Category: Economy

  • सिंगापुर दौरे पर सीएम नायब सिंह सैनी ने हरियाणा में निवेश, उद्योग और इनोवेशन बढ़ाने की प्राथमिकताएं सामने रखीं

    सिंगापुर दौरे पर सीएम नायब सिंह सैनी ने हरियाणा में निवेश, उद्योग और इनोवेशन बढ़ाने की प्राथमिकताएं सामने रखीं

    नई दिल्ली ।हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सिंगापुर दौरे के दूसरे दिन सिंगापुर इंडिया नेटवर्क फॉर ग्रोथ फोरम के तहत आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में सिंगापुर के प्रमुख उद्योगपति, विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी मौजूद रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य हरियाणा में भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ हरियाणा और सिंगापुर के बीच आपसी सहयोग के नए अवसर तलाशना रहा।

    मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार का लक्ष्य हरियाणा को केवल एक औद्योगिक शक्ति तक सीमित नहीं रखना, बल्कि इसे भारत की इनोवेशन कैपिटल के रूप में स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के जरिए दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग और साझेदारी को नई दिशा देने के अवसर मिल रहे हैं। सैनी ने उन्हें अपने विचार रखने का अवसर देने के लिए सिंगापुर बिजनेस फेडरेशन का आभार भी व्यक्त किया।

    सैनी ने कहा कि यह मंच दो ऐसी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद का अवसर उपलब्ध कराता है, जिनके बीच विश्वास, मित्रता और सहयोग का संबंध लगातार मजबूत हुआ है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 में हरियाणा ने सिंगापुर की कंपनियों और संस्थाओं के साथ पांच बड़े समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए थे। मुख्यमंत्री ने हरियाणा की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य उत्तर भारत के बड़े उपभोक्ता और विनिर्माण बाजार के बीच स्थित है।

    मुख्यमंत्री के मुताबिक, हरियाणा में प्रमुख आर्थिक कॉरिडोर, एक्सप्रेसवे और बेहतर फ्रेट कनेक्टिविटी उपलब्ध है। उनके अनुसार, ये सुविधाएं राज्य में उद्योगों और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती हैं। उन्होंने कहा कि गुरुग्राम और उसके आसपास इंटीग्रेटेड टाउनशिप, कमर्शियल डेवलपमेंट और आधुनिक शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में सिंगापुर की कंपनियों के साथ साझेदारी की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने सिंगापुर की कंपनियों से हरियाणा में अपने टेक्नोलॉजी और प्रोफेशनल कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित करने का भी आह्वान किया।

    सैनी ने बताया कि हाल ही में हरियाणा ने सिंगापुर स्थित एक ग्लोबल स्कूल ग्रुप के साथ साझेदारी की है। इसके तहत राज्य में विश्वस्तरीय के-12 शिक्षा का बुनियादी ढांचा विकसित करने की योजना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हरियाणा सरकार ऐसा मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना चाहती है, जिसमें कारोबार तेजी से आगे बढ़े और उसके साथ रोजगार, निवेश तथा इनोवेशन के नए अवसर भी पैदा हों। उन्होंने कहा कि सिंगापुर के साथ सहयोग हरियाणा के औद्योगिक और आर्थिक विकास को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में गतिरोध, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं- आगे बढ़ना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल

    भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में गतिरोध, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं- आगे बढ़ना दोनों पक्षों के लिए मुश्किल

    नई दिल्ली ।भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन दोनों देश फिलहाल ऐसे पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां आगे बढ़ना मुश्किल दिखाई दे रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि समझौते पर बेहद कठिन और गहन बातचीत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है, जबकि अमेरिका अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग 2026 में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वार्ता अभी खत्म नहीं हुई है। दोनों पक्ष यह देखने की कोशिश कर सकते हैं कि क्या आगे बातचीत की कोई गुंजाइश बाकी है। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा स्थिति में दोनों देशों के लिए कुछ और देना या लेना आसान नहीं होगा। प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत काफी कठिन और व्यापक स्तर पर हुई है।

    सीतारमण ने कहा कि व्यापार संतुलन इस समय भारत के पक्ष में है और अमेरिका की प्रमुख चिंता अपने व्यापार घाटे को कम करना है। उनके अनुसार, अमेरिका की यह चिंता कई वर्षों से भारत के साथ होने वाले व्यापार में उसके नुकसान से जुड़ी हुई है। दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम व्यापार समझौते के लिए तय रूपरेखा के तहत हो रही है। भारत और अमेरिका ने उस समय व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखते हुए अंतरिम समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में काम करने की बात कही थी।

