Category: Economy

  • Union Budget 2026: किस योजना में कितना पैसा खर्च होगा, बजट बनाते समय कैसे होता है तय; क्या होती है पूरी कैलकुलेशन?

    Union Budget 2026: किस योजना में कितना पैसा खर्च होगा, बजट बनाते समय कैसे होता है तय; क्या होती है पूरी कैलकुलेशन?

    नई दिल्ली। Union Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश करने वाली हैं. यह उनका लगातार नौंवा बजट होगा. यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता का सामना कर रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि आखिर सरकार यह कैसे तय करती है कि किस योजना में कितना पैसा जाएगा.

    बजट की तैयारी 6 महीने पहले शुरू होती है

    बजट बनाने की पूरी प्रक्रिया जनवरी में शुरू नहीं होती बल्कि यह सितंबर अक्टूबर के आसपास शुरू हो जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में वित्त मंत्रालय के तहत आर्थिक मामलों का विभाग सभी मंत्रालयों और विभागों को एक बजट सर्कुलर जारी करता है. हर मंत्रालय चल रही योजनाओं, प्रतिबद्ध देनदारियों और प्रस्तावित नई पहलों को कवर करते हुए विस्तृत व्यय अनुमान प्रस्तुत करता है. यह सभी अनुमान आगे की गणनाओं के लिए आधार डेटा बनाते हैं.

    चार मुख्य स्तंभ आवंटन तय करते हैं

    बजट आवंटन सिर्फ इस वजह से नहीं दिए जाते क्योंकि कोई मंत्रालय ज्यादा पैसे मांगता है. वित्त मंत्रालय चार प्रमुख तकनीकी मानदंडों का इस्तेमाल करके प्रस्तावों का मूल्यांकन करता है.

    पहला है पूंजी और राजस्व व्यय के बीच संतुलन. सरकार पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देती है. ऐसे इसलिए क्योंकि यह केवल वेतन या रखरखाव के लिए धन देने के बजाय लंबे समय की संपत्ति बनता है और विकास को बढ़ावा देता है. दूसरा है आने वाले वित्तीय वर्ष के लिए नॉमिनल जीडीपी अनुमान. सभी बजट संख्याएं जीडीपी के प्रतिशत के रूप में गणना की जाती है. इसमें वास्तविक विकास और इन्फ्लेशन दोनों शामिल है.

    तीसरा आता है राजकोषीय घाटे का लक्ष्य. सरकार कोई यह तय करना होता है कि वह अपनी आय से कितना अतिरिक्त खर्च कर सकती है. यह घाटा आमतौर पर जीडीपी के एक तय प्रतिशत पर सीमित होता है. चौथा कारक पिछला प्रदर्शन है. जिन योजनाओं ने अपने पिछले आवंटन का अच्छी तरह से इस्तेमाल कर लिया है और मापने योग्य परिणाम दिखाएं हैं उन्हें ज्यादा धन मिलने की संभावना ज्यादा होती है.

    असली बजट गणित

    एक बार जब कुल अपेक्षित राजस्व की गणना हो जाती है तो सरकार इसे 100 पैसे की तरह मानती है जिसे वितरित किया जाना चाहिए. एक बड़ा हिस्सा अनिवार्य एक्सपेंडिचर के रूप में लॉक कर दिया जाता है. अकेले ब्याज भुगतान कुल खर्च का लगभग 20% इस्तेमाल करता है. सेंट्रल टैक्स में राज्यों का हिस्सा लगभग 22% है और डिफेंस एक्सपेंडिचर लगभग 8%. सैलरी और पेंशन भी ज्यादातर नॉन नेगोशिएबल होते हैं. इन तय खर्चों का हिसाब लगाने के बाद ही सरकार तय करती है कि डेवलपमेंट स्कीम के लिए कितना पैसा बचा है.

    स्कीम की फंडिंग कैसे बांटी जाती है

    बचे हुए फंड को सेंट्रल सेक्टर स्कीम और केंद्रीय प्रायोजित स्कीम में बांटा जाता है. यहां खर्च अक्सर 60:40 या 50:50 के अनुपात में राज्यों के साथ शेयर किया जाता है. इंफ्रास्ट्रक्चर, वेलफेयर, एग्रीकल्चर, एजुकेशन और हेल्थ जैसे प्रायरिटी सेक्टर इस सीमित फाइनेंशियल दायरे में मुकाबला करते हैं.

    बजट को फाइनल करने से पहले वित्त मंत्रालय हर मंत्रालय के साथ मीटिंग करता है. यह अक्सर फाइनेंशियल लिमिट में रहने के लिए मांगों में कटौती करता है. फाइनल वर्जन को प्रधानमंत्री और केंद्रीय कैबिनेट मंजूरी देते हैं. इसके बाद बजट को संसद में अनुदान मांगों के रूप में पेश किया जाता है. यह पैसा तभी खर्च किया जा सकता है जब सांसद वोटिंग के जरिए से मंजूरी दे.

