगार के अवसर मिलें और वे विकास की मुख्यधारा से जुड़े रहें।

    बैठक में पन्ना की रूंझ-मझगांव परियोजना से प्रभावित परिवारों के लिए स्वीकृत अतिरिक्त राशि का भुगतान जल्द करने के निर्देश भी दिए गए। जिन लोगों के पास उम्र से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं उनके लिए मेडिकल परीक्षण के आधार पर आयु निर्धारण की व्यवस्था अपनाने को कहा गया ताकि मुआवजे और पुनर्वास लाभ लेने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

    परियोजना की निगरानी को लेकर मुख्यमंत्री ने जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट को नियमित मॉनिटरिंग और विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर की परियोजना में लगातार निगरानी जरूरी है ताकि निर्माण और पुनर्वास से जुड़े काम अनावश्यक रूप से लंबित न हों। प्रभावित इलाकों में जन चौपाल और जागरूकता यात्राएं आयोजित करने पर भी जोर दिया गया ताकि ग्रामीणों को परियोजना के लाभों की जानकारी मिल सके और उनकी आशंकाओं का समाधान किया जा सके।

    केन-बेतवा लिंक परियोजना से मध्य प्रदेश में करीब 8.11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। वहीं 44 लाख से अधिक लोगों को पेयजल सुविधा मिलने का अनुमान है। परियोजना के तहत 103 मेगावाट जल विद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का प्रावधान भी बताया गया है। परियोजना का प्रत्यक्ष लाभ पन्ना दमोह छतरपुर टीकमगढ़ निवाड़ी सागर विदिशा रायसेन शिवपुरी और दतिया समेत कई जिलों के करीब 1,382 गांवों को मिलने की उम्मीद है।

    परियोजना के कारण छतरपुर और पन्ना जिलों में कुल 5,039 परिवार प्रभावित हो रहे हैं। इनमें पन्ना के 1,321 और छतरपुर के 3,718 परिवार शामिल हैं। बताया गया कि सभी प्रभावित परिवारों ने पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन के विशेष पैकेज का विकल्प चुना है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट किया कि इन परिवारों का पुनर्वास सम्मानजनक तरीके से होना चाहिए।

    डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना को सिर्फ पानी पहुंचाने वाली योजना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इससे कृषि उत्पादन बढ़ने पेयजल संकट कम होने ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती मिलने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलने की संभावना है। बैठक में वन मंत्री दिलीप अहिरवार सांसद वीडी शर्मा समेत कई विधायक वरिष्ठ अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। प्रमुख सचिव जल संसाधन संदीप यादव ने परियोजना की प्रगति और अब तक हुए कार्यों की जानकारी प्रस्तुत की।

  • अखिलेश के बयान से गरमाई यूपी की सियासत, मायावती ने सपा की जातीय राजनीति और पुराने गठबंधन पर उठाए सवाल

    अखिलेश के बयान से गरमाई यूपी की सियासत, मायावती ने सपा की जातीय राजनीति और पुराने गठबंधन पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की राष्ट्रीय लोकदल और जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए उनके बयान को अमर्यादित और अशोभनीय बताया है। मायावती ने जयंत चौधरी और उनके राजनीतिक परिवार का सम्मान करने की बात कहते हुए अखिलेश यादव से माफी मांगने की मांग की है।

    मायावती ने कहा कि अखिलेश यादव की ओर से यह कहना कि उन्होंने अपने पुराने सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकदल और उसके नेता को चवन्नी से रुपया बनाया, राजनीतिक शिष्टाचार के लिहाज से उचित नहीं है। उन्होंने इस टिप्पणी को लेकर अखिलेश यादव से राष्ट्रीय लोकदल, जयंत चौधरी और चौधरी चरण सिंह के परिवार के प्रति कथित अपमान के लिए माफी मांगने को कहा।

    बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी का अपने सहयोगी दलों के साथ व्यवहार लंबे समय से राजनीतिक स्वार्थ और संकीर्णता से प्रभावित रहा है। उन्होंने कहा कि सपा की इसी कार्यशैली के कारण कई मौकों पर उसके राजनीतिक सहयोगियों के साथ संबंध खराब हुए हैं। मायावती ने दावा किया कि ऐसे राजनीतिक मतभेदों का लाभ अक्सर भारतीय जनता पार्टी को मिला और विपक्षी या धर्मनिरपेक्ष ताकतें कमजोर हुईं।

    मायावती ने अपने बयान में सपा और बसपा के पुराने गठबंधन का भी उल्लेख किया। उन्होंने 1993 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा के साथ बसपा के गठबंधन और बाद में उसके टूटने की घटना को याद किया। उन्होंने 2 जून 1995 के लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड का भी जिक्र करते हुए उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों को अपने आरोपों के संदर्भ में सामने रखा।

    बसपा प्रमुख ने इसके बाद अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए सपा और बसपा के चुनावी गठबंधन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के लिए दोनों दलों के बीच गठबंधन हुआ था, लेकिन अपेक्षित चुनावी परिणाम नहीं आने के बाद यह गठबंधन ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। मायावती ने इसके लिए सपा के रवैये को जिम्मेदार ठहराया।

    मायावती ने अखिलेश यादव की पीडीए राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अखिलेश यादव पीडीए में शामिल पी शब्द को कभी पिछड़ा वर्ग और कभी पंडितों के हित से जोड़ते हैं। मायावती ने दावा किया कि सपा पिछड़े वर्गों में अपनी जाति के अलावा अन्य समुदायों, अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के हितों के प्रति पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं रही है।

    उन्होंने सपा की पिछली सरकारों पर दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और ऊंची जातियों के लोगों के साथ भेदभाव तथा उत्पीड़न के आरोप भी लगाए। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि सपा शासन के दौरान अपराधी और अराजक तत्वों को बढ़ावा मिला। इन दावों के आधार पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से आगामी विधानसभा चुनाव में सपा को सत्ता से दूर रखने की अपील की।

    जयंत चौधरी को लेकर शुरू हुई टिप्पणी अब सपा, बसपा और अन्य राजनीतिक दलों के बीच व्यापक बहस का विषय बनती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन, सामाजिक समीकरण और पीडीए की रणनीति आगामी चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। मायावती के ताजा हमले ने इन मुद्दों पर राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है।

  • अमेरिका-कनाडा व्यापार वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा तनाव, पीएम मार्क कार्नी ने अमेरिकी शुल्क का जवाब देने का ऐलान किया

    अमेरिका-कनाडा व्यापार वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा तनाव, पीएम मार्क कार्नी ने अमेरिकी शुल्क का जवाब देने का ऐलान किया


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। दोनों देशों के बीच नई व्यापारिक डील को अंतिम रूप देने के लिए कई दौर की बातचीत के बावजूद सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने कनाडा से आने वाले करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू कर दिया है। यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से चल रहे व्यापारिक विवाद को और गहरा करने वाला माना जा रहा है।

    अमेरिकी प्रशासन के अनुसार यह शुल्क कनाडा के कुछ उत्पादों पर लगाया गया है और इसका उद्देश्य अमेरिकी व्यापारिक हितों के खिलाफ माने जा रहे कनाडाई कदमों का जवाब देना है। अमेरिका ने कनाडा पर अमेरिकी उत्पादों के साथ भेदभावपूर्ण व्यापारिक व्यवहार का आरोप लगाया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने कहा कि कनाडा ने बातचीत के दौरान तय शर्तों के आधार पर समझौते को अंतिम रूप देने से इनकार कर दिया।

