Category: Economy

  • NSE IPO में 20 निवेश बैंकरों की बड़ी कमाई, फीस और कमीशन से मिले 186 करोड़ रुपये

    NSE IPO में 20 निवेश बैंकरों की बड़ी कमाई, फीस और कमीशन से मिले 186 करोड़ रुपये

    नई दिल्ली । नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE के बहुप्रतीक्षित आईपीओ को पूरा कराने में शामिल 20 निवेश बैंकरों ने फीस और कमीशन के रूप में कुल 186.20 करोड़ रुपये कमाए हैं। एक्सचेंज से जुड़ी हालिया फाइलिंग में आईपीओ की प्रक्रिया पर हुए खर्च और अलग-अलग मदों में भुगतान की जानकारी सामने आई है।

    NSE का 22,561.5 करोड़ रुपये का ऑफर फॉर सेल यानी OFS 17 सितंबर से 21 सितंबर 2026 तक निवेशकों के लिए खुला था। इस आईपीओ की लिस्टिंग 24 सितंबर 2026 को निर्धारित है। पूरे ऑफर को पूरा करने में कुल अनुमानित खर्च 392.12 करोड़ रुपये रहा, जो इश्यू के कुल आकार का करीब 1.74 प्रतिशत है।

    आईपीओ प्रक्रिया से जुड़े कुल खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा निवेश बैंकरों की फीस का रहा। 20 मर्चेंट बैंकर्स को कुल 186.20 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। यह रकम आईपीओ से जुड़े कुल खर्च का 47.49 प्रतिशत है। वहीं, पूरे 22,561.5 करोड़ रुपये के इश्यू आकार के मुकाबले यह खर्च करीब 0.82 प्रतिशत बैठता है।

    आईपीओ की पूरी प्रक्रिया में कई तरह के खर्च शामिल होते हैं। इनमें सेबी के पास जमा किए जाने वाले ड्राफ्ट पेपर तैयार करने से लेकर निवेशकों तक आईपीओ की जानकारी पहुंचाने, आवेदन प्रक्रिया को संभालने और विभिन्न पेशेवर सेवाओं के भुगतान तक की लागत शामिल होती है।

    कुल 392.12 करोड़ रुपये के खर्च में बैंकरों की फीस निकालने के बाद 205.92 करोड़ रुपये अन्य मदों में खर्च हुए। यह कुल खर्च का लगभग 52.51 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें नियामकीय शुल्क, स्टॉक एक्सचेंजों से जुड़े खर्च, विज्ञापन और मार्केटिंग, कानूनी सलाहकारों की फीस, रजिस्ट्रार का खर्च और स्टांप ड्यूटी जैसी लागत शामिल है।

    NSE के आईपीओ के लिए नियुक्त 20 मर्चेंट बैंकर्स में कोटक महिंद्रा कैपिटल, जेएम फाइनेंशियल, मॉर्गन स्टेनली इंडिया, सिटीग्रुप ग्लोबल मार्केट्स और एचएसबीसी सिक्योरिटीज शामिल हैं। इनके अलावा जेपी मॉर्गन इंडिया, आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस कैपिटल भी इस सिंडिकेट का हिस्सा रहे।

    इस सूची में मोतीलाल ओसवाल इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स, एसबीआई कैपिटल मार्केट्स, आईआईएफएल कैपिटल सर्विसेज, नुवामा वेल्थ मैनेजमेंट, एवेन्डस कैपिटल और आईडीबीआई कैपिटल मार्केट्स भी शामिल हैं। 360 वन वैम, आनंद राठी एडवाइजर्स, डैम कैपिटल एडवाइजर्स, पंतोमथ कैपिटल और एक्विरेस कैपिटल भी आईपीओ प्रक्रिया में नियुक्त मर्चेंट बैंकर्स में शामिल रहे।

    मेनबोर्ड सेगमेंट के किसी आईपीओ के लिए 20 मर्चेंट बैंकर्स का इतना बड़ा सिंडिकेट भारतीय कॉर्पोरेट बाजार में एक उल्लेखनीय व्यवस्था रही। इतने बड़े नेटवर्क के जरिए अलग-अलग श्रेणी के संस्थागत निवेशकों तक पहुंच बनाने की कोशिश की गई।

    इसमें सॉवरेन वेल्थ फंड्स, वैश्विक पेंशन फंड्स और बड़े म्यूचुअल फंड्स जैसे संस्थागत निवेशक शामिल रहे। आईपीओ की पूरी प्रक्रिया में बैंकरों की भूमिका निवेशकों तक पहुंच, इश्यू प्रबंधन और अन्य संबंधित गतिविधियों को संभालने से जुड़ी रही।

    NSE के इस आईपीओ में कुल 392.12 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत में से करीब आधा हिस्सा अकेले 20 निवेश बैंकरों की फीस और कमीशन पर खर्च हुआ। बाकी राशि नियामकीय शुल्क, मार्केटिंग, कानूनी सेवाओं और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं से जुड़े खर्चों में गई।

  • इंटरनेट बंद होने पर भी पेमेंट की तैयारी, RBI की HaRBInger पहल में e₹ के लिए खोजा जा रहा नया रास्ता

