Category: Economy

  • पेट्रोल पर विंडफॉल टैक्स हुआ शून्य ….., डीजल और एटीएफ पर भी राहत…. आमजन को No Relief

    पेट्रोल पर विंडफॉल टैक्स हुआ शून्य ….., डीजल और एटीएफ पर भी राहत…. आमजन को No Relief


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार (Government of India) ने शनिवार से पेट्रोल, डीजल (Petrol, Diesel) और हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले तेल एविएशन टर्बाइन फ्यूल (Aviation Turbine Fuel) यानी ATF के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स (Windfall tax) को कम कर दिया है। यह जानकारी सरकार के एक आधिकारिक आदेश से मिली है। इस आदेश के अनुसार, डीजल निर्यात पर शुल्क को घटाकर 25.5 रुपये प्रति लीटर से 24 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। वहीं, पेट्रोल निर्यात पर पहले 3.5 रुपये प्रति लीटर शुल्क लगता था, अब इसे पूरी तरह से शून्य कर दिया गया है। एटीएफ के निर्यात पर भी शुल्क में कमी की गई है, जो 22 रुपये से घटकर 19.5 रुपये प्रति लीटर हो गया है।


    आपकी जेब पर क्या पड़ेगा असर

    टैक्स में इस कमी से आम जनता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस कटौती से निर्यातक कंपनियों को थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, हालांकि सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियों पर नजर बनाए हुए है और आने वाले दिनों में भी संशोधन जारी रह सकते हैं।

    गौरतलब है कि भारत ने जुलाई 2022 में पहली बार विंडफॉल टैक्स लागू किया था, ताकि तेल की बढ़ती कीमतों से होने वाले असाधारण मुनाफे पर नियंत्रण पाया जा सके। दो साल बाद इसे समाप्त कर दिया गया था, लेकिन मार्च 2026 में अमेरिका-इजराइल युद्ध के कारण ईरान पर हमले के बाद तेल की कीमतें फिर से बढ़ गईं, जिसके चलते इस कर को दोबारा लागू करना पड़ा।

    अभी भारत हर दो सप्ताह में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर इन निर्यात शुल्कों में संशोधन करता है। लेटेस्ट रेट के अनुसार, 1 अमेरिकी डॉलर लगभग 95.44 भारतीय रुपये के बराबर है।


    पिछली बार बढ़ा था विंडफॉल टैक्स

    पिछली बार 3 अगस्त को पेट्रोल निर्यात पर शुल्क 2.5 रुपये से बढ़ाकर 3.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था। डीजल निर्यात पर विंडफॉल टैक्स 15.5 रुपये से बढ़कर 25.5 रुपये प्रति लीटर हो गया था। इसमें लगभग 10 रुपये की भारी बढ़ोतरी की गई। वहीं, एटीएफ के निर्यात पर शुल्क 14.5 रुपये से बढ़ाकर 22 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था।


    जुलाई में डीजल-एटीएफ पर टैक्स बढ़ा, पेट्रोल का घटा

    गौरतलब है कि इससे पहले 16 जुलाई को हुई समीक्षा में सरकार ने डीजल और एटीएफ के शुल्क बढ़ाए थे, जबकि पेट्रोल पर शुल्क घटाया था। उस समय डीजल 8.5 से बढ़कर 15.5 रुपये, एटीएफ 7.5 से बढ़कर 14.5 रुपये, और पेट्रोल 4 रुपये से घटकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था। इससे पहले की समीक्षा में पेट्रोल पर शुल्क 1.5 से बढ़ाकर 4 रुपये, डीजल 14 से घटाकर 8.5 रुपये और एटीएफ 12.5 से घटाकर 7.5 रुपये किया गया था।


    अप्रैल का क्या रहा हाल

    अगर हालिया बदलावों पर नजर डालें तो 30 अप्रैल को डीजल पर 23 रुपये और एटीएफ पर 33 रुपये का शुल्क लगाया गया था, जबकि पेट्रोल पर शून्य था। वहीं, 30 जून को पेट्रोल पर 4 रुपये, डीजल पर 8.5 रुपये और एटीएफ पर 7.5 रुपये का शुल्क निर्धारित किया गया था।

  • आरबीआई के नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 50 अरब डॉलर तक पूंजी आने की संभावना, रिपोर्ट में बड़ा अनुमान

    आरबीआई के नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 50 अरब डॉलर तक पूंजी आने की संभावना, रिपोर्ट में बड़ा अनुमान


    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से हाल के महीनों में किए गए तरलता समर्थन उपायों और नियामकीय सुधारों से देश के बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पूंजी प्रवाह की संभावना जताई गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इन पहलों के चलते भारतीय बैंकिंग प्रणाली में करीब 50 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त पूंजी आ सकती है। इससे बैंकों की पूंजीगत स्थिति मजबूत होने के साथ विदेशी मुद्रा तरलता में भी सुधार की उम्मीद है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई की एफसीएनआर बी जमा योजना के तहत भारतीय बैंक अब तक 36.7 अरब डॉलर जुटा चुके हैं। उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, विशेष सुविधा की निर्धारित समयसीमा समाप्त होने से पहले यह राशि बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। इससे बैंकों को विदेशी मुद्रा संसाधनों का अतिरिक्त आधार मिलेगा और वित्तीय प्रणाली की मजबूती बढ़ सकती है।

    भारतीय बैंकिंग क्षेत्र फिलहाल व्यापक नियामकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आरबीआई ने तरलता प्रबंधन, ऋण जोखिम, पूंजी पर्याप्तता, ग्राहक संरक्षण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से जुड़े गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में सुधारों को आगे बढ़ाया है। इनका उद्देश्य बैंकिंग व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, मजबूत और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना है।

