Category: Economy

  • रिकॉर्ड EV बिक्री के बीच सिर्फ वाहन निर्माता नहीं, पूरी EV वैल्यू चेन की कंपनियां बन सकती हैं निवेशकों की बड़ी पसंद

    रिकॉर्ड EV बिक्री के बीच सिर्फ वाहन निर्माता नहीं, पूरी EV वैल्यू चेन की कंपनियां बन सकती हैं निवेशकों की बड़ी पसंद

    नई दिल्ली । भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार लगातार विस्तार की ओर बढ़ रहा है और इसके साथ ही निवेशकों की रुचि भी इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ी है। हालांकि बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इलेक्ट्रिक कार या दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियों में निवेश करना पर्याप्त नहीं है। EV उद्योग की वास्तविक मजबूती उन कंपनियों में भी दिखाई देती है जो इस पूरे इकोसिस्टम को आवश्यक तकनीक, उपकरण और पुर्जे उपलब्ध कराती हैं। ऐसे में निवेश का दायरा वाहन निर्माताओं से आगे बढ़कर पूरी EV वैल्यू चेन तक फैलता नजर आ रहा है।

    हाल के समय में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बढ़ती ईंधन कीमतों, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली नीतियों और उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं ने EV को तेजी से लोकप्रिय बनाया है। यही कारण है कि इस क्षेत्र से जुड़ी अनेक कंपनियों के कारोबार में भी विस्तार की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में EV उद्योग का विकास केवल वाहन निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे जुड़े हर स्तर के उद्योग को इसका लाभ मिलेगा।

    EV वैल्यू चेन में बैटरी निर्माण, मोटर, कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग सेवाएं और चार्जिंग से जुड़े पावर उपकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन क्षेत्रों में कार्यरत कंपनियां वाहन निर्माताओं को जरूरी तकनीक और उत्पाद उपलब्ध कराती हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन बढ़ेगा, इन कंपनियों की मांग भी समान गति से बढ़ने की संभावना है। यही वजह है कि निवेशकों का ध्यान अब पूरे इकोसिस्टम की ओर केंद्रित हो रहा है।

    बाजार विश्लेषकों ने इस क्षेत्र से जुड़ी कई कंपनियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया है। इनमें ऑटो कंपोनेंट, बैटरी, इंजीनियरिंग, पावर उपकरण और विशेष रसायन बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं। ऐसे व्यवसाय EV उद्योग की रीढ़ माने जाते हैं क्योंकि इनके बिना बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं है। यदि इलेक्ट्रिक वाहन बाजार अपेक्षित गति से आगे बढ़ता है, तो इन कंपनियों के राजस्व और ऑर्डर बुक पर भी इसका अनुकूल प्रभाव देखने को मिल सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को केवल किसी एक प्रमुख वाहन निर्माता पर निर्भर रहने के बजाय विविधीकृत रणनीति अपनानी चाहिए। EV उद्योग कई स्तरों पर अवसर प्रदान करता है और अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियां अपने-अपने हिस्से का लाभ अर्जित कर सकती हैं। इस कारण बैटरी, मोटर, ऑटो कंपोनेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग समाधान उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भी दीर्घकालिक निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

    हालांकि किसी भी निवेश निर्णय से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, कारोबार की गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धी क्षमता और भविष्य की विकास संभावनाओं का मूल्यांकन करना आवश्यक है। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक होता है और किसी भी क्षेत्र में निवेश जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं होता। इसके बावजूद भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के बढ़ते दायरे और सरकार के स्वच्छ ऊर्जा पर बढ़ते जोर को देखते हुए EV वैल्यू चेन आने वाले वर्षों में निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अवसरों वाला क्षेत्र बन सकती है। इसी वजह से अब बाजार की नजर केवल इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियों पर नहीं, बल्कि पूरे EV इकोसिस्टम को मजबूत करने वाले उद्योगों पर भी बनी हुई है।

  • आरबीआई की विशेष योजना से विदेशी मुद्रा प्रवाह मजबूत, एफसीएनआर (बी) जमा में सार्वजनिक बैंकों की अहम भूमिका

    आरबीआई की विशेष योजना से विदेशी मुद्रा प्रवाह मजबूत, एफसीएनआर (बी) जमा में सार्वजनिक बैंकों की अहम भूमिका

