Category: Economy

  • अब तक सिर्फ 1.97 करोड़ ITR दाखिल, डेडलाइन बढ़ने की उम्मीद नहीं… कहीं भारी न पड़ जाए 31 जुलाई का इंतजार!

    अब तक सिर्फ 1.97 करोड़ ITR दाखिल, डेडलाइन बढ़ने की उम्मीद नहीं… कहीं भारी न पड़ जाए 31 जुलाई का इंतजार!


    नई दिल्ली।
    अगर आपने अभी तक अपना इनकम टैक्स रिटर्न (Income Tax Return- ITR) दाखिल नहीं किया है और सोच रहे हैं कि पिछले साल की तरह इस बार भी सरकार अंतिम तारीख बढ़ा देगी, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। वित्त वर्ष 2025-26 (आकलन वर्ष 2026-27) के लिए 31 जुलाई ITR फाइल करने की आखिरी तारीख है। हालांकि, अब तक केवल करीब 1.97 करोड़ ITR ही दाखिल हुए हैं, जबकि पिछले दो वर्षों में कुल 7 करोड़ से ज्यादा रिटर्न फाइल हुए थे। धीमी रफ्तार को देखकर कई लोग डेडलाइन (Deadline) बढ़ने की उम्मीद लगा रहे हैं, लेकिन टैक्स एक्सपर्ट का कहना है कि इस बार ऐसा होने की संभावना बेहद कम है।

    पिछले साल सरकार ने ITR फाइल करने की अंतिम तारीख इसलिए बढ़ाई थी, क्योंकि आयकर विभाग ने ITR फॉर्म और ऑनलाइन फाइलिंग यूटिलिटी जारी करने में देरी की थी। इसके कारण करदाताओं के पास रिटर्न दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा था। लेकिन, इस साल स्थिति पूरी तरह अलग है। अधिकांश ITR फॉर्म, ऑनलाइन यूटिलिटी, फॉर्म 16, फॉर्म 26AS, एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) और TIS (Taxpayer Information Summary) पहले से उपलब्ध हैं। ऐसे में टैक्सपेयर्स के पास समय की कमी का कोई बड़ा कारण नहीं है।

    एक्सपर्ट का मानना है कि अगर कोई बड़ा तकनीकी व्यवधान या आयकर पोर्टल पर गंभीर समस्या नहीं आती, तो सरकार के पास डेडलाइन बढ़ाने का कोई ठोस आधार नहीं होगा। इसलिए केवल उम्मीद के भरोसे बैठना महंगा साबित हो सकता है।

    अगर कोई करदाता 31 जुलाई के बाद ITR फाइल करता है, तो उसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सबसे पहले इनकम टैक्स एक्ट की धारा 234F के तहत लेट फाइलिंग फीस देनी पड़ सकती है। अगर टैक्स बकाया है, तो उस पर ब्याज भी देना होगा। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में कैपिटल लॉस या बिजनेस लॉस को अगले सालों में कैरी फॉरवर्ड करने का लाभ भी नहीं मिलेगा, यानी देरी सिर्फ जुर्माने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की टैक्स प्लानिंग पर भी असर डाल सकती है।

    टैक्स एक्सपर्ट का कहना है कि जल्दी ITR फाइल करने के कई फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर आपको टैक्स रिफंड मिलना है, तो वह जल्दी प्रोसेस हो जाएगा। इसके अलावा अगर रिटर्न में कोई गलती रह जाती है, तो उसे समय रहते सुधारा भी जा सकता है। आखिरी दिनों में पोर्टल पर भारी ट्रैफिक के कारण वेबसाइट धीमी पड़ने या तकनीकी दिक्कतें आने की संभावना भी बढ़ जाती है, जिससे फाइलिंग में परेशानी हो सकती है।

    ITR दाखिल करने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है। सबसे पहले फॉर्म 16, बैंक इंटरेस्ट सर्टिफिकेट, कैपिटल गेन स्टेटमेंट, अन्य आय से जुड़े दस्तावेज और टैक्स कटौती की पूरी जानकारी एकत्र कर लें। इसके बाद फॉर्म 26AS, AIS और TIS में दर्ज जानकारी का मिलान करें ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचा जा सके। साथ ही यह भी जांच लें कि इस बार आपके लिए पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) बेहतर है या नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime)। सिर्फ पिछले साल चुने गए विकल्प के आधार पर निर्णय लेना सही नहीं होगा।

    इस बार ITR की अंतिम तारीख बढ़ने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। इसलिए आखिरी समय तक इंतजार करने के बजाय जल्द से जल्द रिटर्न दाखिल करना ही समझदारी होगी। इससे न केवल जुर्माने और ब्याज से बचा जा सकेगा, बल्कि रिफंड भी जल्दी मिलेगा और किसी संभावित टैक्स नोटिस की आशंका भी कम हो जाएगी। अगर आपने अभी तक ITR फाइल नहीं किया है, तो 31 जुलाई से पहले यह काम पूरा करना आपके लिए सबसे सुरक्षित विकल्प होगा।

