Category: Economy

  • Gold Price: सोना 8,257 रुपए महंगा होकर 1.60 लाख के पार, चांदी भी 2.46 लाख रुपए के स्तर पर पहुंची

    Gold Price: सोना 8,257 रुपए महंगा होकर 1.60 लाख के पार, चांदी भी 2.46 लाख रुपए के स्तर पर पहुंची

    नई दिल्ली ।देश के सर्राफा बाजार में इस सप्ताह सोने और चांदी की कीमतों में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। दोनों कीमती धातुओं के भाव में लगातार मजबूती देखने को मिली, जिसके चलते 24 कैरेट सोने की कीमत 1.60 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के स्तर को पार कर गई। वहीं, चांदी का भाव भी 2.46 लाख रुपए प्रति किलोग्राम से ऊपर पहुंच गया।

    इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने का भाव इस सप्ताह 8,257 रुपए बढ़कर 1,60,620 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया। इससे पहले इसका भाव 1,52,363 रुपए प्रति 10 ग्राम था। इस तरह सप्ताह के दौरान सोने में मजबूत बढ़त दर्ज की गई और निवेशकों का ध्यान एक बार फिर कीमती धातुओं की ओर बढ़ा।

    22 कैरेट सोने की कीमत भी सप्ताह के दौरान तेजी के साथ बढ़ी। इसका भाव 1,39,565 रुपए प्रति 10 ग्राम से बढ़कर 1,47,128 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया। इसी तरह 18 कैरेट सोने की कीमत 1,14,272 रुपए से बढ़कर 1,20,465 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गई। इससे अलग-अलग शुद्धता वाले सोने के भाव में व्यापक तेजी का संकेत मिलता है।

    सप्ताह के दौरान सोने की कीमत में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। 19 अगस्त की सुबह के सत्र में 24 कैरेट सोने का न्यूनतम भाव 1,52,884 रुपए प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। इसके बाद कीमत में लगातार मजबूती आई और 21 अगस्त की शाम के सत्र में यह बढ़कर 1,60,620 रुपए प्रति 10 ग्राम के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

    सोने की तेजी के साथ चांदी ने भी मजबूत प्रदर्शन किया। चांदी का भाव इस सप्ताह 12,788 रुपए बढ़कर 2,46,630 रुपए प्रति किलो हो गया। इससे पहले इसकी कीमत 2,33,842 रुपए प्रति किलो थी। सप्ताह के दौरान चांदी का न्यूनतम भाव 19 अगस्त की सुबह 2,27,392 रुपए प्रति किलो दर्ज किया गया था।

    इसके बाद चांदी की कीमत में तेजी तेज हुई और 21 अगस्त की शाम को यह 2,46,630 रुपए प्रति किलो के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इस तरह सप्ताह के दौरान चांदी की कीमत में भी बड़ा उछाल देखने को मिला।

    बुलियन बाजार में सोने और चांदी के भाव दिन में दो बार जारी किए जाते हैं। सुबह और शाम के सत्र में कीमतों में होने वाले बदलाव से बाजार की दिशा और मांग की स्थिति का पता चलता है। घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की चाल का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। सोने का भाव करीब 4,600 डॉलर प्रति औंस और चांदी का भाव लगभग 69 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया है। वैश्विक बाजार में मजबूती का असर घरेलू कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, सोने और चांदी में तेजी के पीछे बॉन्ड यील्ड में गिरावट और सुरक्षित निवेश की मांग में बढ़ोतरी प्रमुख कारण हैं। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर अनिश्चितता के बीच निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे कीमती धातुओं में खरीदारी को समर्थन मिल रहा है और दोनों धातुओं की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

  • देश में 1,800 किलोमीटर नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क को मंजूरी, 7,000 करोड़ रुपये के निवेश से मजबूत होगी गैस आपूर्ति

    देश में 1,800 किलोमीटर नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क को मंजूरी, 7,000 करोड़ रुपये के निवेश से मजबूत होगी गैस आपूर्ति

    नई दिल्ली । देश में रसोई गैस की आपूर्ति व्यवस्था को अधिक मजबूत, सुरक्षित और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड ने लगभग 1,800 किलोमीटर लंबे नए एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क के विकास को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं पर करीब 7,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। नई पाइपलाइनों के जरिए एलपीजी की लंबी दूरी तक आपूर्ति को सड़क परिवहन की तुलना में अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया जाएगा।

    स्वीकृत परियोजनाएं तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक और गोवा में विकसित की जाएंगी। इनका उद्देश्य देश के एलपीजी परिवहन ढांचे का विस्तार करना और विभिन्न क्षेत्रों में रसोई गैस की आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाना है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, जिसके बाद इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाया जाता है।