  • Post Office की MIS स्कीम में ₹2,00,000 जमा करें तो हर महीने कितना मिलेगा ब्याज- चेक करें डिटेल्स

    Post Office की MIS स्कीम में ₹2,00,000 जमा करें तो हर महीने कितना मिलेगा ब्याज- चेक करें डिटेल्स


    नई दिल्ली । देश का मिडल क्लास और लोअर क्लास आज भी पोस्ट ऑफिस की बचत योजनाओं पर पूरा भरोसा करता है। पोस्ट ऑफिस की बचत योजनाओं में नागरिकों को न सिर्फ सुरक्षा मिलती है, बल्कि शानदार रिटर्न भी मिलता है। पोस्ट ऑफिस की तमाम बचत योजनाओं में मंथली इनकम स्कीम भी काफी पॉपुलर है। पोस्ट ऑफिस की इस स्कीम में निवेशकों को 5 साल तक हर महीने ब्याज के फिक्स पैसे मिलते रहते हैं। यहां हम जानेंगे कि पोस्ट ऑफिस की एमआईएस स्कीम में 2 लाख रुपये जमा करें तो हर महीने कितने रुपये का ब्याज मिलेगा।

    एमआईएस खाते पर मिल रहा है 7.4 प्रतिशत का ब्याज

    डाकघर की मंथली इनकम स्कीम यानी MIS पर 7.4 प्रतिशत का ब्याज दिया जा रहा है। इस स्कीम में सिर्फ एक बार ही पैसा जमा करना होता है और हर महीने आपको ब्याज मिलता रहता है। ये स्कीम 5 साल में मैच्यॉर होती है। इस स्कीम में कम से कम 1000 रुपये के साथ खाता खुलवाया जा सकता है। एमआईएस स्कीम के तहत सिंगल और जॉइंट, दोनों तरह के अकाउंट खुलवाए जा सकते हैं। सिंगल अकाउंट में अधिकतम 9 लाख रुपये जमा किए जा सकते हैं और जॉइंट अकाउंट में अधिकतम 15 लाख रुपये जमा किए जा सकते हैं। इस स्कीम के तहत जॉइंट अकाउंट में अधिकतम 3 लोगों के नाम जोड़े जा सकते हैं।

    सिर्फ एक बार जमा करना होता है पैसा, हर महीने मिलता है ब्याज

    पोस्ट ऑफिस की एमआईएस स्कीम में सिर्फ एक बार पैसे जमा किए जाते हैं और इसके लिए आपको हर महीने ब्याज का भुगतान किया जाता है। ब्याज के ये पैसे सीधे आपके बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं। अगर आप पोस्ट ऑफिस की मंथली इनकम स्कीम में 2 लाख रुपये का निवेश करते हैं तो आपको हर महीने 1233 रुपये का फिक्स ब्याज मिलेगा। 5 साल में खाता मैच्यॉर होने के बाद आपके निवेश के सारे पैसे आपके खाते में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं।

    डाकघर का बचत खाता होना जरूरी

    पोस्ट ऑफिस में एसआईएस खाता खुलवाने के लिए आपके पास पोस्ट ऑफिस का सेविंग्स अकाउंट होना जरूरी है। अगर पोस्ट ऑफिस में आपका कोई बचत खाता नहीं है तो आपको पहले बचत खाता खुलवाना होगा, जिसके बाद ही आप मंथली इनकम स्कीम में खाता खुलवा सकते हैं क्योंकि ब्याज के पैसे पोस्ट ऑफिस के बचत खाते में ही ट्रांसफर किए जाते हैं।

  • Gold-Silver Crash: चांदी का फूटा बुलबुला… एक दिन में ₹1 लाख सस्ती, सोना 33000 रुपये फिसला

    Gold-Silver Crash: चांदी का फूटा बुलबुला… एक दिन में ₹1 लाख सस्ती, सोना 33000 रुपये फिसला


    नई दिल्ली । सोना-चांदी की कीमतों में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है. एक ही दिन में जहां चांदी का भाव 1 लाख रुपये से ज्यादा टूट गया है, तो वहीं सोना भी एक झटके में 33000 रुपये प्रति 10 ग्राम से ज्यादा सस्ता हो गया है. न सिर्फ वायदा कारोबार में, बल्कि घरेलू मार्केट में भी इन कीमती धातुओं के दाम में अचानक तगड़ी गिरावट देखने को मिली है. एक्सपर्ट पहले से ही ऐतिहासिक लेवल पर पहुंचे कीमती धातुओं के दाम में बड़ी गिरावट का अनुमान जता रहे थे और हुआ भी कुछ ऐसा है. आइए जानते हैं गोल्ड-सिल्वर प्राइस क्रैश के पीछे के बड़े कारणों के बारे में…

    देखते ही देखते फूटा चांदी का बुलबुला

    एक्सपर्ट्स के अनुमान सच साबित हुए हैं और आखिर चांदी का बुलबुला फूट गया (Silver Bubble Burst) है. जी हां, सिर्फ एक ही दिन में 1 Kg Silver Price एक लाख रुपये से ज्यादा कम हो गया है. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर बीते गुरुवार को तूफानी तेजी के साथ उछाल भरते हुए अपना नया हाई लेवल छूने के बाद अंत में 3,99,893 रुपये प्रति किलो पर क्लोज हुई थी, वहीं शुक्रवार को वायदा कारोबार बंद होने पर 5 मार्च की एक्सपायरी वाली चांदी का रेट क्रैश (Silver Price Crash) हो गया और ये तेजी से गिरते हुए 2,91,922 रुपये पर आ गई. यानी एक झटके में ये 1,07,971 रुपये प्रति किलोग्राम सस्ती हो गई.

