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  • स्पेसएक्स की ऐतिहासिक एंट्री, पहले ही दिन शेयरों में जोरदार उछाल; मार्केट वैल्यू ने बनाया नया रिकॉर्ड

    स्पेसएक्स की ऐतिहासिक एंट्री, पहले ही दिन शेयरों में जोरदार उछाल; मार्केट वैल्यू ने बनाया नया रिकॉर्ड

    नई दिल्ली । एलन मस्क की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कंपनी स्पेसएक्स ने शेयर बाजार में ऐतिहासिक शुरुआत करते हुए निवेशकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। लंबे समय से प्रतीक्षित सार्वजनिक निर्गम के बाद कंपनी के शेयरों में पहले ही कारोबारी दिन जोरदार तेजी देखने को मिली, जिससे यह वर्ष की सबसे चर्चित बाजार घटनाओं में शामिल हो गई।

    लिस्टिंग के बाद कंपनी के शेयरों ने मजबूत प्रदर्शन किया और शुरुआती निवेशकों को उल्लेखनीय लाभ मिला। कारोबार के अंत तक शेयर अपने निर्गम मूल्य से काफी ऊपर बंद हुए। इस तेजी के परिणामस्वरूप कंपनी का कुल बाजार मूल्य रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया और वह दुनिया की सबसे मूल्यवान सार्वजनिक कंपनियों की सूची में शामिल हो गई।

    स्पेसएक्स के सार्वजनिक निर्गम को निवेशकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। संस्थागत और खुदरा दोनों वर्गों के निवेशकों ने इसमें बड़ी रुचि दिखाई। उपलब्ध शेयरों की तुलना में कई गुना अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि निवेशकों के बीच कंपनी को लेकर उत्साह काफी मजबूत है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्पेसएक्स की लोकप्रियता का प्रमुख कारण उसका तेजी से विस्तार करता अंतरिक्ष कारोबार, सैटेलाइट सेवाएं और उन्नत तकनीकी परियोजनाएं हैं। हाल के वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भविष्य की तकनीकों को लेकर निवेशकों की बढ़ती रुचि ने भी कंपनी के प्रति सकारात्मक माहौल तैयार किया है।

    कंपनी की बाजार में मजबूत शुरुआत का लाभ उसके संस्थापक एलन मस्क को भी मिला। कंपनी में उनकी बड़ी हिस्सेदारी के कारण उनकी कुल संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इस घटनाक्रम ने वैश्विक कारोबारी जगत में उनकी स्थिति को और मजबूत किया है।

    हालांकि कुछ बाजार विश्लेषकों ने कंपनी के ऊंचे मूल्यांकन को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका मानना है कि कंपनी के वर्तमान वित्तीय प्रदर्शन और बाजार मूल्य के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। ऐसे में भविष्य में निवेशकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना कंपनी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती हो सकता है।

    इसके बावजूद बाजार की शुरुआती प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि निवेशक स्पेसएक्स को केवल एक अंतरिक्ष कंपनी के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक, नवाचार और वैश्विक कनेक्टिविटी के बड़े अवसरों के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि कंपनी ने अपने पहले ही दिन शेयर बाजार में मजबूत पहचान बनाते हुए एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते की उम्मीद से बाजार में लौटी तेजी, इस सप्ताह सेंसेक्स-निफ्टी में दर्ज की गई शानदार बढ़त

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते की उम्मीद से बाजार में लौटी तेजी, इस सप्ताह सेंसेक्स-निफ्टी में दर्ज की गई शानदार बढ़त


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक स्तर पर सकारात्मक संकेतों और कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी के बीच भारतीय शेयर बाजार ने इस सप्ताह उल्लेखनीय मजबूती दिखाई। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की बढ़ती उम्मीदों ने निवेशकों के भरोसे को मजबूत किया, जिसका असर घरेलू बाजारों पर भी देखने को मिला। लगातार दो सप्ताह की कमजोरी के बाद बाजार ने वापसी करते हुए प्रमुख सूचकांकों को ऊंचे स्तरों तक पहुंचाया।

    सप्ताह के दौरान निवेशकों की धारणा में सुधार का सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद रही। भू-राजनीतिक जोखिमों में कमी की संभावना के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सकारात्मक माहौल बना, जिसका लाभ भारतीय इक्विटी बाजार को मिला। साथ ही ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी ने आयात-निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत का संकेत दिया।