    विदेशी मुद्रा जमा को बढ़ावा देने के लिए एफसीएनआर बी स्वैप सुविधा और अनिवासी भारतीयों की जमा दरों से संबंधित अस्थायी सीमा हटाने जैसे कदम भी उठाए गए हैं। इन उपायों से विदेशी जमाकर्ताओं के लिए भारतीय बैंकों में जमा करना अधिक आकर्षक हुआ है। साथ ही हेजिंग लागत में कमी आने से बैंकों को विदेशी मुद्रा संसाधन जुटाने में मदद मिली है।

    बैंकिंग क्षेत्र में हो रहे बदलाव केवल पूंजी जुटाने तक सीमित नहीं हैं। नियामकीय ढांचे में ऋण जोखिम और पूंजी प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जा रहे हैं। अपेक्षित क्रेडिट नुकसान यानी ईसीएल ढांचे और संशोधित बेसल तीन क्रेडिट रिस्क मानदंडों की दिशा में बढ़ना बैंकिंग क्षेत्र के लिए अहम बदलाव माना जा रहा है।

    इन प्रावधानों का असर बैंकों की ऋण मूल्य निर्धारण रणनीति पर पड़ सकता है। बैंकों को यह आकलन करना होगा कि किसी ऋण के लिए कितनी पूंजी रखी जाए, जोखिम के अनुरूप ब्याज दर कैसे तय की जाए और अलग-अलग पोर्टफोलियो में जोखिम का प्रबंधन किस तरह किया जाए। इससे बैंकिंग कारोबार की लागत, पूंजी आवंटन और लाभप्रदता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    तकनीकी क्षेत्र में भी नियामकीय अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। एआई गवर्नेंस से जुड़े नियमों का उद्देश्य बैंकों में नई तकनीकों के इस्तेमाल के दौरान जोखिम, पारदर्शिता और ग्राहक हितों को सुरक्षित रखना है। आने वाले समय में वे बैंक अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकते हैं जो पूंजी नियोजन, जोखिम प्रबंधन और तकनीकी गवर्नेंस में तेजी से बदलाव लागू करेंगे।

    आरबीआई के कदमों का असर भारत के बाहरी क्षेत्र पर भी दिखाई देने की संभावना जताई गई है। एक अन्य अनुमान के अनुसार, देश का पूंजी खाता अधिशेष बढ़कर करीब 108 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा लगभग 2 अरब डॉलर रहा था।

    भुगतान संतुलन को लेकर भी सकारात्मक अनुमान सामने आया है। वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का भुगतान संतुलन करीब 64 अरब डॉलर के अधिशेष में रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।

    यदि विदेशी मुद्रा प्रवाह और बैंकिंग क्षेत्र की पूंजी स्थिति में अपेक्षित सुधार होता है, तो इससे वित्तीय प्रणाली की स्थिरता को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, नियामकीय बदलावों का वास्तविक प्रभाव बैंकों की तैयारी, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और घरेलू ऋण मांग सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।

  • घरेलू रसोई गैस की कीमतों में आज कोई बदलाव नहीं, देशभर में उपभोक्ताओं को फिलहाल नहीं मिली बढ़ोतरी से राहत

    घरेलू रसोई गैस की कीमतों में आज कोई बदलाव नहीं, देशभर में उपभोक्ताओं को फिलहाल नहीं मिली बढ़ोतरी से राहत


    नई दिल्ली ।
    देशभर में रसोई गैस सिलेंडर इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं के लिए 14 अगस्त को राहत की खबर है। सरकारी तेल कंपनियों ने आज घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर के साथ 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर के दाम भी आज स्थिर रखे गए हैं। ऐसे में दिल्ली से पटना और मुंबई से हैदराबाद तक ग्राहकों को आज सिलेंडर के लिए वही कीमत चुकानी होगी जो पहले लागू थी।

    दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत 942 रुपये है। वहीं 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर का भाव 2,738 रुपये पर बना हुआ है। मुंबई में घरेलू सिलेंडर 941.50 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर 2,691.50 रुपये में उपलब्ध है। नोएडा में घरेलू LPG की कीमत 939.50 रुपये, जबकि कमर्शियल सिलेंडर का भाव 2,738 रुपये है।

    जयपुर में घरेलू LPG सिलेंडर के लिए 945.50 रुपये देने होंगे। यहां 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 2,765.50 रुपये है। हैदराबाद में घरेलू सिलेंडर का भाव 994 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर 2,985 रुपये है। वहीं पटना में घरेलू LPG सिलेंडर 1,031.50 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर 3,018 रुपये में मिल रहा है।

    चंडीगढ़ में 14.2 किलोग्राम घरेलू सिलेंडर की कीमत 951.50 रुपये है, जबकि 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल सिलेंडर का भाव 2,760 रुपये है। कोलकाता में घरेलू LPG सिलेंडर 968 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर 2,872.50 रुपये में उपलब्ध है। अलग-अलग शहरों में कीमतों में अंतर स्थानीय करों और अन्य लागतों के कारण देखने को मिलता है।

    महीने की शुरुआत में कमर्शियल LPG सिलेंडर के दाम में 192 रुपये की बड़ी कटौती की गई थी। इसके बाद 14 अगस्त को कीमतों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। घरेलू LPG की कीमतों को स्थिर रखने से आम परिवारों के मासिक रसोई खर्च पर फिलहाल अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ा है।

    वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बीच भारत LPG की आपूर्ति को लेकर भी अपनी रणनीति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए भारत अलग-अलग देशों से LPG आपूर्ति हासिल करने पर जोर दे रहा है। इसका उद्देश्य किसी एक क्षेत्र या आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता कम करना है।