    हाई से इतना टूटा चांदी का भाव
    इससे ठीक एक दिन पहले यानी गुरुवार को ही चांदी की कीमतों ने रॉकेट की रफ्तार से भागते हुए इतिहास में पहली बार 4 लाख रुपये प्रति किलो का ऐतिहासिक स्तर पार किया था और ये 4,20,048 रुपये प्रति किलो के हाई लेवल पर पहुंच गई थी. लेकिन झटके में बुलंदियों पर पहुंची चांदी ने अचानक ही निवेशकों को तगड़ा झटका दिया और इस हाई लेवल से 1,28,126 रुपये महज एक दिन में ही सस्ती हो गई.
    Silver ही नहीं, Gold भी धड़ाम
    न सिर्फ चांदी, बल्कि सोने का बुलबुला भी फूटा है. 10 Gram 24 Karat Gold Rate में सिर्फ एक कारोबारी दिन में ही 33,113 रुपये की बड़ी गिरावट आई है. सिल्वर प्राइस बुरी तरह फिसलने के साथ-साथ गोल्ड रेट भी क्रैश हो गया. एमसीएक्स पर 2 अप्रैल की एक्सपायरी वाले सोने का वायदा भाव गुरुवार को 1,83,962 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था और शुक्रवार को क्लोजिंग तक ये फिसलकर 1,50,849 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया. अगर सोने के हाई लेवल से इसकी कीमत में आई गिरावट पर गौर करें, तो गुरुवार को ही Gold Rate भी चांदी की तरह ताबड़तोड़ तेजी लेकर 1,93,096 रुपये के अपने लाइफ टाइम हाई पर पहुंचे थे और फिर अचानक इसमें ऐसी गिरावट आई कि सोना इस हाई से 42,247 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हो गया.

    अचानक क्यों आई ये बड़ी गिरावट?

    सोना-चांदी की कीमतों में तेज उछाल के बीच एक्सपर्ट्स पहले सी ही अनुमान जता रहे थे कि ये इस ऊंचाई पर पहुंचने के बाद तेजी से फिसल भी सकता है और उनके अनुमान शुक्रवार को सच भी साबित हो गए. अगर इन कीमती धातुओं के भाव में आई गिरावट के पीछे के कारणों के बारे में बात करें, तो एक नहीं बल्कि कई वजह नजर आती हैं.
    Gold-Silver Crash का एक बड़ा कारण मुनाफासूली रही, ऐतिहासिक लेवल पर पहुंचने के बाद निवेशकों ने सोना-चांदी में प्रॉफिट बुकिंग शुरू कर दी और बिकवाली के दबाव में झटके में दोनों के दाम बिखर गए. न सिर्फ सोना-चांदी, बल्कि इनके ईटीएफ भी बिखरे हुए नजर आए. इसमें अमेरिकी डॉलर में आई तेजी का भी बड़ा रोल रहा. आमतौर पर जब US Dollar मजबूत होता है, तो दूसरे देशों के निवेशकों के लिए गोल्ड- सिल्वर खरीदना महंगा पड़ता है और इनकी डिमांड घट जाती है, जिससे कीमतें भी कम होती है.

    डॉलर के साथ ही US Treasury की यील्ड भी बढ़ी है और निवेशकों को सुरक्षित बॉन्ड में ज्यादा रिटर्न नजर आने लगा है, जिससे ये बिकवाली देखने को मिली. वहीं डोनाल्ड ट्रंप के बयानों से ग्लोबल टेंशन में कमी और US Fed में जेरोम पॉवेल की जगह उनके पसंदीदा व्यक्ति केविन वार्श की एंट्री से जुड़ी खबरों ने भी सोना-चांदी पर दबाव बढ़ाया है.

  • डॉलर मजबूत होने और भारी मुनाफावसूली के चलते सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट निवेशकों में बेचैनी का माहौल

    डॉलर मजबूत होने और भारी मुनाफावसूली के चलते सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट निवेशकों में बेचैनी का माहौल


    नई दिल्ली। इस हफ्ते सोने और चांदी के बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली। निवेशकों ने भारी मुनाफावसूली की और डॉलर के मजबूत होने के चलते कीमती धातुओं के दाम अचानक नीचे आ गए। एमसीएक्स पर फरवरी डिलीवरी वाला सोना करीब 9 प्रतिशत गिरा जबकि मार्च डिलीवरी वाली चांदी में 25 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। फिलहाल सोने का भाव 1,49,075 रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी का भाव 2,91,922 रुपए प्रति किलो रिकॉर्ड किया गया।

    इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार 24 कैरेट सोना 10 ग्राम पर घटकर 1,65,795 रुपए पर आ गया था, जबकि इससे पहले यह 1,75,340 रुपए पर बंद हुआ था। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने की वजह से निवेशकों ने तेजी से बिकवाली शुरू की। डॉलर के मजबूती का मुख्य कारण अमेरिकी राष्ट्रपति ने फेडरल रिजर्व चेयरमैन के रूप में केविन वार्श के नाम की घोषणा करना बताया गया है। केविन वार्श महंगाई को काबू में रखने के लिए सख्त रुख रखते हैं और कम ब्याज दरों के पक्ष में नहीं माने जाते।

    विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ, वास्तविक बॉन्ड यील्ड बढ़ीं और सोने व चांदी में लीवरेज्ड पोजीशन, जिन्हें करेंसी वैल्यू घटने से बचाव के तौर पर लिया गया था, तेजी से खत्म कर दी गई। इसके चलते बाजार में अरबों डॉलर का मार्केट वैल्यू साफ हुआ और कमजोर निवेशक बाहर हो गए। विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट लंबी अवधि की मंदी की शुरुआत नहीं है बल्कि एक जरूरी सुधार प्रक्रिया है।लंबी अवधि के बुनियादी कारक अब भी मजबूत बने हुए हैं। केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीद, ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहनों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स में बढ़ती औद्योगिक मांग के कारण चांदी की आपूर्ति में संरचनात्मक कमी बनी हुई है। यही वजह है कि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी अवधि में सोने और चांदी के लिए तेजी का नजरिया बरकरार है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इस गिरावट के बाद जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी और जोखिम भरे निवेश बाहर हो गए हैं जिससे आगे चलकर बाजार स्थिर तरीके से ऊपर जा सकता है। चांदी की कीमत यदि 3 लाख से 3.10 लाख रुपए प्रति किलो के स्तर पर आती है तो वहां से दोबारा खरीदारी शुरू हो सकती है। इसके चलते चांदी संभावित रूप से 3.40 लाख से 3.50 लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंच सकती है।इस गिरावट को निवेशकों के लिए मौका भी माना जा रहा है क्योंकि बाजार में स्थिरता आने के बाद धातुओं की कीमतें फिर से ऊपर जा सकती हैं।

  • Budget Impact on Markets: जानिए पिछले 15 बार शेयर बाजार ने किस दिशा में किया रेस्पॉन्ड

    Budget Impact on Markets: जानिए पिछले 15 बार शेयर बाजार ने किस दिशा में किया रेस्पॉन्ड

    नई दिल्ली  हर साल आम बजट पेश होने के बाद शेयर बाजार की चाल निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए सबसे बड़ा सवाल बन जाती है। टैक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, कैपेक्स और सेक्टरल घोषणाओं का सीधा असर बाजार पर पड़ता है। इसी को देखते हुए एसबीआई सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में पिछले 15 बजट के बाद बाजार के प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।

    एक हफ्ते बाद सेंसेक्स का ट्रैक रिकॉर्ड

    रिपोर्ट के मुताबिक, बजट पेश होने के एक हफ्ते बाद सेंसेक्स ने 15 में से 11 बार सकारात्मक रिटर्न दिया है। इस अवधि में औसतन 2.10 प्रतिशत का मुनाफा निवेशकों को मिला।
    हालांकि, चार बार सेंसेक्स नुकसान में भी रहा, जहां औसत गिरावट 2.05 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे साफ है कि शॉर्ट टर्म में उतार-चढ़ाव के बावजूद बाजार का पलड़ा अक्सर सकारात्मक ही रहा है।

    तीन महीने में सेंसेक्स का प्रदर्शन

    अगर थोड़ा लंबा नजरिया अपनाया जाए तो तस्वीर और साफ हो जाती है। बजट के तीन महीने बाद सेंसेक्स ने 15 में से 9 बार सकारात्मक रिटर्न दिया है। इस दौरान औसत मुनाफा 6.77 प्रतिशत रहा।
    वहीं, छह बार बाजार ने नकारात्मक रिटर्न दिया, जिसमें औसत नुकसान 5.28 प्रतिशत दर्ज हुआ।

    निफ्टी भी रहा मजबूत

    निफ्टी के आंकड़े भी लगभग इसी कहानी को दोहराते हैं। बजट के एक हफ्ते बाद निफ्टी ने 15 में से 12 बार सकारात्मक रिटर्न दिया है। इस दौरान औसत रिटर्न 2.04 प्रतिशत रहा।
    तीन बार निफ्टी गिरावट में रहा, जहां औसत नुकसान 2.65 प्रतिशत रहा।

    तीन महीने बाद निफ्टी का ट्रेंड

    तीन महीने की अवधि में निफ्टी ने 15 में से 9 बार सकारात्मक रिटर्न दिया है। इस दौरान औसत मुनाफा 7.40 प्रतिशत रहा। वहीं, छह बार नकारात्मक रिटर्न में औसत नुकसान 5.46 प्रतिशत देखा गया।

