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  • शेयर बाजार में भारी बिकवाली, सेंसेक्स 876 अंक टूटा और निफ्टी 23 हजार के स्तर से नीचे फिसला

    शेयर बाजार में भारी बिकवाली, सेंसेक्स 876 अंक टूटा और निफ्टी 23 हजार के स्तर से नीचे फिसला


    नई दिल्ली ।
    भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 19 अक्टूबर को भारी बिकवाली देखने को मिली। कमजोर वैश्विक संकेतों और प्रमुख क्षेत्रों के शेयरों में मुनाफावसूली के कारण सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 876.37 अंक यानी 1.17 प्रतिशत टूटकर 73,852.90 पर आ गया। वहीं, निफ्टी 257.20 अंक यानी 1.11 प्रतिशत गिरकर 22,888.95 के स्तर पर बंद हुआ। इस गिरावट के साथ निफ्टी 23,000 के मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण स्तर से नीचे चला गया।

    सोमवार के कारोबार में बाजार के ज्यादातर प्रमुख क्षेत्रों में कमजोरी रही। निजी बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, एफएमसीजी और आईटी शेयरों पर दबाव देखने को मिला। निवेशकों की बिकवाली का असर बड़े शेयरों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों के सूचकांकों पर भी पड़ा। बाजार में व्यापक गिरावट से संकेत मिला कि निवेशक वैश्विक परिस्थितियों और कंपनियों के तिमाही नतीजों को लेकर सतर्क बने हुए हैं।

    क्षेत्रीय सूचकांकों में निफ्टी प्राइवेट बैंक सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल रहा। यह 1.85 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ। निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में 1.58 प्रतिशत, निफ्टी एफएमसीजी में 1.44 प्रतिशत और निफ्टी आईटी में 1.28 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई। निफ्टी सर्विसेज 1.25 प्रतिशत, निफ्टी रियल्टी 1.20 प्रतिशत और निफ्टी कंजप्शन 1.05 प्रतिशत गिरकर बंद हुए। निफ्टी इंडिया डिफेंस में भी 0.94 प्रतिशत की गिरावट रही।

    बाजार की व्यापक कमजोरी के बीच निफ्टी पीएसयू बैंक एकमात्र ऐसा प्रमुख क्षेत्रीय सूचकांक रहा, जिसने तेजी दर्ज की। यह 2.46 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मार्जिन और एसेट क्वालिटी स्थिर रहने की उम्मीदों से समर्थन मिला। इसके विपरीत, निजी बैंकों में तिमाही नतीजों और मुनाफे के मार्जिन को लेकर चिंताओं के कारण दबाव बना रहा।

    बड़ी कंपनियों के अलावा मध्यम और छोटी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप 100 सूचकांक 641.80 अंक यानी 1.09 प्रतिशत टूटकर 58,487.95 पर बंद हुआ। निफ्टी स्मॉलकैप 100 सूचकांक में 194.05 अंक यानी 1.01 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 18,935.75 पर आ गया। इससे स्पष्ट हुआ कि बिकवाली का असर बाजार के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिला।

    सेंसेक्स में शामिल शेयरों में भारतीय स्टेट बैंक, अदाणी पोर्ट्स, एलएंडटी और इंडिगो बढ़त के साथ बंद हुए। दूसरी ओर, एक्सिस बैंक, अल्ट्राटेक सीमेंट, इन्फोसिस, बजाज फाइनेंस, ट्रेंट, एनटीपीसी और एचडीएफसी बैंक समेत कई प्रमुख शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। हिंदुस्तान यूनिलीवर, बजाज फिनसर्व, भारती एयरटेल, इटरनल, आईसीआईसीआई बैंक, टाटा स्टील, सन फार्मा, कोटक महिंद्रा बैंक, आईटीसी, टाइटन, टेक महिंद्रा, एमएंडएम और पावर ग्रिड भी गिरावट के साथ बंद हुए।

    वैश्विक बाजार की परिस्थितियों ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। अमेरिका की ओर से रूस से जुड़े प्रमुख प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आने की बात कही गई। इससे वैश्विक बाजार में रूसी ईंधन की आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद बनी। हालांकि, भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

    कुल मिलाकर, कमजोर वैश्विक संकेतों, निजी बैंकिंग और आईटी शेयरों में बिकवाली तथा तिमाही नतीजों को लेकर बनी चिंताओं के बीच बाजार दबाव में रहा। निफ्टी का 23,000 से नीचे बंद होना और मिडकैप-स्मॉलकैप में गिरावट निवेशकों की सतर्कता को दर्शाती है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था का जलवा… एक्सपर्ट का दावा- अमीर देशों की बराबरी पर पहुंच रही GDP ग्रोथ

    भारतीय अर्थव्यवस्था का जलवा… एक्सपर्ट का दावा- अमीर देशों की बराबरी पर पहुंच रही GDP ग्रोथ


    नई दिल्ली।
    भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) के लिए लगातार गुड न्यूज आ रही हैं. आईएमएफ (IMF) से लेकर वर्ल्ड बैंक *World Bank( तक ने Indian Economy का लोहा माना है. तमाम एजेंसियों ने भारत की जीडीपी ग्रोथ (GDP growth) के अनुमान को बढ़ाकर तमाम ग्लोबल चुनौतियों के बावजूद देश की बढ़ती रफ्तार पर अपनी मोहर लगाई है. अब कोरियाई अर्थशास्त्री (Korean Economist) ने एक और खुशखबरी देते हुए कहा है कि भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी अमीर देशों के बराबर पहुंच रही है. उन्होंने आंकड़ों के साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक के बाद एक कई पोस्ट के जरिए इसे समझाया है।


    जीवन स्तर में तेजी से हो रहा सुधार

    दक्षिण कोरियाई इकोनॉमिस्ट क्युंगहून किम (South Korean Economist Kyunghoon Kim) के अनुसार, भारत की आर्थिक प्रगति का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि देश आज कितना गरीब या अमीर है, बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि देश में जीवन स्तर कितनी तेजी से सुधर रहा है और यह कितनी तेजी से अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती प्रति व्यक्ति आय और गरीबी में आई भारी गिरावट सराहनीय है.

    कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी (KIIP) में भारत और दक्षिण एशिया टीम के प्रमुख क्युंगहून किम ने रविवार को कहा कि भारत की मध्यम अवधि की विकास संभावनाओं के बारे में उनके पहले के आकलन पर ऐसी टिप्पणियां आई थीं, जिनमें सुझाव दिया गया था कि भारत अभी भी गरीब है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब एक्स) पर एक लंबे-चौड़े पोस्ट में लिखा, ‘अधिक उपयोगी प्रश्न यह है कि क्या जीवन स्तर तेजी से बढ़ रहा है और क्या भारत इस मामले में आगे बढ़ रहा है?’


    ‘प्रति व्यक्ति GDP में तेज इजाफा’

    किम ने अपनी पोस्ट में आंकड़े शेयर करते हुए बताया है कि 2025 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,702 डॉलर थी, या क्रय शक्ति समता (PPP) के लिए समायोजित करने पर यह 11,784 डॉलर थी. ऐतिहासिक तुलनाओं के लिए, उन्होंने 2021 की स्थिर पीपीपी प्राइस पर प्रति व्यक्ति जीडीपी का उपयोग किया, जो 2025 में 10,039 डॉलर थी.

    किम ने बताया कि विश्व बैंक द्वारा भारत को 2007 तक निम्न-आय वाले देश के रूप में वर्गीकृत किया गया था. 1990 में, भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी निम्न-आय वाले देशों के औसत से केवल 15% अधिक थी. वहीं 2025 तक यह उस औसत से चार गुना से भी अधिक चुकी थी और मध्यम आय वाले देशों के औसत का 64% तक हो गई, जिसमें से अधिकांश वृद्धि पिछले सिर्फ एक दशक में हुई है. उन्होंने कहा कि भारत की तुलना मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं से करने पर भी सुधार स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, इस समूह में चीन और वियतनाम जैसे तेजी से बढ़ते देश शामिल हैं।


    ‘अमीर देशों के साथ अंतर कम कर रहा भारत’

    किम के मुताबिक, भारत अमीर देशों के साथ आय के अंतर को कम करने की दिशा में लगातार प्रयासरत है. उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारत की प्रगति धीमी, लेकिन लगातार हो रही है. 1990 में, भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी उच्च आय वाले देशों के औसत का मात्र 6% थी, 2025 तक, यह हिस्सा बढ़कर 17% हो गया था।

    हालांकि, अर्थशास्त्री ने इस सुधार के पीछे कई धनी देशों में धीमी आर्थिक ग्रोथ को भी कारण बताया. भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी भी वैश्विक औसत के लगभग आधे के करीब पहुंच रही है, जबकि 1990 में यह सिर्फ एक-पांचवें हिस्से के बराबर थी।


    भारत की तारीफ में ये बोले किम

    किम ने अपनी पोस्ट में लिखा, ‘कुल मिलाकर, भारत निम्न-आय वाले देशों से और आगे निकल रहा है, उच्च-आय वाले देशों के बराबर पहुंच रहा है और मध्यम-आय वाले औसत की ओर तेजी से प्रगति कर रहा है.’ उन्होंने इस धारणा को भी चुनौती दी कि विकासशील देश स्वतः ही धनी अर्थव्यवस्थाओं के बराबर पहुंच जाते हैं. उन्होंने कहा, ‘बराबरी होना स्वतः होने वाली बात नहीं है।

    अर्थशास्त्री के मुताबिक, गरीबी में रहने वाले भारतीयों की संख्या में 627 मिलियन की कमी आई है. भारत की आर्थिक प्रगति के सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक गरीबी में कमी आना रहा है. 4.40 डॉलर प्रति दिन की गरीबी रेखा पर, भारत की गरीबी दर 2004 में 73% से घटकर 2023 में सिर्फ 14% हो गई. किम ने कहा कि भारत की लगभग 1.4 अरब आबादी को देखते हुए ये सुधार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने आगे लिखा कि, ‘मेरा निष्कर्ष वही है, भारत के सामने भले कई चुनौतियां हैं, लेकिन इसकी आर्थिक ग्रोख, विशेष रूप से पिछले दशक में, और सकारात्मक मध्यम अवधि के विकास के दृष्टिकोण सराहनीय हैं. 1.4 अरब लोगों के देश के लिए यह प्रगति बेहद महत्वपूर्ण है।

  • Gold Price Today: 19 अक्टूबर को सोने के भाव में तेजी, दिल्ली, मुंबई, भोपाल और इंदौर समेत जानें 24K, 22K और 18K के ताजा रेट

    Gold Price Today: 19 अक्टूबर को सोने के भाव में तेजी, दिल्ली, मुंबई, भोपाल और इंदौर समेत जानें 24K, 22K और 18K के ताजा रेट


    नई दिल्ली ।
    19 अक्टूबर 2026 को सोने की कीमतों में तेजी देखने को मिली। दो दिन के अंतराल के बाद बाजार खुलते ही सोने के वायदा भाव में बढ़त दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में 24 कैरेट सोने का वायदा मूल्य 421 रुपये यानी 0.28 प्रतिशत बढ़कर 1,48,339 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया। पिछले कारोबारी सत्र में यह 1,47,918 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था।

    सोने की कीमतों में अलग-अलग बाजार दरों के अनुसार अंतर भी देखने को मिला। एक दर के मुताबिक 24 कैरेट सोने की कीमत 1,48,610 रुपये प्रति 10 ग्राम रही, जबकि दूसरी दर के अनुसार इसका भाव 1,47,810 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत 4,199.60 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई। ऐसे में सोना खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए अपने शहर का ताजा भाव जानना जरूरी है।

