Category: Economy

  • डोडला डेयरी की पहली तिमाही में झटका राजस्व रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा लेकिन मुनाफे में 42 प्रतिशत की गिरावट

    डोडला डेयरी की पहली तिमाही में झटका राजस्व रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा लेकिन मुनाफे में 42 प्रतिशत की गिरावट


    नई दिल्ली। डोडला डेयरी लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी करते हुए रिकॉर्ड राजस्व दर्ज किया है लेकिन बढ़ती लागत और महंगे कच्चे माल के कारण कंपनी की लाभप्रदता पर बड़ा असर पड़ा है। अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध मुनाफा घटकर 40.64 करोड़ रुपए रह गया जो पिछली तिमाही के 69.80 करोड़ रुपए की तुलना में करीब 42 प्रतिशत कम है। मजबूत बिक्री के बावजूद लागत में तेज बढ़ोतरी ने कंपनी के मुनाफे को प्रभावित किया।

    हालांकि राजस्व के मोर्चे पर कंपनी ने शानदार प्रदर्शन किया। पहली तिमाही में डोडला डेयरी का कुल राजस्व 19 प्रतिशत की वृद्धि के साथ रिकॉर्ड 1197.94 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। कंपनी ने बताया कि दूध की खरीद कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और आने वाले महीनों की मांग को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त इन्वेंट्री तैयार करने की रणनीति अपनाई गई। इसी वजह से परिचालन लागत बढ़ी और शुद्ध लाभ पर दबाव देखने को मिला।

    कंपनी के प्रबंध निदेशक डोडला सुनील रेड्डी ने कहा कि अधिक इन्वेंट्री तैयार करने का फैसला पूरे डेयरी उद्योग की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है। उनका मानना है कि दूसरी तिमाही से दूध की खरीद कीमतों में धीरे धीरे सामान्य स्थिति लौटने लगेगी जिससे कंपनी की लाभप्रदता में भी सुधार आने की संभावना है।

    गर्मी का लंबा मौसम कंपनी के लिए बिक्री के लिहाज से फायदेमंद साबित हुआ। दही छाछ लस्सी और आइसक्रीम जैसे वैल्यू एडेड उत्पादों की रिकॉर्ड मांग दर्ज की गई। इन उत्पादों की मजबूत बिक्री के कारण अब कंपनी की कुल बिक्री में इनकी हिस्सेदारी लगभग एक तिहाई तक पहुंच गई है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि उपभोक्ताओं की पसंद तेजी से वैल्यू एडेड डेयरी उत्पादों की ओर बढ़ रही है।

    कंपनी का ईबीआईटीडीए भी बेहतर रहा और यह बढ़कर 64.9 करोड़ रुपए पर पहुंच गया जबकि पिछली तिमाही में यह 53.8 करोड़ रुपए था। इसके बावजूद कर्मचारियों पर बढ़ते खर्च और दूध खरीद की ऊंची कीमतों ने कुल लाभ को सीमित कर दिया। नए श्रम कानूनों के तहत ऑफ रोल कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन लागू होने से कर्मचारियों पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ा है। तिमाही आधार पर यह खर्च 51.7 करोड़ रुपए से बढ़कर 55.7 करोड़ रुपए हो गया जबकि सालाना आधार पर इसमें 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    डोडला डेयरी ने इस तिमाही में अब तक की सबसे अधिक दूध खरीद भी दर्ज की। कंपनी ने प्रतिदिन औसतन 21.1 लाख लीटर दूध की खरीद की जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 13 प्रतिशत अधिक है। कंपनी का कहना है कि परिचालन दक्षता में लगातार सुधार के कारण ऑपरेटिंग मार्जिन पूरे पिछले वित्त वर्ष की तुलना में बेहतर बना हुआ है और आने वाले महीनों में इसका सकारात्मक असर दिखाई देगा।

    कंपनी का अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी मजबूती से बढ़ा है। अफ्रीका बिजनेस से होने वाला राजस्व सालाना आधार पर 45.6 प्रतिशत बढ़ा है जिसमें दूध की बिक्री में 52.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इससे कंपनी के वैश्विक कारोबार को भी नई गति मिली है।