    इंटरनेट बंद होने पर भी पेमेंट की तैयारी, RBI की HaRBInger पहल में e₹ के लिए खोजा जा रहा नया रास्ता

    नई दिल्ली ।डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भरता कम करने की दिशा में नई तकनीकों पर काम किया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक की HaRBInger Innovation Challenge पहल में ऑफलाइन डिजिटल भुगतान से जुड़े समाधान को भी शामिल किया गया है। इसके तहत डिजिटल रुपये यानी e₹ का इस्तेमाल इंटरनेट के बिना करने की संभावनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है।

    फिलहाल ज्यादातर डिजिटल भुगतान के लिए मोबाइल इंटरनेट और नेटवर्क कनेक्टिविटी की जरूरत होती है। ऐसे में कमजोर नेटवर्क वाले इलाकों, यात्रा के दौरान या इंटरनेट सेवा बाधित होने की स्थिति में डिजिटल भुगतान करना मुश्किल हो सकता है। ऑफलाइन भुगतान से जुड़ी तकनीक इसी समस्या का समाधान तलाशने की दिशा में एक प्रयास है।

    HaRBInger के तहत ऑफलाइन डिजिटल भुगतान के लिए Bluetooth और NFC जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की संभावनाएं देखी जा रही हैं। इन तकनीकों के जरिए आसपास मौजूद दो डिवाइस के बीच सीधे कनेक्शन स्थापित करके भुगतान से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

    NFC यानी Near Field Communication ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए पास रखे दो संगत डिवाइस के बीच डेटा का आदान-प्रदान किया जा सकता है। वहीं Bluetooth के माध्यम से भी आसपास मौजूद डिवाइस को कनेक्ट किया जा सकता है। ऑफलाइन भुगतान के संभावित मॉडल में इन तकनीकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य डिजिटल भुगतान के लिए हर बार मोबाइल इंटरनेट पर निर्भरता को कम करना है। खास तौर पर ऐसे स्थानों पर इसका इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है, जहां नेटवर्क कमजोर रहता है या इंटरनेट कनेक्टिविटी लगातार उपलब्ध नहीं होती।

    e₹ यानी डिजिटल रुपया केंद्रीय बैंक की ओर से जारी डिजिटल मुद्रा है। HaRBInger Innovation Challenge में Offline CBDC यानी ऑफलाइन e₹ को एक प्रमुख तकनीकी चुनौती के तौर पर शामिल किया गया है। यदि इससे जुड़े समाधान सफल होते हैं, तो इंटरनेट कनेक्टिविटी के बिना डिजिटल रुपये के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

    कमजोर नेटवर्क वाले ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में इस तरह की तकनीक उपयोगी हो सकती है। इसके अलावा यात्रा के दौरान नेटवर्क नहीं मिलने या किसी क्षेत्र में अस्थायी रूप से इंटरनेट सेवा बाधित होने जैसी परिस्थितियों में भी ऑफलाइन डिजिटल भुगतान का विकल्प महत्वपूर्ण हो सकता है।

    हालांकि, अभी यह समझना जरूरी है कि ऑफलाइन e₹ भुगतान पर तकनीकी समाधान तलाशे जाने का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति वर्तमान समय में तुरंत बिना इंटरनेट डिजिटल रुपये से भुगतान कर सकता है। यह पहल मुख्य रूप से ऐसी तकनीक विकसित करने और संभावित समाधान तलाशने से जुड़ी है।

    HaRBInger RBI का ग्लोबल हैकेथॉन है, जिसका उद्देश्य फिनटेक और डिजिटल भुगतान से जुड़ी नई तकनीकों तथा समाधान को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से अलग-अलग तकनीकी चुनौतियों के समाधान के लिए नए विचारों और नवाचारों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है।

    वर्ष 2025 में शुरू की गई इस पहल में Tokenised KYC, Offline CBDC यानी e₹ और Enhancing Trust जैसी तीन प्रमुख चुनौतियों पर नवाचार के लिए ध्यान केंद्रित किया गया था। ऑफलाइन e₹ से जुड़ी तकनीक पर काम इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है।

    अगर भविष्य में सुरक्षित और प्रभावी ऑफलाइन भुगतान प्रणाली विकसित होती है, तो डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल उन परिस्थितियों में भी संभव हो सकता है, जहां सामान्य इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं रहती। हालांकि, इसके वास्तविक उपयोग, उपलब्धता और तकनीकी सीमाएं समाधान के सफल विकास तथा लागू होने के बाद ही स्पष्ट होंगी।

  • अगस्त में घरेलू हवाई यातायात 6.34 प्रतिशत घटा, इंडिगो और स्पाइसजेट की हिस्सेदारी में आई कमी

    अगस्त में घरेलू हवाई यातायात 6.34 प्रतिशत घटा, इंडिगो और स्पाइसजेट की हिस्सेदारी में आई कमी

    नई दिल्ली ।भारत में घरेलू हवाई यात्री यातायात में अगस्त के दौरान सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई। इस महीने घरेलू एयरलाइनों से यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या 6.34 प्रतिशत घटकर करीब 1.21 करोड़ रह गई। विमानन क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान प्रमुख एयरलाइनों की बाजार हिस्सेदारी में भी बदलाव देखने को मिला।

