Category: Economy

  • सोने का भाव 1.54 लाख के पार चांदी 2.37 लाख रुपए पहुंची दिसंबर तक और बढ़ सकते हैं दाम

    सोने का भाव 1.54 लाख के पार चांदी 2.37 लाख रुपए पहुंची दिसंबर तक और बढ़ सकते हैं दाम


    नई दिल्ली। सोने और चांदी की कीमतों में इस सप्ताह तेजी देखने को मिली है। कीमती धातुओं में बढ़त के चलते निवेशकों और खरीदारी की तैयारी कर रहे लोगों की नजर अब बाजार के अगले रुझान पर है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन यानी IBJA के आंकड़ों के अनुसार इस सप्ताह चांदी की कीमत करीब 7988 रुपए बढ़ी है और इसका भाव लगभग 2.37 लाख रुपए प्रति किलो पहुंच गया है। पिछले सप्ताह 11 सितंबर को चांदी करीब 2.29 लाख रुपए प्रति किलो के स्तर पर थी। यानी कुछ ही दिनों में इसकी कीमत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    सोने की कीमत में भी इसी दौरान तेजी रही। 24 कैरेट सोने का भाव पिछले सप्ताह करीब 1.52 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम था जो अब बढ़कर लगभग 1.54 लाख रुपए हो गया है। आंकड़ों के अनुसार इस दौरान सोने की कीमत में करीब 1789 रुपए की बढ़ोतरी हुई है। बाजार में सोने और चांदी की कीमतें कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कारकों से प्रभावित होती हैं। इनमें वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां डॉलर की स्थिति निवेश मांग और केंद्रीय बैंकों की खरीद जैसे प्रमुख कारण शामिल हैं।

    कोटक सिक्योरिटीज के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अनिंद्य बनर्जी के अनुसार दुनिया के कई केंद्रीय बैंक लगातार सोने की खरीद कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर वैश्विक स्तर पर आर्थिक और भू राजनीतिक अनिश्चितता बनी रहती है तो सोने की कीमतों को आगे भी सहारा मिल सकता है। उन्होंने मौजूदा रुझान जारी रहने की स्थिति में दिसंबर तक सोने के करीब 1.70 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी के करीब 3 लाख रुपए प्रति किलो तक पहुंचने का अनुमान जताया है। हालांकि यह बाजार का अनुमान है और वास्तविक कीमत इससे अलग हो सकती है।

    देश के अलग अलग शहरों में सोने की कीमतों में मामूली अंतर देखा जा रहा है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक 24 कैरेट सोने का भाव करीब 1.53 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट सोने की कीमत करीब 1.40 लाख रुपए जबकि 18 कैरेट सोना करीब 1.15 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के आसपास है। 14 कैरेट सोने का भाव करीब 89930 रुपए प्रति 10 ग्राम बताया गया है।

    बड़े शहरों की बात करें तो दिल्ली और जयपुर में 24 कैरेट सोने का भाव करीब 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम है। मुंबई और कोलकाता में यह करीब 1.54 लाख रुपए के आसपास है। भोपाल में 24 कैरेट सोने की कीमत करीब 1.54 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम बताई गई है। पटना लखनऊ रायपुर और अहमदाबाद में भी भाव इसी दायरे में हैं। स्थानीय बाजार में वास्तविक कीमत टैक्स ज्वेलरी की गुणवत्ता और मेकिंग चार्ज के कारण अलग हो सकती है।

    साल 2026 की शुरुआत से सोने में कुल मिलाकर मजबूत बढ़त दर्ज हुई है। 31 दिसंबर 2025 को 10 ग्राम सोना करीब 1.33 लाख रुपए के स्तर पर था जबकि अब यह लगभग 1.54 लाख रुपए पहुंच चुका है। इस तरह साल की शुरुआत से इसमें करीब 21 हजार रुपए की बढ़ोतरी हुई है। चांदी भी साल के दौरान कई बार तेज उतार चढ़ाव से गुजरी है। 31 दिसंबर 2025 के करीब 2.30 लाख रुपए प्रति किलो के स्तर से यह अब लगभग 2.37 लाख रुपए पर पहुंच गई है।

    IBJA के भाव आम तौर पर GST और मेकिंग चार्ज के बिना होते हैं। इसलिए आभूषण खरीदते समय ग्राहक को अंतिम बिल की कीमत अलग मिल सकती है। सोने और चांदी में निवेश या खरीदारी से पहले ताजा स्थानीय भाव और संबंधित शुल्क की जानकारी लेना जरूरी है।

  • ग्लोबल ऑयल मार्केट में बड़ा बदलाव… चीन ने बड़ा स्टॉक जमा कर बदल दिया तेल का पूरा खेल!

    ग्लोबल ऑयल मार्केट में बड़ा बदलाव… चीन ने बड़ा स्टॉक जमा कर बदल दिया तेल का पूरा खेल!


    बीजिंग।
    ईरान युद्ध (Iran War) ने तेल क्षेत्र (Global Oil Market ) में ऐसा बदलाव ला दिया है, जिसकी शायद किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी। अब तक यही नियम चलता था कि जिनके पास तेल कुएं हैं, यानी सऊदी अरब (Saudi Arabia) या अमेरिका (America) जैसे निर्यातक देश ही आपूर्ति और कीमतों की चाल तय करते थे। आयातक देशों को हमेशा उनके इशारों पर नाचना पड़ता था। लेकिन चीन ने दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार होते हुए भी पूरा पासा पलट दिया है।

    चीन (China) ने काफी मात्रा में कच्चा तेल जमा करके, शोधन क्षमता बढ़ाकर और कोयले तथा अन्य विकल्पों में निवेश करके अपनी सबसे बड़ी कमजोरी (तेल के लिए दूसरों पर निर्भर होना) को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। अब आयातक देश अपनी मनमर्जी से तेल का बाजार नहीं चला सकते। चीन ने दिखा दिया है कि वह जब चाहे तेल खरीदकर कीमतें बढ़ा सकता है और जब चाहे खरीदारी रोककर कीमतें गिरा सकता है। इसके अलावा, सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक गाड़ियों में आगे होने के कारण व अब कच्चे तेल का मोहताज भी नहीं रहा है।