    भविष्य की विस्तार रणनीति के तहत डोडला डेयरी के निदेशक मंडल ने डायरेक्ट टू कंज्यूमर डेयरी ब्रांड सिड्स फार्म में करीब 11.6 करोड़ रुपए का प्राथमिक निवेश करने को मंजूरी दी है। इस निवेश के जरिए कंपनी ब्रांड में 2 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निवेश कंपनी को प्रीमियम डेयरी और डायरेक्ट टू कंज्यूमर बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत करने में मदद करेगा।

  • हाईवे पर पुल-टनल या एलिवेटेड स्ट्रक्चर है तो 40% तक कम लगेगा टोल टैक्स… NHAI ने बदला नियम

    हाईवे पर पुल-टनल या एलिवेटेड स्ट्रक्चर है तो 40% तक कम लगेगा टोल टैक्स… NHAI ने बदला नियम


    नई दिल्ली।
    राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) पर सफर करने वाले करोड़ों वाहन चालकों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। यदि आपके रास्ते में लंबे पुल, सुरंगें, फ्लाईओवर या एलिवेटेड रोड आते हैं तो अब आपको पहले के मुकाबले कम टोल टैक्स (Toll Tax) चुकाना होगा। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियमों में संशोधन किया गया है। इसे लागू करते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने अपने सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को नए नियमों के तहत टोल दरों की समीक्षा और संशोधन प्रक्रिया शुरू करने का कड़ा निर्देश जारी कर दिया है।

    आमतौर पर किसी भी हाईवे पर पुल, टनल या एलिवेटेड स्ट्रक्चर (Elevated structure) का निर्माण करना और उसका रखरखाव करना बेहद खर्चीला काम होता है। यही वजह थी कि पुराने नियमों के तहत इनकी लंबाई को 10 गुना मानकर टोल की गणना की जाती थी।

    उदाहरण के लिए यदि किसी हाईवे पर 5 किलोमीटर लंबी टनल (Long tunnel) या एलिवेटेड स्ट्रक्चर होता था तो टोल लेते वक्त उसे 50 किलोमीटर सड़क के बराबर माना जाता था। पहाड़ी इलाकों, एक्सप्रेसवे और बड़े शहरी रास्तों में जहां कई किलोमीटर लंबे ब्रिज या एलिवेटेड हाईवे बने हैं वहां इस नियम के कारण टोल का बोझ आम जनता और वाहन चालकों की जेब पर बेहद भारी पड़ रहा था। इसी समस्या को हल करने और टोल की दरों को व्यावहारिक बनाने के लिए सरकार ने टोल संशोधन नियमों को जारी किया है।


    क्या है नया टोल फॉर्मूला? समझें गणित

    संशोधित राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दरों का निर्धारण और संग्रहण) नियम, 2008 के तहत अब टोल की गणना के लिए एक पारदर्शी और संतुलित फॉर्मूला पेश किया गया है। नए फॉर्मूले के अनुसार, जिन हाईवे पर एक या एक से अधिक ब्रिज, टनल, फ्लाईओवर या एलिवेटेड सेक्शन हैं वहां टोल की गणना के लिए दो तरीके अपनाए जाएंगे।

    पहला तरीका यह है कि विशेष संरचनाओं जैसे कि ब्रिज या टनल की लंबाई का 10 गुना करके, उसे हाईवे के शेष सामान्य हिस्से की लंबाई में जोड़ दिया जाए। दूसरा तरीका यह है कि पूरे हाईवे सेक्शन की कुल लंबाई का 5 गुना कर दिया जाए।

    NHAI को अनिवार्य रूप से इन दोनों गणनाओं में से जो भी दूरी कम होगी उसी के आधार पर टोल तय करना होगा। इसके अलावा जिन पुलों या फ्लाईओवरों की लंबाई 60 मीटर या उससे कम होगी उन्हें अलग से विशेष संरचना नहीं माना जाएगा और उन पर कोई अतिरिक्त नियम नहीं होगा।


    केस स्टडी से समझें टोल का गणित

    केस 1: मान लीजिए कोई हाईवे 40 किलोमीटर लंबा है, जिसमें से 30 किलोमीटर हिस्सा एलिवेटेड या ब्रिज का है और 10 किलोमीटर सामान्य सड़क है। पुराने फॉर्मूले के मुताबिक, 30 किमी × 10 + 10 किमी = 310 किमी की दूरी पर टोल लगता है। नए फॉर्मूले के मुताबिक, कुल दूरी का 5 गुना (40 किमी × 5) यानी कि 200 किमी ही होगा। चूंकि 200 किमी की दूरी कम है, इसलिए जनता को 310 किमी के बजाय केवल 200 किमी का ही टोल देना होगा।