    देश के प्रमुख शहरों में सोने की कीमतें

    19 अक्टूबर को दिल्ली में 24 कैरेट सोने का भाव 1,47,810 रुपये, 22 कैरेट का 1,35,500 रुपये और 18 कैरेट का 1,10,890 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। मुंबई और कोलकाता में 24 कैरेट सोना 1,47,660 रुपये, 22 कैरेट 1,35,350 रुपये और 18 कैरेट 1,10,740 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया।

    पटना में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,47,710 रुपये, 22 कैरेट की 1,35,400 रुपये और 18 कैरेट की 1,10,790 रुपये प्रति 10 ग्राम रही। भोपाल, इंदौर, अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत में भी यही दरें दर्ज की गईं। वहीं, लखनऊ, मेरठ, अयोध्या, कानपुर, आगरा, वाराणसी, प्रयागराज, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, जयपुर और चंडीगढ़ में 24 कैरेट सोने का भाव 1,47,810 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा।

    चेन्नई में 24 कैरेट सोना 1,47,660 रुपये और 22 कैरेट सोना 1,35,350 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। यहां 18 कैरेट सोने की कीमत 1,11,250 रुपये रही। पुणे, नागपुर, बेंगलुरु, हैदराबाद और भुवनेश्वर सहित कई अन्य शहरों में 24 कैरेट सोने का भाव 1,47,660 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। नासिक और वसई-विरार में 24 कैरेट सोने की कीमत 1,47,690 रुपये दर्ज की गई।

    पिछले कारोबारी सत्र में सोने का हाल
    पिछले कारोबारी सत्र में दिल्ली के सर्राफा बाजार में सोने की कीमतें स्थिर रही थीं। 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाले सोने का भाव सभी करों सहित 1,49,900 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बना रहा। हालांकि, सप्ताह के दौरान कीमतों में कुल 4,500 रुपये यानी लगभग तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 0.30 प्रतिशत बढ़कर 4,183.34 डॉलर प्रति औंस पहुंच गया था।

    वायदा बाजार में दिसंबर में आपूर्ति वाले सोने के अनुबंध की कीमत 876 रुपये यानी 0.59 प्रतिशत बढ़कर 1,48,365 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूयॉर्क में सोने का भाव 4,171.84 डॉलर प्रति औंस दर्ज किया गया था। मजबूत हाजिर मांग और कारोबारियों की नई खरीदारी से वायदा कीमतों को सहारा मिला।

    रुपये की मजबूती का सोने पर असर
    भारतीय रुपये की मजबूती भी घरेलू सोने की कीमतों को प्रभावित कर रही है। पिछले कारोबारी सत्र में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया सात पैसे मजबूत होकर 94.92 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। रुपये में लगातार छठे कारोबारी सत्र में मजबूती दर्ज की गई।

    भारत अपनी सोने की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में रुपये की मजबूती से आयात लागत कम हो सकती है और घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में तेजी सीमित रह सकती है। बाजार के जानकारों के अनुसार, सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट के बाद कुछ सुधार देखने को मिला है। सोना 1.49 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर से नीचे आने के बाद नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर रहा है।

    आने वाले समय में सोने का कारोबार सीमित दायरे में रहने के साथ हल्की तेजी दिखा सकता है। बाजार की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों का असर भी महत्वपूर्ण रह सकता है। हालांकि, सोने के भाव में शहर, शुद्धता और स्थानीय बाजार के अनुसार अंतर हो सकता है। खरीदारी से पहले संबंधित शहर के ताजा भाव और आभूषणों पर लागू अतिरिक्त शुल्क की जानकारी लेना उपयोगी रहेगा।

  • भारत की आर्थिक प्रगति जश्न के काबिल, अगले वर्षों में भी सात प्रतिशत से अधिक विकास की उम्मीद

    भारत की आर्थिक प्रगति जश्न के काबिल, अगले वर्षों में भी सात प्रतिशत से अधिक विकास की उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत की आर्थिक प्रगति को पिछले एक दशक की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए शीर्ष अर्थशास्त्री क्युंघून किम ने कहा है कि देश की लगातार मजबूत आर्थिक वृद्धि और बेहतर होती आर्थिक स्थिति भविष्य के लिए आशावाद का आधार प्रदान करती है। उनके अनुसार, भारत के सामने अभी कई चुनौतियां हैं, लेकिन इसके बावजूद देश ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने कहा कि मध्यम अवधि में भी भारत के मजबूत विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं और यह उपलब्धि सराहना के साथ जश्न मनाने योग्य है।

    क्युंघून किम ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने विचारों में कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति को उसके आकार और आबादी के संदर्भ में समझना जरूरी है। करीब 1.4 अरब लोगों वाले देश के लिए लगातार मजबूत विकास दर हासिल करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक रूप से आगे बढ़ने की क्षमता और आने वाले वर्षों में विकास की संभावनाएं सकारात्मक बनी हुई हैं।

    उनकी यह टिप्पणी भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर वैश्विक संस्थानों के बदले आकलन के बीच आई है। एक दिन पहले उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक जैसे प्रमुख वैश्विक संस्थानों ने चालू वर्ष और अगले वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमानों को बढ़ाकर सात प्रतिशत से अधिक कर दिया है। उनके अनुसार, विभिन्न संस्थानों के अनुमानों में हुआ यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और विकास की संभावनाओं को दर्शाता है।

    किम ने कोविड-19 महामारी के बाद भारत की आर्थिक स्थिति में आए सुधार का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, महामारी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में 5.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि, इसके बाद अर्थव्यवस्था ने तेजी से वापसी की और वर्ष 2021 में 9.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। इसके बाद अगले चार वर्षों तक विकास दर सात प्रतिशत से ऊपर बनी रही। इस प्रदर्शन को उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।

