Category: Economy

  • किसानों की होगी डबल कमाई, एक ही खेत में उगेगी फसल और बनेगी बिजली, एग्रीवोल्टाइक्स से ग्रामीण समृद्धि को नई उड़ान

    किसानों की होगी डबल कमाई, एक ही खेत में उगेगी फसल और बनेगी बिजली, एग्रीवोल्टाइक्स से ग्रामीण समृद्धि को नई उड़ान


    नई दिल्ली। देश के किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए एग्रीवोल्टाइक्स तकनीक को एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और शिवराज सिंह चौहान के एक लेख को साझा करते हुए इस तकनीक की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कृषि गतिविधियों के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन को जोड़ने वाली यह व्यवस्था किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और ग्रामीण समृद्धि को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभा सकती है। इस तकनीक के जरिए किसान एक ही जमीन पर खेती जारी रखने के साथ बिजली उत्पादन से भी अतिरिक्त आमदनी हासिल कर सकते हैं।

    प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि एग्रीवोल्टाइक्स किसानों के लिए कमाई का अतिरिक्त स्रोत बन सकती है। इससे ऊर्जा पर होने वाला खर्च कम करने और फसल उत्पादकता को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है। खेती में मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती लागत किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में कृषि और सौर ऊर्जा को एक साथ जोड़ने वाला यह मॉडल किसानों को आय के नए अवसर उपलब्ध कराने के साथ उनकी आर्थिक निर्भरता कम करने में सहायक हो सकता है।

    भारत 21 से 23 अक्टूबर तक नई दिल्ली में सातवें एग्रीवोल्टाइक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस की मेजबानी कर रहा है। इस सम्मेलन की थीम पावरिंग द ग्लोबल साउथ रखी गई है। इसका उद्देश्य कृषि और स्वच्छ ऊर्जा के बीच बेहतर तालमेल की संभावनाओं पर चर्चा करना है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और शिवराज सिंह चौहान ने अपने लेख में एग्रीवोल्टाइक्स को कृषि क्षेत्र के लिए उपयोगी मॉडल बताया है। इसे एग्रीपीवी भी कहा जाता है। इस व्यवस्था में खेतों में सौर पैनल इस तरह लगाए जाते हैं कि उनके नीचे या आसपास खेती की जा सके और जमीन का उपयोग कृषि उत्पादन के साथ बिजली बनाने के लिए भी हो।

    मंत्रियों के अनुसार भारत में लगभग 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं। ऐसे किसानों के लिए आय के अतिरिक्त साधन उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। एग्रीवोल्टाइक्स के माध्यम से किसान खेती से होने वाली कमाई के अलावा सौर ऊर्जा उत्पादन और बिजली की बिक्री से भी आय अर्जित कर सकते हैं। इसके साथ ही सिंचाई के लिए डीजल और खरीदी गई बिजली पर निर्भरता घटाने की संभावना भी बनती है। इससे खेती की लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

    इस तकनीक का लाभ केवल अतिरिक्त आमदनी तक सीमित नहीं है। सौर पैनलों की उचित व्यवस्था खेतों में सूक्ष्म जलवायु तैयार करने में मदद कर सकती है। इससे कुछ परिस्थितियों में फसलों को अत्यधिक गर्मी और तेज सौर विकिरण से राहत मिल सकती है। उपयुक्त डिजाइन और फसल चयन के आधार पर सूखे तथा ओलावृष्टि जैसी परिस्थितियों के प्रभाव को कम करने में भी सहायता मिल सकती है। हालांकि इसका वास्तविक लाभ फसल के प्रकार जलवायु और सौर पैनलों की बनावट पर निर्भर करेगा।

    सरकार प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान यानी पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण में एग्रीवोल्टाइक्स को विशेष महत्व देने की तैयारी कर रही है। इससे कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल और सिंचाई व्यवस्था के सौरकरण को प्रोत्साहन मिल सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सौर संयंत्रों की स्थापना रखरखाव और उनसे जुड़ी कृषि सेवाओं के माध्यम से रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।

    मंत्रियों ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मॉडल की सफलता के लिए वैज्ञानिक तरीके से योजना बनाना जरूरी होगा। ऐसी फसलों का चयन करना होगा जिन्हें उपलब्ध धूप में बेहतर तरीके से उगाया जा सके। सिंचाई पोषक तत्व प्रबंधन और सौर पैनलों की ऊंचाई तथा दूरी पर भी ध्यान देना होगा ताकि खेती के लिए पर्याप्त सूर्य प्रकाश उपलब्ध रहे। इसके अलावा कृषि और ऊर्जा विभागों राज्य सरकारों अनुसंधान संस्थानों तथा स्थानीय निकायों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। सही योजना और प्रभावी क्रियान्वयन के साथ एग्रीवोल्टाइक्स किसानों की आमदनी बढ़ाने और गांवों में स्वच्छ ऊर्जा आधारित विकास को गति देने वाला महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।

  • बैंकिंग सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी, सरकारी बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर मंथन

    बैंकिंग सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी, सरकारी बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर मंथन


