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  • Crude $100 पार: पेट्रोल-डीजल महंगे होने का बढ़ा खतरा, तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटे का बोझ

    Crude $100 पार: पेट्रोल-डीजल महंगे होने का बढ़ा खतरा, तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटे का बोझ


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। बेंचमार्क Brent Crude 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। भारतीय बास्केट में भी बुधवार को कच्चे तेल की कीमत 108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रही। सितंबर का औसत भाव भी 100 डॉलर के पार निकल गया है। हालांकि इसका तत्काल असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नहीं दिखा है, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

    पेट्रोल-डीजल बेचने में कंपनियों को घाटा

    महंगे अंतरराष्ट्रीय क्रूड के बावजूद सरकारी तेल कंपनियां यानी OMCs घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई जारी रखे हुए हैं। ICRA के मुताबिक सितंबर में अब तक के औसत क्रूड भाव के आधार पर कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹5 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹23 प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।

    यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की लागत बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में ईंधन अपेक्षाकृत कम कीमत पर बिक रहा है। इससे कंपनियों के मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ रहा है।

    LPG पर भी करीब ₹200 की अंडर रिकवरी

    OMCs के लिए सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही चुनौती नहीं हैं। घरेलू LPG पर भी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। ICRA के अनुसार एक LPG सिलिंडर पर करीब ₹200 की अंडर रिकवरी हो रही है।

    अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो कंपनियों की कमाई और प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में भविष्य में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का रास्ता खुल सकता है।

    अभी तुरंत दाम बढ़ने की गारंटी नहीं

    फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ेंगे, यह कहना जल्दबाजी होगी। घरेलू ईंधन की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड के भाव से तय नहीं होतीं। सरकार की प्राइसिंग पॉलिसी, टैक्स और तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन की भी इसमें अहम भूमिका होती है।

    मई में सरकार ने चार किस्तों में पेट्रोल की कीमत कुल ₹7.35 प्रति लीटर और डीजल की कीमत ₹7.53 प्रति लीटर बढ़ाई थी। इसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव रहा है और कंपनियों ने तत्काल उसी अनुपात में घरेलू कीमतों में बदलाव नहीं किया।

    हालांकि, अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर रहता है और OMCs का घाटा लगातार बढ़ता है, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव बन सकता है।

    भारत पर क्यों बढ़ेगा दबाव?

    भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90% हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है।

    आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत का क्रूड आयात बिल 56.5% बढ़कर 63.4 अरब डॉलर पहुंच गया। खास बात यह रही कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा लगभग स्थिर रही। यानी आयात बिल में हुई बड़ी बढ़ोतरी का प्रमुख कारण तेल की ऊंची कीमतें रहीं।

    अगर क्रूड की कीमतें आगे भी ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है। इससे रुपए पर दबाव आने की आशंका रहेगी और आगे चलकर महंगाई का जोखिम भी बढ़ सकता है।

  • जीएफएफ 2026 में समीर निगम ने वित्तीय समावेशन के अगले दशक का विजन रखा, डिजिटल पहुंच बढ़ाने की रणनीति बताई

    जीएफएफ 2026 में समीर निगम ने वित्तीय समावेशन के अगले दशक का विजन रखा, डिजिटल पहुंच बढ़ाने की रणनीति बताई

    नई दिल्ली । फोनपे ने बुधवार को ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 में अगले दशक के लिए अपने विजन को सामने रखा। कंपनी के संस्थापक और सीईओ समीर निगम ने मुख्य संबोधन में देशभर के लोगों, परिवारों और कारोबारों के लिए डिजिटल प्रगति को आगे बढ़ाने की रणनीतिक रूपरेखा साझा की। यह प्रस्तुति कंपनी की एक दशक लंबी तकनीकी नवाचार और बड़े स्तर पर विस्तार की यात्रा पर आधारित रही।

    सत्र की शुरुआत में समीर निगम ने फोनपे के मूल दर्शन और समावेशी विकास पर कंपनी के फोकस को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वास्तविक प्रगति का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि शीर्ष 10 प्रतिशत लोग कितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि कहीं कोई पीछे तो नहीं छूट रहा। उनके मुताबिक फोनपे ने पिछले एक दशक में भारत की प्रगति को दिशा देने वाले तकनीकी अग्रणी के रूप में काम किया है और उसके पूरे इकोसिस्टम के उत्पादों को प्रगति की राह में आने वाली बाधाओं को कम करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

    समीर ने कहा कि वास्तविक वित्तीय समावेशन अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों के लिए अलग उत्पाद तैयार करने तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार जरूरी यह है कि ऐसा सिस्टम बनाया जाए, जो हर भारतीय की जरूरत के अनुरूप लचीले तरीके से काम कर सके।

    उन्होंने बताया कि फोनपे ने एनपीसीआई के साथ मिलकर उन बाधाओं को व्यवस्थित रूप से दूर करने पर काम किया है, जिनके कारण लंबे समय से लोग डिजिटल अर्थव्यवस्था से बाहर रहे। इनमें स्मार्टफोन, बैंक खाते और सीमाओं से संबंधित अड़चनें शामिल हैं। हार्डवेयर से जुड़ी समस्या पर उन्होंने यूपीआई 123पे के विस्तार का उल्लेख किया। उनके मुताबिक 20 करोड़ से अधिक फीचर फोन यूजर्स डिजिटल अर्थव्यवस्था से बाहर थे। इंटरनेट के बिना एसएमएस, आईवीआर, मिस्ड कॉल और वॉयस तकनीक के जरिए यह सिस्टम यूपीआई की सुविधाएं फीचर फोन तक पहुंचाता है। प्रमुख कंपनियों के साथ साझेदारी में अब तक आठ लाख से अधिक ऐसे सक्षम डिवाइस भेजे जा चुके हैं।