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष जमा योजना के तहत विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) यानी एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिल रही है। हालिया आकलनों के अनुसार, केवल 45 दिनों के भीतर इन जमाओं का स्तर वर्ष 2013 में दर्ज 26 अरब डॉलर के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पार कर चुका है। मौजूदा रुझानों को देखते हुए सितंबर के अंत तक एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट 65 से 70 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जबकि कुल जमा 80 से 85 अरब डॉलर के दायरे में रह सकती है।

    17 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग 20 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह दर्ज किया गया है। इसमें 17.4 अरब डॉलर का योगदान केवल एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट से आया है। यह संकेत देता है कि विशेष योजना को प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा निवेशकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि जमा में आई यह तेजी देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, अगस्त और सितंबर 2026 के दौरान परिपक्व होने वाली बड़ी संख्या में मौजूदा एफसीएनआर (बी) जमाओं का नवीनीकरण होने की संभावना है। विशेष योजना के तहत उपलब्ध अपेक्षाकृत अधिक ब्याज दरें जमाकर्ताओं को अपनी राशि दोबारा निवेश करने के लिए आकर्षित कर सकती हैं। इससे कुल जमा राशि में और वृद्धि होने की उम्मीद है।

    रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि मौजूदा आधारभूत अनुमान के अतिरिक्त लगभग 10 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी भी देश में आ सकती है। यह अतिरिक्त निवेश मुख्य रूप से उन देशों से आने की संभावना है जहां कर संबंधी रियायतें उपलब्ध हैं और प्रवासी भारतीयों की अच्छी संख्या मौजूद है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो विदेशी मुद्रा प्रवाह अपेक्षा से अधिक मजबूत हो सकता है।

    एफसीएनआर (बी) जमा अभियान को आगे बढ़ाने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इन बैंकों ने न केवल अपने व्यापक ग्राहक आधार का लाभ उठाया है, बल्कि विभिन्न देशों में रहने वाले भरोसेमंद और उच्च साख वाले ग्राहकों के साथ लंबे समय से बने संबंधों का भी प्रभावी उपयोग किया है। इसके साथ ही ऑनशोर और ऑफशोर बैंकिंग रणनीतियों के संतुलित उपयोग ने भी पूंजी जुटाने की प्रक्रिया को गति दी है।

    हालांकि मजबूत पूंजी प्रवाह के बावजूद विदेशी मुद्रा बाजार में कुछ सवाल भी बने हुए हैं। वित्तीय बाजारों में यह चर्चा जारी है कि इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने के बाद भी रुपये पर दबाव क्यों बना हुआ है और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की स्थिति पर इसका वास्तविक प्रभाव किस प्रकार दिखाई देगा। यह विषय आने वाले समय में नीति निर्माताओं और बाजार विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण बना रह सकता है।

    विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप पूरी तरह नियमित नहीं रहा। इसके बावजूद यह आवश्यक माना गया है कि रुपये की मूलभूत मजबूती को बनाए रखा जाए, ताकि वह वैश्विक आर्थिक झटकों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके और भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर प्रतिकूल असर न पड़े। वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ते तनाव और असंतुलित पूंजी प्रवाह के दौर में विदेशी मुद्रा प्रबंधन और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव में नरमी से कच्चे तेल में बड़ी गिरावट, वैश्विक बाजार में ब्रेंट और WTI करीब 5% टूटे

    अमेरिका-ईरान तनाव में नरमी से कच्चे तेल में बड़ी गिरावट, वैश्विक बाजार में ब्रेंट और WTI करीब 5% टूटे


    नई दिल्ली । 
    अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव में फिलहाल नरमी आने के संकेतों का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत देखने को मिला। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई और प्रमुख तेल बेंचमार्क लगभग पांच प्रतिशत तक टूट गए। निवेशकों ने तनाव कम होने की संभावना के बीच मुनाफावसूली की, जिससे पिछले कुछ सप्ताह की तेज बढ़त के बाद बाजार में दबाव बढ़ गया।

    कारोबार के शुरुआती घंटों में अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 4.8 प्रतिशत गिरकर लगभग 87.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) कच्चा तेल भी करीब 5.09 प्रतिशत टूटकर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया। एक ही कारोबारी सत्र में आई यह गिरावट हाल के समय की बड़ी गिरावटों में शामिल रही।