    अर्थशास्त्री ने कहा कि लगातार बेहतर होते आर्थिक आंकड़ों के कारण उन्हें और कई अन्य अर्थशास्त्रियों को अपनी विकास दर संबंधी भविष्यवाणियों में बार-बार संशोधन करना पड़ा। हर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े उम्मीदों से बेहतर रहे। इसके परिणामस्वरूप भारत ने लगातार पांच वर्षों तक सात प्रतिशत से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर्ज की। उनके मुताबिक, यह प्रदर्शन वर्ष 2003 से 2007 के उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ था।

    किम ने वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर 7.83 प्रतिशत रहने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1960 के बाद किसी भी पांच वर्षीय अवधि में यह दूसरी सबसे ऊंची औसत वृद्धि दर है। इससे अधिक औसत वृद्धि केवल वर्ष 2003 से 2007 के दौरान दर्ज की गई थी, जब यह आंकड़ा 7.89 प्रतिशत रहा था। इस तुलना के जरिए उन्होंने भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि के महत्व को रेखांकित किया।

    भारत की अर्थव्यवस्था के आकार में आए बदलाव को भी किम ने अहम बताया। उनके अनुसार, वर्ष 2007 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार एक ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा अधिक था, जबकि अब यह चार ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच रही है। इसका अर्थ है कि आज समान विकास दर से होने वाला आर्थिक विस्तार दो दशक पहले की तुलना में कहीं बड़े पैमाने पर मूल्य सृजन करता है। किम ने कहा कि भारत की पिछले दशक की प्रगति और मध्यम अवधि में मजबूत विकास की संभावनाएं महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि देश के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों से बाजारों का कारोबार प्रभावित, त्योहारों की बिक्री पर संकट; व्यापारियों ने अमित शाह को लिखा पत्र

    दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों से बाजारों का कारोबार प्रभावित, त्योहारों की बिक्री पर संकट; व्यापारियों ने अमित शाह को लिखा पत्र

    नई दिल्ली । दिल्ली में जारी विरोध प्रदर्शनों का असर राजधानी के बाजारों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने की चिंता बढ़ गई है। व्यापारियों का कहना है कि प्रदर्शन के कारण कई इलाकों में दुकानों को बंद रखना पड़ रहा है और बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है। इसका असर ऐसे समय में दिखाई दे रहा है, जब दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहारों के कारण कारोबार में तेजी आने की उम्मीद रहती है। इस स्थिति को लेकर विभिन्न व्यापारी संगठनों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर अपनी समस्याएं बताई हैं और बाजारों में सामान्य गतिविधियां बनाए रखने की मांग की है।

    राजधानी में केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं। व्यापारियों के अनुसार, इन प्रदर्शनों के कारण कई बाजारों में लोग खरीदारी के लिए आने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि जब सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं और लोगों को आवाजाही में परेशानी या असुरक्षा की आशंका रहती है, तो बाजारों में ग्राहकों की संख्या घट जाती है। इससे दुकानदारों की बिक्री प्रभावित होती है और त्योहारों के दौरान होने वाली कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

    दिल्ली इलेक्ट्रिकल ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय शर्मा ने कहा कि दशहरा और दिवाली का समय बिजली की सजावटी लाइटों, झूमरों और घरों को सजाने वाले सामान के कारोबार के लिए महत्वपूर्ण होता है। इन त्योहारों के दौरान लोग घरों और प्रतिष्ठानों की सजावट के लिए बड़ी संख्या में सामान खरीदते हैं। ऐसे में बाजारों में मांग बढ़ने से व्यापारियों को साल के इस हिस्से में बेहतर कारोबार की उम्मीद रहती है। हालांकि, मौजूदा प्रदर्शनों के कारण उन्हें बिक्री प्रभावित होने की चिंता सता रही है।

    अजय शर्मा ने सरकार और प्रदर्शन कर रहे लोगों से अपील की कि फिलहाल विरोध प्रदर्शनों को टालने पर विचार किया जाए, ताकि व्यापारिक गतिविधियां बाधित न हों। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनों के कारण लोग सड़कों पर निकलने से डर रहे हैं। उनके मुताबिक, अपनी मांगों और मुद्दों को लेकर बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहिए, जिससे विरोध भी दर्ज हो सके और आम लोगों तथा कारोबारियों को परेशानी का सामना न करना पड़े।

    व्यापारी संगठनों ने यह भी चिंता जताई है कि कारोबार में गिरावट का असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहेगा। बाजारों में बिक्री कम होने पर सरकार को मिलने वाले कर राजस्व पर भी प्रभाव पड़ सकता है। व्यापारियों का तर्क है कि त्योहारों के दौरान खरीदारी में कमी आने से व्यापारिक गतिविधियां कमजोर हो सकती हैं, जिसका असर संबंधित कारोबार और उससे जुड़े लोगों की आय पर पड़ेगा।

    फोटो मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय कुमार सेठी ने कहा कि देश में त्योहारों का कारोबारी मौसम 15 अगस्त के बाद शुरू हो जाता है। रक्षाबंधन से लेकर दिवाली के बाद तक बाजारों में आम तौर पर खरीदारी और बिक्री का स्तर बेहतर रहता है। उन्होंने बताया कि व्यापारियों की सालभर की कमाई का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा इन चार महीनों में आता है। ऐसे में इस अवधि के दौरान कारोबार प्रभावित होने से उनकी आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    सेठी ने प्रदर्शनों के तरीके पर भी सवाल उठाए और इन गतिविधियों को अराजकता बताते हुए आरोप लगाया कि इनके जरिए देश की स्थिरता को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क पर भी भारत के लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने की मंशा रखने का आरोप लगाया और अपनी बात रखते हुए नेपाल तथा श्रीलंका में हुए घटनाक्रमों से तुलना की। ये आरोप उनके निजी बयान के रूप में सामने आए हैं।