    टैरिफ लागू करने का फैसला अचानक नहीं हुआ। दोनों देशों के बीच कई सप्ताह से व्यापार समझौते को लेकर गहन बातचीत चल रही थी। अगस्त के मध्य में दोनों पक्षों के बीच प्रगति के संकेत मिले थे और अमेरिका ने नई टैरिफ व्यवस्था लागू करने की समयसीमा भी कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ाई थी। इसके बावजूद अंतिम चरण में दोनों सरकारें किसी साझा समझौते तक नहीं पहुंच सकीं।

    कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी कदम पर कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि बातचीत के दौरान कुछ महत्वपूर्ण प्रगति जरूर हुई थी, लेकिन अंतिम समय में अमेरिका की ओर से ऐसी शर्तें और बदलाव सामने आए जिन्हें कनाडा अपने हितों के अनुरूप नहीं मान सकता था। इसके बाद कनाडा ने व्यापार वार्ता को रोकने का फैसला किया है।

    कार्नी ने स्पष्ट किया है कि कनाडा अमेरिकी टैरिफ का जवाब डॉलर के बदले डॉलर के आधार पर देगा। इसका अर्थ है कि कनाडा अमेरिकी उत्पादों पर भी समान आर्थिक प्रभाव वाला शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। कनाडाई सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य अपने श्रमिकों, किसानों और कारोबारियों के हितों की रक्षा करना है।

    अमेरिकी कदम से प्रभावित होने वाले सामान कनाडा के कुल अमेरिकी निर्यात का एक सीमित हिस्सा हैं। फिर भी इसका राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव व्यापक हो सकता है, क्योंकि अमेरिका और कनाडा लंबे समय से एक-दूसरे के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार रहे हैं। दोनों देशों के बीच हर वर्ष बड़े पैमाने पर वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार होता है।

    नए टैरिफ से हॉकी उपकरण, कुछ औद्योगिक उत्पाद, डेयरी और अन्य निर्धारित श्रेणियों के सामान प्रभावित हो सकते हैं। इससे कारोबारियों की लागत बढ़ने और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव आने की आशंका है। यदि कनाडा भी जवाबी शुल्क लागू करता है तो दोनों देशों के उत्पादों की कीमतों और व्यापारिक गतिविधियों पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है।

    यह विवाद ऐसे समय बढ़ा है जब दोनों देश उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था को लेकर भविष्य की दिशा तय करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको के बीच मौजूदा व्यापार समझौते की समीक्षा भी आगे महत्वपूर्ण विषय बनने वाली है। ऐसे में मौजूदा टैरिफ विवाद आने वाली व्यापार वार्ताओं को और जटिल कर सकता है।

    अमेरिका और कनाडा के बीच रिश्ते केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश सुरक्षा, रक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के मामलों में भी लंबे समय से साझेदार रहे हैं। इसलिए व्यापारिक टकराव का असर व्यापक द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल दोनों पक्षों के रुख से साफ है कि तत्काल समझौते के बजाय आर्थिक दबाव और जवाबी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।

  • जयंत चौधरी पर टिप्पणी से बढ़ा यूपी सियासी विवाद, अखिलेश यादव के खिलाफ केशव मौर्य और मायावती हुए मुखर

    जयंत चौधरी पर टिप्पणी से बढ़ा यूपी सियासी विवाद, अखिलेश यादव के खिलाफ केशव मौर्य और मायावती हुए मुखर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की एक टिप्पणी को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को लेकर की गई ‘चवन्नी से रुपया’ वाली टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव से जयंत चौधरी से माफी मांगने की मांग की है। वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने भी इस बयान को जाट समाज से जोड़ते हुए सपा प्रमुख पर निशाना साधा है।

    केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव पर पलटवार करते हुए कहा कि जयंत चौधरी के खिलाफ की गई टिप्पणी उचित नहीं है। उन्होंने सपा प्रमुख से अपने बयान के लिए माफी मांगने को कहा। मौर्य ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव राजनीतिक परेशानी के कारण अगड़े, पिछड़े और दलित समाज को लेकर भी ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं, जिन्हें उचित नहीं माना जा सकता।