    नई पाइपलाइन परियोजनाओं के पूरा होने से आयातित एलपीजी को संबंधित क्षेत्रों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। पाइपलाइन के जरिए परिवहन से सड़क मार्ग पर निर्भरता कम होगी और एलपीजी की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाले टैंकरों की संख्या में भी कमी आ सकती है।

    स्वीकृत प्रमुख परियोजनाओं में तेलंगाना के चेरलापल्ली से महाराष्ट्र के नागपुर तक 556 किलोमीटर लंबी एलपीजी पाइपलाइन शामिल है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के झांसी से उत्तराखंड के सितारगंज तक 611 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन विकसित की जाएगी। महाराष्ट्र के शिकरापुर से गोवा और कर्नाटक के हुबली तक 633 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन परियोजना को भी मंजूरी दी गई है।

    इन सभी परियोजनाओं के निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी गेल इंडिया लिमिटेड संभालेगी। परियोजनाओं के पूरा होने के बाद पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड द्वारा अधिकृत सामान्य वाहक एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क की कुल लंबाई करीब 7,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 9,500 किलोमीटर हो जाएगी। इस तरह देश के अधिकृत एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क में लगभग 23.5 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

    यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब देश में एलपीजी के सुरक्षित और कम लागत वाले परिवहन के लिए पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। इससे पहले कांडला-गोरखपुर एलपीजी पाइपलाइन परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है। लगभग 2,757 किलोमीटर लंबी यह परियोजना देश की सबसे लंबी एलपीजी पाइपलाइन परियोजना मानी जाती है।

    नियामक के अनुसार, एलपीजी को पाइपलाइन के माध्यम से परिवहन करना सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर विकल्प है। सड़क परिवहन में बड़ी संख्या में टैंकरों की आवाजाही होती है, जबकि पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार से इस निर्भरता को कम किया जा सकता है।

    टैंकरों की आवाजाही घटने से सड़क सुरक्षा में सुधार और परिवहन व्यवस्था पर दबाव कम होने की उम्मीद है। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स लागत और ईंधन खपत में कमी आ सकती है। पाइपलाइन आधारित परिवहन से कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है।

    नियामक बोर्ड का दीर्घकालिक लक्ष्य एलपीजी को बॉटलिंग संयंत्रों तक पहुंचाने में सड़क परिवहन पर निर्भरता को न्यूनतम करना है। छह राज्यों में प्रस्तावित नई परियोजनाओं को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इनके पूरा होने से देश के एलपीजी परिवहन ढांचे का विस्तार होने के साथ ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और कुशल बनाने में मदद मिल सकती है।

  • निफ्टी में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट, एफआईआई ने 1,602 करोड़ रुपये निकाले, डीआईआई की खरीदारी ने बाजार को संभाला

    निफ्टी में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट, एफआईआई ने 1,602 करोड़ रुपये निकाले, डीआईआई की खरीदारी ने बाजार को संभाला

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे सप्ताह दबाव देखने को मिला। ऊंची कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिका ईरान तनाव के बीच निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई। इस दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई ने भारतीय बाजार से 1,602 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने मजबूत खरीदारी जारी रखते हुए बाजार को सहारा दिया।

    सप्ताह के दौरान एफआईआई का निवेश व्यवहार उतार चढ़ाव वाला रहा। कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में विदेशी निवेशकों ने बिकवाली की। इसके बाद लगातार दो कारोबारी सत्रों में उन्होंने खरीदारी की, लेकिन सप्ताह के अंतिम दो सत्रों में फिर से बिकवाली का रुख अपनाया। इससे बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर सतर्कता बढ़ी है।

    20 जुलाई से 21 अगस्त के बीच एफआईआई की गतिविधियों पर नजर डालें तो शुरुआती सप्ताह में वे शुद्ध विक्रेता रहे। इसके बाद लगातार तीन सप्ताह तक उन्होंने खरीदारी की। हालांकि मौजूदा सप्ताह में उनका रुख फिर बदल गया और उन्होंने शुद्ध निकासी की। इसके बावजूद पिछले एक महीने की कुल अवधि में एफआईआई अभी भी 1,282 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार रहे हैं।

    दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार में लगातार मजबूती दिखाई। पिछले एक महीने के दौरान डीआईआई ने प्रत्येक सप्ताह शुद्ध खरीदारी की। इस अवधि में उनका कुल निवेश 48,390 करोड़ रुपये रहा। केवल मौजूदा सप्ताह में ही घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 17,320 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की, जिससे विदेशी बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संतुलित करने में मदद मिली।

    अगस्त महीने के अब तक के आंकड़ों से भी घरेलू निवेशकों की मजबूत भूमिका सामने आती है। इस अवधि में एफआईआई ने कुल 2,510 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जबकि डीआईआई का निवेश 34,370 करोड़ रुपये रहा है। इससे संकेत मिलता है कि घरेलू संस्थागत पूंजी बाजार की स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