    बाजार में नरमी की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियों में विराम की संभावना रही। ईरान की ओर से यह संकेत दिए गए कि यदि अमेरिका सैन्य अभियान आगे नहीं बढ़ाता है तो वह भी जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा। इस घटनाक्रम के बाद निवेशकों को लगा कि पश्चिम एशिया में तनाव फिलहाल और नहीं बढ़ेगा, जिससे तेल आपूर्ति पर तत्काल संकट की आशंका कुछ कम हुई है।

    हालांकि मौजूदा गिरावट के बावजूद ऊर्जा बाजार पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं पहुंचा है। पिछले तीन सप्ताह के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया था। उस दौरान ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था। बाजार को आशंका थी कि संघर्ष बढ़ने पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ता।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ताजा गिरावट के बावजूद भू-राजनीतिक जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। हाल के दिनों में लाल सागर क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों को लेकर बढ़ी गतिविधियों ने बाजार की चिंता को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया है। यदि क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में दोबारा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

    बाजार विश्लेषकों के अनुसार, जुलाई महीने के दौरान आई तेज गिरावट के बावजूद कच्चे तेल की कीमतें अभी भी महीने की शुरुआत की तुलना में काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि आपूर्ति से जुड़े जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं और वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सामान्य आवाजाही अभी पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी है। इसलिए निवेशकों की नजर अब भी पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर बनी हुई है।

    कच्चे तेल की कीमतों में नरमी का असर विदेशी मुद्रा बाजार पर भी दिखाई दिया। सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर खुला। शुरुआती कारोबार में रुपया पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में 41 पैसे की मजबूती के साथ 96.15 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका सकारात्मक प्रभाव तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति पर भी पड़ सकता है।

    आने वाले दिनों में वैश्विक निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान संबंधों, पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और प्रमुख समुद्री मार्गों पर तेल आपूर्ति की सामान्य स्थिति पर रहेगी। इन कारकों के आधार पर ही कच्चे तेल की कीमतों की अगली दिशा तय होने की संभावना है।

  • कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । भारतीय बुलियन और सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में लगातार आ रही गिरावट ने निवेशकों और खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष की शुरुआत में सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद अब सोने के दामों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। रिकॉर्ड स्तर से करीब 37 हजार रुपये प्रति दस ग्राम की गिरावट के बाद बाजार में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या यह नए निवेश का सही समय है या अभी कीमतों में और सुधार देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक बाजार के रुझानों का सीधा असर घरेलू सर्राफा बाजार पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनावों, कच्चे तेल की अनिश्चित कीमतों और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की सख्त मौद्रिक नीतियों के कारण सोने की वैश्विक दरों पर लगातार दबाव बना हुआ है। जनवरी महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,602 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने वाला सोना अब घटकर करीब 4,040 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। इसी के प्रभाव से भारतीय बाजार में भी कीमतें एक लाख अस्सी हजार रुपये के पीक स्तर से गिरकर एक लाख तैंतालीस हजार रुपये प्रति दस ग्राम के स्तर पर आ गई हैं।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सोने की कीमतों में इस नरमी का मुख्य कारण केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियां हैं। अमेरिका में महंगाई पर नियंत्रण के लिए अपनाई जा रही कड़ी मौद्रिक नीतियों और ब्याज दरों में कटौती की संभावना न के बराबर होने के कारण निवेशक फिक्स्ड रिटर्न देने वाले अन्य वित्तीय साधनों की ओर रुख कर रहे हैं। चूंकि सोना कोई प्रत्यक्ष ब्याज या लाभांश प्रदान नहीं करता, इसलिए उच्च ब्याज दर के दौर में इसकी मांग पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।

    बाजार के दीर्घकालिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि सोने ने ऐतिहासिक रूप से निवेशकों को सुरक्षित और आकर्षक रिटर्न दिया है। पिछले तीन दशकों के दौरान इस पीली धातु के मूल्यों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। यद्यपि अल्पकालिक अवधि में भू-राजनीतिक बदलावों और आर्थिक नीतियों के कारण इसमें बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक नजरिए से इसे हमेशा से एक मजबूत परिसंपत्ति माना जाता रहा है।

    बाजार विश्लेषकों का सुझाव है कि जो निवेशक अपने पोर्टफोलियो में सोने को शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए एकमुश्त निवेश के बजाय व्यवस्थित तरीके से किस्तों में खरीदारी करना अधिक जोखिम-रहित रणनीति हो सकती है। आने वाले समय में वैश्विक बाजार के रुझानों और नीतिगत निर्णयों के आधार पर कीमतों में सीमित दायरे का उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • ITR: डेडलाइन के अंतिम दिनों में इनकम टैक्स पोर्टल हुआ ठप… टैक्सपेयर्स की बढ़ी टेंशन