    मौर्य ने अपने बयान में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह ने सैफई परिवार के लिए काफी कुछ किया था और परिवार पर उनका बड़ा एहसान रहा है। मौर्य के मुताबिक, ऐसे राजनीतिक और पारिवारिक संबंधों की पृष्ठभूमि में जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी पर अखिलेश यादव को विचार करना चाहिए और माफी मांगनी चाहिए।

    उपमुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा राजनीति का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता समाजवादी पार्टी को सत्ता से दूर रखेगी। मौर्य ने कहा कि भाजपा के साथ अगड़े, पिछड़े और दलित समाज के लोग खड़े हैं। उनके इस बयान को आगामी चुनाव के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    इसी विवाद के बीच बसपा प्रमुख मायावती ने भी अखिलेश यादव की टिप्पणी पर नाराजगी जताई। मायावती ने कहा कि ‘चवन्नी से रुपया’ बनाने वाली टिप्पणी जाट समाज को पसंद नहीं आई है। उन्होंने अखिलेश यादव पर राजनीतिक अहंकार का आरोप लगाते हुए कहा कि सपा प्रमुख को अपने बयान के लिए जाट समाज से माफी मांगनी चाहिए।

    जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभाव रखने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हैं और उनका राजनीतिक आधार मुख्य रूप से जाट समुदाय से जुड़ा माना जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ किसी टिप्पणी को लेकर सामाजिक प्रतिक्रिया का मुद्दा बनना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि भाजपा और बसपा दोनों ने अखिलेश यादव के बयान को लेकर उन्हें घेरने का प्रयास किया है।

    उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार तेज हो रहे हैं। विभिन्न दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे समय में नेताओं के बयानों पर होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया चुनावी माहौल को प्रभावित करने वाले मुद्दों का रूप ले सकती है।

    फिलहाल विवाद का केंद्र अखिलेश यादव की जयंत चौधरी को लेकर की गई टिप्पणी है। केशव मौर्य और मायावती दोनों ने अलग-अलग तरीके से इस बयान की आलोचना करते हुए माफी की मांग की है। अब राजनीतिक चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि अखिलेश यादव इस विवाद पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या उनकी ओर से कोई स्पष्टीकरण सामने आता है।

  • बड़वानी से भोपाल तक IAS काजल जावला का सफर, 29 महीने के कार्यकाल में छोड़ी खास छाप; अब नई जिम्मेदारी के साथ नई पारी

    बड़वानी से भोपाल तक IAS काजल जावला का सफर, 29 महीने के कार्यकाल में छोड़ी खास छाप; अब नई जिम्मेदारी के साथ नई पारी


    बड़वानी। मध्यप्रदेश में हुए प्रशासनिक फेरबदल के बीच जिला पंचायत बड़वानी की मुख्य कार्यपालन अधिकारी IAS काजल जावला का तबादला कर दिया गया है। करीब 29 महीने तक बड़वानी में जिम्मेदारी संभालने के बाद अब उन्हें अपर मिशन संचालक राज्य शिक्षा केंद्र भोपाल की नई जिम्मेदारी सौंपी गई है। बड़वानी में उनका कार्यकाल योजनाओं के क्रियान्वयन से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर बदलाव और कई उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए जाना जाएगा। जल संरक्षण पंचायत विकास शिक्षा महिला आजीविका और ग्रामीण योजनाओं की लगातार निगरानी ने उनके कार्यकाल को अलग पहचान दी।
    काजल जावला की कार्यशैली में मैदानी स्तर पर योजनाओं की स्थिति की समीक्षा और अधिकारियों कर्मचारियों के साथ लगातार समन्वय प्रमुख रहा। उन्होंने सरकारी योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित रखने के बजाय उनके वास्तविक क्रियान्वयन पर जोर दिया। इसी का असर कई योजनाओं के प्रदर्शन में दिखाई दिया। जल संरक्षण के क्षेत्र में बड़वानी ने उनके कार्यकाल के दौरान प्रदेश स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की। जल गंगा संवर्धन अभियान 2026 में जिला प्रदेश में प्रथम स्थान पर रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में 5666 जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए। इनमें खेत तालाब कंटूर ट्रेंच डगवेल रिचार्ज और सामुदायिक तालाब जैसे काम शामिल रहे।

