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  • पेट्रोल पंप का नोजल टंकी फुल होते ही अपने आप कैसे बंद हो जाता है, जानिए पूरी तकनीक

    पेट्रोल पंप का नोजल टंकी फुल होते ही अपने आप कैसे बंद हो जाता है, जानिए पूरी तकनीक

    नई दिल्ली । कार या बाइक में पेट्रोल-डीजल भरवाते समय आपने अक्सर देखा होगा कि फ्यूल टंकी भरते ही पेट्रोल पंप का नोजल अपने आप बंद हो जाता है। इस दौरान कर्मचारी को न तो कोई बटन दबाना पड़ता है और न ही मशीन को अलग से बंद करने की जरूरत होती है। नोजल का ट्रिगर अपने आप रिलीज हो जाता है और ईंधन का प्रवाह रुक जाता है। यह प्रक्रिया सामान्य दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे एक खास तकनीक काम करती है। इसे ऑटोमैटिक शट-ऑफ या ऑटो कट-ऑफ सिस्टम कहा जाता है।

    आधुनिक पेट्रोल पंपों पर इस्तेमाल होने वाले अधिकांश नोजल में यह व्यवस्था मौजूद होती है। इसका मुख्य उद्देश्य फ्यूल टंकी भर जाने पर ईंधन की सप्लाई को अपने आप रोकना है। इस सिस्टम की खास बात यह है कि यह सामान्य तौर पर किसी इलेक्ट्रॉनिक सेंसर या बाहरी बिजली की मदद के बिना काम करता है। इसके बजाय इसमें हवा के दबाव और वैक्यूम के सिद्धांत का इस्तेमाल किया जाता है।

    नोजल की नोक के पास होता है छोटा छेद

    ऑटो कट-ऑफ सिस्टम को समझने के लिए नोजल की बनावट पर ध्यान देना जरूरी है। इसकी नोक के पास एक छोटा-सा छेद होता है, जो नोजल के भीतर मौजूद एक पतली ट्यूब से जुड़ा रहता है। ईंधन भरने के दौरान यह छेद हवा के प्रवाह में मदद करता है। नोजल के अंदर वेंचुरी प्रभाव के कारण दबाव में अंतर पैदा होता है, जो ऑटोमैटिक शट-ऑफ व्यवस्था को सक्रिय रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    जब तक फ्यूल टंकी में पर्याप्त खाली जगह रहती है, तब तक नोजल की नोक के पास मौजूद छेद खुला रहता है। इस स्थिति में हवा का प्रवाह जारी रहता है और ईंधन लगातार टंकी में पहुंचता रहता है। जैसे-जैसे टंकी में पेट्रोल या डीजल का स्तर बढ़ता है, ईंधन नोजल की नोक के करीब आने लगता है। टंकी भरने पर ईंधन इस छोटे छेद को ढक देता है, जिससे हवा का रास्ता बंद हो जाता है।

    छेद बंद होते ही नोजल के अंदर दबाव की स्थिति बदल जाती है और वैक्यूम का प्रभाव बढ़ता है। यह बदलाव नोजल के भीतर मौजूद डायफ्राम को सक्रिय करता है। इसके बाद ट्रिगर को पकड़े रखने वाला मैकेनिज्म रिलीज हो जाता है। नतीजतन, नोजल का वाल्व बंद हो जाता है और पेट्रोल या डीजल की सप्लाई तुरंत रुक जाती है। इस तरह बिना किसी कर्मचारी के हस्तक्षेप के नोजल को पता चल जाता है कि टंकी भर चुकी है।

    ऑटो कट-ऑफ के बाद दोबारा न दबाएं ट्रिगर

    कई वाहन चालक नोजल के पहली बार अपने आप बंद होने के बाद भी उसमें से अतिरिक्त ईंधन भरने की कोशिश करते हैं। इसके लिए वे ट्रिगर को दोबारा दबाते हैं, ताकि टंकी में कुछ और पेट्रोल या डीजल भरा जा सके। हालांकि, ऐसा करने से बचना चाहिए। ऑटो कट-ऑफ सिस्टम का सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि ईंधन टंकी भरने के स्तर तक पहुंच चुकी है।

    जरूरत से ज्यादा ईंधन भरने की कोशिश करने पर पेट्रोल या डीजल बाहर छलक सकता है। इससे ईंधन की बर्बादी के साथ सुरक्षा संबंधी जोखिम भी पैदा हो सकते हैं। इसलिए नोजल पहली बार अपने आप बंद हो जाए तो ईंधन भरना रोक देना बेहतर है।

    पेट्रोल पंप के नोजल में मौजूद यह व्यवस्था ईंधन भरने की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने में मदद करती है। हवा के प्रवाह, दबाव में बदलाव और वैक्यूम के सिद्धांत से काम करने वाला यह मैकेनिज्म टंकी भरने पर सप्लाई रोक देता है। यही वजह है कि पेट्रोल पंप कर्मचारी को हर वाहन की टंकी भरने पर मशीन को हाथ से बंद करने की जरूरत नहीं पड़ती।

  • पीयूष गोयल की यूरोप को चेतावनी, सीबीएएम और 50 प्रतिशत स्टील शुल्क से उद्योगों की प्रतिस्पर्धा पर पड़ेगा असर

    पीयूष गोयल की यूरोप को चेतावनी, सीबीएएम और 50 प्रतिशत स्टील शुल्क से उद्योगों की प्रतिस्पर्धा पर पड़ेगा असर


    नई दिल्ली । केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय देशों को आगाह किया है कि कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) और स्टील आयात पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाने जैसे कदम यूरोप की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसलों से जीवनयापन की लागत बढ़ सकती है, उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव पड़ सकता है और यूरोपीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। गोयल ने वैश्विक व्यापार में भरोसे को सबसे महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि मजबूत आर्थिक संबंधों के लिए विश्वास बनाए रखना जरूरी है।

    बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 के प्रश्नोत्तर सत्र में गोयल ने कहा कि व्यापारिक बाधाएं बढ़ाने से संबंधित देशों के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। उनके मुताबिक, सीबीएएम और स्टील पर भारी आयात शुल्क जैसे उपायों का असर केवल विदेशी उत्पादकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यूरोप के उद्योगों और आम उपभोक्ताओं को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने भारत और यूरोपीय संघ के बीच विश्वास, प्रतिस्पर्धात्मकता और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं पर आधारित आर्थिक साझेदारी विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    जर्मनी में आयोजित एक अन्य कार्यक्रम में गोयल ने भारत और जर्मनी के द्विपक्षीय व्यापार को लेकर बड़ी संभावना जताई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच मौजूदा व्यापार लगभग 31 अरब यूरो से बढ़कर 310 अरब यूरो तक पहुंच सकता है। इसके लिए दोनों देशों को अपनी औद्योगिक क्षमताओं का बेहतर उपयोग करना होगा और नई तकनीकों तथा उत्पादों के विकास में मिलकर काम करना होगा। हालांकि, उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई।

    गोयल 22 से 27 अक्टूबर तक जर्मनी और नीदरलैंड की आधिकारिक यात्रा पर हैं। उनके साथ करीब 100 भारतीय उद्योगों और स्टार्टअप्स का प्रतिनिधिमंडल भी गया है। इस यात्रा का उद्देश्य व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने, निवेश की संभावनाएं बढ़ाने और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाना है।

    जर्मनी की आर्थिक मामलों और ऊर्जा मंत्री कैथरीना रीचे ने भी दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ाने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने लालफीताशाही कम करने और संयुक्त परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने पर जोर देते हुए कहा कि भारत-जर्मनी व्यापार को मौजूदा स्तर से दोगुना किया जा सकता है।

    भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता भी चर्चा का प्रमुख विषय रहा। गोयल ने उम्मीद जताई कि इस समझौते पर वर्ष 2026 के अंत तक हस्ताक्षर हो सकते हैं और अगले चार से पांच महीनों में इसे लागू किया जा सकता है। हालांकि, यह समयसीमा समझौते की वार्ता, औपचारिक प्रक्रियाओं और संबंधित पक्षों की मंजूरी पर निर्भर करेगी।

    गोयल और रीचे के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण और ऊर्जा सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने महत्वपूर्ण खनिजों, हरित हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं के विकास की संभावनाओं पर भी विचार किया। भारत के औद्योगिक और डिजिटल तंत्र में निवेश बढ़ाना भी बातचीत का हिस्सा रहा।

    गोयल ने भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते को दोनों पक्षों के कारोबार के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उनके अनुसार, इससे भारतीय और जर्मन कंपनियों को अपनी क्षमताओं का विस्तार करने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है। व्यापारिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ भरोसे और प्रतिस्पर्धा को महत्व देना इस साझेदारी को मजबूत करने के लिए जरूरी होगा।

  • भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    नई दिल्ली । भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में अक्टूबर 2026 के दौरान तेजी दर्ज की गई है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नए ऑर्डरों की बढ़ोतरी, घरेलू मांग में मजबूती और विदेशी बाजारों से मिले बेहतर कारोबार के कारण गतिविधियां चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं। अक्टूबर के शुरुआती सर्वेक्षण आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों में सुधार का लाभ मिला। इसके साथ ही उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर पड़ने वाले दबाव में भी नरमी दर्ज की गई, जबकि रोजगार वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी रही।

    अक्टूबर में एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स बढ़कर 56.7 पर पहुंच गया, जबकि सितंबर में यह 55.9 था। यह सूचकांक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की संयुक्त कारोबारी गतिविधियों का आकलन करता है। पीएमआई में 50 से ऊपर का स्तर गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है, जबकि इससे नीचे का स्तर संकुचन को दर्शाता है। अक्टूबर का आंकड़ा जून के बाद कारोबारी गतिविधियों में सबसे तेज वृद्धि का संकेत देता है।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने नए ऑर्डरों में बढ़ोतरी और कारोबारी परिस्थितियों में सुधार की जानकारी दी। घरेलू बाजार से मिलने वाली मांग के साथ विदेशी ग्राहकों की ओर से भी ऑर्डर बढ़े। विशेष रूप से निर्यात ऑर्डरों में पिछले छह महीनों की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। इससे भारतीय कंपनियों को उत्पादन और सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों में तेजी बनाए रखने में मदद मिली।

    विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और नए ऑर्डरों की वृद्धि सितंबर के आसपास बनी रही, लेकिन निर्यात मांग में तेजी अक्टूबर की प्रमुख विशेषता रही। भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, जून 2025 के बाद पहली बार निर्यात ऑर्डरों में इतनी मजबूत बढ़ोतरी देखी गई है। विदेशी बाजारों से मिले बेहतर संकेतों के बीच निर्माताओं ने कच्चे माल और तैयार उत्पादों का भंडार भी बढ़ाया। कंपनियों की यह गतिविधि बढ़ती मांग को पूरा करने की तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी आंकड़ों में राहत के संकेत मिले हैं। उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर दबाव लगातार कम होने की जानकारी सामने आई। लागत संबंधी दबाव में नरमी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उत्पादन और बिक्री से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि आने वाले महीनों में महंगाई किस स्तर पर रहेगी। फिलहाल सर्वेक्षण अक्टूबर के दौरान लागत और कीमतों से जुड़े दबावों में कमी का संकेत देता है।