    रणनीतिक ताकत का कराया अहसास

    ईरान जंग के शुरुआती महीनों में चीन ने पड़ोसियों को ईंधन आपूर्ति रोक अपनी ताकत का अहसास कराया। वहीं, पश्चिम एशिया पर निर्भर अन्य देशों के पास दूसरे विकल्प नहीं थे। उन्हें या तो ऊर्जा इस्तेमाल घटाना पड़ा या भारी कीमत चुकानी पड़ी।


    तीन तरीकों से खुद को बनाया आत्मनिर्भर

    – विशाल रिजर्व : जब तेल सस्ता था, तब चीन ने चुपचाप भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर अपने गोदामों में भर लिया। आज दुनिया के कुल ज्ञात आपातकालीन तेल भंडार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेला चीन के पास है।
    – मौके का फायदा : दुनियाभर में तेल की किल्लत हुई तो चीन ने अपने पुराने स्टॉक का इस्तेमाल शुरू किया और आयात 23% घटा दिया। तेल कीमतें काबू में रहीं। चीन ने साबित कर दिया कि अगर वो खरीदना बंद कर दें, तो तेल बेचने वाले संकट में आ जाएंगे।


    ईंधन बना कूटनीतिक हथियार

    चीन के पास उसे पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन में बदलने की सबसे बड़ी फैक्ट्रियां भी हैं। युद्ध के समय उसने अपने पड़ोसी देशों को डीजल-पेट्रोल की सप्लाई रोक दी। वियतनाम जैसे करीबी दोस्तों को ईंधन दिया लेकिन फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया को आपूर्ति रोक दी।


    मांग घटाकर भी खुद को कर रहा मजबूत

    चीन ने अपनी खपत भी घटा दी है। दूसरी तिमाही में चीन ने हर रोज 15 लाख बैरल कम तेल का इस्तेमाल किया, जो वैश्विक मांग में 1% से अधिक की गिरावट के बराबर है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, चीन में यात्री कारों में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी अब 14 प्रतिशत है। हाई-स्पीड रेल नेटवर्क है और कोयले से रसायन बनाने की तकनीक भी है, जो हर देश के पास नहीं है।

  • Share Market में पैसा लगाना है तो पहले समझें पूरा तरीका: Risk से बचने के लिए निवेशकों को पता होनी चाहिए ये बातें

    Share Market में पैसा लगाना है तो पहले समझें पूरा तरीका: Risk से बचने के लिए निवेशकों को पता होनी चाहिए ये बातें


    नई दिल्ली। आज के समय में Share Market निवेश का एक लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। बैंक में पैसा रखने के अलावा कई लोग अपने भविष्य के लिए शेयर बाजार में निवेश करने के बारे में सोचते हैं। बाजार में मिलने वाले रिटर्न की संभावनाएं लोगों को आकर्षित करती हैं लेकिन शेयर बाजार में निवेश के साथ जोखिम भी जुड़ा होता है। इसलिए बिना जानकारी के केवल किसी की सलाह या सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा के आधार पर पैसा लगाना नुकसान का कारण बन सकता है।

    Share Market में निवेश शुरू करने से पहले यह समझना जरूरी है कि यहां पैसा किसी कंपनी के शेयर में लगाया जाता है। कंपनी के कारोबार और वित्तीय प्रदर्शन के साथ उसके शेयर की कीमत में उतार चढ़ाव हो सकता है। बाजार ऊपर जाने पर निवेश की वैल्यू बढ़ सकती है लेकिन गिरावट आने पर नुकसान भी हो सकता है। इसलिए निवेश करने से पहले अपनी Risk Capacity और Financial Goal को समझना जरूरी है।

    शेयर बाजार में शुरुआत करने के लिए सबसे पहले Demat Account और Trading Account की जरूरत होती है। इन्हीं के जरिए शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं। Account खोलने से पहले Broker की सुविधाओं और शुल्क से जुड़ी जानकारी ध्यान से देखनी चाहिए। इसके बाद निवेशक अपनी जरूरत के अनुसार अलग अलग कंपनियों और निवेश विकल्पों का अध्ययन कर सकता है।

    किसी कंपनी का शेयर खरीदने से पहले उसके कारोबार को समझना बेहद जरूरी है। कंपनी क्या काम करती है उसकी कमाई किस तरह होती है कंपनी पर कितना कर्ज है और पिछले कुछ वर्षों में उसका प्रदर्शन कैसा रहा है जैसे सवालों पर ध्यान दिया जा सकता है। कंपनी के Financial Results और अन्य सार्वजनिक जानकारी को पढ़कर निवेशक किसी कंपनी को बेहतर तरीके से समझ सकता है।

    नए निवेशकों के लिए एक बड़ी गलती यह हो सकती है कि वे अपना पूरा पैसा एक ही शेयर में लगा दें। किसी एक कंपनी या एक ही सेक्टर पर पूरी तरह निर्भर रहने से जोखिम बढ़ सकता है। निवेश में Diversification यानी अलग अलग कंपनियों और Asset Classes में पैसा बांटने की रणनीति जोखिम को समझने और संभालने में मदद कर सकती है। हालांकि Diversification भी बाजार में नुकसान की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं करता।

    Share Market में निवेश करते समय जल्दबाजी से बचना भी जरूरी है। शेयर की कीमत तेजी से बढ़ रही हो तो केवल इस वजह से उसे खरीदना या गिरावट देखकर घबराकर बेच देना हमेशा सही रणनीति नहीं होती। बाजार में Short Term उतार चढ़ाव सामान्य हो सकते हैं। इसलिए निवेश का फैसला अपने लक्ष्य और Risk Profile को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