    उन्होंने यूपीआई सर्किल का भी उल्लेख किया, जिसके जरिए मुख्य अकाउंट धारक अपने आश्रितों को सुरक्षित तरीके से खर्च करने की अनुमति दे सकते हैं। सीमा से जुड़ी बाधाओं को कम करने के लिए सिंगापुर, यूएई, फ्रांस और नेपाल में यात्रियों के लिए यूपीआई का विस्तार किया गया है। एनआरई और एनआरओ खातों के माध्यम से 3.5 करोड़ से अधिक एनआरआई के लिए डिजिटल भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है।

    धन और बचत को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए समीर ने ‘सैशेकरण की विचारधारा’ पेश की। इसके तहत बड़े वित्तीय निवेश को छोटी रोजमर्रा की आदतों में बदलने पर जोर है। फोनपे डेली एफडी के जरिए 100 रुपये प्रतिदिन से बैंक स्तर की एफडी शुरू की जा सकती है। डेली गोल्ड, सिल्वर और म्यूचुअल फंड एसआईपी की शुरुआत 10 रुपये से होती है।

    निवेश संबंधी मार्गदर्शन के लिए उन्होंने सीआरआईएसपी का जिक्र किया, जो रियल-टाइम बाजार की जानकारी उपलब्ध कराता है। उन्होंने बताया कि यह हाई नेटवर्थ यूजर्स की जरूरतों के अनुसार एकमुश्त निवेश और एफएंडओ ट्रेडिंग तक विस्तार कर सकता है।

    क्रेडिट की पहुंच बढ़ाने को लेकर समीर ने बताया कि फोनपे का एआई आधारित अंडरराइटिंग सिस्टम 2.5 मिनट में लोन वितरण संभव बना रहा है। उन्होंने कहा कि रोजाना के सेटलमेंट इतिहास को क्रेडिट स्कोर के तौर पर इस्तेमाल करते हुए ऑटोमेटेड डेली-रिपेमेंट मर्चेंट लोन के जरिए उन लोगों तक भी क्रेडिट पहुंचाया जा रहा है, जिनका पारंपरिक क्रेडिट स्कोर नहीं है। उन्होंने विश क्रेडिट कार्ड का भी उल्लेख किया, जो पहली बार कर्ज लेने वालों को साधारण एफडी के जरिए क्रेडिट हिस्ट्री बनाने में मदद करता है। एसबीआई और एचडीएफसी के साथ साझेदारी में यूपीआई पर रुपे क्रेडिट कार्ड जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

    मर्चेंट इकोसिस्टम के लिए फोनपे बिजनेस ऐप को नए रूप में पेश किया गया है। इसमें हाइपरलोकल ऑनलाइन विज्ञापन, व्यक्तिगत बाजार जानकारी और बिना कोडिंग पेमेंट सेटअप की सुविधा शामिल है। स्मार्टकनेक्ट, स्मार्टस्टोर और फोनपे पेमेंट गेटवे के साथ डेटा आधारित सीआरएम, लॉयल्टी इंजन, स्मार्ट स्पीकर और एआई ऑडियो अलर्ट जैसी सुविधाएं भी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं।

    सत्र के अंत में समीर ने फोनपे प्लस प्रो पेश किया। यह हाइपरलोकल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म हर महीने होने वाले 11 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन से डेटा प्राप्त करता है और 40 वर्ग मीटर तक के छोटे भौगोलिक क्षेत्र के स्तर पर जानकारी उपलब्ध कराता है। इसका उद्देश्य कारोबारियों और नीति निर्माताओं को रणनीतिक विकास संबंधी फैसलों में मदद करना है।

  • पश्चिम एशिया तनाव और महंगे कच्चे तेल के दबाव में शेयर बाजार लगातार तीसरे दिन गिरा, सेंसेक्स 813 अंक टूटा

    पश्चिम एशिया तनाव और महंगे कच्चे तेल के दबाव में शेयर बाजार लगातार तीसरे दिन गिरा, सेंसेक्स 813 अंक टूटा

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज की गई। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंचने के कारण निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ी रही। कारोबार के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी दोनों प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे और बाजार लाल निशान में बंद हुआ। सेंसेक्स में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट रही, जबकि निफ्टी भी कमजोर होकर 23,500 के स्तर से नीचे चला गया।

    बाजार बंद होने पर बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 813.35 अंक यानी 1.08 प्रतिशत टूटकर 74,764.23 पर पहुंच गया। एनएसई का निफ्टी 50 भी 203.60 अंक यानी 0.86 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,431.50 पर बंद हुआ। लगातार तीसरे सत्र की गिरावट ने बाजार में बनी कमजोर धारणा को और मजबूत किया।

    सेंसेक्स पिछले कारोबारी सत्र के 75,577.58 के स्तर के मुकाबले 361.36 अंक यानी 0.47 प्रतिशत की गिरावट के साथ 75,216.22 पर खुला था। कारोबार के दौरान बिकवाली बढ़ने से यह दिन के निचले स्तर 74,764.23 तक पहुंच गया। इस स्तर पर सूचकांक में 813.35 अंक यानी 1.08 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई।

