Category: Economy

  • चुनौतियों के बीच मजबूत हुई अदाणी समूह की वित्तीय स्थिति, ब्रोकरेज ने पोर्ट्स और पावर शेयरों पर बढ़ाया भरोसा

    चुनौतियों के बीच मजबूत हुई अदाणी समूह की वित्तीय स्थिति, ब्रोकरेज ने पोर्ट्स और पावर शेयरों पर बढ़ाया भरोसा

    नई दिल्ली ।वैश्विक ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने अदाणी समूह को लेकर अपना सकारात्मक रुख बरकरार रखा है। ब्रोकरेज ने अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन और अदाणी पावर को अपनी प्रमुख निवेश पसंद में शामिल किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में नियामकीय और बाजार से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद समूह की परियोजनाओं को पूरा करने और कारोबार का विस्तार करने की क्षमता मजबूत बनी हुई है।

    बर्नस्टीन ने अदाणी समूह से जुड़े प्रमुख घटनाक्रमों के दौरान कंपनी के प्रदर्शन का आकलन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनौतियों के बावजूद समूह की परिचालन क्षमता पर बड़ा असर नहीं पड़ा और विभिन्न क्षेत्रों में परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की गति बनी रही।

    ब्रोकरेज के आकलन में समूह की वित्तीय स्थिति में भी सुधार का उल्लेख किया गया है। शेयरों को गिरवी रखने की प्रवृत्ति लगभग समाप्त होने और कर्ज के स्तर में कमी को वित्तीय मजबूती के सकारात्मक संकेत के रूप में देखा गया है। इससे समूह की बैलेंस शीट को पहले की तुलना में बेहतर स्थिति मिलने की बात कही गई है।

    अदाणी पोर्ट्स को लेकर बर्नस्टीन ने आउटपरफॉर्म रेटिंग कायम रखी है। ब्रोकरेज ने कंपनी का लक्ष्य मूल्य बढ़ाकर 1,973 रुपये प्रति शेयर कर दिया है, जो पहले 1,880 रुपये था। अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह कारोबार में मजबूत वृद्धि को देखते हुए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कार्गो वॉल्यूम वृद्धि का अनुमान भी बढ़ाया गया है।

    कंपनी के जुलाई कारोबार में 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होने का उल्लेख किया गया है, जबकि पहले वृद्धि का अनुमान 10 प्रतिशत रखा गया था। इसके साथ ही अदाणी पोर्ट्स के लक्षित ईवी से ईबीआईटीडीए अनुपात को भी 16 गुना से बढ़ाकर 16.5 गुना किया गया है।

    बर्नस्टीन के अनुसार, अदाणी पोर्ट्स की प्रमुख ताकतों में मूल्य निर्धारण क्षमता, लॉजिस्टिक्स कारोबार का विस्तार और प्रतिस्पर्धियों की तुलना में आकर्षक मूल्यांकन शामिल हैं। कंपनी द्वारा परिसंपत्तियों का अधिग्रहण कर उन्हें विकसित करने की क्षमता को भी सकारात्मक पहलू माना गया है।

    अदाणी पावर पर भी ब्रोकरेज ने आउटपरफॉर्म रेटिंग बनाए रखी है। कंपनी के लिए लक्ष्य मूल्य 203.56 रुपये से बढ़ाकर 220 रुपये प्रति शेयर किया गया है। अनुमान के अनुसार आने वाले वर्षों में कंपनी का परिचालन लाभ मजबूत रह सकता है।

    रिपोर्ट में वर्ष 2027 के लिए अदाणी पावर का ईबीआईटीडीए 2,41,272 मिलियन रुपये और वर्ष 2028 के लिए 3,02,594 मिलियन रुपये रहने का अनुमान जताया गया है। इससे कंपनी की भविष्य की परिचालन क्षमता को लेकर सकारात्मक धारणा का संकेत मिलता है।

    हालांकि, अदाणी ग्रीन एनर्जी को लेकर बर्नस्टीन का रुख अलग है। ब्रोकरेज ने कंपनी पर अंडरपरफॉर्म रेटिंग बरकरार रखी है और लक्ष्य मूल्य 1,000 रुपये से घटाकर 980 रुपये प्रति शेयर कर दिया है।

    ब्रोकरेज के अनुसार, अदाणी ग्रीन का मौजूदा मूल्यांकन अपेक्षाकृत ऊंचा है, जिससे निकट अवधि में शेयर में तेजी की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं। कंपनी से जुड़े संशोधित अनुमानों में वित्त वर्ष 2027 के ईबीआईटीडीए अनुमान में 10 प्रतिशत की कमी का भी उल्लेख किया गया है।

    कुल मिलाकर, बर्नस्टीन ने अदाणी समूह की वित्तीय और परिचालन स्थिति में सुधार को रेखांकित किया है। घटते कर्ज, बेहतर नकदी प्रवाह और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में समूह की व्यापक मौजूदगी को दीर्घकालिक विकास के लिए सकारात्मक माना गया है। हालांकि, समूह की सभी कंपनियों को लेकर ब्रोकरेज का नजरिया समान नहीं है और अदाणी ग्रीन एनर्जी पर उसने सावधानी बरतने की सलाह दी है।

  • भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को तेज गिरावट, सेंसेक्स 493 अंक टूटा और निफ्टी 24155 के करीब बंद हुआ

    भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को तेज गिरावट, सेंसेक्स 493 अंक टूटा और निफ्टी 24155 के करीब बंद हुआ