    नए निवेशकों को यह भी समझना चाहिए कि शेयर बाजार में Guaranteed Return जैसी कोई चीज नहीं होती। किसी व्यक्ति के पुराने रिटर्न को देखकर यह मान लेना कि भविष्य में भी उतना ही फायदा मिलेगा सही नहीं है। इसी तरह WhatsApp और Social Media पर मिलने वाले Tips पर बिना जांच के पैसा लगाना जोखिम भरा हो सकता है।

    अगर कोई व्यक्ति पहली बार Share Market में निवेश शुरू कर रहा है तो पहले बाजार की बुनियादी जानकारी हासिल करना और छोटी राशि से शुरुआत करना एक व्यावहारिक तरीका हो सकता है। निवेश से पहले अपनी आय खर्च बचत और वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए। जरूरत पड़ने पर SEBI Registered Investment Adviser से सलाह ली जा सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Share Market में निवेश को जल्दी पैसा कमाने के साधन के बजाय जोखिम और संभावित रिटर्न को समझते हुए लंबे समय की वित्तीय योजना का हिस्सा माना जाए।

  • UPI चार्ज से पेट्रोल पंपों पर बढ़ी कैश की मांग, ₹2 हजार से ज्यादा के ऑनलाइन भुगतान से बच रहे ग्राहक

    UPI चार्ज से पेट्रोल पंपों पर बढ़ी कैश की मांग, ₹2 हजार से ज्यादा के ऑनलाइन भुगतान से बच रहे ग्राहक


    नई दिल्ली। UPI के जरिए ₹2,000 से ज्यादा के मर्चेंट पेमेंट पर MDR लागू होने की घोषणा के बाद पेट्रोल पंपों पर इसका असर दिखाई देने लगा है। 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए नियम के तहत सामान्य मर्चेंट कैटेगरी में ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर 0.4% MDR तय किया गया है, जबकि पेट्रोल-डीजल जैसे फ्यूल पेमेंट के लिए ₹5 का फ्लैट MDR रखा गया है।

    राजस्थान के अलवर में आजतक की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, कई पेट्रोल पंपों पर कैश पेमेंट से जुड़े पोस्टर लगाए गए हैं। यहां पेट्रोल-डीजल भरवाने पहुंच रहे ग्राहकों को ₹2,000 से ज्यादा का भुगतान UPI से करने से बचने की सलाह दी जा रही है। इसके चलते कुछ जगहों पर ग्राहक भी ऑनलाइन भुगतान के बजाय नकद भुगतान को प्राथमिकता देने लगे हैं।

    पेट्रोल पंपों पर लगे कैश पेमेंट के पोस्टर

    नए MDR नियम को लेकर पेट्रोल पंप संचालकों के बीच भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। संचालकों का कहना है कि अक्टूबर से नई व्यवस्था लागू होनी है, इसलिए फिलहाल वे UPI से भुगतान स्वीकार कर रहे हैं। हालांकि, जैसे-जैसे ग्राहकों को MDR के बारे में जानकारी मिल रही है, बड़े UPI भुगतान को लेकर उनकी झिझक बढ़ रही है।

    अलवर में पेट्रोल पंप और CNG स्टेशन पर कैश भुगतान के पोस्टर लगाए जाने की बात भी सामने आई है। संचालकों के मुताबिक, अभी तक नए शुल्क को लेकर सभी स्तरों पर स्पष्टता नहीं है। इसी वजह से ग्राहकों को भी यह समझने में परेशानी हो रही है कि नए नियम का वास्तविक असर किस पर पड़ेगा।

    ग्राहक कर रहे भुगतान बांटने की कोशिश

    पेट्रोल-डीजल भरवाने वाले कुछ ग्राहकों ने आजतक से बातचीत में बताया कि UPI MDR को लेकर लोगों के बीच कई तरह की चर्चाएं हैं और स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में कुछ लोग ₹2,000 से अधिक का एकमुश्त ऑनलाइन भुगतान करने से बच रहे हैं।

    कुछ ग्राहक बड़े भुगतान को दो या तीन हिस्सों में करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, नए नियम के अनुसार शुल्क की गणना मर्चेंट कैटेगरी और लागू MDR व्यवस्था के आधार पर होगी, इसलिए केवल भुगतान को हिस्सों में बांटने से हर स्थिति में शुल्क से बचना संभव होगा, यह जरूरी नहीं है।

    लोगों की चिंता- असर आखिरकार जेब पर आएगा

    स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर UPI शुल्क का अतिरिक्त बोझ कारोबारियों पर बढ़ता है तो उसका असर आगे चलकर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है। कुछ ग्राहकों ने आशंका जताई कि खाने-पीने सहित दूसरी चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं।

    लोगों का कहना है कि सरकार को इस तरह की व्यवस्था लागू करने से पहले इसके असर पर दोबारा विचार करना चाहिए। उनका तर्क है कि कारोबारियों पर बढ़ने वाली लागत का असर अंततः आम उपभोक्ता तक पहुंच सकता है।

    पेट्रोल पंप पर ₹5 MDR, 0.4% नहीं

    UPI के नए MDR ढांचे में सभी कारोबारियों के लिए एक जैसी दर नहीं रखी गई है। सामान्य मर्चेंट कैटेगरी में ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर 0.4% MDR लागू होगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन है। वहीं फ्यूल, रेलवे, टेलीकॉम और इंश्योरेंस जैसी कुछ कैटेगरी के लिए अलग फ्लैट MDR तय किया गया है।

    पेट्रोल पंपों पर ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान के लिए ₹5 का फ्लैट MDR लगेगा। यानी ग्राहक अगर पेट्रोल-डीजल के लिए ₹10,000 का भुगतान UPI से करता है, तो पेट्रोल पंप की कैटेगरी में MDR ₹5 ही रहेगा, 0.4% के हिसाब से ₹40 नहीं।