    वित्त मंत्री ने इस दौरान भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए व्यापार समझौते का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे व्यापार समझौतों को लेकर भारत के दृष्टिकोण के उदाहरण के रूप में पेश किया। सीतारमण के अनुसार, यह समझौता करीब दो अरब लोगों और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाली अर्थव्यवस्थाओं को कवर करेगा। उन्होंने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के इस्तेमाल किए गए वाक्यांश का उल्लेख करते हुए इसे “सभी समझौतों की मां” कहना उचित बताया।

    सीतारमण ने बताया कि भारत-यूरोपीय संघ समझौते के तहत भारत ने अपनी 92.5 प्रतिशत टैरिफ लाइनों और व्यापार मूल्य के करीब 97 प्रतिशत हिस्से को खोल दिया है। वहीं, यूरोपीय संघ ने व्यापार मूल्य के करीब 99 प्रतिशत और लगभग 97 प्रतिशत टैरिफ लाइनों को खोला है। उन्होंने कहा कि बाजार पहुंच से जुड़ी प्रतिबद्धताओं का चयन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की पूरकता को ध्यान में रखकर किया गया। साथ ही यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि इन प्रतिबद्धताओं का भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अमेरिका के साथ बातचीत में भी आगे की संभावनाओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच चर्चा जारी है।

  • चंद्रशेखरन बोले- भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, विकसित भारत 2047 के लिए बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी में निवेश जरूरी

    चंद्रशेखरन बोले- भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, विकसित भारत 2047 के लिए बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी में निवेश जरूरी

    नई दिल्ली ।टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने सोमवार को कहा कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चित माहौल के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत और स्थिर बनी हुई है। उन्होंने इसके पीछे मजबूत घरेलू मांग, सेवा निर्यात और अनुकूल नीतिगत माहौल को प्रमुख कारण बताया। चंद्रशेखरन ने कहा कि भारत ने हाल के वर्षों में लगातार उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है और मजबूत विकास के रास्ते पर बना हुआ है।

    इंडियन फाउंडेशन फॉर क्वालिटी मैनेजमेंट सिम्पोजियम 2026 में बोलते हुए चंद्रशेखरन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन को अच्छा बताया। उन्होंने कहा कि कई आर्थिक संकेतक देश की स्थिर और मजबूत स्थिति की ओर इशारा करते हैं। उनके अनुसार, ऑटोमोबाइल बिक्री, क्रेडिट ग्रोथ, बिजली और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में बनी मजबूत मांग अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है।

    चंद्रशेखरन ने चालू खाते की स्थिति को भी सकारात्मक आर्थिक संकेतकों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि चालू खाता घाटा लगातार जीडीपी के एक प्रतिशत से नीचे बना हुआ है। इसके अलावा सेवा निर्यात जीडीपी के करीब 11 प्रतिशत के बराबर है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की बेहतर स्थिति भी देश के आर्थिक परिदृश्य को समर्थन देने वाले महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत के विकसित भारत 2047 के विजन को हासिल करने के लिए समावेशी और टिकाऊ विकास पर ध्यान देना होगा। इसके लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, मजबूत संस्थानों और बौद्धिक संपदा का समर्थन जरूरी होगा। चंद्रशेखरन ने लंबे समय तक आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए ऊर्जा सुरक्षा, उन्नत और सटीक विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार तथा मानव पूंजी में निवेश को महत्वपूर्ण बताया।

    चंद्रशेखरन ने भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बदलाव की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने गुणवत्ता, नवाचार, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता पर अधिक ध्यान देने की बात कही। उनके अनुसार, भारत जर्मनी जैसे देशों से सीख सकता है, जहां इंजीनियरिंग, मानकों और सटीकता के साथ मजबूत आपूर्तिकर्ता तथा छोटे एवं मध्यम उद्यमों के इकोसिस्टम ने प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत में भी इसी तरह के बदलाव की जरूरत है।

    उन्होंने भारत की व्यापक विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं में टिकाऊ विनिर्माण को शामिल करने की आवश्यकता भी बताई। चंद्रशेखरन के मुताबिक, ऐसा बदलाव केवल बड़ी कंपनियों के स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मध्यम स्तर के कारोबारी इकोसिस्टम में भी मजबूत नेतृत्व विकसित करने में मदद करनी चाहिए। इससे ऐसे विशेषज्ञ तैयार करने में भी सहायता मिलेगी, जो वैश्विक विनिर्माण मानकों और प्रथाओं में योगदान देने में सक्षम हों। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास और विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ा।

  • 10 साल में कमर्शियल LPG सिलेंडर ₹838 से ₹2810 तक पहुंचा, जानें अक्टूबर में कैसे बदलती रही 19 किलो सिलेंडर की कीमत

