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  • टाटा संस का IPO होगा लॉन्च…. RBI ने खारिज किया एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन

    टाटा संस का IPO होगा लॉन्च…. RBI ने खारिज किया एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन


    नई दिल्ली।
    अगर सबकुछ ठीक रहा तो जल्द ही टाटा ग्रुप (Tata Group) की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons ) का आईपीओ (IPO) लॉन्च होगा। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) (Reserve Bank of India – RBI) ने टाटा संस को प्रमुख निवेश कंपनी के रूप में एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन को खारिज कर दिया है। इससे टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी हो गया है। कानूनी विशेषज्ञ एचपी रानीना और कॉरपोरेट गवर्नेंस विश्लेषक श्रीराम सुब्रमणियन ने कहा कि रिजर्व बैंक के फैसले के बाद टाटा संस के सामने लागू लिस्टिंग नियमों का पालन करने का विकल्प बचता है।


    रिटेल निवेशकों को क्या फायदा?

    टाटा संस के आईपीओ आने से इसमें रिटेल निवेशक हिस्सेदारी खरीद सकेंगे। अभी आम निवेशक टाटा ग्रुप की कंपनी टाटा मोटर्स, TCS, टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स जैसी अलग-अलग लिस्टेड टाटा कंपनियों के शेयर खरीद सकते हैं लेकिन टाटा संस में सीधे निवेश नहीं कर सकते क्योंकि यह अनलिस्टेड है। अब अगर लिस्टिंग होती है तो शेयरों की खरीद-बिक्री की जा सकेगी।


    टाटा संस की कैसे बढ़ीं मुश्किलें

    दरअसल, आरबीआई ने सितंबर 2022 में टाटा संस को ‘अपर-लेयर’ की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के रूप में वर्गीकृत किया था और ऐसी संस्थाओं के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना अनिवार्य किया गया था। टाटा संस के लिए मूल समयसीमा 30 सितंबर 2025 रखी गई थी। टाटा संस ने इस दायित्व से बचने के लिए 2024 में 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुकाया और एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने का आवेदन किया था। आरबीआई ने आवेदन पर फैसला लंबित रखा और बाद में भी टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी की सूचियों में शामिल करता रहा।


    जून 2026 में आरबीआई ने बदले नियम

    जून 2026 से आरबीआई ने कुछ नियमों में बदलाव किए। इसके तहत 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की एसेट्स वाली कोई भी एनबीएफसी अपने-आप अपर-लेयर श्रेणी में आ जाती है। मार्च, 2026 तक टाटा संस की परिसंपत्तियां दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई गई हैं। अगस्त में जारी अपर-लेयर सूची में टाटा संस 17 संस्थाओं में एकमात्र गैर-सूचीबद्ध निजी इकाई थी। इस सूची में आरईसी, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और भारतीय रेलवे वित्त निगम जैसी सरकारी एनबीएफसी भी शामिल हैं, जिन्हें सूचीबद्धता की अनिवार्यता से छूट हासिल है।

    शेयरधारकों में मतभेद
    हालांकि, टाटा संस के आईपीओ की राह में कई दिक्कतें भी हैं। सूत्रों की मानें तो सूचीबद्धता को लेकर टाटा संस के शेयरधारकों के बीच भी मतभेद हैं। नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है और वह सूचीबद्धता का विरोध करता रहा है। दूसरी ओर, करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह सूचीबद्धता के पक्ष में रहा है और इससे अपनी हिस्सेदारी का मूल्य हासिल करने की बात करता रहा है।


    चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति नहीं होने का भी कारण

    यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब टाटा संस में नेतृत्व और निदेशक मंडल को लेकर मतभेद की खबरें हैं। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अगले साल फरवरी में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुनर्नियुक्ति नहीं लेने का फैसला किया है। ऐसी खबरें हैं कि टाटा संस की सूचीबद्धता का मुद्दा उन कारणों में भी शामिल था जिनकी वजह से नोएल टाटा ने चेयरमैन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया था। रतन टाटा के सौतेले भाई और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा टाटा संस के निदेशक मंडल के सदस्य भी हैं।

    चर्चा है कि वह चंद्रशेखरन से यह आश्वासन चाहते थे कि टाटा संस को सूचीबद्ध होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। वहीं, चंद्रशेखरन ने कथित तौर पर कहा था कि किसी नियामकीय या कानूनी मामले के नतीजे को पहले से तय नहीं माना जा सकता। नोएल टाटा ने समूह के कुछ अन्य कारोबार में हो रहे घाटे का मुद्दा भी उठाया था। इनमें टाटा डिजिटल और एयर इंडिया शामिल हैं, जिन्हें चंद्रशेखरन के करीब एक दशक के कार्यकाल में शुरू या अधिग्रहीत किया गया था।

  • पैसा Nifty में लगाएं या Sensex में निवेशकों की उलझन होगी दूर जानिए लंबी अवधि के लिए कौन सा विकल्प हो सकता है बेहतर

    पैसा Nifty में लगाएं या Sensex में निवेशकों की उलझन होगी दूर जानिए लंबी अवधि के लिए कौन सा विकल्प हो सकता है बेहतर