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार मंगलवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 492.70 अंक यानी 0.63 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 77,235.46 के स्तर पर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी 132.75 अंक यानी 0.55 प्रतिशत गिरकर 24,154.90 पर पहुंच गया। बाजार में शुरुआती कारोबार से ही दबाव दिखाई दिया और दिन बढ़ने के साथ प्रमुख सूचकांकों की कमजोरी बनी रही।

    बाजार की गिरावट में आईटी क्षेत्र की कंपनियों का प्रदर्शन प्रमुख कारणों में रहा। निफ्टी आईटी इंडेक्स 1.93 प्रतिशत की गिरावट के साथ दिन का सबसे कमजोर प्रमुख क्षेत्रीय सूचकांक रहा। इसके अलावा निफ्टी रियल्टी में 1.42 प्रतिशत, पीएसयू बैंक में 1.01 प्रतिशत और एफएमसीजी इंडेक्स में 0.77 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    निफ्टी सर्विसेज इंडेक्स 0.68 प्रतिशत कमजोर रहा, जबकि मेटल इंडेक्स में 0.61 प्रतिशत की गिरावट आई। कंजप्शन इंडेक्स 0.50 प्रतिशत और इंफ्रास्ट्रक्चर इंडेक्स 0.42 प्रतिशत नीचे बंद हुए। इन क्षेत्रों में बिकवाली ने बाजार की व्यापक कमजोरी को बढ़ाने का काम किया।

    हालांकि कुछ क्षेत्रों में खरीदारी देखने को मिली। निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स 1.29 प्रतिशत की बढ़त के साथ प्रमुख लाभार्थियों में रहा। मीडिया इंडेक्स में 0.40 प्रतिशत, ऑटो में 0.30 प्रतिशत, हेल्थकेयर में 0.21 प्रतिशत और ऑयल एंड गैस इंडेक्स में 0.20 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई।

    बड़े शेयरों के साथ मिडकैप कंपनियों पर भी दबाव रहा। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 277.60 अंक यानी 0.44 प्रतिशत गिरकर 63,539.40 पर बंद हुआ। दूसरी ओर निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स लगभग सपाट रहा और 19,808.85 के स्तर पर कारोबार समाप्त किया। इससे संकेत मिला कि व्यापक बाजार में गिरावट एक समान नहीं रही और कुछ हिस्सों में निवेशकों ने मजबूती बनाए रखी।

    सेंसेक्स के प्रमुख शेयरों में एक्सिस बैंक, पावर ग्रिड, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, एलएंडटी, बजाज फिनसर्व और एनटीपीसी बढ़त के साथ बंद हुए। दूसरी तरफ एशियन पेंट्स, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, भारती एयरटेल, टीसीएस, हिंदुस्तान यूनिलीवर और अल्ट्राटेक सीमेंट समेत कई बड़े शेयरों में गिरावट रही।

    बाजार के प्रदर्शन पर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का भी प्रभाव रहा। कच्चे तेल की कीमतों में मजबूती ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई। ऊंची तेल कीमतों से भारत जैसे तेल आयातक देश की कंपनियों की लागत और व्यापक आर्थिक परिस्थितियों पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसके साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और कमजोर वैश्विक संकेतों ने भी बाजार के sentiment पर दबाव बनाया।

    अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम के समाप्त होने के बाद मध्य पूर्व में तनाव को लेकर चिंता बढ़ी है। इससे निवेशकों के बीच मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर सावधानी बढ़ी। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि से उभरते बाजारों में विदेशी निवेश के आकर्षण पर भी असर पड़ सकता है।

    आईटी शेयरों पर विशेष दबाव की वजह वैश्विक स्तर पर तकनीकी खर्च को लेकर बनी चिंताएं रहीं। ऊंची ब्याज दरों के लंबे समय तक बने रहने की आशंका से कंपनियों के प्रौद्योगिकी खर्च में कमी आने की संभावना को लेकर निवेशक सतर्क रहे।

    घरेलू अर्थव्यवस्था के बुनियादी संकेतकों को अपेक्षाकृत मजबूत माना जा रहा है, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमत और बढ़ती इनपुट लागत कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल सकती है। ऐसे माहौल में निवेशकों की नजर आने वाले कारोबारी सत्रों में वैश्विक संकेतों, तेल कीमतों और ब्याज दरों से जुड़े घटनाक्रम पर बनी रहने की संभावना है।

  • केंद्र का बड़ा फोकस, औद्योगिक कॉरिडोरों में मंजूरी के बाद समयबद्ध निर्माण, निवेश और उत्पादन शुरू कराने की रणनीति तेज

    केंद्र का बड़ा फोकस, औद्योगिक कॉरिडोरों में मंजूरी के बाद समयबद्ध निर्माण, निवेश और उत्पादन शुरू कराने की रणनीति तेज

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर अपनी प्राथमिकता में बदलाव करते हुए अब केवल मंजूरी देने के बजाय उन्हें समय पर पूरा कराने, निवेश आकर्षित करने और उत्पादन शुरू कराने पर जोर दिया है। सरकार का मानना है कि किसी परियोजना की वास्तविक सफलता उसकी घोषणा या स्वीकृति से नहीं, बल्कि जमीन पर उसके क्रियान्वयन और आर्थिक गतिविधियों में बदलने से तय होती है।

    राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास एवं कार्यान्वयन न्यास की शीर्ष निगरानी प्राधिकरण की तीसरी बैठक में औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं की प्रगति और उनसे जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में राज्यों से भूमि उपलब्धता, परिवहन संपर्क, बिजली और पानी जैसी सुविधाओं, वैधानिक मंजूरियों तथा परियोजना विशेष प्रयोजन इकाइयों से जुड़ी बाधाओं को तेजी से दूर करने पर जोर दिया गया।