    10 साल में कमर्शियल LPG सिलेंडर ₹838 से ₹2810 तक पहुंचा, जानें अक्टूबर में कैसे बदलती रही 19 किलो सिलेंडर की कीमत

    नई दिल्ली: कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में पिछले एक दशक के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। दिल्ली में 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत सितंबर 2016 में ₹838 थी, जो अक्टूबर 2026 में बढ़कर ₹2810 हो गई। यानी करीब 10 साल की अवधि में इसकी कीमत में बड़ा अंतर आया है। अक्टूबर के महीने में कई वर्षों के दौरान कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी देखने को मिली। 2026 में अक्टूबर की शुरुआत में दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में 19 किलो वाले सिलेंडर की कीमत 62.50 रुपये से 71.50 रुपये तक बढ़ी और दिल्ली में इसका दाम ₹2810 पहुंच गया।

    2014 से कीमतों में बदलाव का सिलसिला देखा जाए तो सितंबर 2014 में दिल्ली में कमर्शियल सिलेंडर की कीमत ₹1503 थी। 1 अक्टूबर को कीमत अपडेट होने के बाद यह ₹30.50 घटकर ₹1472.50 हो गई। 2015 में भी अक्टूबर में कीमत में कमी आई। सितंबर 2015 तक सिलेंडर की कीमत ₹1005.50 थी, जो अक्टूबर में ₹42.50 घटकर ₹963 रह गई। इसके बाद 2016 से 2021 के बीच अक्टूबर के दौरान कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का दौर देखने को मिला। सितंबर 2016 में ₹838 वाला सिलेंडर अक्टूबर में ₹57 महंगा होकर ₹895 हो गया।

    2021 तक यह बढ़ोतरी काफी आगे पहुंच चुकी थी। अक्टूबर 2021 में दिल्ली में 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत ₹1736.50 हो गई। इसके बाद अक्टूबर 2022 में सितंबर की ₹1885 कीमत के मुकाबले सिलेंडर ₹25.50 सस्ता होकर ₹1859.50 पर आ गया। 2023 में सितंबर के मुकाबले अक्टूबर में दिल्ली में कमर्शियल सिलेंडर की कीमत ₹209 बढ़ी और यह ₹1522.50 से बढ़कर ₹1731.50 हो गई। इस तरह अलग-अलग वर्षों में कीमतों में बढ़ोतरी और कमी दोनों देखने को मिली।

    2024 में भी अक्टूबर के दौरान कमर्शियल सिलेंडर महंगा हुआ। सितंबर की ₹1691.50 कीमत के मुकाबले अक्टूबर में इसमें ₹48.50 की बढ़ोतरी हुई और दाम ₹1740 हो गया। 2025 में भी अक्टूबर में कीमत ₹15.50 बढ़ी। सितंबर 2025 में 19 किलो वाले सिलेंडर की कीमत ₹1580 थी, जो अक्टूबर में बढ़कर ₹1595.50 हो गई। हालांकि सालाना आधार पर उस समय कीमत कम रही। इस तरह पिछले वर्षों के आंकड़ों में अक्टूबर के दौरान कई बार कीमत बढ़ने का रुझान दिखाई देता है।

    कमर्शियल LPG की कीमत तय होने में अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों की भी भूमिका होती है। LPG की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के लिए अरब गल्फ बेंचमार्क महत्वपूर्ण माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय LPG रेट में बदलाव का असर भारत में इसकी लागत पर पड़ता है। कीमत तय करने में पिछले महीने के औसत अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क और विदेशी मुद्रा की दर जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाता है। इसी आधार पर तेल विपणन कंपनियां LPG की कीमतों में बदलाव करती हैं। पिछले एक दशक के आंकड़े बताते हैं कि 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में समय के साथ काफी उतार-चढ़ाव आया है और सितंबर 2016 के ₹838 से अक्टूबर 2026 के ₹2810 तक पहुंचने के बीच कई चरणों में बड़े बदलाव हुए।

  • सोना फिर चमका तो चांदी ने भी पकड़ी रफ्तार, 5 अक्टूबर को क्या है Gold Silver का भाव, खरीदारी से पहले जानें ताजा कीमत

    सोना फिर चमका तो चांदी ने भी पकड़ी रफ्तार, 5 अक्टूबर को क्या है Gold Silver का भाव, खरीदारी से पहले जानें ताजा कीमत


    नई दिल्ली। सोने और चांदी की कीमतों पर नजर रखने वाले लोगों के लिए 5 अक्टूबर 2026 का दिन अहम रहने वाला है। शुरुआती बाजार आंकड़ों में दोनों कीमती धातुओं में हलचल दिखाई दे रही है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार MCX पर 5 अक्टूबर 2026 वाला गोल्ड कॉन्ट्रैक्ट करीब 1 लाख 47 हजार 724 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दे रहा था और इसमें करीब 1607 रुपये की तेजी दर्ज की गई। वहीं गोल्ड मिनी का भाव करीब 1 लाख 47 हजार 877 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा।

