Category: Economy

  • लोन लेने से पहले EMI के ये नियम जरूर जान लें: छोटी गलती बढ़ा सकती है बड़ा आर्थिक बोझ

    लोन लेने से पहले EMI के ये नियम जरूर जान लें: छोटी गलती बढ़ा सकती है बड़ा आर्थिक बोझ


    नई दिल्ली। आज के समय में घर, कार, शिक्षा और व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग तेजी से बैंक लोन का सहारा ले रहे हैं। आसान प्रोसेस और डिजिटल बैंकिंग के चलते लोन लेना पहले की तुलना में सरल जरूर हो गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि EMI से जुड़े नियमों की अनदेखी भविष्य में गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, लोन लेने से पहले अपनी मासिक आय, खर्च और EMI क्षमता का सही आकलन करना बेहद जरूरी है। गलत योजना से न केवल बजट बिगड़ सकता है, बल्कि लंबे समय तक आर्थिक दबाव भी बना रह सकता है।

    EMI आय का 35-40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए
    विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी व्यक्ति की कुल EMI उसकी मासिक आय के 35 से 40 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि EMI इससे ज्यादा हो जाती है, तो रोजमर्रा के खर्च, बचत और आपातकालीन जरूरतों पर सीधा असर पड़ता है। बैंकों द्वारा भी लोन मंजूरी से पहले आवेदक की आय, मौजूदा कर्ज और खर्च का विस्तृत आकलन किया जाता है ताकि डिफॉल्ट का जोखिम कम किया जा सके।

    ब्याज दर का सही चुनाव बेहद जरूरी
    लोन लेते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू ब्याज दर होता है। ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि फ्लोटिंग और फिक्स्ड ब्याज दर में बड़ा अंतर होता है। फ्लोटिंग रेट में बाजार की स्थिति के अनुसार EMI बढ़ या घट सकती है, जिससे भविष्य में भुगतान अनिश्चित हो सकता है। वहीं फिक्स्ड रेट में EMI पूरी अवधि के लिए स्थिर रहती है, जिससे बजट प्लानिंग आसान हो जाती है।

    लोन अवधि का सीधा असर EMI पर
    लोन की अवधि भी EMI को सीधे प्रभावित करती है। लंबी अवधि चुनने पर EMI कम हो जाती है, जिससे मासिक दबाव कम महसूस होता है, लेकिन कुल मिलाकर ब्याज अधिक देना पड़ता है। वहीं कम अवधि के लोन में EMI ज्यादा होती है, लेकिन कुल ब्याज कम चुकाना पड़ता है। ऐसे में वित्तीय विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि लोन अवधि का चुनाव अपनी आय और खर्च के संतुलन को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

    क्रेडिट स्कोर और अतिरिक्त चार्ज पर ध्यान जरूरी
    लोन लेने से पहले क्रेडिट स्कोर की जांच करना भी जरूरी है, क्योंकि अच्छा क्रेडिट स्कोर होने पर कम ब्याज दर पर लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज और अन्य छिपे हुए शुल्कों की जानकारी भी पहले से लेना जरूरी है, ताकि बाद में कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।

    सही योजना से ही बनती है वित्तीय स्थिरता
    विशेषज्ञों का कहना है कि लोन लेना गलत नहीं है, लेकिन बिना योजना के लिया गया कर्ज भविष्य में आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। सही EMI प्लानिंग और समझदारी से लिया गया निर्णय व्यक्ति को वित्तीय स्थिरता की ओर ले जाता है।

  • शेयर बाजार में 4 जून को हलचल: वैश्विक संकेतों के बीच उतार-चढ़ाव जारी, निवेशकों की नजर प्रमुख इंडेक्स पर

    शेयर बाजार में 4 जून को हलचल: वैश्विक संकेतों के बीच उतार-चढ़ाव जारी, निवेशकों की नजर प्रमुख इंडेक्स पर


    मुंबई। 4 जून 2026 को घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत वैश्विक संकेतों और निवेशकों की सतर्कता के बीच हल्की अस्थिरता के साथ देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में बाजार ने सीमित दायरे में मूवमेंट किया, जहां कुछ सेक्टरों में खरीदारी का रुझान दिखा, वहीं कुछ में मुनाफावसूली के कारण दबाव भी नजर आया। कुल मिलाकर बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना रहा और निवेशक बड़ी पोजिशन लेने से बचते दिखे।

    सुबह के सत्र में बाजार पर एशियाई बाजारों के मिश्रित संकेतों का असर साफ दिखाई दिया। अमेरिकी बाजारों में पिछले सत्र के उतार-चढ़ाव और कच्चे तेल की कीमतों में हलचल ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। इसके साथ ही डॉलर-रुपया विनिमय दर में उतार-चढ़ाव ने भी बाजार की दिशा को सीमित दायरे में रखा।