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार मौजूदा 20 प्रतिशत की सीमा को बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो सरकारी बैंकों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है। इससे बैंकिंग सेक्टर में पूंजी निवेश को प्रोत्साहन मिलने के साथ सरकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति और विकास योजनाओं पर भी असर पड़ने की संभावना है। हालांकि अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है और सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा भी नहीं की गई है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में प्रारूप कैबिनेट नोट तैयार किया है। प्रस्तावित बदलाव को आगे बढ़ाने से पहले अन्य मंत्रालयों से उनकी राय मांगी गई है। भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने भी सरकारी बैंकों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने का समर्थन किया है। बताया जा रहा है कि केंद्रीय बैंक ने हाल ही में सरकार को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर जल्द विचार करने की सिफारिश की थी। ऐसे में आने वाले समय में इस प्रस्ताव पर सरकार का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    फिलहाल भारत में निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए एफडीआई की अधिकतम सीमा 74 प्रतिशत है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में विदेशी निवेश की सीमा 20 प्रतिशत तक निर्धारित है। इस अंतर को कम करने के उद्देश्य से सरकारी बैंकों में निवेश की सीमा बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। देश के 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई में सबसे अधिक 11.07 प्रतिशत विदेशी निवेश दर्ज किया गया है। इसके बाद केनरा बैंक में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 10.55 प्रतिशत है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो सरकारी बैंकों के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

    इस प्रस्ताव पर विचार ऐसे समय में किया जा रहा है जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में विदेशी निवेश का प्रवाह मजबूत बना हुआ है। उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल से जून तिमाही के दौरान भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश छह प्रतिशत बढ़कर 19.81 अरब डॉलर हो गया। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह आंकड़ा 18.62 अरब डॉलर था। मासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल में एफडीआई लगभग दोगुना होकर 12.1 अरब डॉलर पहुंच गया जबकि एक साल पहले इसी महीने यह 6.6 अरब डॉलर था। मई में निवेश घटकर 2.8 अरब डॉलर रहा लेकिन जून में फिर बढ़कर 4.91 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

    क्षेत्रवार आंकड़ों के अनुसार सेवा क्षेत्र विदेशी निवेश आकर्षित करने में सबसे आगे रहा। इस क्षेत्र में 7.04 अरब डॉलर का निवेश आया। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर क्षेत्र को 2.84 अरब डॉलर तथा व्यापार क्षेत्र को 1.92 अरब डॉलर का विदेशी निवेश मिला। इसके अलावा गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में 1.24 अरब डॉलर और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 62.2 करोड़ डॉलर का निवेश दर्ज किया गया। इक्विटी निवेश पुनर्निवेशित आय और अन्य पूंजी को शामिल करने वाला कुल एफडीआई अप्रैल से जून के दौरान लगभग 22 प्रतिशत बढ़कर 30.65 अरब डॉलर हो गया।

    राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु 5.95 अरब डॉलर के निवेश के साथ पहले स्थान पर रहा। महाराष्ट्र में 4.22 अरब डॉलर दिल्ली में 2.67 अरब डॉलर कर्नाटक में 2.11 अरब डॉलर और गुजरात में 1.3 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया। अब सरकारी बैंकों में एफडीआई सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर सरकार के अंतिम निर्णय का इंतजार है। यदि इसे मंजूरी मिलती है तो भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में विदेशी निवेश की भूमिका बढ़ सकती है।

  • भारत में AI कंपनियों के IPO से निवेशकों को मिलेगी नई उम्मीद, 55 अरब डॉलर की वैल्यू वाली कंपनियों पर नजर

    भारत में AI कंपनियों के IPO से निवेशकों को मिलेगी नई उम्मीद, 55 अरब डॉलर की वैल्यू वाली कंपनियों पर नजर


    नई दिल्ली। भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का तेजी से बढ़ता इकोसिस्टम आने वाले दो से तीन वर्षों में शेयर बाजार के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। गोल्डमैन सैक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में एआई स्टार्टअप्स की संभावित लिस्टिंग से सूचीबद्ध कंपनियों के कुल मूल्यांकन में 50 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर तक की बढ़ोतरी हो सकती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में मध्यम से लेकर अंतिम विकास चरण तक पहुंच चुकी करीब 70 निजी एआई कंपनियों में से 25 से 50 प्रतिशत कंपनियां आने वाले समय में अपना आईपीओ ला सकती हैं। इन कंपनियों की शेयर बाजार में लिस्टिंग उनके मौजूदा अनुमानित मूल्यांकन से औसतन करीब चार गुना अधिक वैल्यूएशन पर हो सकती है। इससे भारतीय शेयर बाजार में एआई से जुड़ी कंपनियों की संख्या बढ़ने के साथ निवेशकों को इस क्षेत्र में निवेश के नए अवसर मिल सकते हैं।

    एआई स्टार्टअप्स की फंडिंग में तेजी

    भारत में एआई कंपनियों के प्रति निवेशकों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 के बाद से भारतीय एआई स्टार्टअप्स के लिए निजी इक्विटी फंडिंग तीन गुना हो गई है। वहीं देश में कुल निजी इक्विटी निवेश में एआई की हिस्सेदारी चार गुना बढ़कर लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह बदलाव दर्शाता है कि निवेशक अब एआई को केवल उभरती हुई तकनीक के रूप में नहीं बल्कि भविष्य में बड़े कारोबार और कमाई की संभावना वाले क्षेत्र के तौर पर देख रहे हैं। भारत निजी एआई फंडिंग के मामले में दुनिया के शीर्ष छह देशों में शामिल है। वहीं नई फंडिंग हासिल करने वाली एआई कंपनियों की संख्या के आधार पर देश दुनिया के शीर्ष चार देशों में जगह रखता है। इस स्थिति से भारतीय एआई उद्योग को वैश्विक निवेश बाजार में मजबूती मिलने की संभावना है।

    84 निजी एआई कंपनियों की कुल वैल्यू 55 अरब डॉलर

    गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में भारत की 84 निजी कंपनियों को प्राइवेट एआई कंटेंडर्स के रूप में पहचाना गया है। इन कंपनियों का कुल अनुमानित मूल्यांकन करीब 55 अरब डॉलर है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 के बाद से भारत में एआई से जुड़ी कुल निजी फंडिंग का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं कंपनियों को मिला है। ये कंपनियां एआई तकनीक से जुड़े अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही हैं। इनमें एआई सॉफ्टवेयर और तकनीकी सेवाओं के साथ ऐसे व्यवसाय भी शामिल हैं जो एआई सिस्टम के संचालन के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराते हैं। इन कंपनियों के संभावित आईपीओ से शेयर बाजार में एआई से जुड़ी कारोबारी गतिविधियों का दायरा बढ़ सकता है।

