Category: Economy

  • विदेशी निवेशकों को बड़ी टैक्स राहत, सरकारी बॉन्ड बाजार में निवेश बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार का बड़ा आर्थिक दांव

    विदेशी निवेशकों को बड़ी टैक्स राहत, सरकारी बॉन्ड बाजार में निवेश बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार का बड़ा आर्थिक दांव


    नई दिल्ली । विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने और भारतीय ऋण बाजार को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार की घोषणा की है। सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों से प्राप्त होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर आयकर से छूट देने का फैसला किया है। यह व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी मानी जाएगी और इसका उद्देश्य भारतीय बॉन्ड बाजार में वैश्विक निवेशकों की भागीदारी को बढ़ाना है।

    सरकार द्वारा जारी आयकर संशोधन अध्यादेश के तहत अब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सरकारी बॉन्ड और अन्य सरकारी प्रतिभूतियों से अर्जित आय पर कर नहीं देना होगा। इससे पहले इन निवेशकों को ब्याज आय के साथ-साथ सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री से प्राप्त शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर भी कर देना पड़ता था। नई व्यवस्था के बाद यह कर बोझ समाप्त हो जाएगा, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय सरकारी बॉन्ड अधिक आकर्षक बन सकते हैं।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब वैश्विक पूंजी विभिन्न उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बेहतर रिटर्न और स्थिरता की तलाश कर रही है। भारत पहले से ही दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। ऐसे में कर संबंधी राहत विदेशी निवेशकों के निर्णय को प्रभावित कर सकती है और उन्हें भारतीय ऋण बाजार में अधिक निवेश के लिए प्रेरित कर सकती है।

    सरकारी प्रतिभूतियां केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा धन जुटाने के लिए जारी किए जाने वाले बॉन्ड और ऋण साधन होते हैं। इन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश माना जाता है क्योंकि इनके पीछे सरकार की गारंटी होती है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कर छूट सूचीबद्ध और गैर-सूचीबद्ध दोनों प्रकार की सरकारी प्रतिभूतियों पर लागू होगी, जिससे निवेशकों को व्यापक लाभ मिलेगा।

    वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी कुल बाजार का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है। सरकार का मानना है कि नई कर व्यवस्था के बाद विदेशी भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इससे बाजार में तरलता बढ़ेगी और सरकारी उधारी की लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है। साथ ही विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ने से भारतीय वित्तीय बाजारों को अतिरिक्त मजबूती मिलने की संभावना है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वैश्विक निवेशकों के लिए निवेश संबंधी निर्णयों में कर नीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाएं विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए कर प्रोत्साहन प्रदान करती हैं। भारत का यह कदम उसी दिशा में एक रणनीतिक पहल माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य वैश्विक निवेश परिदृश्य में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को मजबूत करना है।

    सरकार को उम्मीद है कि इस फैसले से न केवल विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा बल्कि भारतीय बॉन्ड बाजार की गहराई और विश्वसनीयता भी मजबूत होगी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की बढ़ती भागीदारी से भारतीय वित्तीय प्रणाली को दीर्घकालिक स्थिरता और व्यापक निवेश आधार प्राप्त हो सकता है। आर्थिक जानकार इसे केवल कर राहत नहीं बल्कि भारत के वित्तीय बाजारों को वैश्विक स्तर पर अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार के रूप में देख रहे हैं।

  • वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय ऑटो सेक्टर चमका, मई में 4.4 लाख वाहन बिके..

    वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय ऑटो सेक्टर चमका, मई में 4.4 लाख वाहन बिके..

    नई दिल्ली । देश के ऑटोमोबाइल क्षेत्र ने एक बार फिर मजबूत प्रदर्शन करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को नई मजबूती प्रदान की है। मई 2026 में यात्री वाहन बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होने के बाद केंद्र सरकार ने इसे देश की बढ़ती आर्थिक क्षमता, मजबूत उपभोक्ता विश्वास और विनिर्माण क्षेत्र की सफलता का संकेत बताया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत की विकास यात्रा निरंतर गति पकड़ रही है और विभिन्न क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं।

    मंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए अपने संदेश में बताया कि मई 2026 के दौरान देश में लगभग 4.4 लाख यात्री वाहनों की बिक्री हुई। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 23 प्रतिशत अधिक है। उन्होंने कहा कि यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं और बाजार संबंधी चुनौतियों का माहौल बना हुआ है।

    पीयूष गोयल के अनुसार इस उपलब्धि में देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विशेष रूप से मारुति सुजुकी इंडिया, टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा ने बाजार में मजबूत प्रदर्शन करते हुए बिक्री को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। इन कंपनियों की बेहतर बिक्री ने पूरे ऑटोमोबाइल उद्योग को सकारात्मक दिशा दी है।

    मंत्री ने कहा कि भारतीय उपभोक्ताओं का घरेलू स्तर पर निर्मित वाहनों पर बढ़ता भरोसा देश के विनिर्माण क्षेत्र की मजबूती को दर्शाता है। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का सकारात्मक परिणाम बताते हुए कहा कि इस पहल ने देश में औद्योगिक उत्पादन, निवेश और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए भी अधिक सक्षम बनाया है।

    उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र में दिखाई दे रही यह प्रगति केवल बिक्री के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक संरचना में हो रहे व्यापक बदलावों की भी झलक प्रस्तुत करती है। तकनीकी नवाचार, उत्पादन क्षमता में विस्तार और उपभोक्ताओं की बढ़ती क्रय शक्ति जैसे कारकों ने इस क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की है।

    इस बीच देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया ने भी मई महीने में नया रिकॉर्ड कायम किया है। कंपनी ने घरेलू बाजार में डीलरों को 1,90,337 यात्री वाहन भेजे, जो उसके इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी मासिक बिक्री मानी जा रही है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक है। इसके साथ ही कंपनी ने अप्रैल में स्थापित अपने पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती वाहन बिक्री से जुड़े आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मांग की मजबूती का संकेत देते हैं। यदि आने वाले महीनों में यह रुझान जारी रहता है तो ऑटोमोबाइल क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मजबूत मांग, बढ़ते निवेश और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार के बीच भारत का ऑटो उद्योग आने वाले वर्षों में वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

  • रेपो रेट यथावत रखकर आरबीआई ने दिया स्थिरता का संदेश, विशेषज्ञ बोले- दीर्घकालिक विकास को मिलेगा मजबूत आधार

    रेपो रेट यथावत रखकर आरबीआई ने दिया स्थिरता का संदेश, विशेषज्ञ बोले- दीर्घकालिक विकास को मिलेगा मजबूत आधार

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत रेपो दर को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने के निर्णय को अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत ने संतुलित तथा दूरदर्शी कदम बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू चुनौतियों के बीच लिया गया यह फैसला वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के साथ-साथ दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करेगा।

    विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था कई प्रकार की चुनौतियों से गुजर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बढ़ते दबाव का असर विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में ब्याज दरों को स्थिर रखना आरबीआई की सतर्क और संतुलित नीति को दर्शाता है।

    पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अधिकारियों का मानना है कि केंद्रीय बैंक ने विकास और महंगाई के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम बढ़ने के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है और मौजूदा नीति से मध्यम तथा दीर्घकालिक विकास को समर्थन मिलेगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि महंगाई अभी आरबीआई के निर्धारित लक्ष्य के आसपास बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य में चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति संबंधी व्यवधान और मानसून की स्थिति जैसे कारक आगे चलकर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बावजूद मजबूत घरेलू मांग भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने का काम कर रही है।

    बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले महीनों में महंगाई अपेक्षा से अधिक बढ़ती है तो वर्ष के अंत तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। हालांकि फिलहाल आरबीआई ने विकास की गति को बनाए रखने और बाजार को स्थिर संदेश देने को प्राथमिकता दी है। इससे उद्योगों और निवेशकों को नीति संबंधी स्पष्टता मिलेगी।

    आरबीआई द्वारा विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए किए गए उपायों को भी सकारात्मक कदम माना जा रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा जमा से जुड़े फैसलों से बाजार में तरलता बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपायों से भारतीय वित्तीय बाजारों की स्थिति और मजबूत हो सकती है तथा विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है।

    इंडियन बैंक के प्रबंधन का कहना है कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है। ऐसे में ब्याज दरों को स्थिर रखने का निर्णय यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक गतिविधियों को गति देने और विकास को समर्थन देने के पक्ष में है। इससे खुदरा, कृषि और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्रों में मांग को बल मिलने की संभावना है।

    आवास क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरों का माहौल घर खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए राहत लेकर आएगा। इससे होम लोन लेने वाले ग्राहकों का विश्वास बढ़ेगा और आवास बाजार में मांग को मजबूती मिलेगी। साथ ही ऋण वितरण में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

    आर्थिक जानकारों के अनुसार आरबीआई का यह निर्णय भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती पर भरोसे को दर्शाता है। वर्तमान परिस्थितियों में स्थिर ब्याज दरें निवेश, उपभोग और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने का काम करेंगी। आने वाले महीनों में महंगाई, मानसून और वैश्विक बाजारों की दिशा पर नजर रहेगी, लेकिन फिलहाल केंद्रीय बैंक का यह कदम विकास और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

  • मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर बने अर्थव्यवस्था के इंजन, भारत ने दर्ज की 7.7 प्रतिशत विकास दर

    मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर बने अर्थव्यवस्था के इंजन, भारत ने दर्ज की 7.7 प्रतिशत विकास दर

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 में मजबूत प्रदर्शन करते हुए 7.7 प्रतिशत की रियल जीडीपी वृद्धि दर दर्ज की है। यह पिछले वित्त वर्ष की 7.1 प्रतिशत वृद्धि दर की तुलना में उल्लेखनीय सुधार माना जा रहा है। ताजा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि घरेलू मांग, औद्योगिक गतिविधियों और सेवा क्षेत्र की मजबूती ने आर्थिक विकास को नई गति प्रदान की है।

    वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर 8.9 प्रतिशत रही। इसके साथ ही रियल और नॉमिनल ग्रॉस वैल्यू एडेड में क्रमशः 7.9 प्रतिशत और 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रदर्शन वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है।

    विकास दर में सबसे बड़ा योगदान द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों का रहा। औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े द्वितीयक क्षेत्र ने 8.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जबकि सेवा क्षेत्र की विकास दर 9.3 प्रतिशत रही। मैन्युफैक्चरिंग, व्यापार, परिवहन, संचार, होटल, स्टोरेज, वित्तीय सेवाओं और रियल एस्टेट से जुड़े क्षेत्रों में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला।

    विशेष रूप से सेवा क्षेत्र ने आर्थिक वृद्धि को गति देने में अहम भूमिका निभाई। वित्तीय सेवाओं, पेशेवर सेवाओं, व्यापार और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों में बढ़ोतरी ने अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त मजबूती प्रदान की। वहीं मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उत्पादन और निवेश गतिविधियों के विस्तार का सकारात्मक असर भी समग्र विकास दर पर दिखाई दिया।

    हालांकि प्राथमिक क्षेत्र की वृद्धि दर अपेक्षाकृत कम रही। कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों को शामिल करने वाले प्राथमिक क्षेत्र ने वित्त वर्ष के दौरान 3.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। इसके बावजूद समग्र आर्थिक प्रदर्शन पर इसका सीमित प्रभाव देखने को मिला क्योंकि औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों ने विकास की गति बनाए रखी।

    जनवरी से मार्च 2026 की चौथी तिमाही के आंकड़े भी अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाते हैं। इस अवधि में देश की रियल जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, जबकि नॉमिनल जीडीपी में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी दौरान रियल जीवीए में 7.9 प्रतिशत और नॉमिनल जीवीए में 9.9 प्रतिशत का विस्तार हुआ।

    चौथी तिमाही में भी सेवा और औद्योगिक क्षेत्र विकास के प्रमुख आधार बने रहे। द्वितीयक क्षेत्र की वृद्धि दर 7.9 प्रतिशत और तृतीयक क्षेत्र की वृद्धि दर 9.9 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों में निरंतर विस्तार बना हुआ है और विकास की रफ्तार स्थिर बनी हुई है।

    इस बार आर्थिक आंकड़े नए आधार वर्ष 2022-23 के अनुसार जारी किए गए हैं। इससे अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना और उपभोग पैटर्न को अधिक सटीक रूप से दर्शाने में मदद मिलेगी। नए आधार वर्ष के तहत जारी आंकड़े देश की आर्थिक स्थिति का अधिक यथार्थवादी आकलन प्रस्तुत करते हैं।

    वैश्विक स्तर पर जारी अस्थिरता, व्यापारिक चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत की मजबूत विकास दर यह संकेत देती है कि घरेलू अर्थव्यवस्था में लचीलापन बना हुआ है। आने वाले समय में निवेश, उत्पादन और सेवा गतिविधियों में निरंतर वृद्धि देश को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • अंडमान सागर में ऊर्जा क्षेत्र को बड़ी सफलता, ऑयल इंडिया के तीसरे खोजी कुएं में मिली प्राकृतिक गैस

    अंडमान सागर में ऊर्जा क्षेत्र को बड़ी सफलता, ऑयल इंडिया के तीसरे खोजी कुएं में मिली प्राकृतिक गैस

    नई दिल्ली । देश की प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की ऊर्जा कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड को अंडमान के अपतटीय क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की खोज के रूप में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। कंपनी ने घोषणा की है कि अंडमान सागर में ड्रिल किए गए अपने तीसरे खोजी कुएं में प्राकृतिक गैस और हाइड्रोकार्बन की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। इस उपलब्धि को भारत की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू संसाधनों की खोज के प्रयासों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    कंपनी के अनुसार, यह खोज विजयपुरम-3 नामक खोजी कुएं में हुई है, जिसे ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी के तहत अंडमान के अपतटीय ब्लॉक में विकसित किया गया है। यह कुआं अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर समुद्र में स्थित है। समुद्री क्षेत्र में लगभग 355 मीटर की जल गहराई पर स्थित इस स्थान पर उन्नत तकनीक की सहायता से ड्रिलिंग कार्य किया गया।