    निफ्टी 50 भी अपने पिछले बंद स्तर 23,635.10 के मुकाबले 113 अंक यानी 0.47 प्रतिशत नीचे 23,522.05 पर खुला। दिन के कारोबार में यह और फिसलकर 23,431.50 के निचले स्तर तक पहुंच गया। इस तरह निफ्टी में दिन के दौरान 203.60 अंक यानी 0.86 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    व्यापक बाजारों में भी निवेशकों का रुख कमजोर रहा। निफ्टी मिडकैप 0.51 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप 0.48 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए। क्षेत्रवार कारोबार में निफ्टी आईटी सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ और इसमें 3.24 प्रतिशत की गिरावट रही। निफ्टी रियल्टी 2.23 प्रतिशत तथा निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज 1.23 प्रतिशत कमजोर हुए। निफ्टी एफएमसीजी, प्राइवेट बैंक, मीडिया और फार्मा सूचकांक भी गिरावट के साथ बंद हुए।

    इसके विपरीत निफ्टी मेटल में 1.79 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। निफ्टी 50 में अदाणी एंटरप्राइजेज, मैक्स हेल्थ, अदाणी पोर्ट्स, कोल इंडिया, टाटा स्टील, हिंडाल्को, अपोलो हॉस्पिटल और एनटीपीसी प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में रहे। इन कंपनियों के शेयरों में करीब पांच से एक प्रतिशत तक की तेजी दर्ज हुई। दूसरी तरफ इंफोसिस, एचडीएफसी लाइफ, एचसीएल टेक और टेक महिंद्रा सबसे ज्यादा कमजोर शेयरों में शामिल रहे।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशक पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की आशंका को ध्यान में रखते हुए बाजार की कीमतों का आकलन कर रहे हैं। लगातार जारी लड़ाई और जवाबी कार्रवाई के कारण निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने की संभावना बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

    विशेषज्ञों ने कहा कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहने पर प्रमुख केंद्रीय बैंकों के सामने आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन कायम करने की चुनौती बढ़ सकती है। ऊर्जा की बढ़ती लागत आर्थिक गतिविधियों और कीमतों की स्थिरता दोनों के लिए जोखिम पैदा कर रही है। बॉन्ड यील्ड और करेंसी बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों के सतर्क रहने की संभावना है। इससे जोखिम लेने की उनकी क्षमता सीमित रह सकती है और बाजार की धारणा पर दबाव बना रह सकता है।

  • कोफोर्ज के बोर्ड मूल्यांकन में सामने आई खामियों के बाद चेयरमैन ओपी भट्ट ने इस्तीफा दिया, शेयर करीब नौ प्रतिशत तक टूटा

    कोफोर्ज के बोर्ड मूल्यांकन में सामने आई खामियों के बाद चेयरमैन ओपी भट्ट ने इस्तीफा दिया, शेयर करीब नौ प्रतिशत तक टूटा

    नई दिल्ली । मिडकैप आईटी कंपनी कोफोर्ज के इंटरनल ऑडिट में बोर्ड मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर चिंताएं सामने आने के बाद कंपनी के नॉन-एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर और चेयरमैन ओपी भट्ट ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। भट्ट के इस्तीफे की जानकारी सामने आने के बाद बुधवार को कंपनी के शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली और कारोबार के दौरान स्टॉक करीब नौ प्रतिशत तक नीचे चला गया।

    कारोबार के दौरान कोफोर्ज के शेयर ने 1,780.70 रुपये का इंट्राडे निचला स्तर दर्ज किया। यह स्तर कंपनी के पिछले बंद भाव 1,950 रुपये की तुलना में करीब 8.71 प्रतिशत कम था। हालांकि बाद में शेयर में कुछ सुधार दिखाई दिया। सुबह 10:45 बजे तक कोफोर्ज का शेयर 4.50 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 1,862 रुपये पर कारोबार कर रहा था।

    कंपनी की रेगुलेटरी फाइलिंग के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही के इंटरनल ऑडिट प्लान के तहत इंटरनल ऑडिटर ने बोर्ड इवैल्यूएशन प्रक्रिया की समीक्षा की। इसके साथ ही उस प्रक्रिया से तैयार की गई बोर्ड इवैल्यूएशन रिपोर्ट यानी बीईआर की भी जांच की गई। यह पूरी प्रक्रिया ओपी भट्ट की देखरेख में हुई थी।

    ऑडिट के दौरान बोर्ड के मूल्यांकन से संबंधित जानकारी को प्रोसेस करने और उसके डिस्क्लोजर से जुड़ी कुछ कमियां सामने आईं। इन कमियों में चेयरमैन के प्रदर्शन के मूल्यांकन से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जब बोर्ड इवैल्यूएशन रिपोर्ट को बोर्ड के सामने रखा गया, तब उसमें मौजूद या उससे संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां बोर्ड के सदस्यों के सामने पूरी तरह प्रस्तुत नहीं की गई थीं।

    इंटरनल ऑडिटर की रिपोर्ट सामने आने के बाद बोर्ड ने ओपी भट्ट से इस मामले को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। भट्ट ने अपने पक्ष का बचाव करते हुए कहा कि बोर्ड के मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौरान उन्होंने नेक नीयत से काम किया था। हालांकि, बोर्ड की ओर से उनके स्पष्टीकरण की समीक्षा पूरी होने और मामले पर कोई अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया।

    ओपी भट्ट ने 8 सितंबर को अपने पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद कंपनी ने मौजूदा नॉन-एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर विवेक शर्मा को अंतरिम चेयरमैन नियुक्त किया है। यह नियुक्ति 31 जनवरी, 2027 तक प्रभावी रहेगी।

    कंपनी के अनुसार, ओपी भट्ट वॉकहार्ट लिमिटेड के इंडिपेंडेंट डायरेक्टर भी हैं। वहां वह ऑडिट, स्टेकहोल्डर्स रिलेशनशिप और कैपिटल जुटाने से संबंधित कमेटियों के सदस्य के तौर पर जुड़े हुए हैं। इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद कोफोर्ज के शेयर में आई तेज गिरावट ने बाजार में तत्काल प्रतिक्रिया को स्पष्ट किया।