    चांदी की बात करें तो MCX पर दिसंबर 2026 का सिल्वर कॉन्ट्रैक्ट करीब 2 लाख 25 हजार 700 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर नजर आया। इसमें करीब 1994 रुपये की बढ़त दर्ज की गई। सिल्वर मिनी का भाव करीब 2 लाख 27 हजार 695 रुपये प्रति किलोग्राम रहा। इससे संकेत मिलता है कि घरेलू कमोडिटी बाजार में कीमती धातुओं में खरीदारी की दिलचस्पी बनी हुई है।

    हालांकि सोने और चांदी के भाव केवल घरेलू मांग से तय नहीं होते। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की दिशा डॉलर की चाल ब्याज दरों की उम्मीदें वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और निवेशकों की सुरक्षित निवेश की मांग जैसे कई कारकों से प्रभावित होती है। अक्टूबर की शुरुआत में भी बाजार में सोने और चांदी की कीमतों को लेकर उतार चढ़ाव देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमत में कमजोरी के बावजूद घरेलू बाजार में MCX गोल्ड मजबूत दिखाई दिया।

    अगर आप आभूषण खरीदने की तैयारी कर रहे हैं तो केवल MCX का भाव देखकर खरीदारी का फैसला नहीं करना चाहिए। बाजार में 24 कैरेट 22 कैरेट और दूसरी शुद्धता के सोने के अलग अलग भाव होते हैं। 24 कैरेट सोना अधिक शुद्ध माना जाता है जबकि आभूषण बनाने के लिए 22 कैरेट सोने का इस्तेमाल ज्यादा होता है। इसके अलावा अंतिम बिल में GST और मेकिंग चार्ज का असर भी पड़ता है। इसलिए खरीदारी से पहले अपने शहर के स्थानीय ज्वेलर से ताजा रिटेल रेट जरूर जांचना चाहिए।

    चांदी खरीदने वालों के लिए भी यही बात लागू होती है। चांदी का भाव आमतौर पर प्रति किलोग्राम बताया जाता है लेकिन ग्राहक जरूरत के हिसाब से ग्राम या छोटी मात्रा में भी खरीद सकते हैं। 5 अक्टूबर के आसपास चांदी के बाजार में तेजी और कमजोरी दोनों के संकेत दिखाई दे रहे हैं इसलिए निवेशकों को अचानक कीमत बढ़ने या घटने पर जल्दबाजी में फैसला लेने से बचना चाहिए।

    कुल मिलाकर 5 अक्टूबर 2026 को सोना और चांदी दोनों बाजार में चर्चा के केंद्र में हैं। सोने में MCX स्तर पर मजबूती जबकि चांदी में भी बढ़त देखने को मिल रही है। हालांकि कीमती धातुओं में निवेश बाजार जोखिम के अधीन होता है। खरीदारी या निवेश से पहले ताजा भाव शुद्धता टैक्स मेकिंग चार्ज और अपनी वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

  • 5 अक्टूबर को खुलेगा शेयर बाजार, क्या फिर आएगी तेजी या जारी रहेगी गिरावट, Nifty Sensex पर इन बड़े संकेतों का असर

    5 अक्टूबर को खुलेगा शेयर बाजार, क्या फिर आएगी तेजी या जारी रहेगी गिरावट, Nifty Sensex पर इन बड़े संकेतों का असर


    नई दिल्ली। 5 अक्टूबर 2026 सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में कारोबार फिर से शुरू होगा। गांधी जयंती के कारण 2 अक्टूबर को NSE और BSE बंद रहे थे और इसके बाद शनिवार तथा रविवार का अवकाश रहा। ऐसे में निवेशकों की नजर सोमवार के कारोबारी सत्र पर रहेगी। बाजार के लिए पिछला सप्ताह काफी चुनौतीपूर्ण रहा है क्योंकि लगातार बिकवाली के दबाव के बीच सेंसेक्स और निफ्टी में कमजोरी बनी रही। 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570.59 अंक गिरकर 71909.70 पर बंद हुआ जबकि निफ्टी 198.50 अंक की गिरावट के साथ 22421.95 पर पहुंच गया।

    5 अक्टूबर को बाजार खुलने से पहले निवेशकों के सामने कई बड़े संकेत मौजूद हैं। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली बाजार की धारणा पर दबाव बना रही है। इसके अलावा कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी भारतीय शेयर बाजार के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। सितंबर के डेरिवेटिव कारोबार में निफ्टी में करीब 6.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी और बाजार में तेजी वाले दांव कमजोर हुए हैं। ऐसे माहौल में सोमवार को शुरुआती कारोबार में उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

