Category: Economy

  • कैबिनेट ने ईपीएफओ की अनिवार्य कवरेज वेतन सीमा 15 हजार से बढ़ाकर 25 हजार रुपये करने को मंजूरी दी

    कैबिनेट ने ईपीएफओ की अनिवार्य कवरेज वेतन सीमा 15 हजार से बढ़ाकर 25 हजार रुपये करने को मंजूरी दी

    नई दिल्ली ।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि, कर्मचारी पेंशन योजना और कर्मचारी जमा-संबद्ध बीमा योजना का लाभ मिलने की उम्मीद है।

    सरकार के अनुसार, वेतन सीमा बढ़ाने का उद्देश्य अधिक कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ना है। नई सीमा लागू होने के बाद 15,000 से 25,000 रुपये मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों का बड़ा वर्ग ईपीएफओ के अनिवार्य दायरे में आ सकेगा। इससे उन्हें भविष्य निधि, पेंशन और बीमा जैसी सुविधाओं का लाभ मिलेगा।

    ईपीएफओ की वेतन सीमा वर्ष 2004 से 2014 तक 10 वर्षों तक अपरिवर्तित रही थी। सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह किया गया था। अब करीब 12 वर्ष बाद इसे 25,000 रुपये करने का फैसला लिया गया है। सरकार के मुताबिक, इस अवधि में देश में वेतन स्तर, आय और औपचारिक रोजगार की स्थिति में बदलाव आया है।

    पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी भी मौजूदा ईपीएफओ सीमा के करीब पहुंची है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और बदलते वेतन स्तर के अनुरूप करने की जरूरत महसूस की गई। इसी आधार पर अनिवार्य कवरेज की सीमा बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।

    मौजूदा व्यवस्था के तहत 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पर नौकरी शुरू करने वाला नया कर्मचारी स्वतः ईपीएफ ढांचे के अंतर्गत नहीं आता था। इससे ऐसे कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग भविष्य निधि, पेंशन और बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से बाहर रह जाता था। नई व्यवस्था में 15,000 से 25,000 रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को अनिवार्य कवरेज का लाभ मिलने की उम्मीद है।

    वेतन सीमा बढ़ने के बाद कर्मचारियों को तीन प्रमुख सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से लाभ मिलेगा। कर्मचारी भविष्य निधि के तहत नियमित बचत की व्यवस्था होगी। कर्मचारी पेंशन योजना के माध्यम से सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन सुरक्षा मिलेगी। वहीं कर्मचारी जमा-संबद्ध बीमा योजना के तहत बीमा सुरक्षा उपलब्ध होगी। इसके साथ पेंशन योग्य वेतन और वैधानिक अंशदान की व्यवस्था भी वर्तमान वेतन स्तरों के अनुरूप होने की उम्मीद है।

    सरकार के अनुसार, अधिक कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा ढांचे में शामिल करने से औपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं मिलने से कर्मचारियों के लिए भविष्य की वित्तीय सुरक्षा का आधार मजबूत होगा। इसके अलावा, नियोक्ताओं के लिए भी व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज से कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलने की बात कही गई है।

    इस फैसले से सरकारी व्यय भी बढ़ेगा। अनुमान के मुताबिक वार्षिक सरकारी व्यय करीब 11,339 करोड़ रुपये हो जाएगा, जबकि वर्तमान बजटीय सहायता लगभग 10,250 करोड़ रुपये है। अगले पांच वर्षों में इस निर्णय पर करीब 56,696 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। प्रस्ताव पर विभिन्न मंत्रालयों के साथ चर्चा की गई थी और 16 जून 2026 को व्यय वित्त समिति ने इसकी सिफारिश की थी।

    वर्तमान में ईपीएफओ के तहत करीब 7.98 करोड़ अंशदाता सदस्य और 7.68 लाख से अधिक प्रतिष्ठान जुड़े हुए हैं। कर्मचारी पेंशन योजना के तहत लगभग 82 लाख पेंशनभोगियों को लाभ मिल रहा है। वेतन सीमा बढ़ाने के फैसले से सामाजिक सुरक्षा का दायरा और व्यापक होने की उम्मीद है।

    सरकार के अनुसार, बढ़ती आय और औपचारिक रोजगार के विस्तार के साथ सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का भी विस्तार जरूरी है। ईपीएफओ की वेतन सीमा 25,000 रुपये तक बढ़ाने का निर्णय इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे अधिक कर्मचारियों को भविष्य निधि, पेंशन और बीमा सुरक्षा से जोड़ने का रास्ता खुलेगा।

    केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ईपीएफओ की अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा बढ़ाने को मंजूरी दी है। इससे 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ सकते हैं।

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    नई दिल्ली ।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि, कर्मचारी पेंशन योजना और कर्मचारी जमा-संबद्ध बीमा योजना का लाभ मिलने की उम्मीद है।

    सरकार के अनुसार, वेतन सीमा बढ़ाने का उद्देश्य अधिक कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ना है। नई सीमा लागू होने के बाद 15,000 से 25,000 रुपये मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों का बड़ा वर्ग ईपीएफओ के अनिवार्य दायरे में आ सकेगा। इससे उन्हें भविष्य निधि, पेंशन और बीमा जैसी सुविधाओं का लाभ मिलेगा।

    ईपीएफओ की वेतन सीमा वर्ष 2004 से 2014 तक 10 वर्षों तक अपरिवर्तित रही थी। सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह किया गया था। अब करीब 12 वर्ष बाद इसे 25,000 रुपये करने का फैसला लिया गया है। सरकार के मुताबिक, इस अवधि में देश में वेतन स्तर, आय और औपचारिक रोजगार की स्थिति में बदलाव आया है।

    पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में न्यूनतम मजदूरी भी मौजूदा ईपीएफओ सीमा के करीब पहुंची है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और बदलते वेतन स्तर के अनुरूप करने की जरूरत महसूस की गई। इसी आधार पर अनिवार्य कवरेज की सीमा बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।