    केस 2: अगर 40 किलोमीटर के हाईवे में 10 किलोमीटर ब्रिज है और 30 किलोमीटर सामान्य सड़क है। पहले तरीके से दूरी 10 किमी × 10 + 30 किमी यानी कि 130 किमी होगी। दूसरे तरीके से दूरी 40 किमी × 5 यानी कि 200 किमी होगी। आपको बता दें कि यहां 130 किलोमीटर वाली दूरी कम है, इसलिए केवल 130 किमी का टोल लागू होगा। पहले यहां 200 किमी के हिसाब से टोल देना पड़ता था।

    दोनों फॉर्मूले को देखें तो करीब 40 प्रतिशत तक की दूरी कम हो रही है। इस हिसाब से टोल भी 40 प्रतिशत तक सस्ता हो सकता है।


    कब से लागू होंगी नई दरें?

    नियमों में यह संशोधन लागू कर दिया गया है, लेकिन टोल प्लाजा के प्रकार के आधार पर इसका फायदा वाहन चालकों को अलग-अलग समय पर मिलेगा। वर्तमान में चल रहे ऐसे सार्वजनिक टोल प्लाजा पर नई दरें उनके अगले निर्धारित वार्षिक शुल्क संशोधन की तारीख से लागू हो जाएंगी। पीपीपी (PPP) मॉडल या प्राइवेट कंपनियों द्वारा संचालित टोल प्लाजा पर यह नया नियम उनकी रियायत अवधि पूरी होने या प्रोजेक्ट एनएचएआई को वापस सौंपे जाने के बाद प्रभावी होगा। भविष्य में शुरू होने वाले सभी नए टोल प्लाजा पर टोल टैक्स की वसूली पहले दिन से ही इसी संशोधित और सस्ते फॉर्मूले के तहत की जाएगी।

    सरकार के इस कदम से न केवल लंबी दूरी का सफर तय करने वाले निजी वाहन मालिकों को राहत मिलेगी, बल्कि माल ढुलाई करने वाले व्यावसायिक वाहनों का परिचालन खर्च भी कम होगा। इसका सकारात्मक असर आने वाले समय में महंगाई और लॉजिस्टिक्स लागत पर देखने को मिल सकता है।

  • ऑनलाइन शॉपिंग में बड़ी लापरवाही iPhone की जगह मिला Beard Oil उपभोक्ता अदालत ने Flipkart को सुनाया बड़ा फैसला

    ऑनलाइन शॉपिंग में बड़ी लापरवाही iPhone की जगह मिला Beard Oil उपभोक्ता अदालत ने Flipkart को सुनाया बड़ा फैसला


    नई दिल्ली । ऑनलाइन शॉपिंग आज लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है। घर बैठे महंगे स्मार्टफोन से लेकर घरेलू सामान तक आसानी से ऑर्डर किए जा सकते हैं। हालांकि कई बार ऑनलाइन खरीदारी के दौरान ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो ग्राहकों के भरोसे को झटका देती हैं। मुंबई में सामने आया एक ऐसा ही मामला अब चर्चा का विषय बन गया है जहां एक ग्राहक ने लाखों रुपये का प्रीमियम स्मार्टफोन मंगाया लेकिन पार्सल खोलने पर उसमें दाढ़ी बढ़ाने वाला तेल निकला। मामला उपभोक्ता अदालत तक पहुंचा और अदालत ने ग्राहक के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

    जानकारी के अनुसार मुंबई के एक ग्राहक ने ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म Flipkart से लगभग एक लाख ग्यारह हजार रुपये की कीमत वाला iPhone 14 Pro खरीदा था। ग्राहक को उम्मीद थी कि उसे नया स्मार्टफोन मिलेगा लेकिन जब उसने डिलीवरी के बाद पैकेट खोला तो उसके अंदर iPhone की जगह Beard Growth Oil मौजूद था। महंगे स्मार्टफोन के स्थान पर पूरी तरह अलग उत्पाद मिलने से ग्राहक हैरान रह गया।