    तकनीकी स्तरों की बात करें तो बाजार विशेषज्ञों की नजर निफ्टी के 22000 से 22200 के क्षेत्र पर रहेगी। इसे महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन माना जा रहा है। वहीं 22500 से 22600 का स्तर तत्काल रेजिस्टेंस के तौर पर देखा जा रहा है। अगर निफ्टी इन स्तरों के ऊपर मजबूती कायम करता है तो बाजार में कुछ राहत की उम्मीद बन सकती है। दूसरी तरफ कमजोरी बढ़ने पर 22000 के आसपास का क्षेत्र महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

    अक्टूबर का पहला सप्ताह शेयर बाजार के लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक 5 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक चलेगी और 7 अक्टूबर को नीतिगत फैसले की घोषणा होगी। इसके अलावा कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजों का सीजन भी शुरू होने वाला है। TCS 8 अक्टूबर को सितंबर तिमाही के नतीजे घोषित करने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल है। इन घटनाओं का असर बाजार की दिशा पर पड़ सकता है।

    बाजार में विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी। सितंबर में विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं ने भारतीय शेयरों पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से बाजार को कुछ सहारा मिल रहा है। ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी होगा कि वे किसी एक दिन की तेजी या गिरावट देखकर जल्दबाजी में फैसला न लें।

    कुल मिलाकर 5 अक्टूबर को बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है। निवेशकों की नजर निफ्टी के अहम सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तरों के साथ कच्चे तेल की कीमतों विदेशी निवेशकों की गतिविधियों बॉन्ड यील्ड RBI की बैठक और आगामी कंपनियों के तिमाही नतीजों पर रहेगी। मौजूदा माहौल में जोखिम को समझकर और अपनी निवेश रणनीति के अनुसार ही कदम उठाना बेहतर रहेगा। यह जानकारी बाजार विश्लेषण के लिए है और इसे निवेश सलाह नहीं माना जाना चाहिए।

  • चुनौतियों से जूझ रहा भारतीय इक्विटी बाजार, घबराएं नहीं… योजना बनाकर करें निवेश!

    चुनौतियों से जूझ रहा भारतीय इक्विटी बाजार, घबराएं नहीं… योजना बनाकर करें निवेश!


    नई दिल्ली।
    नोएडा (Noida) में रहने वाले आलोक ने कुछ साल पहले म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) में एसआईपी (SIP) शुरू की थी। शुरुआत में पोर्टफोलियो (Portfolio) संतुलित था। लेकिन इक्विटी स्कीमों के शानदार रिटर्न की वजह से संतुलित पोर्टफोलियो देखते-देखते 90% इक्विटी-हेवी हो गया। अब जब बाजार बेचैन है, निफ्टी गोते खा रहा है। पोर्टफोलियो लाल देखकर आलोक की सांसें अटक गईं।

    तुरंत दोस्त को फोन लगाया और पूछा- क्या मुझे एसआईपी बंद कर देनी चाहिए? क्या म्यूचुअल फंड रिडीम कर लेने चाहिए? क्या मुझे सब कुछ फिक्स्ड डिपॉजिट में ट्रांसफर कर देना चाहिए? ये सवाल स्वाभाविक हैं। लेकिन बाजार के हर उतार-चढ़ाव पर प्रतिक्रिया देना ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है: क्या आपका पोर्टफोलियो उतना जोखिम भरा हो गया है, जितना आपने सोचा भी नहीं था? यदि इसका उत्तर हां है, तो इसका समाधान बाजार छोड़कर जाना नहीं हो सकता। इसका समाधान है अपने पोर्टफोलियो को फिर से संतुलित करना।


    बाजार असहज है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि निवेशक घबरा जाएं

    भारतीय इक्विटी बाजार (Indian Equity Market) वर्तमान में कई चुनौतियों से जूझ रहा है। सितंबर में निफ्टी-50 में भारी गिरावट देखी गई, जबकि विदेशी निवेशक लगातार बेच कर बाहर जा रहे हैं। ऊंचे क्रूड ऑयल के दाम, भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और रुपये पर दबाव ने अनिश्चितता और बढ़ा दी है। यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है।

    भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था लचीलापन दिखाना जारी रखे हुए है, अप्रैल-जून 2026 की विकास दर लगभग 8% दर्ज की गई। घरेलू निवेशक भी एसआईपी के जरिये म्यूचुअल फंड में लगातार पैसे लगा रहे हैं। एम्फी के अनुसार, अगस्त 2026 में एसआईपी का कुल योगदान 32,297 करोड़ रुपये रहा। इससे पता चलता है कि निवेशक चिंतित जरूर हैं, लेकिन उन्होंने निवेश करना बंद नहीं किया है। और शायद ऐसा करना भी नहीं चाहिए- बशर्ते उनके निवेश उनके लक्ष्यों और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुकूल हों।