    मौजूदा व्यवस्था के तहत 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पर नौकरी शुरू करने वाला नया कर्मचारी स्वतः ईपीएफ ढांचे के अंतर्गत नहीं आता था। इससे ऐसे कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग भविष्य निधि, पेंशन और बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से बाहर रह जाता था। नई व्यवस्था में 15,000 से 25,000 रुपये तक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को अनिवार्य कवरेज का लाभ मिलने की उम्मीद है।

    वेतन सीमा बढ़ने के बाद कर्मचारियों को तीन प्रमुख सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से लाभ मिलेगा। कर्मचारी भविष्य निधि के तहत नियमित बचत की व्यवस्था होगी। कर्मचारी पेंशन योजना के माध्यम से सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन सुरक्षा मिलेगी। वहीं कर्मचारी जमा-संबद्ध बीमा योजना के तहत बीमा सुरक्षा उपलब्ध होगी। इसके साथ पेंशन योग्य वेतन और वैधानिक अंशदान की व्यवस्था भी वर्तमान वेतन स्तरों के अनुरूप होने की उम्मीद है।

    सरकार के अनुसार, अधिक कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा ढांचे में शामिल करने से औपचारिक रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं मिलने से कर्मचारियों के लिए भविष्य की वित्तीय सुरक्षा का आधार मजबूत होगा। इसके अलावा, नियोक्ताओं के लिए भी व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज से कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलने की बात कही गई है।

    इस फैसले से सरकारी व्यय भी बढ़ेगा। अनुमान के मुताबिक वार्षिक सरकारी व्यय करीब 11,339 करोड़ रुपये हो जाएगा, जबकि वर्तमान बजटीय सहायता लगभग 10,250 करोड़ रुपये है। अगले पांच वर्षों में इस निर्णय पर करीब 56,696 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। प्रस्ताव पर विभिन्न मंत्रालयों के साथ चर्चा की गई थी और 16 जून 2026 को व्यय वित्त समिति ने इसकी सिफारिश की थी।

    वर्तमान में ईपीएफओ के तहत करीब 7.98 करोड़ अंशदाता सदस्य और 7.68 लाख से अधिक प्रतिष्ठान जुड़े हुए हैं। कर्मचारी पेंशन योजना के तहत लगभग 82 लाख पेंशनभोगियों को लाभ मिल रहा है। वेतन सीमा बढ़ाने के फैसले से सामाजिक सुरक्षा का दायरा और व्यापक होने की उम्मीद है।

    सरकार के अनुसार, बढ़ती आय और औपचारिक रोजगार के विस्तार के साथ सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का भी विस्तार जरूरी है। ईपीएफओ की वेतन सीमा 25,000 रुपये तक बढ़ाने का निर्णय इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे अधिक कर्मचारियों को भविष्य निधि, पेंशन और बीमा सुरक्षा से जोड़ने का रास्ता खुलेगा।

  • दीपावली-छठ पर यात्रियों को राहत, कटिहार से मुंबई-अमृतसर और कानपुर-गुवाहाटी के बीच स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू

    दीपावली-छठ पर यात्रियों को राहत, कटिहार से मुंबई-अमृतसर और कानपुर-गुवाहाटी के बीच स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू


    नई दिल्ली ।दीपावली और छठ पूजा के दौरान घर जाने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ने के साथ ट्रेनों में बुकिंग का दबाव भी बढ़ गया है। नियमित ट्रेनों में बुकिंग शुरू होने के कुछ समय बाद ही सीटें भरने की स्थिति को देखते हुए रेलवे ने यात्रियों की सुविधा के लिए कई स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू किया है। इनमें कटिहार-मुंबई, कटिहार-अमृतसर और कानपुर-गुवाहाटी के बीच चलने वाली ट्रेनें शामिल हैं। इन ट्रेनों के जरिए त्योहार के दौरान अलग-अलग शहरों के बीच अतिरिक्त रेल सेवा उपलब्ध कराई जा रही है।

    मुंबई सेंट्रल-कटिहार के बीच 09189/09190 नंबर की स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही है। यह ट्रेन सप्ताह में एक दिन संचालित होती है। मुंबई सेंट्रल से कटिहार जाने वाली ट्रेन प्रत्येक शनिवार को रवाना होती है, जबकि कटिहार से मुंबई सेंट्रल लौटने वाली ट्रेन प्रत्येक मंगलवार को चलती है। इस ट्रेन में सेकेंड एसी, थर्ड एसी, स्लीपर और जनरल क्लास के डिब्बे उपलब्ध हैं। सुपरफास्ट श्रेणी की यह ट्रेन 2292 किलोमीटर की दूरी करीब 42 घंटे 25 मिनट में तय करती है।

    मुंबई-कटिहार स्पेशल ट्रेन बोरीवली, वापी, वलसाड, भरूच, वडोदरा, रतलाम, उज्जैन, संत हिरदाराम नगर जंक्शन, विदिशा, बीना, झांसी और कानपुर समेत कई प्रमुख स्टेशनों पर रुकती है। इसके अलावा ऐशबाग, गोंडा, मनकापुर, बस्ती, खलीलाबाद, गोरखपुर, देवरिया सदर, सिवान, छपरा, हाजीपुर, बरौनी, बेगुसराय, खगड़िया और नौगछिया भी इसके ठहराव में शामिल हैं।

    अमृतसर और कटिहार के बीच 05735/05736 नंबर की स्पेशल ट्रेन सप्ताह में एक दिन चल रही है। अमृतसर से कटिहार जाने वाली ट्रेन प्रत्येक शुक्रवार को रवाना होती है, जबकि कटिहार से अमृतसर जाने वाली ट्रेन प्रत्येक बुधवार को चलती है। इस मेल एक्सप्रेस ट्रेन में सभी डिब्बे जनरल क्लास के हैं। ट्रेन 1676 किलोमीटर की दूरी करीब 36 घंटे 45 मिनट में तय करती है।

