Category: Economy

  • विदेशी निवेश आकर्षित करने में RBI की बड़ी कामयाबी, फॉरेक्स स्वैप योजना से जुटे 40.82 अरब डॉलर

    विदेशी निवेश आकर्षित करने में RBI की बड़ी कामयाबी, फॉरेक्स स्वैप योजना से जुटे 40.82 अरब डॉलर


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक की विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने की विशेष पहल को बाजार से शानदार समर्थन मिला है। केंद्रीय बैंक द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार 31 जुलाई 2026 तक रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा के माध्यम से कुल 40.82 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा निवेश भारत में आया है। इस योजना में सबसे बड़ा योगदान फॉरेन करेंसी नॉन रेजिडेंट बैंक यानी एफसीएनआर बी जमा का रहा है जिसने कुल निवेश का बड़ा हिस्सा उपलब्ध कराया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच यह उपलब्धि भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।

    आरबीआई ने यह विशेष स्वैप सुविधा विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और देश में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की थी। इसके तहत विदेशी निवेशकों और प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करने के लिए बैंकों को विशेष रियायतें दी गईं ताकि वे अधिक विदेशी मुद्रा जुटा सकें। योजना 8 जून 2026 से लागू की गई थी और तब से इसमें लगातार सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

    केंद्रीय बैंक के मुताबिक 31 जुलाई तक जुटाए गए कुल 40.82 अरब डॉलर में से 36.73 अरब डॉलर केवल एफसीएनआर बी जमा के माध्यम से आए हैं। यह कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह का सबसे बड़ा हिस्सा है और इससे साफ संकेत मिलता है कि प्रवासी भारतीयों ने इस योजना पर भरोसा जताया है। इसके अलावा ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स यानी ओएफसीबी के जरिए 2.58 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स यानी ईसीबी के माध्यम से 1.52 अरब डॉलर का निवेश प्राप्त हुआ है।

    आरबीआई ने पांच जून 2026 को इस योजना की घोषणा करते हुए कहा था कि वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूत करना जरूरी है। इसी उद्देश्य से एफसीएनआर बी जमा ओएफसीबी और ईसीबी के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाने की विशेष व्यवस्था की गई। अब शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि यह रणनीति प्रभावी साबित हो रही है और देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है।

    केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई एफसीएनआर बी जमा के लिए रियायती स्वैप सुविधा 30 सितंबर 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ओएफसीबी और ईसीबी के तहत यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। इससे उम्मीद की जा रही है कि आने वाले महीनों में विदेशी मुद्रा प्रवाह का आंकड़ा और बढ़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी अर्थव्यवस्था की वित्तीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होता है। इससे आयात भुगतान आसान होता है विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और वैश्विक बाजार में मुद्रा की स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। साथ ही रुपये पर दबाव कम करने और बाहरी आर्थिक झटकों का सामना करने की क्षमता भी मजबूत होती है।

    वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक चुनौतियों और अनिश्चितताओं के बीच आरबीआई की यह पहल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती आने से न केवल वित्तीय स्थिरता को बल मिलेगा बल्कि निवेशकों का विश्वास भी बढ़ेगा। यही वजह है कि फॉरेक्स स्वैप योजना को भारतीय वित्तीय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण और सफल कदम माना जा रहा है।

  • IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान

    IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान


    नई दिल्ली।
    सरकारी पेट्रोलियम कंपनी (State-Owned Petroleum Company) इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) (Indian Oil Corporation – IOC) ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही (April-June quarter) के नतीजे जारी कर दिए हैं। इस तिमाही में कंपनी को 2,661.37 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ है। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को 5,688.60 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था जबकि जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में कंपनी ने 11,377.51 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।


    घाटे की वजह क्या है?