    अपस्ट्रीम एआई क्षेत्र में सबसे बड़ा अवसर

    रिपोर्ट में एआई वैल्यू चेन के शुरुआती और बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्र को सबसे बड़े अवसर के रूप में बताया गया है। इसे अपस्ट्रीम एआई इनेबलर्स कहा जाता है और इसका अनुमानित मूल्यांकन करीब 35 अरब डॉलर है। इस क्षेत्र में बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन से लेकर सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन चिप डिजाइन क्वांटम कंप्यूटिंग डेटा सेंटर क्लाउड सेवाओं और डेटा मैनेजमेंट से जुड़ी कंपनियां आती हैं। एआई तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करने और चलाने के लिए इन क्षेत्रों की अहम भूमिका होती है। इसी वजह से इनके कारोबार में वृद्धि की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

    आईपीओ में दो-तिहाई हिस्सेदारी की संभावना

    गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि भविष्य में एआई कंपनियों की संभावित लिस्टिंग के कुल मूल्य में से लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा अपस्ट्रीम एआई इनेबलर्स का हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार इन कंपनियों की लिस्टिंग से भारतीय शेयर बाजार में एआई वैल्यू चेन के उन हिस्सों को भी प्रतिनिधित्व मिल सकता है जो फिलहाल बाजार में कम दिखाई देते हैं। गोल्डमैन सैक्स में एशिया मैक्रो रिसर्च के सह-प्रमुख और एशिया-प्रशांत इक्विटी रणनीतिकार टिमोथी मो के मुताबिक एआई कंपनियों की लिस्टिंग से भारतीय बाजार में इस क्षेत्र से जुड़ी सूचीबद्ध कंपनियों का दायरा बढ़ सकता है। हालांकि संभावित मूल्यांकन और आईपीओ की संख्या अनुमान पर आधारित हैं। वास्तविक नतीजे बाजार की स्थिति कंपनियों के प्रदर्शन और निवेशकों की मांग पर निर्भर करेंगे।

  • .ऑटो सेक्टर में कारोबार का नया दौर, बैटरी से चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तक कंपनियों में बढ़ा निवेश

    .ऑटो सेक्टर में कारोबार का नया दौर, बैटरी से चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तक कंपनियों में बढ़ा निवेश


    नई दिल्ली। भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में 2026 की तीसरी तिमाही के दौरान निवेश गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। इस अवधि में कुल 1.7 अरब डॉलर के 33 सौदे हुए जबकि पिछली तिमाही में 71.7 करोड़ डॉलर के 20 सौदे दर्ज किए गए थे। बुधवार को जारी ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट के मुताबिक पिछली तिमाही की तुलना में सौदों की संख्या में 65 प्रतिशत और कुल मूल्य में 131 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस तेजी के पीछे विलय एवं अधिग्रहण यानी एमएंडए निजी इक्विटी निवेश वेंचर कैपिटल और सार्वजनिक बाजार से दोबारा पूंजी जुटाने की गतिविधियों में बढ़ोतरी प्रमुख वजह रही। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग अब पारंपरिक वाहन निर्माण से आगे बढ़कर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और नई तकनीक पर आधारित कारोबार की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

    इलेक्ट्रिक वाहनों और नई तकनीक पर निवेशकों की नजर

    तीसरी तिमाही में इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ता रुझान निवेश का प्रमुख विषय बना रहा। निवेशकों ने इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं के साथ बैटरी तकनीक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर मोबिलिटी प्लेटफॉर्म और ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों में पूंजी लगाई। रिपोर्ट के अनुसार निवेशक ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनका कारोबार बड़े स्तर पर विस्तार कर सकता है और जिनके पास दूसरों से अलग तकनीक या मजबूत कारोबारी मॉडल है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संभावनाओं और परिवहन व्यवस्था में हो रहे बदलावों ने इन क्षेत्रों को निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण बना दिया है। अब निवेश केवल कार और दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं है बल्कि उन व्यवसायों पर भी ध्यान दिया जा रहा है जो इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के पूरे ढांचे को मजबूत करते हैं।

    एमएंडए और निजी निवेश के तहत 808 मिलियन डॉलर के सौदे

    रिपोर्ट के मुताबिक तीसरी तिमाही में विलय एवं अधिग्रहण तथा निजी इक्विटी और वेंचर कैपिटल गतिविधियों के तहत कुल 808 मिलियन डॉलर के 28 सौदे हुए। वहीं केवल एमएंडए गतिविधियों के अंतर्गत 389 मिलियन डॉलर के 12 सौदे दर्ज किए गए। पिछली तिमाही में एमएंडए के तहत 138 मिलियन डॉलर के पांच सौदे हुए थे। इससे पता चलता है कि कंपनियां अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने के लिए अधिग्रहण तथा रणनीतिक साझेदारी जैसे विकल्पों पर जोर दे रही हैं। निवेशकों का रुझान उन कारोबारों की ओर है जो भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों और आधुनिक परिवहन व्यवस्था की जरूरतों को पूरा कर सकें।