    घटना के बाद ग्राहक ने सबसे पहले ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म और विक्रेता से शिकायत की लेकिन उसे संतोषजनक समाधान नहीं मिला। कई बार संपर्क करने के बावजूद समस्या का निपटारा नहीं होने पर ग्राहक ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और न्याय की मांग की।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ग्राहक ने निर्धारित राशि का पूरा भुगतान किया था और सही उत्पाद की डिलीवरी सुनिश्चित करना विक्रेता और ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म दोनों की जिम्मेदारी थी। अदालत ने कहा कि ऑनलाइन मार्केटप्लेस केवल बिक्री का माध्यम होने का दावा कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता क्योंकि ग्राहक का लेनदेन उसी प्लेटफॉर्म के माध्यम से पूरा हुआ है।

    उपभोक्ता अदालत ने अपने फैसले में Flipkart को ग्राहक की जमा राशि वापस करने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने मुआवजे और मुकदमे के खर्च के रूप में अतिरिक्त सत्तर हजार रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया। अदालत ने यह भी माना कि ग्राहक की शिकायतों का उचित समाधान न करना सेवा में स्पष्ट कमी का मामला है।

    अदालत ने विक्रेता को भी जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि ग्राहक की बार बार की गई शिकायतों के बावजूद सही उत्पाद उपलब्ध नहीं कराया गया और न ही प्रभावी समाधान दिया गया। इसलिए ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म और विक्रेता दोनों को संयुक्त रूप से जवाबदेह माना गया।

    यह फैसला ऑनलाइन खरीदारी करने वाले उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यदि किसी ग्राहक को ऑर्डर से अलग सामान मिलता है या शिकायत का समाधान नहीं किया जाता तो वह उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत अपने अधिकारों का उपयोग कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्राहकों का विश्वास बनाए रखना ई कॉमर्स कंपनियों की जिम्मेदारी है और लापरवाही की स्थिति में उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

    ऑनलाइन शॉपिंग करते समय ग्राहकों को भी कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। महंगे उत्पादों की डिलीवरी लेते समय पैकेज की स्थिति जांचें यदि संभव हो तो अनबॉक्सिंग का वीडियो रिकॉर्ड करें और किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में तुरंत प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज कराएं। इससे विवाद की स्थिति में जरूरी साक्ष्य उपलब्ध रहते हैं।

    यह मामला याद दिलाता है कि डिजिटल खरीदारी जितनी सुविधाजनक है उतनी ही सतर्कता भी मांगती है। वहीं उपभोक्ता अदालत का यह फैसला ई कॉमर्स कंपनियों के लिए भी स्पष्ट संदेश है कि ग्राहक सेवा और सही डिलीवरी में लापरवाही की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है।

  • पश्चिम एशिया संकट से शेयर बाजार पर दबाव, लगातार पांचवें दिन टूटा सेंसेक्स-निफ्टी, निवेशकों की चिंता बढ़ी

    पश्चिम एशिया संकट से शेयर बाजार पर दबाव, लगातार पांचवें दिन टूटा सेंसेक्स-निफ्टी, निवेशकों की चिंता बढ़ी


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन शुक्रवार को घरेलू बाजार लगातार पांचवें सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। निवेशकों के बीच बढ़ती सतर्कता और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में कारोबार समाप्त करने पर मजबूर रहे। लगातार पांच दिनों की गिरावट ने बाजार की धारणा को कमजोर किया है और निवेशकों की चिंता भी बढ़ा दी है।

    कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 331.62 अंक यानी 0.43 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,059.77 अंक पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 भी 102 अंक यानी 0.43 प्रतिशत टूटकर 23,767.45 अंक पर आ गया। कारोबार की शुरुआत से ही बाजार दबाव में रहा और दिन के दौरान दोनों प्रमुख सूचकांक अपने निचले स्तर तक फिसल गए। हालांकि अंतिम घंटे में कुछ खरीदारी देखने को मिली, लेकिन इससे शुरुआती नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो सकी।

    व्यापक बाजार में भी कमजोरी का माहौल बना रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। निवेशकों ने जोखिम वाले शेयरों में नई खरीदारी से दूरी बनाए रखी और सुरक्षित निवेश विकल्पों को प्राथमिकता दी।

