Category: Economy

  • UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार

    UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार


    नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन दर्ज किया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में यूपीआई के माध्यम से किए गए लेनदेन की संख्या में सालाना आधार पर 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान कुल 23.66 अरब यानी 2366 करोड़ से ज्यादा यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए। वहीं, इन डिजिटल लेनदेन का कुल मूल्य 19 प्रतिशत बढ़कर 29.88 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई महीने में हर दिन औसतन 76.3 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन किए गए। वहीं, प्रतिदिन औसतन 96,383 करोड़ रुपए का डिजिटल भुगतान यूपीआई प्लेटफॉर्म के जरिए हुआ। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में लोग तेजी से नकदी आधारित भुगतान से डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ रहे हैं।

    इससे पहले जून 2026 में भी यूपीआई ने शानदार प्रदर्शन किया था। जून में यूपीआई के जरिए 22.72 अरब ट्रांजैक्शन हुए थे, जो पिछले साल की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक थे। इस दौरान कुल लेनदेन राशि 28.92 लाख करोड़ रुपए रही थी। जून में रोजाना औसतन 75.7 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए थे।

    सरकार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2021-22 में यूपीआई के जरिए 4,595.61 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे, जिनका कुल मूल्य 84.16 लाख करोड़ रुपए था। इसके बाद वित्त वर्ष 2022-23 में लेनदेन की संख्या बढ़कर 8,371.44 करोड़ और कुल मूल्य 139.15 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया।

    वित्त वर्ष 2023-24 में यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या 13,112.95 करोड़ रही, जबकि कुल लेनदेन मूल्य 199.95 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में यूपीआई के जरिए 18,586.60 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए और इनका कुल मूल्य बढ़कर 260.56 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    डिजिटल भुगतान के इस विस्तार को भारत की वित्तीय समावेशन नीति की बड़ी सफलता माना जा रहा है। यूपीआई ने छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े कारोबारियों तक भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाया है। मोबाइल फोन के जरिए कुछ सेकंड में होने वाले भुगतान ने देश में डिजिटल लेनदेन की संस्कृति को तेजी से बढ़ावा दिया है।

    वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने हाल ही में लोकसभा में बताया था कि एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल) भारत की डिजिटल भुगतान तकनीक को दुनिया के अन्य देशों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रही है। एनआईपीएल कई देशों के साथ साझेदारी कर भारतीय भुगतान प्रणाली के वैश्विक विस्तार को बढ़ावा दे रही है।

    इन अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के चलते भारतीय नागरिक विदेशों में भी यूपीआई आधारित भुगतान कर पा रहे हैं। साथ ही, अन्य देशों को भी रियल टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित करने में मदद मिल रही है। वर्तमान में यूपीआई संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, फ्रांस, मॉरीशस और श्रीलंका समेत आठ से अधिक देशों में उपलब्ध है।

    तेजी से बढ़ते यूपीआई उपयोग से साफ है कि भारत डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में अपनी मजबूत स्थिति बना रहा है। आने वाले समय में यूपीआई के और अधिक देशों तक विस्तार की संभावना है, जिससे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।

  • अब समुद्र से निकलेगी ऊर्जा की नई ताकत, 'समुद्र मंथन' योजना से आयात बिल घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैया

    अब समुद्र से निकलेगी ऊर्जा की नई ताकत, 'समुद्र मंथन' योजना से आयात बिल घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैया


    नई दिल्ली। भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और दूरगामी कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की नई समुद्र मंथन योजना का उद्देश्य देश में गहरे समुद्री क्षेत्रों में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को नई रफ्तार देना है। सरकार का मानना है कि इस महत्वाकांक्षी योजना से आने वाले वर्षों में भारत की विदेशी तेल और गैस पर निर्भरता कम होगी और ऊर्जा सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मजबूत बनेगी।

    भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। हर साल देश को कच्चे तेल के आयात पर करीब 144 अरब डॉलर यानी लगभग 13 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार चढ़ाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल आयात आधारित व्यवस्था पर लंबे समय तक निर्भर रहना देश के लिए सुरक्षित विकल्प नहीं हो सकता। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए सरकार ने घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने पर फोकस किया है।

    केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 84084 करोड़ रुपए की लागत वाली राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना समुद्र मंथन को मंजूरी दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू रहेगी और इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा ऑफशोर तेल एवं गैस अन्वेषण अभियान माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य केवल नए भंडार तलाशना नहीं बल्कि ऐसा मजबूत तंत्र तैयार करना है जो भविष्य में ऊर्जा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की नींव रख सके।