    घरेलू सौदों की रही बड़ी हिस्सेदारी

    तीसरी तिमाही में घरेलू सौदे निवेश गतिविधियों के प्रमुख चालक बने रहे। कुल सौदों की संख्या में इनकी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत रही जबकि कुल सौदा मूल्य में घरेलू सौदों का योगदान 87 प्रतिशत दर्ज किया गया। रणनीतिक निवेश मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं मोबिलिटी प्लेटफॉर्म ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी कंपनियों और ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों में केंद्रित रहा। यह रुझान बताता है कि कंपनियां नई क्षमताएं हासिल करने और मोबिलिटी इकोसिस्टम में अपनी स्थिति मजबूत करने पर ध्यान दे रही हैं।

    ऑटो सेक्टर में निवेश के नए चक्र के संकेत

    ग्रांट थॉर्नटन भारत में ऑटोमोटिव एवं ईवी इंडस्ट्री के लीडर और पार्टनर साकेत मेहरा के अनुसार ऑटोमोबाइल सेक्टर निवेश के एक नए चक्र में प्रवेश कर रहा है। यह बदलाव मोबिलिटी क्षेत्र में हो रहे व्यापक परिवर्तन से प्रेरित है। अब पूंजी वाहन निर्माताओं के अलावा बैटरी तकनीक चार्जिंग नेटवर्क ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी और मोबिलिटी प्लेटफॉर्म जैसे क्षेत्रों में भी पहुंच रही है। निवेशक ऐसी कंपनियों को समर्थन देना चाहते हैं जो भारत में परिवहन के भविष्य के लिए जरूरी तकनीक और बुनियादी ढांचा विकसित कर रही हैं। तीसरी तिमाही के आंकड़े दर्शाते हैं कि निवेशक फंडिंग के मामले में चुनिंदा कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करने के बावजूद भारत के मोबिलिटी और इलेक्ट्रिफिकेशन क्षेत्र की दीर्घकालिक संभावनाओं को लेकर भरोसा बनाए हुए हैं।

  • क्रेडिट कार्ड से पेमेंट के बाद पैसा वापस पाने के लिए रिफंड या चार्जबैक, जानें सही विकल्प

    क्रेडिट कार्ड से पेमेंट के बाद पैसा वापस पाने के लिए रिफंड या चार्जबैक, जानें सही विकल्प


    नई दिल्ली । क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन खरीदारी करना सुविधाजनक है, लेकिन कई बार ऑर्डर रद्द होने, सामान नहीं मिलने, गलत बिलिंग या भुगतान से जुड़ी समस्या के कारण ग्राहकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में पैसे वापस पाने के लिए रिफंड और चार्जबैक दो प्रमुख विकल्प हैं। हालांकि, दोनों की प्रक्रिया, इस्तेमाल करने का तरीका और समय अलग-अलग होता है। इसलिए शिकायत की प्रकृति के अनुसार सही विकल्प चुनना जरूरी है।

    क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने के बाद यदि ग्राहक किसी सामान को वापस करता है या ऑर्डर रद्द कर देता है, तो वह संबंधित विक्रेता या कंपनी से रिफंड मांग सकता है। इसी तरह, बिल में कोई गलती मिलने पर भी ग्राहक विक्रेता से भुगतान वापस करने का अनुरोध कर सकता है। रिफंड की प्रक्रिया आमतौर पर मर्चेंट यानी विक्रेता की ओर से शुरू की जाती है। इसके बाद संबंधित राशि ग्राहक के क्रेडिट कार्ड खाते में वापस जमा होती है।

    उदाहरण के तौर पर, यदि किसी ग्राहक ने ऑनलाइन 7,000 रुपये का सामान खरीदा और बाद में ऑर्डर रद्द कर दिया, तो वह संबंधित ई-कॉमर्स कंपनी से पैसे वापस मांग सकता है। रिफंड का अनुरोध स्वीकार होने के बाद राशि वापस आने में कुछ कार्यदिवस लग सकते हैं। यह अवधि विक्रेता की प्रक्रिया और भुगतान व्यवस्था पर निर्भर करती है। ऐसे में ग्राहक को ऑर्डर की जानकारी, भुगतान की रसीद और कंपनी के साथ हुई बातचीत का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए।

    दूसरी ओर, चार्जबैक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ग्राहक किसी विवादित क्रेडिट कार्ड लेनदेन को लेकर अपने कार्ड जारी करने वाले बैंक से शिकायत करता है। इसका इस्तेमाल उस समय किया जा सकता है, जब विक्रेता उचित रिफंड देने से इनकार कर दे, शिकायत का जवाब नहीं दे या भुगतान करने के बावजूद सामान अथवा सेवा उपलब्ध न कराए। यदि खाते में कोई अनधिकृत लेनदेन दिखाई देता है या धोखाधड़ी का संदेह होता है, तो ग्राहक को बैंक को तुरंत सूचित करना चाहिए।

    चार्जबैक की प्रक्रिया में बैंक विवादित भुगतान की जांच करता है। इस दौरान ग्राहक से लेनदेन का विवरण, भुगतान की रसीद, ऑर्डर से जुड़े दस्तावेज और विक्रेता के साथ हुई बातचीत के प्रमाण मांगे जा सकते हैं। जांच के दौरान विक्रेता को भी अपने पक्ष में सबूत देने का अवसर मिल सकता है। इसलिए केवल शिकायत दर्ज कराने से पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। बैंक उपलब्ध तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेता है। निर्धारित समयसीमा के भीतर शिकायत करना भी महत्वपूर्ण है।

    रिफंड और चार्जबैक के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि रिफंड के लिए ग्राहक सीधे विक्रेता से संपर्क करता है, जबकि चार्जबैक के लिए बैंक के माध्यम से विवाद उठाया जाता है। रिफंड की अवधि विक्रेता की प्रक्रिया पर निर्भर करती है, जबकि चार्जबैक की जांच में कई सप्ताह लग सकते हैं। इसलिए सामान्य ऑर्डर रद्द होने या सामान लौटाने की स्थिति में पहले रिफंड मांगना उचित रहता है। यदि विक्रेता समस्या का समाधान नहीं करता, तो ग्राहक बैंक से चार्जबैक की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ले सकता है।

