Category: Economy

  • ब्रांड एंबेसडर से निवेशक तक का सफर, रोहित शर्मा ने FITTR में हिस्सेदारी लेकर हेल्थ और वेलनेस सेक्टर पर जताया भरोसा

    ब्रांड एंबेसडर से निवेशक तक का सफर, रोहित शर्मा ने FITTR में हिस्सेदारी लेकर हेल्थ और वेलनेस सेक्टर पर जताया भरोसा

    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने फिटनेस और हेल्थ टेक्नोलॉजी क्षेत्र में अपनी भागीदारी को नया विस्तार देते हुए FITTR में निवेशक और इक्विटी पार्टनर के रूप में प्रवेश किया है। इस कदम को भारत में तेजी से बढ़ रहे हेल्थ और वेलनेस सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है। इससे पहले रोहित शर्मा कंपनी के पहले ब्रांड एंबेसडर के रूप में जुड़े हुए थे, लेकिन अब उन्होंने कंपनी की विकास यात्रा में प्रत्यक्ष भागीदारी का फैसला किया है।

    कंपनी और रोहित शर्मा के बीच यह साझेदारी केवल व्यावसायिक निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका केंद्र लोगों को बेहतर स्वास्थ्य, नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली के प्रति प्रेरित करना भी है। पिछले कुछ वर्षों में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में तेजी से वृद्धि देखने को मिली है। ऐसे समय में फिटनेस और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास इस साझेदारी की प्रमुख विशेषता माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, निवेश का निर्णय लेने से पहले रोहित शर्मा ने कई महीनों तक कंपनी के संस्थापक और नेतृत्व टीम के साथ विस्तृत चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कंपनी के बिजनेस मॉडल, कार्यप्रणाली, दीर्घकालिक रणनीति और विस्तार योजनाओं को करीब से समझा। कंपनी के संचालन और भविष्य की संभावनाओं का मूल्यांकन करने के बाद ही उन्होंने निवेशक बनने का फैसला किया।

    कंपनी के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी जितेंद्र चौकसे का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली के कारण स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। उनका कहना है कि लोगों को फिर से व्यायाम, संतुलित आहार और अनुशासित दिनचर्या जैसी मूलभूत आदतों को अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अच्छी सेहत का कोई त्वरित विकल्प नहीं होता और दीर्घकालिक परिणाम केवल नियमित प्रयासों से ही प्राप्त किए जा सकते हैं।

    रोहित शर्मा ने भी इस साझेदारी को अपने व्यक्तिगत विश्वास और पेशेवर अनुभव से जुड़ा निर्णय बताया। उनका कहना है कि किसी भी संस्था में निवेश करने से पहले उसकी सोच, उद्देश्य और विकास क्षमता को समझना आवश्यक होता है। FITTR के साथ समय बिताने के दौरान उन्हें यह महसूस हुआ कि कंपनी केवल व्यवसायिक विस्तार पर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लक्ष्य पर भी काम कर रही है।

    उन्होंने कहा कि कंपनी की मजबूत बुनियाद, स्पष्ट दृष्टिकोण और स्वास्थ्य क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रभाव पैदा करने की क्षमता ने उन्हें प्रभावित किया। इसी कारण उन्होंने ब्रांड एंबेसडर की भूमिका से आगे बढ़कर निवेशक और इक्विटी पार्टनर बनने का निर्णय लिया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी लोकप्रिय खिलाड़ी की सक्रिय भागीदारी से फिटनेस और हेल्थ प्लेटफॉर्म को व्यापक पहचान मिलती है। इससे आम लोगों के बीच स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने के प्रयासों को भी मजबूती मिल सकती है। रोहित शर्मा जैसे प्रतिष्ठित खिलाड़ी का जुड़ाव कंपनी के लिए विश्वसनीयता और पहुंच दोनों के स्तर पर लाभकारी साबित हो सकता है।

    कंपनी का लक्ष्य आने वाले समय में अपने निवारक स्वास्थ्य तंत्र का विस्तार करना और अधिक लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना है। रोहित शर्मा की नई भूमिका को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो फिटनेस और स्वास्थ्य जागरूकता को जन-जन तक पहुंचाने में सहायक साबित हो सकती है।

  • 15 जून का दुर्लभ ग्रह संयोग चमकाएगा किस्मत, बुधादित्य राजयोग से 4 राशियों को मिलेगा विशेष लाभ

    15 जून का दुर्लभ ग्रह संयोग चमकाएगा किस्मत, बुधादित्य राजयोग से 4 राशियों को मिलेगा विशेष लाभ


    नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष के अनुसार 15 जून को एक महत्वपूर्ण ग्रह परिवर्तन होने जा रहा है। ग्रहों के राजा सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, जहां पहले से ही बुध देव विराजमान हैं। सूर्य और बुध की युति से अत्यंत शुभ बुधादित्य राजयोग का निर्माण होगा, जिसे करियर, प्रतिष्ठा, बुद्धि और आर्थिक उन्नति के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस योग के शुरुआती चरण में चंद्रमा की उपस्थिति से त्रिग्रही योग का प्रभाव भी बनेगा, जिससे इसका शुभ असर और बढ़ जाएगा। इस महासंयोग का सबसे अधिक लाभ चार राशियों के जातकों को मिलने की संभावना है।

    मेष राशि: करियर में तरक्की और कारोबार में लाभ के संकेत
    मेष राशि के जातकों के लिए यह योग कार्यक्षेत्र में नए अवसर लेकर आ सकता है। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति और वेतन वृद्धि मिलने के योग हैं, जबकि नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को भी सफलता मिल सकती है।

    व्यापार से जुड़े लोगों के लिए यह समय नई शुरुआत और विस्तार के लिहाज से अनुकूल माना जा रहा है। बाजार में प्रतिष्ठा बढ़ेगी और लाभ के अवसर मजबूत होंगे। साथ ही स्वास्थ्य संबंधी पुरानी परेशानियों में भी राहत मिलने की संभावना है।

    वृषभ राशि: अटके काम बनेंगे, भाग्य देगा साथ
    वृषभ राशि वालों के लिए यह राजयोग लंबे समय से रुके हुए कार्यों को गति दे सकता है। सरकारी प्रक्रियाओं या अन्य कारणों से अटके मामलों के समाधान के संकेत हैं।

    प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को मेहनत का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। इसके अलावा धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ेगी तथा लंबी दूरी की यात्राओं के योग भी बन सकते हैं।

    मिथुन राशि: आत्मविश्वास बढ़ेगा, मिलेगा मान-सम्मान
    मिथुन राशि में ही यह बुधादित्य राजयोग बनने से इस राशि के जातकों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है। कार्यस्थल पर नेतृत्व क्षमता उभरकर सामने आएगी और वरिष्ठ अधिकारियों से सराहना प्राप्त हो सकती है।

    व्यापार में बड़ी डील या नया अवसर मिलने के संकेत हैं। आर्थिक मामलों में अचानक लाभ हो सकता है और अटका हुआ धन वापस मिलने की संभावना भी बन रही है। इस दौरान व्यक्तित्व में आकर्षण बढ़ेगा और संवाद कौशल से लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

    सिंह राशि: आय में वृद्धि और पारिवारिक सुख
    सूर्य की स्वामित्व वाली सिंह राशि के लिए यह ग्रह संयोग बेहद शुभ माना जा रहा है। आय के नए स्रोत बनने से आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है और धन संचय के अवसर बढ़ेंगे।

    पारिवारिक जीवन में चल रही समस्याएं दूर होने के संकेत हैं। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा और रिश्तों में मधुरता आएगी। वहीं निवेश की योजना बना रहे लोगों के लिए भी यह समय अनुकूल माना जा रहा है।

    ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा यह संयोग
    ज्योतिष शास्त्र में बुधादित्य राजयोग को बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता, आर्थिक प्रगति और सामाजिक प्रतिष्ठा का कारक माना जाता है। 15 जून को बनने वाला यह विशेष ग्रह संयोग कई लोगों के लिए नए अवसर और सकारात्मक बदलाव लेकर आ सकता है।

  • बिजली बिल में 30% तक कटौती का नया फॉर्मूला, उद्योगों ने पारंपरिक सप्लाई छोड़ हरित ऊर्जा की ओर बढ़ाए कदम

    बिजली बिल में 30% तक कटौती का नया फॉर्मूला, उद्योगों ने पारंपरिक सप्लाई छोड़ हरित ऊर्जा की ओर बढ़ाए कदम

    नई दिल्ली । देश का औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्र बिजली खरीदने की पारंपरिक व्यवस्था से तेजी से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है। बढ़ती ऊर्जा लागत और प्रतिस्पर्धी बाजार के दबाव के बीच बड़ी कंपनियां अब सस्ती, स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हरित ऊर्जा विकल्पों को प्राथमिकता दे रही हैं। इसका परिणाम यह है कि सौर और पवन ऊर्जा आधारित परियोजनाओं में कॉरपोरेट निवेश लगातार बढ़ रहा है और ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदल रही है।