    सेठी ने सरकार से मांग की कि मध्य दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक इलाकों में प्रदर्शनों की अनुमति देने के मामले में विशेष ध्यान रखा जाए। व्यापारियों का कहना है कि विरोध और अपनी मांगें रखने के अधिकार के साथ बाजारों की सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना भी जरूरी है। उनका आग्रह है कि ऐसी व्यवस्था हो, जिससे त्योहारों के दौरान ग्राहक बाजारों तक पहुंच सकें और व्यापारियों को लगातार कारोबार प्रभावित होने की स्थिति का सामना न करना पड़े।

  • त्योहारों से पहले चीनी की बिक्री बढ़ाने की छूट, भारत की जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान

    त्योहारों से पहले चीनी की बिक्री बढ़ाने की छूट, भारत की जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन में बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने चीनी मिलों को अतिरिक्त बिक्री की अनुमति दी है। इस फैसले के तहत मिलें अक्टूबर 2026 में उत्पादित चीनी को अक्टूबर और नवंबर, दोनों महीनों में बेच सकेंगी। यह बिक्री उनके नियमित मासिक कोटे के अतिरिक्त होगी। सरकार के इस कदम का उद्देश्य त्योहारों के दौरान बाजार में आपूर्ति को सुचारू बनाए रखना और मांग के अनुरूप चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

    खाद्य मंत्रालय ने चीनी मिलों को जारी निर्देश में अक्टूबर में उत्पादित चीनी की दोनों महीनों में बिक्री की अनुमति दी है। सामान्य मासिक आवंटन के अलावा अतिरिक्त मात्रा बेचने की छूट से बाजार में आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। त्योहारों के दौरान चीनी की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। हालांकि, इस अतिरिक्त बिक्री की अनुमति से बाजार में कीमतों पर कितना असर पड़ेगा, इसकी जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।

    इस बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को लेकर भी सकारात्मक अनुमान सामने आया है। डेलॉयट इंडिया के आकलन के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.1 से 7.3 प्रतिशत के बीच रह सकती है। इस अनुमान के पीछे निजी निवेश में सुधार को एक प्रमुख कारण बताया गया है। निजी क्षेत्र की ओर से निवेश बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों और बाजार की मांग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है।

    आकलन के मुताबिक, अगले वित्त वर्ष 2027-28 में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मजबूत रह सकती है, हालांकि इसके कुछ धीमी रहने का अनुमान है। इस अवधि में जीडीपी वृद्धि दर 6.6 से 7 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना जताई गई है। यह अनुमान दर्शाता है कि आने वाले वित्त वर्षों में भी आर्थिक विस्तार जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन विकास की वास्तविक गति कई घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

    आर्थिक विकास के सामने कुछ जोखिम भी बताए गए हैं। इनमें भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आने वाली बाधाएं शामिल हैं। ऊर्जा की कीमतों में तेजी से उत्पादन और परिवहन की लागत प्रभावित हो सकती है। वहीं, वैश्विक व्यापार में रुकावटों का असर वस्तुओं की आपूर्ति और कारोबारी गतिविधियों पर पड़ सकता है। इन परिस्थितियों के कारण आर्थिक विकास के अनुमान में बदलाव की संभावना बनी रहती है।

    इसी बीच, केंद्र सरकार ने वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो यानी एफएसआईबी का नए सिरे से गठन किया है। पूर्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के सचिव एससीएल दास को ब्यूरो का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनका कार्यकाल अधिसूचना जारी होने की तारीख से तीन साल का होगा। एफएसआईबी सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में शीर्ष पदों पर नियुक्तियों के लिए सिफारिशें करता है। इस संस्था की भूमिका वित्तीय क्षेत्र में वरिष्ठ पदों पर चयन प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

    नए अध्यक्ष के साथ ब्यूरो में छह सदस्य भी शामिल किए गए हैं। इनमें भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक अरिजीत बसु, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व निदेशक सतीश काशीनाथ मराठे और पूर्व कार्यकारी निदेशक रमनाथन सुब्रमणियन शामिल हैं। इनके अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम के पूर्व प्रमुख सिद्धार्थ मोहंती, न्यू इंडिया एश्योरेंस की पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक नीरजा कपूर और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण की पूर्व सदस्य टीएल अलामेलु को भी सदस्य बनाया गया है।

    इस प्रकार, त्योहारी मांग को ध्यान में रखते हुए चीनी की अतिरिक्त बिक्री की अनुमति, आर्थिक विकास के अनुमान और वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो के नए गठन से जुड़े फैसले एक साथ सामने आए हैं। चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उठाया गया कदम निकट अवधि की बाजार मांग से जुड़ा है, जबकि जीडीपी वृद्धि के अनुमान और एफएसआईबी में नियुक्तियां अर्थव्यवस्था तथा वित्तीय संस्थानों से संबंधित व्यापक घटनाक्रम हैं।

  • रेलवे टिकट पर सिर्फ 45 पैसे में 10 लाख का बीमा, जानिए किन यात्रियों को मिलेगा फायदा और कब लागू होंगे नए नियम

    रेलवे टिकट पर सिर्फ 45 पैसे में 10 लाख का बीमा, जानिए किन यात्रियों को मिलेगा फायदा और कब लागू होंगे नए नियम

    नई दिल्ली ।भारतीय रेलवे में सफर करने वाले यात्रियों के लिए यात्रा बीमा से जुड़ा महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। अब तक ऑनलाइन आरक्षित टिकट बुक करने वाले यात्रियों को मामूली प्रीमियम पर यात्रा बीमा लेने का विकल्प मिलता था, लेकिन रेलवे के आरक्षण काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्री इस सुविधा से बाहर थे। अब इस अंतर को खत्म करने की तैयारी की जा रही है। दिए गए विवरण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद रेलवे को 27 अक्टूबर 2026 से काउंटर से आरक्षित टिकट लेने वाले यात्रियों को भी इस सुविधा के दायरे में लाने के लिए व्यवस्था करने को कहा गया है।