    ऑयल इंडिया ने बताया कि ड्रिलिंग अभियान के दौरान इयोसीन भू-स्तर में 1,900 मीटर से अधिक गहराई तक पहुंचकर परीक्षण किए गए। प्रारंभिक उत्पादन परीक्षणों के दौरान प्राकृतिक गैस की मौजूदगी के स्पष्ट संकेत प्राप्त हुए। परफोरेशन प्रक्रिया के बाद लगातार गैस का प्रवाह और उसका जलना इस बात का प्रमाण माना गया कि क्षेत्र में व्यावसायिक महत्व की गैस मौजूद हो सकती है।

    कंपनी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार परीक्षण के दौरान कुएं के भीतर दबाव में तेजी से वृद्धि दर्ज की गई, जिसके बाद गैस का प्रवाह शुरू हुआ। यह संकेत ऊर्जा विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन प्रणाली की सक्रियता की पुष्टि होती है। फिलहाल प्राप्त गैस के नमूनों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा रहा है ताकि उसकी रासायनिक संरचना और ऊष्मीय क्षमता का सटीक आकलन किया जा सके।

    इसके साथ ही विशेषज्ञ आइसोटोप अध्ययन भी कर रहे हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य गैस और अन्य हाइड्रोकार्बन के स्रोत, उत्पत्ति तथा भूगर्भीय विकास को समझना है। इन परीक्षणों के परिणाम भविष्य में क्षेत्र की ऊर्जा संभावनाओं का अधिक सटीक मूल्यांकन करने में मदद करेंगे।

    यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अंडमान अपतटीय ब्लॉक में यह हाइड्रोकार्बन की दूसरी पुष्टि है। इससे पहले सितंबर 2025 में विजयपुरम-2 नामक खोजी कुएं में भी प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई थी। अब तक इस ब्लॉक में कुल तीन खोजी कुएं ड्रिल किए जा चुके हैं, जिनमें से दो में हाइड्रोकार्बन की मौजूदगी के स्पष्ट संकेत मिले हैं। इससे पूरे क्षेत्र की ऊर्जा क्षमता को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं।

    ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि लगातार मिल रही सफलताएं अंडमान क्षेत्र को भविष्य के महत्वपूर्ण गैस उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर सकती हैं। यदि आगे के परीक्षण और अन्वेषण भी सकारात्मक रहते हैं तो इससे देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिल सकती है और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

    ऑयल इंडिया ने इस खोज को भविष्य की अन्वेषण और उत्पादन गतिविधियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक बताया है। कंपनी का मानना है कि अंडमान क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की मौजूदगी के बढ़ते प्रमाण आने वाले वर्षों में नई ऊर्जा परियोजनाओं और निवेश के अवसरों को भी बढ़ावा देंगे। यह खोज भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।

  • भारत-रूस रिश्तों पर पुतिन का बड़ा बयान, कहा- कोई बाहरी ताकत नहीं डाल सकती असर; 100 अरब डॉलर व्यापार का रखा लक्ष्य

    भारत-रूस रिश्तों पर पुतिन का बड़ा बयान, कहा- कोई बाहरी ताकत नहीं डाल सकती असर; 100 अरब डॉलर व्यापार का रखा लक्ष्य

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर चल रही अहम बातचीत के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत और रूस के संबंधों पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने भारत को एक महान राष्ट्र, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और रूस का भरोसेमंद सहयोगी बताते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्ते इतने मजबूत हैं कि किसी भी बाहरी दबाव से प्रभावित नहीं हो सकते। पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भी खुलकर सराहना की और भारत की आर्थिक प्रगति को उनकी सरकार की नीतियों का परिणाम बताया।

    सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम के दौरान दुनिया की प्रमुख समाचार एजेंसियों के प्रमुखों से बातचीत करते हुए पुतिन ने कहा कि भारत आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसकी विकास दर दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। उन्होंने कहा कि भारत की यह उपलब्धि उसके नेतृत्व, स्थिर नीतियों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की सोच का परिणाम है।