    इन दोनों प्रक्रियाओं का अनुरोध करने से आमतौर पर क्रेडिट स्कोर पर सीधा असर नहीं पड़ता। हालांकि, विवाद के दौरान क्रेडिट कार्ड के बकाया बिल का भुगतान रोकना या निर्धारित तारीख के बाद भुगतान करना स्कोर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ग्राहक को बैंक से भुगतान संबंधी निर्देश स्पष्ट करने चाहिए और केवल विवादित राशि के आधार पर पूरे बिल को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही दस्तावेज सुरक्षित रखना, समय पर शिकायत करना और बैंक की प्रक्रिया का पालन करना पैसे वापस पाने में मददगार हो सकता है।

  • दो SIM और 5G इस्तेमाल करने से कितनी जल्दी खत्म होती है फोन की बैटरी, जानें बचाने के आसान तरीके

    दो SIM और 5G इस्तेमाल करने से कितनी जल्दी खत्म होती है फोन की बैटरी, जानें बचाने के आसान तरीके

    नई दिल्ली । स्मार्टफोन में दो सिम कार्ड इस्तेमाल करना आज आम बात है। कई लोग निजी और कामकाजी जरूरतों के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं, जबकि कुछ लोग एक सिम कॉलिंग और दूसरी इंटरनेट के लिए इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि क्या फोन में दो सिम सक्रिय रखने से बैटरी जल्दी खत्म होती है। इसके साथ ही 5G नेटवर्क के इस्तेमाल को भी बैटरी की खपत से जोड़कर देखा जाता है। इसका जवाब फोन की तकनीक, नेटवर्क की स्थिति और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करता है।

    जब स्मार्टफोन में दो सिम सक्रिय होती हैं, तो उसे दोनों मोबाइल नेटवर्क से जुड़े रहने और संबंधित सेवाओं के लिए तैयार रहने की जरूरत पड़ सकती है। इस प्रक्रिया में नेटवर्क से जुड़ा सिस्टम ऊर्जा खर्च करता है। इसलिए कुछ परिस्थितियों में दो सिम इस्तेमाल करने से बैटरी की खपत बढ़ सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्मार्टफोन में दो सिम लगाने से बैटरी तेजी से खत्म होगी। आधुनिक फोन में ऊर्जा की खपत को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है।

    बैटरी पर नेटवर्क की मजबूती का भी महत्वपूर्ण असर पड़ता है। यदि किसी इलाके में मोबाइल सिग्नल कमजोर है, तो फोन बेहतर कनेक्शन खोजने और उपलब्ध नेटवर्क से जुड़े रहने की कोशिश कर सकता है। इस दौरान सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अधिक ऊर्जा खर्च हो सकती है। घर के अंदर, बेसमेंट, लिफ्ट के आसपास या ऐसे स्थानों पर जहां सिग्नल बार-बार कमजोर होता है, बैटरी तेजी से घटने की समस्या दिखाई दे सकती है। यदि दोनों सिम को कमजोर नेटवर्क मिल रहा हो, तो खपत बढ़ने की संभावना भी रहती है।

    5G नेटवर्क का इस्तेमाल भी कुछ स्थितियों में बैटरी की खपत बढ़ा सकता है। तेज इंटरनेट कनेक्शन के दौरान फोन के नेटवर्क सिस्टम पर काम का दबाव बढ़ सकता है। खासकर जब 5G सिग्नल कमजोर हो और फोन बार-बार 4G तथा 5G नेटवर्क के बीच स्विच कर रहा हो, तो बैटरी पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है। इसके अलावा, वीडियो स्ट्रीमिंग, बड़ी फाइलें डाउनलोड करने और ऑनलाइन गेम खेलने जैसे काम भी ऊर्जा की खपत बढ़ा सकते हैं।

    हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर 5G स्मार्टफोन की बैटरी 4G के मुकाबले जल्दी खत्म हो। नेटवर्क की गुणवत्ता, फोन का मॉडल और इस्तेमाल की जाने वाली सेवाएं बैटरी के प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं। इसी तरह, दो सिम और 5G एक साथ सक्रिय होने पर भी बैटरी कितनी खर्च होगी, इसका कोई एक समान जवाब नहीं है।

    बैटरी बचाने के लिए सबसे पहले फोन की सेटिंग में जाकर बैटरी इस्तेमाल का विवरण देखना चाहिए। इससे पता चल सकता है कि कौन-से ऐप सबसे ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। जिन ऐप की जरूरत नहीं है और जो बैकग्राउंड में लगातार काम कर रहे हैं, उनकी गतिविधि सीमित करना उपयोगी हो सकता है।

    स्क्रीन की चमक कम रखना भी बैटरी बचाने का आसान तरीका है। ऑटो-ब्राइटनेस सुविधा चालू रखने से रोशनी को आसपास की परिस्थितियों के अनुसार समायोजित किया जा सकता है। यदि दूसरी सिम की जरूरत नहीं है, तो उसे कुछ समय के लिए बंद करके भी देखा जा सकता है। इससे खासकर कमजोर नेटवर्क वाले क्षेत्रों में कुछ फोन की बैटरी खपत कम हो सकती है।

    इसी तरह, यदि आपके इलाके में 5G सिग्नल कमजोर है और तेज इंटरनेट की आवश्यकता नहीं है, तो फोन की नेटवर्क सेटिंग में 4G विकल्प चुनना मददगार हो सकता है। हालांकि, इसका असर हर डिवाइस पर एक जैसा नहीं होगा। मजबूत 5G नेटवर्क वाले क्षेत्र में यह बदलाव बहुत कम अंतर पैदा कर सकता है।