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन आवंटन, सड़क और परिवहन संपर्क, आवश्यक उपयोगिताओं तथा नियामकीय मंजूरियों से जुड़ी अड़चनों का प्राथमिकता के आधार पर समाधान होना चाहिए। उन्होंने पीएम गतिशक्ति के माध्यम से समेकित योजना बनाने और निवेशकों के लिए अनुकूल भूमि आवंटन व्यवस्था को लगातार मजबूत करने की आवश्यकता बताई।

    सरकार की योजना औद्योगिक विकास को केवल फैक्टरियों और उत्पादन इकाइयों तक सीमित रखने की नहीं है। औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों के लिए आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं, कौशल विकास, सार्वजनिक परिवहन और अन्य जरूरी सामाजिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है। इससे उद्योगों के आसपास एक ऐसा समग्र इकोसिस्टम विकसित करने की कोशिश है, जिसमें कर्मचारियों और कंपनियों दोनों की जरूरतें पूरी हो सकें।

    केंद्र सरकार सार्वजनिक पूंजीगत व्यय, राज्यों को सहायता और विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए बेहतर ऋण सुविधा के माध्यम से घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रही है। कर और सीमा शुल्क से जुड़े उपायों के जरिए देश में विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं।

    वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने औद्योगिक परियोजनाओं को पीएम गतिशक्ति के साथ जोड़कर समेकित क्षेत्रीय विकास मॉडल के तहत आगे बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने निवेशकों तक पहुंच बढ़ाने और औद्योगिक नोड्स की प्रभावी मार्केटिंग पर जोर दिया। उनका कहना है कि वैश्विक निवेश के अवसरों को आकर्षित करने के लिए परियोजनाओं को निवेशकों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तैयार करना जरूरी है।

    मुक्त व्यापार समझौतों से मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए देश और क्षेत्र विशेष के औद्योगिक एन्क्लेव विकसित करने की योजना पर भी चर्चा हुई। इसके तहत प्लग एंड प्ले इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लैटेड फैक्ट्री, श्रमिक आवास और आर्थिक-सामाजिक सुविधाओं से युक्त तैयार औद्योगिक व्यवस्था विकसित करने पर बल दिया गया।

    पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने औद्योगिक कॉरिडोरों को राष्ट्रीय जलमार्गों से जोड़ने का सुझाव दिया। उनका कहना है कि जलमार्गों को औद्योगिक विकास की रीढ़ के रूप में विकसित करने से लॉजिस्टिक्स लागत कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों में भी बेहतर कनेक्टिविटी, उपलब्ध भूमि और स्थानीय संसाधनों के आधार पर औद्योगिक गतिविधियां बढ़ाने पर जोर दिया।

    नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने परियोजना एसपीवी को अधिक अधिकार देने की आवश्यकता बताई। उनका कहना है कि योजना निर्माण, विकास और नगर प्रशासन से जुड़े पर्याप्त अधिकार मिलने से औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं को तेजी से जमीन पर उतारा जा सकेगा। सरकार का नया फोकस स्पष्ट रूप से मंजूरी से आगे बढ़कर परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और उन्हें वास्तविक आर्थिक गतिविधि में बदलने पर केंद्रित है।

  • दक्षिण कोरिया में जनरेटिव एआई का रोजगार पर असर, युवाओं की 2.85 लाख नौकरियां घटीं, वरिष्ठ कर्मचारियों को मिला फायदा

    दक्षिण कोरिया में जनरेटिव एआई का रोजगार पर असर, युवाओं की 2.85 लाख नौकरियां घटीं, वरिष्ठ कर्मचारियों को मिला फायदा


    नई दिल्ली ।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल का असर अब रोजगार बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। दक्षिण कोरिया के केंद्रीय बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जनरेटिव एआई तकनीकों के तेजी से विस्तार के बाद एआई से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं के रोजगार में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि तकनीकी बदलाव का असर अलग-अलग आयु वर्ग के कर्मचारियों पर समान नहीं रहा है।

    जून 2022 से जून 2026 के बीच दक्षिण कोरिया में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लोगों द्वारा किए जा रहे कुल रोजगारों की संख्या में 2.85 लाख की कमी दर्ज की गई। इस गिरावट का सबसे बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों से जुड़ा रहा जिन्हें एआई के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता है। कुल कम हुए रोजगारों में करीब 2.68 लाख यानी लगभग 94 प्रतिशत नौकरियां एआई प्रभावित क्षेत्रों से संबंधित थीं।

    इन क्षेत्रों में आईटी सेवाएं, प्रकाशन, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और प्रोफेशनल सर्विसेज प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों में ऐसे काम बड़ी संख्या में शामिल हैं जिन्हें जनरेटिव एआई, ऑटोमेशन और डिजिटल टूल्स के जरिए तेजी से बदला या आसान किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, आईटी सेवाओं में युवाओं का रोजगार 31.4 प्रतिशत घटा। यह उन क्षेत्रों में सबसे बड़ी गिरावट रही, जहां एआई आधारित तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।

    प्रकाशन क्षेत्र में भी युवा रोजगार में 27.4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस श्रेणी में सॉफ्टवेयर और वेब डिजाइन से जुड़े पेशे भी शामिल हैं। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग क्षेत्र में युवाओं के रोजगार में 16.6 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि प्रोफेशनल सर्विसेज में यह कमी 11.6 प्रतिशत रही। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि एआई का शुरुआती प्रभाव उन नौकरियों पर अधिक पड़ सकता है जिनमें डिजिटल, दोहराए जाने वाले या सामग्री आधारित कार्य बड़ी भूमिका निभाते हैं।