    ITR: डेडलाइन के अंतिम दिनों में इनकम टैक्स पोर्टल हुआ ठप… टैक्सपेयर्स की बढ़ी टेंशन


    नई दिल्ली।
    अगर आपने अभी तक अपना ITR फाइल नहीं किया है, तो अलर्ट हो जाइए। 31 जुलाई की आखिरी तारीख से ठीक पहले इनकम टैक्स विभाग (Income Tax Department) का ई-फाइलिंग पोर्टल (E-filing portal) कई यूजर्स के लिए ठप पड़ गया। लोगों ने सोशल मीडिया पर शिकायत की कि न तो वेबसाइट खुल रही है, न लॉगिन हो रहा है और न ही टैक्स पेमेंट या ITR फाइल हो पा रहा है। 31 जुलाई को इनकम टैक्स रिटर्न (Income Tax Return 2026- ITR) भरने की आखिरी तारीख है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग अपना रिटर्न दाखिल करने और बाकी टैक्स का पेमेंट करने में जुटे हैं। लेकिन कई टैक्सपेयर्स और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शिकायत की कि इनकम टैक्स विभाग का ई-फाइलिंग पोर्टल ठीक से काम नहीं कर रहा है।


    टैक्सपेयर्स ने की शिकायत

    यूजर्स के मुताबिक पोर्टल पर लॉगिन करने में दिक्कत आ रही है। कई लोगों का कहना है कि वे आईटीआर फाइल नहीं कर पा रहे हैं, जबकि कुछ यूजर्स टैक्स पेमेंट भी नहीं कर सके। एक यूजर ने लिखा कि पिछले दो घंटे से पोर्टल काम नहीं कर रहा है और इनकम टैक्स पर भी वेबसाइट का इस तरह बंद होना हैरान करने वाला है।


    आखिरी दिनों में पोर्टल पर बढ़ा ट्रैफिक

    इनकम टैक्स विभाग की वेबसाइट के मुताबिक असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए अब तक 3.5 करोड़ से ज्यादा आईटीआर दाखिल किए जा चुके हैं। हर साल की तरह इस बार भी आखिरी कुछ दिनों में बड़ी संख्या में लोग रिटर्न फाइल करने के लिए पोर्टल पर पहुंच रहे हैं। माना जा रहा है कि बढ़ते ट्रैफिक की वजह से भी तकनीकी दिक्कतें सामने आ सकती हैं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    31 जुलाई है आईटीआर फाइल करने की आखिरी तारीख
    फिलहाल इनकम टैक्स विभाग की ओर से पोर्टल में आई दिक्कतों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। साथ ही 31 जुलाई की आखिरी तारीख बढ़ाने को लेकर भी कोई घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में जिन लोगों का आईटीआर अभी तक फाइल नहीं हुआ है, उन्हें सलाह दी जाती है कि पोर्टल सामान्य होते ही तुरंत अपना रिटर्न दाखिल करें। जब तक इनकम टैक्स विभाग की ओर से कोई नई सूचना नहीं आती, तब तक 31 जुलाई की अंतिम तारीख पहले की तरह ही लागू रहेगी।

  • आज का शेयर बाजार रहेगा उतार चढ़ाव भरा या मिलेगी शानदार तेजी निवेशकों के लिए जानना जरूरी है ये बड़े फैक्टर

    आज का शेयर बाजार रहेगा उतार चढ़ाव भरा या मिलेगी शानदार तेजी निवेशकों के लिए जानना जरूरी है ये बड़े फैक्टर


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में हर कारोबारी दिन नई संभावनाएं और नई चुनौतियां लेकर आता है। बाजार की चाल कई घरेलू और वैश्विक कारकों पर निर्भर करती है। ऐसे में निवेशकों की नजर सिर्फ सेंसेक्स और निफ्टी के उतार चढ़ाव पर ही नहीं बल्कि विदेशी बाजारों कच्चे तेल की कीमतों डॉलर की स्थिति विदेशी निवेशकों की खरीद बिक्री और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर भी रहती है। आज भी बाजार की दिशा इन्हीं महत्वपूर्ण संकेतों से तय हो सकती है।