    योजना के तहत बेहतर भू वैज्ञानिक आंकड़ों का उपयोग किया जाएगा ताकि संभावित तेल और गैस क्षेत्रों की सटीक पहचान हो सके। साथ ही जोखिम साझा करने की व्यवस्था विकसित की जाएगी जिससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां अधिक निवेश के लिए आगे आएं। साझा बुनियादी ढांचे और घरेलू विनिर्माण क्षमता को भी बढ़ावा दिया जाएगा ताकि अन्वेषण और उत्पादन की लागत कम हो तथा परियोजनाओं का क्रियान्वयन तेज हो सके।

    सरकार का कहना है कि वर्ष 2014 के बाद से हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में कई बड़े सुधार किए गए हैं। पहले जिन क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज की अनुमति नहीं थी उनमें से 99 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रों को खोल दिया गया है। इससे भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक हिस्से में पहली बार अन्वेषण का रास्ता साफ हुआ है। इसके अलावा प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट की जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट लागू कर प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और सरल बनाया गया है।

    सरकार ने ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन अधिनियम 2025 और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम 2025 जैसे सुधारों के जरिए कानूनी और नियामकीय ढांचे को भी आधुनिक बनाया है। कारोबार करने में आसानी बढ़ाने विवाद समाधान को मजबूत करने और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए कई नई व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। वहीं ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के प्रदर्शन मूल्यांकन में भी अब तेल और गैस खोज गतिविधियों को अधिक महत्व दिया जाएगा।

    सरकार का विश्वास है कि समुद्र मंथन योजना केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी विदेशी मुद्रा की बचत होगी आयात बिल में कमी आएगी और देश आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर अधिक तेजी से आगे बढ़ सकेगा। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में यह योजना भारत के ऊर्जा भविष्य को मजबूत बनाने वाली एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल साबित हो सकती है।

  • बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत

    बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत


    नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती और उपभोग में बढ़ोतरी का असर अब सरकार के राजस्व पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जुलाई 2026 में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संग्रह 15.4 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी के साथ 2.11 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया। यह पिछले 14 महीनों की सबसे तेज वृद्धि है और चालू वित्त वर्ष 2026-27 में दूसरी बार ऐसा हुआ है जब मासिक जीएसटी कलेक्शन दो लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार करने में सफल रहा है। यह आंकड़ा देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों मजबूत खपत और बेहतर टैक्स अनुपालन का संकेत माना जा रहा है।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई के दौरान घरेलू जीएसटी राजस्व 10.1 प्रतिशत बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपए हो गया जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.31 लाख करोड़ रुपए था। वहीं आयात पर मिलने वाले जीएसटी राजस्व में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई और इसमें 28.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आयात से प्राप्त जीएसटी संग्रह बढ़कर 66 हजार 511 करोड़ रुपए पहुंच गया। घरेलू और आयात दोनों स्रोतों से मजबूत राजस्व मिलने के कारण कुल सकल जीएसटी संग्रह 2.11 लाख करोड़ रुपए के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया।

    सरकार ने बताया कि जुलाई के दौरान जीएसटी रिफंड में भी वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में रिफंड 13.1 प्रतिशत बढ़कर 29 हजार 968 करोड़ रुपए रहा। रिफंड समायोजित करने के बाद सरकार का शुद्ध जीएसटी राजस्व 1.81 लाख करोड़ रुपए रहा जो पिछले वर्ष की तुलना में 15.8 प्रतिशत अधिक है। घरेलू शुद्ध राजस्व 10.5 प्रतिशत बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि सीमा शुल्क से प्राप्त शुद्ध जीएसटी राजस्व में 30.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई और यह 54 हजार 223 करोड़ रुपए हो गया।

    चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों अप्रैल से जुलाई के दौरान भी सरकार का कर संग्रह लगातार मजबूत बना हुआ है। इस अवधि में कुल सकल जीएसटी संग्रह 10.1 प्रतिशत बढ़कर 8.43 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 7.66 लाख करोड़ रुपए था। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार लगातार बनी हुई है और कर संग्रह में भी इसका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।

    इससे पहले जून 2026 में भी जीएसटी संग्रह 13.9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.94 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया था। उस समय भी आयात से मिलने वाले राजस्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लगातार दो महीनों से मजबूत कर संग्रह यह संकेत देता है कि देश में उत्पादन व्यापार और उपभोग की गतिविधियां गति पकड़ रही हैं।