    इस ट्रेन के प्रमुख ठहरावों में ब्यास, जालंधर सिटी, ढंडारी कलां, राजपुरा जंक्शन, अंबाला कैंट, सहारनपुर, रुड़की, लकसर, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, सीतापुर, गोंडा, बस्ती और गोरखपुर शामिल हैं। इसके बाद ट्रेन कप्तानगंज, नरकटियागंज, रक्सौल, सीतामढ़ी, जनकपुर रोड, शीशो, सकरी, झंझारपुर, निर्मली, सरायगढ़, राघोपुर, ललितग्राम, फारबिसगंज, अररिया कोर्ट और पूर्णिया से होकर गुजरती है।

    कानपुर सेंट्रल और गुवाहाटी के बीच 04127/04128 नंबर की स्पेशल ट्रेन भी सप्ताह में एक दिन संचालित हो रही है। दी गई जानकारी के अनुसार, यह सेवा गुरुवार को रवाना होती है और गुवाहाटी से कानपुर सेंट्रल वापसी सेवा शुक्रवार को चलती है। ट्रेन में सेकेंड एसी, थर्ड एसी, स्लीपर और जनरल क्लास के डिब्बे हैं। यह मेल एक्सप्रेस ट्रेन 1447 किलोमीटर की दूरी करीब 35 घंटे में तय करती है।

    कानपुर-गुवाहाटी स्पेशल ट्रेन फतेहपुर, प्रयागराज जंक्शन, ज्ञानपुर रोड, बनारस, वाराणसी, गाजीपुर सिटी, बलिया, छपरा, सोनपुर, हाजीपुर, शाहपुर पटोरी, बरौनी, बेगुसराय, खगड़िया, मानसी, नौगछिया और कटिहार समेत कई स्टेशनों पर रुकती है। आगे इसके ठहराव बारसोई, किशनगंज, अलुआबाड़ी रोड, न्यू जलपाईगुड़ी, न्यू कूचबिहार, न्यू अलीपुरद्वार, कोकराझार, न्यू बंगाईगांव, बरपेटा रोड, रंगिया और कामाख्या में हैं।

    स्पेशल ट्रेनों के समय, ठहराव और अन्य जानकारी के लिए रेलवे हेल्पलाइन नंबर 139 से जानकारी ली जा सकती है। यात्री NTES के माध्यम से भी ट्रेनों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

  • भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उप-प्रबंध निदेशक नाइजेल क्लार्क ने कहा है कि भारत के पास दुनिया की आर्थिक वृद्धि की अगली बड़ी लहर का नेतृत्व करने की क्षमता है। पांच दिवसीय भारत यात्रा पूरी करने के बाद जारी उनके बयान में देश की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र की प्रगति और बढ़ती तकनीकी क्षमताओं को इसकी प्रमुख वजह बताया गया।

    क्लार्क ने अपनी यात्रा के दौरान नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। आईएमएफ में उप-प्रबंध निदेशक का पद संभालने के बाद यह उनकी भारत की पहली यात्रा थी। इस दौरान उन्होंने वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी से मुलाकात की।

    क्लार्क ने कहा कि भारत दुनिया की अगली आर्थिक वृद्धि को गति देने की क्षमता रखता है और आईएमएफ इस यात्रा में देश का करीबी साझेदार बना रहेगा। उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताया और वैश्विक आर्थिक विकास में देश की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

    उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक आधार और अच्छी नीतियों के कारण भारत वैश्विक विकास के प्रमुख इंजनों में बना हुआ है। भारतीय नीति-निर्माताओं के साथ हुई बातचीत में देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव और टिकाऊ तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक कदमों पर चर्चा हुई।

    क्लार्क के मुताबिक, दुनिया में बढ़ती अनिश्चितताओं और बदलते जोखिमों के बीच आर्थिक स्थिरता और मजबूती बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नीतियों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप लचीला बनाए रखने, महंगाई को नियंत्रण में रखने तथा ऐसे सुधार आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई, जो उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर सकें।

    उन्होंने मध्यम अवधि में तेज आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए सुधारों की जरूरत पर भी जोर दिया। साथ ही क्लार्क ने भारत सरकार को बहुपक्षीय सहयोग का समर्थन करने और क्षेत्र के अन्य देशों की मदद करने के लिए धन्यवाद दिया।

    भारत यात्रा के दौरान आईएमएफ के उप-प्रबंध निदेशक ने उद्योग जगत के कई नेताओं और कारोबारियों से भी मुलाकात की। इन बैठकों का उद्देश्य यह समझना था कि देश का निजी क्षेत्र आर्थिक प्रगति में किस तरह योगदान दे रहा है।

    क्लार्क ने भारतीय निजी क्षेत्र की ऊर्जा और देश में मौजूद प्रतिभाओं की सराहना की। उन्होंने तेजी से विकसित हो रही तकनीकी और विनिर्माण क्षमताओं को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, भारत में निजी क्षेत्र की गतिविधियां आर्थिक विकास की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

    उन्होंने नवाचार, डिजिटल बदलाव, उन्नत विनिर्माण और नई तकनीकों को अपनाने को उत्पादकता बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों के रूप में रेखांकित किया। क्लार्क के मुताबिक इन क्षेत्रों में प्रगति से प्रतिस्पर्धा मजबूत हो सकती है और अधिक मूल्य वाले आर्थिक कार्यों को बढ़ावा मिल सकता है।

    उनकी यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं में भारत की आर्थिक मजबूती के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों के बीच विकास को टिकाऊ बनाए रखने के उपायों पर भी ध्यान दिया गया। क्लार्क ने कहा कि आईएमएफ भारत के साथ साझेदारी जारी रखेगा और देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़े प्रयासों में करीबी सहयोगी बना रहेगा।