    अमेरिका से LPG आयात भी भारत की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस वर्ष अगस्त तक अमेरिका से भारत को करीब 3.9 मिलियन टन LPG की आपूर्ति हो चुकी है। भारत 2027 के लिए अमेरिकी LPG की दीर्घकालिक आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रहा है।

    सरकारी तेल कंपनियां संभावित आपूर्तिकर्ताओं और उनके प्रस्तावों का मूल्यांकन कर रही हैं। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और LPG की कीमतों, आयात लागत तथा वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर घरेलू और कमर्शियल गैस की कीमतों में बदलाव हो सकता है। फिलहाल 14 अगस्त को देश के प्रमुख शहरों में LPG सिलेंडर के दाम स्थिर हैं और उपभोक्ताओं को किसी नई बढ़ोतरी का सामना नहीं करना पड़ रहा है।

  • सोने की कीमत में एक दिन में 2800 रुपये की बड़ी गिरावट, 24 कैरेट गोल्ड के भाव में फिर दिखा नरमी का असर

    सोने की कीमत में एक दिन में 2800 रुपये की बड़ी गिरावट, 24 कैरेट गोल्ड के भाव में फिर दिखा नरमी का असर


    नई दिल्ली ।
    सोने और चांदी की कीमतों में पिछले दिनों की तेजी के बाद अब नरमी का दौर देखने को मिल रहा है। दिल्ली के सर्राफा बाजार में 13 अगस्त को सोने के भाव में एक दिन में 2,800 रुपये प्रति 10 ग्राम की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। लगातार करीब एक सप्ताह तक तेजी रहने के बाद आई इस गिरावट ने बाजार में खरीदारी करने वाले ग्राहकों का ध्यान खींचा है। चांदी की कीमत में भी गुरुवार को भारी गिरावट दर्ज की गई और इसके भाव में करीब 6,000 रुपये प्रति किलोग्राम की कमी आई।

    गिरावट के बाद दिल्ली में 24 कैरेट सोने का भाव 1,57,000 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में इसकी कीमत 1,59,800 रुपये प्रति 10 ग्राम थी। इस तरह एक ही दिन में सोने की कीमत में 2,800 रुपये की कमी आई। लगातार बढ़ रहे भाव के बीच यह गिरावट सोना खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    शुक्रवार को भी सोने की कीमतों में मामूली कमजोरी दिखाई दे रही है। उपलब्ध ताजा भाव के मुताबिक 24 कैरेट सोना 10 रुपये की गिरावट के साथ 1,53,590 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है। इससे पहले इसका भाव 1,53,600 रुपये प्रति 10 ग्राम था। हालांकि एक दिन पहले की बड़ी गिरावट की तुलना में शुक्रवार की कमी काफी मामूली है।

    22 कैरेट सोने की कीमत भी 10 रुपये नीचे आई है। शुक्रवार को 22 कैरेट सोना 1,40,790 रुपये प्रति 10 ग्राम के भाव पर दर्ज किया गया। वहीं 18 कैरेट सोने की कीमत 1,15,190 रुपये प्रति 10 ग्राम है। इसमें भी पिछले कारोबारी भाव की तुलना में 10 रुपये की मामूली गिरावट दर्ज की गई है।

    सोने के साथ चांदी के भाव में भी नरमी बनी हुई है। शुक्रवार को चांदी की कीमत 10 रुपये प्रति किलोग्राम की मामूली गिरावट के साथ 2,54,900 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई है। इससे पिछले कारोबारी सत्र में चांदी 2,55,000 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर थी। यानी एक दिन में मामूली कमी के बावजूद चांदी अब भी काफी ऊंचे भाव पर कारोबार कर रही है।

    वर्तमान भाव के हिसाब से चांदी की कीमत प्रति ग्राम 254.90 रुपये है। वहीं 8 ग्राम चांदी की कीमत 2,039.20 रुपये और 10 ग्राम का भाव 2,549 रुपये है। 100 ग्राम चांदी खरीदने पर इसकी कीमत करीब 25,490 रुपये बैठती है। इन कीमतों में स्थानीय बाजार, टैक्स, मेकिंग चार्ज और अन्य शुल्क के कारण वास्तविक खरीद मूल्य अलग हो सकता है।

    सोने की कीमतों में अचानक आई बड़ी गिरावट के बाद अब बाजार की नजर आगे के कारोबार पर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की चाल, डॉलर की स्थिति, निवेशकों की मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में लगातार तेजी के बाद आई यह नरमी ग्राहकों को कुछ राहत दे सकती है, लेकिन खरीदारी से पहले स्थानीय बाजार का ताजा भाव और लागू शुल्क जरूर जांचना जरूरी है।

  • भारत में वित्त वर्ष 2027 में 95 अरब डॉलर तक आ सकता है पूंजी प्रवाह, मजबूत एफसीएनआर निवेश से भुगतान संतुलन होगा बेहतर

    भारत में वित्त वर्ष 2027 में 95 अरब डॉलर तक आ सकता है पूंजी प्रवाह, मजबूत एफसीएनआर निवेश से भुगतान संतुलन होगा बेहतर

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में बाहरी वित्तीय मोर्चे पर राहत की उम्मीद बढ़ गई है। मजबूत फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक यानी एफसीएनआर (बी) जमा प्रवाह और भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए किए गए नीतिगत उपायों के चलते देश में 90 से 95 अरब डॉलर तक पूंजी प्रवाह आने का अनुमान है। इससे भारत की बाहरी स्थिति मजबूत होने के साथ भुगतान संतुलन में भी उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