    सेक्टरवार प्रदर्शन मिश्रित रहा। सूचना प्रौद्योगिकी, मीडिया, बैंकिंग और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से जुड़े शेयरों में सीमित मजबूती देखने को मिली, जबकि ऑटो, धातु, ऊर्जा, रियल्टी, ऑयल एंड गैस, फार्मा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के शेयरों पर दबाव बना रहा। ऑटो सेक्टर में सबसे अधिक कमजोरी दर्ज की गई, जबकि आईटी कंपनियों ने बाजार को कुछ हद तक सहारा देने का प्रयास किया।

    विश्लेषकों का मानना है कि बाजार पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का रहा। ब्रेंट क्रूड का दाम लगातार छठे कारोबारी सत्र में बढ़ते हुए 101 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। जुलाई महीने में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जो ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर हैं। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगा कच्चा तेल महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत बढ़ाने का कारण बन सकता है, जिसका सीधा असर शेयर बाजार की धारणा पर पड़ता है।

    साप्ताहिक आधार पर भी बाजार का प्रदर्शन कमजोर रहा। पूरे सप्ताह में सेंसेक्स करीब 2,100 अंक नीचे आया, जबकि निफ्टी में भी दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। लगातार बिकवाली यह संकेत देती है कि वैश्विक घटनाक्रमों के बीच निवेशक फिलहाल सतर्क रणनीति अपना रहे हैं और नए निवेश से पहले स्पष्ट संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निफ्टी के लिए 23,650 से 23,600 अंक का स्तर महत्वपूर्ण समर्थन माना जाएगा। यदि यह स्तर टूटता है तो गिरावट और गहरी हो सकती है। वहीं 23,950 से 24,000 अंक का दायरा निकटतम प्रतिरोध रहेगा। यदि बाजार इस स्तर को पार करने में सफल होता है तो निवेशकों का भरोसा लौट सकता है और सीमित अवधि के लिए राहत भरी तेजी देखने को मिल सकती है। फिलहाल वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां ही बाजार की अगली दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

  • आईपीओ, फिर भी मजबूत निवेश, एसएमई कंपनियों ने छह महीने में 3,752 करोड़ रुपये जुटाकर दिखाया भरोसा

    आईपीओ, फिर भी मजबूत निवेश, एसएमई कंपनियों ने छह महीने में 3,752 करोड़ रुपये जुटाकर दिखाया भरोसा

    नई दिल्ली । देश के लघु एवं मध्यम उद्यम (एसएमई) पूंजी बाजार के माध्यम से निवेश जुटाने में लगातार सक्रिय बने हुए हैं। वर्ष 2026 की पहली छमाही के दौरान 78 एसएमई कंपनियों ने प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के जरिए कुल 3,752 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई। आईपीओ की संख्या पिछले दो वर्षों की समान अवधि की तुलना में कम रही, लेकिन निवेश जुटाने का स्तर मजबूत बना रहा। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक अब गुणवत्ता आधारित कंपनियों में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं और मजबूत कारोबारी मॉडल वाली कंपनियों को बाजार से पर्याप्त समर्थन मिल रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार जुटाई गई कुल राशि में सबसे बड़ा योगदान फ्रेश इश्यू का रहा। नई इक्विटी जारी कर कंपनियों ने लगभग 3,555 करोड़ रुपये जुटाए, जो कुल इश्यू आकार का करीब 95 प्रतिशत है। दूसरी ओर, ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के जरिए केवल 197 करोड़ रुपये जुटाए गए। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी कम है। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियां मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बेचने के बजाय अपने विस्तार, नई परियोजनाओं और कारोबार को बढ़ाने के लिए ताजा पूंजी जुटाने पर अधिक जोर दे रही हैं।