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के सामने अक्सर यह सवाल रहता है कि पैसा Nifty 50 में लगाया जाए या Sensex में। दोनों ही भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स हैं और देश की बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। हालांकि निवेश करने से पहले यह समझना जरूरी है कि Nifty और Sensex में सीधे पैसा नहीं लगाया जाता बल्कि इनके आधार पर बने Index Fund या ETF के जरिए निवेश किया जा सकता है। यही वजह है कि नए निवेशकों के लिए दोनों के अंतर को समझना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    Nifty 50 में 50 बड़ी और प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। NSE के अनुसार यह 13 अलग अलग सेक्टरों को कवर करने वाला diversified index है और इसका इस्तेमाल Index Fund तथा ETF सहित कई निवेश उत्पादों के benchmark के रूप में किया जाता है। दूसरी तरफ Sensex में 30 बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन शामिल होता है। इस लिहाज से दोनों इंडेक्स large cap कंपनियों में निवेश का रास्ता देते हैं लेकिन Nifty 50 में कंपनियों की संख्या अधिक होने के कारण diversification थोड़ा ज्यादा मिलता है।

    अगर कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए पैसा लगाना चाहता है तो Nifty 50 Index Fund को एक सरल विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। इसमें निवेशक को अलग अलग कंपनियों के शेयर खुद चुनने की जरूरत नहीं होती। Index Fund इंडेक्स के प्रदर्शन को ट्रैक करने की कोशिश करता है। SIP के जरिए हर महीने एक तय राशि निवेश करने से बाजार के उतार चढ़ाव के दौरान अलग अलग स्तरों पर निवेश होता रहता है।

    Sensex आधारित Index Fund भी इसी तरह निवेश का विकल्प देता है। इसमें 30 बड़ी कंपनियों का exposure मिलता है। इसलिए ऐसा नहीं है कि Sensex में निवेश करना गलत है। अगर किसी निवेशक के पास पहले से Sensex आधारित फंड है तो केवल Nifty में अधिक कंपनियां होने की वजह से उसे बदलना जरूरी नहीं है। दोनों ही विकल्पों में असली महत्व निवेश की अवधि लागत और निवेशक की जोखिम क्षमता का होता है।

    मौजूदा समय में बाजार में उतार चढ़ाव भी बना हुआ है। 11 सितंबर 2026 को Nifty 50 करीब 23398 के स्तर पर बंद हुआ जबकि Sensex करीब 74782 पर रहा। दोनों प्रमुख इंडेक्स लगातार पांचवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुए। मध्य पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने बाजार की चिंता बढ़ाई है।

    ऐसे माहौल में निवेशकों के लिए एक साथ पूरी रकम बाजार में लगाने के बजाय चरणबद्ध निवेश या SIP का रास्ता उपयोगी हो सकता है। अगस्त 2026 में भारतीय म्यूचुअल फंड में SIP के जरिए निवेश रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था जो बताता है कि बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक नियमित निवेश की रणनीति अपना रहे हैं।

    हालांकि किसी भी इंडेक्स में निवेश से मुनाफे की गारंटी नहीं होती। बाजार में गिरावट आने पर Index Fund की वैल्यू भी घट सकती है। इसलिए निवेश का फैसला अपनी आर्थिक स्थिति निवेश की अवधि और जोखिम सहने की क्षमता देखकर लेना चाहिए। सामान्य तौर पर अगर कोई व्यक्ति लंबी अवधि के लिए सरल और diversified equity investment चाहता है तो Nifty 50 आधारित Index Fund एक मजबूत विकल्प हो सकता है। वहीं Sensex आधारित फंड भी समान उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। निवेश से पहले फंड का expense ratio tracking error और निवेश की शर्तों को जरूर देखना चाहिए।

  • भारत में एथेनॉल आपूर्ति 895 करोड़ लीटर पहुंची, कुल मात्रा में अनाज आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत दर्ज हुई

    भारत में एथेनॉल आपूर्ति 895 करोड़ लीटर पहुंची, कुल मात्रा में अनाज आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत दर्ज हुई

    नई दिल्ली ।भारत में एथेनॉल सप्लाई ईयर 2025-26 के दौरान एथेनॉल की आपूर्ति में अनाज आधारित कच्चे माल की भूमिका लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। अगस्त 2026 के अंत तक देश में कुल 895 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। यह मात्रा इस अवधि के लिए अनुबंधित 1,048 करोड़ लीटर एथेनॉल का करीब 85 प्रतिशत है।

    उपलब्ध उद्योग आंकड़ों के अनुसार, कुल 895 करोड़ लीटर आपूर्ति में अनाज आधारित फीडस्टॉक से 624 करोड़ लीटर एथेनॉल उपलब्ध कराया गया। वहीं, चीनी आधारित स्रोतों से 271 करोड़ लीटर की आपूर्ति हुई। इस तरह कुल एथेनॉल आपूर्ति में अनाज आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत रही।

    अनाज आधारित स्रोतों में मक्का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा। अगस्त के अंत तक मक्का से 345 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की गई। इसके बाद भारतीय खाद्य निगम से प्राप्त अधिशेष चावल का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिससे 214 करोड़ लीटर एथेनॉल तैयार किया गया। इसके अलावा क्षतिग्रस्त खाद्यान्नों से 64 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ।