  • भारत-न्यूजीलैंड एफटीए को संसद की मंजूरी, पीएम क्रिस्टोफर लक्सन ने जताई खुशी, व्यापार और रोजगार बढ़ने की उम्मीद

    भारत-न्यूजीलैंड एफटीए को संसद की मंजूरी, पीएम क्रिस्टोफर लक्सन ने जताई खुशी, व्यापार और रोजगार बढ़ने की उम्मीद

    नई दिल्ली ।भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते यानी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को न्यूजीलैंड की संसद से मंजूरी मिल गई है। बुधवार को हुए मतदान में समझौते के पक्ष में 93 वोट पड़े, जबकि 29 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। संसद से मंजूरी मिलने के बाद न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने खुशी जताई और कहा कि इस समझौते से देश में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे तथा दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

    प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने कहा कि कई लोगों ने उनसे कहा था कि भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता संभव नहीं होगा, लेकिन अब संसद ने इसे मंजूरी दे दी है। उन्होंने कहा कि उनकी नेशनल पार्टी ने पहले कार्यकाल में भारत के साथ एफटीए करने का वादा किया था और सरकार ने उस लक्ष्य को पूरा किया है।

    लक्सन के मुताबिक समझौते से न्यूजीलैंड के लोगों के लिए अधिक नौकरियां और आय के अवसर पैदा होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के करीब 1.4 अरब उपभोक्ताओं तक पहुंच बनने से न्यूजीलैंड के उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में अवसर बढ़ेंगे। उनके अनुसार यह समझौता न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

    न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले ने समझौते से जुड़े शुल्क प्रावधानों की जानकारी देते हुए कहा कि एफटीए लागू होने के बाद भारत को न्यूजीलैंड के 57 प्रतिशत निर्यात पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। समझौते के पूरी तरह लागू होने पर 95 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क या तो समाप्त कर दिया जाएगा या उसे काफी कम कर दिया जाएगा।

    मैक्ले ने कहा कि समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में भी सुविधा बढ़ेगी। इसके तहत सीमा पर क्लीयरेंस प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है। उन्होंने भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग तक न्यूजीलैंड के कारोबारियों की बेहतर पहुंच को भी समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।

    उन्होंने कहा कि भारत में भोजन, टेक्नोलॉजी, शिक्षा, पर्यटन, प्रोफेशनल सेवाओं और अन्य उत्पादों की मांग बढ़ रही है। ऐसे में मुक्त व्यापार समझौते से न्यूजीलैंड के निर्यातकों को भारतीय बाजार में अपने कारोबारी संबंधों का विस्तार करने में मदद मिलेगी।

    भारत और न्यूजीलैंड के बीच इस व्यापार समझौते की बातचीत की घोषणा मार्च 2025 में की गई थी। न्यूजीलैंड सरकार को उम्मीद है कि संसद की मंजूरी के बाद एफटीए इस साल के अंत तक लागू हो जाएगा। हालांकि इसके लिए समझौते में निर्धारित प्रक्रियाओं का पूरा होना जरूरी होगा।

    मैक्ले ने कहा कि एफटीए दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने के लक्ष्य को भी समर्थन देगा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। नए समझौते को इसी लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

    संसद की मंजूरी के साथ भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए एक नया ढांचा तैयार हुआ है। समझौते के लागू होने के बाद शुल्क में बदलाव और बाजार तक पहुंच से जुड़े प्रावधानों का असर दोनों देशों के निर्यातकों और कारोबारियों पर पड़ने की उम्मीद है।

  • सोने और चांदी की कीमतों में तेज उछाल, निवेशकों की नजर अमेरिकी फेड के ब्याज दर संबंधी फैसले पर टिकी

    सोने और चांदी की कीमतों में तेज उछाल, निवेशकों की नजर अमेरिकी फेड के ब्याज दर संबंधी फैसले पर टिकी

    नई दिल्ली ।सोने और चांदी की कीमतों में बुधवार को तेजी देखने को मिली। घरेलू वायदा बाजार में दोनों कीमती धातुओं के भाव में बढ़त दर्ज की गई। सोने की कीमत में करीब 0.85 प्रतिशत तक की तेजी रही, जबकि चांदी का भाव शुरुआती कारोबार में 1.57 प्रतिशत तक चढ़ गया। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोने और चांदी की कीमतों में मजबूती बनी हुई है। इस बीच निवेशकों की नजर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर होने वाली बैठक के फैसले पर टिकी है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर 5 अक्टूबर 2026 का सोना वायदा अनुबंध बुधवार को 1,50,809 रुपये प्रति 10 ग्राम के पिछले बंद भाव की तुलना में 1,291 रुपये यानी 0.85 प्रतिशत की बढ़त के साथ 1,52,100 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। दोपहर 12 बजे तक सोना 953 रुपये यानी 0.63 प्रतिशत की तेजी के साथ 1,51,762 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था।

    दिन के कारोबार में अब तक सोने ने 1,51,450 रुपये प्रति 10 ग्राम का निचला स्तर और 1,52,100 रुपये का ऊपरी स्तर छुआ। इससे संकेत मिलता है कि शुरुआती बढ़त के बाद सोने की कीमत सीमित दायरे में कारोबार करती रही।

    चांदी में भी मजबूत तेजी दर्ज की गई। एमसीएक्स पर 4 दिसंबर 2026 का चांदी वायदा अनुबंध पिछले बंद भाव 2,32,118 रुपये प्रति किलोग्राम की तुलना में 3,667 रुपये यानी 1.57 प्रतिशत की बढ़त के साथ 2,35,785 रुपये प्रति किलोग्राम पर खुला। दोपहर 12 बजे चांदी 3,250 रुपये यानी 1.40 प्रतिशत की तेजी के साथ 2,35,988 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रही थी।