    अगस्त में इंडिगो घरेलू विमानन बाजार में सबसे बड़ी एयरलाइन बनी रही, हालांकि उसकी बाजार हिस्सेदारी जुलाई के मुकाबले कम हुई। जुलाई में इंडिगो की हिस्सेदारी 67.4 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 65 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद कंपनी घरेलू हवाई यातायात में सबसे आगे रही।

    अगस्त के दौरान इंडिगो से 78.87 लाख यात्रियों ने हवाई सफर किया। घरेलू बाजार में उसकी हिस्सेदारी घटने के बावजूद यात्रियों की संख्या के लिहाज से वह अन्य प्रमुख एयरलाइनों से आगे रही।

    एयर इंडिया समूह की बाजार हिस्सेदारी में इस दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई। जुलाई में समूह की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 26.7 प्रतिशत हो गई। अगस्त में एयर इंडिया समूह के विमानों से 32.32 लाख यात्रियों ने यात्रा की।

    अकासा एयर की बाजार हिस्सेदारी अगस्त में 5.5 प्रतिशत पर स्थिर रही। एयरलाइन ने इस महीने 6.68 लाख यात्रियों को यात्रा कराई। इस तरह बाजार हिस्सेदारी के मामले में अकासा एयर ने तीसरा स्थान बरकरार रखा।

    स्पाइसजेट के प्रदर्शन में अगस्त के दौरान गिरावट देखने को मिली। जुलाई में उसकी बाजार हिस्सेदारी 1.6 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 1.2 प्रतिशत रह गई। एयरलाइन ने इस महीने करीब 1.40 लाख यात्रियों को यात्रा कराई।

    स्पाइसजेट को अगस्त में कई परिचालन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों का असर उसकी उड़ानों पर भी पड़ा और कई उड़ानों में देरी दर्ज की गई। बाजार हिस्सेदारी में कमी के बीच एयरलाइन के परिचालन प्रदर्शन पर भी निगरानी बनी रही।

    उड़ानों के समय पर संचालन के मामले में अगस्त के दौरान इंडिगो का प्रदर्शन प्रमुख एयरलाइनों में सबसे बेहतर रहा। एयरलाइन का ऑन-टाइम परफॉरमेंस 91 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसके बाद अकासा एयर का प्रदर्शन 90.5 प्रतिशत रहा।

    एयर इंडिया समूह का ऑन-टाइम परफॉरमेंस अगस्त में 83.9 प्रतिशत रहा। वहीं, अलायंस एयर का प्रदर्शन 71.8 प्रतिशत दर्ज किया गया। इन आंकड़ों से अलग-अलग एयरलाइनों के समय पर उड़ान संचालन में अंतर का पता चलता है।

    स्पाइसजेट से जुड़ी परिचालन और वित्तीय स्थिति को लेकर भी निगरानी जारी है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने कहा कि विमानन नियामक डीजीसीए एयरलाइन की मौजूदा चुनौतियों के बीच उसके वित्तीय और परिचालन प्रदर्शन पर करीबी नजर रख रहा है।

    मंत्री के अनुसार, डीजीसीए को एयरलाइन की परिचालन और वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एयरलाइन की मौजूदा परिस्थितियों के बीच विमानन सुरक्षा से किसी तरह का समझौता न हो।

    अगस्त के आंकड़ों में जहां घरेलू हवाई यातायात में सालाना गिरावट सामने आई, वहीं एयरलाइनों की बाजार हिस्सेदारी में अलग-अलग बदलाव दर्ज हुए। इंडिगो अभी भी बाजार में सबसे आगे रही, जबकि एयर इंडिया समूह की हिस्सेदारी बढ़ी और स्पाइसजेट की हिस्सेदारी में कमी आई।

  • सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    नई दिल्ली ।भारत के निजी क्षेत्र में सितंबर के दौरान आर्थिक गतिविधियों में मजबूती देखने को मिली है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बेहतर प्रदर्शन के चलते कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंच गया। अगस्त में यह आंकड़ा 54.3 था। सितंबर का स्तर जून के बाद निजी क्षेत्र की गतिविधियों में सबसे तेज विस्तार को दर्शाता है।

    एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट पीएमआई में देश के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों को शामिल किया जाता है। सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, दोनों क्षेत्रों की कंपनियों ने कारोबार में विस्तार दर्ज किया। नए ऑर्डर और रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई, जबकि महंगाई का दबाव कम होने और कारोबारी भरोसे में सुधार के संकेत मिले।

    आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियां अपने दीर्घकालिक औसत से ऊपर पहुंच गईं। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की मजबूती ने संयुक्त गतिविधियों की रफ्तार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उत्पादन और घरेलू नए ऑर्डर में तेज वृद्धि दर्ज की गई।

    सितंबर में कंपनियों के कुल नए कारोबार में भी मजबूत बढ़ोतरी हुई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग बढ़ी, लेकिन सामान बनाने वाली कंपनियों में इसका असर ज्यादा स्पष्ट रहा। मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की बिक्री में वृद्धि सात महीनों के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई।