    आईओसी के चेयरमैन ए.एस साहनी ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे तेल की लागत बढ़ने के बावजूद कंपनी ने अन्य सरकारी तेल कंपनियों की तरह पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) के दाम नहीं बढ़ाए। इसका नुकसान कंपनी को उठाना पड़ा। हालांकि, इससे हुए नुकसान की भरपाई काफी हद तक तेल रिफाइनरी मार्जिन और परिचालन दक्षता में सुधार से हुई। उन्होंने कहा, ”पहली तिमाही में कंपनी ने करीब 1.91 करोड़ टन कच्चे तेल का अब तक का सर्वाधिक प्रोसेसिंग किया। इसके साथ ही ईंधन और अन्य नुकसान की दर घटकर 8.04 प्रतिशत रही, जो पहले 8.5 प्रतिशत थी।”

    इसके साथ ही साहनी ने यह भी कहा कि जून तिमाही में 45 लाख टन पेट्रोल और करीब 1.8 करोड़ टन डीजल की रिकॉर्ड बिक्री हुई। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की बिक्री भी 11 प्रतिशत बढ़ी, जिससे कंपनी को सहारा मिला। इस तिमाही में देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी की परिचालन आय 26 प्रतिशत बढ़कर 2.75 लाख करोड़ रुपये हो गई।

    उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई लेकिन कंपनी ने पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाकर कमी की भरपाई की। साहनी ने कहा कि कंपनी ने अगस्त के पूरे माह और सितंबर के कुछ दिनों तक के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है। उन्होंने कहा कि अगले 45-50 दिनों के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर कोई चिंता नहीं है।

    कंपनी का खर्च कम हुआ

    कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क कम करने के कारण इस मद में कंपनी का खर्च एक साल पहले के 25,637 करोड़ रुपये से घटकर 13,536 करोड़ रुपये रह गया। वहीं, तैयार उत्पादों के दाम बढ़ने से उसे 20,925 करोड़ रुपये का फायदा हुआ। मौजूदा कर और लंबित कर के भुगतान में छूट से कंपनी को 613 करोड़ रुपये की बचत हुई।


    शेयर का परफॉर्मेंस

    इंडियन ऑयल के शेयर की बात करें तो यह शुक्रवार को मामूली बढ़त के साथ 140.15 रुपये पर बंद हुआ। अब सोमवार को शेयर पर निवेशकों की नजर रहेगी।

  • बिना सोचे-समझे निवेश पड़ सकता है भारी, जानिए शेयर बाजार में सफलता के गोल्डन रूल्स

    बिना सोचे-समझे निवेश पड़ सकता है भारी, जानिए शेयर बाजार में सफलता के गोल्डन रूल्स


    नई दिल्ली । शेयर बाजार आज के समय में निवेश का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। पहले जहां लोग केवल बैंक एफडी सोना या जमीन में निवेश को सुरक्षित मानते थे वहीं अब बड़ी संख्या में युवा और नौकरीपेशा लोग भी शेयर बाजार की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। हालांकि शेयर बाजार जितना मुनाफा देने की क्षमता रखता है उतना ही जोखिम भी इसमें मौजूद रहता है। इसलिए बिना जानकारी के निवेश करना कई बार भारी नुकसान का कारण बन सकता है।

    शेयर बाजार में सफल होने का सबसे पहला नियम है कि किसी भी कंपनी में पैसा लगाने से पहले उसके कारोबार वित्तीय स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को अच्छी तरह समझें। केवल किसी दोस्त रिश्तेदार या सोशल मीडिया पर मिली सलाह के आधार पर निवेश करना सही फैसला नहीं माना जाता। कंपनी के पिछले प्रदर्शन मुनाफे कर्ज और बाजार में उसकी स्थिति का विश्लेषण करना जरूरी होता है।