  • सोने के भाव में लगातार दूसरे दिन बड़ी गिरावट, 2150 रुपये टूटा रेट, चांदी 600 रुपये महंगी

    सोने के भाव में लगातार दूसरे दिन बड़ी गिरावट, 2150 रुपये टूटा रेट, चांदी 600 रुपये महंगी

    नई दिल्ली । सोने की कीमतों में गिरावट का सिलसिला लगातार दूसरे दिन भी जारी रहा। मंगलवार को राष्ट्रीय राजधानी के सर्राफा बाजार में सोने के भाव में 2,150 रुपये की बड़ी कमी दर्ज की गई। कमजोर वैश्विक रुख के बीच 99.9 फीसदी शुद्धता वाला सोना घटकर 1,58,100 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। दूसरी ओर, दो कारोबारी सत्र तक स्थिर रहने के बाद चांदी के भाव में एक बार फिर तेजी देखने को मिली। चांदी 600 रुपये महंगी होकर 2,41,100 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई।

    सोने की कीमत में आई इस गिरावट के बाद 99.9 फीसदी शुद्धता वाले सोने का भाव 2,150 रुपये घट गया। ऑल इंडिया सर्राफा एसोसिएशन के मुताबिक, सोना अब 1,58,100 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर आ गया है। इससे पिछले कारोबारी सत्र में 99.9 फीसदी शुद्धता वाले सोने की कीमत 1,60,250 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुई थी। इस तरह लगातार दूसरे कारोबारी दिन सोने के दाम में गिरावट दर्ज की गई है।

    वहीं, चांदी की कीमतों ने सोने के मुकाबले अलग रुख दिखाया। पिछले दो कारोबारी सत्रों में चांदी का भाव स्थिर रहने के बाद मंगलवार को इसमें 600 रुपये की बढ़ोतरी हुई। इसके साथ ही चांदी की कीमत बढ़कर 2,41,100 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। इस तरह एक तरफ सोने की कीमत लगातार दूसरे दिन नीचे आई, तो दूसरी तरफ चांदी ने दो सत्र की स्थिरता के बाद फिर तेजी दर्ज की।

    सोने और चांदी की कीमतों में हुए इस बदलाव के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजारों के रुख को प्रमुख वजह बताया गया है। वैश्विक बाजारों में कमजोर रुख का असर सोने की कीमतों पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की चाल का प्रभाव घरेलू बाजार में भी दिखाई देता है। इसी के चलते मंगलवार को दिल्ली के सर्राफा बाजार में सोने के भाव में तेज गिरावट देखने को मिली।

    हालांकि, चांदी ने इस दौरान अलग दिशा में कारोबार किया। दो कारोबारी सत्र तक कीमत स्थिर रहने के बाद मंगलवार को चांदी के भाव में 600 रुपये की तेजी आई। इससे इसकी कीमत 2,41,100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। यानी मंगलवार के कारोबार में सोने और चांदी के दाम में विपरीत रुख देखने को मिला।

    अगर आज सोना और चांदी खरीदने की योजना है, तो सोने की कीमत में लगातार दूसरे दिन आई गिरावट खरीदारों के लिए राहत वाली खबर है। हालांकि, सोने का भाव अभी भी 1.58 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। ऐसे में शादी या तीज-त्योहार के लिए सोना खरीदने वाले लोग अपने बजट और मौजूदा रेट को ध्यान में रखते हुए खरीदारी का फैसला कर सकते हैं। दूसरी ओर, चांदी के भाव में 600 रुपये की बढ़ोतरी हुई है, जिससे दोनों कीमती धातुओं के आज के रेट में अलग-अलग बदलाव देखने को मिला है।

  • Nifty vs Sensex: आखिर निवेशकों के लिए कौन सा इंडेक्स है ज्यादा बेहतर, 50 शेयरों वाला निफ्टी या 30 कंपनियों वाला सेंसेक्स

    Nifty vs Sensex: आखिर निवेशकों के लिए कौन सा इंडेक्स है ज्यादा बेहतर, 50 शेयरों वाला निफ्टी या 30 कंपनियों वाला सेंसेक्स


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि निफ्टी बेहतर है या सेंसेक्स। रोजाना बाजार की खबरों में इन दोनों इंडेक्स के चढ़ने और गिरने की चर्चा होती है लेकिन कई निवेशक इनके बीच का वास्तविक अंतर नहीं समझ पाते। पहली बात यह जानना जरूरी है कि निफ्टी और सेंसेक्स दोनों भारत के प्रमुख शेयर बाजार इंडेक्स हैं और दोनों का उद्देश्य देश की बड़ी कंपनियों तथा बाजार की दिशा का संकेत देना है। हालांकि दोनों की संरचना और कवरेज में अंतर है। निफ्टी 50 नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई की 50 प्रमुख कंपनियों को दर्शाता है जबकि सेंसेक्स बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई की 30 बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दिखाता है। दोनों इंडेक्स फ्री फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर तैयार किए जाते हैं और इनमें शामिल बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन इंडेक्स की दिशा पर असर डालता है।

    अगर केवल कंपनियों की संख्या के आधार पर देखा जाए तो निफ्टी का दायरा सेंसेक्स से बड़ा है। निफ्टी में 50 कंपनियां शामिल होने के कारण इसमें सेक्टरों की भागीदारी अपेक्षाकृत व्यापक मानी जाती है। सेंसेक्स में केवल 30 कंपनियां हैं लेकिन इनमें भी भारत की कई बड़ी और प्रभावशाली कंपनियां शामिल रहती हैं। यही कारण है कि दोनों इंडेक्स अक्सर एक जैसी दिशा में चलते दिखाई देते हैं। जब देश के बड़े बैंक आईटी कंपनियां ऊर्जा क्षेत्र या दूसरे प्रमुख सेक्टरों के शेयरों में तेजी या गिरावट आती है तो उसका असर निफ्टी और सेंसेक्स दोनों पर पड़ सकता है।