    फैक्ट्रियों, आईटी कंपनियों, कॉरपोरेट कार्यालयों और बड़े डेटा सेंटरों की बिजली आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केवल पारंपरिक बिजली आपूर्ति पर निर्भर रहना कई कंपनियों के लिए महंगा साबित हो रहा है। यही वजह है कि अब वे सीधे नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों से बिजली खरीदने के विकल्प तलाश रही हैं। इससे न केवल बिजली की लागत कम हो रही है बल्कि लंबे समय के लिए ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि उद्योगों और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की कुल बिजली मांग देश की कुल खपत का लगभग आधा हिस्सा है। इसके बावजूद इस मांग का बड़ा भाग अभी भी पारंपरिक स्रोतों से पूरा किया जाता है। यही कारण है कि हरित ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में औद्योगिक क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा होने की संभावना जताई जा रही है।

    हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते रुझान का सबसे बड़ा कारण आर्थिक लाभ है। कंपनियों को सौर और पवन परियोजनाओं के माध्यम से मिलने वाली बिजली पारंपरिक बिजली की तुलना में काफी सस्ती पड़ती है। इससे बिजली बिल में उल्लेखनीय कमी आती है और उत्पादन लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में लागत नियंत्रण किसी भी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण रणनीति बन चुका है, इसलिए ऊर्जा क्षेत्र में यह बदलाव स्वाभाविक माना जा रहा है।

    ओपन एक्सेस मॉडल इस परिवर्तन का प्रमुख आधार बनकर उभरा है। इस व्यवस्था के तहत कंपनियां सीधे बिजली उत्पादकों से ऊर्जा खरीद सकती हैं। इससे उन्हें वितरण प्रणाली की कुछ पारंपरिक सीमाओं से राहत मिलती है और अपनी जरूरतों के अनुसार ऊर्जा स्रोत चुनने की स्वतंत्रता भी प्राप्त होती है। पिछले कुछ वर्षों में इस मॉडल की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है और इसे उद्योग जगत में भविष्य की व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

    डेटा सेंटर क्षेत्र इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी और प्रेरक दोनों बनकर सामने आया है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है। इन संस्थानों के लिए बिजली सबसे महत्वपूर्ण परिचालन लागतों में से एक है। साथ ही उन्हें चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली की आवश्यकता होती है। इसी कारण डेटा सेंटर संचालक नवीकरणीय ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और हाइब्रिड ऊर्जा समाधानों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

    हालांकि इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। विभिन्न राज्यों में नियमों और शुल्क संरचनाओं में बदलाव से परियोजनाओं की व्यवहारिकता प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद नई तकनीकें, बैटरी भंडारण व्यवस्था और ऊर्जा प्रबंधन प्रणालियां इन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत कर रही हैं।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में हरित ऊर्जा आधारित औद्योगिक विकास और तेज होगा। लागत में बचत, ऊर्जा सुरक्षा, बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढांचा और नीतिगत समर्थन इस बदलाव को नई गति प्रदान करेंगे। परिणामस्वरूप देश का औद्योगिक ऊर्जा परिदृश्य पहले की तुलना में अधिक स्वच्छ, प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव से डगमगाया निवेशकों का भरोसा, तेल कीमतों में उछाल के बीच गिरावट के साथ खुले सेंसेक्स और निफ्टी

    अमेरिका-ईरान तनाव से डगमगाया निवेशकों का भरोसा, तेल कीमतों में उछाल के बीच गिरावट के साथ खुले सेंसेक्स और निफ्टी

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तनातनी तथा कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण घरेलू निवेशकों का रुख सतर्क नजर आया। कारोबार की शुरुआत में ही प्रमुख शेयर सूचकांकों पर दबाव देखने को मिला और बाजार गिरावट के साथ खुला।

    विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ती अनिश्चितता ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ऊर्जा आपूर्ति को लेकर पैदा हुई आशंकाओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिसका सीधा प्रभाव उन देशों पर पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत भी दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में शामिल है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में होने वाली हर बड़ी हलचल का असर घरेलू वित्तीय बाजारों पर दिखाई देता है।

    बाजार में शुरुआती कमजोरी के पीछे वैश्विक संकेत भी एक प्रमुख कारण रहे। विदेशी बाजारों में निवेशकों ने बढ़ते तनाव और महंगाई से जुड़ी चिंताओं के बीच जोखिम वाले निवेशों से दूरी बनाई। इसका प्रभाव एशियाई और भारतीय बाजारों पर भी पड़ा। निवेशकों ने सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया, जिससे इक्विटी बाजारों में दबाव बढ़ गया।

    तेल कीमतों में तेजी ने बाजार की चिंता को और बढ़ा दिया। ऊर्जा लागत बढ़ने से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर कंपनियों की लागत और उपभोक्ता खर्च दोनों पर पड़ता है। यही वजह है कि तेल कीमतों में उछाल को निवेशक अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट आय के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम के रूप में देखते हैं।