    कारोबारी सप्ताह के अंतिम दिन बाजार में जोरदार खरीदारी देखने को मिली। निफ्टी लगभग दो प्रतिशत की मजबूती के साथ 23,600 अंक के ऊपर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स भी उल्लेखनीय बढ़त दर्ज कर 75,500 अंक के स्तर को पार करने में सफल रहा। पूरे सप्ताह के दौरान दोनों प्रमुख सूचकांकों ने मजबूत प्रदर्शन किया और निवेशकों की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

    विश्लेषकों के अनुसार, वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की ब्याज दर नीति को लेकर बनी अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय बाजार की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है। लार्ज-कैप कंपनियों में निवेशकों का भरोसा कायम रहा, जबकि हाल के महीनों में तेज बढ़त हासिल कर चुके मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में सीमित मुनाफावसूली देखने को मिली।

    वित्तीय क्षेत्र इस सप्ताह बाजार का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा। निजी बैंकों में निवेशकों की सक्रिय खरीदारी और सकारात्मक नियामकीय माहौल ने बैंकिंग शेयरों को समर्थन दिया। इसके अलावा उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्र की कंपनियों में भी अच्छी तेजी दर्ज की गई, क्योंकि निवेशक अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर आय वाले क्षेत्रों की ओर आकर्षित हुए।

    दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र दबाव में बना रहा। अमेरिका में आर्थिक अनिश्चितताओं और तकनीकी खर्च में संभावित कमी की आशंकाओं ने आईटी शेयरों की गति को सीमित किया। वहीं धातु क्षेत्र पर भी दबाव देखने को मिला, क्योंकि चीन में मांग कमजोर रहने की चिंताओं और कमोडिटी कीमतों में नरमी ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली बाजार के लिए चुनौती बनी रही। सप्ताह के दौरान विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर शेयरों की बिक्री की, हालांकि सप्ताह के अंतिम चरण में यह दबाव कुछ कम होता दिखाई दिया। इसके विपरीत घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगातार खरीदारी जारी रखी और बाजार को मजबूत समर्थन प्रदान किया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा कई महत्वपूर्ण आर्थिक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। घरेलू महंगाई से जुड़े आंकड़े, चीन के औद्योगिक उत्पादन के संकेतक और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति निवेशकों की नजर में रहेंगे। यदि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होती है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली घटती है, तो भारतीय शेयर बाजार में तेजी का रुख आगे भी जारी रह सकता है।

  • महंगाई दर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी…. लगातार पांचवें माह बढ़कर 16 माह के उच्च स्तर तक पहुंची

    महंगाई दर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी…. लगातार पांचवें माह बढ़कर 16 माह के उच्च स्तर तक पहुंची


    नई दिल्ली। इ
    स तपती गर्मी में सिर्फ मौसम का पारा ही नहीं चढ़ रहा है, आपके घर का मासिक बजट (Monthly Budget) और रसोई का खर्च (Kitchen Expenses) भी बढ़ रहा है। शुक्रवार को जारी हुए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई (Consumer Price Index-based Inflation) के आधिकारिक आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि आम आदमी की जेब पर चौतरफा बोझ बढ़ रहा है।

    सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, मई में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 16 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई। इसकी प्रमुख वजह चांदी और सोने के गहनों के साथ टमाटर एवं अदरक की कीमतों में तेल उछाल है। अगर खाद्य महंगाई के आंकड़े देखें, तो यह और भी डरावना है। खाद्य महंगाई बीते माह बढ़कर 4.78 फीसदी पर पहुंच गई, जो अप्रैल में 4.20 फीसदी थी।


    महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह

    महंगाई बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा हाथ खाने-पीने की चीजों और व्यक्तिगत रखरखाव के खर्च का है। आंकड़ों के मुताबिक, व्यक्तिगत देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और अन्य विविध वस्तुओं एवं सेवाओं की श्रेणी में महंगाई में सालाना आधार पर 18.46 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। रेस्टोरेंट-होटल जैसी सेवाएं 5.75 फीसदी और पान-तंबाकू 4.83 फीसदी महंगे हुए हैं, जिसने आम आदमी का खर्च बढ़ा दिया है।