    कारोबार के दौरान चांदी ने अब तक 2,34,540 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम स्तर और 2,35,988 रुपये प्रति किलोग्राम का उच्चतम स्तर छुआ। इस तरह घरेलू वायदा बाजार में सोने के साथ चांदी में भी तेजी का रुख बना रहा।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमती धातुओं की कीमतों में बढ़त देखने को मिली। कॉमेक्स पर सोना 0.77 प्रतिशत की तेजी के साथ 4,366 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। वहीं चांदी की कीमत 1.96 प्रतिशत बढ़कर 65 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

    बाजार की नजर अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दो दिवसीय बैठक के फैसले पर है। ब्याज दरों को लेकर बैठक के फैसलों की घोषणा बुधवार देर शाम की जाएगी। निवेशक इस फैसले का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि ब्याज दरों से जुड़ी जानकारी का असर सोने और चांदी समेत वैश्विक वित्तीय बाजारों पर पड़ सकता है।

    यह बैठक ऐसे समय हो रही है, जब मध्य पूर्व में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमत करीब चार महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। इसी अवधि में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी 5 प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है। इन परिस्थितियों के बीच फेड के फैसले पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।

  • राइड बुकिंग में अतिरिक्त रकम देने का दबाव पड़ा भारी, CCPA ने रैपिडो की कंपनी पर 10 लाख रुपये की कार्रवाई की

    राइड बुकिंग में अतिरिक्त रकम देने का दबाव पड़ा भारी, CCPA ने रैपिडो की कंपनी पर 10 लाख रुपये की कार्रवाई की

    नई दिल्ली । रैपिडो चलाने वाली कंपनी रोप्पेन ट्रांसपोर्टेशन सर्विसेज पर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी CCPA ने 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई ऐप पर इस्तेमाल किए जा रहे ऐसे तरीकों को लेकर की गई है, जिनसे यात्रियों पर राइड बुक करने से पहले अतिरिक्त पैसे देने का दबाव पड़ने की बात सामने आई। प्राधिकरण ने इसे डार्क पैटर्न और भ्रामक व्यापार तरीके की श्रेणी में रखा है।

    CCPA की जांच में पाया गया कि रैपिडो ऐप पर शुरुआत में यात्री को एक किराया दिखाई देता था, लेकिन बुकिंग की प्रक्रिया के दौरान उससे अतिरिक्त रकम जोड़ने के लिए कहा जाता था। ऐप पर ऐसे संदेश दिखाए जाने की बात सामने आई, जिनमें ज्यादा पैसे देने से राइड मिलने की संभावना बढ़ने का संकेत दिया जाता था।

    जांच के मुताबिक, कुछ संदेशों में यात्रियों से 10, 20 या 30 रुपये अतिरिक्त जोड़ने के लिए कहा जाता था। इसके पीछे यह बताया जाता था कि कैप्टन कम कीमत पर राइड स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इस तरह के संदेशों से यात्री के मन में यह धारणा बन सकती थी कि यदि उसने किराया नहीं बढ़ाया तो उसे राइड नहीं मिलेगी। CCPA ने इस तरीके को ‘कन्फर्म शेमिंग’ नाम दिया है।

    प्राधिकरण ने रैपिडो के ‘सेट योर प्राइस’ फीचर के इंटरफेस पर भी सवाल उठाए। जांच में पाया गया कि कीमत बढ़ाने का विकल्प हरे रंग में दिखाया जाता था, जबकि कीमत कम करने पर लाल या नारंगी रंग की चेतावनी दिखाई देती थी। इसके अलावा कीमत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले स्लाइडर में अधिक जगह दिए जाने की बात भी सामने आई। CCPA ने इस तरीके को ‘इंटरफेस इंटरफेरेंस’ की श्रेणी में रखा।

    टिपिंग को लेकर भी प्राधिकरण ने स्थिति स्पष्ट की। CCPA के मुताबिक टिप किसी सेवा के पूरा होने के बाद ग्राहक की इच्छा से दिया जाने वाला अतिरिक्त भुगतान होता है। इसे राइड हासिल करने की शर्त के रूप में नहीं जोड़ा जा सकता। मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025 के अनुसार भी टिप राइड पूरी होने के बाद ही मांगी जानी चाहिए।

    रैपिडो की ओर से सफाई में कहा गया कि टिप पूरी तरह यात्रियों की इच्छा पर निर्भर है और उसका मैचिंग सिस्टम अतिरिक्त पैसे दिए बिना भी काम करता है। हालांकि, CCPA ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। प्राधिकरण ने यह भी पाया कि ज्यादा पैसे देने से राइड मिलने की संभावना बढ़ने के संबंध में कंपनी कोई सबूत पेश नहीं कर सकी।

    CCPA की कार्रवाई के बाद रैपिडो के ऐप पर राइड बुकिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाले इंटरफेस और अतिरिक्त भुगतान से जुड़े तरीकों पर सवाल सामने आए हैं। मामला केवल टिप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किराया बढ़ाने के लिए दिए जाने वाले संकेतों और ऐप के डिजाइन को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।

    इस बीच उबर, ओला और नम्मा यात्री जैसी कंपनियां भी CCPA की जांच के दायरे में हैं। ऐसे में राइड-बुकिंग प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों से अतिरिक्त भुगतान मांगने के तरीकों और ऐप इंटरफेस से जुड़े मामलों पर नियामकीय निगरानी जारी है।

  • सेंसेक्स और निफ्टी में बन सकता है बड़ा मूवमेंट शेयर बाजार में निवेश से पहले जानें जरूरी बातें

    सेंसेक्स और निफ्टी में बन सकता है बड़ा मूवमेंट शेयर बाजार में निवेश से पहले जानें जरूरी बातें