    प्रमुख सूचकांकों की बात करें तो निफ्टी ने सप्ताह की शुरुआत कमजोरी के साथ की। मध्य सप्ताह में सूचकांक 24,026 के स्तर तक फिसल गया। हालांकि सप्ताह के अंतिम दो कारोबारी सत्रों में इसमें सुधार देखने को मिला और निफ्टी अपने निचले स्तर से ऊपर आया। इसके बावजूद सप्ताह के अंत में यह 24,252 के स्तर पर बंद हुआ, जो पिछले सप्ताह के मुकाबले करीब 0.5 प्रतिशत की गिरावट है।

    व्यापक बाजार में तस्वीर अपेक्षाकृत बेहतर रही। निफ्टी मिडकैप 100 लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 ने नया सर्वकालिक उच्च स्तर बनाया और सप्ताह के दौरान एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों की दिलचस्पी छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों में बनी हुई है।

    बाजार के लिए आगे कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिका ईरान के बीच भू राजनीतिक घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेंगे। कच्चे तेल की कीमत 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहने से भारतीय बाजार पर दबाव की आशंका है। आने वाले दिनों में एफआईआई की दिशा भी बाजार की चाल तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगी। वहीं डीआईआई की मजबूत खरीदारी बाजार को समर्थन देती रह सकती है।

  • चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    चीनी की बढ़ती कीमतों पर विशेषज्ञों ने साफ किया रुख, एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि गन्ने की कमी और कम रिकवरी जिम्मेदार

    नई दिल्ली । देश में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी डायवर्जन को जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच कृषि और चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने अलग तस्वीर पेश की है। विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा तेजी की मुख्य वजह एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन, गुणवत्ता और चीनी रिकवरी में आई कमी है। उनका कहना है कि सरकार चीनी की घरेलू जरूरत, एथेनॉल उत्पादन और निर्यात के बीच लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती है।

    नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन के अनुसार देश में हर वर्ष घरेलू खपत के लिए करीब 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद उपलब्ध अतिरिक्त मात्रा में से ही एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए चीनी के इस्तेमाल की अनुमति दी जाती है। चालू वर्ष में करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल की गई, जबकि लगभग सात लाख टन चीनी का निर्यात हुआ है।

    विशेषज्ञ के मुताबिक चालू वर्ष में देश का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहा है और इसके साथ पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में देश में पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाता है, ताकि उत्पादन या आपूर्ति में अचानक कमी आने की स्थिति में घरेलू बाजार प्रभावित न हो। इसलिए केवल एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन को मौजूदा कीमत वृद्धि का सीधा कारण मानना उचित नहीं है।

    प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने एथेनॉल को चीनी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण बदलाव वाला क्षेत्र बताया। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन घरेलू मांग से काफी अधिक हो जाता था, तब अतिरिक्त चीनी की वजह से बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ता था। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी और किसानों को गन्ने का भुगतान मिलने में भी परेशानी पैदा होती थी। निर्यात एक विकल्प जरूर था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों और प्रतिस्पर्धा के कारण यह हमेशा लाभदायक नहीं रहता था।

    ऐसी परिस्थितियों में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने की नीति ने उद्योग को एक वैकल्पिक बाजार दिया। इससे चीनी की अधिकता को नियंत्रित करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिला और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद मिली। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार उत्पादन के अनुमान और घरेलू जरूरतों को देखते हुए समय-समय पर एथेनॉल डायवर्जन तथा चीनी निर्यात से जुड़े फैसले ले सकती है।

    बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने मौजूदा स्थिति में गुणवत्तापूर्ण गन्ने के उत्पादन और चीनी रिकवरी को महत्वपूर्ण कारक बताया। उनके अनुसार उत्तर भारत में इस समय गन्ना पेराई का अपेक्षाकृत कमजोर दौर चल रहा है। मुख्य पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ने की संभावना है, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

    गन्ने की फसल अवधि और रिकवरी में राज्यों के बीच अंतर भी चीनी उत्पादन को प्रभावित करता है। उत्तर भारत में किसान सामान्यतः करीब 10 से 11 महीने में तैयार होने वाली फसल लेते हैं, जबकि महाराष्ट्र में गन्ना लगभग 13 से 14 महीने और तमिलनाडु में कुछ परिस्थितियों में 18 महीने तक खेत में रहता है। लंबी अवधि से गन्ने में चीनी संचय और रिकवरी बेहतर हो सकती है।

    डॉ. हरिओम के अनुसार उत्तर भारत में किसान धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करने के साथ गेहूं, सरसों, मसूर, चना और सब्जियों जैसी अंतरवर्ती फसलों का विकल्प अपना सकते हैं। इससे अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ सकते हैं और गन्ने की खेती की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में सुधार की संभावना बन सकती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए केवल एथेनॉल डायवर्जन पर ध्यान देने के बजाय गन्ने के उत्पादन, रिकवरी, पेराई चक्र और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को भी समान रूप से देखना जरूरी है।

  • आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार अधिकृत डीलर बैंकों ने केंद्रीय बैंक की विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत 21 अगस्त 2026 तक कुल 72.848 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है। इसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा गैर-निवासी बैंक यानी एफसीएनआर(बी) जमा के जरिए आया है। इस माध्यम से बैंकों ने 65.397 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है।

    आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक विशेष स्वैप सुविधा के तहत बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी और विदेशी मुद्रा उधारी ओएफसीबी के माध्यम से भी 7.451 अरब डॉलर की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है। इस तरह दोनों माध्यमों से आने वाला कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह 72.848 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

    केंद्रीय बैंक ने 8 जून 2026 को एफसीएनआर(बी) जमा, ईसीबी और ओएफसीबी से आने वाली विदेशी मुद्रा के लिए विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य घरेलू वित्तीय प्रणाली में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाना और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को कम करना था।

    योजना के तहत एफसीएनआर(बी) जमा के लिए सुविधा 31 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ईसीबी और ओएफसीबी से जुड़ी स्वैप सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। आरबीआई ने पहले एफसीएनआर(बी) योजना की अंतिम तारीख 30 सितंबर निर्धारित की थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 31 अगस्त कर दिया गया।

    केंद्रीय बैंक ने समयसीमा में बदलाव का कारण योजना को मिली बेहतर प्रतिक्रिया और विदेशी मुद्रा जुटाने की तेज गति को बताया था। बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए एफसीएनआर(बी) खातों पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की, जिससे इस योजना के तहत डॉलर प्रवाह को गति मिली।

    एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि एफसीएनआर(बी) योजना के तहत निर्धारित विदेशी मुद्रा जुटाने का लक्ष्य काफी हद तक पहले ही हासिल हो चुका है। रिपोर्ट में यह संभावना भी जताई गई थी कि अगस्त के बाकी दिनों में 25 से 30 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह आ सकता है। ऐसे में कुल विदेशी मुद्रा संग्रह लगभग 85 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक स्वैप सुविधा की लागत को भी बड़ी बाधा नहीं माना गया है। अनुमान के अनुसार योजना की कुल लागत करीब 10.5 अरब डॉलर या जुटाई गई कुल राशि का लगभग 15 प्रतिशत हो सकती है। हालांकि इस लागत को देश के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी हाल के सप्ताहों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 14 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 9.905 अरब डॉलर बढ़कर 716.90 अरब डॉलर हो गया। इससे पिछले सप्ताह भी भंडार में 14.1 अरब डॉलर की वृद्धि हुई थी।

    एफसीएनआर(बी) योजना के जरिए आई विदेशी मुद्रा ने बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति को मजबूत करने के साथ रुपये को भी सहारा दिया है। इसके अलावा बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार से भारत की बाहरी आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता बेहतर होती है। आने वाले दिनों में एफसीएनआर(बी) योजना के तहत होने वाली अतिरिक्त जमा और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

  • Tesla समेत 11 कंपनियों की 40 लाख से ज्यादा कारें रिकॉल, दरवाजे की सुरक्षा पर बड़ा सवाल; जानें पूरा मामला

    Tesla समेत 11 कंपनियों की 40 लाख से ज्यादा कारें रिकॉल, दरवाजे की सुरक्षा पर बड़ा सवाल; जानें पूरा मामला


    नई दिल्ली। चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की सुरक्षा को लेकर अब तक का सबसे बड़ा वाहन रिकॉल सामने आया है। Tesla समेत कई वाहन कंपनियों ने करीब 43 लाख गाड़ियों को वापस बुलाने का फैसला किया है। यह कार्रवाई मुख्य रूप से ऐसे दरवाजों के इमरजेंसी मैकेनिकल रिलीज सिस्टम को लेकर की गई है जिन्हें गंभीर दुर्घटना या इलेक्ट्रिकल सिस्टम फेल होने की स्थिति में पहचानना या इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है। चीन के नियामकों के मुताबिक ऐसी स्थिति में यात्रियों को कार से बाहर निकलने में परेशानी हो सकती है और बचाव दल के लिए भी वाहन के अंदर पहुंचना मुश्किल हो सकता है।