    रूसी राष्ट्रपति ने अमेरिका सहित कुछ देशों द्वारा भारत पर रूस के साथ संबंधों को लेकर बनाए जाने वाले दबाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बड़े और स्वतंत्र देश पर किसी प्रकार का राजनीतिक या आर्थिक दबाव बनाना आसान नहीं है। उनके अनुसार डेढ़ अरब से अधिक आबादी वाले देश के अपने राष्ट्रीय हित हैं और वह उन्हीं के आधार पर अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक साझेदारियों का निर्धारण करता है। पुतिन ने संकेत दिया कि किसी भी देश द्वारा भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने का प्रयास अंततः उसके अपने हितों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

    भारत-रूस आर्थिक सहयोग का उल्लेख करते हुए पुतिन ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 60 अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास है, लेकिन आने वाले वर्षों में इसे 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने की पूरी संभावना मौजूद है। उनके अनुसार ऊर्जा, रक्षा, प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं, जिनका लाभ दोनों देशों को मिलेगा।

    पुतिन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूसी तेल की खरीद को लेकर अमेरिका एक बार फिर सख्त रुख अपनाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों को दी गई कुछ प्रतिबंध छूटों की समीक्षा की जा सकती है। भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है जिन्होंने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के दौरान रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा किया है। ऐसे में पुतिन का बयान भारत-रूस ऊर्जा सहयोग के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    रूस और भारत के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी को लेकर पुतिन ने भरोसा जताया कि दोनों देश भविष्य में भी विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर मिलकर काम करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने दीर्घकालिक सहयोग की ऐसी रूपरेखा तैयार की है जो पारस्परिक लाभ और साझा विकास पर आधारित है।

    विशेष महत्व की बात यह है कि पुतिन का यह बयान उनके प्रस्तावित भारत दौरे से पहले आया है। सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में उनके शामिल होने की संभावना है। भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और सम्मेलन को लेकर तैयारियां तेज़ हैं। ऐसे में पुतिन के हालिया बयान को भारत-रूस संबंधों की मजबूती और दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक विश्वास के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

  • रेपो रेट पर RBI के फैसले के बाद बाजार में बिकवाली, सेंसेक्स 200 अंक टूटा, बैंकिंग शेयर दबाव में

    रेपो रेट पर RBI के फैसले के बाद बाजार में बिकवाली, सेंसेक्स 200 अंक टूटा, बैंकिंग शेयर दबाव में


    नई दिल्ली ।
    घरेलू शेयर बाजार में शुक्रवार को उतार-चढ़ाव भरा कारोबार देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत सकारात्मक माहौल में हुई और प्रमुख सूचकांकों ने बढ़त के साथ शुरुआत की, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति संबंधी घोषणा के बाद बाजार का रुख बदल गया। रेपो रेट को यथावत रखने के फैसले और आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान में कमी के संकेतों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया, जिसके चलते बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ गया।

    कारोबार के शुरुआती चरण में निवेशकों का रुझान सकारात्मक था और सेंसेक्स के अधिकांश शेयर बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं और ऑटोमोबाइल क्षेत्र के कुछ प्रमुख शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। हालांकि, जैसे ही RBI की नीति से जुड़े प्रमुख संकेत सामने आए, बाजार ने अपनी शुरुआती बढ़त खो दी और प्रमुख सूचकांक लाल निशान में पहुंच गए।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों की प्रतिक्रिया केवल रेपो रेट को स्थिर रखने तक सीमित नहीं रही, बल्कि केंद्रीय बैंक द्वारा आर्थिक वृद्धि के अनुमान को कम करने और महंगाई के अनुमान को बढ़ाने का असर भी बाजार पर दिखाई दिया। इससे निवेशकों के बीच आगामी आर्थिक गतिविधियों और कॉर्पोरेट आय को लेकर सतर्कता बढ़ी, जिसका सीधा असर शेयरों की खरीदारी पर पड़ा।

    बीएसई सेंसेक्स कारोबार के दौरान 200 अंकों से अधिक फिसल गया और बाद में भी गिरावट के साथ कारोबार करता रहा। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी दबाव में दिखाई दिया। बैंकिंग क्षेत्र के शेयरों में सबसे अधिक असर देखने को मिला, क्योंकि शुरुआती तेजी के बाद इनमें मुनाफावसूली बढ़ गई। निवेशकों को उम्मीद थी कि केंद्रीय बैंक की ओर से नीतिगत दरों में किसी प्रकार की राहत मिल सकती है, लेकिन ऐसा नहीं होने से बैंकिंग शेयरों की रफ्तार थम गई।

    दूसरी ओर, तकनीकी और आईटी क्षेत्र के कुछ शेयरों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। टेक महिंद्रा, इन्फोसिस और टीसीएस जैसे शेयरों में निवेशकों की रुचि बनी रही। इसके अलावा कुछ निजी वित्तीय और ऑटोमोबाइल कंपनियों के शेयरों ने भी शुरुआती सत्र में मजबूती दिखाई। हालांकि व्यापक बाजार में दबाव बढ़ने के कारण इन शेयरों की तेजी भी सीमित रही।