    इसके विपरीत 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के कर्मचारियों के रोजगार में इसी अवधि के दौरान 2.30 लाख की बढ़ोतरी हुई। खास बात यह रही कि इनमें से 1.73 लाख रोजगार एआई प्रभावित क्षेत्रों में ही बढ़े। इससे यह संकेत मिलता है कि अनुभव, विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र की गहरी समझ वाले कर्मचारियों की मांग कई जगहों पर अभी भी मजबूत बनी हुई है।

    रिपोर्ट में 2022 को आधार वर्ष माना गया है। इसी वर्ष के अंत में चैटजीपीटी के लॉन्च के बाद जनरेटिव एआई तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ा। इसके बाद कंपनियों में कंटेंट तैयार करने, कोडिंग, डेटा विश्लेषण और अन्य डिजिटल कार्यों के लिए एआई आधारित उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे कंपनियों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ कुछ पारंपरिक भूमिकाओं की जरूरत पर भी असर पड़ा है।

    शिक्षा के आधार पर रोजगार की स्थिति में भी बदलाव सामने आया है। 2019 से 2022 के बीच स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रीधारकों की औसत बेरोजगारी दर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि माध्यमिक या जूनियर कॉलेज स्तर तक पढ़े युवाओं में यह 8 प्रतिशत थी। 2022 के बाद उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर 7 प्रतिशत रही, जबकि कम शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं में यह 5.4 प्रतिशत दर्ज की गई।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण कोरिया की लगातार घटती आबादी युवाओं के रोजगार में बदलाव का एक कारण हो सकती है। हालांकि एआई ने इस बदलाव को और तेज किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार एआई युवा कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ा सकता है, लेकिन यही तकनीक कुछ भूमिकाओं में उनके काम को प्रतिस्थापित भी कर सकती है। इसलिए चुनौती केवल नौकरियां घटने की नहीं, बल्कि युवाओं के लिए पारंपरिक करियर की शुरुआती सीढ़ियों के कमजोर होने की भी है।

  • सोना 1.54 लाख रुपये के पार, चांदी 2.35 लाख पर पहुंची, घरेलू बाजार में कीमती धातुओं की कीमतों में तेज उछा

    सोना 1.54 लाख रुपये के पार, चांदी 2.35 लाख पर पहुंची, घरेलू बाजार में कीमती धातुओं की कीमतों में तेज उछा

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को मजबूत तेजी दर्ज की गई। घरेलू सराफा बाजार में दोनों कीमती धातुओं के भाव में करीब 1,800 रुपये तक की बढ़ोतरी हुई। इस तेजी के बाद 24 कैरेट सोने की कीमत 1.54 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के पार पहुंच गई, जबकि चांदी का भाव भी 2.35 लाख रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर चला गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों धातुओं की कीमतों में बढ़त रही, जिसका असर घरेलू बाजार पर दिखाई दिया।

    घरेलू बाजार में 24 कैरेट सोने का भाव 1,804 रुपये बढ़कर 1,54,167 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया। इससे पहले सोना 1,52,363 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था। एक ही कारोबारी सत्र में इतनी बढ़ोतरी से सोने की कीमत ने फिर ऊंचे स्तर की ओर रुख किया है। निवेशकों के साथ आभूषण बाजार की नजर भी अब आगे की कीमतों पर बनी हुई है।

    22 कैरेट सोने की कीमत में भी तेजी रही। इसका भाव 1,652 रुपये बढ़कर 1,41,217 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया, जबकि इससे पहले कीमत 1,39,565 रुपये थी। इसी तरह 18 कैरेट सोना 1,353 रुपये महंगा होकर 1,15,625 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। पिछले कारोबारी स्तर पर इसकी कीमत 1,14,272 रुपये थी।

    चांदी ने भी सोमवार के कारोबार में मजबूती दिखाई। इसकी कीमत 1,800 रुपये बढ़कर 2,35,642 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। इससे पहले चांदी 2,33,842 रुपये प्रति किलोग्राम पर थी। चांदी में यह तेजी ऐसे समय में आई है, जब औद्योगिक मांग और निवेश से जुड़े कारकों के कारण वैश्विक बाजार में भी इस धातु की कीमतों पर लगातार नजर बनी हुई है।

    हाजिर बाजार के अलावा वायदा कारोबार में भी सोने और चांदी की कीमतों में तेजी रही। एमसीएक्स पर 5 अक्टूबर 2026 के सोने के अनुबंध में 1,419 रुपये यानी 0.92 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई और भाव 1,55,925 रुपये प्रति 10 ग्राम पहुंच गया। इससे घरेलू वायदा बाजार में भी खरीदारी का रुख मजबूत रहने का संकेत मिला।

    चांदी के वायदा अनुबंध में भी बढ़त दर्ज की गई। 4 सितंबर 2026 का अनुबंध 2,419 रुपये यानी 1.03 प्रतिशत की तेजी के साथ 2,38,343 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। हाजिर और वायदा दोनों बाजारों में एक साथ तेजी से कीमती धातुओं के कारोबार में मजबूती का संकेत मिला है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई। कॉमेक्स पर सोना 0.83 प्रतिशत बढ़कर 4,474 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। वहीं चांदी में 2.05 प्रतिशत की तेजी रही और इसका भाव 66.43 डॉलर प्रति औंस दर्ज किया गया। वैश्विक बाजार की यह मजबूती घरेलू कीमतों को भी समर्थन देती दिखाई दी।