    निफ्टी और सेंसेक्स में सीमित दायरे का कारोबा
    कारोबार की शुरुआत में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही इंडेक्स सीमित दायरे में घूमते नजर आए। निफ्टी में बैंकिंग, आईटी और मेटल सेक्टर के शेयरों में हल्की खरीदारी देखने को मिली, जबकि ऑटो और एफएमसीजी सेक्टर में मुनाफावसूली का दबाव बना रहा। विश्लेषकों के अनुसार, बाजार में फिलहाल स्पष्ट ट्रेंड की कमी है और निवेशक आगामी आर्थिक आंकड़ों और वैश्विक संकेतों का इंतजार कर रहे हैं। यही कारण है कि बड़ी तेजी या गिरावट की बजाय बाजार में साइडवेज मूवमेंट देखने को मिल रहा है।

    सेक्टोरल प्रदर्शन: कहीं खरीदारी तो कहीं दबाव
    आज के कारोबार में बैंकिंग और आईटी सेक्टर ने बाजार को कुछ सहारा देने का काम किया। कई प्रमुख बैंकिंग शेयरों में हल्की तेजी देखी गई, जबकि आईटी कंपनियों में भी विदेशी मांग की उम्मीदों ने सपोर्ट दिया। वहीं दूसरी ओर, ऑटो सेक्टर में बिक्री के आंकड़ों को लेकर चिंता बनी रही, जिससे कुछ प्रमुख शेयर दबाव में आ गए। एफएमसीजी सेक्टर में भी मुनाफावसूली का असर देखा गया।

    निवेशकों की रणनीति: सतर्क रुख बरकरार
    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल निवेशकों को सतर्क रुख अपनाने की जरूरत है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और फेडरल रिजर्व की नीतियों को लेकर संकेतों का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स जहां हल्के मुनाफे की तलाश में सक्रिय हैं, वहीं लॉन्ग टर्म निवेशक मजबूत फंडामेंटल वाले शेयरों पर नजर बनाए हुए हैं।

    आगे की दिशा: डेटा और वैश्विक संकेत तय करेंगे रुझान
    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सत्रों में बाजार की दिशा मुख्य रूप से वैश्विक आर्थिक डेटा, विदेशी निवेश प्रवाह और घरेलू आर्थिक संकेतकों पर निर्भर करेगी। अगर विदेशी निवेशकों की खरीदारी बढ़ती है, तो बाजार में तेजी का नया दौर देखने को मिल सकता है। फिलहाल बाजार में स्थिरता के साथ हल्का उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • बैंकों को सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश, कर्ज समझौते के बाद धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता

    बैंकों को सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश, कर्ज समझौते के बाद धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता


    नई दिल्ली ।
    बैंकिंग और वित्तीय विवादों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि बैंक और कर्जदार के बीच लोन खाते से संबंधित विवाद का आपसी समझौते के जरिए समाधान हो चुका है, तो उसके बाद उसी मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे विवाद मुख्य रूप से दीवानी और व्यावसायिक प्रकृति के होते हैं तथा समझौते के बाद आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

    अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बैंकिंग लेनदेन और ऋण संबंधी विवादों का उद्देश्य मूल रूप से वित्तीय दायित्वों का समाधान करना होता है। जब दोनों पक्ष बातचीत और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से किसी विवाद का निपटारा कर लेते हैं, तब उसी मामले को आपराधिक मुकदमे के रूप में जारी रखना न केवल अनावश्यक है बल्कि इससे संबंधित व्यक्ति के लिए उत्पीड़न की स्थिति भी पैदा हो सकती है। न्यायालय ने कहा कि कानून का उद्देश्य विवादों का समाधान करना है, न कि समझौते के बाद भी पक्षकारों को अनिश्चित कानूनी प्रक्रिया में उलझाए रखना।

    मामला एक कारोबारी से जुड़ा था, जिसने अदालत के समक्ष बताया कि उसने अपने बैंक के साथ बकाया ऋण को लेकर समझौता कर लिया था। समझौते के तहत निर्धारित राशि का भुगतान भी किया गया और विवाद का निपटारा हो गया। इसके बावजूद कुछ समय बाद उसी मामले में धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित आपराधिक मामला दर्ज किया गया, जिसकी जांच आगे बढ़ाई गई और आरोपपत्र भी दाखिल किया गया। कारोबारी ने इसे चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों का विस्तृत परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच पहले ही वित्तीय समझौता हो चुका था और बैंक को भुगतान प्राप्त हो गया था। ऐसे में आपराधिक कार्रवाई को जारी रखने का कोई ठोस औचित्य दिखाई नहीं देता। अदालत ने यह भी कहा कि समझौते के बाद मुकदमा शुरू करना या उसे जारी रखना सद्भावना के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में व्यापक आर्थिक और व्यावसायिक प्रभावों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में समझौते के बाद भी आपराधिक मुकदमे चलते रहे तो कारोबारी, उद्योगपति और अन्य ऋणग्राही भविष्य में विवादों के समाधान के लिए समझौते का रास्ता अपनाने से हिचक सकते हैं। इससे बैंकिंग क्षेत्र में विवाद निपटान की प्रक्रिया प्रभावित होगी और वित्तीय संस्थानों तथा ग्राहकों के बीच विश्वास कमजोर पड़ सकता है।