    इस बड़े रिकॉल में सबसे ज्यादा प्रभावित Tesla है। कंपनी करीब 29.8 लाख चीन में निर्मित और आयातित इलेक्ट्रिक वाहनों को वापस बुला रही है। इनमें Model 3 Model Y Model X और Model S शामिल हैं। चीन के स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन फॉर मार्केट रेगुलेशन के मुताबिक प्रभावित वाहनों में इमरजेंसी मैकेनिकल डोर रिलीज हैंडल को लेकर चिंता सामने आई है। Tesla इस समस्या को कम करने के लिए चेतावनी लेबल और ओवर द एयर यानी OTA सॉफ्टवेयर अपडेट का इस्तेमाल करेगी। अपडेट के जरिए दुर्घटना के बाद वाहन की खिड़कियों को नीचे करने की रणनीति में भी सुधार किया जाएगा।

    दरअसल Tesla समेत कई इलेक्ट्रिक कार कंपनियां ऐसे फ्लश या छिपे हुए डोर हैंडल का इस्तेमाल करती हैं जो कार के डिजाइन को आधुनिक और आकर्षक बनाते हैं। सामान्य स्थिति में ये हैंडल इलेक्ट्रॉनिक तरीके से बाहर आते हैं और दरवाजा खोलने में मदद करते हैं। समस्या तब पैदा हो सकती है जब किसी गंभीर टक्कर के बाद वाहन की बिजली व्यवस्था प्रभावित हो जाए। ऐसे समय में यात्रियों को इमरजेंसी मैकेनिकल रिलीज का इस्तेमाल करना पड़ सकता है लेकिन अगर उसका स्थान आसानी से समझ न आए तो बाहर निकलने में देरी हो सकती है।

    Tesla अकेली कंपनी नहीं है जिसे इस कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। Xiaomi करीब 3.9 लाख वाहनों को रिकॉल कर रही है जबकि Leapmotor के करीब 3.71 लाख वाहन इस अभियान में शामिल हैं। Xpeng भी करीब 2.65 लाख वाहनों को रिकॉल कर रही है। इसके अलावा Geely और उसकी Zeekr ब्रांड समेत कई अन्य चीनी वाहन कंपनियों ने भी अलग-अलग संख्या में गाड़ियों के लिए रिकॉल की घोषणा की है। कुल मिलाकर चीन में यह अभियान कई वाहन निर्माताओं तक फैला हुआ है।

    Xiaomi के मामले में करीब 3.90 लाख SU7 वाहनों को शामिल किया गया है। कंपनी चेतावनी लेबल लगाने के साथ OTA अपडेट के जरिए दरवाजे खोलने की प्रक्रिया और दुर्घटना के बाद खिड़कियों के नीचे आने वाली व्यवस्था को बेहतर करेगी। Leapmotor ने C11 और C01 मॉडल की करीब 3.71 लाख गाड़ियों को रिकॉल किया है। Xpeng के करीब 2.65 लाख वाहन भी इस कार्रवाई में शामिल हैं। कई दूसरी कंपनियां भी इमरजेंसी रिलीज सिस्टम को ज्यादा आसानी से पहचानने योग्य बनाने के लिए चेतावनी लेबल या दूसरे तकनीकी बदलाव कर रही हैं।

    इस पूरे मामले का एक बड़ा पहलू चीन के बदलते वाहन सुरक्षा नियम भी हैं। चीन ने छिपे हुए डोर हैंडल को लेकर पहले ही सख्ती बढ़ा दी है। नए नियमों के तहत 2027 से नए वाहनों में पूरी तरह छिपे या इलेक्ट्रॉनिक डोर हैंडल के इस्तेमाल पर रोक की दिशा में कदम उठाया गया है। इसका उद्देश्य दुर्घटना के बाद यात्रियों के लिए दरवाजे खोलने की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और आसान बनाना है।

    इस रिकॉल से यह सवाल भी सामने आया है कि कारों में आधुनिक डिजाइन और तकनीक के साथ इमरजेंसी सुरक्षा को कितनी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। फिलहाल चीन की कार्रवाई का उद्देश्य प्रभावित वाहनों में चेतावनी और सॉफ्टवेयर स्तर पर सुधार करना है। अमेरिका में भी ऐसे डोर हैंडल से जुड़े जोखिमों की समीक्षा हो रही है लेकिन वहां अभी इसी तरह के व्यापक रिकॉल का आदेश नहीं दिया गया है।

  • बिना जानकारी शेयर बाजार में न लगाएं पैसा, निवेश शुरू करने से पहले इन जरूरी नियमों को जरूर समझें

    बिना जानकारी शेयर बाजार में न लगाएं पैसा, निवेश शुरू करने से पहले इन जरूरी नियमों को जरूर समझें

    नई दिल्ली । शेयर बाजार में निवेश आज के समय में पैसे को लंबे समय में बढ़ाने का एक विकल्प माना जाता है लेकिन इसमें मिलने वाला रिटर्न निश्चित नहीं होता और बाजार में उतार चढ़ाव के कारण नुकसान की संभावना भी बनी रहती है। इसलिए शेयर मार्केट में कदम रखने से पहले निवेशक को बाजार की बुनियादी जानकारी समझना और अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार रणनीति बनाना जरूरी है। खासकर नए निवेशकों के लिए केवल किसी दोस्त की सलाह सोशल मीडिया की पोस्ट या तेजी से मुनाफे के वादे के आधार पर शेयर खरीदना जोखिम भरा हो सकता है।