    एसबीआई रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि जीएसटी संग्रह और बेसिक एक्साइज ड्यूटी में राज्यों की हिस्सेदारी को एक साथ देखा जाए तो वित्त वर्ष 2026-27 में राज्यों को पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.43 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि आने वाले महीनों में जीएसटी संग्रह और मजबूत हो सकता है तथा पूरे वित्त वर्ष के दौरान इसमें 8 से 9 प्रतिशत की वृद्धि बनी रहने की संभावना है।

    रिपोर्ट के मुताबिक हाल के महीनों में जीएसटी संग्रह की रफ्तार में जो हल्की नरमी देखने को मिली थी उसका प्रमुख कारण जीएसटी दरों का युक्तिकरण था जिसकी पहले से संभावना जताई जा रही थी। अब आर्थिक गतिविधियों में तेजी और कर संग्रह में लगातार सुधार से यह उम्मीद बढ़ गई है कि वित्त वर्ष के शेष महीनों में भी सरकार का राजस्व मजबूत रहेगा और इससे केंद्र तथा राज्यों दोनों की वित्तीय स्थिति को मजबूती मिलेगी।

  • आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक पर नजर, रेपो रेट स्थिर रह सकता है; GDP ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद

    आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक पर नजर, रेपो रेट स्थिर रह सकता है; GDP ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक की अगस्त 2026 में होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक पर पूरे वित्तीय बाजार की नजर टिकी हुई है। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस बार रेपो रेट में किसी बदलाव की संभावना बेहद कम है। रिपोर्ट का मानना है कि खुदरा महंगाई अगले दो तिमाहियों तक पांच प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है जबकि देश की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है। ऐसे में आरबीआई के लिए फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखना सबसे संतुलित विकल्प माना जा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर सात प्रतिशत से अधिक रह सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो यह पहले लगाए गए अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाएगा। मजबूत आर्थिक गतिविधियां और स्थिर मांग ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनकी वजह से केंद्रीय बैंक फिलहाल नीतिगत दरों में बदलाव करने से बच सकता है।

    एसबीआई रिसर्च ने बताया कि जुलाई के दौरान देश में लगभग 35 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह दर्ज किया गया। इसके परिणामस्वरूप 24 जुलाई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 12.5 अरब डॉलर बढ़ गया। इसके साथ ही जून के अंत तक तीन महीने की अवधि वाले फॉरवर्ड पोजीशन में 13 अरब डॉलर की कमी आई जिससे विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव कम हुआ और रुपये की स्थिति को भी सहारा मिला।

    हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि वैश्विक परिस्थितियां अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई हैं। कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति और वैश्विक पूंजी प्रवाह को लेकर बनी अनिश्चितता ऐसे कारक हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि आरबीआई फिलहाल अत्यधिक नरम रुख अपनाने के बजाय सतर्क रणनीति जारी रख सकता है।

    आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समिति की बैठक तीन से पांच अगस्त तक आयोजित होगी जबकि पांच अगस्त को नीतिगत फैसलों की घोषणा की जाएगी। वित्तीय बाजार और उद्योग जगत इस बैठक से ब्याज दरों के साथ साथ महंगाई आर्थिक वृद्धि और भविष्य की मौद्रिक नीति के संकेतों पर भी नजर रखे हुए हैं।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी दबाव में है। कई देशों में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी हुई है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी अप्रैल से जून 2026 की तिमाही के दौरान अपेक्षा से अधिक सुस्ती देखने को मिली। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है।

    एसबीआई रिसर्च ने यह भी कहा कि पिछले कुछ महीनों में मानसून की स्थिति में सुधार हुआ है। जुलाई में सामान्य से अधिक वर्षा होने के कारण देश में वर्षा की कमी घटकर केवल 13 प्रतिशत रह गई है। जलाशयों का जलस्तर लगभग सामान्य है और खरीफ फसलों की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में मामूली कम रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता मांग को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। इसमें कहा गया है कि तकनीकी क्षेत्र में एआई को लेकर तेजी से बढ़ते निवेश और अत्यधिक उम्मीदों के कारण भविष्य में एआई बबल बनने का खतरा पैदा हो सकता है। कई कंपनियां आवश्यकता से अधिक निवेश कर रही हैं जो आगे चलकर जोखिम का कारण बन सकता है।