    सर्विस सेक्टर की कंपनियों ने नए ऑर्डर हासिल करने में मार्केटिंग गतिविधियों को उपयोगी बताया। सर्वेक्षण के गुणात्मक हिस्से में प्रॉपर्टी सेवाओं, परिवहन सेवाओं और नई यात्रा बुकिंग से जुड़ी मांग में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया।

    मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी कई उत्पादों की मांग बढ़ने की जानकारी सामने आई। कंपनियों ने एल्युमीनियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्य एवं पेय पदार्थों और फार्मास्युटिकल उत्पादों के साथ नए मॉडलों की मांग में बढ़ोतरी दर्ज की।

    सितंबर के दौरान रोजगार के मोर्चे पर भी सकारात्मक गतिविधि देखने को मिली। कंपनियों ने उत्पादन और नए ऑर्डर में लगातार वृद्धि के बीच अपनी स्टाफिंग क्षमता बढ़ाई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में नई नौकरियां पैदा हुईं। दोनों क्षेत्रों में रोजगार विस्तार की दर लगभग समान रही।

    आर्थिक गतिविधियों में तेजी के साथ कंपनियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इनपुट खरीद भी बढ़ाई। तैयार माल के स्टॉक से जुड़े सूचकांक में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह सूचकांक करीब साढ़े 11 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

    हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए लागत से जुड़ा दबाव बढ़ने के संकेत भी मिले। इनपुट कीमतों में बढ़ोतरी के बीच कंपनियों ने अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए आउटपुट की कीमतों में भी वृद्धि की। इससे उत्पादों की कीमतों पर महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति बनी।

    आर्थिक गतिविधियों के मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों ने वैश्विक स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां बढ़ाईं। मध्य पूर्व में बढ़े तनाव के बीच कंपनियों ने संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए बफर तैयार करने पर ध्यान दिया।

    सितंबर के पीएमआई आंकड़ों से निजी क्षेत्र में उत्पादन, नए कारोबार और रोजगार के स्तर पर व्यापक सुधार के संकेत मिले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों में विस्तार के चलते संयुक्त पीएमआई अगस्त के मुकाबले काफी ऊपर रहा और जून के बाद सबसे मजबूत स्तर दर्ज किया गया।

  • आयुष्मान भारत के आठ साल पूरे, 60 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिला पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर, जानें बड़े आंकड़े

    आयुष्मान भारत के आठ साल पूरे, 60 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिला पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर, जानें बड़े आंकड़े

    नई दिल्ली । आयुष्मान भारत योजना के बुधवार को आठ साल पूरे हो गए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना से जुड़े लाभार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए इसके अब तक के सफर और उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि योजना के तहत देश के 60 करोड़ से अधिक लोगों को सालाना पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिल रहा है।

    प्रधानमंत्री के अनुसार आयुष्मान भारत की शुरुआत आठ साल पहले इस उद्देश्य के साथ की गई थी कि देश के प्रत्येक नागरिक को बेहतर और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकें। योजना के विस्तार के साथ बड़ी संख्या में लोगों को अस्पताल में इलाज कराने के दौरान आर्थिक सहायता मिली है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुष्मान भारत के तहत 60 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सालाना पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिल रहा है। उनके अनुसार, इस वजह से यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल हो गई है।

    उन्होंने यह भी कहा कि योजना की वजह से इलाज पर होने वाले खर्च में बड़ी बचत संभव हुई है। इसका लाभ विशेष रूप से गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को मिलने की बात कही गई। स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के घरों के करीब पहुंचाने की दिशा में भी योजना के तहत काम किए जाने का उल्लेख किया गया।

    आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का भी इस अवसर पर उल्लेख किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार, इन केंद्रों पर अब तक 500 करोड़ से अधिक बार लोगों की विजिट दर्ज की जा चुकी है। इन केंद्रों के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को जमीनी स्तर पर मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी योजना के आठ वर्ष पूरे होने पर इसके विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को लेकर जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि आठ साल पहले स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बदलने के उद्देश्य से शुरू की गई पहल ने बड़ी संख्या में लोगों को लाभ पहुंचाया है।

    योजना के तहत अब तक 48.54 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड बनाए जाने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा 13 करोड़ से अधिक लोगों को इलाज का लाभ मिलने की बात कही गई। योजना के दायरे में आने वाले लाभार्थियों को देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।

    आंकड़ों के अनुसार, देशभर में 39 हजार से अधिक सरकारी और निजी अस्पताल योजना के तहत सूचीबद्ध हैं। इन अस्पतालों के माध्यम से दो लाख करोड़ रुपये से अधिक के अस्पताल में भर्ती और इलाज संबंधी लाभ का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी गई है।

    केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी आयुष्मान भारत योजना के आठ वर्ष पूरे होने पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि योजना ने करोड़ों परिवारों के लिए बेहतर इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को आसान बनाने में मदद की है।

    उन्होंने यह भी कहा कि गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए इलाज के खर्च की चिंता कम करने में योजना सहायक रही है। उनके अनुसार, स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी इस पहल ने बड़ी संख्या में परिवारों को आर्थिक सहारा उपलब्ध कराया है।