    न्यायालय ने यह भी माना कि संबंधित मामले में समझौते के बाद दोषसिद्धि की संभावना अत्यंत कम थी। ऐसे में लंबी आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता। अदालत ने कहा कि न्यायिक संसाधनों का उपयोग उन मामलों में होना चाहिए जहां वास्तविक विवाद और अभियोजन की आवश्यकता मौजूद हो। केवल औपचारिक रूप से मुकदमा जारी रखना न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालने जैसा होगा।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में बैंकिंग और वित्तीय विवादों से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। इससे यह संदेश जाता है कि जब किसी वित्तीय विवाद का वैधानिक और पारस्परिक समाधान हो जाए, तो पक्षकारों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों में नहीं उलझाया जाना चाहिए। साथ ही यह निर्णय विवाद समाधान की संस्कृति को भी प्रोत्साहित करेगा और बैंकिंग क्षेत्र में विश्वास एवं पारदर्शिता को मजबूत बनाने में सहायक हो सकता है।

  • आईटी, ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं का दम, मई में सर्विस सेक्टर की ग्रोथ तेज, रोजगार सृजन में भी बढ़ोतरी

    आईटी, ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं का दम, मई में सर्विस सेक्टर की ग्रोथ तेज, रोजगार सृजन में भी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत और उत्साह देने वाली खबर सामने आई है। देश के सेवा क्षेत्र ने मई 2026 में उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए पिछले छह महीनों की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की है। मजबूत मांग, नए ग्राहकों की बढ़ती संख्या और विभिन्न क्षेत्रों में कारोबारी गतिविधियों के विस्तार ने सर्विस सेक्टर को नई ऊर्जा प्रदान की है। ताजा आर्थिक संकेतकों से स्पष्ट है कि भारत का सेवा क्षेत्र घरेलू और वैश्विक दोनों स्तरों पर बढ़ती मांग का लाभ उठा रहा है।

    मई के दौरान सर्विसेज पीएमआई 59.8 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के मुकाबले अधिक है और नवंबर के बाद का सबसे मजबूत प्रदर्शन माना जा रहा है। आर्थिक गतिविधियों को मापने वाले इस सूचकांक में 50 से ऊपर का स्तर विस्तार का संकेत देता है। ऐसे में 59.8 का आंकड़ा यह दर्शाता है कि सेवा क्षेत्र में विकास की गति लगातार मजबूत बनी हुई है और कारोबार में सकारात्मक माहौल कायम है।

    विशेषज्ञों के अनुसार माल ढुलाई, डिजिटल सेवाएं, ई-कॉमर्स, सूचना प्रौद्योगिकी और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में बढ़ती मांग ने इस वृद्धि को प्रमुख रूप से समर्थन दिया है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार और ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ते उपयोग का असर भी सेवा क्षेत्र की गतिविधियों पर साफ दिखाई दिया। कंपनियों को नए ग्राहकों और नए प्रोजेक्ट्स से लगातार ऑर्डर प्राप्त हुए, जिससे कारोबारी विश्वास को मजबूती मिली।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों से भी भारतीय सेवा क्षेत्र को सकारात्मक संकेत मिले हैं। विदेशी ग्राहकों की मांग में सुधार दर्ज किया गया, जिससे निर्यात आधारित सेवाओं को बल मिला। विभिन्न देशों से प्राप्त नए ऑर्डरों ने भारतीय कंपनियों को अपनी सेवाओं का दायरा बढ़ाने का अवसर दिया। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है, जो निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    सेवा क्षेत्र में गतिविधियों के विस्तार का प्रभाव रोजगार बाजार पर भी दिखाई दिया। कई कंपनियों ने बढ़ते कार्यभार को देखते हुए नए कर्मचारियों की भर्ती की। रोजगार सृजन की गति पिछले एक वर्ष के दौरान सबसे मजबूत स्तरों में से एक रही। हालांकि अधिकांश कंपनियों ने अपने मौजूदा कार्यबल को बनाए रखा, फिर भी नई भर्तियों में बढ़ोतरी आर्थिक गतिविधियों में सुधार का संकेत देती है।