    इन चीजों ने बढ़ाया संकट

    – चांदी के गहने : यहां महंगाई का विस्फोट हुआ है और कीमतें एक साल पहले की तुलना में 155.23 फीसदी महंगी हो चुकी हैं।
    – टमाटर : रसोई के राजा टमाटर के दाम 48.43 फीसदी चढ़ चुके हैं।
    – सोने, हीरे और प्लेटिनम के आभूषण : इनकी महंगाई दर भी 40.93 फीसदी पहुंच गई है।
    – अदरक : चाय का स्वाद कड़वा करते हुए यह 32.49 फीसदी महंगा।
    – किशमिश-मुनक्का : सूखे मेवे भी 21.97 फीसदी महंगे बिक रहे हैं।


    यहां राहत

    बढ़ती महंगाई के बीच आलू (-23.71%), हरी मटर (-11.47), मोटर कार एवं जीप (-7.19%), जीरा (-4.59%) और मोटर साइकिल-स्कूटर (-3.56%) की कीमतों में सालाना आधार पर गिरावट आई है।


    इन राज्यों में सर्वाधिक महंगाई दर
    राज्य – महंगाई दर

    तेलंगाना – 6.15%
    तमिलनाडु – 5.11%
    आंध्र प्रदेश – 4.90%
    कर्नाटक – 4.59%
    ओडिशा – 4.54%
    उत्तर प्रदेश – 3.97%
    पंजाब – 3.34%
    हरियाणा – 3.09%
    हिमाचल प्रदेश – 3.05%
    दिल्ली – 2.50%


    शहरों से ज्यादा गांवों में बढ़ी महंगाई

    बीते माह ग्रामीण महंगाई 4.25 फीसदी पर पहुंच गई, जबकि शहरों में यह 3.53 फीसदी दर्ज की गई। खाद्य महंगाई के मामले में भी गांवों का आंकड़ा 4.85 फीसदी है, जबकि शहरों में 4.66 फीसदी। ग्रामीण महंगाई बढ़ने से कपड़े, जूते, बाइक, मोबाइल और रोजमर्रा के सामान की खरीदारी कम हेागी, जिससे कंपनियों की बिक्री-मुनाफे पर चोट पहुंचेगी।

  • वैश्विक राहत संकेतों से भारतीय बाजार में रिकॉर्ड तेजी, बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने बढ़ाई निवेशकों की दौलत

    वैश्विक राहत संकेतों से भारतीय बाजार में रिकॉर्ड तेजी, बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने बढ़ाई निवेशकों की दौलत

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव कम होने के संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार ने सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में शानदार प्रदर्शन किया। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया, जिसके चलते घरेलू बाजार में चौतरफा खरीदारी देखने को मिली। इस तेजी के परिणामस्वरूप निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में करीब 10 लाख करोड़ रुपये का इजाफा दर्ज किया गया।

    कारोबार समाप्त होने पर प्रमुख सूचकांक मजबूत बढ़त के साथ बंद हुए। निवेशकों की सकारात्मक धारणा और वैश्विक संकेतों के समर्थन से बाजार ने पूरे सत्र के दौरान मजबूती बनाए रखी। बड़ी कंपनियों के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी उल्लेखनीय खरीदारी देखने को मिली, जिससे बाजार की व्यापक भागीदारी स्पष्ट हुई।

    बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर लगभग 462 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि निवेशकों ने वैश्विक परिस्थितियों में सुधार की उम्मीदों को सकारात्मक रूप से लिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को सबसे अधिक राहत इस बात से मिली कि पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम होने की संभावना दिखाई दी।

    कारोबारी सत्र के दौरान बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के शेयरों में मजबूत खरीदारी दर्ज की गई। निजी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के शेयरों ने बाजार को ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई प्रमुख कंपनियों के शेयरों में दो से तीन प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई, जिससे प्रमुख सूचकांकों को मजबूती मिली।

    मिडकैप और स्मॉलकैप वर्ग के शेयरों में भी निवेशकों का उत्साह देखने को मिला। आमतौर पर जोखिम वाले माने जाने वाले इन शेयरों में खरीदारी यह संकेत देती है कि बाजार सहभागियों का भरोसा केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक स्तर पर सकारात्मक धारणा बनी रही। इससे बाजार की मजबूती और अधिक व्यापक दिखाई दी।