    जल संचय जन भागीदारी अभियान 2.0 में भी जिले ने उल्लेखनीय काम किया। जनसहयोग से 30155 कंटूर गड्ढे बनाए गए जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 41957 जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए। इस अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरचनाओं को मजबूत करने के साथ जल संरक्षण के प्रति जनभागीदारी को भी बढ़ावा दिया।

    महिलाओं की आय बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने वाले एक बगिया मां के नाम अभियान में भी बड़वानी प्रदेश में तीसरे स्थान पर रहा। जिले में 732 बगिया स्वीकृत हुईं। कानपुरी बोरलाय और मतराला ग्राम पंचायतों को बेहतर प्रदर्शन के कारण प्रदेश की टॉप 10 पंचायतों में स्थान मिला। पंचायत स्तर की उपलब्धियों में भी जिले का प्रदर्शन मजबूत रहा। पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स में मलफा और मोरतलाई ग्राम पंचायतों ने प्रदेश में क्रमशः पहला और दूसरा स्थान हासिल किया।

    आदि कर्मयोगी अभियान के तहत जिले के 529 गांव चयनित हुए और सभी गांवों के विलेज एक्शन प्लान तैयार करने में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए बड़वानी प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहा। इस उपलब्धि पर जिले को राष्ट्रपति स्तर पर सम्मान भी मिला। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के क्रियान्वयन में भी बड़वानी लगातार दूसरे स्थान पर रहा।

    शिक्षा के क्षेत्र में भी काजल जावला के कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण काम हुए। कायाकल्प अभियान के तहत करीब 600 सरकारी स्कूलों का कायाकल्प किया गया। इससे विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद मिली। प्रधानमंत्री पोषण अभियान और मध्यान्ह भोजन योजना की निगरानी से खाद्यान्न उठाव और एसएमएस मॉनिटरिंग का प्रदर्शन 44 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत तक पहुंचा और लंबे समय तक यह स्थिति बनी रही। जनसहयोग से पांच स्कूलों में सरस्वती प्रसादम अभियान भी संचालित हुआ जिसमें बच्चों को भोजन के अलावा फल दही मिठाई और शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराई गई।

    किसानों और महिलाओं की आय बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड कार्यक्रम के तहत चार सब्जी क्लस्टर विकसित किए गए जिससे करीब 450 किसान सब्जी उत्पादन से जुड़े। मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए 10 तालाबों का निर्माण कराया गया। पाटी विकासखंड में स्वयं सहायता समूहों को रिवॉल्विंग फंड उपलब्ध कराने और आजीविका कैफे तथा कियोस्क के जरिए महिला समूहों की आय बढ़ाने के प्रयास भी किए गए।

    जनता की शिकायतों के निराकरण में भी बड़वानी का प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा। सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के त्वरित निराकरण के लिए लगातार मॉनिटरिंग की गई और जिला टॉप तीन में बना रहा। अब करीब 29 महीने बाद काजल जावला बड़वानी से विदा हो रही हैं। उनके तबादले के साथ जिम्मेदारी जरूर बदली है लेकिन जल संरक्षण पंचायत विकास शिक्षा और महिला आजीविका के क्षेत्र में किए गए काम उनके कार्यकाल की पहचान बने रहेंगे। अब भोपाल में नई जिम्मेदारी के साथ उनके प्रशासनिक अनुभव का दायरा और व्यापक होने की उम्मीद है।