    शेयर बाजार में निवेश शुरू करने के लिए सबसे पहले डीमैट और ट्रेडिंग अकाउंट की जरूरत होती है। इसके लिए निवेशक को किसी पंजीकृत ब्रोकर के माध्यम से अकाउंट खोलना होता है। डीमैट अकाउंट में खरीदे गए शेयर इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखे जाते हैं जबकि ट्रेडिंग अकाउंट के जरिए शेयरों की खरीद और बिक्री की जाती है। अकाउंट खोलने से पहले ब्रोकरेज चार्ज अन्य शुल्क और संबंधित सुविधाओं को समझ लेना चाहिए।

    निवेश की शुरुआत हमेशा अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार करनी चाहिए। ऐसा पैसा शेयर बाजार में नहीं लगाना चाहिए जिसकी जरूरत निकट भविष्य में पड़ने वाली हो। पहले इमरजेंसी फंड और जरूरी खर्चों की व्यवस्था करना बेहतर माना जाता है। इसके बाद अपनी जोखिम उठाने की क्षमता और निवेश की अवधि तय करनी चाहिए। लंबे समय के लिए निवेश करने वाले व्यक्ति और कुछ महीनों के लिए ट्रेडिंग करने वाले निवेशक की रणनीति अलग होती है।

    किसी कंपनी के शेयर खरीदने से पहले उसके कारोबार और वित्तीय स्थिति को समझना बेहद जरूरी है। कंपनी का कारोबार किस क्षेत्र में है उसकी आय और मुनाफा कैसा है उस पर कितना कर्ज है और भविष्य में उसके सामने कौन से अवसर और चुनौतियां हैं जैसी बातों पर ध्यान देना चाहिए। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट और आधिकारिक वित्तीय जानकारी को समझना सोशल मीडिया की अफवाहों पर भरोसा करने से कहीं बेहतर तरीका है।

    नए निवेशकों के लिए एक ही कंपनी में अपनी पूरी रकम लगाने से बचना भी महत्वपूर्ण है। अलग अलग कंपनियों और क्षेत्रों में निवेश फैलाने से किसी एक शेयर के खराब प्रदर्शन का पूरे पोर्टफोलियो पर असर कुछ हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि विविधीकरण भी नुकसान की गारंटी नहीं देता। बाजार में निवेश करते समय जोखिम हमेशा बना रहता है।

    शेयर बाजार में धैर्य भी बेहद महत्वपूर्ण है। बाजार में कभी तेजी तो कभी गिरावट आती है और छोटी अवधि के उतार चढ़ाव देखकर घबराकर फैसला लेना नुकसानदायक हो सकता है। निवेशक को अपने तय लक्ष्य और निवेश अवधि के अनुसार समय समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करनी चाहिए। अगर किसी शेयर को खरीदने की वजह बदल गई है तो उसके प्रदर्शन और भविष्य की संभावनाओं पर दोबारा विचार करना जरूरी है।

    निवेशकों को गारंटीड रिटर्न के दावों से सावधान रहना चाहिए। शेयर बाजार में कोई भी व्यक्ति निश्चित और बिना जोखिम वाले मुनाफे की गारंटी नहीं दे सकता। ट्रेडिंग खासकर इंट्राडे और डेरिवेटिव्स में जोखिम काफी अधिक हो सकता है इसलिए शुरुआती निवेशकों को बिना पर्याप्त जानकारी और अनुभव के ऐसे विकल्पों में पैसा लगाने से बचना चाहिए।

    कुल मिलाकर शेयर बाजार में सफल निवेश का आधार जल्दी पैसा कमाना नहीं बल्कि सही जानकारी अनुशासन जोखिम प्रबंधन और लंबी अवधि की सोच है। निवेश करने से पहले अपने वित्तीय लक्ष्य तय करें जोखिम समझें और जरूरत पड़ने पर सेबी पंजीकृत निवेश सलाहकार से सलाह लें। किसी भी निवेश का फैसला अपनी परिस्थितियों के अनुसार सोच समझकर लेना चाहिए।

  • Gold Silver Price Today: 22 अगस्त को सोने-चांदी के दाम ने बदली करवट, खरीदारी से पहले जान लें कीमतों का हाल

    Gold Silver Price Today: 22 अगस्त को सोने-चांदी के दाम ने बदली करवट, खरीदारी से पहले जान लें कीमतों का हाल