    सेक्टोरल प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऊर्जा और तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों में अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई दी। बढ़ती तेल कीमतों से इन कंपनियों को संभावित लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी और कुछ उपभोक्ता आधारित क्षेत्रों के शेयरों में दबाव देखा गया। निवेशक फिलहाल वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और ब्याज दरों से जुड़े संकेतों का भी आकलन कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार की मौजूदा कमजोरी मुख्य रूप से अनिश्चितता से प्रेरित है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है, जिससे वैश्विक वित्तीय बाजारों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। वहीं यदि कूटनीतिक प्रयास सफल रहते हैं और हालात सामान्य होते हैं तो बाजारों में स्थिरता लौटने की संभावना भी बनी रहेगी।

    भारत जैसे तेजी से बढ़ते आर्थिक ढांचे के लिए ऊर्जा लागत एक महत्वपूर्ण कारक है। तेल कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी रहने से आयात बिल बढ़ सकता है और महंगाई पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि निवेशक केवल शेयर बाजार के आंकड़ों पर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर भी बारीकी से नजर रखे हुए हैं।

    फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों, तेल कीमतों की चाल और निवेशकों के जोखिम लेने के रुझान पर निर्भर करेगी। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया से जुड़ी खबरें और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकेतक बाजार की चाल तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • घर खरीदारों के लिए बढ़ सकती है इंतजार की घड़ी, वैश्विक संकट के असर से लाखों मकानों की डिलीवरी पर मंडराया खतरा

    घर खरीदारों के लिए बढ़ सकती है इंतजार की घड़ी, वैश्विक संकट के असर से लाखों मकानों की डिलीवरी पर मंडराया खतरा


    नई दिल्ली ।
    देश का रियल एस्टेट क्षेत्र वर्ष 2026 में एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लॉन्च की गई बड़ी आवासीय परियोजनाएं अब अपने अंतिम निर्माण चरण में पहुंच चुकी हैं और लाखों घर खरीदार अपने सपनों के घर का कब्जा मिलने का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियों ने इस उम्मीद के सामने नई अनिश्चितताएं खड़ी कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात का असर अब केवल ऊर्जा और व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव रियल एस्टेट क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। यदि वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में बाधाएं लंबे समय तक बनी रहती हैं तो निर्माण कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है, जिससे कई परियोजनाओं की डिलीवरी तय समय पर नहीं हो पाएगी।

    देश के सात प्रमुख महानगरों में इस वर्ष बड़ी संख्या में आवासीय इकाइयों का निर्माण पूरा होने की उम्मीद है। इनमें दिल्ली-एनसीआर, मुंबई महानगर क्षेत्र, पुणे, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और कोलकाता जैसे बड़े आवासीय बाजार शामिल हैं। इन शहरों में हजारों परियोजनाएं अंतिम चरण में हैं और डेवलपर्स खरीदारों को समय पर घर सौंपने की तैयारी कर रहे हैं।

    विशेष रूप से मुंबई महानगर क्षेत्र और पुणे को लेकर अधिक चिंता जताई जा रही है। इन दोनों शहरों में सबसे अधिक आवासीय इकाइयों की डिलीवरी प्रस्तावित है। ऐसे में यदि निर्माण सामग्री की उपलब्धता प्रभावित होती है या लागत में तेज वृद्धि होती है, तो इन बाजारों पर सबसे पहले असर देखने को मिल सकता है। बड़ी परियोजनाओं की संख्या अधिक होने के कारण यहां किसी भी प्रकार की देरी का प्रभाव हजारों परिवारों तक पहुंच सकता है।

    दक्षिण भारत के प्रमुख शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई में भी बड़ी संख्या में आवासीय परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। यदि सप्लाई चेन में व्यवधान बना रहता है, तो इन शहरों में भी परियोजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर उन खरीदारों पर होगा जो लंबे समय से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं।

    रियल एस्टेट विशेषज्ञों के अनुसार निर्माण क्षेत्र स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, मशीनरी और परिवहन सेवाओं पर काफी हद तक निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा कीमतों में वृद्धि होने पर इन सभी क्षेत्रों की लागत बढ़ जाती है। जब निर्माण लागत बढ़ती है तो परियोजनाओं के बजट और समयसीमा दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि डेवलपर्स मौजूदा परिस्थितियों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

    हालांकि उद्योग जगत का मानना है कि वर्तमान स्थिति महामारी काल जैसी नहीं है। आज डेवलपर्स की वित्तीय स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है और परियोजना प्रबंधन में तकनीक का उपयोग भी बढ़ा है। इसके बावजूद वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिमों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लंबे समय तक बने रहने वाले संकट से निर्माण क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है।

    एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू नियामकीय व्यवस्था भी है। रेरा जैसे नियमों के कारण डेवलपर्स पर तय समय में परियोजनाएं पूरी करने का दबाव रहता है। यदि लागत बढ़ती है या सप्लाई बाधित होती है, तो समयसीमा का पालन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में रियल एस्टेट क्षेत्र की दिशा काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों और आपूर्ति व्यवस्था की स्थिरता पर निर्भर करेगी।

  • E20 के बाद अब E30 तक का रास्ता साफ, सरकार की नई नीति से एथेनॉल अर्थव्यवस्था और हरित ईंधन को मिलेगा बढ़ावा

    E20 के बाद अब E30 तक का रास्ता साफ, सरकार की नई नीति से एथेनॉल अर्थव्यवस्था और हरित ईंधन को मिलेगा बढ़ावा

    नई दिल्ली । देश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से E22, E25, E27 और E30 श्रेणी के ईंधनों को केंद्रीय उत्पाद शुल्क से छूट देने का निर्णय लिया है। इस फैसले को भारत की वैकल्पिक ईंधन नीति और हरित ऊर्जा अभियान के लिए अहम माना जा रहा है।

    नई व्यवस्था के तहत 22 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल को कर राहत का लाभ मिलेगा। इससे तेल विपणन कंपनियों और ईंधन क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों को उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले उत्पाद बाजार में लाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। सरकार का मानना है कि इससे भविष्य में पारंपरिक पेट्रोल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सकेगी।

    एथेनॉल एक जैव ईंधन है, जिसे मुख्य रूप से कृषि आधारित स्रोतों से तैयार किया जाता है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से जीवाश्म ईंधनों की खपत कम होती है और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी लाने में मदद मिलती है। यही कारण है कि भारत सहित दुनिया के कई देश एथेनॉल मिश्रित ईंधन के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं।

    पिछले कुछ वर्षों में भारत ने एथेनॉल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है। उत्पादन बढ़ने के साथ अब सरकार का ध्यान अधिक एथेनॉल खपत वाले ईंधनों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का मानना है कि देश में उपलब्ध अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का उपयोग करने के लिए उच्च मिश्रण वाले ईंधनों को प्रोत्साहन देना आवश्यक हो गया था।

    इस नीति का एक प्रमुख उद्देश्य कच्चे तेल के आयात बिल को कम करना भी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों से आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ने से विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी। साथ ही इससे गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से जुड़े किसानों को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है।

    हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल इस फैसले का सीधा प्रभाव सभी वाहन चालकों पर नहीं पड़ेगा। वर्तमान में अधिकांश पेट्रोल वाहन E20 तक के ईंधन के उपयोग के लिए डिजाइन किए गए हैं। E22, E25, E27 और E30 जैसे उच्च मिश्रण वाले ईंधनों के व्यापक उपयोग के लिए ऐसे वाहनों की आवश्यकता होगी जो तकनीकी रूप से इन ईंधनों के अनुकूल हों। इसलिए इन ईंधनों का प्रसार चरणबद्ध तरीके से होने की संभावना है।

    हाल के वर्षों में फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को लेकर भी चर्चा बढ़ी है। इस तकनीक वाले वाहन विभिन्न स्तर के एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर संचालित हो सकते हैं। सरकार भविष्य में ऐसे वाहनों और उनसे जुड़े बुनियादी ढांचे के विस्तार पर भी जोर दे रही है। इससे एथेनॉल आधारित ईंधनों के उपयोग को और बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि कर छूट का यह निर्णय केवल ईंधन क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है। यदि एथेनॉल उत्पादन, वाहन तकनीक और वितरण नेटवर्क का विस्तार समान गति से होता है तो आने वाले वर्षों में देश के ईंधन बाजार में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

  • पश्चिम एशिया संकट गहराया तो महंगा हो सकता है तेल, सप्लाई पर दबाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया नया खतरा

    पश्चिम एशिया संकट गहराया तो महंगा हो सकता है तेल, सप्लाई पर दबाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया नया खतरा

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बिगड़ते संबंधों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा तनाव और बढ़ता है तथा स्थिति व्यापक संघर्ष में बदलती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक तेल बाजार पहले से ही अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों, ऊर्जा कंपनियों और आयातक देशों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। तेल की कीमतों में हालिया तेजी इस बात का संकेत है कि बाजार संभावित आपूर्ति बाधाओं को लेकर सतर्क हो चुका है। यदि हालात और बिगड़ते हैं तो ऊर्जा लागत में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार खाड़ी क्षेत्र विश्व तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या परिवहन व्यवधान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है। तेल उत्पादन और निर्यात में बाधा आने की आशंका के कारण बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। यही वजह है कि निवेशक लगातार घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    माना जा रहा है कि क्षेत्र में तेल उत्पादन और परिवहन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मार्ग दबाव में हैं। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि गंभीर संकट की स्थिति में कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच सकता है।