    रोजगार के मामले में स्थिति अपेक्षाकृत मिश्रित रही। निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या बढ़ने की गति धीमी हुई। सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने लगातार नौ महीनों तक भर्ती बढ़ाने के बाद अक्टूबर में नई नियुक्तियों को लगभग रोक दिया। कंपनियों का मानना था कि मौजूदा कर्मचारियों की संख्या से कामकाज की जरूरतें पूरी हो रही हैं। वहीं, विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ा, लेकिन इसकी रफ्तार सीमित रही। इससे स्पष्ट होता है कि कारोबारी गतिविधियों में तेजी के बावजूद भर्ती में समान स्तर का विस्तार नहीं हुआ।

    सर्वेक्षण में लंबित कार्यभार में भी गिरावट दर्ज की गई। कंपनियों के पास पहले से जमा काम का स्तर लगातार तीसरी बार घटा और यह संयुक्त रूप से पिछले साढ़े छह वर्षों की सबसे तेज गिरावट रही। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लंबित काम को अपेक्षाकृत तेजी से पूरा कर पा रही हैं। अक्टूबर में विनिर्माण पीएमआई 54.9 दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र में लगातार विस्तार को दर्शाता है।

    कुल मिलाकर, अक्टूबर के शुरुआती पीएमआई आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के निजी क्षेत्र में मजबूत कारोबारी गति का संकेत देते हैं। घरेलू मांग, निर्यात ऑर्डरों और विनिर्माण गतिविधियों से विस्तार को सहारा मिला है। हालांकि, रोजगार वृद्धि की धीमी रफ्तार यह बताती है कि कारोबार में तेजी का लाभ सभी क्षेत्रों में नई नियुक्तियों के रूप में समान रूप से दिखाई नहीं दिया है।

  • सोना-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट, चांदी 6,799 रुपये टूटी, दो लाख के नीचे पहुंचा भाव

    सोना-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट, चांदी 6,799 रुपये टूटी, दो लाख के नीचे पहुंचा भाव

    नई दिल्ली । कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट का सिलसिला जारी है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने और चांदी के भाव में एक बार फिर बड़ी कमजोरी देखने को मिली। वैश्विक शेयर बाजारों में बिकवाली, कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहना और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहने की आशंका ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। इसका सीधा असर कीमती धातुओं पर पड़ा। घरेलू वायदा बाजार में चांदी की कीमत गिरकर दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम के नीचे आ गई, जबकि सोना भी अपने पिछले बंद स्तर से काफी नीचे कारोबार करता दिखाई दिया।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर दिसंबर में डिलीवरी वाला सोना पिछले कारोबारी सत्र में 1,43,309 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। शुक्रवार को यह 1,251 रुपये यानी 0.87 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,42,058 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। कारोबार के दौरान बिकवाली बढ़ने से इसका भाव 1,41,806 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया। इस स्तर पर सोने में पिछले बंद भाव के मुकाबले 1,503 रुपये यानी 1.04 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, बाद में कीमतों में कुछ सुधार हुआ। कारोबार के दौरान सोना 629 रुपये यानी 0.44 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,42,680 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बना हुआ था।

    चांदी की कीमतों में इससे भी अधिक गिरावट दर्ज की गई। दिसंबर डिलीवरी वाली चांदी पिछले कारोबारी सत्र में 1,99,599 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी। शुक्रवार को यह 3,012 रुपये यानी 1.50 प्रतिशत टूटकर 1,96,587 रुपये प्रति किलोग्राम पर खुली। दिन के कारोबार में गिरावट तेज हुई और इसका भाव 6,799 रुपये यानी 3.40 प्रतिशत फिसलकर 1,92,800 रुपये प्रति किलोग्राम के निचले स्तर तक पहुंच गया। इस गिरावट के साथ चांदी दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे आ गई। हालांकि, बाद में कुछ खरीदारी लौटने से कीमत में आंशिक सुधार हुआ और चांदी 1.66 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,96,276 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार करती नजर आई।

    बाजार में कमजोरी की प्रमुख वजहों में महंगी ऊर्जा और उससे बढ़ने वाली महंगाई की चिंता शामिल है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहने के कारण निवेशकों को आशंका है कि महंगाई पर नियंत्रण पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में प्रमुख केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकते हैं। ऊंची ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड से सोने जैसी ऐसी संपत्तियों पर दबाव पड़ता है, जिनसे नियमित ब्याज नहीं मिलता। ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर होने से भी निवेशकों का रुझान प्रभावित हुआ है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। कॉमेक्स पर सोना लगभग 0.65 प्रतिशत टूटकर 4,034 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता दिखाई दिया। वहीं, चांदी करीब 1.30 प्रतिशत गिरकर 54.29 डॉलर प्रति औंस के आसपास रही। वैश्विक बाजार में सोने का भाव 4,000 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंचने से कीमती धातुओं में कमजोरी का माहौल बना हुआ है।

    हालांकि, डॉलर में कमजोरी और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी आने पर सोने-चांदी को कुछ समर्थन मिल सकता है। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों, महंगाई के रुझान, केंद्रीय बैंकों की नीतियों, चीन की अर्थव्यवस्था, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और कच्चे तेल की कीमतों पर रहेगी।

    इस साल सोने ने घरेलू वायदा बाजार में 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम का रिकॉर्ड स्तर छुआ था, जबकि चांदी 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम के ऐतिहासिक उच्च स्तर तक पहुंची थी। मौजूदा भाव की तुलना में दोनों धातुएं अपने रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ चुकी हैं। विशेष रूप से चांदी की कीमत अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर के मुकाबले लगभग आधी रह गई है। आगे कीमतों की दिशा वैश्विक आर्थिक संकेतों और निवेशकों की धारणा पर निर्भर करेगी।