    गिरावट वाले शेयरों में धातु, ऊर्जा और कुछ बैंकिंग कंपनियों के शेयर प्रमुख रहे। टाटा स्टील, पावरग्रिड, एचडीएफसी बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज और एनटीपीसी जैसे प्रमुख शेयरों में कमजोरी दर्ज की गई। इन शेयरों में बिकवाली का असर सूचकांकों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

    इस बीच विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया अपेक्षाकृत स्थिर रहा। डॉलर के मुकाबले रुपये में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया और यह लगभग पिछले कारोबारी सत्र के स्तर के आसपास कारोबार करता रहा। इससे संकेत मिला कि मुद्रा बाजार ने केंद्रीय बैंक की घोषणा पर सीमित प्रतिक्रिया दी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक बाजारों से मिलने वाले संकेतों पर बनी रहेगी। यदि आर्थिक आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहते हैं तो बाजार में फिर से खरीदारी लौट सकती है। फिलहाल RBI के ताजा संकेतों ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है, जिसके कारण बाजार में अल्पकालिक दबाव देखने को मिल रहा है।

  • चांदी बाजार में बड़ी नरमी, MCX से लेकर सर्राफा बाजार तक कीमतों में तेज गिरावट; निवेशकों की बढ़ी चिंता

    चांदी बाजार में बड़ी नरमी, MCX से लेकर सर्राफा बाजार तक कीमतों में तेज गिरावट; निवेशकों की बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । देश के सर्राफा और कमोडिटी बाजार में शुक्रवार को चांदी की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। घरेलू बाजारों से लेकर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) तक चांदी के दाम दबाव में दिखाई दिए, जिससे निवेशकों और खरीदारों के बीच बाजार की दिशा को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। हाल के दिनों में लगातार ऊंचे स्तर पर कारोबार कर रही चांदी में आई यह गिरावट बाजार के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    5 जून 2026 के कारोबारी सत्र में देश के कई प्रमुख बाजारों में चांदी की कीमतों में नरमी देखने को मिली। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित विभिन्न राज्यों के सर्राफा बाजारों में चांदी के भाव पिछले सत्रों की तुलना में नीचे आए। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट केवल स्थानीय मांग और आपूर्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का भी बड़ा प्रभाव है।

    कमोडिटी बाजार में भी चांदी के वायदा कारोबार पर दबाव साफ दिखाई दिया। MCX पर शुरुआती कारोबार के दौरान चांदी के भाव में उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई। रिपोर्टों के अनुसार कुछ कॉन्ट्रैक्ट्स में कीमतों में प्रति किलोग्राम कई हजार रुपये तक की गिरावट देखने को मिली। हालांकि विभिन्न एक्सपायरी और कॉन्ट्रैक्ट अवधि के अनुसार दरों में अंतर बना रहा, फिर भी पूरे बाजार में कमजोरी का रुख स्पष्ट दिखाई दिया।

    स्थानीय स्पॉट मार्केट में भी चांदी की कीमतें नरम रहीं। व्यापारियों के अनुसार हाल के उच्च स्तरों के बाद निवेशकों द्वारा मुनाफावसूली और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोरी का असर घरेलू कीमतों पर पड़ा है। इसके कारण खरीदारों को कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन निवेशकों के लिए बाजार की दिशा को लेकर सतर्कता बढ़ गई है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की मजबूती ने कीमती धातुओं पर दबाव बनाया है। जब डॉलर मजबूत होता है तो सोना और चांदी जैसी धातुएं अपेक्षाकृत महंगी हो जाती हैं, जिससे वैश्विक मांग प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता भी निवेशकों को सुरक्षित रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।

    भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी बाजार की चाल को प्रभावित कर रही हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी चिंताओं ने निवेशकों के रुख को प्रभावित किया है। हालांकि ऐसे समय में आमतौर पर सुरक्षित निवेश विकल्पों की मांग बढ़ती है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों का व्यवहार अपेक्षाकृत सतर्क बना हुआ है।

    कमोडिटी विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। वैश्विक आर्थिक आंकड़े, अमेरिकी डॉलर की चाल और केंद्रीय बैंकों की नीतियां बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ऐसे में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचना चाहिए और बाजार के संकेतों पर लगातार नजर बनाए रखनी चाहिए।