    अगर वैश्विक बाजारों से सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो भारतीय बाजार में भी खरीदारी का माहौल बन सकता है। वहीं अमेरिका और एशियाई बाजारों में कमजोरी या किसी बड़ी आर्थिक घटना का असर घरेलू बाजार पर भी दिखाई दे सकता है। निवेशकों की नजर विदेशी संस्थागत निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों पर भी रहेगी क्योंकि बड़े निवेशकों की खरीद और बिकवाली बाजार की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।

    इस समय कंपनियों के तिमाही नतीजों का दौर भी जारी है। जिन कंपनियों के वित्तीय परिणाम उम्मीद से बेहतर आते हैं उनके शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है जबकि कमजोर नतीजे निवेशकों की निराशा बढ़ा सकते हैं। बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा एफएमसीजी और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के शेयरों पर बाजार की खास नजर बनी रह सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव भी भारतीय शेयर बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है तो इसका असर कई कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है। वहीं तेल की कीमतों में नरमी आने से बाजार को राहत मिल सकती है। इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित करती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे निवेशकों को बाजार की हर हलचल देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। यदि निवेश लंबी अवधि के लिए किया गया है तो मजबूत कंपनियों में बने रहना अधिक लाभदायक साबित हो सकता है। बाजार में उतार चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया है इसलिए केवल अफवाहों या सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट खबरों के आधार पर निवेश संबंधी निर्णय लेने से बचना चाहिए।

    जो लोग पहली बार शेयर बाजार में निवेश करना चाहते हैं उन्हें किसी भी शेयर में पैसा लगाने से पहले कंपनी के कारोबार वित्तीय स्थिति और भविष्य की संभावनाओं का अध्ययन जरूर करना चाहिए। पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखना भी जोखिम कम करने का अच्छा तरीका माना जाता है। एक ही सेक्टर या एक ही कंपनी में पूरा निवेश करना समझदारी नहीं होती।

    आज के कारोबार में बाजार की दिशा वैश्विक संकेतों आर्थिक आंकड़ों विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और कंपनियों के प्रदर्शन से तय हो सकती है। ऐसे में निवेशकों को धैर्य के साथ बाजार पर नजर रखनी चाहिए और किसी भी निवेश से पहले पूरी जानकारी हासिल करनी चाहिए। समझदारी से लिया गया फैसला लंबे समय में बेहतर रिटर्न देने में मदद कर सकता है जबकि जल्दबाजी नुकसान का कारण बन सकती है।

  • मारुति सुजुकी का चालू वित्त वर्ष में 9 लाख सीएनजी वाहन बेचने का लक्ष्य

    मारुति सुजुकी का चालू वित्त वर्ष में 9 लाख सीएनजी वाहन बेचने का लक्ष्य


    नई दिल्ली।
    देश की सबसे बड़ी कार विनिर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया (एमएसआई) ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 में करीब 9 लाख सीएनजी वाहन बेचने का लक्ष्य रखा है। यह पिछले वित्त वर्ष में बेची गई 7 लाख से अधिक इकाइयों की तुलना में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि होगी।

    मारुति सुज़ुकी इंडिया के वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी (विपणन एवं बिक्री) पार्थो बनर्जी ने रविवार को जारी बयान में कहा कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 की (अप्रैल-जून) पहली तिमाही में कंपनी ने विभिन्न मॉडल श्रेणियों में 2.2 लाख सीएनजी वाहन बेचे हैं, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 58 फीसदी अधिक है।

    पार्थो बनर्जी ने कहा कि पश्चिम एशिया युद्ध के बाद ईंधन के दाम बढ़ने से सीएनजी वाहनों की मांग बढ़ी है। उन्होंने बताया कि कंपनी का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बाद ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से सीएनजी वाहनों की मांग तेजी से बढ़ी है। कंपनी को मांग में पहले ही तीव्र वृद्धि देखने को मिल रही है।

    चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सीएनजी वाहन बिक्री लक्ष्य के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि पहली तिमाही के आंकड़े को देखते हुए हम लगभग नौ लाख इकाई की बिक्री की उम्मीद कर रहे हैं। बनर्जी ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने सात लाख से ज्यादा सीएनजी वाहन बेचे थे। उन्होंने कहा कि पहले सीएनजी वाहनों की मांग मुख्य रूप से छोटी कारों, वैन और अर्टिगा तक सीमित थी लेकिन अब कंपनी की एसयूवी श्रेणी में भी इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