    मिडकैप और स्मॉलकैप में ज्यादा उतार-चढ़ाव

    लार्जकैप के मुकाबले मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में ज्यादा वोलैटिलिटी दिखी है।
    बजट के एक हफ्ते बाद निफ्टी मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ने 15 में से 11 बार सकारात्मक रिटर्न दिया। मिडकैप का औसत रिटर्न 3.1 प्रतिशत और स्मॉलकैप का 3.3 प्रतिशत रहा।
    तीन महीने बाद मिडकैप ने 10 बार सकारात्मक रिटर्न (औसत 8.67%) दिया, जबकि स्मॉलकैप में केवल 7 बार तेजी दिखी, हालांकि इसका औसत रिटर्न 14.54 प्रतिशत रहा, जो जोखिम के साथ ज्यादा मुनाफे की संभावना दिखाता है।

    निवेशकों के लिए क्या संकेत

    कुल मिलाकर, आंकड़े बताते हैं कि बजट के बाद बाजार ने ज्यादातर मौकों पर निवेशकों को फायदा पहुंचाया है। हालांकि, शॉर्ट टर्म में उतार-चढ़ाव से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबी अवधि के निवेशक बजट के बाद आने वाले उतार-चढ़ाव को अवसर के रूप में देख सकते हैं, जबकि ट्रेडर्स को जोखिम प्रबंधन पर खास ध्यान देना चाहिए।

  • अदाणी समूह को अंतरराष्ट्रीय भरोसा: जापान की रेटिंग एजेंसी ने तीन प्रमुख कंपनियों को दी मजबूत क्रेडिट रेटिंग

    अदाणी समूह को अंतरराष्ट्रीय भरोसा: जापान की रेटिंग एजेंसी ने तीन प्रमुख कंपनियों को दी मजबूत क्रेडिट रेटिंग

    नई दिल्ली जापान की प्रतिष्ठित क्रेडिट रेटिंग एजेंसी Japan Credit Rating Agency (JCR) ने अदाणी समूह की तीन प्रमुख कंपनियों अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड (APSEZ), अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड (AGEL) और अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (AESL)को स्टेबल आउटलुक के साथ दीर्घकालिक फॉरेन करेंसी क्रेडिट रेटिंग प्रदान की है। यह रेटिंग न केवल अदाणी समूह की वित्तीय मजबूती को दर्शाती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच उसके प्रति बढ़ते भरोसे का भी संकेत है।

    किस कंपनी को कितनी रेटिंग

    रतीय इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में शामिल करती है। वहीं, अदाणी ग्रीन एनर्जी और अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस दोनों को BBB+ (स्टेबल) रेटिंग मिजेसीआरए ने अदाणी पोर्ट्स एंड एसईजेड (APSEZ) को A- (स्टेबल) रेटिंग दी है, जो इसे देश की संप्रभु रेटिंग से ऊपर रखने वाली चुनिंदा भाली है। खास बात यह है कि ये रेटिंग्स भारत की सॉवेरन क्रेडिट रेटिंग (BBB+) के बराबर हैं।

    ग्रुप CFO ने क्या कहा

    अदाणी समूह के ग्रुप सीएफओ जुगेशिंदर सिंह ने इन रेटिंग्स को समूह के लिए अहम उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि यह रेटिंग्स अनुशासित वित्तीय प्रबंधन, मजबूत बैलेंस शीट और विविध बुनियादी ढांचा पोर्टफोलियो में विश्वस्तरीय निष्पादन को दर्शाती हैं।
    उन्होंने आगे कहा कि यह वैश्विक ऋणदाताओं, संस्थागत निवेशकों और पूंजी बाजारों के उस भरोसे की पुष्टि है, जो अदाणी समूह की दीर्घकालिक रणनीति और सतत विकास मॉडल में दिखाई देता है।

    अदाणी पोर्ट्स की खास उपलब्धि

    जेसीआरए ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अदाणी पोर्ट्स की मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल, विविध परिसंपत्ति आधार और स्थिर नकदी प्रवाह इसे अन्य कंपनियों से अलग बनाते हैं। एजेंसी के अनुसार, कंपनी की बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमताएं, लगातार मजबूत मुनाफा और विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन इसे भारत की विदेशी मुद्रा सॉवेरन रेटिंग से ऊपर स्थान दिलाते हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मानकों से बढ़ता तालमेल

    यह रेटिंग भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए एक अहम संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह उन शुरुआती उदाहरणों में से एक है, जहां जापानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्लेटफॉर्म को इस स्तर पर आंका है। इससे वैश्विक रेटिंग एजेंसियों के साथ अदाणी समूह के बढ़ते तालमेल और अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट मानकों पर उसकी मजबूत पकड़ स्पष्ट होती है।

    निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत

    कुल मिलाकर, जेसीआरए की यह रेटिंग अदाणी समूह की वित्तीय स्थिरता, दीर्घकालिक विकास क्षमता और भारत के बुनियादी ढांचे के निर्माण में उसकी अग्रणी भूमिका को मजबूती देती है। यह आने वाले समय में विदेशी निवेश और वैश्विक फंडिंग के नए रास्ते भी खोल सकती है।