    विश्लेषकों के अनुसार, बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की खबरें रहीं। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए चिंता का विषय बना हुआ था। यदि किसी समझौते की दिशा में ठोस प्रगति होती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और निवेश माहौल पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    इसी उम्मीद का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जिसे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए सकारात्मक माना जाता है। कम तेल कीमतें महंगाई के दबाव को घटाने, चालू खाते के संतुलन को बेहतर बनाने और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने में सहायक हो सकती हैं। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में नरमी को शेयर बाजार ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया।

    हालांकि बाजार विशेषज्ञ निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि वैश्विक घटनाक्रमों में किसी भी प्रकार का बदलाव बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकता है। फिर भी मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों का भरोसा मजबूत दिखाई दे रहा है और घरेलू आर्थिक संकेतक भी बाजार को समर्थन प्रदान कर रहे हैं।

    दिनभर की तेज बढ़त ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होने की संभावना भारतीय बाजार के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं, तो आने वाले कारोबारी सत्रों में भी सकारात्मक रुख देखने को मिल सकता है।

  • मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    नई दिल्ली । देश में खुदरा महंगाई दर ने मई 2026 में एक बार फिर बढ़ोतरी का संकेत दिया है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर मई में 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य वस्तुओं की कीमतों में दबाव बढ़ रहा है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है।

    मई के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई का असर अलग-अलग स्तर पर देखने को मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 4.25 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.53 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीण उपभोक्ताओं पर मूल्य वृद्धि का दबाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है।

    खाद्य महंगाई भी मई में बढ़ी है। अप्रैल में जहां खाद्य महंगाई दर 4.20 प्रतिशत थी, वहीं मई में यह बढ़कर 4.78 प्रतिशत तक पहुंच गई। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 4.85 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.66 प्रतिशत दर्ज की गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है, इसलिए इस श्रेणी के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

    हालांकि कुछ प्रमुख वस्तुओं की कीमतों में राहत भी देखने को मिली। सालाना आधार पर आलू की कीमतों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मटर, जीरा तथा मोटर वाहन श्रेणी की कुछ वस्तुओं के दाम भी कम हुए हैं। वाहन बाजार में मोटर कार, जीप, मोटरसाइकिल और स्कूटर की कीमतों में आई गिरावट ने उपभोक्ताओं को कुछ राहत प्रदान की है।

    इसके विपरीत कई वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। चांदी के आभूषणों की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई। इसके अलावा टमाटर, सोना-हीरा-प्लेटिनम आभूषण, अदरक और किशमिश जैसी वस्तुओं के दाम भी उल्लेखनीय रूप से बढ़े हैं। खाद्य और कीमती धातुओं से जुड़े उत्पादों की कीमतों में यह वृद्धि महंगाई के समग्र स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रही।

    राज्यों के स्तर पर देखें तो अधिक आबादी वाले राज्यों में तेलंगाना सबसे अधिक खुदरा महंगाई वाला राज्य रहा। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा का स्थान रहा। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में महंगाई का दबाव अधिक दर्ज किया गया, जिससे स्थानीय उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा कई बाहरी और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ा रही हैं। यदि ऊर्जा लागत में और वृद्धि होती है तो परिवहन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ी लागतें भी बढ़ सकती हैं।

    इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी आगामी वित्त वर्ष के लिए महंगाई अनुमान को ऊपर संशोधित किया है। कमजोर मानसून की आशंका, अल-नीनो का संभावित प्रभाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को प्रमुख जोखिम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बना रहा तो महंगाई दर आने वाले महीनों में आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

  • जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और कृषि क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत ने ब्रिक्स देशों से छोटे और सीमांत किसानों को सशक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास तेज करने का आह्वान किया है। भारत का मानना है कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और टिकाऊ कृषि विकास सुनिश्चित करने के लिए किसानों को आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत रूप से सक्षम बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

    इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सदस्य देशों के बीच गहरा सहयोग वैश्विक कृषि व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि यदि ब्रिक्स देश अपनी सामूहिक क्षमता, अनुभव और संसाधनों का प्रभावी उपयोग करें तो कृषि क्षेत्र में सकारात्मक और दूरगामी बदलाव संभव हैं।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है और वैश्विक कृषि बाजारों में अस्थिरता किसानों के लिए नई कठिनाइयां पैदा कर रही है। इन परिस्थितियों में छोटे किसानों की सुरक्षा और समृद्धि को प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है।