    निवेश करते समय धैर्य सबसे बड़ी ताकत होती है। शेयर बाजार में हर दिन उतार चढ़ाव आता है लेकिन अनुभवी निवेशक छोटी गिरावट से घबराते नहीं हैं। वे लंबी अवधि की रणनीति अपनाते हैं और मजबूत कंपनियों में निवेश बनाए रखते हैं। समय के साथ अच्छे शेयर अक्सर बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपनी पूरी पूंजी कभी भी एक ही कंपनी या एक ही सेक्टर में निवेश नहीं करनी चाहिए। अलग अलग क्षेत्रों की कंपनियों में निवेश करने से जोखिम कम हो जाता है। इसे निवेश का विविधीकरण कहा जाता है। यदि किसी एक सेक्टर में गिरावट आती है तो दूसरे सेक्टर का प्रदर्शन नुकसान की भरपाई करने में मदद कर सकता है।

    शेयर बाजार में भावनाओं के आधार पर फैसला लेना भी नुकसानदायक साबित हो सकता है। कई निवेशक तेजी देखकर बिना सोचे समझे शेयर खरीद लेते हैं और गिरावट आते ही घबराकर बेच देते हैं। इस तरह वे नुकसान उठा लेते हैं। सही रणनीति यही है कि निवेश तय योजना के अनुसार किया जाए और बाजार की हर हलचल पर जल्दबाजी में निर्णय न लिया जाए।

    यदि आप शेयर बाजार में नए हैं तो शुरुआत छोटी राशि से करें। पहले बाजार की कार्यप्रणाली को समझें और धीरे धीरे अनुभव बढ़ाएं। जरूरत पड़ने पर किसी प्रमाणित वित्तीय सलाहकार की मदद भी ली जा सकती है। म्यूचुअल फंड जैसे विकल्प भी उन लोगों के लिए बेहतर हो सकते हैं जो सीधे शेयर चुनने का अनुभव नहीं रखते।

    नियमित निवेश की आदत भी लंबे समय में बेहतर परिणाम देती है। एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय समय समय पर निवेश करने से बाजार के उतार चढ़ाव का असर कम हो सकता है। साथ ही अपने निवेश की समय समय पर समीक्षा करना भी जरूरी है ताकि जरूरत पड़ने पर पोर्टफोलियो में बदलाव किया जा सके।

    ध्यान रखें कि शेयर बाजार में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। सही जानकारी अनुशासन धैर्य और लंबी अवधि की सोच ही निवेश को सफल बनाती है। यदि समझदारी से निवेश किया जाए तो शेयर बाजार भविष्य की आर्थिक मजबूती और संपत्ति निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

  • जंग का असर: इंडिगो बंद करेगी वाइड-बॉडी उड़ानें, 25 अक्टूबर से बड़ा बदलाव

    जंग का असर: इंडिगो बंद करेगी वाइड-बॉडी उड़ानें, 25 अक्टूबर से बड़ा बदलाव


    नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती परिचालन लागत के बीच देश की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइन इंडिगो ने अपने वाइड-बॉडी विमान संचालन को बंद करने का फैसला किया है। कंपनी ने घोषणा की है कि 25 अक्टूबर 2026 से वाइड-बॉडी ऑपरेशन समाप्त कर दिए जाएंगे। इसी के साथ नॉर्स अटलांटिक एयरवेज के साथ किया गया डैम्प लीज समझौता भी उसी महीने खत्म हो जाएगा।

    इंडिगो ने बताया कि फिलहाल मुंबई-एम्स्टर्डम मार्ग पर डैम्प लीज पर लिए गए बोइंग 787-9 विमान की जगह एयरबस A321XLR विमान से उड़ानें संचालित की जाएंगी। वहीं, लंदन हीथ्रो के लिए एयरलाइन की सेवाएं अस्थायी रूप से बंद रहेंगी। कंपनी का कहना है कि यह सेवा तब दोबारा शुरू होगी, जब उसके ऑर्डर किए गए एयरबस A350-900 विमान बेड़े में शामिल हो जाएंगे।

    2025 में हुआ था समझौता
    इंडिगो ने वर्ष 2025 की शुरुआत में नॉर्स अटलांटिक एयरवेज के साथ छह बोइंग 787-9 विमानों के लिए डैम्प लीज एग्रीमेंट किया था, ताकि लंबी दूरी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का विस्तार किया जा सके।