    कुल मिलाकर एसबीआई रिसर्च का आकलन है कि मजबूत आर्थिक वृद्धि विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार बेहतर मानसून और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और मौद्रिक नीति में स्थिरता बनाए रखने को प्राथमिकता देगा।

  • सेबी का बड़ा एक्शन, पुनीत गोयनका और सुभाष चंद्रा पर शेयर बाजार में कारोबार करने पर एक साल का बैन

    सेबी का बड़ा एक्शन, पुनीत गोयनका और सुभाष चंद्रा पर शेयर बाजार में कारोबार करने पर एक साल का बैन


    नई दिल्ली। पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े गंभीर उल्लंघनों के मामले में जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड और उसके शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। सेबी ने कंपनी के प्रबंध निदेशक पुनीत गोयनका और एस्सेल समूह के प्रमुख सुभाष चंद्रा को एक वर्ष के लिए प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से प्रतिबंधित कर दिया है। इसके साथ ही जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड पर भी दो महीने तक प्रतिभूति बाजार में प्रवेश करने पर रोक लगा दी गई है। नियामक ने तीनों पक्षों पर कुल 1.48 करोड़ रुपए का आर्थिक दंड भी लगाया है।

    सेबी की जांच में सामने आया कि कंपनी की हैदराबाद स्थित मूल्यवान जमीन को आवश्यक कॉरपोरेट मंजूरियों के बिना एस्सेल समूह की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के बदले गिरवी रखा गया था। नियामक ने इसे कॉरपोरेट गवर्नेंस और लिस्टिंग नियमों का गंभीर उल्लंघन माना। अंतिम आदेश में कहा गया कि इस प्रक्रिया में नियामकीय प्रावधानों का पालन नहीं किया गया और आवश्यक स्वीकृतियां भी नहीं ली गईं।

    सेबी के आदेश के अनुसार जी एंटरटेनमेंट पर 30 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है जबकि पुनीत गोयनका पर 58 लाख रुपए और सुभाष चंद्रा पर 60 लाख रुपए का दंड लगाया गया है। नियामक ने सभी संबंधित पक्षों को 45 दिनों के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी माना कि लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स रेगुलेशंस 2015 और प्रोहिबिशन ऑफ फ्रॉडुलेंट एंड अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिसेज रेगुलेशंस 2003 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।

    मामले की शुरुआत वित्त वर्ष 2018-19 के वैधानिक ऑडिट के दौरान हुई थी। ऑडिट में कंपनी की कुछ अचल संपत्तियों के मूल स्वामित्व दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई थी। इसके बाद सेबी ने विस्तृत जांच शुरू की। जांच में पता चला कि दिसंबर 2016 में एस्सेल समूह की चार कंपनियों ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड से 726 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। इन कंपनियों पर पुनीत गोयनका सुभाष चंद्रा और उनके परिवार का प्रभावी नियंत्रण था।

    जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जब कर्ज लेने वाली कंपनियां आवश्यक सुरक्षा बनाए रखने में विफल रहीं तब नवंबर 2018 में अतिरिक्त संपार्श्विक उपलब्ध कराने के लिए नोटिस जारी किया गया। इसके बाद दिसंबर 2018 में जी एंटरटेनमेंट की हैदराबाद स्थित जमीन के मूल दस्तावेज कर्ज के लिए अतिरिक्त सुरक्षा के रूप में जमा कराए गए ताकि उस संपत्ति पर प्रथम श्रेणी का बंधक बनाया जा सके।

    हालांकि कंपनी ने दावा किया कि इस प्रक्रिया के लिए सभी आवश्यक मंजूरियां प्राप्त की गई थीं लेकिन सेबी की जांच में ऑडिट समिति निदेशक मंडल या शेयरधारकों की ओर से ऐसी किसी पूर्व स्वीकृति का कोई प्रमाण नहीं मिला। बाद में कंपनी ने स्वयं नियामक को बताया कि प्रबंधन और निदेशक मंडल इस बंधक की प्रक्रिया से अनभिज्ञ थे और उन्होंने इस लेनदेन को मंजूरी नहीं दी थी।

    सेबी ने अपने आदेश में कहा कि यह संबंधित पक्षों के बीच हुआ लेनदेन था जिसके लिए नियमानुसार पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक था। वित्तीय विवरणों में भी इस संबंध में आवश्यक खुलासे और स्वीकृतियों का पालन नहीं किया गया। नियामक ने स्पष्ट किया कि सूचीबद्ध कंपनियों में निवेशकों के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और कॉरपोरेट गवर्नेंस के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भविष्य में भी इसी तरह सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

  • एफएसएसएआई का स्विट्ज फूड्स पर बड़ा एक्शन, फूड सेफ्टी नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस सस्पेंड

    एफएसएसएआई का स्विट्ज फूड्स पर बड़ा एक्शन, फूड सेफ्टी नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस सस्पेंड

    नई दिल्ली। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन के मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए स्विट्ज फूड्स प्राइवेट लिमिटेड का फूड बिजनेस लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। एफएसएसएआई ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक कंपनी सभी कमियों को दूर कर खाद्य सुरक्षा एवं स्वच्छता मानकों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित नहीं करती तब तक वह किसी भी प्रकार की खाद्य उत्पादन या व्यावसायिक गतिविधि संचालित नहीं कर सकेगी। यह कार्रवाई उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    एफएसएसएआई के अनुसार कंपनी के विनिर्माण संयंत्र के निरीक्षण के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। जांच में पाया गया कि खाद्य पदार्थों का निर्माण पैकेजिंग और भंडारण बेहद अस्वच्छ परिस्थितियों में किया जा रहा था जिससे खाद्य सामग्री के दूषित होने का गंभीर खतरा बना हुआ था। फैक्ट्री परिसर में साफ सफाई और सैनिटेशन की स्थिति भी बेहद खराब मिली। विशेष रूप से क्रेट वॉशिंग एरिया नॉन वेज रिसीविंग एरिया और गाजर काटने वाली मशीन के आसपास अत्यधिक गंदगी पाई गई।

    निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली मशीनों ट्रॉलियों ट्रे मोल्ड एचडीपीई क्रेट और अन्य उपकरणों की नियमित सफाई और रखरखाव नहीं किया जा रहा था। उत्पाद भंडारण क्षेत्र के ऊपर से एयर कंडीशनिंग पाइपलाइन का पानी रिस रहा था जबकि क्रेट साफ करने वाली मशीन भी खराब स्थिति में मिली। इन कमियों को खाद्य सुरक्षा मानकों के लिए गंभीर खतरा माना गया।

    एफएसएसएआई ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि खाद्य प्रसंस्करण उपकरणों वेंटिलेशन सिस्टम और भोजन के संपर्क में आने वाले कई बर्तनों पर जंग और क्षरण पाया गया। एग्जॉस्ट फैन पर कीट रोकने वाली जालियां नहीं लगी थीं जिससे मक्खियों और अन्य कीड़ों के प्रवेश का खतरा बना हुआ था। निरीक्षण के दौरान परिसर में मक्खियां मच्छर फ्रूट फ्लाई मकड़ी के जाले और अन्य कीटों का भारी प्रकोप भी पाया गया।

    जांच में दीवारों पर सीलन उखड़ता पेंट टूटी हुई फर्श की टाइलें और कई स्थानों पर तेल तथा ग्रीस की मोटी परत भी देखी गई। अर्धनिर्मित और तैयार खाद्य उत्पादों को अलग अलग रखने के नियमों का पालन नहीं किया गया था। इसी तरह शाकाहारी और मांसाहारी खाद्य पदार्थों को भी निर्धारित मानकों के अनुसार अलग नहीं रखा गया। कई कच्चे और अर्धनिर्मित उत्पादों पर निर्माण तिथि या उपयोग की अंतिम तिथि का उल्लेख भी नहीं था। तैयार खाद्य पदार्थ गंदी ट्रे में बिना किसी सुरक्षात्मक लाइनर के रखे गए थे जबकि कोल्ड स्टोरेज में खाद्य सामग्री के साथ कबाड़ भी रखा मिला।

    एफएसएसएआई ने यह भी पाया कि कटे हुए चिकन को सामान्य कमरे के तापमान पर डीफ्रॉस्ट किया जा रहा था जो खाद्य सुरक्षा मानकों का स्पष्ट उल्लंघन है। तापमान नियंत्रण की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं थी और निरीक्षण के दौरान एक तैयार चिकन सैंडविच बिना अनिवार्य लेबलिंग के पाया गया।

    इन सभी गंभीर कमियों को देखते हुए प्राधिकरण ने कंपनी का लाइसेंस निलंबित कर दिया और निर्देश दिया कि फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट 2006 के सभी प्रावधानों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित होने तक कोई भी खाद्य व्यावसायिक गतिविधि संचालित नहीं की जाएगी। एफएसएसएआई ने दोहराया है कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा और खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के खिलाफ आगे भी सख्त कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।