    एक आकलन के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भारत का भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट्स करीब 64 अरब डॉलर के अधिशेष में रह सकता है। यह अनुमान पिछले वर्षों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2026 में भारत का भुगतान संतुलन 23.6 अरब डॉलर के अधिशेष में रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2025 में करीब 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।

    अनुमान के मुताबिक एफसीएनआर (बी) के जरिए करीब 80 अरब डॉलर का प्रवाह हो सकता है। इसके अलावा बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा में बाहरी स्रोतों से मिलने वाली पूंजी से 10 से 15 अरब डॉलर अतिरिक्त आने की संभावना है। इन दोनों माध्यमों से आने वाले धन से देश के पूंजी खाते की स्थिति में भी बड़ा सुधार होने की उम्मीद है।

    पूंजी खाते का अधिशेष वित्त वर्ष 2027 में करीब 108 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2026 में यह केवल लगभग 2 अरब डॉलर रहा था। यदि यह अनुमान वास्तविक प्रवाह में बदलता है तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय स्थिरता और बाहरी भुगतान क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

    विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए जून 2026 में घोषित नीतिगत उपायों का शुरुआती असर भी दिखाई दे रहा है। एफसीएनआर (बी) जमा, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा में बाहरी उधारी के लिए रियायती स्वैप व्यवस्था शुरू किए जाने के बाद विदेशी निवेशकों और बैंकों की ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

    5 जून से 31 जुलाई 2026 के बीच इन उपायों के माध्यम से कुल 40.8 अरब डॉलर की पूंजी आकर्षित होने का अनुमान है। इसमें एफसीएनआर (बी) जमा का हिस्सा 36.7 अरब डॉलर रहा, जबकि बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा आधारित बाहरी उधारी से करीब 4.1 अरब डॉलर आए।

    एफसीएनआर जमा को आकर्षक बनाने में ब्याज दरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बड़े बैंक फिलहाल एफसीएनआर जमा पर लगभग 6 से 6.5 प्रतिशत तक ब्याज दे रहे हैं, जबकि कुछ छोटे और नए बैंक करीब 7 प्रतिशत तक की दर पेश कर रहे हैं। इससे प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा रखने वाले निवेशकों के लिए भारतीय बैंकिंग प्रणाली में धन रखने की दिलचस्पी बढ़ सकती है।

    मजबूत पूंजी प्रवाह का असर घरेलू बैंकिंग प्रणाली की तरलता पर भी पड़ने की संभावना है। जुलाई में बैंकिंग प्रणाली में औसत तरलता करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये रही थी, जो अगस्त में अब तक बढ़कर लगभग 3 लाख करोड़ रुपये हो गई है। महीने के अंत में आने वाले विदेशी पूंजी प्रवाह ने भी तरलता बढ़ाने में योगदान दिया है।

    भारत के लिए यह स्थिति ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक बाजारों में आर्थिक और वित्तीय अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। मजबूत पूंजी प्रवाह से देश को विदेशी भुगतान दायित्वों को पूरा करने में मदद मिल सकती है और वैश्विक अस्थिरता के दौरान बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि पूंजी प्रवाह का वास्तविक स्तर वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों की धारणा और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

  • Shiprocket IPO से पहले सामने आए कानूनी विवाद, कंपनी पर चार आपराधिक मामले और 5.39 करोड़ रुपये की दावा राशि लंबित

    Shiprocket IPO से पहले सामने आए कानूनी विवाद, कंपनी पर चार आपराधिक मामले और 5.39 करोड़ रुपये की दावा राशि लंबित


    नई दिल्ली । ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स और शिपिंग प्लेटफॉर्म शिपरॉकेट शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रही है। कंपनी के प्रस्तावित आईपीओ से पहले सामने आए मसौदा दस्तावेज में कई कानूनी, कर और परिचालन जोखिमों का उल्लेख किया गया है। इनमें कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों से जुड़े लंबित मामले भी शामिल हैं, जिनका संभावित असर कारोबार और वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है।

    दस्तावेज के अनुसार, शिपरॉकेट के खिलाफ चार आपराधिक मामले लंबित हैं। इन मामलों में कुल दावा राशि 5.39 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके अलावा कंपनी के खिलाफ दो अन्य आपराधिक कार्यवाहियां और सात कर विवाद भी चल रहे हैं। सहयोगी कंपनियों के स्तर पर भी एक आपराधिक मामला और तीन कर संबंधी मामले लंबित हैं, जिनमें कुल दावा राशि 2.34 करोड़ रुपये बताई गई है।

    कंपनी के सामने मौजूद मामलों में वर्ष 2022 का एक प्रमुख मामला भी शामिल है। इसमें शिपरॉकेट के सह-संस्थापक साहिल गोयल और गौतम कपूर, निदेशक अर्जुन सेठी तथा मुख्य वित्तीय अधिकारी कुमार तनमय को नामजद किया गया है। मामले में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं। यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

    वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो शिपरॉकेट अभी लाभ में नहीं आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का शुद्ध घाटा 79.2 करोड़ रुपये रहा। इससे पिछले वित्त वर्ष में घाटा 74.4 करोड़ रुपये था। हालांकि वित्त वर्ष 2023-24 में दर्ज 595.1 करोड़ रुपये के घाटे की तुलना में कंपनी की वित्तीय स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

    राजस्व के मोर्चे पर कंपनी ने लगातार वृद्धि दर्ज की है। वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन से प्राप्त आय 24 प्रतिशत बढ़कर 2024.1 करोड़ रुपये हो गई। राजस्व में यह वृद्धि कंपनी के कारोबार के विस्तार का संकेत देती है, लेकिन बढ़ती आय के बावजूद लाभप्रदता हासिल करना अभी भी प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