    आयुष्मान भारत योजना के आठ वर्ष पूरे होने के मौके पर सामने आए आंकड़े इसके विस्तार को दर्शाते हैं। 60 करोड़ से अधिक लाभार्थियों का स्वास्थ्य कवर, 48.54 करोड़ से अधिक कार्ड और 13 करोड़ से अधिक लोगों को उपचार का लाभ योजना के अब तक के क्रियान्वयन से जुड़े प्रमुख आंकड़े हैं।

  • Amazon Great Indian Festival 2026 का ऐलान, 8 अक्टूबर से शुरू होगी बड़ी फेस्टिव सेल

    Amazon Great Indian Festival 2026 का ऐलान, 8 अक्टूबर से शुरू होगी बड़ी फेस्टिव सेल

    नई दिल्ली । त्योहारी सीजन के साथ ऑनलाइन शॉपिंग की तैयारियां भी तेज हो गई हैं। Amazon ने भारत में अपनी Great Indian Festival 2026 सेल की तारीख घोषित कर दी है। यह बड़ी फेस्टिव सेल 8 अक्टूबर से शुरू होगी। सेल के दौरान Smartphones, Electronics, TV, Home Appliances और दूसरी कई कैटेगरी के प्रोडक्ट्स पर अलग-अलग तरह के ऑफर्स मिलने की उम्मीद है। हालांकि अभी हर प्रोडक्ट की अंतिम कीमत और सटीक डिस्काउंट की जानकारी सामने नहीं आई है।

    इस बार सेल में ग्राहकों को कई तरह के डील फॉर्मेट देखने को मिलेंगे। Blockbuster Deals, Top 100 Deals, Mega Deals और 8 PM Deals जैसे ऑफर्स के अलावा Buy More Save More, Exchange Mela, Amazon Combos और Sample Mania भी सेल का हिस्सा होंगे। इन ऑफर्स के जरिए अलग-अलग कैटेगरी में खरीदारी करने वाले ग्राहकों को कीमत में बचत के कई विकल्प मिल सकते हैं।

    सेल में SBI के पात्र क्रेडिट और डेबिट कार्ड से खरीदारी करने पर 10 प्रतिशत तक की तत्काल छूट मिलने की जानकारी दी गई है। पात्र क्रेडिट कार्ड से EMI पर खरीदारी करने वाले ग्राहकों को भी यह लाभ मिल सकता है। हालांकि न्यूनतम खरीदारी, अधिकतम डिस्काउंट और किन प्रोडक्ट्स पर यह ऑफर लागू होगा, इसकी विस्तृत शर्तें अभी स्पष्ट नहीं की गई हैं।

    Prime Members के लिए भी सेल में अतिरिक्त बचत का विकल्प रहेगा। कुछ चुनिंदा प्रोडक्ट्स पर Prime ग्राहकों को 10 प्रतिशत तक अतिरिक्त सेविंग्स मिलने की जानकारी दी गई है। यह लाभ सभी प्रोडक्ट्स पर समान रूप से लागू होगा या नहीं, इसकी पूरी जानकारी सेल शुरू होने के बाद सामने आ सकती है।

    Smartphone खरीदने वाले ग्राहकों की नजर खासतौर पर प्रीमियम मॉडल्स पर रह सकती है। नए iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max के बाजार में उपलब्ध होने के बीच पुराने प्रीमियम मॉडल्स पर कंपनियों और विक्रेताओं की ओर से कीमतों में बदलाव देखने को मिल सकता है। iPhone 17 Pro, iPhone 17 Pro Max और Samsung Galaxy S25 Ultra जैसे स्मार्टफोन पर Price Cut, Bank Offer और Exchange Benefit मिलने की संभावना है, लेकिन इनकी अंतिम सेल कीमत अभी घोषित नहीं हुई है।

    ग्राहकों को अलग-अलग कैटेगरी में Exchange Offers और No Cost EMI का विकल्प भी मिलेगा। पुराने डिवाइस को एक्सचेंज करके नया गैजेट खरीदने पर मिलने वाला वास्तविक लाभ डिवाइस की स्थिति और निर्धारित एक्सचेंज वैल्यू पर निर्भर करेगा। इसी तरह No Cost EMI की उपलब्धता भी संबंधित प्रोडक्ट और भुगतान विकल्पों के आधार पर अलग हो सकती है।

    किसी भी प्रोडक्ट की वास्तविक बचत केवल घोषित डिस्काउंट से तय नहीं होगी। Product Price, Seller Offer, Bank Discount, Exchange Value और उपलब्ध Stock जैसे कई कारक अंतिम कीमत को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए खरीदारी के दौरान ऑफर की सभी शर्तों और अंतिम भुगतान राशि की जांच करना जरूरी होगा।

    त्योहारी खरीदारी बढ़ने की संभावना को देखते हुए डिलीवरी नेटवर्क को भी मजबूत किया गया है। इसके तहत 20 नए Fulfilment Centers, 6 Sort Centers और 150 Last-Mile Delivery Stations जोड़े गए हैं। इसके साथ 1.6 लाख से अधिक मौसमी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की घोषणा भी की गई है। सेल की शुरुआत के बाद अलग-अलग प्रोडक्ट्स पर वास्तविक कीमत और ऑफर्स की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी।

  • RBI का बड़ा फैसला…. 1 अक्‍टूबर से बदल जाएंगे FD के नियम, जानें ग्राहकों पर क्या होगा असर?