    कृषि मंत्री ने कहा कि दुनिया के अधिकांश देशों में छोटे और सीमांत किसान खाद्य उत्पादन की रीढ़ हैं। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता, बेहतर बाजार और नवाचार आधारित कृषि प्रणालियों तक पहुंच मिलती है तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला भी अधिक मजबूत और स्थिर बनेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों का सशक्तिकरण ही खाद्य सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव है।

    भारत की कृषि उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए चौहान ने कहा कि पिछले एक दशक में देश के कृषि क्षेत्र ने लगातार उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। उन्होंने बताया कि कृषि क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 4.5 प्रतिशत रही है, जो इस क्षेत्र की मजबूती और क्षमता को दर्शाती है। खाद्यान्न उत्पादन में निरंतर वृद्धि ने देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है।

    उन्होंने जानकारी दी कि भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 376 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। वहीं गेहूं उत्पादन करीब 118 मिलियन टन के स्तर पर पहुंच गया है। बागवानी क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है और इसका उत्पादन 378 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। इसके अलावा मत्स्य उत्पादन 19 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया है, जो कृषि से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक विकास का संकेत है।

    सम्मेलन के दौरान मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कृषि नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता है और कृषि क्षेत्र में साझा प्रगति का समर्थन करता है।

    चौहान ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसके माध्यम से करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि देश की लगभग 43 प्रतिशत कार्यशक्ति कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है, जिससे यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

    उन्होंने विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर दिया कि भारत के लगभग 87 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। ऐसे में उनकी आय, उत्पादकता और संसाधनों तक पहुंच बढ़ाना केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का मानना है कि ब्रिक्स देशों का साझा सहयोग कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बना सकता है।

  • आईडीएफसी बैंक फंड दुरुपयोग मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रकरणों में 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

    आईडीएफसी बैंक फंड दुरुपयोग मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रकरणों में 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

    नई दिल्ली । हरियाणा सरकार और चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड के फंड के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने जांच को आगे बढ़ाते हुए नौ आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालतों में चार्जशीट दाखिल कर दी है। एजेंसी के अनुसार इन मामलों में सरकारी अधिकारियों, बैंक कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों की कथित मिलीभगत के जरिए सरकारी धन के अनुचित उपयोग और वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया।

    सीबीआई द्वारा दाखिल आरोपपत्रों के अनुसार हरियाणा सरकार से जुड़े मामले में अवैध बैंकिंग लेन-देन के कारण लगभग 504 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। वहीं चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से जुड़े मामले में करीब 153 करोड़ रुपये की धनराशि प्रभावित होने का दावा किया गया है। दोनों मामलों को मिलाकर कथित अनियमितताओं का आंकड़ा 650 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचता है।

    जांच एजेंसी ने कहा है कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसके साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं को भी आरोपपत्र में शामिल किया गया है। एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया गया है और आगे की जांच भी जारी रहेगी।

    हरियाणा सरकार से जुड़े मामले में दाखिल चार्जशीट पंचकूला स्थित विशेष सीबीआई अदालत में प्रस्तुत की गई है। इस मामले में दो निजी व्यक्तियों को कथित रूप से अपराध से अर्जित धन का लाभार्थी बताते हुए आरोपी बनाया गया है। यह इस प्रकरण में दाखिल दूसरी चार्जशीट है। इससे पहले एजेंसी 15 अन्य आरोपियों के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है, जिनमें सरकारी कर्मचारी, बैंक अधिकारी, निजी कंपनियां और अन्य व्यक्ति शामिल थे।

    दूसरी ओर चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से जुड़े मामले में पहली बार आरोपपत्र दाखिल किया गया है। चंडीगढ़ स्थित विशेष अदालत में प्रस्तुत इस चार्जशीट में सात आरोपियों को नामजद किया गया है। इनमें पांच बैंक अधिकारी, स्मार्ट सिटी परियोजना से जुड़ा एक अधिकारी तथा एक निजी व्यक्ति शामिल हैं। एजेंसी का आरोप है कि वित्तीय लेन-देन की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी धन को अनुचित तरीके से स्थानांतरित किया गया।

