Category: Economy

  • पश्चिम एशिया तनाव से भारतीय शेयर बाजार पर बड़ा असर, सेंसेक्स 561 अंक टूटा, निफ्टी 24,100 के नीचे फिसला, तीन दिन की तेजी थमी

    पश्चिम एशिया तनाव से भारतीय शेयर बाजार पर बड़ा असर, सेंसेक्स 561 अंक टूटा, निफ्टी 24,100 के नीचे फिसला, तीन दिन की तेजी थमी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों का असर मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन घरेलू बाजार गिरावट के साथ बंद हुआ और लगातार तीन सत्रों से जारी तेजी का सिलसिला टूट गया। निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाई, जिसके चलते अधिकांश सेक्टरों में बिकवाली हावी रही। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक अनिश्चितता ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया।

    कारोबार समाप्त होने पर बीएसई सेंसेक्स 561.46 अंक यानी 0.72 प्रतिशत की गिरावट के साथ 77,054.94 अंक पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 इंडेक्स 158.95 अंक यानी 0.66 प्रतिशत टूटकर 24,052.05 अंक पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार से ही बाजार पर दबाव बना रहा और दिनभर बिकवाली का माहौल देखने को मिला। निवेशकों की सतर्क रणनीति के कारण प्रमुख सूचकांक पूरे सत्र में लाल निशान में कारोबार करते रहे।

    बाजार की व्यापक तस्वीर भी कमजोर रही। कारोबार के दौरान लगभग 1,422 शेयरों में बढ़त दर्ज हुई, जबकि 2,632 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए। करीब 190 शेयरों में कोई विशेष बदलाव नहीं आया। व्यापक बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.44 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे यह संकेत मिला कि केवल बड़ी कंपनियों ही नहीं, बल्कि मझोली और छोटी कंपनियों के शेयरों पर भी बिकवाली का दबाव बना रहा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो रियल्टी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहा और इसमें करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा पीएसयू बैंक, ऑटो, बैंकिंग और आईटी सेक्टरों में भी उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली। प्राइवेट बैंक, ऑयल एंड गैस, एफएमसीजी, मीडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े शेयर भी दबाव में रहे। हालांकि फार्मा और मेटल सेक्टर ने बाजार को कुछ राहत दी। फार्मा सूचकांक में लगभग 1 प्रतिशत और मेटल इंडेक्स में 0.60 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जिससे इन क्षेत्रों में खरीदारी का रुझान बना रहा।

    निफ्टी 50 में शामिल अधिकांश शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। एचसीएल टेक्नोलॉजीज, श्रीराम फाइनेंस, एचडीएफसी लाइफ, टाटा मोटर्स और इंटरग्लोब एविएशन के शेयर प्रमुख नुकसान वाले शेयरों में शामिल रहे। दूसरी ओर भारती एयरटेल, अपोलो हॉस्पिटल्स, सन फार्मा, टीसीएस और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के शेयरों में मजबूती देखने को मिली और ये दिन के प्रमुख बढ़त वाले शेयर रहे। इससे स्पष्ट हुआ कि बाजार में चुनिंदा रक्षात्मक क्षेत्रों में निवेशकों की रुचि बनी रही।

    विदेशी मुद्रा बाजार में भी दबाव देखने को मिला। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 57 पैसे कमजोर होकर 96.25 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 4 प्रतिशत से अधिक उछलकर करीब 87 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए महंगाई और व्यापार घाटे की चिंता बढ़ा सकती हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आने वाले कारोबारी सत्रों में भी भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बना रह सकता है।

  • प्रत्यक्ष कर संग्रह में मजबूत उछाल, चालू वित्त वर्ष में 7.74 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा कलेक्शन, अर्थव्यवस्था की मजबूती के मिले संकेत

    प्रत्यक्ष कर संग्रह में मजबूत उछाल, चालू वित्त वर्ष में 7.74 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा कलेक्शन, अर्थव्यवस्था की मजबूती के मिले संकेत


    नई दिल्ली ।
    चालू वित्त वर्ष में भारत के प्रत्यक्ष कर संग्रह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे देश की आर्थिक गतिविधियों और कर संग्रह व्यवस्था की मजबूती के संकेत मिले हैं। 13 जुलाई तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह सालाना आधार पर 16.11 प्रतिशत बढ़कर 7.74 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस वृद्धि में कॉरपोरेट टैक्स, गैर-कॉरपोरेट टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) के बेहतर प्रदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कर संग्रह में यह तेजी सरकार के राजस्व आधार को मजबूत करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में जारी सकारात्मक गतिविधियों को भी दर्शाती है।

    आंकड़ों के अनुसार, रिफंड की राशि को समायोजित करने के बाद शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 16.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 6.51 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसी अवधि में करदाताओं को जारी किए गए रिफंड भी बढ़े हैं और उनका कुल मूल्य 1.22 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 14.57 प्रतिशत अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि एक ओर सरकार का कर संग्रह बढ़ रहा है तो दूसरी ओर पात्र करदाताओं को समय पर रिफंड भी जारी किए जा रहे हैं।