  • 2027 से WhatsApp और Telegram पर सिम-बाइंडिंग नियम संभव, सिम हटाने पर अकाउंट की सेवाएं हो सकती हैं बंद

    2027 से WhatsApp और Telegram पर सिम-बाइंडिंग नियम संभव, सिम हटाने पर अकाउंट की सेवाएं हो सकती हैं बंद

    नई दिल्ली । व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग ऐप इस्तेमाल करने वालों के लिए 2027 से नए नियम लागू हो सकते हैं। प्रस्तावित सिम-बाइंडिंग व्यवस्था के तहत अकाउंट से जुड़े भारतीय मोबाइल नंबर का सक्रिय सिम या ई-सिम उसी डिवाइस में मौजूद होना जरूरी हो सकता है, जिस पर संबंधित अकाउंट इस्तेमाल किया जा रहा है। दूरसंचार विभाग ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स को 31 दिसंबर 2026 तक इन नियमों का पालन करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य साइबर धोखाधड़ी पर अंकुश लगाना और भारतीय मोबाइल नंबरों के दुरुपयोग को रोकना बताया गया है।

    इस व्यवस्था का सीधा असर उन उपयोगकर्ताओं पर पड़ सकता है, जो मैसेजिंग ऐप पर अकाउंट बनाने के बाद रजिस्टर्ड सिम कार्ड निकाल देते हैं या उसे किसी दूसरे फोन में इस्तेमाल करते हैं। नए नियमों के तहत प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना पड़ सकता है कि अकाउंट से जुड़ा नंबर उसी डिवाइस में सक्रिय सिम या ई-सिम के माध्यम से सत्यापित हो। यदि सिम निकाल दिया जाता है, नंबर बदल जाता है या सिम निष्क्रिय हो जाता है, तो संबंधित अकाउंट की सेवाएं सीमित या निलंबित की जा सकती हैं, जब तक नंबर का दोबारा सत्यापन नहीं हो जाता।

    सरकार की इस पहल के पीछे ऑनलाइन धोखाधड़ी के उन तरीकों पर रोक लगाने का उद्देश्य है, जिनमें भारतीय मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करके मैसेजिंग अकाउंट बनाए जाते हैं और बाद में उनका संचालन दूसरे देशों से किया जाता है। दूरसंचार विभाग के अनुसार, कुछ धोखाधड़ी गिरोह सिम कार्ड के माध्यम से अकाउंट तैयार करते हैं और फिर उनका इस्तेमाल फिशिंग, आर्थिक ठगी तथा तथाकथित डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों के लिए करते हैं। सक्रिय सिम और मैसेजिंग अकाउंट के बीच संबंध मजबूत होने से ऐसे मामलों की रोकथाम में मदद मिलने की उम्मीद है।

    व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म मोबाइल नंबर के आधार पर उपयोगकर्ता का पंजीकरण करते हैं, इसलिए उनके इस व्यवस्था के दायरे में आने की संभावना है। हालांकि, अलग-अलग ऐप पर नियमों के लागू होने की स्थिति को लेकर पूरी स्पष्टता जरूरी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, स्नैपचैट पर इन नियमों के लागू होने की संभावना कम बताई गई है, जबकि सिग्नल को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। उपयोगकर्ताओं को अपने संबंधित ऐप की आधिकारिक जानकारी और नियमों के अंतिम स्वरूप पर नजर रखनी चाहिए।

    इन संभावित बदलावों का असर उन लोगों पर अधिक पड़ सकता है, जो एक फोन में सिम रखते हैं लेकिन व्हाट्सएप या अन्य मैसेजिंग ऐप किसी दूसरे डिवाइस पर चलाते हैं। इसी तरह, अकाउंट बनाने के बाद सिम निकाल देने वाले, मुख्य रूप से वाई-फाई के जरिए ऐप इस्तेमाल करने वाले और डुअल-सिम फोन में अकाउंट से जुड़े नंबर को निष्क्रिय छोड़ने वाले उपयोगकर्ताओं को भी परेशानी हो सकती है।

    हालांकि, सिम-बाइंडिंग नियमों का मतलब यह नहीं है कि 1 जनवरी 2027 से व्हाट्सएप किसी खास आईफोन या एंड्रॉइड फोन पर चलना बंद कर देगा। प्रस्तावित व्यवस्था का संबंध मोबाइल नंबर के सत्यापन और अकाउंट की सुरक्षा से है, न कि किसी विशेष मोबाइल ब्रांड या ऑपरेटिंग सिस्टम से। इसलिए इसे फोन के मॉडल पर आधारित प्रतिबंध समझना सही नहीं होगा।

    प्रस्तावित नियमों में भौतिक सिम कार्ड के साथ ई-सिम को भी शामिल किया गया है। यदि अकाउंट से जुड़ा नंबर सक्रिय ई-सिम के रूप में उसी डिवाइस में मौजूद रहता है, तो उपयोगकर्ता को निर्धारित शर्तों के तहत सेवा जारी रखने में आसानी हो सकती है। हालांकि, अंतिम प्रक्रिया और सत्यापन से जुड़े व्यावहारिक निर्देश नियमों के अंतिम स्वरूप पर निर्भर करेंगे।

    उपयोगकर्ताओं के लिए फिलहाल जरूरी है कि वे अपने मैसेजिंग अकाउंट से जुड़े मोबाइल नंबर की सक्रियता बनाए रखें और सिम बदलने या दूसरे फोन में स्थानांतरित करने से पहले संभावित प्रभाव को समझें। इन नियमों का उद्देश्य सुरक्षा मजबूत करना है, लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम दिशानिर्देश किस तरह लागू किए जाते हैं और प्लेटफॉर्म सत्यापन की प्रक्रिया कैसे संचालित करते हैं।

  • पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर

    पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर


    नई दिल्ली ।
    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान भारत में निवेश, विनिर्माण और नवाचार की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए बड़े अवसर उपलब्ध कराता है। भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच विश्वास, प्रतिस्पर्धात्मकता और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं के आधार पर मजबूत आर्थिक साझेदारी विकसित करने की भी व्यापक संभावनाएं हैं। गोयल ने दोनों देशों के उद्योग जगत से सहयोग बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर तलाशने का आह्वान किया।

    बर्लिन दौरे के दौरान गोयल ने फ्रेसेनियस ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल सेन के साथ बैठक की। इसमें भारत के तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, गुणवत्तापूर्ण और किफायती चिकित्सा सेवाओं की बढ़ती मांग तथा मजबूत विनिर्माण क्षमताओं पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने विचार किया कि इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर भारतीय बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है।

    गोयल ने भारत की कुशल प्रतिभा और उत्पादन क्षमता को जर्मन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उनके अनुसार, कंपनियां भारत में उपलब्ध योग्य कर्मचारियों और विश्वस्तरीय विनिर्माण सुविधाओं का लाभ उठाकर घरेलू तथा वैश्विक बाजारों में अपनी पहुंच मजबूत कर सकती हैं। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग के कारण चिकित्सा उत्पादों और सेवाओं के विकास में भी सहयोग की संभावनाएं हैं।

    केंद्रीय मंत्री ने बेयर के फार्मास्यूटिकल्स प्रभाग के अध्यक्ष स्टीफन ओएलरिख के साथ भी चर्चा की। इस बैठक में भारत में बेयर की विस्तार योजनाओं और देश के विकसित होते स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक निवेश की संभावनाओं पर विचार किया गया। बातचीत में नवाचार और सहयोग को बढ़ावा देने से जुड़े अवसर भी शामिल रहे। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए इस क्षेत्र में निवेश और तकनीकी सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया।

    गोयल ने बर्लिन में नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिलदिज के साथ बैठक में भी भाग लिया। इसमें भारत में कंपनी के विनिर्माण विस्तार, टिकाऊ निर्माण सामग्री और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण और आर्थिक बदलावों के बीच निर्माण क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया गया। टिकाऊ निर्माण सामग्री और उत्पादन क्षमता बढ़ाने से जुड़े अवसर इस बातचीत के प्रमुख विषय रहे।

    इससे पहले गोयल ने जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (डीजीएपी) के इंडिया सेंटर के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया। कार्यक्रम में जर्मनी की संघीय आर्थिक मामलों और ऊर्जा मंत्री कैथरीना रीचे भी मौजूद थीं। गोयल ने कहा कि यह केंद्र भारत-जर्मनी संबंधों की बढ़ती मजबूती और आपसी सहयोग को गहरा करने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

    अपने संबोधन में गोयल ने दोनों देशों की पूरक क्षमताओं को महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्यों के लिए मजबूत आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक साझेदारी को नई गति दे सकता है। उनके अनुसार, भारत और जर्मनी मिलकर वैश्विक स्तर पर मजबूत और लचीली मूल्य शृंखलाएं विकसित कर सकते हैं। इसके लिए दोनों देशों के उद्योगों और निवेशकों को पारस्परिक लाभ वाले क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

    बर्लिन स्थित ईएसएमटी बर्लिन की ओर से आयोजित बिजनेस लीडर्स राउंडटेबल में भी गोयल ने प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। उन्होंने भारत और जर्मनी के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों के भविष्य को लेकर विश्वास जताया। इन बैठकों के जरिए निवेश, उत्पादन, स्वास्थ्य सेवा, निर्माण सामग्री और नवाचार जैसे क्षेत्रों में कारोबारी सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं को सामने रखा गया।

  • तीन दिन की गिरावट के बाद शेयर बाजार में लौटी तेजी, सेंसेक्स 517 अंक चढ़ा, आईटी शेयरों में खरीदारी से मिला सहारा

    तीन दिन की गिरावट के बाद शेयर बाजार में लौटी तेजी, सेंसेक्स 517 अंक चढ़ा, आईटी शेयरों में खरीदारी से मिला सहारा

    नई दिल्ली । लगातार तीन कारोबारी दिनों की गिरावट के बाद शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार ने तेजी के साथ कारोबार की शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी दोनों हरे निशान में रहे। सेंसेक्स 416.25 अंक यानी 0.57 प्रतिशत की बढ़त के साथ 73,665.64 पर खुला, जबकि निफ्टी 50 ने 54.55 अंक यानी 0.24 प्रतिशत की तेजी के साथ 22,742.20 पर शुरुआत की। पिछले कारोबारी सत्र में सेंसेक्स 73,249.39 और निफ्टी 22,687.65 पर बंद हुआ था।

    कारोबार आगे बढ़ने के साथ सेंसेक्स की तेजी बढ़ी और उसने 517.12 अंक यानी 0.70 प्रतिशत की बढ़त के साथ 73,766.51 का उच्चतम स्तर छुआ। वहीं, निफ्टी 50 करीब 100 अंक यानी 0.43 प्रतिशत चढ़कर 22,787.25 के स्तर तक पहुंचा। बाजार में आई इस तेजी के बावजूद सभी श्रेणियों के शेयरों में खरीदारी का माहौल नहीं दिखा। व्यापक बाजार में दबाव बना रहा और छोटे तथा मझोले शेयरों के सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई।