    क्यों लिया गया फैसला?
    एयरलाइन के अनुसार, समझौते के बाद वैश्विक हालात तेजी से बदले हैं। एयरस्पेस पर प्रतिबंध, ईंधन की लगातार बढ़ती कीमतें और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों के दबाव ने परिचालन लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर दी है। इन परिस्थितियों का असर उड़ानों की क्षमता, समयबद्धता, कनेक्टिविटी और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ा है। इसी वजह से कंपनी ने पूरे कार्यक्रम की समीक्षा कर रणनीति में बदलाव का निर्णय लिया है।

    ‘संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग जरूरी’
    इंडिगो के प्लानिंग एवं रेवेन्यू मैनेजमेंट के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अभिजीत दासगुप्ता ने कहा कि वैश्विक विमानन उद्योग लगातार भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में अल्पकालिक संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करना और दीर्घकालिक रणनीति को संतुलित रखना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एयरलाइन भविष्य में भी मिड और लॉन्ग-हॉल अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

    यात्रियों को दिए जाएंगे विकल्प
    इंडिगो ने स्पष्ट किया है कि इस फैसले से प्रभावित यात्रियों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क किया जाएगा। उन्हें वैकल्पिक यात्रा व्यवस्था या लागू नियमों के तहत रिफंड का विकल्प उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि यात्रियों को किसी तरह की असुविधा न हो।

  • देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.12 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर

    देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.12 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर


    नई दिल्ली।
    विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार चौथे हफ्ते इजाफा हुआ है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार 24 जुलाई को समाप्त हफ्ते में 6.12 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

    रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने शुक्रवार को जारी आंकड़ों में बताया है कि 24 जुलाई को समाप्त हफ्ते में देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 6.12 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर रहा है। इससे पिछले सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 1.08 अरब डॉलर बढ़कर 676.24 अरब डॉलर रहा था।

    आरबीआई के जारी आंकड़ों के मुताबिक 24 जुलाई को समाप्त हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार का अहम घटक माने जाने वाली विदेशी मुद्रा आस्तियां (एफसीए) 4.87 अरब डॉलर बढ़कर 555.93 अरब डॉलर हो गईं। इस अवधि में स्वर्ण भंडार का मूल्य 1.31 अरब डॉलर बढ़कर 103.06 अरब डॉलर हो गया।

    आंकड़ों के विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 5.3 करोड़ डॉलर घटकर 18.62 अरब डॉलर रह गया। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में भारत का आरक्षित कोष 1.1 करोड़ डॉलर घटकर 4.75 अरब डॉलर रहा है।

    उल्लेखनीय है कि आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार 27 फरवरी को समाप्त हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर रिकॉर्ड 728.49 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था।

  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार मजबूत होता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 682.2354 अरब डॉलर पर पहुंच गया। लगातार दूसरे सप्ताह दर्ज हुई इस वृद्धि को देश की बाहरी आर्थिक स्थिति के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इससे पहले 17 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। लगातार दो सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में हुई वृद्धि से यह संकेत मिल रहा है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी भारत की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार का क्रम जारी है।

    केंद्रीय बैंक के अनुसार, इस दौरान स्वर्ण भंडार के मूल्य में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। समीक्षा अवधि में गोल्ड रिजर्व 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा मानी जाने वाली विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां भी 4.873 अरब डॉलर बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गईं। यह बढ़ोतरी देश की समग्र वित्तीय मजबूती का संकेत देती है।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में केवल अमेरिकी डॉलर ही नहीं बल्कि यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है। इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाले बदलाव वैश्विक मुद्रा बाजार की गतिविधियों से भी प्रभावित होते हैं।

    हालांकि इस अवधि में स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (एसडीआर) में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यह 5.3 करोड़ डॉलर घटकर 18.617 अरब डॉलर रह गया। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य प्रमुख घटकों में हुई वृद्धि के कारण कुल भंडार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली।