    बाजार विशेषज्ञों की नजर अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक के मिनट्स पर है। निवेशकों को उम्मीद है कि इससे ब्याज दरों की आगे की दिशा और मौद्रिक नीति को लेकर संकेत मिल सकते हैं। ब्याज दरों से जुड़े संकेत वैश्विक स्तर पर सोने की मांग और कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार, फेड के रुख और निवेशकों की गतिविधियां सोने तथा चांदी की अगली चाल के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी।

  • LPG उत्पादन बढ़ाने के सख्त निर्देश… त्योहारी सीजन में नहीं होगी सिलेंडर की किल्लत

    LPG उत्पादन बढ़ाने के सख्त निर्देश… त्योहारी सीजन में नहीं होगी सिलेंडर की किल्लत


    नई दिल्ली।
    मोदी सरकार (Modi government) किसी भी कीमत पर एलपीजी (LPG) की किल्लत नहीं होने देना चाहती। आने वाले त्योहारी और शादियों के सीजन (Festive and Wedding season) से पहले सरकारी और प्राइवेट 21 कंपनियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के सख्त आदेश दिए गए हैं। क्योंकि, होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर अनिश्चितता आयात पर खतरा पैदा कर रही है।


    सरकार का 13 अगस्त का निर्देश क्या कहता है

    13 अगस्त की सरकारी सूचना के अनुसार, निजी और सरकारी रिफाइनरियों, साथ ही तेल और गैस उत्पादक कंपनियों को एलपीजी उत्पादन अधिकतम करने के लिए “सभी तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव कदम” उठाने का आदेश दिया गया है। इसमें नेफ्था को एलपीजी में बदलने जैसे वैकल्पिक तरीकों को अपनाने की भी बात कही गई है।


    त्योहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए बढ़ाया गया उत्पादन

    युद्ध से पहले घरेलू रिफाइनरियां रोजाना लगभग 36,000 टन एलपीजी का उत्पादन करती थीं। पारंपरिक त्योहारी सीजन सितंबर से शुरू होकर नवंबर में दिवाली के दौरान चरम पर होता है। इस दौरान बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उन्होंने पहले ही उत्पादन बढ़ाकर 54,000 टन प्रतिदिन कर दिया है।


    कंपनियों को मिला नया लक्ष्य और जिम्मेदारी

    सरकार चाहती है कि उद्योग निर्धारित समय-सीमा के भीतर 63,810 टन प्रतिदिन उत्पादन करने में सक्षम हो जाए। सूचना में सभी रिफाइनरियों के लिए अलग-अलग लक्ष्य तय किए गए हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज की घरेलू बाजार पर केंद्रित इकाई को सबसे बड़ा लक्ष्य (18,000 टन प्रतिदिन) दिया गया है, जबकि उसकी निर्यात-केंद्रित स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) रिफाइनरी को इससे छूट दी गई है।

    सरकारी कंपनियों ओएनजीसी, ऑयल इंडिया और राष्ट्रीय गैस पाइपलाइन कंपनी गेल को भी कुल राष्ट्रीय लक्ष्य का लगभग दसवां हिस्सा पूरा करने को कहा गया है।


    आयात पर निर्भरता और खाड़ी संकट

    भारत अपनी एलपीजी खपत का लगभग दो-तिहाई (66%) हिस्सा आयात करता है। इसमें से करीब 90% सप्लाई फारस की खाड़ी के रास्ते से होकर आती है। मिडिल ईस्ट में युद्ध शुरू होने के बाद जब सप्लाई बाधित हुई, तो भारत में LPG की भारी कमी हो गई थी। इस संकट के दौरान हफ्तों तक लोगों को बायोमास और मिट्टी के तेल (केरोसिन) जैसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले विकल्पों का सहारा लेना पड़ा था।


    वैकल्पिक सप्लाई की चुनौती

    रेटिंग एजेंसी ICRA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ ने कहा, “लंबे समय तक चले इस युद्ध के कारण सरकार घरेलू एलपीजी उत्पादन को अधिकतम करना चाहती है।” उन्होंने बताया कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से वैकल्पिक आपूर्ति लाने में बहुत अधिक समय लगता है, जिससे लागत बढ़ जाती है और इन सप्लाई के लिए महीनों पहले ही इंतजाम करने पड़ते हैं।

  • गरीब की थाली पर महंगाई की मार…. 4% तक बढ़े गेहूं के दाम…. आटा-रोटी पर असर

    गरीब की थाली पर महंगाई की मार…. 4% तक बढ़े गेहूं के दाम…. आटा-रोटी पर असर


    नई दिल्ली।
    महंगाई (Inflation) की मार अब खाने की थाली (Food plate) तक और बढ़ सकती है। वैश्विक बाजार (Global market) में गेहूं की कीमतों (Wheat prices) में तेजी का असर घरेलू बाजार (Domestic Market) में भी दिखाई देने लगा है। फिलहाल गेहूं की कीमत करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के आसपास है, जो 24 जुलाई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। पिछले एक महीने में देश की प्रमुख मंडियों में गेहूं के भाव 3.85 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। अगर यह तेजी आगे भी बनी रहती है तो आटा, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।


    काला सागर का तनाव गेहूं के लिए इतना अहम क्यों है?