    निफ्टी स्मॉलकैप 100 सूचकांक में करीब 2 प्रतिशत और निफ्टी मिडकैप 100 में 1.3 प्रतिशत की गिरावट आई। इससे संकेत मिला कि प्रमुख सूचकांकों में बढ़त के बावजूद व्यापक बाजार की स्थिति कमजोर बनी हुई थी। निवेशकों की खरीदारी चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित रही और कई प्रमुख क्षेत्रीय सूचकांक गिरावट में कारोबार करते दिखे।

    क्षेत्रवार प्रदर्शन में आईटी शेयरों ने बाजार को सबसे अधिक सहारा दिया। निफ्टी आईटी सूचकांक में 1.8 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इसके विपरीत निफ्टी मेटल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, रियल्टी, ऑटो, पीएसयू बैंक और मीडिया सूचकांकों में सबसे ज्यादा गिरावट रही। इस तरह बाजार की शुरुआती तेजी के बीच अलग-अलग क्षेत्रों के प्रदर्शन में बड़ा अंतर देखने को मिला।

    विदेशी मुद्रा बाजार में भी रुपये में मामूली मजबूती दर्ज की गई। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया तीन पैसे बढ़कर 94.79 पर खुला। इससे पिछले कारोबारी दिन गुरुवार को यह 94.82 के स्तर पर बंद हुआ था। हालांकि, रुपये में सुधार सीमित रहा और वैश्विक बाजारों से मिलने वाले संकेत निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण बने रहे।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों का रुख कमजोर रहा। एशियाई शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई, जबकि अमेरिकी बाजार भी अधिकांशतः नुकसान के साथ बंद हुए। अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई पर बढ़ते खर्च और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को लेकर चिंताओं ने निवेशकों की धारणा प्रभावित की। अमेरिकी तकनीकी शेयरों में बिकवाली के बीच नैस्डैक सूचकांक 2.6 प्रतिशत गिरकर बंद हुआ। एशिया में जापान का निक्केई सूचकांक शुरुआती कारोबार में लगभग 1.7 प्रतिशत नीचे आ गया।

    बाजार विश्लेषकों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत 114 डॉलर तक पहुंचना अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के लिए चिंता का विषय है। दूसरी ओर, अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट और रुपये में मजबूती को सकारात्मक संकेत माना गया। विश्लेषकों का कहना है कि ये कारक विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली का दबाव कम करने में मदद कर सकते हैं।

    बाजार की आगे की दिशा को लेकर विश्लेषकों ने निफ्टी के लिए 22,600 से 22,650 के स्तर को तत्काल समर्थन और 22,900 से 23,000 के स्तर को प्रतिरोध क्षेत्र बताया। निफ्टी का सापेक्ष शक्ति सूचकांक यानी आरएसआई 43.98 पर रहा, जबकि इसका औसत 38.86 था। पुट-कॉल अनुपात यानी पीसीआर घटकर 0.82 पर आ गया।

    गुरुवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 3,459 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिकवाली की थी। इसके विपरीत घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 2,891 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की, जिससे बाजार को सहारा मिला। विश्लेषकों ने यह भी अनुमान जताया कि जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ में लगाए गए 3.73 लाख करोड़ रुपये में से तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि शेयर आवंटन के बाद अगले सोमवार तक व्यवस्था में लौट सकती है। उनके मुताबिक, इससे अगले सप्ताह बाजार में नकदी की उपलब्धता बढ़ने की संभावना है, हालांकि बाजार की दिशा वैश्विक संकेतों और निवेशकों की गतिविधियों पर भी निर्भर करेगी।

  • कच्चे तेल की कीमतों में तूफानी तेजी, सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता, पेट्रोल-डीजल पर मंडराया महंगाई का खतरा

    कच्चे तेल की कीमतों में तूफानी तेजी, सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता, पेट्रोल-डीजल पर मंडराया महंगाई का खतरा


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत समेत दुनिया के कई तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। सऊदी अरब पर हमलों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 113 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया जबकि अमेरिकी कच्चा तेल डब्ल्यूटीआई करीब 99 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता रहा। तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर आने वाले दिनों में पेट्रोल डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। हालांकि घरेलू बाजार में ईंधन के दाम बढ़ेंगे या नहीं इसका फैसला तेल कंपनियों और सरकार की नीतियों समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।

    कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव प्रमुख वजह माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के लाल सागर स्थित यनबू बंदरगाह के अलावा एक तेल क्षेत्र और हवाई अड्डे पर हमलों का दावा किया है। इन घटनाओं ने तेल उत्पादन और निर्यात से जुड़े बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। सऊदी अरब वैश्विक तेल आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में उसके तेल ठिकानों या निर्यात केंद्रों पर किसी बड़े हमले से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

    इस साल अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 85 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। डीजल जैसे तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भी भारी तेजी दर्ज की गई है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लिए तेल और गैस की आपूर्ति का अहम रास्ता है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की उपलब्धता और कीमतों पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    कच्चे तेल की महंगाई का भारत पर सीधा असर पड़ने की आशंका इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है और इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ सकता है। परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों समेत दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे तेल के प्रति बैरल भाव में 10 डॉलर की बढ़ोतरी से तेल कंपनियों को करीब छह रुपये प्रति लीटर के बराबर लागत का दबाव पड़ सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम भी स्वतः छह रुपये बढ़ जाएंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को व्हाइट हाउस में बातचीत के दौरान दावा किया कि अमेरिका ने ईरान को काफी कमजोर कर दिया है। उन्होंने आगे भी कार्रवाई के संकेत दिए। इस बीच फारस की खाड़ी से कच्चे तेल की आवाजाही में कुछ सुधार के बावजूद पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति सीमित रहने की खबरें सामने आई हैं। रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों ने भी ईंधन बाजार पर दबाव बढ़ाया है। स्थिति से निपटने के लिए कुछ सरकारें अपने रणनीतिक भंडार से ईंधन जारी कर रही हैं।