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के लिए बाजार की चाल हमेशा महत्वपूर्ण रहती है। कभी तेजी निवेशकों का उत्साह बढ़ाती है तो कभी अचानक गिरावट बाजार की चिंता बढ़ा देती है। ऐसे में शेयर बाजार की दिशा को समझने के लिए केवल सेंसेक्स और निफ्टी के उतार चढ़ाव को देखना पर्याप्त नहीं होता बल्कि देश और दुनिया की आर्थिक गतिविधियों का भी असर बाजार पर पड़ता है। निवेशकों के लिए यह जरूरी है कि वे बाजार में किसी भी फैसले से पहले मौजूदा परिस्थितियों और प्रमुख संकेतकों को ध्यान से समझें।

    शेयर बाजार पर सबसे बड़ा असर वैश्विक बाजारों की चाल का भी पड़ता है। अमेरिका समेत दूसरे प्रमुख बाजारों में होने वाली हलचल का असर भारतीय बाजार पर देखने को मिल सकता है। इसके अलावा ब्याज दरों को लेकर केंद्रीय बैंकों के फैसले महंगाई के आंकड़े और आर्थिक विकास से जुड़े संकेत भी बाजार की धारणा को प्रभावित करते हैं। यदि आर्थिक माहौल मजबूत दिखाई देता है तो निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है वहीं कमजोर संकेतों की स्थिति में बाजार में दबाव देखने को मिल सकता है।

    भारतीय बाजार के लिए कंपनियों के तिमाही नतीजे भी बेहद अहम होते हैं। किसी कंपनी के मुनाफे में बढ़ोतरी बिक्री में सुधार और भविष्य के कारोबार को लेकर सकारात्मक संकेत उसके शेयर को मजबूती दे सकते हैं। इसके उलट कमजोर नतीजे या कारोबार से जुड़ी चिंता किसी शेयर में बिकवाली बढ़ा सकती है। यही वजह है कि निवेशकों को केवल शेयर की कीमत देखकर फैसला लेने के बजाय कंपनी के कारोबार और वित्तीय स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए।

    बाजार में कच्चे तेल की कीमतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है और इसका असर अर्थव्यवस्था के साथ बाजार की धारणा पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत का संकेत मानी जा सकती है।

    विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से बाजार में सकारात्मक माहौल बन सकता है जबकि लगातार बिकवाली से दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी बाजार को सहारा देने का काम कर सकती है।

    ऐसे माहौल में छोटे निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है कि वे जल्दबाजी में फैसला न लें। शेयर बाजार में तेजी देखकर केवल मुनाफे की उम्मीद में पैसा लगाना और गिरावट देखकर घबराकर बिकवाली करना नुकसान का कारण बन सकता है। निवेशकों को अपनी जोखिम क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी चाहिए। बाजार में उतार चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया है इसलिए मजबूत कंपनियों और लंबी अवधि की रणनीति पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

    शेयर बाजार में किसी भी निवेश से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति बाजार की मौजूदा दिशा और आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन करना जरूरी है। बाजार में अवसर लगातार बनते रहते हैं इसलिए धैर्य और सोच समझकर लिया गया फैसला निवेशकों के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकता है।

  • अडानी-अंबानी की दौलत पर बाजार की मार: एक दिन में ₹59 हजार करोड़ से ज्यादा घटे नेटवर्थ

    अडानी-अंबानी की दौलत पर बाजार की मार: एक दिन में ₹59 हजार करोड़ से ज्यादा घटे नेटवर्थ


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में मंगलवार की तेज गिरावट का असर देश के दो बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति पर भी दिखाई दिया। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक गौतम अडानी की नेटवर्थ एक दिन में 4.44 अरब डॉलर यानी करीब 42 हजार करोड़ रुपए घट गई, जबकि मुकेश अंबानी की संपत्ति में 1.78 अरब डॉलर यानी करीब 17 हजार करोड़ रुपए की कमी आई। अडानी की नेटवर्थ घटकर 105 अरब डॉलर रह गई और वे अरबपतियों की सूची में 20वें स्थान पर पहुंच गए।

    अडानी ग्रुप के शेयरों में भारी गिरावट

    अडानी की संपत्ति में कमी की बड़ी वजह ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में आई गिरावट रही। मंगलवार, 15 सितंबर को अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर 4.29% टूटकर ₹2,928.60 पर बंद हुआ। अडानी पावर में 3.80% की गिरावट रही और यह ₹202 पर बंद हुआ। अडानी पोर्ट्स एंड SEZ 2.88% गिरकर ₹1,713.80 पर आ गया।

    इसी तरह अडानी ग्रीन एनर्जी में 2.05% की कमजोरी रही और शेयर ₹1,255 पर बंद हुआ। अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस 1.86% गिरकर ₹1,347.50 पर आ गया, जबकि अडानी टोटल गैस में करीब 2.46% की गिरावट दर्ज की गई।

    अंबानी की संपत्ति भी घटी

    मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में भी मंगलवार को 1.78 अरब डॉलर यानी करीब 17 हजार करोड़ रुपए की कमी दर्ज की गई। उनकी कुल संपत्ति घटकर 81.3 अरब डॉलर रह गई।

    रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में मंगलवार को तेज गिरावट रही। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार शेयर ₹1,235.30 पर बंद हुआ, जो पिछले बंद भाव के मुकाबले 1.77% नीचे था।

    अरबपतियों की संपत्ति में रोजाना होने वाले बदलाव में शेयर बाजार की भूमिका अहम होती है। इन कारोबारियों की नेटवर्थ का बड़ा हिस्सा उनकी कंपनियों में मौजूद हिस्सेदारी से जुड़ा होता है। इसलिए संबंधित कंपनियों के शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव का सीधा असर उनकी संपत्ति के अनुमानित मूल्य पर पड़ता है।

    सेंसेक्स-निफ्टी भी दबाव में

    मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में व्यापक गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स 1.04% टूटकर 74,003.82 अंक पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 1.19% गिरकर 23,118.60 अंक पर आ गया।

    बाजार में दबाव की वजहों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी शामिल रही। ऐसे माहौल में बड़ी कंपनियों के शेयरों में बिकवाली का दबाव बढ़ा और इसका असर अडानी तथा रिलायंस समूह के शेयरों पर भी दिखाई दिया।