    वर्ष 2026 की शुरुआत में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना था। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते रुपये पर भी दबाव देखा गया, जिसके बाद बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया था। इसके कारण कुछ सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दर्ज की गई थी।

    उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.494 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद आई गिरावट से अब धीरे-धीरे उबरने का क्रम जारी है और हाल के सप्ताहों में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है।

    आरबीआई का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखना नहीं है, बल्कि केवल बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना है। आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होता है। इससे आयात भुगतान, बाहरी ऋण दायित्वों का निर्वहन और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौरान वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। हालिया बढ़ोतरी को भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के रूप में देखा जा रहा है।

  • आय सीमा नहीं तय करती ITR की जरूरत, इन वित्तीय गतिविधियों में टैक्स रिटर्न भरना बन जाता है अनिवार्य

    आय सीमा नहीं तय करती ITR की जरूरत, इन वित्तीय गतिविधियों में टैक्स रिटर्न भरना बन जाता है अनिवार्य

    नई दिल्ली । इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि अगर उनकी सालाना आय टैक्स छूट की सीमा से कम है तो उन्हें रिटर्न दाखिल करने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि आयकर नियमों के अनुसार कुछ ऐसी परिस्थितियां भी हैं, जहां व्यक्ति की आय पर टैक्स देनदारी न होने के बावजूद ITR भरना कानूनी रूप से जरूरी हो जाता है।

    आयकर विभाग ने ऐसी कई स्थितियां तय की हैं, जिनमें केवल आय की सीमा ही नहीं बल्कि व्यक्ति के वित्तीय लेन-देन और आर्थिक गतिविधियों के आधार पर भी ITR दाखिल करने की बाध्यता बन सकती है। ऐसे में टैक्स फ्री इनकम वाले लोगों को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड और लेन-देन की स्थिति के आधार पर रिटर्न भरने की जरूरत पड़ सकती है।

    अगर किसी व्यक्ति ने एक वित्तीय वर्ष में बिजली बिल के रूप में 1 लाख रुपये या उससे अधिक का भुगतान किया है, तो उसके लिए ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। यह नियम उन लोगों पर लागू होता है जिनके बड़े खर्च उनकी आर्थिक स्थिति को दर्शाते हैं।

    इसी तरह अगर किसी व्यक्ति ने खुद या अपने परिवार के किसी सदस्य के विदेश दौरे पर 2 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च किए हैं, तो उसे भी आयकर रिटर्न दाखिल करना आवश्यक हो सकता है। विदेश यात्रा पर होने वाले बड़े खर्च को आयकर नियमों के तहत रिपोर्टिंग की श्रेणी में रखा गया है।

    यदि किसी व्यक्ति के एक या एक से अधिक सेविंग बैंक खातों में एक वित्तीय वर्ष के दौरान कुल जमा राशि 50 लाख रुपये या उससे अधिक पहुंच जाती है, तो भी ITR दाखिल करना अनिवार्य हो सकता है। इसी तरह करंट अकाउंट में 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक जमा करने वाले व्यक्तियों को भी रिटर्न दाखिल करना पड़ता है।

    टैक्स कटौती से जुड़ा नियम भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी व्यक्ति की आय से निर्धारित सीमा से अधिक TDS या TCS काटा गया है, तो उसे ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। हालांकि वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह सीमा अलग निर्धारित की गई है।

    इसके अलावा जिन लोगों की कुल आय लागू बेसिक छूट सीमा से अधिक है, उनके लिए भी ITR दाखिल करना अनिवार्य है। अलग-अलग टैक्स व्यवस्था के अनुसार छूट सीमा अलग हो सकती है, इसलिए करदाताओं को अपनी आय और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

    अगर किसी व्यक्ति को शेयर बाजार, क्रिप्टो निवेश या संपत्ति बिक्री से नुकसान हुआ है और वह उस नुकसान को भविष्य के वर्षों में होने वाले लाभ के साथ समायोजित करना चाहता है, तो उसे नुकसान को आगे ले जाने के लिए ITR दाखिल करना जरूरी होता है।