  • Silver Price Crash: अचानक चांदी में बड़ी गिरावट… खुलते ही ₹24000 रुपये सस्ती, सोना भी धड़ाम

    Silver Price Crash: अचानक चांदी में बड़ी गिरावट… खुलते ही ₹24000 रुपये सस्ती, सोना भी धड़ाम

    नई दिल्ली  सोना-चांदी की कीमतों में शुक्रवार को बड़ी गिरावट देखने को मिली। लगातार तूफानी तेजी के बाद इन कीमती धातुओं के भाव खुलते ही क्रैश हो गए। सबसे ज्यादा झटका चांदी को लगा, जहां MCX पर चांदी का वायदा भाव करीब 24,000 रुपये तक टूट गया। वहीं सोने की कीमतों में भी तेज गिरावट दर्ज की गई और यह खुलते ही लगभग 8,000 रुपये प्रति 10 ग्राम तक सस्ता हो गया। इस अचानक गिरावट से निवेशकों में हलचल तेज हो गई है।

    चांदी में रिकॉर्ड एकदिनी गिरावट
    चांदी की कीमतों में शुक्रवार को जोरदार गिरावट देखने को मिली। बीते कारोबारी दिन गुरुवार को MCX पर चांदी रॉकेट की रफ्तार से चढ़ते हुए इतिहास में पहली बार 4 लाख रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गई थी और 3,99,893 रुपये प्रति किलो पर बंद हुई थी। लेकिन शुक्रवार को बाजार खुलते ही तस्वीर बदल गई। 5 मार्च एक्सपायरी वाली चांदी का वायदा भाव 23,993 रुपये टूटकर 3,75,900 रुपये प्रति किलो पर आ गया।

    लाइफटाइम हाई से 44 हजार की टूट
    गुरुवार को चांदी ने 4,20,048 रुपये प्रति किलो का नया लाइफटाइम हाई बनाया था। इस स्तर से तुलना करें तो सिर्फ एक ही दिन में चांदी करीब 44,148 रुपये तक सस्ती हो गई। इतनी बड़ी एकदिनी गिरावट ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है और बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

    📉 सोने में भी बड़ा झटका
    चांदी के बाद सोने की कीमतों में भी शुक्रवार को भारी गिरावट दर्ज की गई। MCX पर गोल्ड रेट क्रैश करता नजर आया। गुरुवार को सोना जबरदस्त तेजी के साथ नया ऑलटाइम हाई छूने के बाद 1,83,962 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। लेकिन शुक्रवार को 2 अप्रैल एक्सपायरी वाला गोल्ड खुलते ही 8,862 रुपये टूटकर 1,75,100 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया।

    गोल्ड लाइफटाइम हाई से करीब 18 हजार नीचे
    गुरुवार को ही सोने ने 1,93,096 रुपये प्रति 10 ग्राम का नया लाइफटाइम हाई बनाया था। इस स्तर के मुकाबले शुक्रवार को सोने की कीमतों में करीब 17,996 रुपये की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इतनी तेज एकदिनी गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।

    सोना-चांदी में गिरावट के पीछे क्या है वजह?
    एमसीएक्स से लेकर ग्लोबल बाजारों तक सोना-चांदी की कीमतों में आई भारी गिरावट के पीछे कई अहम वजहें सामने आ रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कीमती धातुओं के तेजी से नए हाई लेवल पर पहुंचते ही बाजार में जोरदार बिकवाली शुरू हो गई। निवेशकों की मुनाफावसूली के चलते कीमतों में अचानक तेज गिरावट देखने को मिली।

    ग्लोबल संकेतों का भी असर
    वैश्विक स्तर पर भले ही तनाव का माहौल बना हुआ हो, लेकिन टैरिफ अटैक के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान के साथ परमाणु समझौते को लेकर बातचीत की दिशा में कदम बढ़ाना भी बाजार पर असर डालता दिखा है। भू-राजनीतिक तनाव में नरमी के संकेत मिलने से सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोना-चांदी पर दबाव बढ़ा और दाम फिसलते चले गए।

  • वैश्विक तनाव से सोने-चांदी की कीमतों में उछाल वैश्विक तनाव और डॉलर की कमजोरी ने निवेशकों को सोना-चांदी की ओर खींचा

    वैश्विक तनाव से सोने-चांदी की कीमतों में उछाल वैश्विक तनाव और डॉलर की कमजोरी ने निवेशकों को सोना-चांदी की ओर खींचा

    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी के बाद वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव बढ़ गया है, जिससे सुरक्षित निवेश की मांग पर सीधा असर पड़ा। गुरुवार को कीमती धातुओं की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। केंद्रीय बैंकों द्वारा खरीदारी और अमेरिकी डॉलर की कमजोरी ने भी सोना-चांदी की कीमतों में तेजी को बढ़ावा दिया। निवेशकों का भरोसा इन सुरक्षित संपत्तियों पर और मजबूत हो गया है।