    निवेशकों के लिए यह समझना भी जरूरी है कि किसी इंडेक्स का अंक अधिक होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह दूसरे इंडेक्स से बेहतर है। कई नए निवेशक सेंसेक्स के बड़े अंक को देखकर इसे निफ्टी से अधिक मजबूत या महंगा मान लेते हैं लेकिन यह सही तरीका नहीं है। दो इंडेक्स की तुलना हमेशा प्रतिशत के आधार पर की जानी चाहिए। सेंसेक्स में 500 अंकों की गिरावट और निफ्टी में 200 अंकों की गिरावट को सीधे तुलना नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों का स्तर अलग है। इसलिए बाजार की वास्तविक चाल समझने के लिए प्रतिशत बदलाव अधिक महत्वपूर्ण होता है।

    अगर कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए इंडेक्स फंड या ईटीएफ के जरिए निवेश करने पर विचार कर रहा है तो निफ्टी 50 को अक्सर व्यापक कवरेज के कारण देखा जाता है। निफ्टी 50 भारत की 50 प्रमुख कंपनियों और कई महत्वपूर्ण सेक्टरों को कवर करता है तथा यह फंड पोर्टफोलियो की तुलना और इंडेक्स आधारित निवेश के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। वहीं सेंसेक्स उन निवेशकों के लिए भी उपयोगी बेंचमार्क है जो भारत की चुनिंदा 30 बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन के आधार पर बाजार की दिशा समझना चाहते हैं।

    हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर निवेशक के लिए केवल निफ्टी ही बेहतर है या सेंसेक्स ही सबसे अच्छा विकल्प है। दोनों प्रमुख बाजार इंडेक्स हैं और लंबी अवधि में इनके प्रदर्शन की दिशा अक्सर काफी हद तक मिलती जुलती रही है। सही विकल्प निवेशक के लक्ष्य जोखिम लेने की क्षमता निवेश अवधि और चुने गए निवेश उत्पाद के खर्च जैसे कारकों पर निर्भर करता है। इंडेक्स फंड या ईटीएफ चुनते समय केवल निफ्टी या सेंसेक्स का नाम देखने के बजाय एक्सपेंस रेशियो ट्रैकिंग एरर और निवेश की अवधि पर भी ध्यान देना चाहिए।

    कुल मिलाकर बाजार को व्यापक रूप से समझने और 50 बड़ी कंपनियों की भागीदारी देखने के लिए निफ्टी 50 को अधिक विस्तृत प्रतिनिधित्व वाला इंडेक्स माना जा सकता है जबकि सेंसेक्स 30 प्रमुख कंपनियों के जरिए बाजार की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करता है। दोनों में से कौन बेहतर है इसका जवाब हर निवेशक के लिए अलग हो सकता है। निवेश का फैसला केवल इंडेक्स के पिछले प्रदर्शन के आधार पर नहीं बल्कि अपने वित्तीय लक्ष्य और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है इसलिए बिना समझे केवल तेजी के दौर को देखकर निवेश करने के बजाय पूरी जानकारी और जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार की सलाह के साथ कदम उठाना बेहतर है।

    निफ्टी 50 में 50 कंपनियां और सेंसेक्स में 30 कंपनियां शामिल हैं तथा दोनों फ्री फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन पद्धति का उपयोग करते हैं। निफ्टी का कवरेज अपेक्षाकृत व्यापक है लेकिन दोनों प्रमुख इंडेक्स भारत की बड़ी कंपनियों और बाजार की दिशा को दर्शाते हैं।

  • अंबानी को एक दिन में ₹20 हजार करोड़ का झटका, मस्क की दौलत ₹3.23 लाख करोड़ बढ़ी

    अंबानी को एक दिन में ₹20 हजार करोड़ का झटका, मस्क की दौलत ₹3.23 लाख करोड़ बढ़ी


    नई दिल्ली। दुनिया के दिग्गज अरबपतियों की संपत्ति में शेयर बाजार की चाल के साथ बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में बुधवार को 2.11 अरब डॉलर यानी 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की गिरावट आई। इसका असर उनकी वैश्विक रैंकिंग पर भी पड़ा और वे ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स में एक स्थान नीचे खिसककर 24वें नंबर पर पहुंच गए। उनकी कुल संपत्ति अब 86 अरब डॉलर बताई गई है।

    इसके उलट दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क के लिए मंगलवार का दिन बेहद शानदार रहा। स्पेसएक्स और टेस्ला के शेयरों में जोरदार तेजी से उनकी संपत्ति में एक ही दिन में 34.1 अरब डॉलर से ज्यादा का इजाफा हुआ। भारतीय मुद्रा में यह रकम 3.20 लाख करोड़ रुपए से अधिक बैठती है। मस्क की नेटवर्थ अब 938 अरब डॉलर हो गई है और वे खरबपति बनने के बेहद करीब पहुंच गए हैं।

    कभी एशिया के सबसे अमीर थे अंबानी

    मुकेश अंबानी की संपत्ति एक समय 100 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुकी थी और वे एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति थे। अब तस्वीर बदल गई है। चीन के झांग यिमिंग उनसे आगे निकल चुके हैं। झांग की नेटवर्थ 92.8 अरब डॉलर है और वे दुनिया के अमीरों की सूची में 21वें स्थान पर हैं।