    RBI का बड़ा फैसला…. 1 अक्‍टूबर से बदल जाएंगे FD के नियम, जानें ग्राहकों पर क्या होगा असर?


    नई दिल्ली।
    हर महीने के शुरुआत की तरह अक्टूबर का महीना भी देश में कई बड़े बदलाव (Rule Change From 1st October) लेकर आ रहा है। ये चेंज बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposit) से जुड़े हुए हैं. दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) एफडी के नियमों को बदलने (FD Rule Change) जा रहा है, जिसकी जगह पर नए फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट के नियम लागू होंगे. इनमें FD Interest Rates समेत कई अन्य अपडेट भी शामिल किए जा रहे हैं. फिक्स्ड डिपॉजिट के नए नियम 1 अक्टूबर, 2026 से प्रभावी होंगे।


    3 करोड़ से ज्यादा FD पर ब्याज

    FD New Rules, जो 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहे हैं, ये सबसे ज्यादा बल्क डिपॉजिट से जुड़े हुए हैं. यहां जान लीजिए कि थोक जमा या Bulk FD Deposit का मतलब होता है कि 3 करोड़ रुपये या उससे ज्‍यादा की FD. आरबीआई की ओर से तय किए गए बदलावों के मुताबिक, बैंकों को एलसीआर ढांचे के तहत जमा या असुरक्षित थोक जमा पर लागू डिफरेंशियल रन-ऑफ रेट्स को ध्यान में रखते हुए थोक जमा पर डिफरेंशियल इंटरेस्‍ट रेट्स देने की स्वतंत्रता होगी।


    हर दिन ब्याज पर अपडेट

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़े ब्याज नियमों में जो बदलाव लागू किया जा रहा है, उसका उद्देश्‍य बैंकों को ब्‍याज दरें तय करने में ज्‍यादा लचीलापन देना है. अब अक्टूबर महीने की पहली तारीख से से बैंकों को अपनी वेबसाइट पर जमा राशि, जिसमें थोक जमा भी शामिल हैं, पर दी जा रहीं ब्याज दरें दिखानी होंगी. थोक जमा पर देय ब्याज दरें हर कार्य दिवस को सुबह 10:00 बजे बैंक की वेबसाइट पर अपडेट की जाएंगी, जिसमें 10 मिनट का अतिरिक्त समय दिया जाएगा, और यह घोषणा अधिकतम 10:10 बजे तक की जानी अनिवार्य है।


    सभी शाखाओं में एक जैसी दरें

    RBI की ओर से बैंकों को ये निर्देश भी दिया गया है कि वे एक ही तारीख को स्‍वीकार की गई फिक्स्ड डिपॉजिट रकम पर एक समान ब्‍याज दर प्रदान करें. केंद्रीय बैंक के मुताबिक, किसी भी ब्रांच में एक ही तारीख को स्‍वीकार की गई समान अमाउंट की जमा राशियों पर दिए जाने वाले ब्‍याज के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।


    निवेशकों पर क्या होगा चेंज का असर?

    अब सबसे बड़ा सवाल ये कि आखिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से 1 अक्टूबर 2026 से लागू किए जाने वाले इन एफडी निवेश से जुड़े बदलावों का आम निवेशकों पर क्या और कितना असर होगा? तो बता दें कि ये बदले हुए नियम बड़ी जमा राशि (3 करोड़ रुपये और उससे अधिक) से संबंधित हैं, इसलिए सावधि जमा निवेशकों पर इसका प्रभाव सीमित रहने की संभावना है. हालांकि, ये दिशा-निर्देश बैंकों में अधिक पारदर्शिता और एकरूपता लाएंगे।


    ‘Zero Risk’, जोरदार रिटर्न

    गौरतलब है कि सुरक्षित निवेश और जोरदार रिटर्न की बात होती है, तो बीते कुछ समय में एफडी स्कीम्स खासी पॉपुलर हुई हैं. खासतौर पर सीनियर सिटीजंस के लिए, क्योंकि एफडी में निवेश पर आम ग्राहकों की तुलना में बैंक इन निवेशकों को ज्यादा ब्याज ऑफर करते हैं, जो 8 से 9 फीसदी तक पहुंच जाता है. इसके अलावा तमाम बैंक अलग-अलग टैन्योर के लिए चलाई जा रहीं स्पेशल एफडी स्कीम पर एक्स्ट्रा ब्याज से साथ अन्य सुविधाएं भी ऑफर कर रहे हैं।

  • बैंकों के पास है बंपर सरप्लस कैश…. RBI ने एक ही दिन में ले लिए ₹71971 करोड़

    बैंकों के पास है बंपर सरप्लस कैश…. RBI ने एक ही दिन में ले लिए ₹71971 करोड़


    नई दिल्ली।
    देश के बैंकों (Banks) के पास इस समय जरूरत से ज्यादा नकदी (Cash) है। इसे कंट्रोल करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) ने बैंकों से 71,971 करोड़ रुपये एक दिन के लिए अपने पास ले लिए हैं। RBI ने इसके लिए 75,000 करोड़ रुपये की नीलामी रखी थी, लेकिन बैंकों ने 71,971 करोड़ रुपये ही उपलब्ध कराए।


    आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

    इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि आपके बैंक खाते से पैसा निकल जाएगा। आपके खाते में जमा रकम पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ता। RBI का कदम मुख्य रूप से बैंकों के बीच मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने से जुड़ा है। बाजार में पैसे की उपलब्धता और ब्याज दरों पर इसका असर पड़ सकता है। इसका अप्रत्यक्ष असर आगे चलकर होम लोन, कार लोन या दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है, लेकिन केवल इस एक कदम से ब्याज दरों में तुरंत बदलाव जरूरी नहीं है।


    आखिर RBI ने ऐसा क्यों किया?