    कॉरपोरेट कर संग्रह में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। रिफंड समायोजन के बाद कॉरपोरेट टैक्स से प्राप्त राजस्व 2.40 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.97 लाख करोड़ रुपये था। वहीं गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह बढ़कर 3.85 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो एक वर्ष पहले 3.44 लाख करोड़ रुपये था। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियों के साथ-साथ व्यक्तिगत और अन्य श्रेणी के करदाताओं का योगदान भी लगातार बढ़ रहा है।

    यदि सकल कर संग्रह की बात करें तो कॉरपोरेट टैक्स 3.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 2.90 लाख करोड़ रुपये था। इसी प्रकार गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह भी बढ़कर 4.12 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष 3.58 लाख करोड़ रुपये था। यह वृद्धि विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में कारोबार और आय में सुधार का संकेत मानी जा रही है।

    सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स के मोर्चे पर भी मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया गया। रिफंड समायोजन के बाद एसटीटी का शुद्ध संग्रह 26,428.96 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 17,875.88 करोड़ रुपये था। शेयर बाजार में बढ़ी गतिविधियों और निवेशकों की भागीदारी को इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण माना जा रहा है। हालांकि अन्य करों के मद में इस अवधि के दौरान संग्रह मामूली रूप से नकारात्मक दर्ज किया गया।

    प्रत्यक्ष कर के इन आंकड़ों में कॉरपोरेट संस्थाओं के अलावा व्यक्तिगत करदाता, हिंदू अविभाजित परिवार, साझेदारी फर्म, व्यक्तियों के समूह, स्थानीय निकाय तथा अन्य कानूनी संस्थाओं द्वारा जमा किए गए कर भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष कर संग्रह में लगातार हो रही वृद्धि से सरकार को विकास योजनाओं और सार्वजनिक निवेश के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि देश की आर्थिक गतिविधियां स्थिर गति से आगे बढ़ रही हैं और घरेलू मांग तथा औद्योगिक प्रदर्शन राजस्व वृद्धि को समर्थन दे रहे हैं।

  • वैश्विक अस्थिरता और सप्लाई चेन संकट का असर, भारत में प्रीमियम हाउसिंग की कीमतों में 28% तक उछाल; महानगरों में मजबूत बनी मांग

    वैश्विक अस्थिरता और सप्लाई चेन संकट का असर, भारत में प्रीमियम हाउसिंग की कीमतों में 28% तक उछाल; महानगरों में मजबूत बनी मांग


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं, आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावट और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत का प्रीमियम आवास बाजार मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में देश के प्रमुख शहरों में प्रीमियम आवासों की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। ताजा बाजार विश्लेषण के अनुसार कई प्रमुख शहरों में प्रीमियम संपत्तियों के मूल्य में सालाना आधार पर 28 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च आय वर्ग के खरीदार अब बेहतर गुणवत्ता, विश्वसनीय डेवलपर और रणनीतिक लोकेशन वाली परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार मुंबई, नोएडा, गुरुग्राम, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे प्रमुख रियल एस्टेट बाजारों में प्रीमियम आवासों की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। निर्माणाधीन प्रीमियम परियोजनाओं की कीमतों में मुंबई में लगभग 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई, जबकि नोएडा में यह बढ़ोतरी 4 से 28 प्रतिशत के बीच रही। गुरुग्राम में करीब 2 प्रतिशत और बेंगलुरु में 3 से 11 प्रतिशत तक की वार्षिक वृद्धि देखी गई। यह संकेत देता है कि विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों और बेहतर कनेक्टिविटी वाले कॉरिडोर में निवेशकों तथा खरीदारों का भरोसा कायम है।

    तैयार प्रीमियम आवासों के बाजार में भी तेजी बनी हुई है। दिल्ली में लग्जरी फ्लोर और तैयार प्रीमियम घरों की औसत कीमतों में 10 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। बेंगलुरु में यह वृद्धि 8 से 10 प्रतिशत और मुंबई में 2 से 7 प्रतिशत के बीच रही। विशेषज्ञों का मानना है कि तैयार संपत्तियों की बढ़ती मांग उन खरीदारों से आ रही है जो तुरंत रहने योग्य, आधुनिक सुविधाओं से युक्त और उच्च गुणवत्ता वाले घरों की तलाश में हैं।

    रियल एस्टेट क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि बाजार अब केवल तेज कीमत वृद्धि पर आधारित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक मूल्य सृजन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रीमियम परियोजनाओं में बेहतर निर्माण गुणवत्ता, आधुनिक डिजाइन, ऊर्जा दक्षता, हरित सुविधाएं और वेलनेस आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे पहलुओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है। यही कारण है कि उच्च आय वर्ग के खरीदार अब केवल संपत्ति खरीदने के बजाय दीर्घकालिक निवेश और बेहतर जीवनशैली को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान का असर निर्माण सामग्री की लागत पर भी पड़ा है। कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि और लॉजिस्टिक लागत बढ़ने से परियोजनाओं की कुल लागत प्रभावित हुई है, जिसका असर प्रीमियम आवासों की कीमतों में भी दिखाई दिया। इसके बावजूद मांग में कमी नहीं आई है, क्योंकि बेहतर आय, मजबूत निवेश क्षमता और गुणवत्तापूर्ण आवासों की बढ़ती आवश्यकता इस वर्ग के बाजार को समर्थन दे रही है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि खरीदार अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो चुके हैं। वे परियोजना की लोकेशन, डेवलपर की विश्वसनीयता, निर्माण गुणवत्ता, भविष्य की संभावनाओं और उपलब्ध सुविधाओं का गहन मूल्यांकन करने के बाद ही निवेश का निर्णय ले रहे हैं। इस बदलते रुझान ने डेवलपर्स को भी गुणवत्ता और पारदर्शिता पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है।

    रियल एस्टेट बाजार के मौजूदा संकेत बताते हैं कि भारत के प्रीमियम आवास क्षेत्र में आने वाले समय में भी स्थिर मांग बनी रह सकती है। बेहतर शहरी बुनियादी ढांचे, नई कनेक्टिविटी परियोजनाओं, बढ़ती आय और गुणवत्तापूर्ण आवासों की प्राथमिकता के कारण यह वर्ग निवेशकों और खरीदारों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो प्रीमियम हाउसिंग बाजार आने वाले वर्षों में भी संतुलित और मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकता है।

  • दुनिया में आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की मजबूत उड़ान, अप्रैल से जून के बीच निर्यात में दोहरे अंक की शानदार वृद्धि

    दुनिया में आर्थिक सुस्ती के बावजूद भारत की मजबूत उड़ान, अप्रैल से जून के बीच निर्यात में दोहरे अंक की शानदार वृद्धि


    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अनिश्चितताओं के बावजूद भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में निर्यात के मोर्चे पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून के दौरान देश का कुल निर्यात वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर 11.37 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 232.73 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और व्यापारिक चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे माहौल में भारत का मजबूत निर्यात प्रदर्शन वैश्विक बाजार में उसकी बढ़ती साख और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दर्शाता है।

    पहली तिमाही के दौरान वस्तु निर्यात 129.32 अरब डॉलर दर्ज किया गया जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले काफी अधिक रहा। हालांकि इस दौरान आयात भी बढ़ने से वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 86.86 अरब डॉलर तक पहुंच गया लेकिन इसके बावजूद निर्यात में दर्ज हुई तेज वृद्धि भारतीय विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। दूसरी ओर सेवा क्षेत्र ने भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सेवा निर्यात बढ़कर 103.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया जबकि सेवा व्यापार अधिशेष भी बढ़कर 49.43 अरब डॉलर दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी वित्तीय सेवाएं और अन्य पेशेवर सेवाएं वैश्विक स्तर पर लगातार भारत की पहचान मजबूत कर रही हैं।

    जून महीने के आंकड़े भी उत्साहजनक रहे। इस दौरान वस्तु निर्यात 40.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष जून के मुकाबले उल्लेखनीय वृद्धि है। वहीं सेवा निर्यात भी बढ़कर 33.03 अरब डॉलर रहा। लगातार बेहतर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि भारतीय निर्यातक बदलते वैश्विक बाजार की मांग के अनुरूप खुद को तेजी से ढाल रहे हैं और नए अवसरों का लाभ उठा रहे हैं।

    नॉन पेट्रोलियम निर्यात में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। अप्रैल से जून के दौरान यह 106.30 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.44 प्रतिशत अधिक है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि भारत का निर्यात केवल ऊर्जा उत्पादों पर निर्भर नहीं है बल्कि विनिर्माण और उच्च मूल्य वाले उत्पाद भी वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं।

    विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो रत्न एवं आभूषण उद्योग ने सबसे तेज वृद्धि दर्ज की। इसके अलावा इंजीनियरिंग उत्पादों जैविक और अकार्बनिक रसायनों इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा चावल के निर्यात में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। विशेष रूप से इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन यह संकेत देता है कि भारत धीरे धीरे वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं और निर्यात बढ़ाने वाली नीतियों का सकारात्मक असर भी इन आंकड़ों में दिखाई देता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं और घरेलू उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ती है तो आने वाले महीनों में भारत का निर्यात और अधिक मजबूत हो सकता है। हालांकि बढ़ते व्यापार घाटे को संतुलित करने और निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए सरकार को लॉजिस्टिक्स लागत कम करने नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और घरेलू उद्योगों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करने होंगे। कुल मिलाकर पहली तिमाही के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी अपनी निर्यात क्षमता के दम पर विकास की नई कहानी लिख रहा है।

  • E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस

    E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस


    नई दिल्ली ।
    देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चल रही चर्चाओं और उपभोक्ताओं की शिकायतों के बीच केंद्र सरकार ने फ्यूल की गुणवत्ता को लेकर सख्त रुख अपनाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पेट्रोल में मिलावट, सप्लाई व्यवस्था में लापरवाही या गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। मंत्रालय ने ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है और स्पष्ट किया है कि सरकार की नीति इस विषय में पूरी तरह जीरो टॉलरेंस की है।

    सरकार का कहना है कि यदि किसी वाहन में ईंधन भरवाने के बाद तकनीकी समस्या सामने आती है तो हर मामले के लिए E20 पेट्रोल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। मंत्रालय के अनुसार, कई बार पेट्रोल की गुणवत्ता में कमी, भंडारण व्यवस्था की खामियां, सप्लाई चेन में गड़बड़ी या ईंधन में मिलावट जैसी वजहों से वाहन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए जांच का केंद्र वास्तविक कारण होना चाहिए, न कि मानकों के अनुरूप तैयार किए गए E20 ईंधन पर सीधे सवाल उठाना।

    केंद्र ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया है कि पेट्रोल पंपों, भंडारण केंद्रों और वितरण व्यवस्था की नियमित निगरानी की जाए। यदि कहीं ईंधन में मिलावट, रखरखाव में लापरवाही या गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए। हालांकि सरकार ने यह जानकारी साझा नहीं की है कि अब तक किन राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं या कितनी कार्रवाई की गई है।

    सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किया गया E20 पेट्रोल सुरक्षित है और इसका उद्देश्य स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना है। मंत्रालय के अनुसार, सही गुणवत्ता वाले E20 पेट्रोल से सामान्य परिस्थितियों में वाहनों को नुकसान नहीं होना चाहिए। यदि कहीं वाहन में खराबी आती है तो उसके पीछे फ्यूल की गुणवत्ता या वितरण प्रक्रिया से जुड़ी अन्य कमियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

    इधर, पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर कई वाहन मालिकों ने E20 पेट्रोल को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। कुछ लोगों ने दावा किया है कि इस ईंधन के उपयोग के बाद उनकी कार या बाइक का माइलेज कम हुआ है, जबकि कुछ ने इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने, ईंधन प्रणाली पर असर पड़ने और वाहन के बीच रास्ते में बंद होने जैसी शिकायतें भी सामने रखी हैं। इन दावों के कारण आम उपभोक्ताओं के बीच E20 पेट्रोल को लेकर भ्रम और आशंकाएं बढ़ी हैं।

    इस मुद्दे ने राजनीतिक स्वरूप भी ले लिया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने E20 पेट्रोल के विरोध में ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। उन्होंने लोगों से इस अभियान से जुड़ने की अपील करते हुए कहा है कि सरकार को वाहन मालिकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए और उन्हें विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। उनका आरोप है कि पर्याप्त तैयारी के बिना E20 पेट्रोल को लागू किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में लोग माइलेज घटने और वाहन संबंधी समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं।

    केंद्र सरकार का कहना है कि स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण ईंधन उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से राज्यों को निगरानी मजबूत करने, मिलावट रोकने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे और ईंधन की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।

  • बायोकॉन में ₹3,481 करोड़ की ब्लॉक डील से शेयरों में जबरदस्त उछाल, 18 महीने की सबसे बड़ी तेजी के बाद निवेशकों की नजर आगे की चाल पर

    बायोकॉन में ₹3,481 करोड़ की ब्लॉक डील से शेयरों में जबरदस्त उछाल, 18 महीने की सबसे बड़ी तेजी के बाद निवेशकों की नजर आगे की चाल पर

    नई दिल्ली । फार्मा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी बायोकॉन के शेयरों में मंगलवार को बाजार खुलते ही तेज खरीदारी देखने को मिली, जिससे कंपनी का शेयर एक समय सात प्रतिशत से अधिक की बढ़त के साथ 18 महीनों के सबसे बड़े एकदिवसीय उछाल की ओर बढ़ गया। बाजार में आई इस तेजी की सबसे बड़ी वजह कंपनी में बड़े पैमाने पर हुई ब्लॉक डील और प्रमुख निवेशक मायलन द्वारा अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी रही। इस घटनाक्रम के बाद निवेशकों के बीच कंपनी को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है और बाजार की नजर अब आगे होने वाले बदलावों पर टिक गई है।

    बाजार में आई तेजी के पीछे सबसे अहम कारण मायलन की ओर से बायोकॉन में मौजूद अपनी 5.64 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की योजना मानी जा रही है। इस हिस्सेदारी का अनुमानित मूल्य करीब 3,481 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। जैसे ही इस बड़े सौदे की जानकारी बाजार तक पहुंची, निवेशकों की सक्रियता बढ़ गई और शेयर में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। शुरुआती कारोबार के दौरान शेयर ने मजबूत बढ़त दर्ज करते हुए कई महीनों का उच्च स्तर छू लिया।

    कारोबारी सत्र की शुरुआत में लगभग नौ करोड़ शेयरों का बड़ा ब्लॉक डील बाजार में दर्ज किया गया। पहले चरण में करीब 4.4 करोड़ और दूसरे चरण में लगभग 4.6 करोड़ शेयरों की खरीद-बिक्री हुई। दोनों सौदों को मिलाकर यह संख्या लगभग उतनी ही रही, जितनी हिस्सेदारी मायलन के पास थी। हालांकि शुरुआती कारोबार के दौरान इन शेयरों के खरीदार और विक्रेता की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई, लेकिन बाजार विशेषज्ञों ने इसे बड़े संस्थागत निवेशकों की भागीदारी वाला महत्वपूर्ण लेनदेन माना।

    उपलब्ध शेयरहोल्डिंग आंकड़ों के अनुसार कंपनी में प्रमोटर किरण मजूमदार-शॉ की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है, जबकि ग्लेंटेक इंटरनेशनल के पास करीब 15 प्रतिशत हिस्सेदारी मौजूद है। इसके अलावा कई घरेलू म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियां भी कंपनी में महत्वपूर्ण निवेश बनाए हुए हैं। बड़ी संख्या में खुदरा निवेशकों की भागीदारी भी कंपनी में बनी हुई है, जिससे यह शेयर लंबे समय से निवेशकों के बीच लोकप्रिय माना जाता है।

    हाल के महीनों में बायोकॉन के शेयर ने लगातार सकारात्मक प्रदर्शन किया है। पिछले एक सप्ताह में इसमें उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई, जबकि एक महीने के दौरान भी शेयर मजबूत स्थिति में बना रहा। वर्ष 2026 की शुरुआत से अब तक निवेशकों को दोहरे अंक का रिटर्न मिल चुका है। वहीं लंबी अवधि के निवेशकों के लिए भी कंपनी ने पिछले तीन वर्षों में बेहतर लाभ दिया है, जिससे इस शेयर पर भरोसा बना हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बड़े निवेशक के बाहर निकलने का अर्थ हमेशा कंपनी के मूलभूत कारोबार में कमजोरी नहीं होता। कई बार वैश्विक कंपनियां अपनी निवेश रणनीति में बदलाव के तहत हिस्सेदारी बेचती हैं। ऐसे में बाजार की वास्तविक प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि इन शेयरों को कौन से नए निवेशक खरीदते हैं और कंपनी की भविष्य की कारोबारी रणनीति कैसी रहती है।

    बायोकॉन से जुड़े इस बड़े घटनाक्रम ने फिलहाल बाजार का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आने वाले दिनों में निवेशकों की निगाह कंपनी के शेयरहोल्डिंग पैटर्न, संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों और कारोबारी प्रदर्शन पर बनी रहेगी। यदि कंपनी अपने परिचालन और वित्तीय प्रदर्शन को मजबूत बनाए रखती है, तो शेयर की आगे की दिशा पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

  • एस. जयशंकर ने रखा भारत का वैश्विक विजन; बोले- संघर्ष और अस्थिरता के दौर में संयुक्त राष्ट्र को निभानी होगी निर्णायक भूमिका

    एस. जयशंकर ने रखा भारत का वैश्विक विजन; बोले- संघर्ष और अस्थिरता के दौर में संयुक्त राष्ट्र को निभानी होगी निर्णायक भूमिका

    नई दिल्ली । भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की 2028-29 की गैर-स्थायी सदस्यता के लिए अपना औपचारिक अभियान शुरू करते हुए वैश्विक मंच पर अपनी प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण को स्पष्ट किया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अभियान की शुरुआत के दौरान कहा कि वर्तमान समय में दुनिया अभूतपूर्व संघर्ष, हिंसा और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में संयुक्त राष्ट्र और विशेष रूप से सुरक्षा परिषद की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि वैश्विक शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप कार्य करना होगा।

    डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत का उद्देश्य केवल सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करना नहीं, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी और व्यावहारिक बनाने में सक्रिय योगदान देना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ऐसी विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है जहां सभी देशों की आवाज को समान महत्व मिले और विकासशील देशों, विशेषकर ग्लोबल साउथ, को निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। उनके अनुसार बदलती वैश्विक परिस्थितियों में बहुपक्षीय संस्थाओं को भी समय के अनुरूप स्वयं को ढालना आवश्यक है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि भारत का पूरा अभियान एसएचएएनटीआई दृष्टिकोण पर आधारित होगा, जिसका उद्देश्य विश्वास, पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय मानकों और सहयोग के माध्यम से समग्र प्रगति सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि भारत विभिन्न देशों के बीच संवाद, सहयोग और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास करेगा ताकि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से संभव हो सके। उनका मानना है कि स्थायी शांति केवल बातचीत और सहयोग से ही सुनिश्चित की जा सकती है।

    उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए पीसकीपिंग मिशनों को आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और स्पष्ट रणनीति से लैस करना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत महिला, शांति और सुरक्षा एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा तथा शांति अभियानों में महिला शांति सैनिकों की भूमिका को और मजबूत करने का समर्थन करेगा।

    नई और उभरती तकनीकों का उल्लेख करते हुए डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मानव-केंद्रित और जिम्मेदार उपयोग का समर्थक है। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग समावेशी विकास, सार्वजनिक हित और सुरक्षा के लिए किया जाना चाहिए। साथ ही इसके दुरुपयोग को रोकने और अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा पर संभावित खतरों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग की आवश्यकता भी उन्होंने रेखांकित की।

    समुद्री सुरक्षा को भारत की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल बताते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि नियम-आधारित और स्वतंत्र समुद्री व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। उन्होंने सुरक्षित समुद्री व्यापार, समुद्री डकैती पर नियंत्रण, नाविकों की सुरक्षा तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों को निरंतर समर्थन देने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण पर प्रभावी रोक लगाने और आतंकी संगठनों के खिलाफ पारदर्शी एवं साक्ष्य-आधारित वैश्विक प्रतिबंध प्रणाली की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

    अपने संबोधन के अंत में डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज की चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, उत्तरदायी और परिणामोन्मुख बने। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत का अभियान वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी, संतुलित और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा तथा विश्व समुदाय के सामने मौजूद नई चुनौतियों से सामूहिक रूप से निपटने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

  • 10 महीनों में 50 लाख यूजर्स का आंकड़ा पार, 'अदाणी वन' ऐप ने एयरपोर्ट लॉयल्टी प्रोग्राम में बनाई मजबूत पहचान, यात्रियों के लिए जल्द आएंगी नई प्रीमियम सुविधाएं

    10 महीनों में 50 लाख यूजर्स का आंकड़ा पार, 'अदाणी वन' ऐप ने एयरपोर्ट लॉयल्टी प्रोग्राम में बनाई मजबूत पहचान, यात्रियों के लिए जल्द आएंगी नई प्रीमियम सुविधाएं

    नई दिल्ली । देश में तेजी से बढ़ते डिजिटल एयरपोर्ट इकोसिस्टम के बीच अदाणी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड के कंज्यूमर ऐप ‘अदाणी वन’ ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। कंपनी के एयरपोर्ट लॉयल्टी प्रोग्राम ‘अदाणी रिवार्ड्स’ ने लॉन्च होने के महज 10 महीनों के भीतर 50 लाख सदस्यों का आंकड़ा पार कर लिया है। यह उपलब्धि इस बात का संकेत मानी जा रही है कि यात्रियों के बीच डिजिटल सेवाओं और रिवार्ड आधारित सुविधाओं की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। कंपनी का मानना है कि यह बढ़ती भागीदारी यात्रियों को अधिक सुविधाजनक, तेज और लाभकारी एयरपोर्ट अनुभव उपलब्ध कराने की दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।

    ‘अदाणी रिवार्ड्स’ देश के सात राज्यों में स्थित अदाणी एयरपोर्ट्स द्वारा संचालित सभी आठ एयरपोर्ट पर उपलब्ध है। इस कार्यक्रम के तहत यात्री ‘अदाणी वन’ ऐप के माध्यम से एयरपोर्ट परिसर में खरीदारी, खानपान और अन्य सेवाओं का उपयोग करते समय रिवार्ड पॉइंट अर्जित कर सकते हैं। बाद में इन पॉइंट्स का उपयोग विभिन्न सुविधाओं और विशेष लाभों के लिए किया जा सकता है। इससे यात्रियों को अपनी नियमित यात्रा के दौरान अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

    कंपनी के अनुसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से यात्रियों को एकीकृत सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास लगातार किया जा रहा है। ऐप के जरिए टिकट, एयरपोर्ट सेवाएं और रिवार्ड सिस्टम को एक ही मंच पर उपलब्ध कराने से उपयोगकर्ताओं का अनुभव अधिक सरल और सुविधाजनक बना है। यही वजह है कि कम समय में बड़ी संख्या में लोगों ने इस प्लेटफॉर्म को अपनाया है और लॉयल्टी प्रोग्राम से जुड़ना पसंद किया है।

    कंपनी ने यह भी जानकारी दी है कि वर्ष के अंत तक टियर-बेस्ड मेंबरशिप मॉडल शुरू करने की योजना बनाई गई है। इस नई व्यवस्था के तहत नियमित और अधिक यात्रा करने वाले यात्रियों को अतिरिक्त लाभ, विशेष सुविधाएं और उनकी जरूरतों के अनुरूप व्यक्तिगत सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे यात्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ एयरपोर्ट अनुभव को और बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

    कंपनी के प्रतिनिधियों का कहना है कि 50 लाख सदस्यों का आंकड़ा पार करना ‘अदाणी रिवार्ड्स’ के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। आने वाले समय में नए फीचर्स, बेहतर ऑफर्स और अतिरिक्त सुविधाएं जोड़ी जाएंगी ताकि अधिक से अधिक यात्री इस प्लेटफॉर्म से जुड़ सकें। कंपनी का उद्देश्य अपने सभी एयरपोर्ट पर यात्रियों को एक समान और आधुनिक डिजिटल अनुभव प्रदान करना है।

    यात्रियों के लिए इस प्रोग्राम से जुड़ना भी काफी आसान बनाया गया है। एयरपोर्ट पर खरीदारी या अन्य सेवाओं का उपयोग करते समय केवल मोबाइल नंबर के माध्यम से तुरंत सदस्यता ली जा सकती है। इसके बाद अर्जित रिवार्ड पॉइंट्स का उपयोग मुफ्त खानपान, प्रीमियम एयरपोर्ट सेवाओं और अन्य विशेष सुविधाओं के लिए किया जा सकता है। इससे यात्रियों को नियमित यात्रा के दौरान अतिरिक्त मूल्य प्राप्त होता है।

    कंपनी ने यह भी बताया कि दिवाली, विंटरफेस्ट और समर कार्निवल जैसे विशेष अभियान उपयोगकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाने में प्रभावी साबित हुए हैं। इन अभियानों के दौरान विशेष ऑफर्स और चुनिंदा अनुभव उपलब्ध कराए गए, जिससे ऐप के उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वर्तमान में कंपनी मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, मंगलुरु, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम और नवी मुंबई सहित आठ एयरपोर्ट का संचालन कर रही है। आने वाले महीनों में लॉयल्टी प्रोग्राम का और विस्तार कर यात्रियों को अधिक डिजिटल सुविधाएं और बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने की योजना पर काम किया जा रहा है।

  • अदाणी इलेक्ट्रिसिटी ने घटाया एटीएंडसी लॉस, हजारों छापों से करोड़ों की चोरी का हुआ खुलासा

    अदाणी इलेक्ट्रिसिटी ने घटाया एटीएंडसी लॉस, हजारों छापों से करोड़ों की चोरी का हुआ खुलासा


    नई दिल्ली ।
    बिजली चोरी के खिलाफ लगातार चलाए गए सघन अभियान का असर अब बिजली वितरण व्यवस्था के प्रदर्शन में भी दिखाई देने लगा है। अदाणी इलेक्ट्रिसिटी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अपने एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल (एटीएंडसी) लॉस को घटाकर 4.46 प्रतिशत तक पहुंचाने का दावा किया है। कंपनी के अनुसार यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में बेहतर प्रदर्शन है और इससे वितरण प्रणाली की दक्षता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

    कंपनी का कहना है कि एटीएंडसी लॉस में आई कमी का सीधा लाभ उन उपभोक्ताओं को मिलेगा जो नियमित रूप से बिजली बिल का भुगतान करते हैं। बिजली चोरी कम होने से वितरण कंपनियों पर वित्तीय दबाव घटता है, जिससे नेटवर्क को बेहतर बनाने और उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण सेवा उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। साथ ही बिजली आपूर्ति व्यवस्था भी अधिक स्थिर और विश्वसनीय बनती है।

    बिजली चोरी पर अंकुश लगाने के लिए पूरे वर्ष बड़े स्तर पर विशेष अभियान चलाया गया। इस दौरान हजारों स्थानों पर छापेमारी की गई और चोरी के मामलों में सैकड़ों प्राथमिकी दर्ज कराई गईं। अभियान के दौरान सुबह, देर शाम और अवकाश के दिनों में भी विशेष कार्रवाई की गई, ताकि चोरी के ऐसे मामलों को रोका जा सके जो सामान्य निरीक्षण के दौरान सामने नहीं आ पाते।

    जांच के दौरान बड़ी मात्रा में अवैध बिजली खपत का पता चला। इसके साथ ही बिजली चोरी में इस्तेमाल किए जा रहे भारी मात्रा में अवैध तार और अन्य उपकरण भी जब्त किए गए। कंपनी का कहना है कि इस कार्रवाई से करोड़ों रुपये मूल्य की अवैध बिजली खपत का खुलासा हुआ, जिससे वितरण व्यवस्था को होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने में मदद मिली।

    अभियान के दौरान औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े कुछ बड़े मामलों का भी पता चला, जहां कथित रूप से सीधे बिजली आपूर्ति का उपयोग कर अवैध तरीके से बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा था। ऐसे मामलों में संबंधित स्थानों पर कार्रवाई करते हुए अवैध कनेक्शन हटाए गए और कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई। कंपनी का कहना है कि इस प्रकार की कार्रवाई भविष्य में बिजली चोरी पर प्रभावी रोक लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि बिजली चोरी केवल आर्थिक नुकसान का विषय नहीं है, बल्कि इससे पूरे वितरण नेटवर्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। अधिक भार के कारण ट्रांसफॉर्मर, केबल और अन्य उपकरणों के खराब होने की संभावना बढ़ जाती है। विशेष रूप से अधिक मांग वाले घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इसका असर बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और रखरखाव लागत दोनों पर पड़ता है।

    बिजली अधिनियम के प्रावधानों के तहत बिजली चोरी को गंभीर अपराध माना गया है। दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ जुर्माना, कारावास अथवा दोनों प्रकार की कार्रवाई का प्रावधान है। इसी कारण कंपनी स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सहयोग से नियमित संयुक्त अभियान चलाकर ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है।

    कंपनी का मानना है कि बिजली चोरी पर प्रभावी नियंत्रण से न केवल वितरण प्रणाली अधिक मजबूत होगी, बल्कि उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी दरों पर बेहतर सेवा उपलब्ध कराने में भी सहायता मिलेगी। आने वाले समय में भी विशेष निगरानी अभियान जारी रखने की योजना है, ताकि एटीएंडसी लॉस को और कम किया जा सके तथा बिजली वितरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और सक्षम बनाया जा सके।

  • टाटा कैपिटल की गोल्ड लोन बिजनेस में धमाकेदार एंट्री…. ₹318 करोड़ की डील की तैयारी!