    हालांकि फिलहाल कुछ ऐसे कारक भी हैं जो बाजार को पूरी तरह अस्थिर होने से बचा रहे हैं। प्रमुख देशों के रणनीतिक तेल भंडार, वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग और कुछ बड़े उपभोक्ता देशों द्वारा आयात में संतुलन बनाए रखने के प्रयासों से बाजार को अस्थायी राहत मिली हुई है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ते हैं तो ये उपाय लंबे समय तक पर्याप्त साबित नहीं होंगे।

    ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहता। तेल की कीमतों में तेजी का सीधा प्रभाव परिवहन, विनिर्माण, विमानन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत पर पड़ता है। इससे वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों की आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन सकती है।

    पिछले कुछ महीनों में वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़े प्रभाव ने बाजार को पहले ही संवेदनशील बना दिया है। आपूर्ति में कमी और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है। निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव कम नहीं हुआ तो बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल रहते हैं और तनाव कम होता है तो बाजार को राहत मिल सकती है। वहीं दूसरी ओर यदि टकराव बढ़ता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों और उनके आर्थिक प्रभावों पर टिकी हुई हैं।

  • शेयरधारकों को नकदी लौटाने की तैयारी, लेकिन बाजार का भरोसा कमजोर; विप्रो के सामने आय वृद्धि और मुनाफे की चुनौती बरकरार

    शेयरधारकों को नकदी लौटाने की तैयारी, लेकिन बाजार का भरोसा कमजोर; विप्रो के सामने आय वृद्धि और मुनाफे की चुनौती बरकरार

    नई दिल्ली । देश की प्रमुख आईटी कंपनियों में शामिल विप्रो इन दिनों निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। कंपनी ने 15,000 करोड़ रुपये के बड़े शेयर बायबैक कार्यक्रम की शुरुआत की है, लेकिन इसके बावजूद उसके शेयरों पर दबाव कम होता नजर नहीं आ रहा। बायबैक शुरू होने के साथ ही कंपनी के शेयर में गिरावट दर्ज की गई और यह कई वर्षों के निचले स्तर तक पहुंच गया।

    बाजार में हालिया कमजोरी के बीच विप्रो का प्रदर्शन व्यापक सूचकांकों की तुलना में अधिक कमजोर दिखाई दिया है। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में लगातार गिरावट के कारण निवेशकों की चिंता बढ़ी है। वर्ष 2026 में अब तक कंपनी के शेयर मूल्य में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जिससे निवेशकों की धारणा पर असर पड़ा है।

    कंपनी ने शेयरधारकों को अतिरिक्त नकदी लौटाने के उद्देश्य से बायबैक योजना लागू की है। इसके तहत बड़ी संख्या में शेयर वापस खरीदे जाएंगे। बायबैक का उद्देश्य बाजार में उपलब्ध कुल शेयरों की संख्या को कम करना और शेयरधारकों के लिए मूल्य सृजन करना माना जाता है। आमतौर पर ऐसी योजनाओं से प्रति शेयर आय और अन्य वित्तीय संकेतकों में सुधार की संभावना बढ़ जाती है।

    कंपनी का कहना है कि उसके पास पर्याप्त नकदी उपलब्ध है और वह पूंजी आवंटन की रणनीति के तहत निवेशकों को लाभ पहुंचाना चाहती है। बायबैक में छोटे निवेशकों के लिए भी एक हिस्सा सुरक्षित रखा गया है, जिससे खुदरा निवेशकों को भागीदारी का अवसर मिल सके। हालांकि बाजार की प्रतिक्रिया से संकेत मिलता है कि निवेशक फिलहाल कंपनी के भविष्य के कारोबार पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में कंपनी को कई परिचालन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। बड़े ग्राहकों से मिलने वाले कारोबार में अपेक्षित वृद्धि नहीं होने और कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लागू होने में देरी जैसी परिस्थितियां राजस्व वृद्धि पर असर डाल सकती हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाओं और विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी मांग में कमजोरी भी कंपनी के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है।

    आईटी उद्योग इस समय वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन में बढ़ते निवेश के कारण कंपनियों को नए अवसर तो मिल रहे हैं, लेकिन साथ ही प्रतिस्पर्धा और लागत का दबाव भी बढ़ रहा है। विप्रो भी इसी चुनौतीपूर्ण माहौल में अपनी विकास रणनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े सौदों का वास्तविक वित्तीय लाभ मिलने में समय लग सकता है। ऐसे में निकट अवधि में आय वृद्धि सीमित रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही कर्मचारियों के वेतन, नए प्रोजेक्ट्स की लागत और उभरती तकनीकों में निवेश से लाभप्रदता पर भी असर पड़ सकता है।