    इसे ऐसे समझें। अगर बैंकों के पास जरूरत से बहुत ज्यादा पैसा पड़ा रहता है तो वे उसे दूसरे बैंकों को उधार दे सकते हैं। इससे बाजार में कैश की मात्रा बढ़ती है और बहुत कम ब्याज पर पैसा उपलब्ध हो सकता है।

    RBI अतिरिक्त नकदी को कुछ समय के लिए अपने पास लेकर बाजार में पैसों की मात्रा को संतुलित करता है। इसके लिए VRRR यानी वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो जैसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है।


    बैंकिंग सिस्टम में अभी भी खूब पैसा

    रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक 21 सितंबर तक बैंकिंग सिस्टम में करीब 4.92 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कैश मौजूद था। इसका मतलब यह हुआ कि बैंकों के पास उनकी तत्काल जरूरत से काफी ज्यादा पैसा था। RBI पिछले कुछ समय से इस अतिरिक्त नकदी को धीरे-धीरे कम कर रहा है। इसके लिए उसने सरकारी बॉन्ड बेचकर भी बाजार से पैसा वापस खींचा है।


    RBI बार-बार पैसा क्यों खींच रहा है?

    बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी आने के कई कारण हैं। इनमें विदेशी मुद्रा से जुड़े लेनदेन, बैंकों में विदेशी मुद्रा जमा बढ़ना और केंद्रीय बैंक की कुछ वित्तीय गतिविधियां शामिल हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का लक्ष्य है कि बाजार में न तो पैसे की बहुत ज्यादा कमी हो और न ही जरूरत से बहुत ज्यादा पैसा पड़ा रहे। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए वह जरूरत के हिसाब से कभी पैसा बाजार में डालता है और कभी अतिरिक्त पैसा वापस खींचता है।

  • 23 सितंबर को शेयर बाजार में क्या होगा हलचल के बीच Sensex Nifty पर रहेगी नजर जानें किन संकेतों से तय होगी बाजार की चाल

    23 सितंबर को शेयर बाजार में क्या होगा हलचल के बीच Sensex Nifty पर रहेगी नजर जानें किन संकेतों से तय होगी बाजार की चाल


    नई दिल्ली। 23 सितंबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की नजर कई अहम संकेतों पर रहने वाली है। मंगलवार 22 सितंबर को घरेलू बाजार में दबाव देखने को मिला और कारोबार के अंत में निफ्टी 50 करीब 0.36 प्रतिशत गिरकर 23329 के स्तर पर बंद हुआ जबकि सेंसेक्स 0.44 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 74529.08 पर रहा। आईटी शेयरों में दबाव बाजार की कमजोरी की प्रमुख वजहों में शामिल रहा। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया।

    अब 23 सितंबर के कारोबार में निवेशकों की नजर ग्लोबल मार्केट के संकेतों के साथ कच्चे तेल की कीमतों पर भी रहेगी। हाल के सत्रों में क्रूड की कीमतों में उतार चढ़ाव भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत बनकर सामने आया है। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है इसलिए तेल की कीमतों में तेज बदलाव का असर महंगाई और कंपनियों की लागत से लेकर निवेशकों की धारणा तक दिखाई दे सकता है। मंगलवार को भी बाजार पर क्रूड और भू राजनीतिक घटनाक्रम का असर नजर आया।

    निफ्टी के स्तरों की बात करें तो 23 सितंबर को कारोबार के दौरान 23300 के आसपास का स्तर बाजार की नजर में रह सकता है। इसके ऊपर टिकाव बाजार में स्थिरता का संकेत दे सकता है जबकि कमजोरी बढ़ने पर निवेशकों की नजर अगले सपोर्ट स्तरों पर जा सकती है। इससे पहले 21 सितंबर को निफ्टी 23414.30 पर बंद हुआ था और बाजार में खरीदारी का रुख देखने को मिला था। उस सत्र में सेंसेक्स 564 अंक चढ़कर 74858.99 पर बंद हुआ था।

    बाजार की दिशा तय करने में विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण रहेंगी। विदेशी पूंजी का प्रवाह बाजार में उतार चढ़ाव बढ़ा सकता है जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी कई बार गिरावट के दौरान सहारा देने का काम करती है। ऐसे में 23 सितंबर को निवेशकों की नजर एफआईआई और डीआईआई के आंकड़ों पर भी रहेगी।