  • विदेशी निवेश आकर्षित करने में RBI की बड़ी कामयाबी, फॉरेक्स स्वैप योजना से जुटे 40.82 अरब डॉलर

    विदेशी निवेश आकर्षित करने में RBI की बड़ी कामयाबी, फॉरेक्स स्वैप योजना से जुटे 40.82 अरब डॉलर


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक की विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने की विशेष पहल को बाजार से शानदार समर्थन मिला है। केंद्रीय बैंक द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार 31 जुलाई 2026 तक रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा के माध्यम से कुल 40.82 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा निवेश भारत में आया है। इस योजना में सबसे बड़ा योगदान फॉरेन करेंसी नॉन रेजिडेंट बैंक यानी एफसीएनआर बी जमा का रहा है जिसने कुल निवेश का बड़ा हिस्सा उपलब्ध कराया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच यह उपलब्धि भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।

    आरबीआई ने यह विशेष स्वैप सुविधा विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और देश में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की थी। इसके तहत विदेशी निवेशकों और प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करने के लिए बैंकों को विशेष रियायतें दी गईं ताकि वे अधिक विदेशी मुद्रा जुटा सकें। योजना 8 जून 2026 से लागू की गई थी और तब से इसमें लगातार सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

    केंद्रीय बैंक के मुताबिक 31 जुलाई तक जुटाए गए कुल 40.82 अरब डॉलर में से 36.73 अरब डॉलर केवल एफसीएनआर बी जमा के माध्यम से आए हैं। यह कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह का सबसे बड़ा हिस्सा है और इससे साफ संकेत मिलता है कि प्रवासी भारतीयों ने इस योजना पर भरोसा जताया है। इसके अलावा ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स यानी ओएफसीबी के जरिए 2.58 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स यानी ईसीबी के माध्यम से 1.52 अरब डॉलर का निवेश प्राप्त हुआ है।

    आरबीआई ने पांच जून 2026 को इस योजना की घोषणा करते हुए कहा था कि वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूत करना जरूरी है। इसी उद्देश्य से एफसीएनआर बी जमा ओएफसीबी और ईसीबी के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाने की विशेष व्यवस्था की गई। अब शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि यह रणनीति प्रभावी साबित हो रही है और देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है।

    केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई एफसीएनआर बी जमा के लिए रियायती स्वैप सुविधा 30 सितंबर 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ओएफसीबी और ईसीबी के तहत यह सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। इससे उम्मीद की जा रही है कि आने वाले महीनों में विदेशी मुद्रा प्रवाह का आंकड़ा और बढ़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी अर्थव्यवस्था की वित्तीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होता है। इससे आयात भुगतान आसान होता है विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और वैश्विक बाजार में मुद्रा की स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। साथ ही रुपये पर दबाव कम करने और बाहरी आर्थिक झटकों का सामना करने की क्षमता भी मजबूत होती है।

    वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक चुनौतियों और अनिश्चितताओं के बीच आरबीआई की यह पहल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती आने से न केवल वित्तीय स्थिरता को बल मिलेगा बल्कि निवेशकों का विश्वास भी बढ़ेगा। यही वजह है कि फॉरेक्स स्वैप योजना को भारतीय वित्तीय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण और सफल कदम माना जा रहा है।

  • IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान

    IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान


    नई दिल्ली।
    सरकारी पेट्रोलियम कंपनी (State-Owned Petroleum Company) इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) (Indian Oil Corporation – IOC) ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही (April-June quarter) के नतीजे जारी कर दिए हैं। इस तिमाही में कंपनी को 2,661.37 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ है। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को 5,688.60 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था जबकि जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में कंपनी ने 11,377.51 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।


    घाटे की वजह क्या है?