    दूसरी ओर लागत संबंधी चुनौतियां भी बनी हुई हैं। खाद्य सामग्री, ईंधन, गैस, श्रम और अन्य परिचालन खर्चों में बढ़ोतरी के कारण कंपनियों की लागत बढ़ी है। हालांकि लागत में वृद्धि के बावजूद कंपनियां अपनी कारोबारी गतिविधियों का विस्तार करने में सफल रही हैं। महंगाई के दबाव में कुछ नरमी आने से सेवा प्रदाताओं पर मूल्य बढ़ाने का दबाव भी पहले की तुलना में कम हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू मांग मजबूत बनी रहती है और वैश्विक बाजारों से सकारात्मक संकेत मिलते रहते हैं, तो आने वाले महीनों में भी सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन मजबूत रह सकता है। कारोबारी संस्थानों का दृष्टिकोण फिलहाल आशावादी बना हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि आर्थिक गतिविधियों में सुधार आगे भी जारी रहेगा।

    सेवा क्षेत्र की मजबूती का असर समग्र अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दिया है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के संयुक्त प्रदर्शन को दर्शाने वाला कंपोजिट पीएमआई भी मई में बेहतर स्तर पर पहुंच गया। इससे संकेत मिलता है कि निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां गति पकड़ रही हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के मजबूत पथ पर आगे बढ़ रही है।

  • विंड एनर्जी से आगे बढ़ेगी सुजलॉन, FY31 तक 10 GW सेल्स और 70 GW एसेट मैनेजमेंट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य

    विंड एनर्जी से आगे बढ़ेगी सुजलॉन, FY31 तक 10 GW सेल्स और 70 GW एसेट मैनेजमेंट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य

    नई दिल्ली । भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में तेजी से बदलते परिदृश्य के बीच सुजलॉन एनर्जी ने अपने विकास की नई रणनीति ‘Suzlon 2.0’ का ऐलान किया है। इस नई योजना के तहत कंपनी केवल विंड टरबाइन निर्माता की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि विंड, सोलर, बैटरी एनर्जी स्टोरेज और एसेट मैनेजमेंट जैसी सेवाओं को एकीकृत करते हुए खुद को फुल-स्टैक रिन्यूएबल एनर्जी सॉल्यूशंस कंपनी के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। कंपनी का लक्ष्य स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक उपस्थिति दर्ज कराते हुए आने वाले वर्षों में अपनी कारोबारी क्षमता को कई गुना बढ़ाना है।

    कंपनी द्वारा प्रस्तुत रोडमैप के अनुसार वित्त वर्ष 2031 तक वार्षिक रिन्यूएबल एनर्जी बिक्री को 10 गीगावाट तक पहुंचाने और एसेट अंडर मैनेजमेंट को बढ़ाकर 70 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही कंपनी भारतीय पवन ऊर्जा बाजार में अपनी हिस्सेदारी को और मजबूत करने की योजना पर काम कर रही है। वर्तमान में कंपनी देश के विंड एनर्जी बाजार में महत्वपूर्ण उपस्थिति रखती है और आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र को अपना प्रमुख विकास इंजन बनाए रखने का इरादा रखती है।

    नई रणनीति के तहत कंपनी चार प्रमुख व्यावसायिक स्तंभों पर ध्यान केंद्रित करेगी। इनमें विंड-फर्स्ट ऊर्जा समाधान, परियोजना विकास, ऊर्जा परियोजनाओं का निष्पादन और एसेट मैनेजमेंट सेवाएं शामिल हैं। कंपनी का उद्देश्य ग्राहकों को एक ही मंच पर संपूर्ण रिन्यूएबल एनर्जी समाधान उपलब्ध कराना है, जिससे परियोजनाओं के विकास और संचालन की जटिलताओं को कम किया जा सके। इसके जरिए कंपनी बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं को अधिक तेज, प्रभावी और भरोसेमंद तरीके से लागू करने की योजना बना रही है।

    सुजलॉन का मानना है कि भविष्य में केवल ऊर्जा उत्पादन ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऊर्जा के भंडारण और प्रबंधन की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। इसी सोच के तहत कंपनी ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम क्षेत्र में प्रवेश करने की घोषणा की है। कंपनी की योजना आने वाले वर्षों में बैटरी स्टोरेज विनिर्माण सुविधाएं विकसित करने और भारतीय बिजली ग्रिड की जरूरतों के अनुरूप उन्नत ऊर्जा भंडारण समाधान उपलब्ध कराने की है। इससे सौर और पवन ऊर्जा जैसी अस्थिर स्रोतों से उत्पन्न बिजली को अधिक विश्वसनीय तरीके से उपयोग में लाया जा सकेगा।

    विंड एनर्जी कंपनी के विकास का मुख्य आधार बनी रहेगी। सुजलॉन ने इस क्षेत्र में अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने और उच्च क्षमता वाले आधुनिक टरबाइन विकसित करने की योजना भी सामने रखी है। कंपनी का मानना है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है और इस क्षेत्र में तकनीकी नवाचार भविष्य की प्रतिस्पर्धा तय करेंगे। इसी उद्देश्य से अगली पीढ़ी के उच्च क्षमता वाले विंड टरबाइन विकसित किए जा रहे हैं, जो ऊर्जा उत्पादन की दक्षता बढ़ाने में मदद करेंगे।

    कंपनी ने परियोजना विकास और एसेट मैनेजमेंट को भी अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। इसके तहत भूमि अधिग्रहण, ग्रिड कनेक्टिविटी, नियामकीय मंजूरियां और परियोजना निष्पादन जैसी प्रक्रियाओं को एकीकृत तरीके से संचालित किया जाएगा। इससे परियोजनाओं की तैयारी और क्रियान्वयन की गति बढ़ाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा की मांग आने वाले वर्षों में तेज गति से बढ़ेगी। ऐसे में सुजलॉन की नई रणनीति उसे केवल पवन ऊर्जा कंपनी के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक रिन्यूएबल एनर्जी समाधान प्रदाता के रूप में स्थापित कर सकती है। यदि निर्धारित लक्ष्य समय पर हासिल होते हैं तो कंपनी देश के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में और अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकती है।

  • बढ़ती ईंधन लागत पर सरकार का बड़ा फैसला, घरेलू एयरलाइंस के लिए 10,000 करोड़ रुपये का विशेष समर्थन पैकेज

    बढ़ती ईंधन लागत पर सरकार का बड़ा फैसला, घरेलू एयरलाइंस के लिए 10,000 करोड़ रुपये का विशेष समर्थन पैकेज

    नई दिल्ली । देश के विमानन क्षेत्र को बढ़ती ईंधन लागत के दबाव से राहत देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) की अस्थिर और ऊंची कीमतों के प्रभाव को कम करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये की विशेष बजटीय सहायता को मंजूरी दी गई है। सरकार का मानना है कि इस कदम से एयरलाइंस को ईंधन लागत में स्थिरता मिलेगी और वे अपने परिचालन को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित कर सकेंगी।

    सरकार द्वारा स्वीकृत यह सहायता तेल विपणन कंपनियों को ब्याज-मुक्त अग्रिम राशि के रूप में उपलब्ध कराई जाएगी। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन कीमतों में आने वाले अचानक उतार-चढ़ाव के दौरान एयरलाइंस को अपेक्षाकृत स्थिर दरों पर एटीएफ उपलब्ध कराना है। पिछले कुछ महीनों में वैश्विक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण विमानन ईंधन की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका सीधा असर एयरलाइंस की परिचालन लागत पर पड़ा है।

    नई व्यवस्था के तहत एटीएफ मूल्य स्थिरीकरण सहायता को 36 महीनों तक लागू रखा जाएगा। हालांकि इसकी वार्षिक समीक्षा की जाएगी और आवश्यकता के अनुसार इसमें संशोधन भी संभव होगा। योजना का उद्देश्य केवल तत्काल राहत प्रदान करना नहीं है, बल्कि विमानन उद्योग को वित्तीय अनिश्चितताओं से बचाते हुए दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करना भी है।

    सरकारी व्यवस्था के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में एटीएफ की आयात समता कीमत निर्धारित मानक स्तर से अधिक हो जाती है, तो उससे होने वाले अतिरिक्त वित्तीय भार की भरपाई इस सहायता कोष से की जाएगी। दूसरी ओर जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों में कमी आएगी, तब तेल विपणन कंपनियों से अंतर की राशि वापस ली जाएगी और उसे सरकारी कोष में जमा कराया जाएगा। इस प्रकार योजना को संतुलित और वित्तीय रूप से जिम्मेदार ढंग से संचालित करने का प्रयास किया गया है।

    यह सुविधा सभी इच्छुक अनुसूचित भारतीय एयरलाइंस के लिए उपलब्ध होगी और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार की उड़ानों पर लागू होगी। योजना में भाग लेने वाली एयरलाइंस को एक निर्धारित अवधि तक केवल अधिकृत तेल विपणन कंपनियों से ही एटीएफ खरीदना होगा। इसके लिए एयरलाइंस और तेल विपणन कंपनियों के बीच औपचारिक समझौता किया जाएगा, जिसमें संबंधित मंत्रालय भी भागीदार होंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि विमानन उद्योग की लागत संरचना में ईंधन का हिस्सा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में ईंधन कीमतों में तेज वृद्धि सीधे टिकट दरों, परिचालन योजनाओं और एयरलाइंस की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करती है। सरकार की इस पहल से एयरलाइंस को लागत प्रबंधन में मदद मिलेगी और वे भविष्य की व्यावसायिक रणनीतियां अधिक सटीक तरीके से तैयार कर सकेंगी।

    इस निर्णय का प्रभाव केवल विमानन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने की संभावना है। पर्यटन, होटल उद्योग, व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय संपर्क जैसे क्षेत्रों को भी इससे अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। बेहतर और स्थिर हवाई सेवाएं आर्थिक गतिविधियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिससे व्यापक स्तर पर विकास को प्रोत्साहन मिल सकता है।

    हालिया आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में एटीएफ की कीमतों में बेहद तेज वृद्धि हुई है। कुछ ही महीनों के भीतर ईंधन लागत में कई गुना बढ़ोतरी ने एयरलाइंस के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर दी थी। ऐसे समय में सरकार का यह कदम विमानन उद्योग को राहत देने और उसकी वित्तीय स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन सीएस शेट्टी ने ब्याज दरों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में ब्याज दरों में किसी प्रकार का बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए अधिक लाभदायक रहेगा। उनके अनुसार इस समय नीतिगत दरों में स्थिरता बनाए रखने से आर्थिक गतिविधियों को संतुलित समर्थन मिलेगा और विकास की रफ्तार भी बनी रहेगी। बाजार की सामान्य धारणा भी यही संकेत देती है कि आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना केंद्रीय बैंक की प्रमुख जिम्मेदारी होती है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर रखना एक व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरें उद्योग, कारोबार और उपभोक्ताओं को स्पष्ट संकेत देती हैं, जिससे निवेश और ऋण गतिविधियों को निरंतरता मिलती है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था इस समय सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और इसे स्थिर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।

    एसबीआई चेयरमैन ने निवेशकों को सलाह देते हुए कहा कि शेयर बाजार में होने वाले रोजाना उतार-चढ़ाव को लेकर अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक ताकत उसकी दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता में निहित है। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, डिजिटल क्रांति, वित्तीय समावेशन और तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि निवेशकों को अल्पकालिक बाजार गतिविधियों के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं पर ध्यान देना चाहिए।

    सीएस शेट्टी ने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याएं और तकनीकी परिवर्तन जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत एक स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में आर्थिक सुधारों और निवेश के अनुकूल वातावरण ने भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

    डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने भारत की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आज देश की सबसे बड़ी तकनीकी सफलताओं में शामिल है। हर महीने अरबों डिजिटल लेनदेन यूपीआई के माध्यम से किए जा रहे हैं, जिससे नकदी पर निर्भरता कम हुई है और भुगतान प्रणाली अधिक तेज, सुरक्षित तथा पारदर्शी बनी है। उन्होंने बताया कि एसबीआई की डिजिटल सेवाओं की सफलता उसकी मजबूत तकनीकी संरचना और ग्राहकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।

    उन्होंने वित्तीय समावेशन में जनधन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार ‘जेएएम ट्रिनिटी’ ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में अहम योगदान दिया है। इसके साथ ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) प्रणाली ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद की है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और विभिन्न योजनाओं में होने वाली संभावित अनियमितताओं में कमी आई है।

    भारत की भविष्य की विकास यात्रा पर बात करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि आने वाले वर्षों में देश को बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी। उन्होंने बताया कि बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा परिवर्तन, शहरी विकास, एमएसएमई और नवाचार जैसे क्षेत्रों में विशाल निवेश अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बनेंगे।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर भी उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उनका मानना है कि भारत एआई तकनीक के उपयोग और विस्तार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन सकता है। उन्होंने बताया कि एसबीआई पहले से कई बैंकिंग सेवाओं में एआई आधारित प्रणालियों का उपयोग कर रहा है और इसके लिए जिम्मेदार तथा सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने हेतु विशेष ढांचा भी विकसित किया गया है।

    कर्ज की मांग के संबंध में उन्होंने कहा कि छोटे और मध्यम उद्योगों सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऋण की मांग मजबूत बनी हुई है। बैंक लगातार उद्यमियों और व्यवसायों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही बैंक विलय एवं अधिग्रहण से जुड़े वित्तपोषण के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत की मजबूत आर्थिक नींव, डिजिटल प्रगति और निवेश क्षमता देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में मदद करेगी।

  • EPFO Update: मार्च खत्म हुए दो महीने बीते, पीएफ खाते में कब आएगा 8.25% ब्याज? जानिए ताजा अपडेट

    EPFO Update: मार्च खत्म हुए दो महीने बीते, पीएफ खाते में कब आएगा 8.25% ब्याज? जानिए ताजा अपडेट

    नई दिल्ली। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के करोड़ों खाताधारकों को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए घोषित ब्याज राशि का इंतजार है। मार्च में ब्याज दर तय किए जाने के बावजूद जून की शुरुआत तक खातों में ब्याज जमा नहीं होने से कई कर्मचारियों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पीएफ खाते में ब्याज कब आएगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि ब्याज दर घोषित होने और उसे खातों में जमा किए जाने के बीच कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।

    ईपीएफओ ने मार्च 2026 की शुरुआत में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कर्मचारी भविष्य निधि पर 8.25 प्रतिशत ब्याज दर बनाए रखने का फैसला किया था। यह निर्णय केंद्रीय न्यासी बोर्ड की बैठक के बाद लिया गया था। इसके बाद श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से इस संबंध में जानकारी भी साझा की गई थी। हालांकि ब्याज दर की घोषणा के बाद इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार की औपचारिक अधिसूचना जारी होना आवश्यक होता है। इसी प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ईपीएफओ अपने करोड़ों सदस्यों के खातों में ब्याज की राशि जमा करता है।

    देशभर में लगभग सात करोड़ से अधिक पीएफ खाताधारक हैं, जिनकी नजर हर साल अपने खाते में जमा होने वाले ब्याज पर रहती है। वित्त वर्ष समाप्त होने के दो महीने बाद भी ब्याज राशि जमा नहीं होने से कर्मचारियों के बीच चर्चा बढ़ गई है। कई लोग यह जानना चाहते हैं कि जब ब्याज दर मार्च में ही तय हो चुकी है तो राशि अब तक खातों में क्यों नहीं पहुंची। विशेषज्ञों के अनुसार ब्याज क्रेडिट करने से पहले सरकार की मंजूरी, तकनीकी अपडेट और खातों का सत्यापन जैसी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं, जिनमें कुछ समय लगना सामान्य बात है।

    वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों के अनुभव को देखें तो ईपीएफओ आमतौर पर जून या जुलाई के दौरान खातों में ब्याज की राशि जमा करता है। पहले यह प्रक्रिया सितंबर या अक्टूबर तक चलती थी, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि इस वर्ष भी सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद जून या जुलाई के दौरान करोड़ों खाताधारकों के खातों में ब्याज की राशि दिखाई देने लगेगी। हालांकि अंतिम समयसीमा को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    ईपीएफओ सदस्य अपने खाते में ब्याज जमा हुआ है या नहीं, इसकी जानकारी घर बैठे मोबाइल फोन के जरिए भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए उमंग ऐप एक आसान विकल्प माना जाता है। उपयोगकर्ता सबसे पहले अपने मोबाइल फोन में उमंग ऐप डाउनलोड कर सकते हैं और मोबाइल नंबर के माध्यम से पंजीकरण कर सकते हैं। इसके बाद ईपीएफओ सेवाओं के विकल्प में जाकर ‘व्यू पासबुक’ पर क्लिक करना होगा। ओटीपी सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सदस्य अपने खाते का बैलेंस और ब्याज से जुड़ी जानकारी देख सकते हैं।

    इसके अलावा ईपीएफओ की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से भी पीएफ खाते का विवरण देखा जा सकता है। सदस्य पोर्टल पर लॉग इन करने के बाद ‘मेंबर पासबुक’ विकल्प पर क्लिक करके अपने खाते में जमा राशि, मासिक योगदान और ब्याज संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यदि ब्याज की राशि खाते में जमा कर दी गई होगी तो वह पासबुक में दिखाई देने लगेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पीएफ खाताधारकों को फिलहाल घबराने की आवश्यकता नहीं है। ब्याज राशि में किसी प्रकार की कटौती या देरी की कोई आधिकारिक सूचना नहीं है। सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद ईपीएफओ निर्धारित प्रक्रिया के तहत सभी पात्र खातों में ब्याज जमा करेगा। ऐसे में कर्मचारियों को समय-समय पर अपनी पासबुक जांचते रहना चाहिए और किसी भी अपडेट के लिए आधिकारिक स्रोतों पर नजर बनाए रखनी चाहिए।

  • आरबीआई का बड़ा बयान: सोना बेचने की खबरें फर्जी, भारत के पास अब भी 880.52 टन गोल्ड रिजर्व सुरक्षित

    आरबीआई का बड़ा बयान: सोना बेचने की खबरें फर्जी, भारत के पास अब भी 880.52 टन गोल्ड रिजर्व सुरक्षित

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने देश के स्वर्ण भंडार को लेकर फैल रही अटकलों और मीडिया रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि भारत के पास मौजूद भौतिक सोने के भंडार में किसी प्रकार की बिक्री या कमी नहीं हुई है और यह पहले की तरह 880.52 टन पर स्थिर है।

    आरबीआई ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जारी बयान में कहा कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया था कि केंद्रीय बैंक ने अपने गोल्ड रिजर्व का एक हिस्सा बेच दिया है, जो पूरी तरह गलत और भ्रामक है। बैंक ने दोहराया कि उसके पास मौजूद भौतिक सोने का भंडार सुरक्षित है और इसमें कोई बदलाव दर्ज नहीं किया गया है।