    कंपनी के अनुसार, व्यापारियों का आधार बढ़ाने, नए उत्पाद विकसित करने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमताओं में निवेश करने और नए कारोबारी क्षेत्रों का विस्तार करने पर खर्च निकट भविष्य में मुनाफे पर दबाव बनाए रख सकता है। ऐसे निवेश कंपनी की दीर्घकालिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके कारण तत्काल लाभ में सुधार सीमित रह सकता है।

    शिपरॉकेट की एक अन्य महत्वपूर्ण निर्भरता तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाताओं पर है। वित्त वर्ष 2025-26 में मर्चेंट सॉल्यूशन लागत कंपनी के कुल खर्च का लगभग 69.4 प्रतिशत रही। इस खर्च में शीर्ष 10 विक्रेताओं की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक थी। इससे कुछ प्रमुख सेवा प्रदाताओं पर कंपनी की निर्भरता का जोखिम सामने आता है।

    कंपनी ने यह भी बताया है कि उसके अधिकांश लॉजिस्टिक्स साझेदारों के साथ विशेष समझौते नहीं हैं। ऐसी स्थिति में किसी साझेदार के साथ कारोबारी संबंध प्रभावित होने पर सेवा व्यवस्था, लागत और परिचालन क्षमता पर असर पड़ सकता है। बढ़ती परिचालन लागत और प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्मों द्वारा बेहतर शर्तें दिए जाने की स्थिति भी कंपनी के लिए चुनौती बन सकती है।

    ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में शिपरॉकेट को मार्केटप्लेस, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और तकनीकी एग्रीगेटर्स से प्रतिस्पर्धा मिलती है। कंपनी घरेलू बाजार के साथ क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स कारोबार का विस्तार करना चाहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर अधिक हैं, लेकिन वहां नियामकीय आवश्यकताओं, लागत, संचालन और प्रतिस्पर्धा से जुड़े अतिरिक्त जोखिम भी मौजूद हैं।

    ऐसे में प्रस्तावित आईपीओ से पहले निवेशकों के लिए कंपनी की बढ़ती आय के साथ उसके घाटे, लंबित कानूनी मामलों, सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता और विस्तार संबंधी खर्चों को समझना महत्वपूर्ण होगा। कंपनी की आगे की रणनीति का मुख्य लक्ष्य कारोबार बढ़ाने के साथ लाभप्रदता और परिचालन स्थिरता हासिल करना रहेगा।

  • स्वतंत्र माइक्रोफिन के 3000 करोड़ रुपये IPO से पहले सामने आए जोखिम, असुरक्षित कर्ज और नकदी बहिर्वाह ने बढ़ाई चिंता

    स्वतंत्र माइक्रोफिन के 3000 करोड़ रुपये IPO से पहले सामने आए जोखिम, असुरक्षित कर्ज और नकदी बहिर्वाह ने बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली ।अनन्या बिरला और एंटीमैटर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रमोटेड स्वतंत्र माइक्रोफिन लिमिटेड ने 3000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के लिए मसौदा दस्तावेज दाखिल किया है। कंपनी के ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में कारोबार और संचालन से जुड़े कई जोखिमों का उल्लेख किया गया है, जिन पर संभावित निवेशकों की नजर रह सकती है।

    कंपनी के सामने सबसे प्रमुख जोखिमों में असुरक्षित माइक्रोफाइनेंस ऋणों पर अत्यधिक निर्भरता शामिल है। 31 मार्च 2026 तक स्वतंत्र माइक्रोफिन की कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों में 88.56 प्रतिशत हिस्सा असुरक्षित माइक्रोफाइनेंस ऋणों का था। ऐसे ऋणों में किसी प्रकार की आर्थिक कमजोरी आने पर वसूली से जुड़ी चुनौती बढ़ सकती है।

    स्वतंत्र माइक्रोफिन मुख्य रूप से ऐसे परिवारों को ऋण उपलब्ध कराती है, जिनकी वार्षिक आय तीन लाख रुपये तक है। कंपनी के अनुसार, इस आय वर्ग के ग्राहक रोजगार में बदलाव, आय में कमी और आर्थिक परिस्थितियों से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इससे ऋण भुगतान और वसूली पर असर पड़ने का जोखिम बना रहता है।

    कंपनी के कारोबार में नकद संग्रह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। डिजिटल माध्यमों को बढ़ावा देने के बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी के कुल संग्रह का 79.22 प्रतिशत हिस्सा नकद भुगतान से आया। कंपनी ने स्वयं माना है कि नकद लेनदेन में धोखाधड़ी, चोरी, नकदी प्रबंधन की गलतियों और धन के दुरुपयोग जैसे जोखिम हो सकते हैं।

    नकदी प्रवाह से जुड़ा आंकड़ा भी कंपनी के लिए महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन गतिविधियों में इस्तेमाल हुई शुद्ध नकदी 5392.6 करोड़ रुपये रही, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में यह 427 करोड़ रुपये थी। इस तरह परिचालन नकदी बहिर्वाह में करीब 1160 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज हुई।

    कंपनी ने इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण ऋण वितरण में तेजी और लोन बुक के विस्तार को बताया है। साथ ही, भविष्य में कारोबार और ऋण पोर्टफोलियो बढ़ने के साथ परिचालन स्तर पर नकारात्मक नकदी प्रवाह जारी रहने की संभावना से भी दस्तावेज में अवगत कराया गया है।

    भौगोलिक एकाग्रता भी कंपनी के लिए जोखिम का विषय है। कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों का करीब 68 प्रतिशत हिस्सा बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे पांच राज्यों में केंद्रित है। इन क्षेत्रों में आर्थिक, राजनीतिक या प्राकृतिक परिस्थितियों में प्रतिकूल बदलाव आने पर कंपनी के कारोबार और ऋण वसूली पर असर पड़ सकता है।