    कुल मिलाकर कच्चे तेल की कीमतों में आगे की चाल पश्चिम एशिया में संघर्ष की स्थिति सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और प्रमुख समुद्री मार्गों से आपूर्ति सामान्य रहने पर निर्भर करेगी। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर फिलहाल किसी निश्चित बढ़ोतरी का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी लेकिन लंबे समय तक तेल महंगा बना रहा तो देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के बजट पर दबाव बढ़ सकता है।

  • 10 साल तक मैच्योर FD का पैसा नहीं निकाला, तो क्या होगा? जानें RBI के नियम

    10 साल तक मैच्योर FD का पैसा नहीं निकाला, तो क्या होगा? जानें RBI के नियम


    नई दिल्ली। फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) नौकरीपेशा लोगों और आम निवेशकों के बीच निवेश का लोकप्रिय विकल्प है। इसमें तय अवधि के लिए पैसा जमा करने पर निर्धारित शर्तों के अनुसार ब्याज मिलता है। लेकिन कई बार बैंक का नोटिफिकेशन छूट जाने या जानकारी के अभाव में लोग FD की मैच्योरिटी के बाद भी रकम नहीं निकालते। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 10 साल तक पैसा नहीं निकालने पर रकम डूब जाती है या उस पर ब्याज मिलता रहता है?

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के मुताबिक, FD की मैच्योरिटी के बाद रकम का भुगतान, रिन्यूअल और ब्याज बैंक में दर्ज निर्देशों और लागू शर्तों पर निर्भर करता है। अगर रकम 10 साल तक अनक्लेम्ड रहती है, तो उसे डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस (DEA) फंड में ट्रांसफर किया जा सकता है। हालांकि, इससे जमाकर्ता का पैसा वापस पाने का अधिकार खत्म नहीं होता।

    FD मैच्योर होने के बाद क्या होता है?

    FD की अवधि पूरी होने पर बैंक जमाकर्ता को रकम का भुगतान करता है या पहले से दिए गए निर्देशों के अनुसार डिपॉजिट को रिन्यू कर सकता है। आम तौर पर तीन स्थितियां बनती हैं।

    1. ऑटो-रिन्यूअल: अगर FD खोलते समय ऑटो-रिन्यूअल का विकल्प चुना गया है, तो बैंक तय निर्देशों और शर्तों के अनुसार FD को आगे बढ़ा सकता है।

    2. बैंक खाते में रकम ट्रांसफर: अगर मैच्योरिटी पर भुगतान का निर्देश दिया गया है, तो बैंक अपनी प्रक्रिया के अनुसार रकम जमाकर्ता के रजिस्टर्ड बैंक खाते में भेज सकता है।

    3. मैच्योरिटी के बाद ब्याज: अगर मैच्योरिटी की रकम का भुगतान नहीं हुआ है, तो उस पर लागू नियमों के अनुसार ब्याज मिल सकता है। कई मामलों में यह ब्याज बचत खाते की दर या मैच्योर हो चुकी FD की अनुबंधित दर में से जो कम हो, उसके आधार पर तय होता है। इसलिए मैच्योरिटी के बाद पुरानी FD की पूरी ब्याज दर मिलते रहने की गारंटी नहीं है।

    10 साल तक पैसा नहीं निकाला, तो DEA फंड में होगा ट्रांसफर?

    अगर FD की मैच्योरिटी के बाद रकम 10 साल तक अनक्लेम्ड रहती है, तो वह RBI के नियमों के तहत अनक्लेम्ड डिपॉजिट की श्रेणी में आ सकती है। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बैंक ऐसी रकम को डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस (DEA) फंड में ट्रांसफर करता है।

    यह फंड RBI के अंतर्गत संचालित होता है और इसका उद्देश्य जमाकर्ताओं में जागरूकता बढ़ाने के साथ अनक्लेम्ड डिपॉजिट से संबंधित व्यवस्था को संभालना है।

    ध्यान रखें, DEA फंड में रकम ट्रांसफर होने का मतलब यह नहीं है कि आपका पैसा डूब गया। जमाकर्ता या उसके कानूनी उत्तराधिकारी का रकम पर दावा करने का अधिकार बना रहता है। इसके लिए संबंधित बैंक से संपर्क कर निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

    जमाकर्ता की मृत्यु होने पर कौन कर सकता है क्लेम?

    अगर FD के जमाकर्ता की मृत्यु हो चुकी है और उसकी रकम अनक्लेम्ड है, तो नॉमिनी या कानूनी उत्तराधिकारी बैंक में दावा कर सकता है। बैंक की आवश्यकताओं के अनुसार मृत्यु प्रमाण पत्र, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य जरूरी कागजात जमा करने पड़ सकते हैं।

    बैंक दस्तावेजों और दावे का सत्यापन करने के बाद लागू नियमों के अनुसार रकम का भुगतान करता है। इसलिए परिवार के सदस्यों को अपनी FD, बैंक खातों और नॉमिनी से संबंधित जानकारी व्यवस्थित रखनी चाहिए।

    FD रिन्यू कराने से पहले इन 4 बातों का रखें ध्यान

    1. ब्याज दर की तुलना करें: नई FD कराने से पहले बैंक की मौजूदा ब्याज दरों की तुलना पुरानी FD की दर से करें। नई FD पर मिलने वाला ब्याज अलग हो सकता है।