    बनर्जी के अनुसार कंपनी की विक्टोरिस एसयूवी की कुल बिक्री में 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी गाड़ी के नीचे लगे सीएनजी टैंक (अंडरबॉडी) संस्करण की है। इसी रुझान को देखते हुए कंपनी ने नई ब्रेज़ा एस-सीएनजी में भी अंडरबॉडी सीएनजी टैंक की सुविधा दी है। उन्होंने कहा कि मारुति सुज़ुकी फिलहाल घरेलू बाजार में 15 सीएनजी मॉडल, जिनमें हल्के वाणिज्यिक वाहन भी शामिल हैं, बेच रही है। पिछले महीने कंपनी की कुल बिक्री में सीएनजी वाहनों की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत रही, जो इस श्रेणी की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।

  • अनिल अग्रवाल की वेदांता डीमर्जर योजना ने पार किया अहम पड़ाव, ऑयल एंड गैस बिजनेस ट्रांसफर को मिली सरकारी मंजूरी

    अनिल अग्रवाल की वेदांता डीमर्जर योजना ने पार किया अहम पड़ाव, ऑयल एंड गैस बिजनेस ट्रांसफर को मिली सरकारी मंजूरी

    नई दिल्ली । अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाली वेदांता लिमिटेड की बहुप्रतीक्षित डीमर्जर योजना को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। कंपनी के ऑयल एंड गैस कारोबार को अलग इकाई में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी कर दिया है। इस मंजूरी के साथ कंपनी के पुनर्गठन कार्यक्रम ने एक अहम चरण पार कर लिया है और आगे की कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं का रास्ता भी साफ हो गया है।

    सरकारी स्वीकृति के तहत वेदांता ऑयल एंड गैस लिमिटेड को तेल एवं गैस ब्लॉकों में पार्टिसिपेटिंग इंटरेस्ट और ऑपरेटरशिप के हस्तांतरण की अनुमति दी गई है। यह नई इकाई पहले माल्को एनर्जी लिमिटेड के नाम से जानी जाती थी। कंपनी की पुनर्गठन योजना के अनुसार अब ऑयल एंड गैस कारोबार को अलग कॉर्पोरेट पहचान के साथ संचालित किया जाएगा, जिससे इस व्यवसाय के संचालन और विस्तार पर स्वतंत्र रूप से ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।

    कंपनी ने शेयर बाजार को दी गई जानकारी में बताया कि यह मंजूरी एक मई 2026 से प्रभावी डीमर्जर योजना के अनुरूप प्रदान की गई है। इसके तहत वेदांता लिमिटेड से ऑयल एंड गैस कारोबार का हस्तांतरण नई इकाई को किया जाएगा। इस कदम का उद्देश्य विभिन्न व्यवसायों को अलग-अलग संस्थाओं के रूप में विकसित करना और प्रत्येक क्षेत्र को स्वतंत्र रणनीतिक दिशा प्रदान करना है।

    मंजूरी के साथ कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी निर्धारित की गई हैं। नई इकाई को तेल एवं गैस परियोजनाओं से जुड़े सभी मौजूदा अनुबंधों के तहत लंबित दायित्वों का निर्वहन करना होगा। इसके अलावा संबंधित परियोजनाओं के लिए आवश्यक नई बैंक गारंटी जमा करनी होगी तथा यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार के प्रति किसी प्रकार का वित्तीय बकाया शेष न रहे। इन शर्तों का पालन डीमर्जर प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के लिए आवश्यक माना गया है।

    सरकारी दस्तावेजों में एक विशेष ब्लॉक से जुड़े कानूनी पहलुओं का भी उल्लेख किया गया है। संबंधित परियोजना से जुड़े न्यायिक निर्णयों और नियामकीय प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए कंपनी को सभी निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। इससे स्पष्ट है कि पुनर्गठन प्रक्रिया केवल कॉर्पोरेट निर्णय नहीं, बल्कि नियामकीय और कानूनी शर्तों के अनुरूप चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाई जा रही है।

    डीमर्जर के बाद वेदांता के ऑयल एंड गैस कारोबार को स्वतंत्र पहचान मिलने की उम्मीद है। इससे इस क्षेत्र में निवेश, परिचालन निर्णय और व्यवसाय विस्तार की प्रक्रिया अधिक केंद्रित और प्रभावी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग इकाई बनने से कारोबार के प्रदर्शन का स्वतंत्र मूल्यांकन आसान होगा और निवेशकों को भी प्रत्येक व्यवसाय की वास्तविक क्षमता समझने का बेहतर अवसर मिलेगा।