    सीबीआई के अनुसार इन मामलों की जांच विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त शिकायतों और प्राथमिक जांच रिपोर्टों के आधार पर शुरू की गई थी। हरियाणा के कई सरकारी विभागों से जुड़े मामलों की जांच राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र से सीबीआई को सौंपी गई थी। वहीं चंडीगढ़ में आर्थिक अपराध से जुड़े मामलों की जांच भी बाद में केंद्रीय एजेंसी के हवाले की गई।

    जांच के दौरान एजेंसी ने हाल ही में चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया था। इन छापों के दौरान कुछ सरकारी अधिकारियों के आवासों, निजी कंपनियों और संबंधित व्यक्तियों के परिसरों की जांच की गई। एजेंसी का उद्देश्य वित्तीय लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड और कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन के प्रवाह की जानकारी जुटाना था।

    सीबीआई का दावा है कि जांच में ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि कुछ सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों ने आपसी समन्वय के साथ खातों के संचालन, धन हस्तांतरण और रकम को विभिन्न माध्यमों से आगे भेजने में भूमिका निभाई। एजेंसी अब वित्तीय लेन-देन की पूरी श्रृंखला को खंगाल रही है ताकि कथित अनियमितताओं के सभी पहलुओं को सामने लाया जा सके।

    जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भविष्य में अतिरिक्त आरोपपत्र भी दाखिल किए जा सकते हैं। मामले की सुनवाई विशेष अदालतों में आगे बढ़ेगी, जहां प्रस्तुत साक्ष्यों और आरोपों की न्यायिक जांच की जाएगी।

  • तेल कंपनियों को रोजाना 500 करोड़ रुपये की चोट, सरकार ने डीजल बिक्री पर लगाई बड़ी रोक, 90 दिन के लिए नए नियम लागू

    तेल कंपनियों को रोजाना 500 करोड़ रुपये की चोट, सरकार ने डीजल बिक्री पर लगाई बड़ी रोक, 90 दिन के लिए नए नियम लागू

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता और बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने डीजल वितरण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए रिटेल आउटलेट्स से बल्क डीजल बिक्री पर रोक लगाने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि इस कदम से सरकारी तेल कंपनियों को राहत मिलेगी, जो वर्तमान परिस्थितियों में प्रतिदिन सैकड़ों करोड़ रुपये की अंडर रिकवरी का सामना कर रही हैं।

    नए प्रावधानों के तहत देशभर के पेट्रोल पंपों पर डीजल की बिक्री को लेकर सख्त नियम लागू किए गए हैं। अब डीजल केवल वाहनों के ईंधन टैंक या अधिकृत और स्वीकृत कंटेनरों में ही दिया जा सकेगा। साथ ही प्रति वाहन या ग्राहक प्रतिदिन अधिकतम 200 लीटर डीजल खरीदने की सीमा तय की गई है। सरकार ने यह व्यवस्था प्रारंभिक रूप से 90 दिनों के लिए लागू की है।

    सरकार का कहना है कि हाल के महीनों में डीजल की रिटेल कीमत और बल्क आपूर्ति कीमत के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। इसका लाभ उठाते हुए कई औद्योगिक, व्यावसायिक और संस्थागत उपभोक्ता निर्धारित चैनलों की बजाय सामान्य पेट्रोल पंपों से डीजल खरीदने लगे थे। इससे सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ गया था।

    ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतों के बावजूद घरेलू स्तर पर उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखा गया। यही कारण रहा कि रिटेल स्तर पर मिलने वाला डीजल बल्क आपूर्ति के मुकाबले काफी सस्ता पड़ रहा था। इस मूल्य अंतर ने बड़े उपभोक्ताओं को रिटेल आउटलेट्स की ओर आकर्षित किया, जिससे सामान्य उपभोक्ताओं के लिए उपलब्धता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कई जिलों में डीजल की मांग में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है। बड़ी मात्रा में डीजल खरीदकर उसके पुनर्विक्रय और अनधिकृत उपयोग की शिकायतें भी सामने आईं। कुछ मामलों में जेरी कैन और अन्य कंटेनरों के माध्यम से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदे जाने की जानकारी मिली, जिसके बाद सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया।