    मस्क की दौलत में भी बड़ी गिरावट

    दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क की संपत्ति में भी मंगलवार को बड़ी कमी दर्ज की गई। टेस्ला और स्पेसएक्स के शेयरों में गिरावट के चलते उनकी नेटवर्थ करीब 24.8 अरब डॉलर घटने की बात सामने आई है। इसके बाद उनकी संपत्ति करीब 892 अरब डॉलर रह गई।

    अरबपतियों की नेटवर्थ में इस तरह के दैनिक बदलाव को उनकी कंपनियों के शेयरों के बाजार मूल्य से जोड़कर देखा जाता है। शेयर कीमतों में बदलाव के साथ नेटवर्थ के आंकड़े भी लगातार बदलते रहते हैं।

  • UPI पर नया नियम: ग्राहक से नहीं लिया जाएगा चार्ज, बड़े व्यापारियों पर लगेगा शुल्क

    UPI पर नया नियम: ग्राहक से नहीं लिया जाएगा चार्ज, बड़े व्यापारियों पर लगेगा शुल्क


    नई दिल्ली। UPI से पेमेंट करने वाले ग्राहकों के लिए राहत की बात है कि प्रस्तावित नए MDR ढांचे में उन्हें सीधे कोई चार्ज नहीं देना होगा। 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इस फ्रेमवर्क के मुताबिक, 2,000 रुपए से अधिक के कुछ चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.40% MDR लगाया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपए प्रति ट्रांजेक्शन होगी। छोटे दुकानदारों को इससे बाहर रखा गया है।

    नए नियम को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चार्ज किससे लिया जाएगा, छोटे दुकानदारों की पहचान कैसे होगी और क्या इसका बोझ ग्राहक पर डाला जा सकेगा? आइए 12 सवालों में समझते हैं पूरा मामला।

    1. क्या UPI से पेमेंट करने वाले ग्राहक को चार्ज देना होगा?

    नहीं। दिए गए फ्रेमवर्क के मुताबिक MDR P2M यानी Person-to-Merchant लेनदेन पर लागू होगा। ग्राहक 2,000 रुपए से ज्यादा का UPI भुगतान करता है तो भी उससे सीधे कोई MDR नहीं लिया जाएगा। यह शुल्क पात्र मर्चेंट से जुड़ेगा।

    2. कितना MDR देना होगा?

    2,000 रुपए से ज्यादा का भुगतान प्राप्त करने वाले पात्र बड़े व्यापारी पर 0.40% MDR लगेगा। हालांकि इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपए प्रति ट्रांजेक्शन तय की गई है। यानी किसी एक लेनदेन पर 300 रुपए से अधिक MDR नहीं लिया जाएगा।

    3. छोटे व्यापारियों को क्या छूट मिलेगी?

    छोटे व्यापारियों को MDR से छूट दी गई है। यानी पात्र छोटे व्यापारी 2,000 रुपए से कम या अधिक का UPI भुगतान प्राप्त करें, उन पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।

    4. छोटे व्यापारी की पहचान कैसे होगी?

    फ्रेमवर्क में P2PM यानी छोटे मर्चेंट की श्रेणी रखी गई है। इसके तहत दुकानदार और छोटे कारोबारी आते हैं। दिए गए नियम के अनुसार, QR कोड के जरिए हर महीने 1 लाख रुपए तक का भुगतान प्राप्त करने वाले ऐसे व्यापारियों को MDR से छूट मिलेगी।

    5. 2,000 रुपए से कम के पेमेंट पर बड़े व्यापारी को भी MDR देना होगा?

    नहीं। 2,000 रुपए से कम के UPI भुगतान पर MDR लागू नहीं होगा। यह छूट छोटे और बड़े दोनों तरह के व्यापारियों के लिए होगी।

    6. कितने व्यापारियों पर पड़ेगा असर?

    दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 2,000 रुपए से अधिक का भुगतान प्राप्त करने वाले बड़े व्यापारियों की हिस्सेदारी कुल UPI पेमेंट में करीब 5% है। वहीं करीब 95% छोटे व्यापारी बताए गए हैं, जिन पर नया MDR लागू नहीं होगा।

    7. सब्जी वाले, चाय की दुकान और छोटे दुकानदारों पर क्या असर होगा?

    छोटे कारोबारियों को इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है। P2PM श्रेणी में आने वाले ऐसे दुकानदार, जिनका QR कोड के जरिए मासिक डिजिटल कलेक्शन 1 लाख रुपए तक है, उन्हें 2,000 रुपए से अधिक के भुगतान पर भी MDR नहीं देना होगा।

    8. क्या दुकानदार यह चार्ज ग्राहक से वसूल सकते हैं?

    नहीं। दिए गए नियमों के मुताबिक MDR का बोझ ग्राहक पर डालने की अनुमति नहीं होगी। इसी तरह Google Pay, PhonePe या Paytm जैसे UPI ऐप्स के जरिए इस MDR के नाम पर ग्राहक से अलग से प्लेटफॉर्म फीस वसूलने की बात भी इस फ्रेमवर्क में नहीं है।

    9. सरकार MDR का नया मॉडल क्यों ला रही है?

    दिए गए विवरण के अनुसार, UPI नेटवर्क के विस्तार, सर्वर क्षमता बढ़ाने और साइबर फ्रॉड से निपटने के लिए बैंकों और फिनटेक कंपनियों को लगातार खर्च करना पड़ता है। नए MDR मॉडल के जरिए इस डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने का तर्क दिया गया है।

    इसके अलावा MDR से मिलने वाली राशि का 5% हिस्सा विशेष फंड में जाने की बात कही गई है। इसका इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों और टियर-3 शहरों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने के लिए किया जाना है।

    10. छोटे व्यापारी के खाते में अचानक 1 लाख रुपए आ जाएं तो क्या होगा?