    गेहूं की कीमतों में तेजी के पीछे काला सागर क्षेत्र में बढ़ता तनाव बड़ी वजह बन रहा है। रूस और यूक्रेन दुनिया के गेहूं निर्यात में बड़ा हिस्सा रखते हैं। रूस की ओर से यूक्रेन के साथ काला सागर में संभावित युद्धविराम के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद वहां तनाव बना हुआ है। हमलों से समुद्री रास्तों पर शिपिंग प्रभावित हो रही है और निर्यात घटने की चिंता बढ़ी है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की आपूर्ति को लेकर आशंका पैदा हुई है।


    घरेलू मंडियों में कितनी बढ़ी गेहूं की कीमत?

    इस वैश्विक चिंता का असर भारतीय मंडियों में भी दिख रहा है। 17 जुलाई से 17 अगस्त के बीच राजकोट में गेहूं का भाव 2,600 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। दिल्ली में यह 2,782.50 रुपये से बढ़कर 2,870 रुपये, कानपुर में 2,620 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये और कोटा में 2,657.50 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। इंदौर में भी भाव 2,695 रुपये से बढ़कर 2,708.75 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। यानी कई प्रमुख मंडियों में एक महीने के भीतर कीमतें बढ़ी हैं।


    क्या आगे भी बढ़ सकती हैं गेहूं की कीमतें?

    गेहूं की कीमतों का आगे का रुख काला सागर क्षेत्र के हालात और मौसम पर निर्भर करेगा। अगर वहां तनाव और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आयातक देशों के बाजारों पर पड़ सकता है। भारत में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का घरेलू बाजार पर असर पड़ता है। ऐसे में फिलहाल गेहूं के ऊंचे भाव चिंता का विषय बने हुए हैं। कीमतों में और तेजी आई तो इसका असर आटे और गेहूं से जुड़े दूसरे उत्पादों पर भी पड़ सकता है।


    गेहूं के साथ प्याज ने भी क्यों बढ़ाई रसोई की चिंता?

    महंगाई का दबाव केवल गेहूं तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत से खरीफ प्याज की आवक में देरी के बीच थोक मंडी में प्याज का भाव बढ़कर 32 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है। 17 अगस्त 2026 को प्याज का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य 37.20 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक महीने पहले यह 34.53 रुपये और एक साल पहले 26.86 रुपये प्रति किलो था। सरकार की ओर से न्यूनतम खरीद मूल्य में सात बार बढ़ोतरी के बावजूद प्याज की खरीद दो लाख टन के लक्ष्य से करीब 25 फीसदी कम रहने का अनुमान है। यानी गेहूं और प्याज दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी ने घरेलू रसोई के बजट को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

  • Gen Z में बढ़ा Buy Now Pay Later का चलन, शौक और लाइफस्टाइल के लिए बढ़ती उधारी बना रही आर्थिक दबाव का नया कारण

    Gen Z में बढ़ा Buy Now Pay Later का चलन, शौक और लाइफस्टाइल के लिए बढ़ती उधारी बना रही आर्थिक दबाव का नया कारण

    नई दिल्ली । बदलती डिजिटल लाइफस्टाइल के साथ युवाओं के खर्च करने और भुगतान करने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। खासकर Gen Z के बीच Buy Now Pay Later यानी अभी खरीदें और बाद में भुगतान करें जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। महंगे मोबाइल फोन, ब्रांडेड कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, यात्रा, खान-पान और मनोरंजन जैसी जरूरतों या इच्छाओं को पूरा करने के लिए अब हमेशा खाते में पर्याप्त रकम होने का इंतजार नहीं किया जाता। आसान किस्त और तत्काल क्रेडिट की सुविधा ने खरीदारी को पहले की तुलना में काफी सरल बना दिया है।

    पहले कर्ज को मुख्य रूप से घर खरीदने, शिक्षा, कारोबार या किसी बड़ी आपात जरूरत से जोड़कर देखा जाता था। अब डिजिटल भुगतान व्यवस्था और ऑनलाइन शॉपिंग के विस्तार के साथ छोटे और रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी क्रेडिट का इस्तेमाल बढ़ा है। क्रेडिट कार्ड, Buy Now Pay Later और छोटे व्यक्तिगत ऋण युवाओं को तत्काल खर्च करने की सुविधा देते हैं। खरीदारी के समय पूरी रकम चुकाने के बजाय कम मासिक किस्त दिखाई देती है, जिससे महंगा सामान भी आसानी से खरीदने योग्य नजर आने लगता है।

    क्रेडिट व्यवहार से जुड़े आंकड़ों और विश्लेषणों से यह संकेत मिलता है कि अलग-अलग पीढ़ियों में पहली बार उधार लेने की उम्र कम हुई है। युवा वर्ग कम उम्र में ही क्रेडिट सिस्टम से जुड़ रहा है। इसका एक बड़ा कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुछ ही चरणों में उपलब्ध होने वाली ऋण और किस्त की सुविधा है। कई बार खरीदारी करते समय ही ग्राहक को EMI या Pay Later का विकल्प मिल जाता है। इससे खरीदारी का फैसला बचत और आय के आधार पर करने के बजाय तत्काल उपलब्ध किस्त के आधार पर होने लगता है।