    यह शुल्क ग्राहक से सीधे वसूलने के बजाय मर्चेंट पर लागू होने वाला MDR है। वित्त मंत्रालय ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी है कि नए शुल्क का बोझ सीधे ग्राहकों पर न डाला जाए।

    छोटे कारोबारियों को राहत

    नई व्यवस्था में छोटे कारोबारियों के लिए भी प्रावधान रखा गया है। UPI QR के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे मर्चेंट MDR के दायरे से बाहर रहेंगे। वहीं ₹2,000 तक के पात्र मर्चेंट UPI भुगतान पर MDR नहीं लगेगा।

    इस तरह 15 अक्टूबर से UPI की पूरी व्यवस्था बंद या सभी भुगतानों पर शुल्क वाली नहीं हो रही है। बदलाव मुख्य रूप से चुनिंदा P2M यानी ग्राहक से व्यापारी को होने वाले बड़े डिजिटल भुगतान पर लागू होगा, जबकि व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले UPI ट्रांजैक्शन पहले की तरह शुल्क-मुक्त रहेंगे।

  • सरकारी खजाने में पहुंचा आपका पैसा कहां होता है इस्तेमाल जानिए टैक्स से जुड़े खर्च का पूरा हिसाब

    सरकारी खजाने में पहुंचा आपका पैसा कहां होता है इस्तेमाल जानिए टैक्स से जुड़े खर्च का पूरा हिसाब


    नई दिल्ली। नौकरी करने वाला हो या अपना कारोबार चलाने वाला हर व्यक्ति अपनी कमाई के हिसाब से सरकार को टैक्स देता है। हर साल करोड़ों लोगों और कंपनियों से मिलने वाला यह टैक्स सरकार की आय का एक अहम हिस्सा होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब से निकलकर सरकारी खजाने तक पहुंचने वाला पैसा आखिर जाता कहां है। दरअसल सरकार टैक्स से मिलने वाली रकम को किसी एक काम में खर्च नहीं करती बल्कि देश की अलग अलग जरूरतों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।

    इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स जैसे डायरेक्ट टैक्स से सरकार को मिलने वाला पैसा Consolidated Fund of India में जाता है। इसके बाद सरकार बजट के जरिए अलग अलग क्षेत्रों के लिए खर्च का प्रावधान करती है। इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति द्वारा दिया गया टैक्स सीधे उसी व्यक्ति के लिए किसी एक सुविधा पर खर्च नहीं होता बल्कि सरकारी आय का हिस्सा बनकर देश के व्यापक खर्च में इस्तेमाल होता है।

    सरकारी बजट में कुल खर्च को अलग अलग हिस्सों में बांटा जाता है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा राज्यों को टैक्स में उनकी हिस्सेदारी देने पर जाता है। कुल सरकारी खर्च में इसका हिस्सा करीब 22 प्रतिशत बताया गया है। इसका उद्देश्य राज्यों को उनके हिस्से की राशि उपलब्ध कराना है ताकि वे अपने स्तर पर विकास और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े खर्च कर सकें।

    सरकार के खर्च में एक बड़ा हिस्सा कर्ज और उस पर लगने वाले ब्याज की अदायगी में भी जाता है। आंकड़ों के मुताबिक कुल खर्च का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा ब्याज भुगतान और कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होता है। यह सरकारी वित्त व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि सरकार द्वारा लिए गए कर्ज की जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए नियमित भुगतान करना पड़ता है।

    इसके अलावा करीब 17 प्रतिशत हिस्सा केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं के लिए खर्च किया जाता है। इन योजनाओं के जरिए केंद्र सरकार अलग अलग क्षेत्रों में योजनाएं और कार्यक्रम संचालित करती है। करीब 11 प्रतिशत हिस्सा रक्षा क्षेत्र पर खर्च होता है जिसमें सीमा सुरक्षा और रक्षा से जुड़े दूसरे खर्च शामिल होते हैं।

    केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर भी सरकारी खर्च का हिस्सा जाता है। इसका करीब 8 प्रतिशत हिस्सा ऐसे कार्यक्रमों के लिए रखा जाता है। इनमें ग्रामीण रोजगार और आवास जैसी योजनाएं शामिल हो सकती हैं। इसके बाद करीब 7 प्रतिशत हिस्सा वित्त आयोग के अनुदान और दूसरे ट्रांसफर पर खर्च होता है।

    सरकारी खर्च में प्रशासनिक जरूरतों का भी हिस्सा होता है। आंकड़ों के मुताबिक करीब 7 प्रतिशत हिस्सा अन्य प्रशासनिक खर्च के लिए जाता है। इसके अलावा लगभग 6 प्रतिशत सब्सिडी और करीब 2 प्रतिशत पेंशन पर खर्च होने का उल्लेख किया गया है। इन सभी हिस्सों को मिलाकर सरकारी खर्च का पूरा ढांचा तैयार होता है।

    वहीं डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन के आंकड़ों पर नजर डालें तो 17 सितंबर तक सरकार को डायरेक्ट टैक्स से 12.12 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई थी। यह रकम पिछले साल की समान अवधि की तुलना में करीब 13 प्रतिशत अधिक बताई गई है। इसमें इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स से मिलने वाली रकम शामिल होती है।

    इस तरह आपकी कमाई से सरकार तक पहुंचने वाला टैक्स किसी एक जगह जमा होकर पड़ा नहीं रहता। यह सरकारी आय का हिस्सा बनता है और बजट के जरिए राज्यों की हिस्सेदारी कर्ज भुगतान रक्षा योजनाओं प्रशासन सब्सिडी और पेंशन समेत कई जरूरी क्षेत्रों में इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि टैक्स की रकम को देश की पूरी वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

  • हफ्ते के आखिरी दिन बाजार में मिला-जुला रुख निफ्टी चढ़ा IT शेयर फिसले जानिए किन सेक्टरों में रही तेजी