    असली बीमारी बाजार की गिरावट नहीं, पोर्टफोलियो ड्रिफ्ट है। आलोक की तरह ज्यादातर निवेशक तब तक जोखिम के बारे में नहीं सोचते, जब तक बाजार ऊपर चढ़ रहा होता है। जब अनजाने में आपका 90% पैसा सिर्फ इक्विटी में फंस जाए, इसे पोर्टफोलियो ड्रिफ्ट कहा जाता है। इसलिए, समस्या बाजार गिरना नहीं है। समस्या यह है कि पोर्टफोलियो को कभी ऐसे डिजाइन ही नहीं किया गया था कि वह ऐसी गिरावट को झेल सके।


    पोर्टफोलियो कैसा दिखना चाहिए?

    – ऐसा कोई जादुई प्रतिशत नहीं है, जो हर किसी के लिए काम करे।
    – अधिक जोखिम उठाने की क्षमता और लंबे समय का नजरिया रखने वाला व्यक्ति अधिक इक्विटी चुन सकता है।
    – रिटायरमेंट के करीब पहुंच रहे या किसी अन्य बड़े वित्तीय लक्ष्य वाले निवेशक को काफी कम इक्विटी की आवश्यकता हो सकती है।


    भावनाएं नहीं, पोर्टफोलियो को रोटेट करें

    सबसे पहले सारी इक्विटी होल्डिंग्स को अचानक बेचने की जरूरत नहीं है। अब अपनी नई एसआईपी के योगदान को डेट या अन्य कम हिस्सेदारी वाली एसेट क्लास की तरफ मोड़ें।


    बाजार से भागें नहीं, योजना सुधारें

    सिर्फ इसलिए एसआईपी या निवेश बंद न करें, क्योंकि बाजार में उतार-चढ़ाव है। अपने फंड्स की जांच करें कि वे एक ही तरह के शेयरों में तो पैसा नहीं लगा रहे हैं। अपने निवेश के फैसले बाजार के मूड के बजाय अपने वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर लें। …सिद्धार्थ शर्मा, को-फाउंडर, मनीट्री पार्टनर्स


    किस कैटेगरी से पैसा निकालकर कहां लगाएं?

    यदि छोटे शेयरों ने आपके पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा हथिया लिया है, तो मुनाफे का कुछ हिस्सा निकालकर बड़े-कैप या फ्लेक्सी-कैप फंड्स में शिफ्ट किया जा सकता है।
    यदि पोर्टफोलियो में इक्विटी के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है, तो संकट के समय स्थिरता के लिए डेट फंड या सोने को जगह दें।
    यदि कोई वित्तीय लक्ष्य पास आ रहा है, तो जोखिम भरे इक्विटी से पैसा निकालकर सुरक्षित और अधिक तरल विकल्पों में लगाना चाहिए।

  • कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार: OPEC+ के 7 देशों ने नवंबर में उत्पादन न बढ़ाने का फैसला किया

    कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार: OPEC+ के 7 देशों ने नवंबर में उत्पादन न बढ़ाने का फैसला किया


    नई दिल्ली। ईरान से जुड़े संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। बढ़ती कीमतों और सप्लाई पर दबाव के बावजूद OPEC+ के सात प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने नवंबर में उत्पादन मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का फैसला किया है।

    रविवार को हुई बैठक में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाखस्तान, अल्जीरिया और ओमान ने उत्पादन में न तो बढ़ोतरी करने और न ही कटौती करने पर सहमति जताई। यानी नवंबर में इन देशों से बाजार में तेल की सप्लाई फिलहाल मौजूदा स्तर के आसपास ही रहेगी। अब समूह की अगली बैठक 1 नवंबर को होगी, जिसमें बाजार की स्थिति की समीक्षा की जाएगी।

    100 डॉलर के पार क्यों पहुंचा कच्चा तेल?

    कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी को ईरान से जुड़े संघर्ष और उससे पैदा हुए सप्लाई जोखिम से जोड़ा जा रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद शुरू हुए संघर्ष ने तेल की वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है।

    ब्रेंट क्रूड को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों का प्रमुख बेंचमार्क माना जाता है। ऐसे में इसका 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। सप्लाई में संभावित रुकावट की आशंका बढ़ने पर बाजार में कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

    OPEC+ के 7 देशों का फैसला क्या है?