    विदेश में संपत्ति रखने वाले भारतीय निवासियों के लिए भी टैक्स रिटर्न दाखिल करना आवश्यक हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति के नाम विदेश में बैंक खाता, शेयर या कोई संपत्ति है, तो उसे इसकी जानकारी आयकर रिटर्न में देनी होती है।

    फ्रीलांसर, डॉक्टर, वकील, आईटी प्रोफेशनल या अन्य सलाहकारों जैसे पेशेवरों के लिए भी कुछ परिस्थितियों में ITR जरूरी हो जाता है। अगर उनकी पेशेवर आय निर्धारित सीमा से अधिक है, तो उन्हें रिटर्न दाखिल करना पड़ता है।

    इसी तरह कारोबार करने वाले लोगों के लिए भी टर्नओवर के आधार पर ITR दाखिल करने की आवश्यकता हो सकती है। यदि किसी व्यवसाय का सालाना कारोबार तय सीमा से अधिक है, तो मुनाफा कम होने या न होने की स्थिति में भी रिटर्न दाखिल करना जरूरी हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ITR केवल टैक्स भुगतान का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की वित्तीय पहचान और रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी होता है। लोन लेने, वीजा प्रक्रिया, निवेश और कई अन्य वित्तीय कार्यों में भी ITR की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए करदाताओं को केवल आय सीमा देखकर निर्णय लेने के बजाय अपनी पूरी वित्तीय स्थिति और नियमों को ध्यान में रखकर रिटर्न दाखिल करना चाहिए।

  • ITR से लेकर LPG-तत्काल टिकट बुकिंग तक…. 1 अगस्त से बदल जाएंगे ये नियम

    ITR से लेकर LPG-तत्काल टिकट बुकिंग तक…. 1 अगस्त से बदल जाएंगे ये नियम


    नई दिल्ली।
    हर नए महीने की पहली तारीख अपने साथ कई नए बदलाव (Rules Changing ) लेकर आती है, जिनका सीधा असर देश के आम नागरिकों के घरेलू बजट और रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ता है। 1 अगस्त 2026 ( 1st August 2026) से भी देश में कई महत्वपूर्ण नियम (New Rules) बदलने जा रहे हैं, जो सीधे आपकी जेब, यात्रा, टैक्स और बैंकिंग सेवाओं से जुड़े हुए हैं।

    इन नए नियमों में रसोई गैस (LPG) की कीमतों से लेकर, रेलवे (Railways, Banking) की तत्काल टिकट खिड़की, क्रेडिट कार्ड के सर्विस चार्ज, आईटीआर पेनल्टी और पहचान सत्यापन की पूरी व्यवस्था शामिल है। सही जानकारी न होने पर आपको वित्तीय नुकसान झेलना पड़ सकता है। आइए बेहद आसान और सरल भाषा में समझते हैं कि 1 अगस्त से देश में कौन से 5 बड़े बदलाव होने जा रहे हैं।


    एलपीजी सिलेंडर की नई कीमतें

    तेल विपणन कंपनियां हर महीने की पहली तारीख को रसोई गैस सिलेंडरों के दामों की समीक्षा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को देखते हुए 1 अगस्त को घरेलू और कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों के नए रेट जारी किए जाएंगे। अगर कमर्शियल गैस सिलेंडरों के दाम बढ़ते हैं, तो बाहर होटलों और रेस्टोरेंट में खाना-पीना महंगा हो सकता है, जिसका सीधा असर आपके मासिक बजट पर पड़ेगा।