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों पर नजर रखने वाले लोगों के लिए 22 अगस्त का दिन अहम है। घरेलू सर्राफा बाजार में कीमती धातुओं की कीमतें कई कारकों के असर से बदलती रहती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी की चाल से लेकर डॉलर की स्थिति कच्चे तेल की कीमतें वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और निवेशकों की खरीदारी तक इन धातुओं के भाव को प्रभावित करती है। ऐसे में अगर आप आज सोना या चांदी खरीदने की तैयारी कर रहे हैं तो केवल एक दिन के भाव को देखकर फैसला करने के बजाय बाजार की मौजूदा दिशा को समझना जरूरी है।

    सोने की कीमतों में तेजी या गिरावट का सीधा असर आभूषण खरीदने वालों के बजट पर पड़ता है। खासकर शादी विवाह या किसी बड़े पारिवारिक आयोजन के लिए सोना खरीदने वाले लोग कीमत में मामूली बदलाव को भी गंभीरता से लेते हैं। 24 कैरेट सोना सबसे शुद्ध माना जाता है जबकि आभूषणों के लिए आम तौर पर 22 कैरेट सोने का इस्तेमाल अधिक किया जाता है। इसलिए बाजार में सोने का भाव जानने के साथ यह भी देखना जरूरी है कि कीमत किस कैरेट के सोने की बताई जा रही है।

    चांदी की बात करें तो इसकी कीमत भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार के रुख पर निर्भर करती है। चांदी को केवल आभूषणों और पारंपरिक खरीदारी तक सीमित नहीं माना जाता बल्कि इसका इस्तेमाल औद्योगिक क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर होता है। इलेक्ट्रॉनिक्स सोलर पैनल और कई तकनीकी उत्पादों में चांदी की मांग बनी रहती है। यही वजह है कि वैश्विक औद्योगिक मांग में बदलाव का असर भी चांदी की कीमत पर दिखाई दे सकता है। निवेशकों की गतिविधियां बढ़ने पर चांदी में तेज उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

    22 अगस्त को सोने और चांदी की खरीदारी करने वालों को एक और महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी चाहिए। बाजार में बताए जाने वाले सोने के भाव में कई बार मेकिंग चार्ज जीएसटी और अन्य शुल्क शामिल नहीं होते हैं। इसलिए यदि आप आभूषण खरीद रहे हैं तो दुकान पर मिलने वाली अंतिम कीमत बाजार भाव से अलग हो सकती है। अलग अलग शहरों और ज्वेलर्स के बीच भी कीमतों में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है। इसी कारण खरीदारी से पहले स्थानीय सर्राफा बाजार में उसी दिन का ताजा रेट और बिल में लगने वाले सभी शुल्क जरूर जांचें।

    वर्तमान वैश्विक माहौल में निवेशकों की नजर अमेरिकी ब्याज दरों डॉलर की चाल और दुनिया की आर्थिक अनिश्चितताओं पर भी बनी हुई है। जब बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है तो सोने को अक्सर सुरक्षित निवेश विकल्प के तौर पर देखा जाता है। इससे सोने की मांग बढ़ सकती है। वहीं चांदी में निवेश का रुख औद्योगिक मांग और निवेश दोनों से प्रभावित होता है।

    अगर आप सोना या चांदी निवेश के उद्देश्य से खरीदना चाहते हैं तो केवल तेजी देखकर जल्दबाजी में बड़ी रकम लगाने से बचना बेहतर है। कीमतों में कभी भी बदलाव हो सकता है। जरूरत और बजट के अनुसार खरीदारी करना और शुद्धता तथा बिल की पूरी जानकारी लेना जरूरी है। सोने में हॉलमार्क और चांदी में शुद्धता की जांच जरूर करें। 22 अगस्त के भाव को देखते हुए खरीदारी करने से पहले अपने शहर के ताजा रेट की पुष्टि करना सबसे सुरक्षित तरीका रहेगा।

  • क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    नई दिल्ली । पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता एक बार फिर बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिला है। 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 2.4 फीसदी की तेजी के साथ 93.78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 24 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत में भी करीब 2.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। कच्चे तेल की इस तेजी ने भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए ईंधन की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ने वाले हैं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड लंबे समय तक महंगा बना रहा तो घरेलू कीमतों पर असर पड़ने की संभावना जरूर बढ़ सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं मजबूत हुई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के समर्थन वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। तेल बाजार में किसी बड़े उत्पादक क्षेत्र से सप्लाई बाधित होने की आशंका पैदा होते ही कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। यही स्थिति अभी दिखाई दे रही है।

    इस पूरे मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद ज्यादा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही होती है। अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और इस मार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों पर पड़ सकता है।

    भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स डीलर कमीशन तेल कंपनियों की लागत और मार्जिन तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए क्रूड में तेजी आने के साथ ही अगले दिन पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो क्या होगा। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर क्रूड की कीमतें और ऊपर जाती हैं तथा रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात लागत पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। इसका असर पेट्रोल और डीजल के साथ परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है।

    ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सब्जियों खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। उद्योगों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्रूड की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू कीमतों को लेकर क्या फैसला करती हैं।

    फिलहाल सबसे बड़ी निगाह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति पर बनी हुई है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन अगर आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ता है तो क्रूड में और तेजी संभव है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईंधन की कीमत निश्चित रूप से बढ़ने वाली है लेकिन महंगे क्रूड ने सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों के सामने जरूर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

  • ईडी के 715 करोड़ रुपये मामले में रिलायंस पावर को नोटिस, नकारात्मक खबर के बीच शेयर पांच फीसदी से ज्यादा चढ़े

    ईडी के 715 करोड़ रुपये मामले में रिलायंस पावर को नोटिस, नकारात्मक खबर के बीच शेयर पांच फीसदी से ज्यादा चढ़े

    नई दिल्ली । अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस पावर के शेयरों में शुक्रवार को तेज उछाल देखने को मिला। कंपनी को करीब 715 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नोटिस मिलने की जानकारी सामने आने के बावजूद कारोबार के दौरान शेयर 5.55 प्रतिशत से अधिक चढ़कर 23.38 रुपये तक पहुंच गया। इस तेजी ने बाजार में निवेशकों के रुख को लेकर भी चर्चा बढ़ा दी है।

    रिलायंस पावर और उसकी सहायक कंपनी रिलायंस क्लीनजेन लिमिटेड को नई दिल्ली स्थित विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश की ओर से प्री-कॉग्निजेंस नोटिस मिला है। यह नोटिस प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत के आधार पर जारी किया गया है। मामला रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड और उससे जुड़े अन्य पक्षों से संबंधित बताया गया है।

    प्रवर्तन निदेशालय ने करीब 715 करोड़ रुपये की कथित रकम से जुड़े मामले में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत शिकायत दर्ज की है। इसमें अधिनियम की धारा 3 और 4 का उल्लेख किया गया है। शिकायत में रिलायंस पावर और उसकी सहायक कंपनी का नाम संभावित आरोपियों के रूप में शामिल किए जाने की जानकारी कंपनी की ओर से दी गई है।

    नोटिस की खबर सामान्य तौर पर कंपनी के लिए नकारात्मक मानी जा सकती है, लेकिन शुक्रवार को शेयर बाजार में इसका तत्काल असर अलग दिखाई दिया। रिलायंस पावर के शेयरों में खरीदारी बढ़ी और कीमत 23.38 रुपये तक पहुंच गई। हालांकि शेयर की मौजूदा स्थिति को केवल एक कारोबारी सत्र की तेजी से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि पिछले कुछ समय में स्टॉक में काफी उतार-चढ़ाव रहा है।

    कंपनी के शेयरों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो छह महीने की अवधि में इसमें करीब 9.73 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। एक साल के दौरान शेयर करीब 53 प्रतिशत टूट चुका है। हालांकि पांच साल की अवधि में स्टॉक ने लगभग 131.49 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। इससे कंपनी के शेयर में लंबी अवधि और छोटी अवधि के प्रदर्शन के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

    शुक्रवार को कारोबार के दौरान रिलायंस पावर का बाजार पूंजीकरण करीब 9,574 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। कंपनी के शेयर का 52 सप्ताह का उच्च स्तर 50.90 रुपये और निचला स्तर 20.23 रुपये बताया गया है। मौजूदा भाव इन दोनों स्तरों के बीच कारोबार कर रहा है।

    रिलायंस पावर मुख्य रूप से बिजली उत्पादन से जुड़ी कंपनी है। इसे भारत और विदेशों में बिजली परियोजनाओं के विकास, निर्माण और संचालन के लिए स्थापित किया गया था। कंपनी के पास बिजली उत्पादन से संबंधित परियोजनाओं का पोर्टफोलियो है, जिसमें चालू और निर्माणाधीन परियोजनाएं शामिल हैं। इन परियोजनाओं का संचालन कंपनी सीधे या अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से करती है।

    715 करोड़ रुपये के मामले में जारी नोटिस अब कंपनी के लिए कानूनी और कारोबारी दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हालांकि नोटिस मिलना अपने आप में आरोपों का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाता। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया के दौरान संबंधित पक्षों का पक्ष और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया जाएगा।

    इस बीच शेयरों में आई तेजी यह दिखाती है कि बाजार में किसी खबर पर तत्काल प्रतिक्रिया हमेशा उसी दिशा में नहीं होती, जिस दिशा में खबर को सामान्य तौर पर देखा जाता है। रिलायंस पावर के मामले में भी कानूनी खबर के बीच शेयरों में खरीदारी देखने को मिली है, जबकि निवेशकों के लिए कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और आगे की कानूनी प्रक्रिया दोनों पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा।