Category: Economy

  • चार वर्षों में न्यूनतम बैलेंस शुल्क से बैंकों ने वसूले 26,170 करोड़ रुपये, संसद में सरकार ने साझा किए आंकड़े

    चार वर्षों में न्यूनतम बैलेंस शुल्क से बैंकों ने वसूले 26,170 करोड़ रुपये, संसद में सरकार ने साझा किए आंकड़े

    नई दिल्ली । खातों में न्यूनतम औसत शेष राशि बनाए नहीं रखने पर ग्राहकों से वसूले जाने वाले शुल्क को लेकर सरकार ने संसद में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। सरकार के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से वित्त वर्ष 2026 के बीच देश के बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर ग्राहकों से कुल 26,170 करोड़ रुपये से अधिक की राशि शुल्क के रूप में वसूली है। यह जानकारी राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा दिए गए लिखित उत्तर में सामने आई।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में निजी क्षेत्र के बैंकों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में कहीं अधिक न्यूनतम बैलेंस शुल्क वसूला। केवल वित्त वर्ष 2026 की बात करें तो बैंकों ने कुल 7,086.63 करोड़ रुपये का न्यूनतम बैलेंस शुल्क एकत्र किया। इसमें निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी 4,948.71 करोड़ रुपये रही, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 2,137.92 करोड़ रुपये वसूले।

    आंकड़ों के मुताबिक, निजी क्षेत्र के बैंकों में एचडीएफसी बैंक ने वित्त वर्ष 2026 के दौरान सबसे अधिक 1,798.14 करोड़ रुपये न्यूनतम बैलेंस शुल्क के रूप में वसूले। इसके बाद एक्सिस बैंक का स्थान रहा, जिसने 1,081.33 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। दोनों बैंकों की संयुक्त हिस्सेदारी निजी क्षेत्र के कुल न्यूनतम बैलेंस शुल्क का लगभग 58 प्रतिशत रही।

    अन्य निजी बैंकों में आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, यस बैंक और आईडीबीआई बैंक ने भी इस मद में उल्लेखनीय राशि वसूली। दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक सबसे आगे रहा, जिसने 477.27 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन बैंक का स्थान रहा।

    हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बताई गई राशि केवल चालू खातों से संबंधित है। बैंक ने मार्च 2020 से बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर लगने वाली पेनाल्टी समाप्त कर दी थी। इस कारण बचत खाताधारकों पर यह शुल्क लागू नहीं होता।

    सरकार ने यह भी बताया कि हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश बैंकों ने बचत खातों पर न्यूनतम औसत बैलेंस बनाए रखने की अनिवार्यता को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से 10 बैंकों ने बचत खातों पर यह शुल्क पूरी तरह खत्म कर दिया है, जबकि शेष दो बैंकों ने अपनी नीतियों के अनुरूप इसे सीमित और तर्कसंगत बनाया है।

    वित्त मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट और प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खोले गए खाते न्यूनतम बैलेंस रखने की अनिवार्यता से पूरी तरह मुक्त हैं। ऐसे खातों पर न्यूनतम बैलेंस नहीं होने की स्थिति में किसी प्रकार का जुर्माना नहीं लगाया जाता। वर्तमान में देश में लगभग 73 करोड़ ऐसे खाते संचालित हैं, जिनके खाताधारकों को इस नियम से राहत प्राप्त है।

    सरकार की ओर से साझा किए गए ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब बैंकिंग सेवाओं की लागत, ग्राहकों के अधिकारों और बैंकिंग शुल्कों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। आने वाले समय में न्यूनतम बैलेंस संबंधी नियमों और शुल्क व्यवस्था पर भी नीति स्तर पर नजर बनी रह सकती है।

  • ब्रिटेन के 21 पोर्ट पर अडानी की नजर! ABP में हिस्सेदारी खरीदने की तैयारी, वैश्विक विस्तार को मिलेगी रफ्तार

    ब्रिटेन के 21 पोर्ट पर अडानी की नजर! ABP में हिस्सेदारी खरीदने की तैयारी, वैश्विक विस्तार को मिलेगी रफ्तार


    नई दिल्ली। अडानी समूह की प्रमुख कंपनी अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (APSEZ) ब्रिटेन के सबसे बड़े पोर्ट ऑपरेटर एसोसिएटेड ब्रिटिश पोर्ट्स (ABP) में हिस्सेदारी खरीदने की संभावनाएं तलाश रही है। यदि यह सौदा सफल होता है, तो अडानी समूह का बंदरगाह कारोबार भारत से आगे बढ़कर ब्रिटेन तक पहुंच जाएगा और वैश्विक स्तर पर उसकी मौजूदगी और मजबूत होगी।

    63.9% हिस्सेदारी बिक्री के लिए उपलब्ध
    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ABP की 63.9% नियंत्रक हिस्सेदारी बिक्री के लिए उपलब्ध है। यह हिस्सेदारी कनाडा के दो प्रमुख पेंशन फंड—कनाडा पेंशन प्लान इन्वेस्टमेंट बोर्ड (CPPIB) और ओंटारियो म्युनिसिपल एम्प्लॉइज़ रिटायरमेंट सिस्टम (OMERS)—के पास है। दोनों निवेशकों ने अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया के लिए बैंकर नियुक्त किए हैं।

    21 बंदरगाहों का संचालन करती है ABP
    ABP इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स में फैले 21 प्रमुख बंदरगाहों का संचालन करती है। इनमें इमिंघम, जो ब्रिटेन का सबसे बड़ा बंदरगाह है, और साउथेम्प्टन, जो देश का प्रमुख आयात केंद्र माना जाता है, शामिल हैं। कंपनी के पोर्ट ब्रिटेन के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत संभालते हैं।

    वर्ष 2025 में ABP ने 42.5 मिलियन टन बल्क कार्गो और 3.1 मिलियन कंटेनर एवं रोल-ऑन/रोल-ऑफ यूनिट्स का संचालन किया। इस दौरान कंपनी का राजस्व 819.8 मिलियन पाउंड और परिचालन लाभ 586.5 मिलियन पाउंड रहा।

    अडानी के लिए क्यों अहम है यह सौदा?
    विशेषज्ञों के अनुसार, ABP की आय का बड़ा हिस्सा दीर्घकालिक ग्राहक अनुबंधों और पायलटेज सेवाओं से आता है, जिससे कंपनी को स्थिर राजस्व मिलता है। यही वजह है कि इसे अडानी पोर्ट्स के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण निवेश माना जा रहा है।

    पहले से कई देशों में मौजूद है अडानी पोर्ट्स
    अडानी पोर्ट्स फिलहाल भारत में 15 बंदरगाहों का संचालन करती है, जिनकी कुल क्षमता 653 मिलियन टन है। इसके अलावा कंपनी इज़रायल, तंजानिया, श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया में भी पोर्ट कारोबार से जुड़ी हुई है।

    वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने 501 मिलियन टन कार्गो का संचालन किया। अडानी पोर्ट्स का लक्ष्य 2030 तक अपनी कार्गो हैंडलिंग क्षमता 1 अरब टन तक पहुंचाने का है। इसके लिए अगले पांच वर्षों में ₹1 लाख करोड़ तक निवेश की योजना बनाई गई है, जिसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर विस्तार पर जोर रहेगा।

    कंपनी ने क्या कहा?
    अडानी पोर्ट्स के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी अपनी दीर्घकालिक रणनीति के अनुरूप नए निवेश अवसरों का लगातार मूल्यांकन करती रहती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बाजार में चल रही अटकलों या संभावित सौदों पर कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की जाएगी।

  • सेंसेक्स और निफ्टी की चाल पर रहें नजर बाजार में उतार चढ़ाव के बीच जानिए किन सेक्टरों में दिख सकते हैं बेहतर अवसर

    सेंसेक्स और निफ्टी की चाल पर रहें नजर बाजार में उतार चढ़ाव के बीच जानिए किन सेक्टरों में दिख सकते हैं बेहतर अवसर


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में आज निवेशकों की नजर घरेलू आर्थिक संकेतों के साथ साथ वैश्विक बाजारों की चाल पर बनी रहेगी। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में बाजार में उतार चढ़ाव का दौर देखने को मिला है और विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भी यही रुख जारी रह सकता है। ऐसे माहौल में निवेशकों को जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय सोच समझकर निवेश करने की सलाह दी जा रही है। मजबूत कंपनियों में लंबी अवधि का निवेश अब भी बेहतर रणनीति माना जा रहा है।

    बाजार की दिशा तय करने में विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीद बिक्री महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि विदेशी निवेशकों का रुझान सकारात्मक रहता है तो सेंसेक्स और निफ्टी को मजबूती मिल सकती है। वहीं यदि वैश्विक बाजारों में कमजोरी रहती है या विदेशी निवेशक बिकवाली करते हैं तो घरेलू बाजार पर भी दबाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतें अमेरिकी डॉलर की चाल और रुपये की स्थिति भी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा और एफएमसीजी सेक्टर के शेयरों पर निवेशकों की खास नजर रहेगी। यदि कंपनियों के तिमाही नतीजे उम्मीद से बेहतर आते हैं तो इन क्षेत्रों में खरीदारी बढ़ सकती है। वहीं कमजोर परिणाम आने पर मुनाफावसूली का दबाव भी देखने को मिल सकता है। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी गतिविधि बनी रह सकती है लेकिन इनमें निवेश करते समय जोखिम का आकलन करना जरूरी है।

    बाजार विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केवल सोशल मीडिया या अफवाहों के आधार पर निवेश नहीं करना चाहिए। किसी भी कंपनी में निवेश से पहले उसके वित्तीय प्रदर्शन कारोबार की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं का मूल्यांकन करना आवश्यक है। जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि का है उन्हें बाजार में आने वाले छोटे उतार चढ़ाव से घबराने की जरूरत नहीं है। अच्छी कंपनियों में नियमित और अनुशासित निवेश भविष्य में बेहतर रिटर्न देने की संभावना रखता है।

    अगर आप नए निवेशक हैं तो एक साथ बड़ी रकम लगाने के बजाय चरणबद्ध निवेश की रणनीति अपनाना अधिक सुरक्षित माना जाता है। इससे बाजार में गिरावट आने की स्थिति में जोखिम कम हो सकता है। साथ ही अपने निवेश पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखना भी जरूरी है ताकि किसी एक सेक्टर में कमजोरी आने पर पूरे निवेश पर बड़ा असर न पड़े।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बाजार में हर दिन तेजी या गिरावट आना सामान्य प्रक्रिया है। इसलिए भावनाओं में आकर खरीदारी या बिकवाली करने से बचना चाहिए। निवेश का निर्णय हमेशा अपनी वित्तीय क्षमता निवेश अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए। सही जानकारी धैर्य और अनुशासित रणनीति के साथ किया गया निवेश लंबे समय में बेहतर परिणाम दे सकता है।

    कुल मिलाकर आज शेयर बाजार में उतार चढ़ाव के बीच चुनिंदा सेक्टरों में अवसर बन सकते हैं। ऐसे में निवेशकों को वैश्विक संकेतों कंपनियों के तिमाही नतीजों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर नजर रखते हुए संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए। समझदारी और धैर्य के साथ लिया गया निवेश निर्णय ही भविष्य में बेहतर लाभ का आधार बन सकता है।

  • भारतीय खिलौनों की दुनिया में बढ़ी धाक, सात साल में 89 फीसदी बढ़ा निर्यात

    भारतीय खिलौनों की दुनिया में बढ़ी धाक, सात साल में 89 फीसदी बढ़ा निर्यात


    नई दिल्ली।
    वैश्विक बाजार में भारतीय खिलौनों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले 7 साल में घरेलू विनिर्माण और सरकार की प्रोत्साहन नीतियों के बल पर भारत के खिलौना उद्योग का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। भारत के खिलौना निर्यात में 89.1 फीसदी की भारी बढ़ोत्तरी हुई है।

    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने मंगलवार को लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत खिलौने आयात करने वाले देश से उभरकर एक शुद्ध निर्यातक बन चुका है। अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स तथा जर्मनी जैसे विकसित देशों को भारतीय खिलौने निर्यात किए जा रहे हैं।

    ट्रेडस्टैट आंकड़ों के मुताबिक भारत में खिलौनों का आयात 37.5 फीसदी कम हुआ है, जबकि खिलौनों के निर्यात में 89.1 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। वित्त वर्ष 2018-19 की तुलना में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत से खिलौनों के निर्यात में 89.1 फीसदी का बड़ा उछाल दर्ज किया गया है। विदेशी खिलौनों पर निर्भरता भी कम हुई है और आयात में 37.5 फीसदी की भारी कमी देखने को मिली है।

    मंत्रालय ने बताया कि टॉय एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने 17वीं टॉय बिज इंटरनेशनल बी2बी प्रदर्शनी का आयोजन नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 4 से 7 जुलाई तक किया। इस प्रदर्शनी में 400 भारतीय खिलौना ब्रांडों, 40 देशों के 100 अंतरराष्ट्रीय खरीदारों और लगभग 30,000 व्यावसायिक आगंतुकों ने भाग लिया। इस प्रदर्शनी ने निर्माताओं को थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं, वितरकों, संस्थागत खरीदारों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ने का मंच प्रदान किया।

  • केंद्र सरकार ने चीनी की स्टॉक लिमिट तय की, नये नियम 1 अगस्त से लागू होंगे

    केंद्र सरकार ने चीनी की स्टॉक लिमिट तय की, नये नियम 1 अगस्त से लागू होंगे


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार ने चीनी की जमाखोरी रोकने के लिए बड़ा सख्त कदम उठाया है। सरकार ने बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चीनी कारोबारियों के लिए नई स्टॉक रखने की सीमा लागू किया है। सरकार के नए आदेश के तहत अब कोई भी चीनी डीलर 4,000 क्विंटल से अधिक चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेगा। ये नियम 1 अगस्त से 30 नवंबर तक लागू रहेगा।

    उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और सरकारी चीनी भंडार को इस नई स्टॉक सीमा से छूट दी गई है। केंद्र सरकार ने निर्देश दिया कि कोई भी चीनी डीलर 30 दिन से ज्यादा समय तक स्टॉक या भंडार न रखे। साथ ही चीनी की कीमतों को काबू में रखने की कोशिशों के तहत चार हजार क्विंटल की स्टॉक सीमा तय की गई है।

    उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार सभी चीनी डीलरों को खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के ऑनलाइन पोर्टल के जरिए हर हफ्ते अपने चीनी स्टॉक की जानकारी देनी होगी और स्टॉक की स्थिति को अपडेट करना होगा। इसके अलावा केंद्र सरकार ने राज्यों को भी अधिकार दिया है कि अगर जरूरी हो तो वे केंद्र की ओर से तय सीमा से कम स्टॉक लिमिट लागू कर सकते हैं। इस कदम का मकसद बाजार में चीनी की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना, जमाखोरी पर अंकुश लगाना और कीमतों को कंट्रोल रखने में मदद करना है।

  • 16,086 मेगावाट क्षमता और रिकॉर्ड बिजली उत्पादन के साथ पवन ऊर्जा में गुजरात सबसे आगे, केंद्र ने जारी किए आंकड़े

    16,086 मेगावाट क्षमता और रिकॉर्ड बिजली उत्पादन के साथ पवन ऊर्जा में गुजरात सबसे आगे, केंद्र ने जारी किए आंकड़े

    नई दिल्ली। देश में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में गुजरात ने एक नई उपलब्धि हासिल की है। केंद्र सरकार के अनुसार राज्य ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में स्थापित क्षमता और बिजली उत्पादन, दोनों मामलों में देशभर में पहला स्थान प्राप्त किया है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 30 जून 2026 तक गुजरात में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 16,086 मेगावाट तक पहुंच गई है, जो देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक है। इस उपलब्धि ने गुजरात को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य के रूप में और अधिक मजबूत पहचान दिलाई है।

    सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान गुजरात ने पवन ऊर्जा से 33,706 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया। यह देश के कुल पवन ऊर्जा उत्पादन का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। भारत की कुल पवन ऊर्जा स्थापित क्षमता इसी अवधि में 57,443 मेगावाट तक पहुंच चुकी है, जबकि पूरे देश में पवन ऊर्जा से 106 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन दर्ज किया गया। इसमें गुजरात का योगदान सबसे अधिक रहा, जिससे राज्य की ऊर्जा क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी मजबूत स्थिति स्पष्ट होती है।

    केंद्र सरकार का कहना है कि वर्ष 2030 तक देश की कुल बिजली आवश्यकता का 50 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसी दिशा में गुजरात ने पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और रूफटॉप सोलर परियोजनाओं के विस्तार के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति की है। राज्य में विकसित बुनियादी ढांचा, निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण और प्रभावी नीतियों के कारण स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं का तेजी से विस्तार हुआ है।

    सरकार ने बताया कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई हैं। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर योजना के तहत नई ट्रांसमिशन लाइनें और सबस्टेशन विकसित किए गए हैं, जिससे स्वच्छ ऊर्जा को बिजली ग्रिड तक पहुंचाने की क्षमता में वृद्धि हुई है। इसके अलावा इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम शुल्क में दी गई राहत से निजी निवेश को बढ़ावा मिला है और नई परियोजनाओं की लागत कम करने में मदद मिली है।

    पवन ऊर्जा क्षेत्र को और मजबूत बनाने के लिए ‘नेशनल रिपावरिंग एंड लाइफ एक्सटेंशन पॉलिसी फॉर विंड पावर प्रोजेक्ट्स-2023’ लागू की गई है। इसके साथ ही ऑफशोर विंड एनर्जी लीज रूल्स-2023 और ऑफशोर पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग जैसी योजनाओं ने समुद्री क्षेत्रों में पवन ऊर्जा विकास के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। इन पहलों का लाभ गुजरात सहित कई राज्यों को मिल रहा है, हालांकि इस क्षेत्र में सबसे तेज प्रगति गुजरात ने दर्ज की है।

    केंद्र सरकार के अनुसार गुजरात ने देश में सबसे पहले पवन ऊर्जा नीति लागू करने वाले राज्यों में शामिल होकर इस क्षेत्र के विकास की मजबूत नींव रखी थी। समय के साथ राज्य ने आधुनिक तकनीक, बेहतर ग्रिड प्रबंधन और निवेश समर्थक नीतियों के माध्यम से अपनी क्षमता में लगातार विस्तार किया। परिणामस्वरूप राज्य में पवन ऊर्जा उत्पादन लगातार बढ़ा है और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिली है।

    सरकार का मानना है कि गुजरात का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो सकता है। स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और टिकाऊ विकास को गति देने की दिशा में राज्य की यह उपलब्धि देश के ऊर्जा परिवर्तन अभियान को नई मजबूती प्रदान करेगी। आने वाले वर्षों में पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विस्तार से भारत के हरित ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण सहायता मिलने की उम्मीद जताई गई है।

  • E20 पेट्रोल को लेकर फैली गलतफहमियों पर सरकार ने दी सफाई, इंश्योरेंस और इंजन से जुड़े दावों का किया खंडन

    E20 पेट्रोल को लेकर फैली गलतफहमियों पर सरकार ने दी सफाई, इंश्योरेंस और इंजन से जुड़े दावों का किया खंडन


    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने E20 पेट्रोल को लेकर उपभोक्ताओं के बीच फैली एक बड़ी आशंका को दूर करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इस ईंधन के उपयोग के आधार पर किसी वाहन का इंश्योरेंस क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। सरकार ने कहा है कि इस तरह के दावे पूरी तरह भ्रामक हैं और वाहन मालिक बिना किसी चिंता के E20 पेट्रोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके साथ ही इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से जुड़े इंजन खराब होने, ईंधन की गुणवत्ता और अन्य तकनीकी पहलुओं को लेकर फैल रही गलतफहमियों पर भी विस्तार से स्थिति स्पष्ट की गई है।

    सरकार का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर E20 पेट्रोल को लेकर कई तरह के दावे और भ्रम फैलाए जा रहे थे। इन्हीं दावों के बीच यह चर्चा भी सामने आई कि E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने वाले वाहन मालिकों का इंश्योरेंस क्लेम अस्वीकार किया जा सकता है। सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल E20 ईंधन के उपयोग को आधार बनाकर किसी भी इंश्योरेंस दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।

    इससे पहले भी पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर एक विस्तृत जानकारी जारी कर विभिन्न भ्रांतियों का जवाब दिया था। मंत्रालय ने बताया कि वाहन बीमा, इंजन की कार्यक्षमता और ईंधन की गुणवत्ता से जुड़े जिन दावों को सोशल मीडिया पर प्रचारित किया जा रहा है, उनका वैज्ञानिक तथ्यों से कोई संबंध नहीं है। मंत्रालय के अनुसार, इन दावों की जांच की गई और उन्हें तथ्यहीन पाया गया।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि E20 पेट्रोल के कारण बड़े पैमाने पर इंजन खराब होने या वाहन के प्रदर्शन पर गंभीर नकारात्मक असर पड़ने जैसी बातों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी तरह यह दावा भी निराधार बताया गया कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से कीड़े अधिक आकर्षित होते हैं। सरकार का कहना है कि इस प्रकार की बातें अफवाहों पर आधारित हैं और इनका तकनीकी परीक्षणों में कोई आधार नहीं मिला है।

    मंत्रालय के अनुसार, देश में लागू इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम पूरी तरह वैज्ञानिक परीक्षणों और तकनीकी मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। इसे लागू करने से पहले ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, ऑटोमोबाइल निर्माताओं और ईंधन परीक्षण से जुड़ी विशेषज्ञ संस्थाओं के साथ व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया गया। इसके बाद आवश्यक मानकों को ध्यान में रखते हुए E20 पेट्रोल को चरणबद्ध तरीके से बाजार में उपलब्ध कराया गया।

    सरकार ने यह भी जानकारी दी कि वर्ष 2023 में E20 पेट्रोल की शुरुआत के बाद से इथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण इंजन खराब होने या बड़ी संख्या में वाहनों के बंद पड़ने जैसी कोई व्यापक शिकायत सामने नहीं आई है। इससे संकेत मिलता है कि निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार किया गया E20 ईंधन सामान्य परिस्थितियों में सुरक्षित रूप से उपयोग किया जा सकता है।

    मंत्रालय ने बताया कि पेट्रोल में मिलाया जाने वाला इथेनॉल स्थापित औद्योगिक प्रक्रियाओं के तहत तैयार किया जाता है और मिश्रण से पहले यह कई गुणवत्ता परीक्षणों से गुजरता है। निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित करने के बाद ही इसे ईंधन के रूप में उपयोग में लाया जाता है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। ऐसे में उपभोक्ताओं से अपील की गई है कि वे E20 पेट्रोल से जुड़ी अपुष्ट और भ्रामक सूचनाओं पर विश्वास करने के बजाय आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें।

  • रिकॉर्ड 863.1 अरब डॉलर के निर्यात में एफटीए बने गेमचेंजर, नए वैश्विक बाजारों तक भारत की पहुंच मजबूत

    रिकॉर्ड 863.1 अरब डॉलर के निर्यात में एफटीए बने गेमचेंजर, नए वैश्विक बाजारों तक भारत की पहुंच मजबूत

    नई दिल्ली । भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 863.1 अरब डॉलर का अब तक का सर्वाधिक निर्यात दर्ज कर नया रिकॉर्ड बनाया है। सरकार ने संसद में जानकारी देते हुए बताया कि इस उपलब्धि में विभिन्न मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन समझौतों के माध्यम से भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुंच मिली, शुल्क रियायतों का लाभ बढ़ा और श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा हुए। सरकार का कहना है कि एफटीए की बदौलत भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत हुई है और निर्यात के नए क्षेत्रों में विस्तार संभव हुआ है।

    लोकसभा में लिखित उत्तर देते हुए वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में वस्तु निर्यात (मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट) 441.8 अरब डॉलर रहा, जबकि सेवा क्षेत्र का निर्यात बढ़कर 421.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। दोनों क्षेत्रों के संयुक्त प्रदर्शन से देश का कुल निर्यात 863.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। उन्होंने कहा कि सरकार व्यापार समझौतों के तहत मिलने वाली शुल्क रियायतों के उपयोग की लगातार निगरानी कर रही है, ताकि भारतीय निर्यातकों को इनका अधिकतम लाभ मिल सके।

    सरकार के अनुसार भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) लागू होने के बाद अब तक 4.45 लाख सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए जा चुके हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय निर्यातकों ने शुल्क रियायतों का व्यापक रूप से उपयोग किया है। यूएई को निर्यात होने वाली एचएस 8-डिजिट टैरिफ लाइनों की संख्या भी वित्त वर्ष 2021-22 के 7,546 से बढ़कर 2025-26 में 8,053 हो गई। इन टैरिफ लाइनों के तहत 37.3 अरब डॉलर का निर्यात दर्ज किया गया, जो भारतीय उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग का संकेत माना जा रहा है।

    भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ईसीटीए) के तहत भी भारतीय निर्यातकों को उल्लेखनीय लाभ मिला है। समझौते के बाद अब तक 2.73 लाख सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए गए हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया को निर्यात होने वाली टैरिफ लाइनों की संख्या बढ़कर 5,668 हो गई है, जिनके माध्यम से 7.2 अरब डॉलर का निर्यात हुआ। इसी प्रकार भारत-मॉरीशस व्यापक आर्थिक सहयोग एवं साझेदारी समझौते (सीईसीपीए) के तहत भी टैरिफ लाइनों और निर्यात मूल्य दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे भारतीय उत्पादों की पहुंच नए क्षेत्रों तक विस्तारित हुई है।

    सरकार ने बताया कि भारत-ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के तहत भारत के 99.38 प्रतिशत निर्यात को शुल्क मुक्त पहुंच प्राप्त हुई है। समझौता लागू होने के बाद ओमान को निर्यात में तेज वृद्धि देखने को मिली है। जून 2026 में ओमान को 622.8 मिलियन डॉलर का निर्यात दर्ज किया गया, जो मई 2026 की तुलना में 54.7 प्रतिशत और जून 2025 की तुलना में 189.6 प्रतिशत अधिक रहा। इसके अलावा यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के साथ लागू समझौते के बाद भी हजारों सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी किए जा चुके हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों को शुल्क रियायतों का व्यापक लाभ मिला है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में किए गए एफटीए में टेक्सटाइल, चमड़ा और अन्य श्रम-प्रधान उद्योगों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और ईएफटीए जैसे साझेदार देशों के साथ हुए समझौतों ने भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजारों के द्वार खोले हैं। सरकार का कहना है कि इन समझौतों में घरेलू उद्योगों के हितों की सुरक्षा के साथ संतुलित रणनीति अपनाई गई है, जिससे निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ देश के औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को भी नई गति मिली है।

  • नांदेड़ डिवीजन में 163 करोड़ रुपये की ट्रैक्शन अपग्रेड परियोजना को मंजूरी, रेल संचालन क्षमता होगी मजबूत

    नांदेड़ डिवीजन में 163 करोड़ रुपये की ट्रैक्शन अपग्रेड परियोजना को मंजूरी, रेल संचालन क्षमता होगी मजबूत

    नई दिल्ली । भारतीय रेलवे ने देश के रेल बुनियादी ढांचे को अधिक आधुनिक और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए दक्षिण मध्य रेलवे के नांदेड़ डिवीजन के परभणी-मुदखेड़ डबल लाइन रेलखंड में इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन सिस्टम के उन्नयन को मंजूरी प्रदान कर दी है। इस परियोजना पर लगभग 163 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसका उद्देश्य रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने, विद्युत आपूर्ति को अधिक मजबूत बनाना और यात्री तथा मालगाड़ियों के संचालन को अधिक कुशल बनाना है।

    इस परियोजना के तहत मौजूदा 1×25 केवी इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन सिस्टम को आधुनिक 2×25 केवी ट्रैक्शन सिस्टम में परिवर्तित किया जाएगा। यह अपग्रेडेशन लगभग 164 ट्रैक किलोमीटर के दायरे में किया जाएगा। इसके साथ ही बढ़ते विद्युत भार को ध्यान में रखते हुए पावर सप्लाई से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी आधुनिक तकनीक के अनुरूप विकसित किया जाएगा, जिससे भविष्य की बढ़ती परिचालन आवश्यकताओं को आसानी से पूरा किया जा सके।

    परभणी-मुदखेड़ रेलखंड दक्षिण मध्य रेलवे के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में शामिल है। यह रणनीतिक रूप से हाईली यूटिलाइज्ड नेटवर्क (एचयूएन) रूट-9 का हिस्सा है, जो अजमेर, इंदौर, खंडवा, अकोला, पूर्णा, मुदखेड़, सिकंदराबाद, महबूबनगर और धोन जैसे प्रमुख शहरों और रेल मार्गों को जोड़ता है। इस कॉरिडोर का उपयोग बड़ी संख्या में यात्री ट्रेनों के साथ-साथ मालगाड़ियों के संचालन के लिए भी किया जाता है, इसलिए इसकी क्षमता बढ़ाना रेलवे की प्राथमिकताओं में शामिल है।

    रेल मंत्रालय का मानना है कि नए ट्रैक्शन सिस्टम के लागू होने से ट्रेनों को अधिक स्थिर और मजबूत विद्युत आपूर्ति मिलेगी। इससे इस रेलखंड पर माल ढुलाई की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और तेज गति से चलने वाली ट्रेनों, विशेषकर वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी आधुनिक ट्रेनों के संचालन को भी बेहतर तकनीकी समर्थन प्राप्त होगा। इसके परिणामस्वरूप ट्रेनों की समयबद्धता, परिचालन दक्षता और ऊर्जा उपयोग में भी सुधार आने की संभावना है।

    यह परियोजना भारतीय रेलवे के दीर्घकालिक विकास कार्यक्रम का हिस्सा है। रेलवे का लक्ष्य वर्ष 2029-30 तक देशभर में 3,000 मिलियन टन माल ढुलाई का है। मंत्रालय का मानना है कि ट्रैक्शन प्रणाली के आधुनिकीकरण और विद्युत क्षमता में वृद्धि से इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। साथ ही व्यस्त रेल मार्गों पर बढ़ते ट्रैफिक को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करना भी संभव होगा।

    भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों में विद्युत बुनियादी ढांचे के विस्तार और आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दे रहा है। इसी क्रम में देश के विभिन्न महत्वपूर्ण रेल मार्गों पर इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन सिस्टम को उन्नत बनाने का कार्य तेज गति से आगे बढ़ाया जा रहा है। इससे डीजल पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ ऊर्जा दक्षता और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है।

    हाल ही में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, भारत आज दुनिया के सबसे बड़े विद्युतीकृत रेलवे नेटवर्क वाले देशों में शामिल हो चुका है। देश के ब्रॉड गेज रेल नेटवर्क का लगभग 99.6 प्रतिशत हिस्सा विद्युतीकृत हो चुका है। इस मामले में भारत केवल स्विट्जरलैंड से पीछे है, जबकि नेटवर्क के आकार के लिहाज से भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है।

    रेलवे के अनुसार, वर्ष 2014 से 2026 के बीच मिशन मोड में 48,072 रूट किलोमीटर रेल मार्ग का विद्युतीकरण किया गया, जो पिछले कई दशकों की तुलना में कहीं अधिक तेज गति से पूरा हुआ है। नांदेड़ डिवीजन की यह नई परियोजना भी इसी व्यापक आधुनिकीकरण अभियान का हिस्सा है, जिससे भविष्य में भारतीय रेलवे की क्षमता, विश्वसनीयता और परिचालन दक्षता को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • भारत के टेक्सटाइल और परिधान निर्यात ने पार किया ₹3.25 लाख करोड़ का आंकड़ा, वैश्विक बाजारों में बढ़ी मांग

    भारत के टेक्सटाइल और परिधान निर्यात ने पार किया ₹3.25 लाख करोड़ का आंकड़ा, वैश्विक बाजारों में बढ़ी मांग

    नई दिल्ली । भारत का कपड़ा और परिधान उद्योग वैश्विक बाजार में लगातार अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी कि वर्ष 2025-26 के दौरान देश का कपड़ा और परिधान निर्यात, जिसमें हस्तशिल्प भी शामिल है, बढ़कर ₹3,25,339 करोड़ तक पहुंच गया। यह आंकड़ा वर्ष 2023-24 के ₹2,97,004 करोड़ के मुकाबले उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। इस अवधि में निर्यात में 4.7 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई, जो भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और वैश्विक मांग का संकेत है।

    सरकार के अनुसार भारतीय कपड़ा और परिधान उत्पादों के प्रमुख निर्यात बाजारों में अमेरिका, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन और जर्मनी शामिल रहे। इन देशों में भारतीय उत्पादों की मांग लगातार बनी रही, जिससे निर्यात को गति मिली। इसके अलावा वर्ष 2025-26 के दौरान 2024-25 की तुलना में 100 से अधिक देशों को होने वाले निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई, जो भारतीय उद्योग के लिए नए अवसरों का संकेत माना जा रहा है।

    केंद्र सरकार ने कहा कि टेक्सटाइल और परिधान क्षेत्र के निर्यात की नियमित निगरानी की जा रही है। सरकार उद्योग जगत, निर्यातकों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मिलकर ऐसी रणनीतियों पर काम कर रही है, जिनसे वैश्विक चुनौतियों का प्रभाव कम किया जा सके और भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को और मजबूत बनाया जा सके। इसका उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय वस्त्र उद्योग की हिस्सेदारी को विस्तार देना है।

    सरकार ने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई हैं। इनमें पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल पार्क योजना, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना, राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन, समर्थ योजना, सिल्क समग्र-2, राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम और अन्य निर्यात प्रोत्साहन योजनाएं शामिल हैं। इन पहलों का सकारात्मक प्रभाव उत्पादन, निवेश और निर्यात वृद्धि के रूप में सामने आया है।

    निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने 40 प्राथमिकता वाले देशों को ध्यान में रखते हुए बाजार विविधीकरण की रणनीति भी अपनाई है। साथ ही भारत के विभिन्न मुक्त व्यापार समझौते भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकार का मानना है कि ब्रिटेन के साथ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते के अलावा यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ होने वाले मुक्त व्यापार समझौते भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए नए निर्यात अवसर पैदा करेंगे और वैश्विक बाजारों तक पहुंच को और आसान बनाएंगे।

    सरकार ने यह भी बताया कि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री परिवहन से जुड़ी चुनौतियों का असर कम करने के लिए विशेष राहत पहल शुरू की गई है, ताकि निर्यातकों को किसी प्रकार की अतिरिक्त कठिनाई का सामना न करना पड़े। इसके अलावा घरेलू उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास के आयात पर सीमा शुल्क अस्थायी रूप से माफ किया गया है। इससे उत्पादन लागत को नियंत्रित रखने और निर्यात क्षमता बढ़ाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

    आगे की रणनीति के तहत सरकार ने वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक के लिए ‘मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी’ को भी मंजूरी दी है। इस मिशन का उद्देश्य कपास उत्पादन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों को दूर करना, उत्पादकता बढ़ाना और गुणवत्ता में सुधार लाना है। सरकार का मानना है कि बेहतर गुणवत्ता वाला कच्चा माल उपलब्ध होने से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग वैश्विक बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा तथा आने वाले वर्षों में निर्यात में नई ऊंचाइयों को हासिल करने में सफल रहेगा।