    रविवार की बैठक में OPEC+ के इस उपसमूह ने नवंबर के लिए उत्पादन नीति में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया। इसका मतलब है कि फिलहाल इन सात देशों की ओर से बाजार में अतिरिक्त कच्चा तेल लाने की योजना नहीं है।

    सऊदी अरब और रूस जैसे प्रमुख उत्पादकों के साथ इराक, कुवैत, कजाखस्तान, अल्जीरिया और ओमान भी इस समूह में शामिल हैं। अगली बैठक 1 नवंबर को होगी। तब तेल की कीमतों, वैश्विक मांग और सप्लाई की स्थिति को देखते हुए आगे का फैसला लिया जाएगा।

    G7 बाजार में उतारेगा 100 मिलियन बैरल तेल-ईंधन

    दूसरी ओर, बढ़ती कीमतों के बीच G7 देशों ने बाजार में अतिरिक्त तेल और ईंधन उपलब्ध कराने की तैयारी की है। शुक्रवार को G7 ने आने वाले हफ्तों में करीब 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन उत्पाद जारी करने की योजना की घोषणा की।

    इसकी शुरुआत बड़ी मात्रा में डीजल की सप्लाई से होगी। योजना के मुताबिक अगले 20 दिनों के भीतर डीजल की शुरुआती बड़ी खेप बाजार में उतारी जाएगी। इसके बाद शेष मात्रा को करीब चार महीनों में बाजार में लाने की तैयारी है।

    अमेरिका में डीजल की कीमतें भी बढ़ीं

    कच्चे तेल की तेजी का असर पेट्रोलियम उत्पादों पर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिका में डीजल की कीमतें हाल में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं। इसका सीधा असर किसानों, ट्रक ऑपरेटरों और उन उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है, जो परिवहन और दूसरे कामों के लिए डीजल पर निर्भर हैं।

    डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से माल ढुलाई और कृषि क्षेत्र की लागत बढ़ने की आशंका भी रहती है, जिसका असर आगे चलकर अन्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।

    अब 1 नवंबर की बैठक पर नजर

    फिलहाल वैश्विक तेल बाजार में दो अलग-अलग कदम दिखाई दे रहे हैं। एक ओर OPEC+ के सात प्रमुख देश नवंबर में उत्पादन बढ़ाकर अतिरिक्त सप्लाई देने के पक्ष में नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर G7 बाजार में 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन उत्पाद लाने की तैयारी कर रहा है।

    ऐसे में आने वाले दिनों में ईरान से जुड़े संघर्ष, वैश्विक सप्लाई और तेल की मांग के साथ-साथ 1 नवंबर की OPEC+ बैठक पर बाजार की नजर रहेगी। इस बैठक में उत्पादन नीति में किसी बदलाव को लेकर फैसला हो सकता है।

  • एआई कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट से भारत में बढ़ सकता है पूंजी प्रवाह, आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक जोखिमों पर जताई चिंता

    एआई कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट से भारत में बढ़ सकता है पूंजी प्रवाह, आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक जोखिमों पर जताई चिंता

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन में कमी आने से वैश्विक निवेश चक्र में धीमापन होने के बावजूद भारत में पूंजी प्रवाह बढ़ सकता है। उन्होंने शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में यह बात कही। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में एआई निवेश में तेजी वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए प्रमुख प्रेरक कारकों में रही है। हालांकि, एआई से जुड़े निवेश या कमाई में कमी आने पर इस क्षेत्र से जुड़ी वित्तीय परिसंपत्तियों की कीमतों में बड़ा बदलाव हो सकता है।

    मल्होत्रा ने कहा कि एआई क्षेत्र में ऐसी गिरावट वैश्विक बाजारों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, लेकिन इसका भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अगर विकसित देशों में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार होता है, तो इससे भारत की ओर पूंजी प्रवाह पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, हाल के महीनों में भारतीय इक्विटी बाजार में भी ऊंचे वैल्यूएशन से सुधार हुआ है और इसे बाजार की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।

    आरबीआई गवर्नर ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद कई अन्य जोखिमों का भी उल्लेख किया। इनमें वैश्विक स्तर पर बढ़ा हुआ कर्ज, नॉन-बैंक फाइनेंशियल सेक्टर में लीवरेज, प्राइवेट क्रेडिट एक्सपोजर में वृद्धि और साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे शामिल हैं। उन्होंने हालांकि स्पष्ट किया कि इन कमजोरियों का होना तत्काल किसी वित्तीय संकट की शुरुआत का संकेत नहीं है। उनके अनुसार, इन जोखिमों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है, भले ही फिलहाल संकट के तत्काल संकेत दिखाई नहीं दे रहे हों।