    कानूनी मोर्चे पर भी कंपनी से जुड़ी चुनौती सामने आई है। रत्नाफिन कैपिटल और रत्नाफिन एंटरप्राइज ने दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रेडमार्क और लोगो से जुड़े कथित उल्लंघन को लेकर स्वतंत्र माइक्रोफिन के खिलाफ दीवानी मुकदमा दायर किया है। याचिकाकर्ताओं ने रोक लगाने के साथ दो करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है।

    कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े जोखिम भी मसौदा दस्तावेज में दर्ज हैं। कंपनी ने बताया है कि उसके कॉरपोरेट प्रमोटर एंटीमैटर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के पास माइक्रोफाइनेंस कारोबार का पर्याप्त अनुभव नहीं है। यह पहलू निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि इस क्षेत्र में ऋण जोखिम, वसूली और संचालन की निगरानी अहम होती है।

    कर्मचारियों के पलायन की दर भी ऊंची बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में पूर्णकालिक कर्मचारियों की एट्रिशन दर 39.22 प्रतिशत रही, हालांकि यह पिछले वित्त वर्ष के 41.47 प्रतिशत से कम है। लगातार ऊंची एट्रिशन दर कंपनी के श्रम-प्रधान कारोबारी मॉडल के सामने मानव संसाधन से जुड़ी चुनौती को दर्शाती है।

    प्रस्तावित आईपीओ में 1500 करोड़ रुपये के नए इक्विटी शेयर जारी किए जाएंगे, जबकि मौजूदा शेयरधारक 1500 करोड़ रुपये तक के शेयर ऑफर फॉर सेल के माध्यम से पेश करेंगे। कंपनी 300 करोड़ रुपये तक का प्री-आईपीओ प्लेसमेंट भी कर सकती है। यदि यह प्लेसमेंट होता है तो नए शेयरों के निर्गम का आकार उसी अनुपात में घटाया जा सकता है।

  • जुलाई में थोक महंगाई दर घटकर 9.78 प्रतिशत हुई, ईंधन कीमतों में नरमी के बावजूद खाद्य और विनिर्माण दबाव बढ़ा

    जुलाई में थोक महंगाई दर घटकर 9.78 प्रतिशत हुई, ईंधन कीमतों में नरमी के बावजूद खाद्य और विनिर्माण दबाव बढ़ा

    नई दिल्ली ।भारत में थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में जुलाई 2026 के दौरान मामूली नरमी देखने को मिली। जुलाई में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 9.78 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 9.87 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस तरह मासिक आधार पर थोक महंगाई में हल्की कमी आई है, हालांकि कीमतों का दबाव अभी भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

    2022-23 को आधार वर्ष मानकर जारी अनंतिम आंकड़ों के अनुसार जुलाई में सभी वस्तुओं का थोक मूल्य सूचकांक 110.0 रहा। जून में यह सूचकांक 110.2 दर्ज किया गया था। समग्र सूचकांक में मामूली गिरावट के बावजूद अलग-अलग श्रेणियों में कीमतों का रुझान एक जैसा नहीं रहा।

    प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर जुलाई में बढ़कर 8.52 प्रतिशत हो गई, जबकि जून में यह 7.00 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि इस श्रेणी की वस्तुओं की कीमतों में पिछले महीने की तुलना में अधिक दबाव रहा। प्राथमिक वस्तुओं का सूचकांक भी जून के 116.1 से बढ़कर जुलाई में 117.2 हो गया।

    विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिली। जुलाई में इस श्रेणी की महंगाई दर 8.29 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 7.48 प्रतिशत थी। विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक जून के 107.8 से बढ़कर जुलाई में 108.4 हो गया। इससे उत्पादन क्षेत्र में लागत और कीमतों से जुड़ा दबाव बने रहने का संकेत मिलता है।

    इसके विपरीत ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में महंगाई दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। जून में 27.41 प्रतिशत रही यह दर जुलाई में घटकर 20.05 प्रतिशत पर आ गई। हालांकि गिरावट के बावजूद इस श्रेणी में महंगाई अभी भी काफी ऊंची बनी हुई है। ईंधन और ऊर्जा का सूचकांक जून के 111.1 से घटकर जुलाई में 105.4 हो गया।

    जुलाई में थोक महंगाई को प्रभावित करने वाले प्रमुख क्षेत्रों में खनिज तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य वस्तुएं, बेसिक मेटल्स, गैर-खाद्य प्राथमिक उत्पाद, खाद्य उत्पादों का विनिर्माण तथा रसायन और रासायनिक उत्पाद शामिल रहे। इन क्षेत्रों में कीमतों की बढ़ोतरी का असर कुल थोक महंगाई के आंकड़े पर पड़ा।

    खाद्य क्षेत्र में भी कीमतों का दबाव बढ़ा है। जुलाई में डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स आधारित महंगाई दर 6.65 प्रतिशत रही, जो जून के 6.14 प्रतिशत से अधिक है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का असर थोक बाजार के साथ आगे चलकर अन्य कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

    इस बीच मई 2026 के थोक महंगाई आंकड़ों में भी संशोधन किया गया है। मई का अंतिम थोक मूल्य सूचकांक 109.9 के प्रारंभिक अनुमान से संशोधित होकर 110.1 हो गया। इसके साथ मई की थोक महंगाई दर भी 9.68 प्रतिशत के प्रारंभिक आंकड़े से संशोधित होकर 9.88 प्रतिशत हो गई।