    उद्योग संगठन के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन में मक्का और अधिशेष चावल के बढ़ते इस्तेमाल से उत्पादन व्यवस्था को अधिक स्थिरता मिल रही है। इससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलने के साथ किसानों के लिए कृषि उपज के नए उपयोग के अवसर भी बन रहे हैं।

    चीनी आधारित स्रोतों की भी एथेनॉल आपूर्ति में अहम भूमिका बनी हुई है। इस श्रेणी में गन्ने के रस से सबसे अधिक 149 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। बी-हेवी शीरे से 107 करोड़ लीटर और सी-हेवी शीरे से 15 करोड़ लीटर एथेनॉल उपलब्ध कराया गया।

    उद्योग के अनुसार, अलग-अलग फीडस्टॉक से एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से देश की आपूर्ति शृंखला अधिक लचीली हो रही है। इससे किसी एक फसल या कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। एथेनॉल उत्पादन के लिए कई स्रोतों के इस्तेमाल को देश के कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन की उपमहानिदेशक भारती बालाजी ने कहा कि अब तक आपूर्ति किए गए 895 करोड़ लीटर एथेनॉल में करीब 70 प्रतिशत हिस्सा अनाज आधारित स्रोतों का है। इसमें मक्का और भारतीय खाद्य निगम का अधिशेष चावल प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, चीनी आधारित स्रोत भी आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि विभिन्न फीडस्टॉक के इस्तेमाल से भारत के एथेनॉल कार्यक्रम को मजबूती मिलती है। इससे कृषि उपज का बेहतर इस्तेमाल संभव होता है और उत्पादन से जुड़े जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।

    हालांकि, उद्योग ने एथेनॉल उत्पादन क्षमता और आपूर्ति बढ़ने के साथ स्थिर और अनुमानित मांग सुनिश्चित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। उद्योग का मानना है कि आने वाले वर्षों में मांग की स्थिरता का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो सकता है।

    भारत की एथेनॉल खपत का दायरा भी केवल पेट्रोल में मिश्रण तक सीमित नहीं रखने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों, कंप्रेस्ड बायोगैस, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और अन्य औद्योगिक उपयोगों में एथेनॉल की खपत बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है। ऐसे में उत्पादन के साथ विभिन्न क्षेत्रों में मांग बढ़ाना भी एथेनॉल व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • Zomato COD Charges: कैश ऑन डिलीवरी चुनने वाले ग्राहकों से 5 से 20 रुपये तक अतिरिक्त शुल्क वसूलेगी कंपनी

    Zomato COD Charges: कैश ऑन डिलीवरी चुनने वाले ग्राहकों से 5 से 20 रुपये तक अतिरिक्त शुल्क वसूलेगी कंपनी

    नई दिल्ली ।ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने कैश ऑन डिलीवरी यानी COD विकल्प चुनने वाले ग्राहकों के लिए अतिरिक्त शुल्क लागू करना शुरू किया है। अब डिलीवरी के समय नकद भुगतान करने वाले ग्राहकों को ऑर्डर के सामान्य बिल के अलावा 5 से 20 रुपये तक अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ सकती है। कंपनी के ऐप पर बिल विवरण में यह राशि ‘पे ऑन डिलीवरी फीस’ के नाम से अलग से दिखाई जा रही है।

    यह शुल्क केवल उन ग्राहकों पर लागू हो रहा है, जो ऑनलाइन भुगतान करने के बजाय ऑर्डर की डिलीवरी के समय नकद भुगतान का विकल्प चुनते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ज्यादातर मामलों में यह शुल्क 5 रुपये है। हालांकि, कुछ ऑर्डरों में ग्राहकों से 7 रुपये और कुछ मामलों में 20 रुपये तक भी वसूले गए हैं। शुल्क की राशि अलग-अलग ऑर्डर में अलग हो सकती है।

    ‘पे ऑन डिलीवरी फीस’ को जोमैटो के पहले से लागू दूसरे शुल्कों से अलग रखा गया है। ग्राहकों को प्लेटफॉर्म शुल्क के अलावा रेस्तरां की ओर से लिया जाने वाला पैकेजिंग शुल्क और जीएसटी भी देना होता है। ऐसे में कैश ऑन डिलीवरी का विकल्प चुनने पर कुल बिल में यह अतिरिक्त राशि भी जुड़ रही है। वहीं, ऑनलाइन भुगतान करने वाले ग्राहकों से इस शुल्क की वसूली नहीं की जा रही है।

    जोमैटो के लिए यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब कंपनी फूड डिलीवरी कारोबार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी आय के नए स्रोतों को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। कंपनी रोजाना करीब 23 लाख से 25 लाख फूड ऑर्डर प्रोसेस करती है। इतने बड़े ऑर्डर वॉल्यूम के बीच प्रति ऑर्डर छोटी अतिरिक्त फीस भी कंपनी के राजस्व पर असर डाल सकती है।

    फूड डिलीवरी बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। रैपिडो का फूड डिलीवरी ब्रांड ओनली तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। इसके अलावा फ्लिपकार्ट भी अपने ‘ईट इन’ फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म का परीक्षण कर रहा है। ऐसे माहौल में जोमैटो अपने कारोबार से आय बढ़ाने के लिए भुगतान के तरीके से जुड़े शुल्क का इस्तेमाल कर रही है।