    नए नियमों के तहत औद्योगिक, संस्थागत और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को अब निर्धारित उपभोक्ता पंपों से ही डीजल प्राप्त करना होगा। रिटेल आउटलेट्स से खरीदे गए डीजल के पुनर्विक्रय पर भी स्पष्ट रूप से रोक लगा दी गई है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी या राहत आधारित मूल्य व्यवस्था का लाभ केवल वास्तविक उपभोक्ताओं तक पहुंचे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सरकारी तेल कंपनियों के वित्तीय दबाव में कुछ कमी आ सकती है। साथ ही डीजल की उपलब्धता को लेकर पैदा हो रही असंतुलित स्थिति भी नियंत्रित होगी। हालांकि उद्योग जगत के कुछ वर्गों को नई व्यवस्था के अनुसार अपनी खरीद प्रणाली में बदलाव करना पड़ सकता है।

    सरकार ने राज्य प्रशासन, तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप संचालकों को नियमों के प्रभावी पालन के निर्देश दिए हैं। कालाबाजारी, अनधिकृत भंडारण और ईंधन के गलत उपयोग पर निगरानी बढ़ाने के लिए भी संबंधित एजेंसियों को सक्रिय किया गया है। आने वाले महीनों में इस व्यवस्था के प्रभाव का आकलन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

  • न्यूक्लियर सेक्टर को कर राहत का तोहफा: सरकार ने पूर्व प्रभाव से कस्टम ड्यूटी माफी दी, ऊर्जा परियोजनाओं की लागत घटने की उम्मीद

    न्यूक्लियर सेक्टर को कर राहत का तोहफा: सरकार ने पूर्व प्रभाव से कस्टम ड्यूटी माफी दी, ऊर्जा परियोजनाओं की लागत घटने की उम्मीद

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने देश में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को प्रोत्साहन देने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए परमाणु बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ विशेष आयातित सामानों पर कस्टम ड्यूटी से छूट प्रदान कर दी है। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह राहत 1 अप्रैल 2019 से 31 जनवरी 2026 तक की अवधि के लिए प्रभावी मानी जाएगी, जिससे इस दौरान किए गए पात्र आयातों पर सीमा शुल्क देनदारी समाप्त हो जाएगी।

    सरकारी निर्णय के तहत गैर-विकिरणित फ्यूल एलिमेंट्स तथा परमाणु रिएक्टरों में उपयोग किए जाने वाले विशेष कार्ट्रिज जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों और सामग्रियों के आयात पर कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी। ये सामग्री परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के संचालन और बिजली उत्पादन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में यह कदम परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की परिचालन लागत को कम करने में सहायक माना जा रहा है।

    सरकार का कहना है कि इन उत्पादों के आयात पर शुल्क नहीं लेने की व्यवस्था लंबे समय से व्यवहारिक रूप से लागू थी, लेकिन अब इसे औपचारिक वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। इससे संबंधित संस्थानों और कंपनियों को पूर्व अवधि के आयातों के संबंध में किसी प्रकार की कर अनिश्चितता या अतिरिक्त वित्तीय दायित्व का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    इस फैसले का सबसे अधिक लाभ न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को मिलने की संभावना है, जो देश के विभिन्न परमाणु बिजली संयंत्रों के लिए आवश्यक ईंधन असेंबली और तकनीकी सामग्री का आयात करती है। इसके अतिरिक्त, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी अन्य एजेंसियों और सहयोगी संस्थानों को भी इस राहत का लाभ प्राप्त होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे परियोजनाओं की लागत में कमी आएगी और भविष्य में निवेश का वातावरण अधिक अनुकूल बनेगा।

    भारत वर्तमान समय में ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन दोनों लक्ष्यों को समान प्राथमिकता दे रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी के वैश्विक लक्ष्यों को देखते हुए परमाणु ऊर्जा को एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। यही कारण है कि सरकार लगातार इस क्षेत्र में निवेश, तकनीकी उन्नयन और नीतिगत समर्थन बढ़ाने पर जोर दे रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार परमाणु ऊर्जा स्थिर और बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का ऐसा स्रोत है जो मौसम संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहता। सौर और पवन ऊर्जा के साथ संतुलन बनाते हुए यह देश के ऊर्जा मिश्रण को अधिक मजबूत और विश्वसनीय बना सकता है। ऐसे में आयातित महत्वपूर्ण सामग्रियों पर कर छूट का यह निर्णय राष्ट्रीय ऊर्जा रणनीति के व्यापक लक्ष्यों के अनुरूप माना जा रहा है।