    इस बदलाव का सबसे बड़ा जोखिम तब सामने आता है, जब एक व्यक्ति एक साथ कई क्रेडिट सुविधाओं का इस्तेमाल करने लगता है। उदाहरण के लिए किसी युवा की मासिक आय 40 हजार रुपये है और वह मोबाइल, कपड़े, यात्रा तथा अन्य खर्चों के लिए अलग-अलग किस्त ले लेता है। प्रत्येक खरीदारी की EMI अकेले देखने पर छोटी लग सकती है, लेकिन महीने के अंत में सभी किस्तों का कुल भुगतान काफी बड़ा हो सकता है। इसके बाद जरूरी घरेलू खर्चों और बचत के लिए उपलब्ध रकम कम हो जाती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार क्रेडिट सुविधा अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन इसे अतिरिक्त आय समझना वित्तीय गलती हो सकती है। किसी बैंक या वित्तीय संस्था की ओर से दी गई क्रेडिट लिमिट का अर्थ यह नहीं है कि उतनी पूरी राशि खर्च करना सुरक्षित है। खर्च करने से पहले अपनी आय, मौजूदा कर्ज, मासिक किस्तों और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    समय पर भुगतान नहीं होने की स्थिति में ब्याज, लेट फीस और अन्य शुल्क आर्थिक बोझ बढ़ा सकते हैं। लगातार भुगतान में देरी से क्रेडिट रिकॉर्ड पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए युवाओं के लिए जरूरी है कि केवल कम EMI देखकर खरीदारी का फैसला न करें। कुल भुगतान राशि, ब्याज, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्कों को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    बढ़ती डिजिटल क्रेडिट सुविधाओं के बीच वित्तीय अनुशासन ही सबसे बड़ा बचाव है। शौक और लाइफस्टाइल को पूरा करने के लिए लिया गया छोटा कर्ज अगर लगातार बढ़ता जाए तो वह भविष्य की बचत और आर्थिक स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है। जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझकर खर्च करना तथा आय के अनुरूप ही उधारी लेना युवाओं को इस बढ़ते कर्ज के दबाव से बचा सकता है।

  • शेयर बाजार में कमाई का मौका या मंडरा रहा बड़ा जोखिम? निवेश से पहले समझें मार्केट के ये संकेत

    शेयर बाजार में कमाई का मौका या मंडरा रहा बड़ा जोखिम? निवेश से पहले समझें मार्केट के ये संकेत


    नई दिल्ली । शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए हर कारोबारी दिन नई उम्मीद और नई चुनौती लेकर आता है। बाजार की चाल कई घरेलू और वैश्विक संकेतों से प्रभावित होती है। ऐसे में किसी एक अनुमान के आधार पर यहShare Market Today, Stock Market, Nifty Sensex, Stock Market News, Investment Tips तय करना मुश्किल होता है कि बाजार निश्चित रूप से तेजी में जाएगा या गिरावट का सामना करेगा। निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे बाजार की दिशा समझने के साथ जोखिम का भी ध्यान रखें और जल्दबाजी में कोई फैसला न लें।

    शेयर बाजार की शुरुआत पर सबसे पहले वैश्विक बाजारों के संकेतों का असर देखने को मिल सकता है। अमेरिकी और एशियाई बाजारों की चाल से भारतीय बाजार का शुरुआती रुख प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और रुपये की स्थिति भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत माने जाते हैं। अगर वैश्विक माहौल सकारात्मक रहता है तो बाजार में खरीदारी का समर्थन मिल सकता है जबकि कमजोर संकेतों की स्थिति में दबाव देखने को मिल सकता है।

    घरेलू स्तर पर कंपनियों के तिमाही नतीजे आर्थिक आंकड़े ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें और सरकार से जुड़े बड़े फैसले भी बाजार की दिशा तय करने में भूमिका निभाते हैं। किसी बड़ी कंपनी से जुड़ी सकारात्मक खबर उसके शेयर में तेजी ला सकती है जबकि कमजोर नतीजे या नकारात्मक खबर से संबंधित शेयर पर दबाव बन सकता है। इसलिए केवल सेंसेक्स और निफ्टी की दिशा देखने के बजाय निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में शामिल कंपनियों से जुड़ी खबरों पर भी नजर रखनी चाहिए।

    बाजार में उतार चढ़ाव के दौरान सबसे ज्यादा जरूरी निवेशकों का धैर्य होता है। कई बार शुरुआती कारोबार में तेज तेजी या गिरावट दिखाई देती है लेकिन बाद में बाजार की दिशा बदल सकती है। ऐसे में केवल कुछ मिनट या कुछ घंटों की चाल देखकर बड़ा निवेश फैसला लेना जोखिम भरा हो सकता है। खासतौर पर नए निवेशकों को बिना जानकारी के किसी शेयर में पैसा लगाने से बचना चाहिए।

    अगर बाजार में तेजी आती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि हर शेयर में बढ़त देखने को मिलेगी। इसी तरह बाजार में गिरावट आने पर भी सभी कंपनियों के शेयर एक समान नहीं गिरते। कंपनी के कारोबार उसकी वित्तीय स्थिति भविष्य की संभावनाओं और सेक्टर की स्थिति का शेयर की कीमत पर अलग प्रभाव पड़ता है। इसलिए निवेश से पहले कंपनी के मूलभूत आंकड़ों को समझना जरूरी है।

    निवेशकों को अपने लक्ष्य और जोखिम क्षमता के अनुसार रणनीति बनानी चाहिए। लंबी अवधि के निवेशक बाजार की छोटी अवधि की हलचल से ज्यादा प्रभावित होने के बजाय मजबूत कंपनियों और अपने वित्तीय लक्ष्यों पर ध्यान दे सकते हैं। वहीं ट्रेडिंग करने वालों के लिए स्टॉप लॉस और जोखिम प्रबंधन जैसे पहलुओं का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

    शेयर बाजार में मुनाफे की संभावना के साथ जोखिम भी जुड़ा रहता है। किसी शेयर या इंडेक्स की भविष्य की चाल की गारंटी नहीं दी जा सकती। इसलिए निवेश से पहले खुद रिसर्च करना और जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार की राय लेना बेहतर माना जाता है। बाजार में धैर्य और अनुशासन के साथ लिया गया फैसला जल्दबाजी में किए गए निवेश से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