    एमसीएक्स पर सोना-चांदी की तेजी

    एमसीएक्स पर फरवरी डिलीवरी वाला सोना दोपहर 12:02 बजे 6.98 प्रतिशत यानी 11,575 रुपए बढ़कर 1,77,490 रुपए प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। वहीं मार्च डिलीवरी वाली चांदी 23,633 रुपए यानी 6.13 प्रतिशत चढ़कर 4,08,999 रुपए प्रति किलो हो गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति औंस के आसपास रही। इस साल अब तक चांदी की कीमतों में 60 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है, जिसका मुख्य कारण सप्लाई की कमी बताया गया है।

    अमेरिकी फैसलों का प्रभाव

    कीमती धातुओं में यह तेज उछाल अमेरिकी फेडरल रिजर्व के उस फैसले के बाद आया, जिसमें ब्याज दरों को बिना बदलाव के बनाए रखने का ऐलान किया गया। इसके अलावा अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई और ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर दबाव बनाया। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी बाजार में अप्रैल डिलीवरी वाले सोने के वायदा भाव 300 डॉलर बढ़कर 5,588.71 डॉलर प्रति औंस के पार चले गए।

    विशेषज्ञों का नजरिया

    विशेषज्ञों के अनुसार पहले 5,600 डॉलर के आसपास जो स्तर रुकावट माना जाता था, अब वही मजबूत सपोर्ट बन गया है। अमेरिका और सहयोगी देशों के बीच बढ़ता टैरिफ तनाव और शटडाउन की आशंका ने भी सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ा दी है। वैश्विक आर्थिक सुस्ती, बढ़ता अमेरिकी कर्ज और डॉलर की कमजोरी लंबे समय में सोने-चांदी के लिए सकारात्मक संकेत हैं।

    फेडरल रिजर्व की ओर से लंबे समय तक कम ब्याज दरों के संकेत मिलने से बाजार में तरलता बनी रहेगी। ऐसे में अगर कीमतों में थोड़ी गिरावट आती है, तो निवेशक उसे खरीदारी का अवसर मानेंगे। निवेशक और व्यापारी इसे सुरक्षित निवेश के लिए उपयुक्त समय मान रहे हैं और सोने-चांदी में तेजी के रुझान को बरकरार देख रहे हैं।

    वैश्विक अनिश्चितता और डॉलर की कमजोरी ने निवेशकों को सोना-चांदी का सहारा लेने पर मजबूर किया है। चांदी की कीमत 4 लाख रुपए के पार पहुंच गई है, जबकि सोने ने 1.77 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम का स्तर पार कर लिया। विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक तनाव और आर्थिक परिस्थितियां लंबे समय तक कीमती धातुओं के लिए तेजी बनाए रख सकती हैं।

  • अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार लघु वित्त क्षेत्र में भी मजबूती

    अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार लघु वित्त क्षेत्र में भी मजबूती

    नई दिल्ली । देश के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) की परिसंपत्ति गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में जानकारी दी कि कुल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात (जीएनपीए) और कुल एनपीए अनुपात कई दशकों की निम्नतम सीमा और रिकॉर्ड निम्न स्तर पर पहुंच गए हैं। यही नहीं, एनपीए रिकवरी दर वित्त वर्ष 2018 के 13.2 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 26.2 प्रतिशत हो गई, जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग दोगुनी है। एनपीए रिकवरी में सुधार का प्रमुख कारण दिवालिया और दिवालियापन संहिता 2016 (आईबीसी कोड) को बताया गया।

    पूंजी-जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात मजबूत

    आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी बताया गया कि सितंबर 2025 तक एससीबी का पूंजी-जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात (सीआरएआर) 17.2 प्रतिशत पर मजबूत बना हुआ है। इससे बैंकों की वित्तीय मजबूती और जोखिम सहनशीलता स्पष्ट होती है। सरकारी पहलों के कारण क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) के प्रदर्शन में भी सुधार आया है। चार चरणों में आरआरबी के समेकन से उनकी संख्या 1 मई 2025 तक 196 से घटकर 28 रह गई। इससे ग्रामीण बैंकों की वित्तीय स्थिति बेहतर हुई और वे अधिक स्थिर हुए।

    ग्रामीण बैंकों और लाभ में सुधार

    वित्त वर्ष 2024 में ग्रामीण बैंकों ने 7.6 हजार करोड़ रुपए का रिकॉर्ड समेकित कुल लाभ अर्जित किया। वित्त वर्ष 2025 में यह लाभ 6.8 हजार करोड़ रुपए रहा, जो पिछले वर्षों के मुकाबले दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। आरआरबी के इस सुधार से ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय स्थिरता और भरोसा दोनों बढ़े हैं।

    लघु वित्त क्षेत्र में तेजी

    आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी उल्लेख किया गया कि लघु वित्त क्षेत्र में पिछले दशक में लगातार वृद्धि हुई है। सक्रिय ऋण प्राप्तकर्ताओं की संख्या वित्त वर्ष 2014 के 330 लाख से बढ़कर 2025 में 627 लाख हो गई। इसी अवधि में एमएफआई के सकल ऋण में लगभग सात गुना वृद्धि हुई, जो वित्त वर्ष 2014 के 33,517 करोड़ रुपए से बढ़कर 2,38,198 करोड़ रुपए हो गया। एमएफआई शाखा नेटवर्क भी 11,687 से बढ़कर 37,380 शाखाओं तक पहुंच गया।