    उल्लेखनीय है कि हाल ही में सरकार ने अधिक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर भी उत्पाद शुल्क को शून्य करने का निर्णय लिया था। 22 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण वाले मोटर स्पिरिट को इस राहत के दायरे में लाया गया है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार ऊर्जा क्षेत्र में वैकल्पिक और स्वच्छ स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए कर संबंधी नीतियों का सक्रिय उपयोग कर रही है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को मिली यह नई राहत भी उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य देश को अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था की ओर अग्रसर करना है।

  • मध्य पूर्व में शांति समझौते की उम्मीद से चमकी बुलियन मार्केट, सोना 1.50 लाख के पार तो चांदी ने भी दिखाई जोरदार तेजी

    मध्य पूर्व में शांति समझौते की उम्मीद से चमकी बुलियन मार्केट, सोना 1.50 लाख के पार तो चांदी ने भी दिखाई जोरदार तेजी

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच शांति समझौते की संभावनाओं ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में नई ऊर्जा का संचार किया है। इसी सकारात्मक माहौल का असर भारतीय कमोडिटी बाजार में भी दिखाई दिया, जहां सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन सोने और चांदी की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई। निवेशकों के बीच बढ़े विश्वास और वैश्विक जोखिम धारणा में सुधार के कारण दोनों कीमती धातुओं में खरीदारी का रुझान मजबूत रहा।

    शुक्रवार सुबह मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर अगस्त डिलीवरी वाले सोने के वायदा भाव में तेजी देखने को मिली। कारोबार की शुरुआत से ही सोना मजबूत स्तर पर खुला और दिन के शुरुआती सत्र में 1.50 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के महत्वपूर्ण स्तर को पार कर गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तर निवेशकों की मनोवैज्ञानिक धारणा के लिहाज से काफी अहम माना जाता है और इसके ऊपर टिके रहना बाजार की मजबूती का संकेत देता है।

    चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुख देखने को मिला। जुलाई डिलीवरी वाली चांदी ने मजबूत शुरुआत की और कारोबार के दौरान 2.40 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर से ऊपर पहुंच गई। औद्योगिक मांग, निवेशकों की दिलचस्पी और वैश्विक बाजारों में सुधरते संकेतों ने चांदी को भी मजबूती प्रदान की। बाजार विश्लेषकों के अनुसार चांदी में फिलहाल रिकवरी का क्रम जारी है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।

    कीमती धातुओं में यह तेजी उस समय सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। हालिया बयानों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है। इससे वैश्विक निवेशकों के बीच जोखिम लेने की क्षमता में सुधार हुआ है, जिसका प्रभाव शेयर बाजारों के साथ-साथ कमोडिटी बाजारों पर भी दिखाई दिया।

    बुलियन बाजार के आंकड़ों के अनुसार शुद्धता के आधार पर सोने और चांदी की कीमतों में भी मजबूती बनी हुई है। घरेलू बाजार में कीमती धातुओं की मांग और अंतरराष्ट्रीय संकेतों के संयुक्त प्रभाव से निवेशकों की रुचि लगातार बनी हुई है। बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं तो आने वाले समय में कीमतों को और समर्थन मिल सकता है।

    तकनीकी विश्लेषण के अनुसार सोने के लिए 1.52 लाख रुपये का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि कीमतें इस स्तर के ऊपर स्थिर रहने में सफल होती हैं तो आगे और तेजी देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, 1.50 लाख रुपये से नीचे फिसलने की स्थिति में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है। इसी तरह चांदी के लिए 2.48 लाख से 2.51 लाख रुपये का दायरा प्रमुख प्रतिरोध क्षेत्र माना जा रहा है। इस स्तर को पार करने पर तेजी और मजबूत हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम, निवेशकों की जोखिम धारणा, मुद्रा बाजार की चाल और सुरक्षित निवेश की मांग सोने तथा चांदी की कीमतों को प्रभावित करती रहेगी। फिलहाल दोनों धातुओं का निकट अवधि का रुख सकारात्मक दिखाई दे रहा है, हालांकि निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर लगातार नजर बनाए रखने की आवश्यकता होगी।