    मौजूदा ऑनलाइन रेलवे यात्रा बीमा योजना की खास बात इसका कम प्रीमियम है। टिकट बुक करते समय यात्री केवल 45 पैसे देकर 10 लाख रुपये तक का बीमा कवर प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, यह सुविधा टिकट बुकिंग के दौरान उपलब्ध बीमा विकल्प और संबंधित शर्तों के अनुसार मिलती है। काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्रियों के लिए प्रीमियम, बीमा चुनने की प्रक्रिया और दावा करने के विस्तृत नियमों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने आना जरूरी है। इसलिए फिलहाल यह मानना सही नहीं होगा कि प्रत्येक काउंटर टिकट पर बीमा अपने आप लागू हो चुका है।

    यात्रा बीमा का उद्देश्य ट्रेन दुर्घटना की स्थिति में यात्रियों या उनके परिवारों को आर्थिक सहायता देना है। दुर्घटना में यात्री की मृत्यु होने या स्थायी रूप से पूरी तरह दिव्यांग होने पर मौजूदा योजना के तहत 10 लाख रुपये तक का बीमा कवर दिया जा सकता है। यह राशि दुर्घटना के परिणाम और बीमा पॉलिसी में निर्धारित शर्तों के आधार पर मिलती है।

    स्थायी आंशिक दिव्यांगता की स्थिति में 7.5 लाख रुपये तक के बीमा कवर का प्रावधान है। वहीं, गंभीर रूप से घायल होने पर दो लाख रुपये और मामूली चोट लगने की स्थिति में 10,000 रुपये तक की सहायता मिल सकती है। हालांकि, इन सभी मामलों में वास्तविक भुगतान पॉलिसी की शर्तों, चोट की प्रकृति और संबंधित पात्रता पर निर्भर करेगा। इसलिए यात्रियों को बीमा को हर प्रकार की दुर्घटना या परेशानी के लिए मिलने वाला सामान्य मुआवजा नहीं समझना चाहिए।

    काउंटर टिकट लेने वाले यात्रियों को भी बीमा सुविधा के दायरे में लाने का मुख्य उद्देश्य टिकट खरीदने के माध्यम के आधार पर होने वाले अंतर को समाप्त करना है। देश में बड़ी संख्या में यात्री अब भी रेलवे स्टेशन के आरक्षण काउंटर से टिकट लेते हैं। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी, बुजुर्ग और ऐसे लोग शामिल हैं जो ऑनलाइन टिकट बुकिंग की सुविधा का नियमित इस्तेमाल नहीं करते। नई व्यवस्था लागू होने पर इन यात्रियों को भी निर्धारित शर्तों के अनुसार यात्रा बीमा लेने का अवसर मिल सकेगा।
    इस बदलाव को लागू करने के लिए रेलवे को अपने यात्री आरक्षण सिस्टम यानी पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम में जरूरी तकनीकी और प्रक्रियागत संशोधन करने होंगे। काउंटर पर टिकट खरीदने के दौरान बीमा का विकल्प कैसे उपलब्ध कराया जाएगा, यात्रियों की सहमति किस तरह दर्ज होगी और पॉलिसी की जानकारी कैसे दी जाएगी, इन पहलुओं पर स्पष्ट व्यवस्था जरूरी होगी।

    यात्रियों के लिए यह समझना भी जरूरी है कि बीमा का लाभ लेने के लिए बुकिंग के समय नियमों और शर्तों की जानकारी रखना आवश्यक है। ऑनलाइन टिकट लेते समय बीमा का विकल्प चुनने के बाद पॉलिसी से संबंधित संदेश और दस्तावेज संभालकर रखने चाहिए। जहां लागू हो, वहां नामांकित व्यक्ति यानी नॉमिनी का विवरण भी सही भरना चाहिए। दुर्घटना की स्थिति में दावा करते समय ये जानकारियां उपयोगी हो सकती हैं।

    काउंटर से आरक्षित टिकट खरीदने वाले यात्रियों को नई व्यवस्था लागू होने के बाद रेलवे की आधिकारिक सूचना और बीमा पॉलिसी की शर्तें जांचनी चाहिए। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बीमा लिया गया है या नहीं और उसका प्रमाण उपलब्ध है। केवल टिकट खरीद लेने से बीमा कवर मिलना जरूरी नहीं है, क्योंकि इसका लाभ संबंधित नियमों और प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

  • अगले हफ्ते शेयर बाजार की दिशा तय करेंगे तिमाही नतीजे, विदेशी निवेश और कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव

    अगले हफ्ते शेयर बाजार की दिशा तय करेंगे तिमाही नतीजे, विदेशी निवेश और कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला सप्ताह कई अहम संकेत लेकर आने वाला है। सितंबर तिमाही के वित्तीय नतीजे, विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतें बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पिछले सप्ताह प्रमुख सूचकांकों में अच्छी बढ़त दर्ज की गई थी। अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि यह तेजी आगे भी जारी रहती है या बाजार में एक बार फिर दबाव देखने को मिलता है।

    बीते सप्ताह निफ्टी 50 में 2.77 प्रतिशत और सेंसेक्स में 3.11 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के शेयरों में नई खरीदारी, वैश्विक बॉन्ड यील्ड के दबाव में कमी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की लगातार खरीदारी ने बाजार को समर्थन दिया। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन भी दोनों प्रमुख सूचकांकों में लगातार दूसरे सत्र में तेजी रही। इससे हालिया गिरावट के बाद बाजार में आई रिकवरी को मजबूती मिली।