    आईओसी के चेयरमैन ए.एस साहनी ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे तेल की लागत बढ़ने के बावजूद कंपनी ने अन्य सरकारी तेल कंपनियों की तरह पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) के दाम नहीं बढ़ाए। इसका नुकसान कंपनी को उठाना पड़ा। हालांकि, इससे हुए नुकसान की भरपाई काफी हद तक तेल रिफाइनरी मार्जिन और परिचालन दक्षता में सुधार से हुई। उन्होंने कहा, ”पहली तिमाही में कंपनी ने करीब 1.91 करोड़ टन कच्चे तेल का अब तक का सर्वाधिक प्रोसेसिंग किया। इसके साथ ही ईंधन और अन्य नुकसान की दर घटकर 8.04 प्रतिशत रही, जो पहले 8.5 प्रतिशत थी।”

    इसके साथ ही साहनी ने यह भी कहा कि जून तिमाही में 45 लाख टन पेट्रोल और करीब 1.8 करोड़ टन डीजल की रिकॉर्ड बिक्री हुई। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की बिक्री भी 11 प्रतिशत बढ़ी, जिससे कंपनी को सहारा मिला। इस तिमाही में देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी की परिचालन आय 26 प्रतिशत बढ़कर 2.75 लाख करोड़ रुपये हो गई।

    उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई लेकिन कंपनी ने पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाकर कमी की भरपाई की। साहनी ने कहा कि कंपनी ने अगस्त के पूरे माह और सितंबर के कुछ दिनों तक के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है। उन्होंने कहा कि अगले 45-50 दिनों के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर कोई चिंता नहीं है।

    कंपनी का खर्च कम हुआ

    कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क कम करने के कारण इस मद में कंपनी का खर्च एक साल पहले के 25,637 करोड़ रुपये से घटकर 13,536 करोड़ रुपये रह गया। वहीं, तैयार उत्पादों के दाम बढ़ने से उसे 20,925 करोड़ रुपये का फायदा हुआ। मौजूदा कर और लंबित कर के भुगतान में छूट से कंपनी को 613 करोड़ रुपये की बचत हुई।


    शेयर का परफॉर्मेंस

    इंडियन ऑयल के शेयर की बात करें तो यह शुक्रवार को मामूली बढ़त के साथ 140.15 रुपये पर बंद हुआ। अब सोमवार को शेयर पर निवेशकों की नजर रहेगी।

  • बिना सोचे-समझे निवेश पड़ सकता है भारी, जानिए शेयर बाजार में सफलता के गोल्डन रूल्स

    बिना सोचे-समझे निवेश पड़ सकता है भारी, जानिए शेयर बाजार में सफलता के गोल्डन रूल्स


    नई दिल्ली । शेयर बाजार आज के समय में निवेश का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। पहले जहां लोग केवल बैंक एफडी सोना या जमीन में निवेश को सुरक्षित मानते थे वहीं अब बड़ी संख्या में युवा और नौकरीपेशा लोग भी शेयर बाजार की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। हालांकि शेयर बाजार जितना मुनाफा देने की क्षमता रखता है उतना ही जोखिम भी इसमें मौजूद रहता है। इसलिए बिना जानकारी के निवेश करना कई बार भारी नुकसान का कारण बन सकता है।

    शेयर बाजार में सफल होने का सबसे पहला नियम है कि किसी भी कंपनी में पैसा लगाने से पहले उसके कारोबार वित्तीय स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को अच्छी तरह समझें। केवल किसी दोस्त रिश्तेदार या सोशल मीडिया पर मिली सलाह के आधार पर निवेश करना सही फैसला नहीं माना जाता। कंपनी के पिछले प्रदर्शन मुनाफे कर्ज और बाजार में उसकी स्थिति का विश्लेषण करना जरूरी होता है।

    निवेश करते समय धैर्य सबसे बड़ी ताकत होती है। शेयर बाजार में हर दिन उतार चढ़ाव आता है लेकिन अनुभवी निवेशक छोटी गिरावट से घबराते नहीं हैं। वे लंबी अवधि की रणनीति अपनाते हैं और मजबूत कंपनियों में निवेश बनाए रखते हैं। समय के साथ अच्छे शेयर अक्सर बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपनी पूरी पूंजी कभी भी एक ही कंपनी या एक ही सेक्टर में निवेश नहीं करनी चाहिए। अलग अलग क्षेत्रों की कंपनियों में निवेश करने से जोखिम कम हो जाता है। इसे निवेश का विविधीकरण कहा जाता है। यदि किसी एक सेक्टर में गिरावट आती है तो दूसरे सेक्टर का प्रदर्शन नुकसान की भरपाई करने में मदद कर सकता है।

    शेयर बाजार में भावनाओं के आधार पर फैसला लेना भी नुकसानदायक साबित हो सकता है। कई निवेशक तेजी देखकर बिना सोचे समझे शेयर खरीद लेते हैं और गिरावट आते ही घबराकर बेच देते हैं। इस तरह वे नुकसान उठा लेते हैं। सही रणनीति यही है कि निवेश तय योजना के अनुसार किया जाए और बाजार की हर हलचल पर जल्दबाजी में निर्णय न लिया जाए।