  • रामदेव अग्रवाल को भारतीय शेयरों से अगले पांच साल में 15 प्रतिशत सालाना रिटर्न की उम्मीद, पोर्टफोलियो दोगुना होने का अनुमान

    रामदेव अग्रवाल को भारतीय शेयरों से अगले पांच साल में 15 प्रतिशत सालाना रिटर्न की उम्मीद, पोर्टफोलियो दोगुना होने का अनुमान

    नई दिल्ली ।दिग्गज निवेशक और मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन रामदेव अग्रवाल ने भारतीय शेयर बाजार के भविष्य को लेकर सकारात्मक रुख जताया है। उनका मानना है कि अगले पांच वर्षों में भारतीय शेयरों से सालाना करीब 15 प्रतिशत रिटर्न मिल सकता है। इस तरह के रिटर्न से लंबी अवधि में निवेशकों का पोर्टफोलियो लगभग दोगुना होने की संभावना बनती है।

    अग्रवाल के अनुमान का आधार भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत वृद्धि और कंपनियों की कमाई में संभावित बढ़ोतरी है। उनके मुताबिक आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर करीब 7.5 से 8.5 प्रतिशत के बीच रह सकती है, जबकि कॉर्पोरेट मुनाफे में लगभग 13 से 14 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिल सकती है। ऐसे माहौल में प्रमुख बाजार सूचकांकों के रिटर्न के लिए भी सकारात्मक संभावना बनती है।

    हालांकि उन्होंने निकट अवधि के बाजार को लेकर बहुत तेज बढ़त की उम्मीद नहीं जताई। उनके मुताबिक लगभग दो साल की सुस्ती के बाद भारतीय शेयर बाजार अगले विकास चरण में प्रवेश करने से पहले कुछ समय तक सीमित दायरे में रह सकता है। एक और साल तक बाजार में इसी तरह की स्थिति बने रहने की संभावना से भी उन्होंने इनकार नहीं किया।

    मौजूदा वैल्यूएशन को लेकर भी अग्रवाल ने कमाई की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। निफ्टी की कमाई के मुकाबले ऊंचे मूल्यांकन के बीच यदि कंपनियों की कमाई में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो बाजार की वैल्यूएशन अपेक्षाकृत कम हो सकती है। उनका अनुमान है कि इस स्थिति में बाजार में आगे बढ़ने की गुंजाइश बनी रह सकती है।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई के भारत में सीमित रुझान को लेकर अग्रवाल ने वैश्विक बाजारों की स्थिति का उल्लेख किया। उनके मुताबिक अमेरिका के अलावा कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में मजबूत तेजी और कमाई की संभावनाओं के कारण विदेशी निवेशकों का ध्यान वहां अधिक गया है। वैश्विक पूंजी के लिए अमेरिकी बाजार से मुकाबला करना भी भारतीय बाजारों के लिए चुनौती बना हुआ है।

    अग्रवाल ने कहा कि भारत कुछ ऐसे उभरते बाजारों के लिए पूंजी का स्रोत भी बन रहा है, जिन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े निवेश रुझान से फायदा मिल रहा है। हालांकि उन्हें एफआईआई की लगातार बिकवाली में सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। उनके अनुसार यदि विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव कम होता है तो भारतीय बाजार के लिए यह महत्वपूर्ण सकारात्मक कारक साबित हो सकता है।

    विदेशी निवेशकों के लिए भारत की कर व्यवस्था पर भी अग्रवाल ने अपनी राय रखी। उन्होंने कैपिटल गेन्स टैक्स व्यवस्था को विदेशी निवेशकों के लिए कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण बताया, लेकिन इसे भारत से निवेश कम होने का सबसे बड़ा कारण नहीं माना। उनके अनुसार मुद्रा विनिमय में होने वाला बदलाव विदेशी निवेशकों के लिए अधिक महत्वपूर्ण चिंता हो सकता है।

    विदेशी निवेशक भारत में डॉलर के माध्यम से पूंजी लगाते हैं, जबकि कैपिटल गेन्स की गणना रुपये में होती है। ऐसे में रुपये की कमजोरी के कारण डॉलर में वास्तविक रिटर्न कम होने के बावजूद निवेशक को रुपये में बने लाभ पर कर देना पड़ सकता है। अग्रवाल के अनुसार विदेशी निवेशकों के लिए लंबे समय तक आकर्षक माहौल बनाए रखने के लिए कर व्यवस्था को दूसरे उभरते बाजारों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी रखना जरूरी है।

    नई पीढ़ी की कंपनियों और स्टार्टअप को लेकर भी अग्रवाल ने सावधानी बरतने की सलाह दी। उनका कहना है कि किसी कंपनी को सार्वजनिक बाजार में आने से पहले या तो मुनाफे में होना चाहिए या उसके पास मुनाफे तक पहुंचने का स्पष्ट रास्ता होना चाहिए। सार्वजनिक बाजार निवेशक कंपनियों की कमाई और तिमाही प्रदर्शन को काफी महत्व देते हैं।

    जेप्टो में अपने निवेश का उल्लेख करते हुए अग्रवाल ने कहा कि किसी निवेश की सफलता या विफलता का फैसला तुरंत नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक उनके निवेश का अंतिम आकलन 10 साल बाद ही किया जा सकेगा। इससे उनका जोर स्पष्ट होता है कि शेयर बाजार में लंबी अवधि का नजरिया तत्काल उतार-चढ़ाव से अधिक महत्वपूर्ण है।