  • सेंसेक्स निफ्टी में आज क्या होगा बड़ा उतार चढ़ाव निवेशकों के लिए 14 जुलाई का पूरा मार्केट आउटलुक

    सेंसेक्स निफ्टी में आज क्या होगा बड़ा उतार चढ़ाव निवेशकों के लिए 14 जुलाई का पूरा मार्केट आउटलुक


    नई दिल्ली । 14 जुलाई को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कई अहम घरेलू और वैश्विक संकेतों के बीच होने जा रही है। निवेशकों की नजर एक ओर कंपनियों के पहली तिमाही के वित्तीय नतीजों पर रहेगी तो दूसरी ओर वैश्विक बाजारों की चाल भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बीते कारोबारी सत्र में बाजार में उतार चढ़ाव देखने को मिला था और अब निवेशक यह जानने को उत्सुक हैं कि नया कारोबारी दिन किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार की चाल पर विदेशी संस्थागत निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीद और बिकवाली का सीधा असर दिखाई दे सकता है। यदि विदेशी निवेशकों की खरीदारी मजबूत रहती है तो बाजार को सहारा मिल सकता है जबकि लगातार बिकवाली होने पर दबाव देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही रुपये की चाल और कच्चे तेल की कीमतों पर भी निवेशकों की पैनी नजर बनी रहेगी क्योंकि इनका असर कई प्रमुख सेक्टरों पर पड़ता है।

    इस सप्ताह कई बड़ी कंपनियों के तिमाही नतीजे आने वाले हैं। ऐसे में बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा और एफएमसीजी सेक्टर के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है। जिन कंपनियों के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहेंगे उनके शेयरों में तेजी आने की संभावना बन सकती है जबकि कमजोर नतीजों का असर संबंधित शेयरों पर दबाव के रूप में दिखाई दे सकता है। यही वजह है कि निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय कंपनियों के प्रदर्शन और बाजार के रुझान पर ध्यान देना चाहिए।

    वैश्विक बाजारों से मिलने वाले संकेत भी आज के कारोबार के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। अमेरिका और एशियाई बाजारों का प्रदर्शन भारतीय बाजार की शुरुआती चाल को प्रभावित कर सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सकारात्मक माहौल रहता है तो घरेलू बाजार में भी उत्साह देखने को मिल सकता है। वहीं किसी बड़े आर्थिक घटनाक्रम या भू राजनीतिक तनाव की स्थिति में बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।

    तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार बाजार फिलहाल महत्वपूर्ण सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तरों के बीच कारोबार कर सकता है। यदि प्रमुख सूचकांक शुरुआती कारोबार में मजबूती दिखाते हैं तो चुनिंदा सेक्टरों में खरीदारी बढ़ सकती है। दूसरी ओर कमजोर शुरुआत होने पर मुनाफावसूली का दबाव भी देखने को मिल सकता है। ऐसे माहौल में लंबी अवधि के निवेशकों को घबराने के बजाय मजबूत मूलभूत आधार वाली कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए।

    बाजार विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेशकों को अफवाहों या तेजी से बदलते माहौल में भावनात्मक फैसले लेने से बचना चाहिए। जोखिम प्रबंधन के साथ निवेश करना और अपने पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखना हमेशा बेहतर रणनीति मानी जाती है। खासकर नए निवेशकों को बिना पर्याप्त जानकारी के किसी भी शेयर में निवेश करने से बचना चाहिए।

    कुल मिलाकर 14 जुलाई का कारोबारी दिन कई अहम आर्थिक संकेतों और कॉरपोरेट नतीजों के कारण बाजार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। निवेशकों को पूरे दिन बाजार की गतिविधियों पर नजर रखते हुए सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए ताकि बदलते माहौल में बेहतर निवेश अवसरों का लाभ उठाया जा सके।

  • ईरान-अमेरिका तनाव का भारत पर असर, बढ़ा आयात खर्च, जून में व्यापार घाटा 30.4 अरब डॉलर पर पहुंचा

    ईरान-अमेरिका तनाव का भारत पर असर, बढ़ा आयात खर्च, जून में व्यापार घाटा 30.4 अरब डॉलर पर पहुंचा


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इसका सीधा असर देश के व्यापार घाटे पर पड़ा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर करीब 30.4 अरब डॉलर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहा और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो भारत पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।

    महंगे तेल ने बढ़ाया आयात खर्च
    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। जून महीने में कच्चे तेल का आयात 40 प्रतिशत से अधिक बढ़कर करीब 19.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसके पीछे मध्य-पूर्व में बढ़ा तनाव और सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता को प्रमुख कारण माना जा रहा है।

    इसके अलावा खाद, इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी के आयात में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके चलते जून में भारत का कुल आयात बढ़कर 70.8 अरब डॉलर हो गया।

    निर्यात बढ़ा, लेकिन घाटे पर नहीं लगी लगाम
    भारत के लिए राहत की बात यह रही कि जून में निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई। देश का कुल निर्यात करीब 40.4 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की तुलना में बेहतर प्रदर्शन है।

    इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और रसायनों की विदेशी मांग मजबूत रही। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में लगातार सुधार देखा गया, वहीं हीरे और आभूषणों के निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई। हालांकि, आयात में हुई तेज वृद्धि के मुकाबले निर्यात की रफ्तार कम रही, जिसके कारण व्यापार घाटा बढ़ गया।

    आम लोगों पर क्या हो सकता है असर?
    व्यापार घाटे में बढ़ोतरी का असर केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से कंपनियां अपने उत्पादों के दाम बढ़ा सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। इसी वजह से सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    आगे की चुनौती और सरकार की रणनीति
    आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो भारत का आयात बिल ऊंचा बना रह सकता है। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। सरकार फिलहाल निर्यात बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों में जुटी है। इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में बढ़ता निर्यात सकारात्मक संकेत दे रहा है।

    हालांकि, भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए वैश्विक बाजार की स्थिति अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक हालात देश की आर्थिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • अब घरों में रखा सोना आएगा अर्थव्यवस्था के काम, सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन 2.0' प्रस्ताव पर कर रही विचार

    अब घरों में रखा सोना आएगा अर्थव्यवस्था के काम, सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन 2.0' प्रस्ताव पर कर रही विचार


    नई दिल्ली। भारतीय परिवारों के घरों और लॉकरों में वर्षों से सुरक्षित रखे सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार एक नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। सराफा कारोबारियों की ओर से तैयार किए गए इस प्रस्ताव को ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम 2.0’ नाम दिया गया है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो घरेलू स्तर पर मौजूद सोने का बड़ा हिस्सा बाजार में वापस आ सकता है, जिससे सोने के आयात पर निर्भरता कम होने के साथ अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    शुरुआती लक्ष्य 200 टन सोना बाजार में लाने का
    सराफा संगठनों द्वारा सरकार को सौंपे गए प्रस्ताव के अनुसार, योजना के पहले चरण में देशभर के घरों में रखा करीब 200 टन सोना औपचारिक व्यवस्था में लाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे घरेलू मांग का कुछ हिस्सा देश के भीतर उपलब्ध सोने से पूरा किया जा सकेगा और विदेशों से सोना आयात करने की आवश्यकता कम हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा की बचत होने की संभावना भी जताई गई है।

    पुरानी योजना से कैसे होगी अलग?
    इससे पहले लागू की गई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी, क्योंकि लोग सीधे बैंकों के माध्यम से प्रक्रिया अपनाने में सहज महसूस नहीं करते थे।

    नए प्रस्ताव में व्यवस्था को अधिक आसान बनाने की बात कही गई है। इसके तहत ग्राहक अपने पुराने या अनुपयोगी आभूषण लेकर सीधे बैंक जाने के बजाय पंजीकृत ज्वेलर्स के पास पहुंच सकेंगे। ज्वेलर गहनों को गलाकर उनकी शुद्धता का आकलन करेगा और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन्हें बैंक में जमा कराया जाएगा।

    ग्राहकों को मिल सकती हैं गोल्ड यूनिट्स
    प्रस्ताव के मुताबिक, जमा किए गए सोने के बदले ग्राहक के बैंक खाते में उसी मूल्य के बराबर गोल्ड यूनिट्स क्रेडिट की जा सकती हैं। इससे लोग पुराने डिजाइनों के गहनों का बेहतर उपयोग कर सकेंगे और अपनी पसंद के नए आभूषण खरीदने का विकल्प भी मिलेगा। वहीं ज्वेलरी उद्योग को अपेक्षाकृत कम लागत पर कच्चे माल के रूप में सोना उपलब्ध होने की संभावना है।

    टैक्स नियमों को लेकर भी राहत की उम्मीद
    योजना के मसौदे में प्रक्रिया को पारदर्शी रखने और लोगों की टैक्स संबंधी आशंकाओं को कम करने पर भी जोर दिया गया है। मौजूदा आयकर नियमों के अनुसार, विवाहित महिला के पास 500 ग्राम, अविवाहित महिला के पास 250 ग्राम और पुरुष के पास 100 ग्राम तक सोना रखने पर सामान्य परिस्थितियों में राहत का प्रावधान है। हालांकि, अंतिम स्थिति संबंधित नियमों और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।

    सरकार की मंजूरी का इंतजार
    फिलहाल केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। हालांकि, सराफा बाजार इस पहल को सकारात्मक मान रहा है। कारोबारियों का मानना है कि यदि यह योजना लागू होती है तो घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा जा सकेगा। इससे न केवल गोल्ड मार्केट को नई गति मिल सकती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलने की संभावना है।

  • मध्य पूर्व संकट से सहमा भारतीय शेयर बाजार सेंसेक्स 77000 के नीचे फिसला निवेशकों की बढ़ी चिंता

    मध्य पूर्व संकट से सहमा भारतीय शेयर बाजार सेंसेक्स 77000 के नीचे फिसला निवेशकों की बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर सोमवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। कारोबारी सप्ताह की शुरुआत भारी बिकवाली के साथ हुई और निवेशकों में सतर्कता का माहौल नजर आया। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 649 अंकों की गिरावट के साथ 76920 के स्तर पर पहुंच गया जबकि निफ्टी 184 अंक टूटकर 24022 पर कारोबार करता दिखाई दिया। वैश्विक घटनाक्रमों से बढ़ी अनिश्चितता और ऊर्जा कीमतों में तेजी ने बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया।

    सुबह के कारोबार में केवल बड़ी कंपनियों के शेयर ही नहीं बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स करीब 280 अंक टूट गया जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स भी गिरावट के साथ कारोबार करता रहा। इससे साफ संकेत मिला कि निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाते हुए सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं।

    सेक्टोरल इंडेक्स पर नजर डालें तो सबसे अधिक दबाव मेटल फाइनेंशियल सर्विसेज और कंजम्प्शन शेयरों पर रहा। इसके अलावा ऑटो प्राइवेट बैंक पीएसयू बैंक कमोडिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर ऑयल एंड गैस एफएमसीजी और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे लगभग सभी प्रमुख सेक्टर लाल निशान में कारोबार करते रहे। केवल आईटी और फार्मा सेक्टर ने मजबूती दिखाई और सीमित बढ़त के साथ कारोबार किया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में आईटी और दवा कंपनियों को अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश माना जाता है इसलिए इन शेयरों में खरीदारी देखने को मिली।

    सेंसेक्स की प्रमुख कंपनियों में टाटा स्टील इंडिगो मारुति सुजुकी एशियन पेंट्स बजाज फिनसर्व बजाज फाइनेंस एचडीएफसी बैंक एलएंडटी अल्ट्राटेक सीमेंट बीईएल टाइटन महिंद्रा एंड महिंद्रा भारती एयरटेल एसबीआई सन फार्मा आईसीआईसीआई बैंक इन्फोसिस और आईटीसी जैसे शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। वहीं टीसीएस एचसीएल टेक पावर ग्रिड और एनटीपीसी के शेयर सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते दिखाई दिए।

    भारतीय बाजार पर दबाव की सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव माना जा रहा है। अमेरिका द्वारा कमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में ईरान पर की गई नई सैन्य कार्रवाई के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं। इसके जवाब में ईरान ने कुवैत बहरीन और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है और इसका सीधा असर दुनिया भर के शेयर बाजारों पर दिखाई दे रहा है।

    एशियाई बाजारों में भी कमजोरी का माहौल रहा। टोक्यो शंघाई हांगकांग बैंकॉक और सोल के प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए जबकि जकार्ता का बाजार हल्की बढ़त बनाए रखने में सफल रहा। दूसरी ओर शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजार मजबूती के साथ बंद हुए थे लेकिन ताजा घटनाओं के बाद वैश्विक बाजारों का रुख बदल गया।

    मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के साथ कच्चे तेल की कीमतों में भी तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड चार प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 79 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 74 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है इसलिए तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई आयात बिल और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है। यही वजह है कि निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मध्य पूर्व के घटनाक्रम कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक बाजारों के रुख पर बनी रहेगी। यदि तनाव और बढ़ता है तो बाजार में उतार चढ़ाव जारी रह सकता है जबकि हालात सामान्य होने पर निवेशकों का भरोसा दोबारा लौटने की संभावना भी बनी रहेगी।

  • भारत और यूरोप के बीच मजबूत होगी रणनीतिक साझेदारी पीयूष गोयल का तीन देशों का दौरा आज से शुरू

    भारत और यूरोप के बीच मजबूत होगी रणनीतिक साझेदारी पीयूष गोयल का तीन देशों का दौरा आज से शुरू


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश। भारत और यूरोपीय देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने की तैयारी शुरू हो गई है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल सोमवार से स्पेन बेल्जियम और फिनलैंड के पांच दिवसीय आधिकारिक दौरे पर रवाना हो रहे हैं। 13 से 17 जुलाई तक चलने वाले इस दौरे के दौरान वे उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे और व्यापार निवेश तकनीक नवाचार तथा स्वच्छ ऊर्जा जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण बैठकों में हिस्सा लेंगे। इस यात्रा को भारत और यूरोपीय संघ के बीच तेजी से मजबूत होते संबंधों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार इस दौरे का मुख्य उद्देश्य यूरोप के साथ भारत की आर्थिक भागीदारी को और मजबूत बनाना है। यात्रा के दौरान एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग क्लीन एनर्जी डिजिटल टेक्नोलॉजी नवाचार रत्न एवं आभूषण उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। इसके साथ ही दोनों पक्ष निवेश के नए अवसरों और दीर्घकालिक व्यापारिक साझेदारी पर भी चर्चा करेंगे।

    सरकार का मानना है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापक व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने में यह दौरा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारत की कोशिश एक ऐसे संतुलित और पारस्परिक लाभ वाले समझौते की है जो मजबूत आपूर्ति श्रृंखला टिकाऊ विकास और नियम आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को बढ़ावा दे सके। यही वजह है कि इस दौरे को केवल राजनयिक यात्रा नहीं बल्कि आर्थिक सहयोग के नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

    स्पेन दौरे के दौरान पीयूष गोयल वहां के शीर्ष राजनीतिक और आर्थिक नेतृत्व से मुलाकात करेंगे। वे स्पेन के पहले उपराष्ट्रपति और अर्थव्यवस्था व्यापार एवं उद्योग मंत्री कार्लोस कुएर्पो कैबालेरो उद्योग एवं पर्यटन मंत्री जोर्डी हेरेउ बोहेर तथा विदेश मामलों और यूरोपीय संघ सहयोग मंत्री जोस मैनुअल अल्बारेस बुएनो के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इसके अलावा भारत स्पेन बिजनेस राउंडटेबल की अध्यक्षता करते हुए वे स्पेन की प्रमुख कंपनियों और उद्योग संगठनों के साथ निवेश और कारोबारी साझेदारी की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे। इस दौरान भारत में निवेश के अवसरों को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया जाएगा।

    बेल्जियम में केंद्रीय मंत्री एंटवर्प बंदरगाह और विश्व प्रसिद्ध एंटवर्प वर्ल्ड डायमंड सेंटर का दौरा करेंगे। यहां वे कई प्रमुख वैश्विक कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ बैठक करेंगे। इसके अलावा ब्रसेल्स में आयोजित तीसरी भारत यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की मंत्री स्तरीय बैठक की सह अध्यक्षता भी करेंगे। यह परिषद भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार भरोसेमंद तकनीक और आर्थिक सुरक्षा जैसे विषयों पर सहयोग का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत मंच माना जाता है।

    फिनलैंड में पीयूष गोयल वहां के आर्थिक मामलों के मंत्री डॉ सकारी पुइस्टो के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। साथ ही भारत फिनलैंड बिजनेस राउंडटेबल में भाग लेकर फिनिश कंपनियों को भारत में निवेश और साझेदारी के नए अवसरों से अवगत कराएंगे। विशेष रूप से डिजिटल तकनीक हरित ऊर्जा और नवाचार आधारित उद्योगों में सहयोग बढ़ाने पर जोर रहेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव तेजी से हो रहे हैं और दुनिया विश्वसनीय व्यापारिक साझेदारों की तलाश में है। भारत तेजी से विनिर्माण नवाचार और तकनीकी विकास का बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है। ऐसे में यूरोपीय देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध न केवल निवेश बढ़ाएंगे बल्कि रोजगार सृजन तकनीकी सहयोग और निर्यात को भी नई गति देंगे। उम्मीद की जा रही है कि इस दौरे के परिणाम आने वाले समय में भारत और यूरोप के बीच आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण साबित होंगे।

  • स्मार्टफोन खरीदने की सोच बदल रही एआई फीचर्स बने सबसे बड़ा फैसला 68 फीसदी उपभोक्ता दे रहे प्राथमिकता

    स्मार्टफोन खरीदने की सोच बदल रही एआई फीचर्स बने सबसे बड़ा फैसला 68 फीसदी उपभोक्ता दे रहे प्राथमिकता


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में एक बार फिर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव के बीच भारत के लिए राहत की खबर यह है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के मामले में पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा है। ईरान और अमेरिका के बीच फिर से बढ़े सैन्य तनाव तथा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने समय रहते आवश्यक तैयारियां कर ली हैं। इसी कारण संभावित आपूर्ति संकट का असर फिलहाल सीमित रहने की उम्मीद है।

    हाल के घटनाक्रम में अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने 11 जुलाई को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को फिर से बंद करने का ऐलान किया। इसके बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई। यह समुद्री रास्ता दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति का प्रमुख माध्यम है इसलिए इसके प्रभावित होने का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत दिखाई देने लगा।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो सितंबर और अक्टूबर के दौरान कच्चे तेल की आपूर्ति लागत बढ़ सकती है। हालांकि भारत ने पहले से ही अगस्त तक के लिए कच्चे तेल और एलपीजी के आयात की व्यवस्था सुरक्षित कर ली है। यही वजह है कि निकट भविष्य में देश के भीतर ईंधन की उपलब्धता को लेकर किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां जरूर सामने आ सकती हैं लेकिन उन्हें भी प्रभावी तरीके से संभाला जा सकता है।

    मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड करीब पांच प्रतिशत की बढ़त के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगभग पांच प्रतिशत बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुंच सकती हैं।

    हालांकि इस बार वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि गैर ओपेक देशों ने अपना उत्पादन पहले ही बढ़ा दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति का दबाव कुछ हद तक कम हुआ है और संभावित कमी की भरपाई करने की क्षमता भी बनी हुई है। यही कारण है कि कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के बावजूद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति पहले जैसी गंभीर नहीं मानी जा रही।

    भारत सरकार भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर लगातार सतर्क बनी हुई है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि देश के पास लगभग 60 दिनों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है जबकि एलपीजी का करीब 45 दिनों का स्टॉक सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा वैकल्पिक आयात स्रोतों और रणनीतिक भंडारण की व्यवस्था भी लगातार मजबूत की जा रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति में आम लोगों और उद्योगों पर असर कम से कम पड़े।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर जो काम किया है उसका फायदा अब दिखाई दे रहा है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबा भी खिंचता है तो भारत के पास स्थिति से निपटने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत तैयारी मौजूद है। यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद देश की ऊर्जा सुरक्षा फिलहाल सुरक्षित मानी जा रही है।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बीच भारत तैयार कच्चे तेल एलपीजी और गैस का पर्याप्त भंडार संकट से देगा सुरक्षा

    ईरान अमेरिका तनाव के बीच भारत तैयार कच्चे तेल एलपीजी और गैस का पर्याप्त भंडार संकट से देगा सुरक्षा


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में एक बार फिर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव के बीच भारत के लिए राहत की खबर यह है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के मामले में पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा है। ईरान और अमेरिका के बीच फिर से बढ़े सैन्य तनाव तथा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने समय रहते आवश्यक तैयारियां कर ली हैं। इसी कारण संभावित आपूर्ति संकट का असर फिलहाल सीमित रहने की उम्मीद है।

    हाल के घटनाक्रम में अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने 11 जुलाई को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को फिर से बंद करने का ऐलान किया। इसके बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई। यह समुद्री रास्ता दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति का प्रमुख माध्यम है इसलिए इसके प्रभावित होने का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत दिखाई देने लगा।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो सितंबर और अक्टूबर के दौरान कच्चे तेल की आपूर्ति लागत बढ़ सकती है। हालांकि भारत ने पहले से ही अगस्त तक के लिए कच्चे तेल और एलपीजी के आयात की व्यवस्था सुरक्षित कर ली है। यही वजह है कि निकट भविष्य में देश के भीतर ईंधन की उपलब्धता को लेकर किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां जरूर सामने आ सकती हैं लेकिन उन्हें भी प्रभावी तरीके से संभाला जा सकता है।

    मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड करीब पांच प्रतिशत की बढ़त के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगभग पांच प्रतिशत बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुंच सकती हैं।

    हालांकि इस बार वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि गैर ओपेक देशों ने अपना उत्पादन पहले ही बढ़ा दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति का दबाव कुछ हद तक कम हुआ है और संभावित कमी की भरपाई करने की क्षमता भी बनी हुई है। यही कारण है कि कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के बावजूद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति पहले जैसी गंभीर नहीं मानी जा रही।

    भारत सरकार भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर लगातार सतर्क बनी हुई है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि देश के पास लगभग 60 दिनों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है जबकि एलपीजी का करीब 45 दिनों का स्टॉक सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा वैकल्पिक आयात स्रोतों और रणनीतिक भंडारण की व्यवस्था भी लगातार मजबूत की जा रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति में आम लोगों और उद्योगों पर असर कम से कम पड़े।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर जो काम किया है उसका फायदा अब दिखाई दे रहा है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबा भी खिंचता है तो भारत के पास स्थिति से निपटने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत तैयारी मौजूद है। यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद देश की ऊर्जा सुरक्षा फिलहाल सुरक्षित मानी जा रही है।

  • रियल एस्टेट सेक्टर पर निवेशकों का भरोसा मजबूत, 33 फीसदी बढ़ा प्राइवेट इक्विटी निवेश, विदेशी पूंजी ने बढ़ाई रफ्तार

    रियल एस्टेट सेक्टर पर निवेशकों का भरोसा मजबूत, 33 फीसदी बढ़ा प्राइवेट इक्विटी निवेश, विदेशी पूंजी ने बढ़ाई रफ्तार


    नई दिल्ली । भारतीय रियल एस्टेट बाजार लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है और वर्ष 2026 की पहली छमाही ने इस क्षेत्र के लिए बेहद उत्साहजनक तस्वीर पेश की है। जनवरी से जून के बीच देश के रियल एस्टेट सेक्टर में 3.2 अरब डॉलर का निजी इक्विटी निवेश दर्ज किया गया है जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक है। यह बढ़ोतरी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों का भरोसा भारतीय रियल एस्टेट बाजार पर लगातार मजबूत हो रहा है और आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं और अधिक बढ़ सकती हैं।

    ग्लोबल रियल एस्टेट कंसल्टिंग फर्म सैविल्स इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार केवल दूसरी तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान ही करीब 2 अरब डॉलर का निवेश हुआ। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट बताती है कि निवेशकों की प्राथमिकताएं अब तेजी से बदल रही हैं और पारंपरिक ऑफिस परिसंपत्तियों के साथ-साथ डेटा सेंटर जैसे आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी उनका भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

    दूसरी तिमाही के दौरान कुल निवेश में डेटा सेंटर का हिस्सा सबसे अधिक 38 प्रतिशत रहा। इसके बाद ऑफिस सेक्टर ने 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरा स्थान हासिल किया जबकि रेजिडेंशियल सेक्टर 16 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर रहा। हालांकि यदि पूरे जनवरी से जून की अवधि की बात करें तो ऑफिस सेक्टर अब भी सबसे आगे बना हुआ है और कुल निजी इक्विटी निवेश में इसकी हिस्सेदारी 34 प्रतिशत रही। इससे साफ है कि कॉरपोरेट गतिविधियों के विस्तार और आधुनिक कार्यस्थलों की बढ़ती मांग के कारण ऑफिस स्पेस निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ है।

    रिपोर्ट के मुताबिक निवेश केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा बल्कि हॉस्पिटैलिटी हेल्थकेयर और स्टूडेंट हाउसिंग या को लिविंग जैसे वैकल्पिक रियल एस्टेट सेगमेंट में भी पूंजी का प्रवाह बढ़ा है। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में 8 प्रतिशत और स्टूडेंट हाउसिंग तथा को लिविंग में 3 प्रतिशत निवेश दर्ज किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि निवेशक अब तेजी से उभरते नए क्षेत्रों में भी अवसर तलाश रहे हैं।

    निवेश के स्रोतों पर नजर डालें तो इस अवधि में कुल निजी इक्विटी निवेश का 51 प्रतिशत हिस्सा घरेलू निवेशकों से आया जबकि 49 प्रतिशत निवेश विदेशी निवेशकों ने किया। घरेलू निवेश का बड़ा हिस्सा ऑफिस सेक्टर में लगाया गया और इसका लगभग 68 प्रतिशत निवेश देश के प्रमुख टियर वन शहरों में केंद्रित रहा। दूसरी ओर विदेशी निवेशकों की पूंजी का 69 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका और कनाडा से आया जिसने मुख्य रूप से डेटा सेंटर और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर को प्राथमिकता दी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था मजबूत शहरीकरण बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थिर आर्थिक माहौल निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बढ़ता निवेश इस बात का संकेत है कि डिजिटल सेवाओं और क्लाउड टेक्नोलॉजी की मांग भविष्य में और तेजी से बढ़ने वाली है।

    सैविल्स इंडिया के कैपिटल मार्केट सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर सुमीत भाटिया का कहना है कि पहली छमाही के निवेश आंकड़े भारतीय रियल एस्टेट बाजार में निवेशकों के मजबूत विश्वास को दर्शाते हैं। उनका मानना है कि हॉस्पिटैलिटी हेल्थकेयर स्टूडेंट हाउसिंग और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ता निवेश यह साबित करता है कि निवेशक अब भारत की डिजिटल और वैकल्पिक रियल एस्टेट ग्रोथ स्टोरी पर लंबी अवधि का दांव लगा रहे हैं। कंपनी को उम्मीद है कि आने वाली तिमाहियों में भी निवेश का यह सकारात्मक रुझान जारी रहेगा और भारतीय रियल एस्टेट बाजार वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।

  • सेबी का बड़ा एक्शन कर्मचारियों पर सख्त हुई आचार संहिता शेयर बाजार में निवेश से लेकर नई नौकरी तक हर कदम पर रहेगी नजर

    सेबी का बड़ा एक्शन कर्मचारियों पर सख्त हुई आचार संहिता शेयर बाजार में निवेश से लेकर नई नौकरी तक हर कदम पर रहेगी नजर


    नई दिल्ली ।  भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने अपने कर्मचारियों के लिए सेवा नियमों में व्यापक बदलाव करते हुए आचार संहिता को पहले से अधिक सख्त बना दिया है। नए संशोधित नियमों का उद्देश्य हितों के टकराव की संभावना को कम करना पारदर्शिता को बढ़ावा देना और बाजार नियामक संस्था की निष्पक्षता को और मजबूत बनाना है। सेबी द्वारा अधिसूचित कर्मचारी सेवा संशोधन विनियम 2026 के तहत कर्मचारियों के निवेश खुलासे नौकरी बदलने और उपहार स्वीकार करने से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधान लागू किए गए हैं।

    नए नियमों के अनुसार अब कर्मचारियों के साथ उनके परिवार और आश्रितों की परिभाषा का भी विस्तार किया गया है। इसमें गोद लिए गए बच्चे सौतेले बच्चे और ऐसे लोग भी शामिल होंगे जो किसी कर्मचारी पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं। इससे अब निवेश और सेवा संबंधी नियमों का दायरा पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो जाएगा और किसी भी प्रकार के हितों के टकराव की संभावना पर अधिक प्रभावी निगरानी रखी जा सकेगी।

    सेबी ने कर्मचारियों के निवेश नियमों में सबसे बड़ा बदलाव किया है। अब कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य नौकरी के दौरान शेयर इक्विटी में परिवर्तनीय प्रतिभूतियों और डेरिवेटिव उत्पादों में नया निवेश नहीं कर सकेंगे। हालांकि म्यूचुअल फंड रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी रीट्स और अन्य विनियमित सामूहिक निवेश योजनाओं में निवेश की अनुमति पहले की तरह जारी रहेगी। इसके साथ ही ऐसे निवेश उत्पादों में निवेश की अधिकतम सीमा भी तय कर दी गई है जो किसी कर्मचारी के कुल निवेश पोर्टफोलियो के 25 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

    कुछ विशेष परिस्थितियों में कर्मचारियों को छूट भी दी गई है। इनमें जीवनसाथी को मिलने वाले एम्प्लॉई स्टॉक ऑप्शन और विवेकाधीन पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं के माध्यम से किए गए निवेश शामिल हैं। सेबी का मानना है कि इन प्रावधानों से कर्मचारियों की निष्पक्षता बनी रहेगी और बाजार से जुड़े संवेदनशील निर्णयों पर किसी प्रकार का निजी प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    संशोधित नियमों के तहत यदि कोई कर्मचारी इस्तीफा देता है या सेवानिवृत्त होता है तो उस पर दो वर्ष का कूलिंग ऑफ पीरियड लागू रहेगा। इस अवधि के दौरान वह किसी भी व्यक्ति कंपनी या संस्था की ओर से सेबी के समक्ष किसी मामले में पैरवी नहीं कर सकेगा। यह प्रतिबंध जांच सुनवाई सेटलमेंट और विभिन्न मंजूरियों से जुड़े मामलों पर भी लागू रहेगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सेवा के दौरान प्राप्त गोपनीय जानकारी का निजी लाभ के लिए उपयोग न किया जा सके।

    नौकरी बदलने से जुड़े नियमों को भी अधिक पारदर्शी बनाया गया है। यदि कोई कर्मचारी किसी अन्य संस्था या कंपनी में नौकरी के लिए बातचीत शुरू करता है तो उसे एक महीने के भीतर इसकी जानकारी सेबी को देना अनिवार्य होगा। इससे संभावित हितों के टकराव की समय रहते पहचान की जा सकेगी और आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे।

    सेबी ने उपहार स्वीकार करने के नियमों में भी संशोधन किया है। अब कर्मचारियों को 50 हजार रुपए तक के उपहार की रिपोर्ट करने की आवश्यकता नहीं होगी जबकि पहले यह सीमा 10 हजार रुपए थी। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि सामाजिक और पारंपरिक अवसरों पर मिलने वाले कौन से उपहार नियमों के अनुरूप स्वीकार किए जा सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी के ये नए नियम नियामकीय संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे न केवल कर्मचारियों के आचरण पर बेहतर निगरानी रखी जा सकेगी बल्कि निवेशकों का भरोसा भी और मजबूत होगा। बदलते वित्तीय माहौल में यह पहल भारतीय पूंजी बाजार की विश्वसनीयता को नई मजबूती देने वाली मानी जा रही है।