    अंबानी इस साल अब तक 21.7 अरब डॉलर गंवा चुके हैं। वहीं झांग यिमिंग की संपत्ति में इस साल 27.7 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है। एशिया के अमीरों में अब गौतम अडानी पहले स्थान पर हैं। उनकी नेटवर्थ 109 अरब डॉलर है और वैश्विक सूची में वे 18वें नंबर पर हैं। इस साल अडानी की संपत्ति में 24.1 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है।

    रिलायंस के शेयरों में गिरावट बनी वजह

    अरबपतियों की संपत्ति में बदलाव का सीधा संबंध उनके पास मौजूद कंपनियों के शेयरों से होता है। मुकेश अंबानी की नेटवर्थ का बड़ा हिस्सा रिलायंस इंडस्ट्रीज में उनकी हिस्सेदारी से जुड़ा है। मंगलवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 1.34 प्रतिशत गिर गया। शेयर में इस गिरावट का असर अंबानी की संपत्ति पर पड़ा और उनकी नेटवर्थ करीब 2.11 अरब डॉलर घट गई।

    खरबपति बनने से 62 अरब डॉलर दूर मस्क

    एलन मस्क की संपत्ति में मंगलवार को आए उछाल ने उन्हें खरबपति बनने की दौड़ में और आगे कर दिया। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक उनकी नेटवर्थ अब 938 अरब डॉलर है। यानी 1 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा छूने के लिए उन्हें करीब 62 अरब डॉलर और चाहिए।

    मस्क की संपत्ति में यह तेज बढ़ोतरी मुख्य रूप से स्पेसएक्स और टेस्ला के शेयरों में आई तेजी से हुई है।

    दुनिया के टॉप-10 अरबपति

    ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक शीर्ष 10 अमीरों की सूची में एलन मस्क सबसे आगे हैं। उनके बाद लैरी पेज और जेफ बेजोस का नंबर है।

    अरबपति नेटवर्थ अरब डॉलर में
    एलन मस्क 938
    लैरी पेज 291
    जेफ बेजोस 279
    सर्गेई ब्रिन 270
    माइकल डेल 254
    मार्क जुकरबर्ग 218
    लैरी एलिसन 217
    जेनसेन हुआंग 187
    स्टीव बाल्मर 173
    बर्नार्ड अर्नाल्ट 149

    टॉप-10 में अमेरिकी अरबपतियों का दबदबा है। इस सूची में फ्रांस के बर्नार्ड अर्नाल्ट अकेले गैर-अमेरिकी अरबपति हैं। ब्लूमबर्ग के अनुसार अर्नाल्ट इस साल अब तक 58.7 अरब डॉलर गंवा चुके हैं और फिलहाल 10वें स्थान पर हैं।

    अब नजर इस बात पर है कि क्या अर्नाल्ट अपनी टॉप-10 रैंकिंग बचा पाएंगे। अगर उनकी संपत्ति में और गिरावट आती है और वॉरेन बफेट की नेटवर्थ बढ़ती है, तो बफेट 10वें स्थान पर पहुंच सकते हैं। बफेट फिलहाल 144 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 11वें नंबर पर हैं। ऐसे में आने वाले हफ्तों में यह तस्वीर साफ हो सकती है कि दुनिया के शीर्ष 10 अरबपतियों की सूची पर अमेरिकी अरबपतियों का पूरी तरह कब्जा होता है या नहीं।

  • सोना महंगा तो चांदी सस्ती क्यों दिख रही, गोल्ड-सिल्वर रेशियो और फेयर वैल्यू से समझिए दोनों धातुओं की कीमत का अंतर

    सोना महंगा तो चांदी सस्ती क्यों दिख रही, गोल्ड-सिल्वर रेशियो और फेयर वैल्यू से समझिए दोनों धातुओं की कीमत का अंतर

    नई दिल्ली ।मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर मंगलवार, 8 सितंबर को सोने और चांदी के वायदा भाव में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला। कमजोर अमेरिकी डॉलर और अमेरिका की मौद्रिक नीति को लेकर बनी उम्मीदों से कीमती धातुओं को समर्थन मिला। अक्टूबर गोल्ड फ्यूचर्स 1.53 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर रहा और इसमें 0.14 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई। दूसरी ओर दिसंबर सिल्वर फ्यूचर्स 2.38 लाख रुपये प्रति किलो पर रहा, जिसमें 0.08 प्रतिशत की गिरावट आई।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 4,434 डॉलर प्रति औंस और चांदी लगभग 66.95 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रही थी। दोनों धातुओं पर मौजूदा आर्थिक संकेतों का प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन उनकी कीमत और वैल्यूएशन की स्थिति एक जैसी नहीं है।

    सोने की मॉडल्ड फेयर वैल्यू 3,248 से 4,595 डॉलर प्रति औंस के बीच बताई गई है। इसका मिडपॉइंट 3,922 डॉलर प्रति औंस है। अगस्त की शुरुआत में सोना करीब 4,242 डॉलर प्रति औंस पर था, जो अनुमानित मिडपॉइंट से करीब 8 प्रतिशत अधिक था। जनवरी में सोना 5,589 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक पहुंचा था, जो मॉडल्ड रेंज से काफी ऊपर था।

    इसके बाद जून में सोने की कीमत लगभग 3,985 डॉलर प्रति औंस तक आई, जो अनुमानित फेयर वैल्यू के करीब थी। बाद में सोने में फिर तेजी देखने को मिली। इसका मतलब यह है कि पहले की तेज सट्टेबाजी कुछ कम हुई है, लेकिन सोना अभी भी मॉडल्ड मिडपॉइंट से ऊपर कारोबार कर रहा है।