    फूड डिलीवरी कंपनियों ने वर्ष 2023 में पहली बार प्लेटफॉर्म फीस लागू करना शुरू किया था। इसकी शुरुआत स्विगी ने 2 रुपये प्रति ऑर्डर के शुल्क से की थी। इसके बाद जोमैटो ने भी प्लेटफॉर्म फीस लागू की। समय के साथ कंपनी ने इस शुल्क में बढ़ोतरी की और इस वर्ष इसे 12.50 रुपये से बढ़ाकर 14.99 रुपये प्रति ऑर्डर कर दिया। इस शुल्क पर जीएसटी अलग से लिया जाता है।

    मौजूदा ऑर्डर वॉल्यूम को देखते हुए प्रति ऑर्डर शुल्क में मामूली बढ़ोतरी भी कंपनी के लिए सालाना आधार पर अतिरिक्त आय का जरिया बन सकती है। कैश ऑन डिलीवरी फीस इसी दिशा में एक और कदम है, जिसमें भुगतान के विकल्प के आधार पर ग्राहकों से अलग राशि ली जा रही है।

    जोमैटो हाल के महीनों में लागत नियंत्रण और परिचालन ढांचे में बदलाव पर भी काम कर रही है। अगस्त में सामने आई जानकारी के अनुसार, कंपनी ने संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा के बाद करीब 250 कर्मचारियों की छंटनी की थी। इसी प्रक्रिया के तहत हैदराबाद स्थित कस्टमर डिलाइट ऑपरेशंस को बंद करने और बची हुई इन-हाउस ग्राहक सहायता गतिविधियों को गुरुग्राम में एकीकृत करने का फैसला लिया गया था।

  • Crude Oil Price Rise: कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5 प्रतिशत पार होने का अनुमान, एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ाने को कहा

    Crude Oil Price Rise: कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5 प्रतिशत पार होने का अनुमान, एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ाने को कहा

    नई दिल्ली ।वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में तेजी के बीच भारत में महंगाई को लेकर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है। एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत या उससे भी ऊपर जा सकती है। ऐसे में रिपोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक से मौद्रिक नीति के स्तर पर दरों में बढ़ोतरी करने की सलाह दी है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक को अक्टूबर में रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी करनी चाहिए। इसके बाद दिसंबर में भी 25 आधार अंक की अतिरिक्त वृद्धि का सुझाव दिया गया है। इस तरह कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी की जरूरत बताई गई है। इसके पीछे मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर पड़ने वाला संभावित असर है।

    एसबीआई रिसर्च के अनुमान के मुताबिक अगस्त में महंगाई दर करीब 4.8 से 4.9 प्रतिशत के बीच रह सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहने पर आने वाले महीनों में स्थिति बदल सकती है। रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक रहने की संभावना बन सकती है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल का बेंचमार्क 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। अगले 15 दिनों में इसके 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की उम्मीद भी जताई गई है। कच्चे तेल की कीमतों में इस तरह की तेजी का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में लागत के रूप में दिखाई देने लगा है।

    रिपोर्ट के मुताबिक खुदरा महंगाई बढ़ने के शुरुआती संकेत पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बेवरेज, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं। इन क्षेत्रों में लागत का बढ़ता बोझ अब ग्राहकों तक पहुंचने की स्थिति बन रही है। रिपोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों को ब्याज दरों में कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी के लिए अनुकूल आधार माना है।

    लिक्विडिटी के मोर्चे पर रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल में जुटाए गए फंड काफी हद तक बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग जरूरतों को पूरा करते हैं। इसके साथ ही क्रेडिट की मजबूत मांग और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ के मजबूत आंकड़ों को देखते हुए मौजूदा तेजी में धीरे-धीरे कमी आने की उम्मीद जताई गई है।

    रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि क्रेडिट की मांग अपेक्षा के अनुरूप पूरी होती है तो वित्त वर्ष 2027 के अंत तक सिस्टम में लिक्विडिटी सामान्य स्तर पर लौट सकती है। रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2027 के बाकी समय में लिक्विडिटी धीरे-धीरे कम होने की संभावना है और मार्च 2027 तक इसका स्तर आदर्श रूप से 6 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए।

    बॉन्ड बाजार को लेकर भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण अनुमान दिया गया है। कई संकेतों के आधार पर 10 साल की भारतीय बेंचमार्क यील्ड के 7.15 प्रतिशत या उससे ऊपर जाने की संभावना जताई गई है।

    वैश्विक स्तर पर भी यील्ड में तेजी का रुझान बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक कई प्रमुख यील्ड पिछले दस वर्षों के उच्चतम स्तर से ऊपर जा रहे हैं। अमेरिकी यील्ड में भी तेजी देखने को मिल रही है और 10 साल की यील्ड करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि 30 साल की यील्ड घटकर 5.40 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है।

  • ब्रिक्स सम्मेलन में अफ्रीकी कारोबारी बोले, पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य समय से पहले हासिल करेगा