    तत्काल टिकट बुकिंग में टोकन से जुड़ा नया नियम

    पश्चिम मध्य रेलवे 1 अगस्त से रिजर्वेशन काउंटरों पर तत्काल टिकटों की बुकिंग के लिए नया ‘टोकन सिस्टम’ लागू कर रहा है। अब काउंटरों पर लंबी लाइन और धक्का-मुक्की रोकने के लिए टोकन बांटने का समय तत्काल बुकिंग खुलने के समय के साथ मिलाया जा रहा है। एसी तत्काल के लिए सुबह 8:30-9:00 बजे और नॉन-एसी के लिए सुबह 9:00-9:30 बजे टोकन मिलेंगे, इसके बाद ही काउंटर से तत्काल टिकट बुक कर सकेंगे।


    क्रेडिट कार्ड और बैंकिंग चार्ज में बड़ा बदलाव

    1 अगस्त से कुछ बैंक अपने क्रेडिट कार्ड से जुड़े शुल्क, रिवॉर्ड पॉइंट्स या अन्य नियमों में बदलाव कर सकते हैं। बता दें कि यह बदलाव सभी बैंकों पर लागू नहीं होगा। इसलिए अगर आप क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, तो अपने बैंक की वेबसाइट या एप पर जाकर नए नियम और शुल्क जरूर चेक करें।


    आईटीआर (ITR) फाइलिंग पर भारी लेट फीस और पेनल्टी

    वित्तीय वर्ष के लिए बिना जुर्माने के इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई है। जो लोग इस समय सीमा तक अपना रिटर्न फाइल नहीं कर पाए हैं, उन्हें 1 अगस्त से बिलेटेड रिटर्न भरने पर आय के आधार पर भारी जुर्माना (पेनल्टी) देना होगा। इसलिए टैक्सपेयर्स को किसी भी अन्य कानूनी पचड़े से बचने के लिए जल्द से जल्द लेट फीस के साथ रिटर्न भरने की सलाह दी जाती है।


    सीकेवाईसी (CKYC) 2.0 की शुरुआत

    1 अगस्त से देश के बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों में ग्राहक सत्यापन को सुरक्षित बनाने के लिए ‘सेंट्रल नो योर कस्टमर’ यानी सीकेवाईसी 2.0 सिस्टम लागू होने जा रहा है। इसके तहत ग्राहकों को 14 अंकों का एक यूनिक सीकेवाईसी नंबर मिलेगा। इस नए सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि आपको हर बैंक, बीमा कंपनी या म्यूचुअल फंड में अलग-अलग केवाईसी दस्तावेज देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

  • शेयर बाजार में तेजी से बढ़ रही युवाओं की भागीदारी….. हर 10वां भारतीय बना निवेशक

    शेयर बाजार में तेजी से बढ़ रही युवाओं की भागीदारी….. हर 10वां भारतीय बना निवेशक


    नई दिल्ली।
    भारतीय शेयर बाजार (Indian stock market) में युवाओं (Youth) की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) (National Stock Exchange – NSE) की मार्केट पल्स-जुलाई 2026 रिपोर्ट के अनुसार, इस साल अप्रैल से जून के बीच यानी तीन माह में शेयर बाजार में आए नए निवेशकों में जेन जी (Gen Z) की हिस्सेदारी 59% रही। मार्च, 2020 से जून, 2026 तक भी हर साल नए निवेशकों में इनका हिस्सा 53-59 फीसदी रहा।


    नए निवेशकों में जेन जी की हिस्सेदारी कितनी रही?

    रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च, 2020 में देश में 3 करोड़ पंजीकृत निवेशक थे, जो जून, 2026 तक बढ़कर 13.24 करोड़ हो गए। यानी अब देश का लगभग हर 10वां व्यक्ति पंजीकृत निवेशक है। इनमें 4.40 करोड़ सक्रिय निवेशक हैं, जिन्होंने एक साल में कम से कम एक बार ट्रेडिंग की। 3.55 करोड़ कैश मार्केट में सक्रिय रहे, जबकि 85 लाख निवेशकों ने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफएंडओ) में कारोबार किया।

    रिपोर्ट के अनुसार, शेयर बाजार में निवेश करने में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है। देश के कुल पंजीकृत निवेशकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 24.9 फीसदी है। यानी लगभग हर चार में एक निवेशक महिला है।


    महिलाओं की भागीदारी कितनी बढ़ी है?
    राज्य – हिस्सेदारी

    गोवा – 33.3%
    मिजोरम- 32.6%
    दिल्ली – 31.1%
    महाराष्ट्र – 29%
    तमिलनाडु- 28.7%
    गुजरात – 28.4%
    उत्तर प्रदेश – 19.2%
    बिहार – 16.5%
    एनएसई में 2020 से जून, 2026 के आंकड़ाें से निष्कर्ष


    लंबी अवधि के निवेश का रुझान क्यों बढ़ रहा है?