    यह स्थिति मासिक कलेक्शन की सीमा पर निर्भर करेगी। दिए गए नियम के मुताबिक जिन व्यापारियों का मासिक भुगतान प्राप्त करने का आंकड़ा 1 लाख रुपए से कम है, उन्हें MDR से छूट मिलेगी। यदि किसी महीने उनका कलेक्शन निर्धारित सीमा से ऊपर चला जाता है, तो उस महीने उनकी MDR पात्रता प्रभावित हो सकती है।

    वहीं, 2,000 रुपए से कम के व्यक्तिगत भुगतान पर MDR नहीं लगेगा। यानी केवल छोटे-छोटे लेनदेन होने से व्यापारी पर यह शुल्क नहीं आएगा।

    11. बीमा, रिचार्ज, रेलवे और पेट्रोल-डीजल पर कितना MDR होगा?

    कुछ विशेष सेक्टर के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। दिए गए विवरण के मुताबिक 2,000 रुपए से अधिक के भुगतान पर अधिकतम 5 रुपए प्रति ट्रांजेक्शन MDR लिया जाएगा।

    इसमें टेलीकॉम में 2,000 रुपए से अधिक का रिचार्ज, बीमा में 2,000 रुपए से अधिक का प्रीमियम, रेलवे टिकट और पेट्रोल-डीजल से जुड़े 2,000 रुपए से अधिक के भुगतान शामिल हैं।

    12. क्या UPI का MDR कार्ड या वॉलेट से ज्यादा होगा?

    दिए गए फ्रेमवर्क के अनुसार UPI पर लागू MDR को क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या वॉलेट के मुकाबले कम रखने की बात कही गई है। यानी नए शुल्क का उद्देश्य UPI को महंगा भुगतान विकल्प बनाना नहीं, बल्कि बड़े मर्चेंट लेनदेन के लिए MDR व्यवस्था तैयार करना बताया गया है।

    ग्राहक के लिए सबसे जरूरी बात

    नए ढांचे को लेकर फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि ग्राहक से सीधे UPI MDR नहीं लिया जाना है। 2,000 रुपए से कम के भुगतान पर MDR नहीं है, जबकि छोटे व्यापारियों को भी निर्धारित शर्तों के तहत छूट दी गई है। मुख्य असर 2,000 रुपए से अधिक के पात्र बड़े मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर पड़ेगा, जहां 0.40% की दर और 300 रुपए की अधिकतम सीमा बताई गई है।

  • अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92 प्रतिशत पहुंची, ईंधन और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव

    अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92 प्रतिशत पहुंची, ईंधन और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव

    नई दिल्ली ।देश में थोक महंगाई का दबाव अगस्त 2026 में एक बार फिर बढ़ा है। थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI पर आधारित महंगाई दर अगस्त में बढ़कर 9.92 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई 2026 में यह 9.78 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईंधन और ऊर्जा तथा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आए उछाल से जुड़ी रही। इसके अलावा विनिर्माण क्षेत्र की महंगाई में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई।

    अगस्त में सभी वस्तुओं का समग्र थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 110.8 पर पहुंच गया। इससे पहले जुलाई में यह स्तर अलग था। थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर दिखाई दिया, खासकर ईंधन और ऊर्जा तथा रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाद्य वस्तुओं पर।

    ईंधन और ऊर्जा श्रेणी में महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ी। जुलाई में इस श्रेणी की महंगाई दर 20.05 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 22.93 प्रतिशत हो गई। इसी अवधि में इस श्रेणी का सूचकांक भी 105.4 से बढ़कर 108.3 पर पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू थोक कीमतों पर भी दिखाई दिया।

    खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई। जुलाई में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 6.65 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 7.05 प्रतिशत हो गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर घरेलू बजट पर पड़ने वाली लागत के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विनिर्माण क्षेत्र में भी थोक महंगाई दर में मामूली बढ़ोतरी हुई। जुलाई में यह 8.29 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 8.37 प्रतिशत हो गई। इस दौरान विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक 108.4 से बढ़कर 108.8 पर पहुंच गया।

    हालांकि प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी में महंगाई दर में कमी दर्ज की गई। जुलाई में यह 8.52 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 7.76 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद इस श्रेणी का सूचकांक 117.2 से बढ़कर 118.1 पर पहुंच गया। यानी महंगाई दर में कमी के बावजूद सूचकांक में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    अगस्त में थोक महंगाई को प्रभावित करने वाली प्रमुख वस्तुओं में खनिज तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य वस्तुएं, मूल धातु, गैर-खाद्य कृषि उत्पाद और रासायनिक उत्पाद शामिल रहे। इन क्षेत्रों में कीमतों में बदलाव का असर कुल WPI आंकड़े पर पड़ा।

    जून 2026 के थोक महंगाई के आंकड़ों में भी संशोधन किया गया है। जून की अंतिम थोक महंगाई दर को पहले जारी किए गए 9.87 प्रतिशत के अनुमान से बढ़ाकर 9.97 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही जून का अंतिम सूचकांक भी संशोधित किया गया। पहले यह 110.2 था, जिसे संशोधित कर 110.3 कर दिया गया।

    जुलाई के मुकाबले अगस्त में थोक महंगाई बढ़ने के आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने कुल महंगाई दर को प्रभावित किया है। खास तौर पर ईंधन एवं ऊर्जा श्रेणी में हुई बढ़ोतरी ने अगस्त के आंकड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    इस तरह अगस्त में WPI आधारित महंगाई दर 9.92 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो जुलाई के 9.78 प्रतिशत से अधिक है। ईंधन और ऊर्जा तथा खाद्य वस्तुओं की महंगाई में बढ़ोतरी के साथ विनिर्माण क्षेत्र में मामूली तेजी दर्ज हुई, जबकि प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर में कमी आई। जून के आंकड़ों में संशोधन के बाद अब अंतिम दर 9.97 प्रतिशत दर्ज की गई है।