    चांदी के मामले में तस्वीर कुछ अलग है। इसकी वैल्यूएशन को गोल्ड-सिल्वर रेशियो के आधार पर देखा जा रहा है। 60:1 के सामान्य रेशियो के अनुसार चांदी की अनुमानित कीमत 54 से 77 डॉलर प्रति औंस के बीच बनती है, जिसका मिडपॉइंट 65 डॉलर है। विश्लेषण के अनुसार चांदी करीब 61.7 डॉलर प्रति औंस पर थी, यानी मिडपॉइंट से लगभग 6 प्रतिशत नीचे।

    गोल्ड-सिल्वर रेशियो भी चांदी की तुलनात्मक स्थिति को समझने में मदद करता है। जनवरी में यह अनुपात करीब 46 तक पहुंच गया था, जिसका मतलब था कि सोने की तुलना में चांदी महंगी हो गई थी। अब यह लगभग 69 पर पहुंच चुका है, जो 21वीं सदी के करीब 69:1 के औसत के आसपास है।

    चांदी को केवल निवेश मांग से ही समर्थन नहीं मिलता। इसका इस्तेमाल औद्योगिक कार्यों में भी होता है। इसलिए इसकी कीमत पर निवेश मांग के साथ औद्योगिक मांग का भी प्रभाव पड़ता है। रुपये की कमजोरी भी घरेलू MCX सिल्वर के लिए समर्थन देने वाला कारक मानी जा रही है।

    MCX सिल्वर के लिए 2.36 लाख रुपये प्रति किलो का स्तर सपोर्ट और 2.42 लाख रुपये प्रति किलो का स्तर रेजिस्टेंस बताया गया है। यदि चांदी रेजिस्टेंस के ऊपर टिकती है तो खरीदारी बढ़ने की संभावना बताई गई है।

    अब बाजार की नजर अमेरिका के आने वाले महंगाई आंकड़ों पर है। PPI और CPI जैसे आंकड़े फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदों को प्रभावित कर सकते हैं। सोने के लिए 4,300 से 4,500 डॉलर प्रति औंस और चांदी के लिए 65 से 67 डॉलर प्रति औंस के स्तर महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

    भारतीय निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ रुपये की चाल भी अहम है। अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने के साथ रुपया कमजोर होने पर घरेलू सोने-चांदी की कीमतों में तेजी अधिक दिख सकती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट की स्थिति में कमजोर रुपया घरेलू कीमतों में गिरावट को कुछ हद तक सीमित कर सकता है।

  • अगस्त 2026 में ईवी बिक्री रिकॉर्ड 2.98 लाख यूनिट पार, बाजार हिस्सेदारी 12.3 प्रतिशत पहुंची, चारों सेगमेंट में मजबूत प्रदर्शन

    अगस्त 2026 में ईवी बिक्री रिकॉर्ड 2.98 लाख यूनिट पार, बाजार हिस्सेदारी 12.3 प्रतिशत पहुंची, चारों सेगमेंट में मजबूत प्रदर्शन

    नई दिल्ली ।भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग लगातार मजबूत हो रही है। अगस्त 2026 में देश में ईवी की खुदरा बिक्री 52.9 प्रतिशत की सालाना वृद्धि के साथ रिकॉर्ड 2,98,448 यूनिट पर पहुंच गई। इसके साथ कुल वाहन बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 12.3 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त 2025 में यह 9.5 प्रतिशत थी।

    अगस्त में इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया, यात्री वाहन और वाणिज्यिक वाहन, चारों प्रमुख श्रेणियों में अब तक की सबसे अधिक मासिक खुदरा बिक्री दर्ज की गई। आंकड़ों से संकेत मिलता है कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।

    इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की बिक्री अगस्त में 67.05 प्रतिशत बढ़कर 1,83,204 यूनिट रही। हालांकि जुलाई 2026 में दर्ज 2,04,362 यूनिट की तुलना में अगस्त में बिक्री कुछ कम रही। इस श्रेणी में टीवीएस मोटर 48,938 यूनिट के साथ पहले स्थान पर रही। बजाज ऑटो ने 41,114 और एथर एनर्जी ने 28,757 यूनिट बेचीं। ओला इलेक्ट्रिक की बिक्री 13,852 यूनिट रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 29 प्रतिशत कम है। इलेक्ट्रिक दोपहिया की बाजार हिस्सेदारी 7.7 प्रतिशत से बढ़कर 10.7 प्रतिशत हो गई।

    इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों की बिक्री 25.28 प्रतिशत बढ़कर 79,846 यूनिट पहुंच गई। इस श्रेणी में इलेक्ट्रिक वाहनों की पैठ 56.6 प्रतिशत से बढ़कर 65.3 प्रतिशत हो गई। बजाज ऑटो ने 13,833 यूनिट के साथ सबसे अधिक बिक्री की। महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी ने 12,806 और टीवीएस मोटर ने 4,415 यूनिट बेचीं।

    इलेक्ट्रिक वाणिज्यिक वाहन सबसे तेजी से बढ़ने वाले सेगमेंट के रूप में सामने आए। अगस्त में इनकी बिक्री करीब तीन गुना बढ़कर 4,702 यूनिट रही, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 1,631 यूनिट था। बाजार हिस्सेदारी भी 2.06 प्रतिशत से बढ़कर 5.18 प्रतिशत हो गई। टाटा मोटर्स ने 1,416 यूनिट के साथ इस श्रेणी में बढ़त बनाए रखी। यूलर मोटर्स ने 849 और सैनी हेवी इंडस्ट्री इंडिया ने 605 यूनिट बेचीं।