    इसके बावजूद कंपनी की मजबूत वैश्विक उपस्थिति, विविध ग्राहक आधार और डिजिटल सेवाओं में बढ़ता फोकस भविष्य के लिए सकारात्मक पहलू माने जा रहे हैं। निवेशकों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि बायबैक कार्यक्रम के बाद कंपनी अपने कारोबारी प्रदर्शन और विकास योजनाओं को किस तरह आगे बढ़ाती है। आने वाली तिमाहियों के वित्तीय नतीजे निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतक साबित हो सकते हैं।

  • भारत में AI क्रांति को मिलेगी नई रफ्तार, TCS और Anthropic की साझेदारी से हजारों कर्मचारियों को मिलेगा उन्नत AI प्लेटफॉर्म

    भारत में AI क्रांति को मिलेगी नई रफ्तार, TCS और Anthropic की साझेदारी से हजारों कर्मचारियों को मिलेगा उन्नत AI प्लेटफॉर्म

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच देश की प्रमुख आईटी कंपनी टीसीएस ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाया है। कंपनी ने एआई क्षेत्र की अग्रणी संस्था एंथ्रोपिक के साथ साझेदारी कर अपने डिजिटल परिवर्तन अभियान को नई दिशा देने का फैसला किया है। इस सहयोग का उद्देश्य विभिन्न उद्योगों में एआई आधारित समाधानों के विकास को गति देना और ग्राहकों को उन्नत तकनीकी सेवाएं उपलब्ध कराना है।

    इस साझेदारी के तहत टीसीएस अपने लगभग 50 हजार कर्मचारियों को Claude AI प्लेटफॉर्म तक पहुंच उपलब्ध कराएगी। इस पहल का लाभ इंजीनियरिंग, वित्त, कानूनी सेवाओं, विपणन, बिक्री और अन्य महत्वपूर्ण विभागों में कार्यरत पेशेवरों को मिलेगा। कंपनी का मानना है कि कर्मचारियों को अत्याधुनिक एआई उपकरणों से जोड़ने से उत्पादकता बढ़ेगी और जटिल कार्यों को अधिक दक्षता के साथ पूरा किया जा सकेगा।

    टीसीएस इस सहयोग के अंतर्गत एक विशेष विशेषज्ञ टीम का गठन भी करेगी, जो Claude एआई मॉडल पर आधारित नए तकनीकी समाधान विकसित करेगी। कंपनी को इन एआई क्षमताओं और टूल्स तक शुरुआती पहुंच मिलने से वह अपने ग्राहकों के लिए तेजी से नवाचार करने की स्थिति में होगी। इससे एंटरप्राइज ग्राहकों को अत्याधुनिक एआई तकनीकों का लाभ अपेक्षाकृत कम समय में मिल सकेगा।

    दोनों कंपनियां मिलकर बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी प्रशासन, जीवन विज्ञान, विमानन, दूरसंचार और चिकित्सा प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए एआई आधारित समाधान विकसित करेंगी। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जहां डेटा सुरक्षा, विश्वसनीयता और नियामकीय अनुपालन सर्वोच्च प्राथमिकता रखते हैं। ऐसे क्षेत्रों में एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देना इस साझेदारी का प्रमुख लक्ष्य माना जा रहा है।

    तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को एआई टूल्स से जोड़ना भविष्य की कार्यशैली को बदल सकता है। इससे न केवल कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि होगी, बल्कि संगठन के भीतर नवाचार और समस्या समाधान की क्षमता भी मजबूत होगी। आधुनिक व्यवसायों में एआई की बढ़ती भूमिका को देखते हुए यह कदम उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    यह साझेदारी ग्राहकों के लिए भी कई नए अवसर लेकर आएगी। कंपनियां ऐसे एआई समाधान विकसित करेंगी जो व्यावसायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने, पुराने तकनीकी ढांचे को आधुनिक बनाने और ग्राहकों के अनुभव को बेहतर बनाने में मदद करेंगे। इससे डिजिटल परिवर्तन परियोजनाओं की गति बढ़ने और परिचालन लागत को कम करने की संभावना भी जताई जा रही है।

    एआई तकनीक के तेजी से विस्तार के बीच यह सहयोग भारत के तकनीकी क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर एआई अपनाने की बढ़ती मांग के बीच भारतीय आईटी कंपनियां नई तकनीकों में निवेश कर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रही हैं। टीसीएस और एंथ्रोपिक की यह साझेदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।

    उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में एआई आधारित समाधान व्यवसायों की कार्यप्रणाली को व्यापक रूप से प्रभावित करेंगे। ऐसे में बड़े पैमाने पर एआई प्रशिक्षण, उन्नत प्लेटफॉर्म तक पहुंच और उद्योग-विशिष्ट समाधानों का विकास कंपनियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार कर सकता है।

  • Gold ETF से निवेशकों ने निकाले ₹725 करोड़, मुनाफावसूली के बीच Silver ETF में बढ़ा निवेश

    Gold ETF से निवेशकों ने निकाले ₹725 करोड़, मुनाफावसूली के बीच Silver ETF में बढ़ा निवेश


    नई दिल्ली। कुछ महीने पहले तक सोना और चांदी निवेशकों की पहली पसंद बने हुए थे। तेजी से बढ़ती कीमतों और शानदार रिटर्न के चलते बड़ी संख्या में निवेशकों ने गोल्ड और सिल्वर ETF में पैसा लगाया था। सोशल मीडिया से लेकर वित्तीय सलाहकारों तक, हर जगह इन निवेश विकल्पों की चर्चा थी। हालांकि अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है।

    सोने और चांदी की कीमतों में हालिया नरमी के बीच निवेशकों का उत्साह भी कम हुआ है। गोल्ड ETF में निवेश घटने लगा है और मई 2026 में इस श्रेणी से भारी निकासी दर्ज की गई। वहीं दूसरी ओर सिल्वर ETF में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है।

    गोल्ड ETF से ₹725 करोड़ की निकासी
    भारतीय म्यूचुअल फंड संघ (AMFI) के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 में गोल्ड ETF से ₹725 करोड़ की शुद्ध निकासी हुई। इसके विपरीत अप्रैल में इस श्रेणी में ₹3,040 करोड़ का शुद्ध निवेश दर्ज किया गया था। लगभग एक साल तक लगातार निवेश आकर्षित करने के बाद गोल्ड ETF में यह पहला बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

    हालांकि निकासी के बावजूद गोल्ड ETF का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) मजबूत बना हुआ है। पिछले वर्ष की तुलना में इसका आकार तीन गुना बढ़कर करीब ₹1.85 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो निवेशकों के बीच सोने की दीर्घकालिक मांग को दर्शाता है।

    क्यों बढ़ी मुनाफावसूली?
    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सोने में आई इस कमजोरी के पीछे कई कारण हैं। इनमें मुनाफावसूली, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर बदली उम्मीदें शामिल हैं।

    INVasset PMS के बिजनेस हेड हर्षल दासानी के अनुसार, बाजार अब महंगाई से बचाव के लिए सोना खरीदने की रणनीति से हटकर ब्याज दरों और वैश्विक आर्थिक संकेतकों के आधार पर निवेश का मूल्यांकन कर रहा है। अमेरिका के मजबूत रोजगार आंकड़ों ने इस संभावना को कमजोर किया है कि फेडरल रिजर्व निकट भविष्य में आक्रामक दर कटौती करेगा।

    उन्होंने कहा कि सोना कोई नियमित आय या रिटर्न नहीं देता। ऐसे में जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर मजबूत होते हैं, तो सोना रखने की अवसर लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा, हाल के महीनों में सोने की कीमतों में तेज उछाल के बाद वैश्विक स्तर पर निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली भी बढ़ी है।

    लॉन्ग टर्म में सोना अब भी अहम
    विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक दबाव के बावजूद पोर्टफोलियो में जोखिम संतुलन और सुरक्षा के लिए सोना अब भी महत्वपूर्ण निवेश विकल्प बना हुआ है। हालांकि हालिया तेजी के बाद निवेशकों द्वारा लाभ बुक करने का दौर जारी है।

    सिल्वर ETF में बनी रही चमक
    जहां गोल्ड ETF से निवेशकों ने पैसा निकाला, वहीं सिल्वर ETF में मजबूत निवेश देखने को मिला। मई 2026 के दौरान सिल्वर ETF में ₹2,133 करोड़ का निवेश दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक मांग बढ़ने की उम्मीद और निवेशकों की बढ़ती रुचि इसके पीछे प्रमुख कारण हैं।

    दासानी के मुताबिक, सौर ऊर्जा, विद्युतीकरण और आपूर्ति संबंधी चुनौतियां चांदी की दीर्घकालिक मांग को समर्थन दे रही हैं। हालांकि निकट भविष्य में चांदी की कीमतों की दिशा भी अमेरिकी डॉलर, बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व की नीतियों पर निर्भर करेगी।

    नोट: सोना या चांदी समेत किसी भी निवेश विकल्प में पैसा लगाने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह अवश्य लें।