    हालांकि आईपीओ की संख्या में कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में 88 और वर्ष 2024 की पहली छमाही में 116 एसएमई आईपीओ आए थे, जबकि इस वर्ष यह संख्या घटकर 78 रह गई। इसके बावजूद कुल जुटाई गई राशि में केवल मामूली गिरावट आई है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में एसएमई कंपनियों ने 4,004 करोड़ रुपये जुटाए थे। यह अंतर दर्शाता है कि बाजार में कम लेकिन अपेक्षाकृत बड़े और मजबूत आईपीओ आ रहे हैं, जिन्हें निवेशकों का अच्छा समर्थन मिल रहा है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही, यानी अप्रैल से जून के बीच 38 एसएमई कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुईं। इन कंपनियों ने लगभग 1,891 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में जुटाई गई 1,644 करोड़ रुपये की राशि से अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि बाजार में निवेशकों की रुचि अभी भी बनी हुई है और विकास की संभावनाओं वाली कंपनियों को पूंजी जुटाने में अपेक्षाकृत आसानी हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में एसएमई आईपीओ गतिविधियों में असाधारण तेजी देखने को मिली थी, जबकि मौजूदा वर्ष में बाजार अपेक्षाकृत संतुलित स्थिति में पहुंच गया है। अब निवेशकों का ध्यान केवल बड़ी संख्या में आने वाले आईपीओ पर नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर है जिनकी वित्तीय स्थिति, विकास की योजना और कारोबारी संभावनाएं मजबूत हैं। यही कारण है कि कम लिस्टिंग के बावजूद पूंजी जुटाने की क्षमता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।

    विश्लेषकों के अनुसार एसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है और पूंजी बाजार तक इसकी आसान पहुंच आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। मजबूत आईपीओ बाजार से इन कंपनियों को विस्तार, तकनीकी उन्नयन और रोजगार सृजन के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध होते हैं। मौजूदा आंकड़े संकेत देते हैं कि निवेशकों का भरोसा गुणवत्ता वाली एसएमई कंपनियों पर कायम है और आने वाले महीनों में भी यह रुझान जारी रहने की संभावना है।

  • एआई और इनोवेशन से बढ़ेगी ऑफिस स्पेस की मांग, भारत में जीसीसी की हिस्सेदारी 50% के करीब पहुंचने के संकेत

    एआई और इनोवेशन से बढ़ेगी ऑफिस स्पेस की मांग, भारत में जीसीसी की हिस्सेदारी 50% के करीब पहुंचने के संकेत

    नई दिल्ली । भारत वैश्विक कंपनियों के लिए केवल लागत आधारित संचालन का केंद्र नहीं रह गया है, बल्कि अब नवाचार, अनुसंधान और अत्याधुनिक तकनीकों के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। इसी बदलाव का असर देश के कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर में भी साफ दिखाई दे रहा है। आने वाले दो वर्षों में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) भारत में ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस की मांग का सबसे बड़ा आधार बनने की ओर बढ़ रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2026 और 2027 के दौरान देश में होने वाली कुल ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस लीजिंग का लगभग 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा अकेले जीसीसी के खाते में जाएगा। इससे भारत की वैश्विक कारोबारी और तकनीकी क्षमता को नई मजबूती मिलने की संभावना है।

    बीते कुछ वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपने परिचालन और रणनीतिक केंद्रों का लगातार विस्तार किया है। वर्ष 2021 से अब तक देश के सात प्रमुख शहरों में जीसीसी ने लगभग 11.8 करोड़ वर्ग फुट ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस लीज पर लिया है। यह इसी अवधि के दौरान हुई कुल ऑफिस स्पेस मांग का करीब 37 प्रतिशत हिस्सा है। केवल वर्ष 2026 की पहली छमाही में ही जीसीसी द्वारा 1.66 करोड़ वर्ग फुट ऑफिस स्पेस लीज पर लिया गया, जो कुल ग्रेड-ए लीजिंग का लगभग 46 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में वैश्विक कंपनियों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अब जीसीसी की भूमिका पारंपरिक बैक-ऑफिस सेवाओं तक सीमित नहीं रह गई है। वर्तमान समय में ये केंद्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंजीनियरिंग, डेटा एनालिटिक्स, रिसर्च एंड डेवलपमेंट तथा डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे उच्च मूल्य वाले कार्यों का संचालन कर रहे हैं। कुशल मानव संसाधन, प्रतिस्पर्धी परिचालन लागत, मजबूत तकनीकी क्षमता, अनुकूल कारोबारी माहौल और नीतिगत समर्थन ने भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में एआई आधारित नवाचार और तकनीकी निवेश ऑफिस स्पेस की मांग को और अधिक गति देने की उम्मीद है।