    2. अवधि का चुनाव करें: अपनी भविष्य की जरूरतों और खर्चों को ध्यान में रखकर FD की अवधि तय करें। लंबी अवधि के लिए पैसा जमा करने से पहले यह आकलन कर लें कि रकम की जरूरत कब पड़ सकती है।

    3. समय से पहले FD तोड़ने की शर्तें समझें: मैच्योरिटी से पहले FD बंद कराने पर लागू पेनाल्टी या ब्याज में कटौती की जानकारी जरूर लें।

    4. जरूरत के लिए पैसा उपलब्ध रखें: अगर निकट भविष्य में रकम की जरूरत हो सकती है, तो पूरा पैसा लंबी अवधि की FD में रखने के बजाय बचत खाते या अलग-अलग मैच्योरिटी वाली FD में बांटने पर विचार कर सकते हैं।

    FD की मैच्योरिटी तारीख और बैंक में दर्ज निर्देशों की समय-समय पर जांच करते रहें। इससे रकम के भुगतान या रिन्यूअल में होने वाली परेशानी से बचा जा सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। FD के भुगतान, ब्याज और क्लेम से जुड़े नियम बैंक तथा संबंधित योजना की शर्तों के अनुसार अलग हो सकते हैं। कोई कदम उठाने से पहले अपने बैंक से लागू नियमों की पुष्टि करें।

  • हिमाचल के सिंदूरी अनार दुबई पहुंचे, किसानों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमाई बढ़ाने का नया रास्ता

    हिमाचल के सिंदूरी अनार दुबई पहुंचे, किसानों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमाई बढ़ाने का नया रास्ता

    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश के किसानों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपज पहुंचाने का एक नया अवसर सामने आया है। राज्य के कुल्लू में पैदा होने वाले सिंदूरी अनारों की 1.3 मीट्रिक टन खेप सफलतापूर्वक दुबई भेजी गई है। इस निर्यात से भारतीय कृषि उत्पादों को विदेशी बाजारों में पहचान दिलाने और स्थानीय किसानों को व्यापक बाजार से जोड़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार, 22 अक्टूबर को इस उपलब्धि की जानकारी दी।

    इस खेप का निर्यात कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के सहयोग से किया गया। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय कृषि उपज को वैश्विक खरीदारों तक पहुंचाना है। विदेशों में भारतीय फलों की मांग और बाजार तक सीधी पहुंच बढ़ने से किसानों को अपनी उपज के लिए नए खरीदार मिल सकते हैं। हालांकि, किसानों की आय पर इसका वास्तविक प्रभाव निर्यात की निरंतरता, बाजार की मांग, कीमतों और आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

    कुल्लू के सिंदूरी अनारों का दुबई पहुंचना हिमाचल प्रदेश की कृषि उपज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। विदेशी बाजार में उत्पाद पहुंचाने के लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग, भंडारण, परिवहन और समय पर आपूर्ति जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी होता है। यदि ऐसे निर्यात नियमित रूप से आगे बढ़ते हैं, तो स्थानीय उत्पादकों और उनसे जुड़े कारोबारियों को अपने व्यापार का विस्तार करने का अवसर मिल सकता है।

    कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अन्य राज्यों में भी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी महीने की शुरुआत में एपीडा ने हरियाणा के सोनीपत से कनाडा के लिए 24 मीट्रिक टन जमे हुए खाद्य उत्पादों की खेप भेजने में सहायता की थी। इस खेप में हरी मटर, मिश्रित सब्जियां, मटर और गाजर, स्वीट कॉर्न तथा समोसे जैसे उत्पाद शामिल थे। यह निर्यात किसान उत्पादक संगठनों के नेतृत्व में किया गया था। निर्यात करने वाली इकाई को एपीडा की वित्तीय सहायता योजना से भी मदद मिली।

    इन पहलों के जरिए कृषि और खाद्य उत्पादों के कारोबार से जुड़े छोटे उत्पादकों तथा संगठनों को विदेशी बाजारों तक पहुंचने में सहायता देने का प्रयास किया जा रहा है। किसान उत्पादक संगठन सामूहिक रूप से उपज जुटाने, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने और बड़े खरीदारों की जरूरतों के अनुसार आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वित्तीय सहायता और निर्यात संबंधी मार्गदर्शन से ऐसी इकाइयों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी आसान हो सकती है।

    इस बीच, मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए के लाभों को कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जागरूकता गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं। गांधीनगर में हुई राज्यस्तरीय कार्यशाला में 200 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें राज्य सरकार के अधिकारी, निर्यात संवर्धन परिषदों के प्रतिनिधि और निर्यातक शामिल थे। कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को मुक्त व्यापार समझौतों के तहत उपलब्ध अवसरों की जानकारी देना था।

    पीयूष गोयल ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय कारोबारियों और निर्यातकों की भागीदारी बढ़ाने से एफटीए का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इससे भारत के कुल निर्यात में गुजरात की हिस्सेदारी बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

    मंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में हुए मुक्त व्यापार समझौतों ने भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोले हैं। सरकार का जोर इन समझौतों का लाभ किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और छोटे कारोबारियों तक पहुंचाने पर है, ताकि देश में बने उत्पादों को वैश्विक बाजारों में अधिक अवसर मिल सकें।

    गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की ओर से स्थानीय कारोबारियों को नए निर्यात बाजार तलाशने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयासों की भी सराहना की गई। केंद्र सरकार के वाणिज्य विभाग की योजना राज्यों के साथ मिलकर ऐसी और पहल आयोजित करने की है। इससे राज्यों को अपनी विशिष्ट निर्यात क्षमता पहचानने, मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाने और देश के निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिलने की उम्मीद है।