    इलेक्ट्रिक यात्री वाहनों की बिक्री 51.89 प्रतिशत बढ़कर 30,696 यूनिट रही। इस श्रेणी में ईवी की बाजार हिस्सेदारी 5.8 प्रतिशत से बढ़कर 7.6 प्रतिशत हो गई। टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स ने 13,158 यूनिट के साथ सबसे अधिक बिक्री दर्ज की। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने 6,464 और जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया ने 4,622 यूनिट बेचीं। नई कंपनियों में विनफास्ट ऑटो इंडिया की बिक्री 2,199 यूनिट और टेस्ला इंडिया मोटर्स एंड एनर्जी की बिक्री 116 यूनिट रही।

    फाडा के अध्यक्ष साई गिरिधर ने अगस्त 2026 को भारतीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी उद्योग के इतिहास का सबसे बड़ा अगस्त महीना बताया। उन्होंने इलेक्ट्रिक वाणिज्यिक वाहन सेगमेंट के प्रदर्शन को खास तौर पर उल्लेखनीय बताया और कहा कि फ्लीट विद्युतीकरण अब परीक्षण से आगे बढ़कर वास्तविक खरीद निर्णयों तक पहुंच गया है।

    उन्होंने कहा कि गैर-त्योहारी मौसम के बावजूद इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, जबकि इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहन संरचनात्मक रूप से इलेक्ट्रिक श्रेणी में बदल चुके हैं। उनके अनुसार, ईवी की वृद्धि अब केवल सरकारी प्रोत्साहनों तक सीमित नहीं है। कम परिचालन लागत, बढ़ता चार्जिंग नेटवर्क, उपभोक्ताओं का बढ़ता विश्वास, पीएम ई-ड्राइव योजना और राज्यों की अनुकूल नीतियां मिलकर इस बदलाव को आगे बढ़ा रही हैं।

  • अनिल अंबानी की बढ़ी मुश्किलें, केनरा बैंक की जांच में कर्ज की रकम तय उद्देश्य से अलग इस्तेमाल करने की बात सामने आई

    अनिल अंबानी की बढ़ी मुश्किलें, केनरा बैंक की जांच में कर्ज की रकम तय उद्देश्य से अलग इस्तेमाल करने की बात सामने आई

    नई दिल्ली । अनिल अंबानी और उनकी कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। केनरा बैंक ने अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशंस की सहायक कंपनी रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड को विलफुल डिफॉल्टर घोषित किया है। बैंक की ओर से यह फैसला कर्ज की रकम के कथित तौर पर तय उद्देश्य के अनुरूप इस्तेमाल नहीं किए जाने से जुड़े मामले में लिया गया है।

    विलफुल डिफॉल्टर उस व्यक्ति या कंपनी को कहा जाता है, जिसके पास कर्ज चुकाने के लिए पर्याप्त संपत्ति या संसाधन होने के बावजूद वह जानबूझकर कर्ज का भुगतान नहीं करता। इस मामले में बैंक की जांच के दौरान फंड के इस्तेमाल और उससे जुड़े लेनदेन को लेकर कई सवाल सामने आए हैं।

    रिलायंस कम्युनिकेशंस ने 8 सितंबर 2026 को इस घटनाक्रम की जानकारी एक्सचेंज फाइलिंग के जरिए दी। फाइलिंग के मुताबिक, केनरा बैंक की विलफुल डिफॉल्टर रिव्यू कमेटी ने 31 अगस्त 2026 को हुई बैठक में यह फैसला लिया। बैंक की जांच में पाया गया कि कंपनी ने बैंक से प्राप्त फंड का इस्तेमाल उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया, जिनके लिए कर्ज लिया गया था।

    बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस ग्रुप की कंपनियों आरकॉम, रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड और रिलायंस इंफ्राटेल लिमिटेड ने बैंकों से कुल 31,580 करोड़ रुपये प्राप्त किए थे। जांच में इन कंपनियों से जुड़े निवेश और रकम के इस्तेमाल को लेकर विसंगतियां सामने आने की बात कही गई है।

    बैंक का आरोप है कि इन निवेशों को तुरंत भुनाया गया और संबंधित तथा गैर-संबंधित पक्षों को भुगतान करने में इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, नेटिजन नामक एक इकाई से जुड़े संदिग्ध लेनदेन के माध्यम से फंड डायवर्ट किए जाने की बात भी जांच में सामने आई है। इन्हीं बिंदुओं के आधार पर बैंक ने विलफुल डिफॉल्टर संबंधी कार्रवाई की है।

    हालांकि, रिलायंस कम्युनिकेशंस ने इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। कंपनी के मुताबिक आरकॉम और रिलायंस टेलीकॉम लिमिटेड दोनों वर्तमान में कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत हैं। कंपनी का कहना है कि केनरा बैंक से जुड़ा यह मामला दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले की अवधि का है।

    कंपनी ने बताया कि लेनदारों की समिति पहले ही समाधान योजनाओं को मंजूरी दे चुकी है और ये योजनाएं अब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित हैं। कंपनी ने दिवाला और दिवालियापन संहिता की धारा 32A के तहत मिलने वाली सुरक्षा का भी उल्लेख किया है। उसके अनुसार, समाधान योजना को मंजूरी मिलने के बाद पिछले अपराधों के लिए कानूनी सुरक्षा का प्रावधान है।

    रिलायंस कम्युनिकेशंस ने यह भी कहा है कि वह पूरे घटनाक्रम को लेकर कानूनी सलाह ले रही है। कंपनी के अनुसार, अनिल अंबानी 15 नवंबर 2019 से ही रिलायंस कम्युनिकेशंस के चेयरमैन और निदेशक पद से इस्तीफा दे चुके हैं।

    इस घटनाक्रम से अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े कर्ज और दिवाला मामलों पर एक बार फिर ध्यान गया है। केनरा बैंक की कार्रवाई और कंपनी की ओर से दी गई कानूनी स्थिति के बीच अब आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।