    चांदी की कीमतों में आई यह गिरावट उन उपभोक्ताओं के लिए राहत भरी खबर मानी जा रही है जो निवेश या आभूषण खरीदारी की योजना बना रहे हैं। वहीं निवेशकों के लिए यह समय बाजार की गतिविधियों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने और दीर्घकालिक रणनीति के साथ आगे बढ़ने का संकेत दे रहा है।

  • मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में बड़ी गिरावट…5 माह में गंवा दिए दो लाख करोड़ रुपये से अधिक

    मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में बड़ी गिरावट…5 माह में गंवा दिए दो लाख करोड़ रुपये से अधिक


    नई दिल्ली।
    यह साल अबतक मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) के लिए अच्छा नहीं रहा। न केवल उनके सिर से भारत और एशिया (India and Asia) के सबसे अमीर का ताज छिना बल्कि नेटवर्थ के मोर्चे पर भी बहुत बड़ा झटका लगा, जिसकी वजह रिलायंस इंडस्टीज के शेयरों (Reliance Industries shares) में भारि गिरावट है। अंबानी अब दुनिया के अमीरों की लिस्ट में 26वें स्थान पर आ गए हैं।

    ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के ताजा आंकड़ों के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 85.8 अरब डॉलर आंकी गई है। इस साल उनकी संपत्ति में 21.9 अरब डॉलर (करीब ₹2,09,583 करोड़) की गिरावट दर्ज की गई है। यह उनकी कुल संपत्ति में लगभग 20.4 प्रतिशत की कमी के बराबर है।

    ब्लूमबर्ग के अनुसार 5 जून 2026 को मुकेश अंबानी की संपत्ति में एक ही दिन 4 जून को 617 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई। इसके बावजूद वह एशिया और भारत के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में शामिल हैं। एशिया के अरबपतियों में उनकी पोजीशन नंबर तीन और भारत में नंबर दो की है। एशिया में पहले स्थान पर चीन के झांक यिमिन हैं और भारत में हमवतन गौतम अडानी।


    रिलायंस इंडस्ट्रीज है सबसे बड़ी संपत्ति का स्रोत

    मुकेश अंबानी की संपत्ति का बड़ा हिस्सा रिलायंस इंडस्ट्रीज में उनकी हिस्सेदारी से आता है। रिलायंस दुनिया के सबसे बड़े ऑयल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स का संचालन करती है।मार्च 2025 तक कंपनी का सालाना रेवेन्यू 114 अरब डॉलर रहा।

    कंपनी पेट्रोकेमिकल्स, रिटेल, डिजिटल सेवाओं, टेलीकॉम एंड एनर्जी सेक्टर में सक्रिय है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक अंबानी के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज में प्रमोटर समूह के जरिए करीब 42 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिसे ब्लूमबर्ग अपनी गणना में उनकी संपत्ति का प्रमुख आधार मानता है।


    जियो फाइनेंशियल सर्विसेज में भी बड़ी हिस्सेदारी

    रिलायंस से अलग हुई जियो फाइनेंशियल सर्विसेज में भी मुकेश अंबानी की लगभग 41 प्रतिशत हिस्सेदारी है। यह हिस्सेदारी सीधे और प्रमोटर समूह के माध्यम से उनके नियंत्रण में है।


    एंटीलिया की कीमत 400 मिलियन डॉलर से ज्यादा

    मुंबई स्थित अंबानी परिवार का आलीशान घर “एंटीलिया” भी उनकी संपत्ति का अहम हिस्सा है। 27 मंजिला इस इमारत का मूल्य 400 मिलियन डॉलर से अधिक माना जाता है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस भवन के निर्माण पर 1 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए गए थे। इसमें हेलिपैड, थिएटर, स्पा, फिटनेस सेंटर, बॉलरूम और सैकड़ों कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था है।


    कारोबार संभालने के लिए छोड़ दी थी स्टैनफोर्ड की पढ़ाई

    मुकेश अंबानी 1979 में अमेरिका के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए गए थे, लेकिन एक साल बाद उनके पिता धीरूभाई अंबानी ने उन्हें भारत बुला लिया। इसके बाद उन्होंने रिलायंस के विस्तार और नई परियोजनाओं की जिम्मेदारी संभाली।

    धीरूभाई अंबानी के 2002 में निधन के बाद मुकेश और अनिल अंबानी के बीच कारोबारी विवाद हुआ। वर्ष 2005 में परिवार की मध्यस्थता से दोनों भाइयों के बीच कारोबार का बंटवारा हुआ।


    मुंबई इंडियंस टीम के भी मालिक हैं मुकेश अंबानी

    मुकेश अंबानी इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) की सबसे सफल फ्रेंचाइजी में से एक मुंबई इंडियंस के मालिक भी हैं। इसके अलावा उन्होंने टेलीकॉम, डिजिटल सेवाओं और रिटेल कारोबार में भी बड़े निवेश किए हैं।


    क्यों घटी संपत्ति?