    यदि आप शेयर बाजार में नए हैं तो शुरुआत छोटी राशि से करें। पहले बाजार की कार्यप्रणाली को समझें और धीरे धीरे अनुभव बढ़ाएं। जरूरत पड़ने पर किसी प्रमाणित वित्तीय सलाहकार की मदद भी ली जा सकती है। म्यूचुअल फंड जैसे विकल्प भी उन लोगों के लिए बेहतर हो सकते हैं जो सीधे शेयर चुनने का अनुभव नहीं रखते।

    नियमित निवेश की आदत भी लंबे समय में बेहतर परिणाम देती है। एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय समय समय पर निवेश करने से बाजार के उतार चढ़ाव का असर कम हो सकता है। साथ ही अपने निवेश की समय समय पर समीक्षा करना भी जरूरी है ताकि जरूरत पड़ने पर पोर्टफोलियो में बदलाव किया जा सके।

    ध्यान रखें कि शेयर बाजार में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। सही जानकारी अनुशासन धैर्य और लंबी अवधि की सोच ही निवेश को सफल बनाती है। यदि समझदारी से निवेश किया जाए तो शेयर बाजार भविष्य की आर्थिक मजबूती और संपत्ति निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

  • जंग का असर: इंडिगो बंद करेगी वाइड-बॉडी उड़ानें, 25 अक्टूबर से बड़ा बदलाव

    जंग का असर: इंडिगो बंद करेगी वाइड-बॉडी उड़ानें, 25 अक्टूबर से बड़ा बदलाव


    नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती परिचालन लागत के बीच देश की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइन इंडिगो ने अपने वाइड-बॉडी विमान संचालन को बंद करने का फैसला किया है। कंपनी ने घोषणा की है कि 25 अक्टूबर 2026 से वाइड-बॉडी ऑपरेशन समाप्त कर दिए जाएंगे। इसी के साथ नॉर्स अटलांटिक एयरवेज के साथ किया गया डैम्प लीज समझौता भी उसी महीने खत्म हो जाएगा।

    इंडिगो ने बताया कि फिलहाल मुंबई-एम्स्टर्डम मार्ग पर डैम्प लीज पर लिए गए बोइंग 787-9 विमान की जगह एयरबस A321XLR विमान से उड़ानें संचालित की जाएंगी। वहीं, लंदन हीथ्रो के लिए एयरलाइन की सेवाएं अस्थायी रूप से बंद रहेंगी। कंपनी का कहना है कि यह सेवा तब दोबारा शुरू होगी, जब उसके ऑर्डर किए गए एयरबस A350-900 विमान बेड़े में शामिल हो जाएंगे।

    2025 में हुआ था समझौता
    इंडिगो ने वर्ष 2025 की शुरुआत में नॉर्स अटलांटिक एयरवेज के साथ छह बोइंग 787-9 विमानों के लिए डैम्प लीज एग्रीमेंट किया था, ताकि लंबी दूरी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का विस्तार किया जा सके।

    क्यों लिया गया फैसला?
    एयरलाइन के अनुसार, समझौते के बाद वैश्विक हालात तेजी से बदले हैं। एयरस्पेस पर प्रतिबंध, ईंधन की लगातार बढ़ती कीमतें और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों के दबाव ने परिचालन लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर दी है। इन परिस्थितियों का असर उड़ानों की क्षमता, समयबद्धता, कनेक्टिविटी और प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ा है। इसी वजह से कंपनी ने पूरे कार्यक्रम की समीक्षा कर रणनीति में बदलाव का निर्णय लिया है।

    ‘संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग जरूरी’
    इंडिगो के प्लानिंग एवं रेवेन्यू मैनेजमेंट के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अभिजीत दासगुप्ता ने कहा कि वैश्विक विमानन उद्योग लगातार भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में अल्पकालिक संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करना और दीर्घकालिक रणनीति को संतुलित रखना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एयरलाइन भविष्य में भी मिड और लॉन्ग-हॉल अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

    यात्रियों को दिए जाएंगे विकल्प
    इंडिगो ने स्पष्ट किया है कि इस फैसले से प्रभावित यात्रियों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क किया जाएगा। उन्हें वैकल्पिक यात्रा व्यवस्था या लागू नियमों के तहत रिफंड का विकल्प उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि यात्रियों को किसी तरह की असुविधा न हो।