    मल्होत्रा ने कहा कि भारत मजबूत व्यापक आर्थिक आधार और बैंकों तथा नॉन-बैंक फाइनेंशियल संस्थानों की मजबूत बैलेंस शीट के सहारे चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल का सामना कर रहा है। उन्होंने यह भी माना कि कमोडिटी की कीमतों, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और पूंजी प्रवाह में बदलाव के कारण भारत बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने घरेलू वित्तीय प्रणाली की मजबूती को रेखांकित किया और कहा कि वित्तीय क्षेत्र में मजबूती बनी हुई है।

    आरबीआई गवर्नर के बयान में एआई निवेश से जुड़े वैश्विक घटनाक्रम और भारत में संभावित पूंजी प्रवाह के बीच संबंध पर जोर दिया गया। उनके मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार भारत के लिए पूंजी आकर्षित करने का अवसर बन सकता है। दूसरी ओर, वैश्विक कर्ज, वित्तीय संस्थानों में बढ़ता लीवरेज, निजी ऋण का बढ़ता एक्सपोजर और साइबर सुरक्षा जैसे जोखिमों पर नजर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की घरेलू वित्तीय प्रणाली मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के कारण सतर्कता आवश्यक है।

  • सितंबर में एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार से निकाले 45,536 करोड़ रुपये, लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन अब आकर्षक

    सितंबर में एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार से निकाले 45,536 करोड़ रुपये, लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन अब आकर्षक


    नई दिल्ली ।
    सितंबर 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजार में बड़ी बिकवाली की। महीने के दौरान उन्होंने कुल 45,536 करोड़ रुपये के इक्विटी शेयर बेचे। हालांकि, प्राथमिक बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही और उन्होंने सितंबर में 9,676 करोड़ रुपये का निवेश किया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी निवेशकों की बढ़ती बिकवाली के पीछे अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड का 5.2 प्रतिशत से ऊपर पहुंचना और कच्चे तेल की कीमतों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की आशंका प्रमुख कारण रही।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार विदेशी बिकवाली ने भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ाया है। इसी दबाव के बीच बाजार लगातार आठ सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ। इस दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश वाले कमजोर मानसून ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। हालांकि, बाजार में हालिया करेक्शन के बाद बड़ी कंपनियों यानी लार्ज-कैप शेयरों के वैल्यूएशन पहले की तुलना में अधिक आकर्षक दिखाई देने लगे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्ता वाली बड़ी कंपनियों के शेयरों में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अवसर बन सकते हैं।

    विदेशी निवेशकों की बिकवाली में ठहराव या उनके दोबारा खरीदारी की ओर लौटने के लिए कुछ सकारात्मक संकेतों की जरूरत होगी। इनमें कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में नरमी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जुलाई और अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में संभावित गिरावट की उम्मीद के कारण एफपीआई का रुख कुछ सकारात्मक हुआ था, लेकिन यह बदलाव ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। 28 सितंबर से 1 अक्टूबर के बीच केवल चार कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों ने करीब 34,965 करोड़ रुपये की अस्थायी इक्विटी बिकवाली की, जबकि इसी अवधि के लिए निर्धारित इक्विटी बिकवाली 27,962 करोड़ रुपये रही। इससे महीने के अंत और अक्टूबर की शुरुआत में विदेशी निकासी तेज होने का संकेत मिला।

    बाजार रणनीतिकारों के अनुसार, द्वितीयक बाजार में बिकवाली और प्राथमिक बाजार में निवेश का अंतर यह दर्शाता है कि विदेशी निवेशक भारत से पूरी तरह बाहर नहीं जा रहे हैं। वे निवेश के अवसरों का चयन पहले की तुलना में अधिक सावधानी से कर रहे हैं। यह रुझान अक्टूबर में भी जारी रहने की संभावना जताई गई है। दूसरी ओर, घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी डीआईआई ने बाजार को मजबूत सहारा दिया। सितंबर 2026 में डीआईआई ने नकद इक्विटी बाजार में 76,030 करोड़ रुपये की खरीदारी की। घरेलू संस्थागत और खुदरा निवेशकों की लगातार खरीदारी ने विदेशी बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संतुलित किया।

    आगे बाजार की दिशा वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के कॉरपोरेट नतीजों से भी प्रभावित होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, जिन कंपनियों के परिणाम उम्मीद से बेहतर रहेंगे और जिनका प्रबंधन भविष्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण पेश करेगा, उनके शेयरों में निवेशकों की खरीदारी बढ़ सकती है। ऐसे में विदेशी निवेशकों की गतिविधि, घरेलू संस्थागत निवेश, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कंपनियों के दूसरी तिमाही के प्रदर्शन पर बाजार की नजर बनी रहेगी।