    अब कंपनी को निर्धारित समयसीमा के भीतर सभी आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी। इसमें कंपनी के नाम परिवर्तन, डीमर्जर से जुड़े दस्तावेजों का पंजीकरण और अन्य नियामकीय प्रक्रियाएं शामिल हैं। इन चरणों के पूरा होने के बाद नई संरचना के तहत ऑयल एंड गैस कारोबार स्वतंत्र रूप से संचालित किया जा सकेगा।

    वेदांता की व्यापक डीमर्जर योजना का उद्देश्य समूह के विभिन्न कारोबारों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में विकसित करना है, ताकि प्रत्येक व्यवसाय अपनी रणनीति, पूंजी प्रबंधन और विकास योजनाओं पर स्वतंत्र रूप से काम कर सके। सरकार की ओर से मिली यह मंजूरी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। इससे न केवल पुनर्गठन प्रक्रिया को गति मिलेगी, बल्कि कंपनी के भविष्य के विस्तार और निवेश संबंधी योजनाओं को भी नई मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है।

  • रिलायंस से SBI तक बाजार पूंजीकरण में भारी गिरावट, एक सप्ताह में 2.74 लाख करोड़ रुपये घटे

    रिलायंस से SBI तक बाजार पूंजीकरण में भारी गिरावट, एक सप्ताह में 2.74 लाख करोड़ रुपये घटे


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और निवेशकों की सतर्कता का असर बीते कारोबारी सप्ताह भारतीय शेयर बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। व्यापक बिकवाली के चलते देश की शीर्ष 10 सूचीबद्ध कंपनियों में से नौ के बाजार पूंजीकरण में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इस दौरान इन कंपनियों का संयुक्त मार्केटकैप लगभग 2.74 लाख करोड़ रुपये घट गया। बाजार में कमजोरी का असर बैंकिंग, आईटी, दूरसंचार, वित्तीय सेवाओं और ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों पर देखने को मिला, जबकि केवल एक कंपनी इस दबाव के बीच बढ़त दर्ज करने में सफल रही।

    20 से 24 जुलाई के कारोबारी सप्ताह के दौरान सेंसेक्स 2,091.68 अंक यानी 2.68 प्रतिशत फिसलकर 76,059.77 अंक पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 566.85 अंक या 2.33 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,767.45 अंक पर आ गया। वैश्विक बाजारों में अस्थिरता, निवेशकों की मुनाफावसूली और जोखिम से बचने की रणनीति का असर घरेलू शेयर बाजार पर भी पड़ा, जिससे बड़े शेयरों में लगातार दबाव बना रहा।

    सबसे अधिक नुकसान देश के सबसे बड़े निजी बैंक एचडीएफसी बैंक को हुआ। सप्ताह भर में कंपनी का बाजार पूंजीकरण 1.18 लाख करोड़ रुपये से अधिक घट गया। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज को भी बड़ा झटका लगा, जिसका मार्केटकैप 65 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा कम हो गया। भारतीय शेयर बाजार की सबसे मूल्यवान कंपनी होने के बावजूद रिलायंस अपनी शीर्ष स्थिति बनाए रखने में सफल रही।

    स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बजाज फाइनेंस, आईसीआईसीआई बैंक, भारती एयरटेल, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और लार्सन एंड टुब्रो जैसी कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। इन सभी कंपनियों के शेयरों पर बिकवाली का दबाव बना रहा, जिससे उनके कुल मूल्यांकन में कमी आई।

    इस पूरे सप्ताह के दौरान केवल हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड ने सकारात्मक प्रदर्शन किया। कंपनी का बाजार पूंजीकरण मामूली बढ़त के साथ ऊपर गया और वह शीर्ष 10 कंपनियों में अकेली ऐसी कंपनी रही, जिसने निवेशकों को राहत दी। उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्र की इस कंपनी में अपेक्षाकृत स्थिर निवेश के कारण उसका मूल्यांकन बढ़ने में सफलता मिली।

    हालांकि बाजार में कमजोरी के बावजूद कंपनियों की रैंकिंग में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। रिलायंस इंडस्ट्रीज देश की सबसे अधिक बाजार पूंजीकरण वाली सूचीबद्ध कंपनी बनी रही। इसके बाद भारती एयरटेल, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, बजाज फाइनेंस, एलआईसी, लार्सन एंड टुब्रो और हिंदुस्तान यूनिलीवर का स्थान रहा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और अंतरराष्ट्रीय बाजारों का रुख निकट भविष्य में भी भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यदि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होती है और निवेशकों का भरोसा लौटता है तो बाजार में सुधार की संभावना बन सकती है। फिलहाल निवेशक आगामी आर्थिक आंकड़ों, कंपनियों के वित्तीय परिणामों और वैश्विक संकेतों पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर बाजार की अगली चाल तय होगी।