    कुल मिलाकर, फोन की बैटरी जल्दी खत्म होने के लिए केवल दो सिम या 5G को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। नेटवर्क की स्थिति, स्क्रीन की चमक, बैकग्राउंड ऐप और बैटरी की पुरानी हालत भी महत्वपूर्ण कारण हैं। इसलिए बैटरी बचाने के लिए पहले फोन की बैटरी सेटिंग में खपत की जांच करना और उसके बाद जरूरत के अनुसार नेटवर्क तथा ऐप की सेटिंग बदलना बेहतर तरीका है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर जोर

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर जोर

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं और वित्तीय जोखिमों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में बनी हुई है। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने मंगलवार को कहा कि भारत का अनुभव बताता है कि मजबूत व्यापक आर्थिक आधार किसी देश को चुनौतीपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी स्थिरता और निरंतर विकास बनाए रखने में मदद कर सकता है। उन्होंने यह बात भारतीय रिजर्व बैंक के अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘संवाद 2026’ के दूसरे दिन वित्तीय स्थिरता पर आयोजित विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कही।

    अनुराधा ठाकुर के अनुसार, भारत की राजकोषीय स्थिति विश्वसनीय रही है। इसके साथ ही, मुद्रास्फीति को निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखने की लचीली व्यवस्था ने महंगाई को लेकर लोगों और बाजारों की अपेक्षाओं को स्थिर बनाए रखने में भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत मौजूदा चुनौतीपूर्ण वैश्विक हालात का सामना व्यापक आर्थिक स्थिरता की मजबूत स्थिति के साथ कर रहा है। उनके संबोधन में आर्थिक आधार को मजबूत बनाए रखने और बदलते वैश्विक वातावरण में स्थिरता कायम रखने के महत्व पर जोर दिया गया।

    संगोष्ठी में आयोजित पैनल चर्चा के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने वित्तीय स्थिरता को एक स्वतंत्र नीतिगत उद्देश्य के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी नीतियों का दायरा अब केवल अलग-अलग संस्थानों की स्थिति तक सीमित नहीं रह गया है। इसके बजाय पूरी वित्तीय प्रणाली की मजबूती पर ध्यान दिया जा रहा है। इस व्यापक दृष्टिकोण में बैंकों के साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों की भूमिका और उनसे जुड़े जोखिमों को भी शामिल किया गया है।

    चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने आगाह किया कि वित्तीय संकट अब पहले की तुलना में अधिक तेजी से सामने आ सकते हैं और उनकी गंभीरता भी बढ़ सकती है। ऐसे में वित्तीय प्रणाली की निगरानी, जोखिमों की समय रहते पहचान और संस्थानों की संकट से निपटने की क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। पैनल के सदस्यों ने यह भी कहा कि वित्तीय क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देते समय पिछली आर्थिक मंदियों और संकटों से मिली सीख को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वित्तीय पुनर्गठन से पैदा होने वाले संभावित दुष्प्रभावों का आकलन भी नीतिगत फैसलों का हिस्सा होना चाहिए।

    वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों में जलवायु परिवर्तन के जोखिम, गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थों का बढ़ता प्रभाव, फिनटेक कंपनियों की भूमिका और मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन कारकों को वित्तीय नीतियों और जोखिम आकलन में उचित महत्व देना आवश्यक है। इसके अलावा, वित्तीय आंकड़ों को साझा करने में मौजूद कमियों को दूर करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एजेंटों के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़ी चिंताओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

    पैनल ने वित्तीय सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाने पर जोर देते हुए कहा कि केवल बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों और परिवारों की वित्तीय स्थिति भी ऐसी होनी चाहिए कि वे अचानक पैदा होने वाले आर्थिक झटकों का सामना कर सकें। इस दृष्टिकोण के तहत पूरी वित्तीय व्यवस्था की मजबूती और विभिन्न क्षेत्रों के बीच जोखिमों के प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण माना गया।चर्चा में भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष अजय सेठ, भूटान की रॉयल मॉनेटरी अथॉरिटी की गवर्नर यांगचेन त्शोग्येल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अथानासियोस वाम्वाकिडिस और इनवेस्को के पॉल जैक्सन भी शामिल हुए।

    दो दिवसीय ‘संवाद 2026’ का उद्घाटन सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने किया था। इस अवसर पर केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुख्य संबोधन दिया। आयोजन में विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों के गवर्नर, वरिष्ठ नीति निर्माता, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ वैश्विक वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद चुनौतियों तथा संभावित अवसरों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

  • भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते से इंजीनियरिंग निर्यात पांच साल में दोगुना होने की उम्मीद

    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते से इंजीनियरिंग निर्यात पांच साल में दोगुना होने की उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता लागू होने से भारतीय इंजीनियरिंग क्षेत्र को नए अवसर मिलने की उम्मीद है। उद्योग जगत का अनुमान है कि इस समझौते के बाद अगले पांच वर्षों में न्यूजीलैंड को भारत का इंजीनियरिंग निर्यात लगभग दोगुना होकर 28 से 30 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे भारतीय निर्माताओं को न्यूजीलैंड के बाजार में अपनी पहुंच बढ़ाने और नए व्यापारिक अवसर तलाशने में मदद मिलने की संभावना है।

    इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद इंडिया के अध्यक्ष पंकज चड्ढा ने समझौते को भारतीय इंजीनियरिंग उद्योग के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए अपेक्षाकृत छोटा बाजार है, लेकिन वहां विकास की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। उनके मुताबिक, मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने से इस बाजार में भारतीय कंपनियों के लिए नए रास्ते खुलेंगे।