    मई के अंतिम आंकड़े 98.14 प्रतिशत वेटेड रिस्पॉन्स रेट के आधार पर तैयार किए गए हैं। इसके अलावा आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स का मई का अंतिम आंकड़ा 109.6 के प्रारंभिक अनुमान से बढ़कर 109.9 हो गया है।

    विनिर्माण क्षेत्र के ऑल इंडिया ट्रायल इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स की बात करें तो जुलाई में यह 105.9 दर्ज किया गया। मई के इनपुट पीपीआई के अंतिम आंकड़े में भी संशोधन हुआ और यह शुरुआती 104.9 से बढ़कर 106.5 हो गया।

    कुल मिलाकर जुलाई में थोक महंगाई दर में मामूली राहत जरूर मिली, लेकिन प्राथमिक वस्तुओं, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों में बढ़ता मूल्य दबाव अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। वहीं ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में आई नरमी ने समग्र महंगाई दर को नीचे लाने में मदद की है।

  • E20 पेट्रोल पर नया विवाद: कार कंपनियों की ईमेल बातचीत में सामने आई चिंता तो SIAM ने क्यों वापस लिया पत्र?

    E20 पेट्रोल पर नया विवाद: कार कंपनियों की ईमेल बातचीत में सामने आई चिंता तो SIAM ने क्यों वापस लिया पत्र?


    नई दिल्ली। देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चल रही बहस के बीच एक नई रिपोर्ट ने ऑटो सेक्टर में हलचल बढ़ा दी है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर पहले से ही वाहन मालिकों के बीच कई तरह की चिंताएं सामने आती रही हैं। अब Reuters की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि Tata Motors Maruti Suzuki और Mahindra जैसी बड़ी ऑटो कंपनियों के अधिकारी भी E20 फ्यूल की गुणवत्ता को लेकर आपस में चर्चा कर रहे थे। कंपनियों के बीच हुई ईमेल बातचीत में पेट्रोल में क्लोराइड और नमी की मात्रा को लेकर चिंता सामने आने की बात कही गई है।

    भारत में E20 फ्यूल को पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण घटाने के उद्देश्य से बढ़ावा दिया गया है। सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत देशभर में E20 पेट्रोल का इस्तेमाल बढ़ाया गया है। लेकिन इसके साथ ही वाहन मालिकों की चिंता भी बढ़ी है कि लंबे समय तक ऐसे ईंधन के इस्तेमाल का गाड़ियों पर क्या असर पड़ेगा। इसी बीच ऑटो कंपनियों से जुड़े कुछ आंतरिक डेटा ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक कई ऑटोमेकर्स ने करीब एक साल की अवधि में 21 राज्यों के 250 से ज्यादा पेट्रोल पंपों से ईंधन के सैंपल इकट्ठा कर उनकी जांच की थी। दावा है कि 18 राज्यों के कई सैंपल में क्लोराइड की मात्रा और नमी का स्तर ज्यादा पाया गया। कंपनियों से जुड़े अधिकारियों के बीच हुई बातचीत में इन तत्वों की वजह से वाहनों के कुछ हिस्सों में संभावित समस्याओं को लेकर चिंता जताई गई थी।

    हालांकि इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑटो कंपनियां सार्वजनिक तौर पर E20 फ्यूल का विरोध नहीं कर रही हैं। बल्कि उद्योग संगठन SIAM ने भी बाद में सरकार को भेजे गए अपने पत्र को वापस ले लिया था। 28 जुलाई को भेजी गई शिकायत में E20 पेट्रोल में संभावित मिलावट और गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई गई थी लेकिन बाद में SIAM ने कहा कि पत्र में इस्तेमाल किए गए कुछ आंकड़ों की और जांच तथा वैलिडेशन की जरूरत है।

    SIAM के मुताबिक यह डेटा आंतरिक चर्चा और वैलिडेशन के लिए जुटाया गया था। संगठन का कहना है कि टेस्टिंग का आधार और सैंपल साइज किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसी वजह से सरकार को भेजे गए पत्र को वापस लेने का फैसला किया गया। साथ ही SIAM इस विषय पर ज्यादा व्यापक और वैज्ञानिक अध्ययन कराने की योजना बना रहा है।

    इस बीच पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से इस रिपोर्ट पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि SIAM का पत्र मिलने से करीब दो सप्ताह पहले ही सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल पंपों पर ईंधन की गुणवत्ता और संभावित मिलावट की जांच शुरू कर चुकी थीं। उनके मुताबिक जांच में केवल चार मामले ही इस तरह की समस्या से जुड़े मिले।

    सरकारी तेल कंपनियों ने भी रैंडम और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर बड़ी चिंता की बात को खारिज किया है। उनका कहना है कि किए गए परीक्षणों में ईंधन में ऐसी कोई व्यापक समस्या सामने नहीं आई जिससे वाहन मालिकों को घबराने की जरूरत हो।

    वहीं Mahindra ने Reuters की रिपोर्ट में ईमेल के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों को पूरी तरह गलत बताया है। कंपनी का कहना है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर निकाले गए परिणाम सही नहीं हैं। दूसरी तरफ Maruti Suzuki और Tata Motors की ओर से इस मामले में कोई विस्तृत जवाब नहीं दिया गया है।

    पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि एक तरफ सरकारी तेल कंपनियां E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त कर रही हैं और दूसरी तरफ ऑटो इंडस्ट्री के भीतर हुए परीक्षणों तथा बातचीत को लेकर रिपोर्ट में अलग तस्वीर सामने आई है। ऐसे में अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि E20 पेट्रोल सभी वाहनों के लिए नुकसानदायक है। फिलहाल सबसे जरूरी है कि ईंधन की गुणवत्ता और संभावित क्लोराइड तथा नमी की समस्या को लेकर व्यापक वैज्ञानिक जांच हो और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं। इससे वाहन मालिकों के बीच बनी आशंकाओं को भी स्पष्ट जवाब मिल सकेगा।