    हफ्ते के आखिरी दिन बाजार में मिला-जुला रुख निफ्टी चढ़ा IT शेयर फिसले जानिए किन सेक्टरों में रही तेजी


    नई दिल्ली। हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में पूरे दिन उतार-चढ़ाव देखने को मिला। कारोबार के दौरान कभी बाजार में तेजी दिखाई दी तो कभी बिकवाली का दबाव बढ़ा। अंत में सेंसेक्स मामूली गिरावट के साथ लगभग सपाट बंद हुआ जबकि निफ्टी बढ़त के साथ बंद होने में कामयाब रहा। व्यापक बाजार में हालांकि खरीदारी का रुझान मजबूत रहा और मिडकैप तथा स्मॉलकैप इंडेक्स में भी तेजी दर्ज की गई।

    कारोबार समाप्त होने पर 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 19.63 अंक यानी 0.03 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 74294.96 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 50 में 75.80 अंक यानी 0.33 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई और यह 23346.40 के स्तर पर पहुंच गया। इस तरह दोनों प्रमुख सूचकांकों में अलग अलग रुख देखने को मिला।

    व्यापक बाजार की बात करें तो निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 1.24 प्रतिशत की तेजी रही जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 1.74 प्रतिशत ऊपर बंद हुआ। इससे संकेत मिला कि शुक्रवार के कारोबार में बड़ी कंपनियों के अलावा मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही।

    सेक्टर के स्तर पर भी बाजार में अलग अलग रुझान दिखाई दिए। निफ्टी मेटल निफ्टी रियल्टी निफ्टी ऑयल एंड गैस निफ्टी सीमेंट और निफ्टी केमिकल में मजबूती रही। दूसरी ओर निफ्टी आईटी में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। आईटी शेयरों में कमजोरी की एक वजह प्रॉफिट बुकिंग को माना गया। लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों के कारण वैश्विक स्तर पर टेक्नोलॉजी खर्च पर संभावित असर को लेकर भी बाजार में चिंता बनी हुई है।

    निफ्टी 50 में अदाणी पोर्ट्स अदाणी एंटरप्राइजेज भारती एयरटेल एचडीएफसी बैंक पावरग्रिड अल्ट्राटेक सीमेंट और अपोलो हॉस्पिटल जैसे शेयर बढ़त वाले प्रमुख शेयरों में शामिल रहे। वहीं टीसीएस टीएमपीवी एसबीआई लाइफ कोल इंडिया मारुति सुजुकी एनटीपीसी टाटा कंज्यूमर और सन फार्मा में गिरावट देखने को मिली।

    बाजार के एक विशेषज्ञ के अनुसार लगातार बनी भू राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों और ग्लोबल यील्ड में नरमी ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को कुछ समर्थन दिया। इसके चलते भारतीय इक्विटी बाजार में रिकवरी का रुझान जारी रहा। बड़े केंद्रीय बैंकों की ओर से उम्मीद के मुताबिक नीतिगत फैसलों के बाद मिले सकारात्मक वैश्विक संकेतों से भी निवेशकों का भरोसा बढ़ने की बात कही गई।

    विशेषज्ञ के अनुसार बाजार की रिकवरी कई सेक्टर में दिखाई दी लेकिन आईटी शेयरों में मुनाफावसूली का दबाव रहा। आगे बाजार की दिशा को लेकर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण रहेंगी। कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक यील्ड में नरमी से फिलहाल राहत मिली है लेकिन यह रिकवरी कितनी टिकाऊ रहती है यह ग्लोबल मैक्रो जोखिमों में कमी और विदेशी निवेशकों की ओर से लगातार निवेश पर निर्भर कर सकता है।

    कुल मिलाकर शुक्रवार का कारोबार भारतीय शेयर बाजार के लिए मिश्रित रहा। सेंसेक्स लगभग सपाट रहा जबकि निफ्टी और व्यापक बाजार सूचकांकों में बढ़त देखने को मिली। अगले कारोबारी सत्र में निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों विदेशी निवेश और विभिन्न सेक्टरों में खरीदारी की दिशा पर रहेगी।

  • US में ब्याज दरें बढ़ने का भारत में भी दिखेगा असर… रुपया, सोना और शेयर बाजार होगा प्रभावित

    US में ब्याज दरें बढ़ने का भारत में भी दिखेगा असर… रुपया, सोना और शेयर बाजार होगा प्रभावित


    नई दिल्ली।
    करीब तीन साल के अंतराल के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (American Central bank Federal Reserve) ने ब्याज दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ब्याज दरें (Interest rates) 3.75 से 4% तक पहुंच गई हैं। फेडरल रिजर्व के इस रुख के बाद दुनियाभर के बाजारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका सबसे तगड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत (India) पर बिल्कुल साफ दिखेगा।

    अमेरिकी दरें बढ़ने से डॉलर इंडेक्स मजबूत होकर एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इसके दबाव में रुपया कमजोर होकर 95 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। रुपये की इस कमजोरी से आयातित महंगाई बढ़ने का खतरा है।


    विदेशी निवेशकों की निकासी

    अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से वैश्विक निवेशक सुरक्षित अमेरिकी संपत्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली और तेज हो सकती है। इस साल अब तक एफपीआई भारतीय बाजार से 2.41 लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाल चुके हैं। इस फैसले से सोने की चमक पर भी अल्पकालिक दबाव के आसार हैं। 


    आपकी जेब पर क्या होगा असर?

    बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाएगा, जिसके चलते वे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देंगे। जिन लोगों के लोन फ्लोटिंग रेट पर हैं, उनकी मासिक ईएमआई बढ़ जाएगी, जिससे आम जनता के पास खर्च करने योग्य आय कम हो जाएगी। कर्ज लेने वालों के लिए जहां यह बुरी खबर होगी, वहीं बचत करने वाले सीनियर सिटीजन और निवेशकों को बैंक एफडी पर पहले से बेहतर ब्याज मिलना शुरू हो जाएगा।


    क्या आरबीआई बढ़ाएगा ब्याज दरें?

    जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी नीतिगत दरों में बदलाव करता है, तो आरबीआई ब्याज दर के अंतर, पूंजी प्रवाह और मुद्रा बाजारों पर पड़ने वाले प्रभाव पर करीब से नजर रखता है। हालांकि, आरबीआई के नीतिगत फैसले घरेलू महंगाई, विकास और अन्य आर्थिक स्थितियों से भी तय होते हैं। घरेलू मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है, ऐसे में आरबीआई को पूंजी की निकासी और मुद्रा की स्थिरता को लेकर अतिरिक्त बातों पर विचार करना पड़ सकता है।

    एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेस का मानना है कि देश में महंगाई के दबाव को देखते हुए अक्तूबर में होने वाली समीक्षा बैठक में आरबीआई 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है। एचडीएफसी बैंक का मानना है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार कर सकता है ताकि यह पूरी तरह स्पष्ट हो सके कि महंगाई का दबाव कितना व्यापक और टिकाऊ है।

  • शेयर मार्केट में उतार-चढ़ाव जारी: निफ्टी और सेंसेक्स पर ग्लोबल संकेतों का असर जानिए बाजार की पूरी तस्वीर

    शेयर मार्केट में उतार-चढ़ाव जारी: निफ्टी और सेंसेक्स पर ग्लोबल संकेतों का असर जानिए बाजार की पूरी तस्वीर


    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में 18 सितंबर को निवेशकों की नजर घरेलू संकेतों के साथ वैश्विक घटनाक्रम पर भी बनी रहेगी। 17 सितंबर के कारोबारी सत्र में बाजार ने काफी उतार चढ़ाव के बीच लगभग सपाट रुख दिखाया था। कारोबारी दिन के अंत में Nifty 50 करीब 0.23 प्रतिशत की बढ़त के साथ 23270.60 के स्तर पर बंद हुआ जबकि Sensex 0.03 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 74314.59 पर रहा। बाजार में हाल की गिरावट के बाद कुछ चुनिंदा शेयरों में खरीदारी जरूर दिखाई दी लेकिन निवेशकों का रुख पूरी तरह से जोखिम लेने वाला नहीं रहा।

    18 सितंबर के कारोबार में सबसे बड़ा असर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले का रह सकता है। फेड ने ब्याज दर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की है और ब्याज दर का दायरा 3.75 से 4 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही आगे भी दरों में बढ़ोतरी की संभावना का संकेत दिया गया है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है और दुनियाभर के बाजारों में निवेशकों की नजर ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड पर बनी हुई है। भारतीय बाजार के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी से विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियां आकर्षक हो सकती हैं और उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी पर दबाव बढ़ सकता है।

    रुपये की चाल भी बाजार के लिए अहम संकेत रहेगी। 17 सितंबर को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.93 के स्तर पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान रुपया 96 के स्तर के पार भी गया था लेकिन बाद में इसमें सुधार देखने को मिला। Reuters के मुताबिक संभावित RBI हस्तक्षेप और पोर्टफोलियो निवेश से रुपये को कुछ सहारा मिला। ऐसे में 18 सितंबर को डॉलर इंडेक्स और रुपये की दिशा पर निवेशकों की नजर बनी रह सकती है।

    कच्चा तेल भी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगा। 17 सितंबर को Brent crude करीब 104.8 डॉलर प्रति बैरल पर रहा। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें महंगाई और आयात बिल से जुड़े दबाव बढ़ा सकती हैं। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी या गिरावट का असर बाजार के अलग अलग सेक्टर पर दिखाई दे सकता है।

    सेक्टर के लिहाज से 17 सितंबर को ऑटो और मेटल शेयरों में खरीदारी देखने को मिली थी। वहीं व्यापक बाजार में भी मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों ने मजबूती दिखाई। Business Standard के अनुसार कारोबारी सत्र के दौरान Nifty Metal में भी बढ़त रही और बाजार की चौड़ाई सकारात्मक बनी रही।

    18 सितंबर को निवेशकों की नजर विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों पर भी रहेगी। 17 सितंबर से पहले उपलब्ध आंकड़ों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी थी जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी बाजार को सहारा दे रही थी। इस खींचतान के बीच Nifty और Sensex में उतार चढ़ाव बढ़ सकता है। इसलिए बाजार की चाल को केवल एक संकेत के आधार पर समझने के बजाय वैश्विक बाजार रुपये कच्चे तेल विदेशी निवेश और अमेरिकी ब्याज दरों को साथ देखकर समझना महत्वपूर्ण रहेगा।

  • टाटा संस में फिर बोर्डरूम टकराव: चंद्रशेखरन को 5 साल और, नोएल टाटा ने किया विरोध

    टाटा संस में फिर बोर्डरूम टकराव: चंद्रशेखरन को 5 साल और, नोएल टाटा ने किया विरोध


    नई दिल्ली। टाटा संस में एक बार फिर नेतृत्व और कंपनी की भविष्य की दिशा को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। गुरुवार को बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को पांच साल के एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए रखने को मंजूरी दे दी, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। इसी बैठक में टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ने पर भी फैसला हुआ। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब आरबीआई ने टाटा संस की NBFC पंजीकरण खत्म करने की अर्जी खारिज कर दी है।

    चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होना है। उन्होंने अगस्त में बोर्ड को बताया था कि वह मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद दोबारा पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं। इसके बावजूद बोर्ड ने उन्हें पांच साल और देने का प्रस्ताव मंजूर कर दिया। प्रस्ताव पर नोएल टाटा ने विरोध में वोट दिया। रिपोर्टों के मुताबिक बोर्ड में प्रस्ताव 4-1 से पारित हुआ।

    नोएल टाटा ने क्यों किया विरोध?