    केंद्रीय बैंक ने यह भी बताया कि स्वर्ण भंडार से संबंधित सभी आधिकारिक आंकड़े नियमित रूप से मासिक बुलेटिन में प्रकाशित किए जाते हैं, जिन्हें आरबीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर देखा जा सकता है। बैंक ने लोगों से अपील की कि वे केवल आधिकारिक स्रोतों से जारी जानकारी पर ही भरोसा करें और अफवाहों से बचें।

    इस मामले में प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट ने भी स्थिति स्पष्ट करते हुए इन खबरों को फर्जी बताया है। पीआईबी ने कहा कि सोशल मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया था कि आरबीआई ने लगभग 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना बेच दिया है, लेकिन यह जानकारी तथ्यात्मक रूप से गलत है।

    पीआईबी के अनुसार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। सितंबर 2025 के अंत में यह हिस्सेदारी 13.92 प्रतिशत थी, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 16.70 प्रतिशत हो गई। इसके बाद 22 मई 2026 तक यह और बढ़कर 16.85 प्रतिशत तक पहुंच गई। ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की भूमिका मजबूत हो रही है।

    इससे पहले एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ब्लूमबर्ग के हवाले से आरबीआई ने हाल के दो हफ्तों में लगभग 12 अरब डॉलर मूल्य का सोना बेचकर विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां खरीदी हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद वित्तीय बाजारों और निवेशकों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।

    हालांकि आरबीआई और पीआईबी दोनों ने इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि यह रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित नहीं है। केंद्रीय बैंक ने दोहराया कि भारत का स्वर्ण भंडार पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें किसी तरह की बिक्री या गिरावट नहीं हुई है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की बढ़ती हिस्सेदारी देश की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच एक सुरक्षा कवच के रूप में देखी जाती है। सोने को हमेशा से एक सुरक्षित निवेश माना जाता है और केंद्रीय बैंक भी इसे अपने रिजर्व पोर्टफोलियो का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए रखते हैं।

    इस स्पष्टीकरण के बाद अब बाजार में फैली अटकलों पर विराम लगने की उम्मीद है और निवेशकों के बीच स्थिति को लेकर स्पष्टता आई है। आरबीआई ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि देश की वित्तीय स्थिति मजबूत है और स्वर्ण भंडार पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर बना हुआ है।

  • आरबीआई एमपीसी की तीन दिवसीय बैठक शुरू, ब्याज दरों पर फैसले को लेकर बाजार की निगाहें टिकीं, महंगाई और वैश्विक तनाव बना मुख्य फोकस

    आरबीआई एमपीसी की तीन दिवसीय बैठक शुरू, ब्याज दरों पर फैसले को लेकर बाजार की निगाहें टिकीं, महंगाई और वैश्विक तनाव बना मुख्य फोकस

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक बुधवार से शुरू हो गई है, जिसमें देश की मौद्रिक नीति की दिशा तय करने को लेकर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है। यह बैठक ऐसे समय पर हो रही है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई प्रकार की चुनौतियों से गुजर रही है और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था पर महंगाई और विकास दर दोनों को संतुलित रखने का दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार आरबीआई रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और मौजूदा दरों को यथावत बनाए रखेगा, हालांकि नीति वक्तव्य में अधिक सतर्क रुख देखने को मिल सकता है।

    इस बैठक पर बाजार और निवेशकों की खास नजर बनी हुई है क्योंकि इससे आने वाले महीनों में ऋण, निवेश और आर्थिक गतिविधियों की दिशा तय होगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा शुक्रवार को बैठक के बाद नीतिगत फैसलों की घोषणा करेंगे। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, जिसका सीधा असर भारत की महंगाई दर पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें स्थिर नहीं रहती हैं तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर दबाव बढ़ सकता है और महंगाई अनुमान में वृद्धि संभव है।

    एचएसबीसी और अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों के विश्लेषकों का कहना है कि निकट भविष्य में आरबीआई ब्याज दरों को स्थिर रखने की रणनीति अपनाएगा, लेकिन परिस्थितियों के अनुसार आगे चलकर सख्ती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिए गए हैं कि बाजार 2026 के अंत तक दरों में हल्की कटौती की संभावना को देख रहा है, हालांकि यह पूरी तरह वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

    अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि महंगाई का मौजूदा दबाव मुख्य रूप से आपूर्ति पक्ष से जुड़ा हुआ है, न कि मांग में तेजी के कारण। ऐसे में आरबीआई के लिए चुनौती यह होगी कि वह विकास दर को प्रभावित किए बिना मूल्य स्थिरता बनाए रखे। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 6.6 से 6.7 प्रतिशत के बीच रह सकती है, बशर्ते वैश्विक तेल कीमतें नियंत्रित रहें।