    शुक्रवार को सेंसेक्स 413.66 अंक यानी 0.56 प्रतिशत की बढ़त के साथ 74,729.27 पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी 50 में 148.80 अंक यानी 0.65 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह 23,146.15 के स्तर पर बंद हुआ। पूरे सप्ताह के दौरान सेंसेक्स में 2,256.94 अंक और निफ्टी में 625.7 अंक की बढ़त रही। अब बाजार की नजर इस तेजी के आगे बने रहने की संभावनाओं पर है।

    अगले सप्ताह सितंबर तिमाही के नतीजे निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक होंगे। बाजार यह आकलन करेगा कि हालिया तेजी केवल आईटी शेयरों तक सीमित रहती है या बैंकिंग, उपभोक्ता और औद्योगिक क्षेत्रों में भी खरीदारी का रुझान दिखाई देता है। कंपनियों के राजस्व, मुनाफे, मार्जिन और मांग की स्थिति से जुड़े आंकड़ों पर खास ध्यान दिया जाएगा।

    कंपनियों के प्रबंधन की टिप्पणियां और आने वाली तिमाहियों के लिए जारी किया जाने वाला कारोबारी मार्गदर्शन भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है। बेहतर नतीजे और सकारात्मक भविष्य के संकेत शेयरों में खरीदारी बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत, कमजोर वित्तीय प्रदर्शन या कारोबार को लेकर सतर्क अनुमान निवेशकों को सावधानी बरतने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई का रुख भी बाजार के लिए अहम रहेगा। विदेशी निवेशकों की बिकवाली में कुछ कमी आने से बाजार को राहत मिली है, लेकिन आगे उनकी गतिविधियों पर नजर बनी रहेगी। यदि विदेशी निवेशकों की ओर से बिकवाली दोबारा बढ़ती है, तो प्रमुख सूचकांकों पर दबाव आ सकता है। दूसरी ओर, घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई की लगातार खरीदारी बाजार को सहारा दे सकती है।

    वैश्विक बॉन्ड यील्ड में होने वाला बदलाव भी शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत होगा। बॉन्ड यील्ड बढ़ने से शेयरों का मूल्यांकन प्रभावित हो सकता है, क्योंकि निवेशकों के लिए निश्चित आय वाले विकल्प अधिक आकर्षक हो सकते हैं। इसके विपरीत, बॉन्ड यील्ड में नरमी आने पर जोखिम वाले निवेश विकल्पों में रुचि बढ़ने की संभावना रहती है। मौद्रिक नीति को लेकर बदलती उम्मीदें भी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं।

    कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी बाजार की चाल को प्रभावित करेंगे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव पड़ सकता है। इससे कंपनियों की लागत और लाभ मार्जिन पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। वहीं, वैश्विक तनाव बढ़ने से वित्तीय बाजारों में अस्थिरता आ सकती है।

    कुल मिलाकर, अगले सप्ताह शेयर बाजार में कंपनियों के नतीजों और घरेलू-वैश्विक आर्थिक संकेतों के बीच निवेशकों की गतिविधियां महत्वपूर्ण रहेंगी। बीते सप्ताह की तेजी के बाद बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है, यह काफी हद तक इन कारकों से मिलने वाले संकेतों पर निर्भर करेगा।

  • वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध, व्यापारिक तनाव और बढ़ते कर्ज का खतरा, आईएमएफ ने आर्थिक स्थिरता को लेकर दी चेतावनी

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध, व्यापारिक तनाव और बढ़ते कर्ज का खतरा, आईएमएफ ने आर्थिक स्थिरता को लेकर दी चेतावनी

    नई दिल्ली । वैश्विक अर्थव्यवस्था ने हाल के आर्थिक झटकों का अनुमान से बेहतर सामना किया है, लेकिन आगे भी यही स्थिति बनी रहेगी, इसकी गारंटी नहीं है। युद्ध, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावट, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और भारी सार्वजनिक कर्ज वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की नीति-निर्धारक समिति ने इन चुनौतियों को लेकर चेतावनी देते हुए कहा है कि सरकारों को आने वाले समय में कई मोर्चों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

    बैंकॉक में आयोजित अपनी 54वीं बैठक के बाद शनिवार को जारी बयान में इंटरनेशनल मॉनेटरी एंड फाइनेंशियल कमिटी (आईएमएफसी) ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का मौजूदा प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है, लेकिन इसे स्थायी स्थिति मानना उचित नहीं होगा। समिति के मुताबिक, विभिन्न देशों की सरकारें एक साथ भू-राजनीतिक और वित्तीय चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है।

    समिति की अध्यक्षता सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान ने की। बयान में कहा गया कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों के कारण भारी मानवीय और आर्थिक नुकसान हो रहा है। इन परिस्थितियों का सबसे अधिक असर गरीब और कमजोर देशों पर पड़ रहा है। युद्धों के कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान पैदा हो सकता है, जिससे वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित होने के साथ उनकी कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

    भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई गई है। इसका असर ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति पर पड़ सकता है। समिति ने चेताया कि यदि ये बाधाएं बढ़ती हैं, तो पहले से मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे देशों में ऊर्जा और खाद्य असुरक्षा की समस्या गंभीर हो सकती है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार नीतियों और लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों के आर्थिक प्रभावों को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है।

    वित्तीय क्षेत्र में समिति ने सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले रिटर्न यानी सॉवरेन बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, सार्वजनिक कर्ज के भारी स्तर और पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की जरूरत को प्रमुख जोखिम बताया। इन परिस्थितियों में उन देशों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जिन्हें अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए लगातार उधार लेना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों तक सीमित पहुंच रखने वाली अर्थव्यवस्थाओं पर इसका दबाव अधिक पड़ सकता है।