    विशेषज्ञों का मानना है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता और निवेशकों की बदलती धारणा के कारण अंबानी की संपत्ति में इस साल बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। हालांकि, 85.8 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ मुकेश अंबानी अभी भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली अरबपतियों में शामिल हैं और भारतीय उद्योग जगत में उनकी स्थिति मजबूत बनी हुई है।

  • EPFO ने EPF की ब्याज दर को 8.25% पर रखा बरकार….. करोड़ों सदस्यों को होगा फायदा

    EPFO ने EPF की ब्याज दर को 8.25% पर रखा बरकार….. करोड़ों सदस्यों को होगा फायदा


    नई दिल्ली।
    ईपीएफओ (EPFO) ने वित्तवर्ष 2026 के लिए 8.25% ब्याज दर बरकरार रखी है और यह कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (Employees Provident Fund Organization- EPFO) के करोड़ों सदस्यों के लिए राहत की खबर है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने 2 मार्च 2026 को इसकी जानकारी दी थी। हालांकि ब्याज दर (Interest Rate) की घोषणा हुए दो महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक अधिकांश खाताधारकों के खातों में ब्याज की राशि दिखाई नहीं दी है।


    कब खाते में आएगा EPF का ब्याज?

    EPFO द्वारा ब्याज दर की घोषणा के बाद उसे केंद्र सरकार की मंजूरी मिलनी होती है। इसके बाद करोड़ों खातों का मिलान और रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसी वजह से ब्याज जमा होने में कुछ समय लगता है। आमतौर पर EPF खातों में पिछले वित्त वर्ष का ब्याज जून से सितंबर के बीच जमा किया जाता है। इसलिए सदस्य आने वाले महीनों में अपने खाते में ब्याज की एंट्री देख सकते हैं।


    देरी हो सकती है, लेकिन पूरा ब्याज मिलेगा

    EPFO ने स्पष्ट किया है कि भले ही ब्याज जमा होने में कुछ समय लगे, लेकिन सभी पात्र सदस्यों को पूरा ब्याज मिलेगा। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सभी खातों की पासबुक में ब्याज की एंट्री एक साथ दिखाई नहीं देती। अलग-अलग खातों में यह अपडेट अलग-अलग समय पर नजर आ सकता है।


    कैसे चेक करें कि ब्याज जमा हुआ या नहीं?

    EPF सदस्य कई तरीकों से यह जांच सकते हैं कि उनके खाते में ब्याज जमा हुआ है या नहीं।
    1. UMANG ऐप: UMANG ऐप में लॉगिन कर EPF पासबुक देख सकते हैं।
    2. EPFO पोर्टल: EPFO की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर पासबुक चेक की जा सकती है।
    3. मिस्ड कॉल सेवा: रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से EPFO की मिस्ड कॉल सेवा का उपयोग किया जा सकता है।
    4. SMS सुविधा: UAN से जुड़े मोबाइल नंबर से SMS भेजकर खाते की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।


    EPFO 3.0 में मिलेगा UPI से पैसा निकालने का विकल्प

    EPFO जल्द ही अपने नए डिजिटल प्लेटफॉर्म EPFO 3.0 के तहत बड़ी सुविधा शुरू करने जा रहा है। इसके बाद सदस्य अपने पीएफ खाते से सीधे बैंक खाते में राशि ट्रांसफर कर सकेंगे।

    EPFO 3.0 के तहत UPI के माध्यम से सीधे बैंक खाते में PF राशि ट्रांसफर, UMANG ऐप पर उपलब्ध निकासी राशि की जानकारी और QR कोड के जरिए सुरक्षित ट्रांसफर की सुविधा मिलेगी। बैंक खाते में पैसा आने के बाद ATM या UPI से उपयोग की सुविधा भी मिलेगी। वहीं, ऑटो-सेटलमेंट की सीमा 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये की गई है।


    अब नहीं होगी लंबी प्रक्रिया

    नई व्यवस्था लागू होने के बाद पीएफ निकासी के लिए लंबी प्रतीक्षा और कई स्तर की मंजूरी की जरूरत कम हो जाएगी। सदस्य सीधे अपने लिंक्ड बैंक खाते में राशि प्राप्त कर सकेंगे और जरूरत के अनुसार उसका उपयोग कर सकेंगे।

    करोड़ों कर्मचारियों को मिलेगा फायदा: EPFO 3.0 को कर्मचारियों के लिए एक बड़ा डिजिटल सुधार माना जा रहा है। इससे पीएफ निकासी प्रक्रिया पहले से अधिक तेज, आसान और पारदर्शी होने की उम्मीद है।