    सेक्टोरल स्तर पर आईटी शेयरों की गतिविधि खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकती है। मंगलवार को आईटी इंडेक्स में कमजोरी दर्ज की गई थी। इसके अलावा बैंकिंग ऑटो फार्मा मेटल और एनर्जी शेयरों में भी स्टॉक आधारित गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं। बाजार में किसी एक सेक्टर की चाल पूरे इंडेक्स की दिशा को प्रभावित कर सकती है।

    इस समय निवेशकों के लिए केवल सेंसेक्स और निफ्टी की चाल देखना पर्याप्त नहीं होगा। अमेरिकी बाजारों की स्थिति एशियाई बाजारों का रुख डॉलर की चाल बॉन्ड यील्ड कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां सभी बाजार के लिए अहम संकेत दे सकती हैं। सोमवार को वैश्विक संकेतों और तेल की कीमतों में नरमी के बीच भारतीय बाजार में खरीदारी देखने को मिली थी लेकिन मंगलवार को बाजार फिर दबाव में आ गया। इससे साफ है कि मौजूदा दौर में बाजार में उतार चढ़ाव बना रह सकता है।

    23 सितंबर को निवेशकों को जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय बाजार की शुरुआती चाल के साथ प्रमुख स्तरों और सेक्टरवार गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। शेयर बाजार में किसी भी दिशा की गारंटी नहीं होती इसलिए निवेश का फैसला अपने जोखिम और वित्तीय लक्ष्य के अनुसार करना जरूरी है। आने वाले कारोबार में वैश्विक संकेत और घरेलू घटनाक्रम मिलकर बाजार की चाल को प्रभावित कर सकते हैं।

  • छठ-दिवाली से पहले बढ़ सकती है रसोई की महंगाई, खाने के तेल के दाम 7-8% तक बढ़ने की आशंका

    छठ-दिवाली से पहले बढ़ सकती है रसोई की महंगाई, खाने के तेल के दाम 7-8% तक बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले आम लोगों की रसोई का बजट एक बार फिर प्रभावित हो सकता है। खाने पकाने में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों में 7 से 8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। वैश्विक बाजार में कच्चे खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों और आयात लागत में इजाफे के कारण कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है।

    आने वाले महीनों में दशहरा, छठ पूजा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार हैं। इस दौरान खाद्य तेल की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे समय में कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले बदलाव का घरेलू कीमतों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

    अगर त्योहारों से पहले खाद्य तेल के दाम बढ़ते हैं, तो मार्च के बाद यह कीमतों में बढ़ोतरी का तीसरा दौर होगा। मार्च से शुरू हुए पिछले दो दौर में कंपनियों ने खाद्य तेल की कीमतों में करीब 5 से 6 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की थी। इसके बाद मार्च से जून के बीच कुल कीमतों में लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक इजाफा हुआ।

    अब वैश्विक परिस्थितियों और कच्चे माल की आपूर्ति में कमी के कारण एक बार फिर 7 से 8 प्रतिशत तक कीमत बढ़ने की आशंका है। यदि यह बढ़ोतरी होती है, तो मार्च से अब तक खाद्य तेल की कुल कीमतों में करीब 18 से 20 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है।

    कीमतों पर बढ़ते दबाव की प्रमुख वजह कच्चे खाद्य तेल की बढ़ी हुई आयात लागत है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 18 सितंबर को मुंबई बंदरगाहों पर कच्चे पाम तेल की कीमत 1,265 डॉलर प्रति टन, सोयाबीन तेल की 1,314 डॉलर प्रति टन और सूरजमुखी तेल की कीमत 1,380 डॉलर प्रति टन थी।

    पाम और सोयाबीन तेल की लागत एक साल पहले की तुलना में करीब 11 प्रतिशत अधिक रही। वहीं, सूरजमुखी तेल की लागत में लगभग 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे घरेलू स्तर पर तेल को रिफाइन और प्रोसेस करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ गई है।

    इसके अलावा रुपये की कमजोरी, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और बीमा प्रीमियम बढ़ने से भी आयातित तेल महंगा हुआ है। इन सभी कारकों का असर दुनिया भर में वनस्पति तेल की कीमतों पर पड़ा है और इसका दबाव भारतीय रिफाइनरों तथा प्रोसेसर्स पर भी बढ़ा है।

    उद्योग से जुड़े आदित्य अग्रवाल के अनुसार, कच्चे खाद्य तेल की लैंडेड कॉस्ट में करीब 8 से 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। लागत में इस वृद्धि को देखते हुए कंपनियों के सामने इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालने का विकल्प बच सकता है।

    खाद्य तेल रोजमर्रा की जरूरत की प्रमुख वस्तुओं में शामिल है। इसलिए कीमतों में संभावित वृद्धि का असर घरेलू खर्च के साथ-साथ त्योहारों के दौरान होने वाली खरीदारी पर भी पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह वैश्विक बाजार, आयात लागत और कंपनियों के मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगा।

    ऐसे में छठ और दिवाली से पहले खाद्य तेल की कीमतों पर नजर बनी हुई है। यदि लागत का मौजूदा दबाव आगे भी कायम रहता है, तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं को रसोई के बजट में अतिरिक्त खर्च का सामना करना पड़ सकता है।