    समिति ने उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों के बढ़ते आर्थिक प्रभावों पर भी चर्चा की। उसके अनुसार, तेजी से हो रही तकनीकी प्रगति निवेश और व्यापार को बढ़ावा देने के साथ उत्पादकता में सुधार कर सकती है। हालांकि, इन तकनीकों के आर्थिक और वित्तीय नतीजों को लेकर बनी अनिश्चितता मौजूदा कमजोरियों को बढ़ा सकती है। इसलिए तकनीकी बदलावों से मिलने वाले अवसरों के साथ उनसे जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए आईएमएफसी ने मजबूत व्यापक आर्थिक नीतियों, विश्वसनीय राजकोषीय ढांचे और सरकारों के बीच निरंतर सहयोग पर जोर दिया। समिति ने देशों से अपनी वित्तीय कमजोरियों को दूर करने, कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी निवेश जारी रखने का आग्रह किया। उसने यह भी कहा कि महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित रखने और आर्थिक नीतियों पर भरोसा बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।

    बयान में बैंकॉक ब्लूप्रिंट का स्वागत किया गया, जिसका उद्देश्य डिजिटल वित्तीय सेवाओं को अधिक सुरक्षित बनाना, साइबर सुरक्षा मजबूत करना और डिजिटल धोखाधड़ी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है। समिति ने वैश्विक आर्थिक असंतुलन, व्यापारिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को प्रभावित करने वाली विसंगतियों को दूर करने के लिए भी आपसी सहयोग की आवश्यकता बताई।

    इसके अलावा, सुरक्षित और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए आवागमन की स्वतंत्रता बनाए रखने पर जोर दिया गया। समिति ने संप्रभु ऋण पुनर्गठन की प्रक्रिया में सुधार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। विशेष रूप से कम आय वाले और कमजोर मध्यम आय वाले देशों के लिए कर्ज पुनर्गठन को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई। इसके तहत कर्ज लेने वालों और कर्ज देने वालों से अधिक पारदर्शिता बरतने तथा ऋण पुनर्गठन की व्यवस्थाओं को अधिक स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य बनाने का आह्वान किया गया।

  • सोने की कीमत में 3,004 रुपये और चांदी में 10,191 रुपये की गिरावट, जानें अब 10 ग्राम गोल्ड और किलो सिल्वर के भाव

    सोने की कीमत में 3,004 रुपये और चांदी में 10,191 रुपये की गिरावट, जानें अब 10 ग्राम गोल्ड और किलो सिल्वर के भाव


    नई दिल्ली ।
    सोने और चांदी की कीमतों में इस सप्ताह बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। दोनों कीमती धातुओं के भाव में कमी आने से खरीदारों और निवेशकों का ध्यान बाजार के नए रुख पर है। सप्ताह के दौरान सोने की कीमत 3,000 रुपये से अधिक और चांदी का भाव 10,000 रुपये से ज्यादा नीचे आया। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम घटकर 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गया, जबकि चांदी की कीमत कम होकर 2,10,918 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों धातुओं के भाव दबाव में रहे।

    बुलियन बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत इस सप्ताह 3,004 रुपये घट गई। सप्ताह की शुरुआत में इसका भाव 1,49,430 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो गिरकर 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया। इस बदलाव के साथ सोने की कीमत में उल्लेखनीय साप्ताहिक कमी दर्ज की गई है।

    अन्य शुद्धता वाले सोने के भाव में भी गिरावट देखने को मिली। 22 कैरेट सोने की कीमत पहले 1,36,878 रुपये प्रति 10 ग्राम थी, जो घटकर 1,34,126 रुपये रह गई। इसी तरह 18 कैरेट सोने का भाव 1,12,073 रुपये से कम होकर 1,09,820 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। इस तरह अलग-अलग श्रेणियों में सोने की कीमतों में कमी दर्ज की गई है।

    सप्ताह के दौरान 24 कैरेट सोने का सबसे ऊंचा भाव 12 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 1,48,425 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया था। वहीं, सबसे कम भाव 15 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 1,45,564 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। इन आंकड़ों से पता चलता है कि सप्ताह के भीतर सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहा और कुल मिलाकर भाव नीचे आए।

    चांदी की कीमत में भी सोने के मुकाबले बड़ी रकम की गिरावट दर्ज की गई। सप्ताह के दौरान चांदी 10,191 रुपये प्रति किलोग्राम सस्ती हुई। इसका भाव पहले 2,21,109 रुपये प्रति किलो था, जो घटकर 2,10,918 रुपये प्रति किलो रह गया। चांदी का उच्चतम भाव 12 अक्टूबर को सुबह के सत्र में 2,20,874 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया था। इसके बाद कीमत में गिरावट आई और 15 अक्टूबर को सुबह के सत्र में भाव घटकर 2,07,098 रुपये प्रति किलो के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया।

    सोने और चांदी की कीमतें जारी करने वाली व्यवस्था के तहत दिन में दो बार, सुबह और शाम के सत्र में भाव घोषित किए जाते हैं। इससे बाजार में कीमतों के बदलाव पर नजर रखने में मदद मिलती है। हालांकि, ग्राहकों को ध्यान रखना चाहिए कि आभूषण खरीदते समय अंतिम कीमत में शुद्धता, स्थानीय बाजार के भाव, मेकिंग चार्ज और लागू करों के कारण अंतर हो सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,186 डॉलर प्रति औंस और चांदी लगभग 57 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर कारोबार कर रही थी। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण डॉलर मजबूत होने से कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ा है। इसके अलावा, महंगाई बढ़ने की आशंका से ब्याज दरों में इजाफे की संभावना भी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर रही है।

    ब्याज दरें बढ़ने की आशंका के बीच कुछ निवेशक सोने और चांदी में बिकवाली कर रहे हैं। इससे दोनों धातुओं की कीमतों में गिरावट को बल मिला है। आने वाले दिनों में इनके भाव पर डॉलर की चाल, कच्चे तेल की कीमतों और ब्याज दरों से जुड़े संकेतों का असर बना रह सकता है।