    इस पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति है। नोएल टाटा का तर्क है कि जब चंद्रशेखरन पहले ही 2027 के बाद पद छोड़ने की इच्छा बोर्ड को बता चुके थे, तो कंपनी को उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया आगे बढ़ानी चाहिए थी। टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को “कानूनी रूप से अमान्य” बताया है और कंपनी के Articles of Association से जुड़े प्रावधानों का हवाला दिया है।

    यही वजह है कि यह मामला केवल चेयरमैन के कार्यकाल तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ टाटा संस के बोर्ड अधिकार, टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और कंपनी की लिस्टिंग का सवाल भी जुड़ गया है।

    टाटा ट्रस्ट्स के पास 66% हिस्सेदारी

    टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है। इसलिए बोर्ड के फैसले के बाद अगली महत्वपूर्ण परीक्षा शेयरधारकों की मंजूरी होगी। चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और लिस्टिंग से जुड़े फैसलों पर आगे की प्रक्रिया में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। ताजा रिपोर्टों में दोनों मुद्दों पर ट्रस्ट्स और बोर्ड के बीच मतभेद सामने आए हैं।

    टाटा संस में शापूरजी पालोनजी समूह की हिस्सेदारी करीब 18.37% है। वह लंबे समय से लिस्टिंग के पक्ष में रहा है। लिस्टिंग से उसे अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेचकर कर्ज घटाने का रास्ता मिल सकता है।

    IPO का रास्ता क्यों खुला?

    टाटा संस के लिए IPO का मुद्दा अचानक नहीं आया है। सितंबर 2022 में RBI ने कंपनी को अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत किया था। इस श्रेणी की कंपनियों के लिए नियामकीय नियमों के तहत शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी है।

    टाटा संस ने इस व्यवस्था से बाहर निकलने के लिए मार्च 2024 में अपना NBFC/CIC पंजीकरण सरेंडर करने का आवेदन दिया था। कंपनी ने करीब 21-22 हजार करोड़ रुपए का कर्ज चुकाकर खुद को नियामकीय ढांचे से बाहर करने की कोशिश की थी। लेकिन 11 सितंबर 2026 को RBI ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद कंपनी के सामने लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता प्रमुख विकल्प बन गया।

    गुरुवार को बोर्ड ने RBI के फैसले को चुनौती देने के बजाय लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया। हालांकि, टाटा संस ने अभी IPO की तारीख, आकार या शेयर बिक्री का औपचारिक ऐलान नहीं किया है।

    चंद्रशेखरन का तीसरा कार्यकाल क्यों अहम?

    एन. चंद्रशेखरन करीब चार दशक से टाटा समूह से जुड़े हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत TCS से की और आगे चलकर कंपनी के CEO और MD बने। फरवरी 2017 में उन्हें पहली बार टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया था। 2022 में उन्हें दूसरा कार्यकाल मिला।

    उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने पारंपरिक कारोबार के साथ एयरलाइन, डिजिटल, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और बैटरी जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया। एयर इंडिया का अधिग्रहण भी इसी दौर की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा।

    आपकी दी गई जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2020 में टाटा समूह का रेवेन्यू 7.89 लाख करोड़ रुपए था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 16.24 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया। इसी तरह लिस्टेड कंपनियों का संयुक्त मार्केट कैप 2020 में करीब 9.31 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2026 में 24 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया।

    असली मतभेद सिर्फ चेयरमैन पद पर नहीं

    चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच मतभेदों की चर्चा पिछले कुछ महीनों से होती रही है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों के बीच नए कारोबारों में निवेश, पूंजी आवंटन और कुछ कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन को लेकर अलग-अलग राय रही है। खासकर एयर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसे नए कारोबारों में भारी निवेश और घाटे को लेकर निगरानी बढ़ाने की मांग का मुद्दा सामने आया है।

    यानी मौजूदा विवाद को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि चंद्रशेखरन चेयरमैन रहेंगे या नहीं। इसके पीछे टाटा संस की रणनीति, पूंजी का इस्तेमाल, लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका जैसे कई बड़े सवाल जुड़े हैं।

    टाटा संस की वैल्यू कितनी?

    मार्च 2026 तक टाटा संस का एसेट बेस करीब 2.01 लाख करोड़ रुपए बताया गया है। RBI के नियामकीय ढांचे में कंपनी का आकार भी महत्वपूर्ण है। संभावित लिस्टिंग के चलते बाजार में इसके वैल्यूएशन को लेकर कई अनुमान लगाए जा रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ अनुमानों में यह 7 लाख करोड़ से 11 लाख करोड़ रुपए के बीच बताया गया है, हालांकि वास्तविक मूल्यांकन IPO प्रक्रिया, बाजार परिस्थितियों और कंपनी के अंतिम स्ट्रक्चर पर निर्भर करेगा।

    टाटा संस की बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी के कारण इसकी लिस्टिंग भारतीय पूंजी बाजार में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो सकती है। हालांकि अभी IPO का अंतिम आकार और समयसीमा तय नहीं हुई है।

    टाटा संस में किसकी कितनी हिस्सेदारी?

    टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66% हिस्सेदारी है। शापूरजी पालोनजी समूह के पास करीब 18.37% हिस्सा है। इसके अलावा टाटा समूह की कंपनियों—TCS, टाटा मोटर्स और टाटा स्टील—की हिस्सेदारी भी है।

    लिस्टिंग होने की स्थिति में शेयरधारकों के लिए अपनी हिस्सेदारी का मूल्य तय करने और जरूरत के मुताबिक हिस्सेदारी बेचने का रास्ता खुल सकता है। दूसरी तरफ टाटा समूह के लिए बाजार से पूंजी जुटाने का विकल्प भी बढ़ेगा।

    टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस और टाटा ग्रुप में अंतर

    टाटा ग्रुप: टाटा ब्रांड के तहत काम करने वाली 30 से अधिक प्रमुख सार्वजनिक और निजी कंपनियों का व्यापक कारोबारी समूह है। इसमें TCS, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाइटन, एयर इंडिया और ट्रेंट जैसी कंपनियां शामिल हैं।

    टाटा संस: यह टाटा ग्रुप की प्रमुख होल्डिंग और प्रमोटर कंपनी है। समूह की बड़ी कंपनियों में इसकी हिस्सेदारी है और ‘टाटा’ ब्रांड के इस्तेमाल से जुड़े अधिकार भी इसी के पास हैं। फिलहाल यह अनलिस्टेड कंपनी है।

    टाटा ट्रस्ट्स: सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट समेत विभिन्न परोपकारी ट्रस्टों का समूह है। टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी होने के कारण इसकी भूमिका कारोबारी फैसलों में भी महत्वपूर्ण है। इसके संसाधनों का बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण से जुड़े कामों में लगाया जाता है।

    फिलहाल चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और टाटा संस की लिस्टिंग दोनों ही अगले चरण की मंजूरियों और नियामकीय प्रक्रिया पर निर्भर हैं। बोर्ड के फैसले के बाद अब निगाह इस बात पर है कि टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के बीच यह मतभेद किस तरह आगे बढ़ता है।

  • सरकारी बिक्री में 35 रुपये किलो प्याज, खुले बाजार में 60 से 70 रुपये तक पहुंची कीमत..

    सरकारी बिक्री में 35 रुपये किलो प्याज, खुले बाजार में 60 से 70 रुपये तक पहुंची कीमत..

    नई दिल्ली । प्याज की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा दिया है। देश के कई खुदरा बाजारों में प्याज 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है। दूसरी ओर सरकारी बफर स्टॉक से प्याज 35 रुपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। दोनों कीमतों के बीच बड़ा अंतर होने के बावजूद सरकारी प्याज हर बाजार और हर उपभोक्ता तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पा रही है।

    16 सितंबर को देशभर में प्याज का औसत खुदरा भाव 53.84 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया। एक साल पहले इसी दिन औसत खुदरा कीमत 27.71 रुपये प्रति किलो थी। इस तरह एक साल के दौरान औसत खुदरा भाव में करीब 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। थोक बाजार में भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। 16 सितंबर को प्याज का औसत थोक भाव 45.65 रुपये प्रति किलो रहा।

    बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 24 अगस्त से बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारना शुरू किया है। प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड के तहत रखे गए इस स्टॉक की बिक्री 35 रुपये प्रति किलो की दर से की जा रही है। इसके लिए नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर फेडरेशन, नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन, केंद्रीय भंडार और मोबाइल वैन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    हालांकि, सरकारी बिक्री के बावजूद प्याज की उपलब्धता को लेकर चुनौती बनी हुई है। उत्पादक राज्यों से बड़े खपत केंद्रों तक बफर स्टॉक पहुंचाना आसान नहीं है। यही वजह है कि सरकारी बिक्री में प्याज अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध है, जबकि खुले बाजार में उपभोक्ताओं को काफी अधिक रकम चुकानी पड़ रही है।

    कीमतों पर नियंत्रण के लिए बफर स्टॉक की आपूर्ति को 19 शहरों तक बढ़ाया गया है। उत्पादक क्षेत्रों से बड़े शहरों तक प्याज पहुंचाने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’, रेलवे रैक और 30 से अधिक ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी स्तर पर माना गया है कि कुछ बाजारों में बफर प्याज की बिक्री का असर दिखाई देने लगा है। हालांकि, खुदरा कीमतों में व्यापक राहत के लिए सरकारी स्टॉक की पहुंच और उपलब्धता महत्वपूर्ण बनी हुई है।

    प्याज की कीमतों में मौसमी उतार-चढ़ाव का भी असर पड़ता है। रबी सीजन की प्याज का स्टॉक धीरे-धीरे कम होने के बाद अगली खरीफ फसल की आवक का इंतजार रहता है। रबी और खरीफ फसल के बीच का समय प्याज के लिए अपेक्षाकृत कम आपूर्ति वाला दौर माना जाता है। इसी अवधि में बाजार में बफर स्टॉक से प्याज उतारकर आपूर्ति बढ़ाने की व्यवस्था की जाती है।

    इस बार खरीफ प्याज की बुआई में देरी ने भी चिंता बढ़ाई है। महाराष्ट्र के नासिक में बुआई करीब 15 दिन पीछे चलने की जानकारी सामने आई थी। कर्नाटक के चित्रदुर्गा-चलकेरे क्षेत्र में भी बुआई सामान्य स्तर की करीब 60 प्रतिशत बताई गई थी। इससे नई फसल की मंडियों में आवक प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।

    मौसम की स्थिति और बाजार की गतिविधियों का असर भी कीमतों पर पड़ता है। मॉनसून में देरी और उससे जुड़े हालात को प्याज की स्थिति से जोड़ा गया है। कुछ कारोबारियों की सट्टा खरीदारी का असर बाजार की धारणा पर पड़ने की बात भी सामने आई है। हालांकि, देश में कुल उत्पादन के स्तर पर बड़ी कमी नहीं बताई गई है।

    2025-26 में प्याज का उत्पादन 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि पिछले साल यह 307.67 लाख टन था। सरकार ने 2026-27 के लिए 2 लाख टन रबी प्याज बफर के रूप में खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसमें करीब 1.21 लाख टन की खरीद हो चुकी थी। बफर खरीद का भाव भी बढ़ाकर 2,125 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। इसका उद्देश्य कम आपूर्ति वाले समय में बाजार में प्याज की उपलब्धता बढ़ाकर कीमतों पर नियंत्रण रखना है।