    टाटा कैपिटल की गोल्ड लोन बिजनेस में धमाकेदार एंट्री…. ₹318 करोड़ की डील की तैयारी!


    नई दिल्ली।
    देश की दिग्गज गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) टाटा कैपिटल (Tata Capital) ने तेजी से बढ़ते गोल्ड लोन बिजनेस (Gold Loan Business) में धमाकेदार एंट्री कर ली है। कंपनी ने केरल की गोल्ड लोन कंपनी योगलोन्स (Yogakshemam Loans) में 88.6% हिस्सेदारी खरीदने का फैसला किया है। इस डील की कुल कीमत 318 करोड़ रुपये तक हो सकती है। इसके साथ ही टाटा कैपिटल (Tata Capital) ने कंपनी के विस्तार के लिए करीब 93 करोड़ रुपये का नया निवेश भी करने का फैसला किया है। इस अधिग्रहण के बाद योगलोन्स, टाटा कैपिटल की सहायक (Subsidiary) कंपनी बन जाएगी।

    यह डील ऐसे समय में हुआ है, जब भारत में गोल्ड लोन की मांग लगातार बढ़ रही है। बढ़ती महंगाई, आसान लोन प्रक्रिया और सोने की ऊंची कीमतों के कारण लोग तेजी से गोल्ड लोन का विकल्प अपना रहे हैं। ऐसे में टाटा कैपिटल (Tata Capital) का यह कदम उसके रिटेल लोन कारोबार को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।


    योगलोंस कौन है और क्यों है खास?

    योगलोंस (Yogloans) दक्षिण भारत की एक तेजी से बढ़ती गोल्ड लोन NBFC है। कंपनी के 162 ब्रांच केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में फैले हुए हैं। 31 मार्च तक कंपनी का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) करीब 708 करोड़ रुपये था और यह लगभग 32,000 ग्राहकों को सेवाएं दे रही थी।

    इस कंपनी की सबसे बड़ी ताकत इसका अनुभवी प्रबंधन है। योगलोंस (Yogloans) के प्रमोटर उन्नीकृष्णन इडिचारम वीटिल पहले मनप्पुरम फाइनेंस (Manappuram Finance) के डिप्टी CEO रह चुके हैं। टाटा कैपिटल (Tata Capital) ने साफ किया है कि अधिग्रहण के बाद भी वही कंपनी का नेतृत्व करते रहेंगे, जिससे ग्राहकों और कर्मचारियों को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी।


    टाटा कैपिटल को क्या होगा फायदा?

    टाटा कैपिटल (Tata Capital) का कुल नेट AUM 2.77 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। अभी तक कंपनी का फोकस रिटेल लोन, SME लोन और कॉर्पोरेट लोन पर था। अब गोल्ड लोन जुड़ने से उसका रिटेल पोर्टफोलियो और मजबूत होगा।

    कंपनी के MD और CEO राजीव सभरवाल के अनुसार, गोल्ड लोन एक सुरक्षित (Secured) लेंडिंग बिजनेस है, जिसमें तेजी से ग्रोथ की संभावना है। इससे कंपनी का लोन पोर्टफोलियो और अधिक विविध (Diversified) बनेगा और भविष्य में कम जोखिम के साथ बेहतर कमाई का अवसर मिलेगा।


    भारत में क्यों बढ़ रहा है गोल्ड लोन का कारोबार?

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, मई के अंत तक NBFC का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो 69% बढ़कर 3.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इससे साफ है कि यह सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है। सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और आसान लोन उपलब्ध होने से ग्राहक भी इस विकल्प को पसंद कर रहे हैं।

    ब्रोकरेज फर्म IIFL Capital का मानना है कि योगलोंस (Yogloans) का लोन बुक भविष्य में करीब 5% Return on Assets (RoA) दे सकता है, जबकि टाटा कैपिटल (Tata Capital) का अनुमानित RoA करीब 2.2% है, यानी यह अधिग्रहण कंपनी की कमाई और मुनाफे दोनों को मजबूत कर सकता है।


    क्या मुथूट फाइनेंस और मनप्पुरम को मिलेगी चुनौती?

    अब तक भारत के गोल्ड लोन बाजार में मुथूट फाइनेंस और मनप्पुरम फाइनेंस जैसी कंपनियों का दबदबा रहा है। लेकिन टाटा ग्रुप (Tata Group) जैसे बड़े और भरोसेमंद ब्रांड की एंट्री से इस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। मजबूत वित्तीय स्थिति, बड़ा ग्राहक आधार और तकनीकी क्षमता के दम पर टाटा कैपिटल (Tata Capital) आने वाले सालों में गोल्ड लोन मार्केट में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश करेगी।

    टाटा कैपिटल (Tata Capital) का योगलोंस (Yogloans) में निवेश सिर्फ एक अधिग्रहण नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते गोल्ड लोन बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति है। यदि कंपनी इस कारोबार का सफलतापूर्वक विस्तार करती है, तो आने वाले समय में यह टाटा कैपिटल (Tata Capital) के लिए कमाई का एक बड़ा इंजन बन सकता है।