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, कैश मार्केट में लगातार बढ़ती भागीदारी इस बात का संकेत है कि खुदरा निवेशक एफएंडओ में सिर्फ सट्टेबाजी और जल्द पैसा बनाने के बजाय लंबी अवधि के निवेश पर भी जोर दे रहे हैं। सेबी कह चुका है कि एफएंडओ में ज्यादातर नुकसान होता है।

  • अमेरिका ईरान तनाव और महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाई बाजार की बेचैनी शुरुआती कारोबार में शेयर बाजार पर दबाव

    अमेरिका ईरान तनाव और महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाई बाजार की बेचैनी शुरुआती कारोबार में शेयर बाजार पर दबाव


    नई दिल्ली। वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बढ़े सैन्य तनाव कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने के फैसले ने निवेशकों का भरोसा कमजोर कर दिया। इसी दबाव के बीच घरेलू शेयर बाजार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स तथा निफ्टी दोनों लाल निशान में कारोबार करते नजर आए।

    बाजार खुलते ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले करीब 250 से 300 अंकों की कमजोरी के साथ खुला जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी लगभग 80 से 100 अंकों की गिरावट के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। शुरुआती घंटों में निवेशकों ने नई खरीदारी से दूरी बनाई और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख किया जिससे बाजार में दबाव बना रहा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय वैश्विक घटनाक्रम भारतीय बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी भारत जैसे आयात आधारित देशों के लिए चिंता का विषय बन गई है क्योंकि इससे महंगाई और व्यापार घाटे पर असर पड़ सकता है।

    एशियाई बाजारों का प्रदर्शन भी मिला जुला रहा। जापान के निक्केई और टॉपिक्स सूचकांक दबाव में रहे जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी शुरुआती गिरावट के बाद संभलता नजर आया। हांगकांग के हैंगसेंग फ्यूचर्स में हल्की मजबूती देखने को मिली लेकिन कुल मिलाकर एशियाई बाजारों में सतर्कता का माहौल बना रहा। निवेशक फिलहाल किसी बड़े फैसले से पहले वैश्विक घटनाओं पर नजर बनाए हुए हैं।

    वहीं अमेरिकी बाजारों में पिछले कारोबारी सत्र के दौरान बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। डॉव जोन्स एसएंडपी 500 और नैस्डैक तीनों प्रमुख सूचकांक दबाव में बंद हुए। फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने के बावजूद भू राजनीतिक तनाव ने बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया। हालांकि बाद में अमेरिकी फ्यूचर्स में हल्की रिकवरी देखने को मिली लेकिन उसका सकारात्मक असर भारतीय बाजार की शुरुआत पर नहीं दिखाई दिया।

    बाजार विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल निवेशकों को जल्दबाजी में बड़े निवेश फैसले लेने से बचना चाहिए। वैश्विक हालात सामान्य होने तक बाजार में उतार चढ़ाव बना रह सकता है। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मजबूत कंपनियों में चरणबद्ध निवेश की रणनीति बेहतर मानी जा रही है जबकि अल्पकालिक निवेशकों को जोखिम प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

    आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों और प्रमुख आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम होता है और विदेशी बाजारों में स्थिरता लौटती है तो भारतीय शेयर बाजार में भी सुधार देखने को मिल सकता है। फिलहाल बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है और निवेशक हर नए संकेत पर पैनी नजर रखे हुए हैं।