    ब्रिक्स सम्मेलन में अफ्रीकी कारोबारी बोले, पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य समय से पहले हासिल करेगा

    नई दिल्ली ।भारत में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच अफ्रीकी कारोबारियों ने देश की आर्थिक प्रगति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना की है। नाइजीरिया के डिप्लोमैटिक कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन के चेयरमैन इदेहाई फ्रेडरिक ने कहा कि भारत जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए देश ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर सकता है।

    इदेहाई फ्रेडरिक के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक शानदार नेता हैं और उनके पास देश के विकास को लेकर बड़ा विजन है। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में हो रही तेज प्रगति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उठाए जा रहे कदमों, नीतियों और साझेदारी में दिखाई देती है। उनके मुताबिक ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान भी भारत के नेतृत्व और दृष्टिकोण का प्रभाव स्पष्ट नजर आ रहा है।

    फ्रेडरिक ने भारत और नाइजीरिया के संबंधों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देश दशकों से मित्र रहे हैं और दोनों के बीच कारोबार का भी बड़ा आधार है। उन्होंने भारत को नाइजीरिया के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बताते हुए दोनों देशों के बीच व्यापार में आगे और बढ़ोतरी की उम्मीद जताई।

    उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी आर्थिक प्रगति के आधार पर उनका मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को भारत लक्ष्य से पहले प्राप्त कर सकता है।

    ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत और अफ्रीकी देशों के बीच संबंधों को लेकर भी चर्चा सामने आई। अबिसीनिया बिजनेस नेटवर्क के प्रबंध निदेशक डैनियल तिरुनेह ने भारत और इथियोपिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों देश व्यापार, निवेश, नवाचार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं।

    डैनियल तिरुनेह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इथियोपिया यात्रा का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार कुछ महीने पहले हुई इस यात्रा से भारत और इथियोपिया के संबंधों को नई ऊर्जा मिली। उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव ब्रिक्स के मंच पर भी दिखाई दे रहा है और इथियोपिया के लिए यह एक महत्वपूर्ण मंच है।

    भारत इस वर्ष 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। ब्रिक्स में वर्तमान में 11 सदस्य देश और 10 साझेदार देश हैं। सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि नई दिल्ली पहुंच रहे हैं। सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बीच भारत की भूमिका और उसकी साझेदारियों पर भी ध्यान केंद्रित है।

    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को देखते हुए राजधानी नई दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के लिए 15,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके अलावा पैरामिलिट्री फोर्स की 200 कंपनियां भी सुरक्षा व्यवस्था में लगाई गई हैं।

    अफ्रीकी कारोबारियों की टिप्पणियों में भारत की आर्थिक प्रगति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और ब्रिक्स के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को प्रमुखता दी गई। नाइजीरिया और इथियोपिया से जुड़े प्रतिनिधियों ने भारत के साथ व्यापार, निवेश, नवाचार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।

    इस बीच नई दिल्ली में हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की मेजबानी में आयोजित हो रहा है। सदस्य और साझेदार देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के कारण राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है।

  • आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर

    आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर


    नई दिल्ली ।
    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 44.9 अरब डॉलर बढ़कर 785.7 अरब डॉलर हो गया है। इस तेज बढ़ोतरी के साथ भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में रूस को पीछे छोड़ दिया है और अब चीन, जापान तथा स्विट्जरलैंड के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बढ़ोतरी को मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से डॉलर आकर्षित करने के लिए शुरू की गई एफसीएनआर (बी) जमा योजना के तहत आए बड़े फंड से जोड़ा गया है।

    785.7 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत के लिए महत्वपूर्ण बढ़त है। इस दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 44.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस बढ़ोतरी ने भारत को वैश्विक स्तर पर विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले प्रमुख देशों की सूची में रूस से आगे कर दिया है।

    विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में हालांकि एक समान वृद्धि नहीं हुई। सप्ताह के दौरान सोने के भंडार में 2.59 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई और यह घटकर 113.81 अरब डॉलर रह गया। सोने की कीमतों में गिरावट को इसके पीछे प्रमुख कारण बताया गया है। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य हिस्से में मजबूती के कारण कुल भंडार में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए अधिक गुंजाइश मिलती है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध होने से केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।

    मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के कारण आरबीआई को स्पॉट और फॉरवर्ड करेंसी मार्केट में भी हस्तक्षेप करने की अधिक क्षमता मिलती है। जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर जारी करके रुपये की कीमत में तेज गिरावट को रोकने की कोशिश कर सकता है। इस तरह विदेशी मुद्रा भंडार बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में काम करता है।

    इस बीच, विदेशी मुद्रा के बड़े पैमाने पर देश में आने से बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त लिक्विडिटी जमा हुई है। आरबीआई ने इसी अतिरिक्त तरलता को कम करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ बिक्री की घोषणा की है।

    केंद्रीय बैंक यह बिक्री तीन अलग-अलग किश्तों में करेगा। पहली नीलामी 17 सितंबर को होगी, जिसमें 50,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज बेची जाएंगी। इसके बाद 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये और 28 सितंबर को शेष 25,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री की जाएगी।