  • Cab Tip Rules: अब राइड पूरी होने के बाद ही दे सकेंगे टिप, बुकिंग से पहले अतिरिक्त भुगतान पर सरकार की सख्ती

    Cab Tip Rules: अब राइड पूरी होने के बाद ही दे सकेंगे टिप, बुकिंग से पहले अतिरिक्त भुगतान पर सरकार की सख्ती

    नई दिल्ली । कैब बुकिंग के दौरान यात्रियों को राइड जल्दी कन्फर्म कराने के लिए अतिरिक्त रकम या एडवांस टिप देने के लिए प्रेरित करने वाले विकल्प अब उपलब्ध नहीं होंगे। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने Ola, Uber, Rapido समेत कैब एग्रीगेटर्स को ऐसे सभी फीचर, मैसेज और पेमेंट विकल्प हटाने के निर्देश दिए हैं, जिनसे यात्रियों को सामान्य किराये के अलावा अतिरिक्त भुगतान करने पर जल्दी राइड मिलने का संकेत मिलता है।

    मंत्रालय की ताजा एडवाइजरी के बाद कैब बुकिंग से जुड़े डिजिटल इंटरफेस की समीक्षा करने को कहा गया है। एग्रीगेटर्स को ऐसे फीचर तत्काल हटाने या उनमें बदलाव करने होंगे, जो अतिरिक्त भुगतान को राइड की पुष्टि, ड्राइवर द्वारा ट्रिप स्वीकार करने या कम इंतजार के समय से जोड़ते हैं।

    कैब बुकिंग के दौरान कुछ प्लेटफॉर्म पर Advance Tip, Choose an Add-on या बेहतर और जल्दी राइड कन्फर्म होने की संभावना बढ़ाने जैसे विकल्प दिखाई देने की शिकायतें सामने आई थीं। ऐसे विकल्पों से यात्रियों को यह धारणा बन सकती थी कि सामान्य किराये से अधिक भुगतान करने पर उनकी राइड को प्राथमिकता मिल सकती है।

    सरकार ने इसी व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। निर्देश के अनुसार यात्री को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि अतिरिक्त रकम देने से उसे बेहतर या तेज सेवा मिल सकती है। राइड की बुकिंग सामान्य किराये के आधार पर होनी चाहिए और अतिरिक्त भुगतान को सेवा की प्राथमिकता से नहीं जोड़ा जा सकता।

    Motor Vehicle Aggregator Guidelines, 2025 के Clause 14.15 के तहत ड्राइवर को दी जाने वाली टिप पूरी तरह स्वैच्छिक रखी गई है। इसका विकल्प यात्रा पूरी होने के बाद ही उपलब्ध कराया जा सकता है। बुकिंग के समय, यात्रा शुरू होने से पहले या यात्रा के दौरान टिप देने के लिए प्रेरित करने वाला विकल्प नहीं होना चाहिए।

    नियमों के मुताबिक यात्री द्वारा दी गई पूरी टिप राशि ड्राइवर को ही मिलनी चाहिए। एग्रीगेटर इसमें किसी प्रकार की कटौती नहीं कर सकता। साथ ही टिप से जुड़ा इंटरफेस ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे यात्री पर अतिरिक्त भुगतान करने का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव बने।

    सरकार ने इससे पहले दिसंबर 2025 में एग्रीगेटर गाइडलाइंस में बदलाव करते हुए टिप को यात्रा पूरी होने के बाद तक सीमित किया था। इसके बावजूद कुछ प्लेटफॉर्म पर एडवांस टिप से जुड़े विकल्प दिखाई देने की शिकायतों के बाद अब मंत्रालय ने दोबारा सख्ती दिखाई है।

    11 अगस्त 2026 को जारी एडवाइजरी में कैब एग्रीगेटर्स को अपने मोबाइल ऐप और डिजिटल प्लेटफॉर्म की तत्काल समीक्षा करने को कहा गया है। नियमों के अनुरूप नहीं पाए जाने वाले इंटरफेस, संदेश, पेमेंट विकल्प और ऐड-ऑन को हटाने या संशोधित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    एडवांस टिप को लेकर उपभोक्ता संरक्षण से जुड़ी चिंताएं पहले भी सामने आती रही हैं। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने भी राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म पर बुकिंग से पहले टिप मांगने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। मुख्य चिंता यह थी कि अतिरिक्त भुगतान करने वाले यात्रियों को सामान्य बुकिंग प्रक्रिया में अनुचित प्राथमिकता मिलने का संकेत न जाए।

    नए निर्देशों के बाद यात्रियों के लिए कैब बुकिंग प्रक्रिया अधिक स्पष्ट रहने की उम्मीद है। अब बुकिंग के समय अतिरिक्त टिप देकर राइड जल्दी हासिल करने का विकल्प नहीं दिया जा सकेगा। यात्री सामान्य किराये पर राइड बुक करेंगे और यात्रा पूरी होने के बाद, यदि वे ड्राइवर की सेवा से संतुष्ट हैं, तो अपनी इच्छा के अनुसार टिप दे सकेंगे।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य कैब बुकिंग में अतिरिक्त भुगतान और राइड की प्राथमिकता के बीच किसी भी तरह के संबंध को खत्म करना है। एग्रीगेटर्स को अपने ऐप के इंटरफेस और भुगतान व्यवस्था को निर्धारित नियमों के अनुरूप रखना होगा, ताकि यात्रियों को सेवा पाने के लिए अतिरिक्त भुगतान करने का दबाव महसूस न हो।