    भारत का न्यूजीलैंड को इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्यात वर्ष 2024-25 में 12.98 करोड़ डॉलर था, जो 2025-26 में बढ़कर 14.05 करोड़ डॉलर हो गया। निर्यात में हुई इस बढ़ोतरी के बीच उद्योग को उम्मीद है कि व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच इंजीनियरिंग उत्पादों का कारोबार और मजबूत होगा। शुल्क संबंधी रियायतों और बेहतर व्यापारिक पहुंच से भारतीय निर्माताओं को न्यूजीलैंड में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति सुधारने का अवसर मिल सकता है।

    भारत से न्यूजीलैंड भेजे जाने वाले प्रमुख इंजीनियरिंग उत्पादों में ऑटोमोबाइल, डेयरी उद्योग में इस्तेमाल होने वाली औद्योगिक मशीनरी, चिकित्सा एवं वैज्ञानिक उपकरण, कार्यालय संबंधी उपकरण तथा लोहा और इस्पात उत्पाद शामिल हैं। इन क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों के लिए मांग बढ़ने की संभावनाएं हैं। समझौते के बाद निर्यातकों को अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने और न्यूजीलैंड के बाजार की जरूरतों के अनुरूप कारोबार का विस्तार करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    पंकज चड्ढा ने विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए इस समझौते को उपयोगी बताया। उनके अनुसार, मुक्त व्यापार समझौता छोटे और मध्यम स्तर के भारतीय इंजीनियरिंग निर्यातकों को अपने उत्पाद पोर्टफोलियो में विविधता लाने का अवसर देगा। इससे वे पारंपरिक बाजारों पर निर्भरता कम करने के साथ न्यूजीलैंड में अपनी व्यावसायिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में काम कर सकेंगे।

    उद्योग की अपेक्षा है कि आने वाले वर्षों में भारतीय कंपनियां न्यूजीलैंड में इंजीनियरिंग वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने के लिए नए ग्राहक तलाशेंगी और कारोबार के नए अवसरों का लाभ उठाएंगी। हालांकि, निर्यात में वास्तविक वृद्धि बाजार की मांग, कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और समझौते से मिलने वाले लाभों का उपयोग करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगी।

    इंजीनियरिंग निर्यात संवर्धन परिषद इंडिया के अनुमान के मुताबिक, अगले पांच वर्षों में न्यूजीलैंड को भारत का इंजीनियरिंग निर्यात बढ़कर 28 से 30 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। यह वर्ष 2025-26 के 14.05 करोड़ डॉलर के निर्यात की तुलना में लगभग दोगुना होगा। दोनों देशों के बीच इंजीनियरिंग व्यापार संबंध मजबूत होने से वर्ष 2030 तक भारत के 250 अरब डॉलर के इंजीनियरिंग निर्यात लक्ष्य को हासिल करने की व्यापक कोशिशों को भी बल मिलने की उम्मीद है।

  • भारत-न्यूजीलैंड एफटीए लागू, सभी भारतीय निर्यात पर शून्य शुल्क, 20 अरब डॉलर के निवेश से खुलेंगे नए अवसर

    भारत-न्यूजीलैंड एफटीए लागू, सभी भारतीय निर्यात पर शून्य शुल्क, 20 अरब डॉलर के निवेश से खुलेंगे नए अवसर


    नई दिल्ली । भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) लागू होने के साथ भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खुल गए हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को कहा कि इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड में भारतीय वस्तुओं को सभी टैरिफ श्रेणियों में शून्य शुल्क पर प्रवेश मिलेगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूती मिलने और निवेश गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    पीयूष गोयल के अनुसार, समझौते के लागू होने से न्यूजीलैंड जाने वाले सभी भारतीय निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क छूट का लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय उत्पाद अब न्यूजीलैंड के बाजार में बिना आयात शुल्क के प्रवेश कर सकेंगे। इससे वहां भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर होने और निर्यातकों को नए खरीदारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलने की संभावना है।

    मंत्री ने यह भी बताया कि समझौते के तहत न्यूजीलैंड भारत में 20 अरब डॉलर तक के निवेश को सुगम बनाएगा। इस निवेश से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने, रोजगार के नए अवसर तैयार करने और दोनों देशों के कारोबारी संबंधों को व्यापक बनाने की उम्मीद है। हालांकि, निवेश की वास्तविक मात्रा और उसके क्षेत्रवार वितरण का प्रभाव समझौते के क्रियान्वयन तथा निवेश संबंधी निर्णयों पर निर्भर करेगा।

    भारत ने इस समझौते में संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हितों की सुरक्षा पर भी जोर दिया है। गोयल ने स्पष्ट किया कि डेयरी, प्रमुख कृषि उत्पादों और पशु-आधारित उत्पादों जैसे क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है। उनके अनुसार, किसानों का कल्याण सरकार की प्राथमिकता है और व्यापार विस्तार के साथ घरेलू कृषि हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है।

    व्यापारी संगठनों ने भी समझौते का स्वागत किया है। अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ के महासचिव और चांदनी चौक से सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने इसे भारत की बढ़ती विनिर्माण क्षमता और वैश्विक बाजारों में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उनके अनुसार, यह समझौता ‘लोकल टू ग्लोबल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

    इस समझौते से वस्त्र एवं परिधान, चमड़ा और फुटवियर, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान, ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स, दवाइयों, रसायनों, कृषि उत्पादों तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों जैसे क्षेत्रों को निर्यात के नए अवसर मिलने की उम्मीद है। न्यूजीलैंड में शून्य शुल्क पर प्रवेश से भारतीय उत्पादों की कीमत संबंधी प्रतिस्पर्धा बेहतर हो सकती है। इसका लाभ विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), कारीगरों, निर्माताओं, किसानों, महिला उद्यमियों और निर्यातकों तक पहुंचने की संभावना है।

    समझौते के तहत निवेश को बढ़ावा देने के साथ भारतीय पेशेवरों और युवाओं के लिए भी नए अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई गई है। व्यापारिक गतिविधियों में विस्तार से विनिर्माण, सेवाओं और निर्यात से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, इसका वास्तविक असर आने वाले समय में व्यापार और निवेश के आंकड़ों से स्पष्ट होगा।

    भारत और न्यूजीलैंड ने वर्ष 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। उद्योग जगत को उम्मीद है कि शुल्क-मुक्त पहुंच और निवेश को प्रोत्साहन मिलने से इस लक्ष्य की दिशा में प्रगति तेज होगी। खंडेलवाल ने व्यापारियों, निर्माताओं और एमएसएमई से इस अवसर का लाभ उठाकर ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों की वैश्विक पहुंच बढ़ाने का आह्वान किया है।

  • दशहरे पर सोने की कीमतों में गिरावट, 24 कैरेट का भाव 1.48 लाख रुपये के करीब, जानें अपने शहर के रेट

    दशहरे पर सोने की कीमतों में गिरावट, 24 कैरेट का भाव 1.48 लाख रुपये के करीब, जानें अपने शहर के रेट

    नई दिल्ली । दशहरे के अवसर पर मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को देश के सर्राफा बाजार बंद हैं। ऐसे में सोने की खरीदारी करने वाले लोगों को पिछले कारोबारी सत्र के भाव और उपलब्ध शहरवार दरों के आधार पर कीमतों का अंदाजा लगाना होगा। सोने की कीमतों में हाल के दिनों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। घरेलू वायदा बाजार में गिरावट दर्ज की गई, जबकि दिल्ली के सर्राफा बाजार में पिछले कारोबारी दिन सोने की कीमतों में तेजी आई थी। अलग-अलग शहरों में 24, 22 और 18 कैरेट सोने के भाव में भी अंतर देखने को मिल रहा है।

    उपलब्ध दरों के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत दिल्ली और लखनऊ जैसे शहरों में 1,48,190 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है। मुंबई और कोलकाता में इसका भाव 1,48,040 रुपये प्रति 10 ग्राम है। इंदौर, भोपाल, पटना और अहमदाबाद में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,48,090 रुपये प्रति 10 ग्राम बताई गई है। ये दरें शहरवार उपलब्ध कीमतों पर आधारित हैं। स्थानीय दुकानों पर कर, मेकिंग चार्ज और अन्य शुल्क के कारण अंतिम कीमत अलग हो सकती है।

    22 कैरेट सोने की बात करें तो दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, जयपुर, चंडीगढ़ और कई अन्य शहरों में इसकी कीमत 1,35,850 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज की गई है। मुंबई, कोलकाता, पुणे और बेंगलुरु में 22 कैरेट सोने का भाव 1,35,700 रुपये प्रति 10 ग्राम है। वहीं, इंदौर, भोपाल, पटना और अहमदाबाद में इसकी कीमत 1,35,750 रुपये प्रति 10 ग्राम बताई गई है। आभूषण खरीदने वाले ग्राहकों के लिए 22 कैरेट सोना महत्वपूर्ण विकल्प होता है, क्योंकि इसका इस्तेमाल सामान्य तौर पर गहने बनाने में किया जाता है।

    18 कैरेट सोने की कीमत भी शहर के अनुसार अलग-अलग है। दिल्ली में इसका भाव 1,11,180 रुपये प्रति 10 ग्राम है, जबकि मुंबई और कोलकाता में यह 1,11,030 रुपये दर्ज किया गया है। इंदौर, भोपाल और पटना में 18 कैरेट सोने की कीमत 1,11,080 रुपये प्रति 10 ग्राम बताई गई है। चेन्नई में इसका भाव 1,11,550 रुपये प्रति 10 ग्राम है। खरीदारी से पहले स्थानीय सर्राफा कारोबारी से ताजा दर की पुष्टि करना जरूरी है।

    वायदा बाजार में पिछले कारोबारी सत्र के दौरान सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर सोने का भाव 618 रुपये यानी 0.42 प्रतिशत गिरकर करीब 1,47,300 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया। इससे पहले यह 1,47,918 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। हालांकि, पिछले सोमवार के कारोबार के अन्य आंकड़ों में दिसंबर आपूर्ति वाले सोने के वायदा अनुबंध में 436 रुपये की तेजी दर्ज की गई थी और इसका भाव 1,48,354 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया था। अलग-अलग समय के आंकड़ों में यह अंतर बाजार के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है।

    दिल्ली के सर्राफा बाजार में सोमवार को 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाले सोने की कीमत 400 रुपये बढ़कर 1,50,300 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई थी। इससे पहले इसका भाव 1,49,900 रुपये था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमतों में बदलाव दर्ज किया गया। उपलब्ध आंकड़ों में हाजिर सोने का भाव करीब 4,175.57 डॉलर प्रति औंस और एक अन्य कारोबारी अपडेट में 4,145 डॉलर प्रति औंस बताया गया।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, त्योहारी मौसम में खुदरा मांग बढ़ने से घरेलू सोने की कीमतों को समर्थन मिल सकता है। दिवाली और शादी-विवाह के मौसम में आभूषणों की खरीदारी बढ़ने की संभावना रहती है। हालांकि, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों से जुड़े फैसले, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी बॉण्ड प्रतिफल जैसे कारक अंतरराष्ट्रीय बाजार की दिशा प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए दशहरे के दिन खरीदारी की योजना बना रहे लोगों को बाजार खुलने पर ताजा भाव की जानकारी लेनी चाहिए।