    आरबीआई के अनुसार, इन नीलामियों को मल्टी-सिक्योरिटी नीलामी के माध्यम से मल्टीपल-प्राइस मेथड के तहत किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य विदेशी मुद्रा के भारी इनफ्लो से बैंकिंग सिस्टम में बनी अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करना है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में हुई 44.9 अरब डॉलर की साप्ताहिक बढ़ोतरी के बाद भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है। रूस को पीछे छोड़कर चौथे स्थान पर पहुंचना देश के विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बड़ी वृद्धि को दर्शाता है।

  • शेयर मार्केट में कमाई के लिए कहां लगाएं पैसा जोखिम और रिटर्न समझकर चुनें ये निवेश विकल्प नए निवेशकों के लिए जरूरी जानकारी

    शेयर मार्केट में कमाई के लिए कहां लगाएं पैसा जोखिम और रिटर्न समझकर चुनें ये निवेश विकल्प नए निवेशकों के लिए जरूरी जानकारी


    नई दिल्ली ।
    शेयर मार्केट में निवेश करके पैसा बढ़ाने की इच्छा रखने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खासकर युवा निवेशक अब बैंक एफडी और पारंपरिक बचत विकल्पों के साथ शेयर बाजार को भी अपने निवेश पोर्टफोलियो का हिस्सा बना रहे हैं। हालांकि शेयर मार्केट में निवेश करने से पहले यह समझना बेहद जरूरी है कि हर शेयर और हर निवेश विकल्प का जोखिम एक जैसा नहीं होता। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि आखिर शेयर मार्केट में पैसा कहां लगाया जाए और किस तरह का निवेश बेहतर हो सकता है।

    शेयर बाजार में निवेश का सबसे सीधा तरीका कंपनियों के शेयर खरीदना है। जब किसी कंपनी के शेयर खरीदे जाते हैं तो निवेशक उस कंपनी में हिस्सेदारी लेता है। कंपनी के प्रदर्शन और बाजार की स्थिति के आधार पर शेयर की कीमत ऊपर या नीचे जा सकती है। अच्छे कारोबार वाली मजबूत कंपनियों के शेयर लंबे समय में बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं लेकिन शेयर बाजार में रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती। इसलिए केवल किसी के कहने पर शेयर खरीदने के बजाय कंपनी के कारोबार वित्तीय प्रदर्शन कर्ज और भविष्य की संभावनाओं को समझना जरूरी है।

    नए निवेशकों के लिए Large Cap कंपनियां अपेक्षाकृत स्थिर विकल्प मानी जाती हैं क्योंकि इनमें आमतौर पर बड़ी और स्थापित कंपनियां शामिल होती हैं। वहीं Mid Cap और Small Cap कंपनियों में तेजी से बढ़ने की संभावना हो सकती है लेकिन इनके साथ उतार चढ़ाव और जोखिम भी ज्यादा हो सकता है। इसलिए निवेशक को अपनी जोखिम क्षमता और निवेश की अवधि के हिसाब से ही इन श्रेणियों में पैसा लगाने का फैसला करना चाहिए।

    अगर किसी निवेशक को अलग अलग कंपनियों के शेयर चुनने में परेशानी होती है तो म्यूचुअल फंड एक विकल्प हो सकता है। म्यूचुअल फंड में निवेशकों का पैसा अलग अलग सिक्योरिटीज में लगाया जाता है और इसका प्रबंधन फंड मैनेजर करते हैं। इक्विटी म्यूचुअल फंड में शेयर बाजार से जुड़ा जोखिम रहता है लेकिन अलग अलग कंपनियों में निवेश होने के कारण पोर्टफोलियो में विविधता मिल सकती है। लंबी अवधि के लिए निवेश करने वाले लोग Systematic Investment Plan यानी SIP के जरिए नियमित रकम निवेश करने पर भी विचार कर सकते हैं।

    शेयर मार्केट में निवेश करते समय पूरा पैसा एक ही शेयर या एक ही सेक्टर में लगाना जोखिम बढ़ा सकता है। अलग अलग कंपनियों और सेक्टर में निवेश करके पोर्टफोलियो को संतुलित रखने की कोशिश की जा सकती है। इसके साथ ही निवेश की अवधि भी महत्वपूर्ण है। अगर पैसा जल्द ही चाहिए तो बाजार के उतार चढ़ाव के कारण परेशानी हो सकती है। लंबी अवधि के निवेश में बाजार की छोटी अवधि की हलचल का असर कम करने का मौका मिल सकता है हालांकि इसमें भी जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता।

    निवेश करने से पहले अपनी आय बचत और वित्तीय लक्ष्य को समझना जरूरी है। आपातकालीन जरूरतों के लिए अलग से पर्याप्त रकम रखने के बाद ही बाजार में निवेश करना बेहतर माना जाता है। किसी शेयर के पुराने रिटर्न को देखकर भविष्य में भी उसी तरह का रिटर्न मिलने की उम्मीद करना सही रणनीति नहीं है। निवेश से पहले कंपनी और निवेश उत्पाद की जानकारी समझें और जरूरत पड़ने पर SEBI पंजीकृत निवेश सलाहकार से सलाह लें। सबसे जरूरी बात यह है कि शेयर बाजार में तेजी से पैसा कमाने के बजाय अनुशासित तरीके से लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखकर निवेश की रणनीति बनानी चाहिए।