    वित्तीय क्षेत्र में सुधार के प्रभाव

    एससीबी और आरआरबी के सुधार के साथ-साथ लघु वित्त क्षेत्र की तेजी ने देश में बैंकिंग और वित्तीय स्थिरता को मजबूती दी है। एनपीए में कमी और रिकवरी दर में वृद्धि ने बैंकों के परिसंपत्ति पोर्टफोलियो को स्वस्थ बनाया है। ग्रामीण और लघु वित्त क्षेत्र में विस्तार ने वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया है और छोटे ऋणधारकों को लाभ पहुंचाया है।

    इस प्रकार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने यह स्पष्ट किया है कि बैंकिंग क्षेत्र की परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार और वित्तीय समावेशन के प्रयास देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।

  • आम बजट 2026-27: लंबाई बढ़ाने के बजाय ग्रीन और इलेक्ट्रिक नेशनल हाईवे को प्राथमिकता

    आम बजट 2026-27: लंबाई बढ़ाने के बजाय ग्रीन और इलेक्ट्रिक नेशनल हाईवे को प्राथमिकता

    नई दिल्ली। इस बार आम बजट 2026-27 (General Budget 2026-27) में पारंपरिक नेशनल हाईवे (Conventional National Highway.) की लंबाई बढ़ाने के बजाय ग्रीन और इलेक्ट्रिक नेशनल हाईवे (Green and Electric National Highway) को प्राथमिकता दी जाएगी। यही कारण है गत वर्ष की अपेक्षा सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की बजटीय सहायता में महज 2-3 फीसदी की बढ़ोतरी होने की संभावना है।

    मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार आम बजट में बड़े नीतिगत बदलाव किए जा सकते हैं। इसमें सड़क निर्माण के साथ-साथ ग्रीन एनर्जी और ई-मोबिलिटी को पहली प्राथमिकता दी जा सकती है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट से इस बार विभाग को 2.92 लाख करोड़ रुपये (पिछले वर्ष से 1.8 फीसदी ज्यादा) की बजटीय सहायता मिल सकती है। सरकार का पीपीपी मोड के तहत अधिक से अधिक राशि जुटाने का प्रयास होगा।


    इलेक्ट्रिक नेशनल हाईवे के लिए 5000 करोड़ का विशेष फंड

    सरकार सड़कों के मुद्रीकरण से अतिरिक्त 35,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखेगी। इसे सीधे ग्रीन प्रोजेक्ट्स में निवेश किया जाएगा। बजट में इलेक्ट्रिक नेशनल हाईवे के लिए 5000 करोड़ का विशेष फंड का प्रावधान किया जाएगा। अधिकारियों ने बताया कि आम बजट में दिल्ली-जयपुर और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के चुनिंदा सेक्शन को पायलट इलेक्ट्रिक नेशनल हाईवे के रूप में विकसित करने के लिए एक विशेष प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की जा सकती है।

    इसमें स्वीडन और जर्मनी की तर्ज पर ओवरहेड केबल तकनीक, भारी ट्रकों के लिए ओवरहेड इलेक्ट्रिक लाइनों का ट्रायल अब बड़े स्तर पर शुरू किया जाएगा। हर 40-50 किलोमीटर पर सड़क किनारे फास्ट चार्जिंग स्टेशनों के लिए निजी ऑपरेटरों को 20-25 फीसदी की कैपिटल सब्सिडी मिलने की उम्मीद है। बजट में 10,000 से 11,000 किलोमीटर हाईवे निर्माण का लक्ष्य रखा जा सकता है। यानी प्रतिदिन 27 से 30 किलोमीटर सड़कों का निर्माण होगा।


    सड़क निर्माण में कचरे का उपयोग

    सरकार अब सर्कुलर इकोनॉमी के तहत नई सड़कों के निर्माण में नगर निगम के कचरे और प्लास्टिक के अनिवार्य उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। इसमें सड़क बनाने वाली कंपनियों को कार्बन क्रेडिट दिए जाएंगे, जिन्हें वे बाजार में बेच सकेंगी।


    सैटेलाइट से टोल कलेक्शन

    इस साल मंत्रालय सैटेलाइट टोलिंग योजना शुरू करेगा। इसके तहत टोल प्लाजा के बजाय सैटेलाइट से टोल टैक्स कलेक्शन किया जाएगा। इससे ईंधन की बचत होगी और ट्रैफिक जाम नहीं होगा। सड़क बनाने से पहले उसका डिजिटल मॉडल तैयार होगा, जो निर्माण की गलतियों में कमी और पारदर्शिता लाएगा। सरकार नया बिजनेस मॉडल ला सकती है, जहां निजी कंपनियां हाईवे पर बिजली की बुनियादी संरचना लगाएंगी और ट्रकों से बिजली खपत के आधार पर शुल्क वसूलेंगी।