  • 'कर वसूली ही नहीं, नागरिक सुविधा भी प्राथमिकता बने', आयकर विभाग को निर्मला सीतारमण का स्पष्ट संदेश

    'कर वसूली ही नहीं, नागरिक सुविधा भी प्राथमिकता बने', आयकर विभाग को निर्मला सीतारमण का स्पष्ट संदेश


    नई दिल्ली ।
    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आयकर विभाग को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि उसकी जिम्मेदारी केवल कर संग्रह तक सीमित नहीं है, बल्कि आम नागरिकों को बिना अनावश्यक परेशानी के समय पर और प्रभावी सेवाएं उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण दायित्व है। उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था का उद्देश्य लोगों के काम को आसान बनाना होना चाहिए, ताकि उन्हें अपने वैध अधिकारों के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।

    मुंबई के नरीमन पॉइंट स्थित आयकर विभाग की नई 13 मंजिला इमारत ‘आयकर सिंधु’ के उद्घाटन के अवसर पर वित्त मंत्री ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी विभागों को नागरिकों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ समझना चाहिए और ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिसमें सेवाएं समय पर और पारदर्शी तरीके से उपलब्ध हों। उनके अनुसार, प्रभावी प्रशासन वही है जो नियमों का पालन करते हुए लोगों की कठिनाइयों को कम करे।

    वित्त मंत्री ने सरकारी भूमि और संपत्तियों के संरक्षण के विषय पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि जिस भूमि पर नई इमारत का निर्माण हुआ है, वह कई दशक पहले विभाग को आवंटित की गई थी, लेकिन लंबे समय तक उपयोग नहीं होने के कारण वहां अवैध कब्जे की स्थिति उत्पन्न हो गई। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा और उनका समय पर उपयोग सुनिश्चित करना उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, ताकि राष्ट्रीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके।

    अपने संबोधन में उन्होंने भवन निर्माण से जुड़ी प्रशासनिक और मंजूरी संबंधी प्रक्रियाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि एक बड़े सरकारी विभाग को विभिन्न अनुमतियां प्राप्त करने में लंबा समय और कई स्तरों की जटिलताओं का सामना करना पड़ता है, तो आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए विभागों को प्रक्रियाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की दिशा में लगातार प्रयास करना चाहिए।

    सीतारमण ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य नियमों में ढील देने का नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि नियमों का पालन करते हुए भी लोगों के कार्य अनावश्यक रूप से लंबित न रहें। उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक को अपने वैध अधिकार या सरकारी सेवा प्राप्त करने के लिए अत्यधिक प्रयास करने की स्थिति नहीं आनी चाहिए। प्रशासन की कार्यशैली ऐसी होनी चाहिए, जिसमें जवाबदेही और दक्षता दोनों दिखाई दें।

    उन्होंने आयकर विभाग के अधिकारियों के आवास से जुड़ी समस्याओं का भी उल्लेख किया। वित्त मंत्री ने कहा कि मुंबई और नवी मुंबई क्षेत्र में अनेक अधिकारियों को सरकारी आवास उपलब्ध नहीं हो पाता, जिसके कारण उन्हें लंबी दूरी तय करके कार्यालय पहुंचना पड़ता है। इससे उनके कार्य और व्यक्तिगत जीवन दोनों पर प्रभाव पड़ता है। उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक सरकारी भूमि के हस्तांतरण को प्राथमिकता देने का आश्वासन दिया।

    वित्त मंत्री ने कहा कि भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया को गति देने के लिए केंद्र स्तर पर आवश्यक सहयोग दिया जाएगा। इसके बाद भवन निर्माण, स्वीकृतियां, निविदाएं और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को संबंधित विभागों द्वारा समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि बेहतर बुनियादी ढांचे, पारदर्शी कार्यप्रणाली और नागरिक-केंद्रित सोच के साथ आयकर विभाग अधिक प्रभावी सेवाएं प्रदान कर सकेगा और प्रशासनिक व्यवस्था पर लोगों का विश्वास भी और मजबूत होगा।