  • सिर्फ ₹20 सालाना में ₹2 लाख का दुर्घटना बीमा, जानिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की पात्रता और जरूरी शर्तें

    सिर्फ ₹20 सालाना में ₹2 लाख का दुर्घटना बीमा, जानिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की पात्रता और जरूरी शर्तें

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना देश में उपलब्ध कम प्रीमियम वाली सरकारी दुर्घटना बीमा योजनाओं में शामिल है। इस योजना की सबसे खास बात इसका बेहद कम सालाना प्रीमियम है। इसके लिए पात्र व्यक्ति को केवल 20 रुपये प्रति वर्ष का भुगतान करना होता है। अगर इस रकम को रोजाना के खर्च के हिसाब से देखा जाए तो यह करीब 5.5 पैसे प्रतिदिन बैठती है। यानी इसका दैनिक खर्च 50 पैसे से भी काफी कम है।

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत बीमित व्यक्ति को दुर्घटना से जुड़े मामलों में आर्थिक सुरक्षा मिलती है। योजना के अंतर्गत अधिकतम 2 लाख रुपये का बीमा कवर उपलब्ध है। यदि बीमित व्यक्ति की दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है या वह पूर्ण रूप से दिव्यांग हो जाता है, तो 2 लाख रुपये की बीमा राशि का प्रावधान है।

    दुर्घटना के कारण आंशिक रूप से दिव्यांग होने की स्थिति में बीमा कवर की राशि 1 लाख रुपये है। इस तरह योजना दुर्घटना से होने वाली मृत्यु के साथ-साथ पूर्ण और आंशिक दिव्यांगता की स्थिति में भी आर्थिक सहायता का प्रावधान करती है।

    इस योजना का लाभ लेने के लिए आयु संबंधी पात्रता भी तय है। 18 वर्ष से लेकर 70 वर्ष की उम्र तक के व्यक्ति इसमें शामिल हो सकते हैं। इसके लिए संबंधित व्यक्ति का बैंक या डाकघर में बचत खाता होना जरूरी है। योजना का लाभ लेने वाले व्यक्ति के खाते से निर्धारित प्रीमियम की राशि ऑटो-डेबिट माध्यम से तय समय पर काटी जाती है।

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना की बीमा अवधि एक जून से अगले वर्ष 31 मई तक रहती है। यह वार्षिक आधार पर नवीनीकृत होने वाली योजना है। यानी योजना के तहत बीमा कवर एक साल की अवधि के लिए रहता है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इसे आगे जारी रखा जा सकता है।

    इस बीमा योजना को सरकारी स्तर पर किफायती दुर्घटना बीमा सुविधा के तौर पर उपलब्ध कराया गया है। योजना के तहत बीमा सेवाएं सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध होती हैं। इसका उद्देश्य कम प्रीमियम में दुर्घटना से संबंधित बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराना है।

    प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना को समझने के लिए इसके प्रीमियम और कवर के बीच का अंतर भी महत्वपूर्ण है। केवल 20 रुपये सालाना प्रीमियम के बदले पात्र व्यक्ति को दुर्घटना में मृत्यु या पूर्ण दिव्यांगता की स्थिति में 2 लाख रुपये तक का बीमा कवर मिलता है। वहीं आंशिक दिव्यांगता की स्थिति में 1 लाख रुपये का कवर निर्धारित है।

    इस योजना की पात्रता में उम्र और बचत बैंक खाते की शर्त प्रमुख है। 18 से 70 वर्ष के बचत बैंक खाताधारक इस योजना के लिए पात्र हो सकते हैं। योजना की अवधि एक जून से 31 मई तक रहती है और प्रीमियम की राशि बैंक खाते से ऑटो-डेबिट के जरिए काटी जाती है।

  • अब जमीन का भी बनेगा Aadhaar: हर संपत्ति को मिलेगा 14 अंकों का यूनिक नंबर, सबकुछ होगा डिजिटल

    अब जमीन का भी बनेगा Aadhaar: हर संपत्ति को मिलेगा 14 अंकों का यूनिक नंबर, सबकुछ होगा डिजिटल


    नई दिल्ली। अब जमीन की पहचान भी डिजिटल तरीके से होगी। केंद्र सरकार ने देशभर में भूमि रिकॉर्ड को आधुनिक और एकीकृत करने की दिशा में डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) 3.0 की शुरुआत की है। इसके तहत ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों की जमीनों से जुड़े रिकॉर्ड, नक्शे, रजिस्ट्रेशन और अन्य जानकारियों को एक डिजिटल सिस्टम से जोड़ा जाएगा। सरकार ने गुरुवार को DILRMP के तीसरे चरण की विस्तृत गाइडलाइन जारी की।

    योजना के लिए 2026 से 2031 के दौरान 565.5 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य भूमि रिकॉर्ड, नक्शे, रजिस्ट्रेशन और उससे जुड़े आंकड़ों को GIS आधारित डिजिटल फ्रेमवर्क में लाना है। सरकार का मानना है कि एकीकृत डिजिटल व्यवस्था से जमीन से जुड़े रिकॉर्ड की पहचान और जांच आसान होगी तथा धोखाधड़ी और विवादों को कम करने में मदद मिलेगी।

    केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने योजना के लॉन्च के दौरान कहा कि DILRMP 3.0 केवल व्यक्तिगत रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश को एक यूनिफाइड लैंड मैनेजमेंट सिस्टम की ओर ले जाएगा। उनके मुताबिक, इससे किसानों को संस्थागत ऋण हासिल करने में आसानी होगी और सरकारी कार्यालयों के बार-बार चक्कर लगाने की जरूरत भी कम होगी।

    GIS आधारित ‘लैंड स्टैक’ बनेगा

    DILRMP 3.0 की सबसे अहम पहल GIS-इनेबल्ड लैंड स्टैक है। यह एक यूनिफाइड डिजिटल फ्रेमवर्क होगा, जिसमें जियो-रेफरेंस्ड कैडस्ट्रल मैप, अधिकारों के रिकॉर्ड, संपत्ति रजिस्ट्रेशन और भूमि से जुड़े अदालती मामलों जैसी जानकारियों को एक ही डिजिटल इंटरफेस पर जोड़ा जाएगा।

    हर राज्य API के माध्यम से अलग-अलग भूमि डेटासेट और सिस्टम को आपस में जोड़कर अपना स्टेट लैंड स्टैक तैयार कर सकेगा। यही राज्य स्तरीय स्टैक आगे चलकर नेशनल लैंड स्टैक की नींव बनेंगे। इससे संबंधित अधिकारियों को भूमि से जुड़े डेटा और सिस्टम पर बेहतर नियंत्रण मिल सकेगा।

    हर जमीन को मिलेगा 14 अंकों का यूनिक नंबर

    योजना के तहत देश की हर जमीन को 14 अंकों का यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर देने की व्यवस्था की जाएगी। इसका उद्देश्य प्रत्येक संपत्ति की स्पष्ट डिजिटल पहचान सुनिश्चित करना है। सरकार को उम्मीद है कि इससे जमीन की पहचान को लेकर होने वाली गड़बड़ियों और धोखाधड़ी पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

    75 सब-रजिस्ट्रार कार्यालय बनेंगे सर्विस सेंटर

    जमीन और संपत्ति के रजिस्ट्रेशन से जुड़ी सेवाओं को भी आधुनिक बनाया जाएगा। पासपोर्ट सेवा केंद्रों की तर्ज पर ज्यादा भीड़ वाले 75 सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों को डिजिटल सुविधाओं से लैस कर आधुनिक सर्विस सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा।

    इससे लोगों को रजिस्ट्रेशन से जुड़ी सेवाएं एक बेहतर और व्यवस्थित व्यवस्था के तहत उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी।

    पुश्तैनी जमीन के पुराने रिकॉर्ड भी होंगे डिजिटल

    भूमि और संपत्ति के पुराने रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड को भी व्यवस्थित तरीके से स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जाएगा। इसका उद्देश्य पुराने दस्तावेजों को सुरक्षित रखना, विरासत से जुड़े अधिकारों की रक्षा करना और पुश्तैनी जमीन को लेकर होने वाले विवादों को कम करना है।

    डिजिटल होगी रजिस्ट्रेशन रिपोजिटरी

    योजना में रजिस्ट्रेशन रिपोजिटरी भी विकसित की जाएगी। इसमें रजिस्टर्ड दस्तावेजों के साथ संपत्ति से जुड़ी देनदारियों और ऋण की जानकारी सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। इससे जमीन के स्वामित्व की जांच, पुराने खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड और संपत्ति से संबंधित जरूरी जांच-पड़ताल आसान हो सकेगी।

    पेपरलेस होंगे राजस्व न्यायालय

    राजस्व अदालतों को भी डिजिटल भूमि रिकॉर्ड से जोड़ा जाएगा। इसके लिए राजस्व न्यायालय मामला प्रबंधन प्रणाली (RCCMS) को आधुनिक बनाया जाएगा। इसे सीधे भूमि रिकॉर्ड से जोड़ने का उद्देश्य लंबित मामलों को कम करना और म्यूटेशन से जुड़े मामलों के निपटारे में तेजी लाना है।

    शहरों में तैयार होंगे डिजिटल लैंड रिकॉर्ड

    शहरी क्षेत्रों के लिए NAKSHA (नक्शा) पायलट प्रोजेक्ट को भी गति दी जाएगी। इसके तहत सटीक और GIS-इनेबल्ड शहरी भूमि रिकॉर्ड तैयार किए जाएंगे। शहरी संपत्तियों के लिए Urban Property Card यानी UrPro Card जारी किए जाने की व्यवस्था भी की जाएगी।

    इस तरह DILRMP 3.0 के जरिए जमीन के नक्शे से लेकर मालिकाना हक, रजिस्ट्रेशन और न्यायालय से जुड़े रिकॉर्ड तक को एक डिजिटल व्यवस्था में लाने की तैयारी है। सरकार का लक्ष्य है कि जमीन से जुड़े कामकाज में पारदर्शिता बढ़े, रिकॉर्ड तक पहुंच आसान हो और संपत्ति विवाद व धोखाधड़ी के मामलों में कमी आए।