    क्षेत्रवार आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 से अब तक जीसीसी लीजिंग में टेक्नोलॉजी सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे अधिक करीब 39 प्रतिशत रही है। हालांकि अब अन्य क्षेत्रों की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है। बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा क्षेत्र ने कुल लीजिंग में लगभग 22 प्रतिशत योगदान दिया है, जबकि इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत रही। वर्ष 2021 से 2025 के बीच बीएफएसआई क्षेत्र की लीजिंग लगभग तीन गुना बढ़ी, वहीं इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की मांग 2.5 गुना से अधिक बढ़ने का अनुमान दर्ज किया गया। इससे स्पष्ट है कि जीसीसी मॉडल अब विभिन्न उद्योगों में तेजी से अपनाया जा रहा है।

    शहरों की बात करें तो बेंगलुरु और हैदराबाद अभी भी जीसीसी गतिविधियों के सबसे बड़े केंद्र बने हुए हैं। वर्ष 2021 से अब तक कुल लीजिंग में इन दोनों शहरों की संयुक्त हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके बावजूद अब चेन्नई, पुणे, मुंबई और दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियां नए कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित करने में तेजी से रुचि दिखा रही हैं। इसके साथ ही ‘हब-प्लस-वन’ रणनीति के तहत टियर-2 और टियर-3 शहरों की ओर भी विस्तार की संभावनाएं बढ़ रही हैं। एआई-आधारित जीसीसी, नैनो और मिड-साइज कैपेबिलिटी सेंटर तथा नए कारोबारी मॉडल आने वाले वर्षों में भारत के ऑफिस स्पेस बाजार और वैश्विक निवेश परिदृश्य को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

    जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

    नई दिल्ली । जुलाई महीने में भारत के निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का क्रम जारी रहा, हालांकि इसकी रफ्तार जून की तुलना में कुछ धीमी दर्ज की गई। ताजा आंकड़ों के अनुसार जुलाई में कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) 54.3 रहा। यह स्तर इस बात का संकेत है कि देश की आर्थिक गतिविधियां अब भी विस्तार के चरण में हैं, क्योंकि पीएमआई का 50 से ऊपर रहना आर्थिक वृद्धि का संकेत माना जाता है। हालांकि जून में यह सूचकांक 57.1 था, जिससे स्पष्ट है कि जुलाई में विकास की गति कुछ कम हुई है।

    जुलाई के दौरान निजी क्षेत्र के प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की सुस्ती प्रमुख कारण रही। कारोबार से जुड़े नए ऑर्डरों की रफ्तार कमजोर पड़ी और ग्राहकों की ओर से पूछताछ में कमी देखने को मिली। कई कंपनियों ने मांग में नरमी और कुछ ऑर्डर रद्द होने की वजह से सेवा गतिविधियों में अपेक्षाकृत धीमी बढ़ोतरी दर्ज की। इसके चलते सर्विस सेक्टर का बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स घटकर 53.1 पर पहुंच गया, जो पिछले 53 महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

    इसके विपरीत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। वैश्विक बाजारों से लगातार मिल रही मजबूत मांग और निर्यात ऑर्डरों में बढ़ोतरी के कारण उत्पादन गतिविधियां मजबूत बनी रहीं। मुख्य मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई में मामूली गिरावट के बावजूद फैक्ट्री उत्पादन सूचकांक में सुधार दर्ज किया गया। इससे संकेत मिलता है कि औद्योगिक उत्पादन की गति बनी हुई है और विनिर्माण क्षेत्र देश की आर्थिक गतिविधियों को सहारा देता रहा।

    व्यापारिक संस्थानों ने भविष्य की संभावित चुनौतियों को देखते हुए अपनी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने वाले संभावित असर को ध्यान में रखते हुए कंपनियों ने कच्चे माल की खरीद बढ़ाई है। इसके साथ ही तैयार माल और इनपुट इन्वेंट्री में भी वृद्धि दर्ज की गई है, ताकि किसी भी आपूर्ति व्यवधान की स्थिति में उत्पादन प्रभावित न हो।

    सर्वेक्षण के अनुसार लागत का दबाव भी जुलाई में बढ़ा है। कच्चे माल और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि के कारण कंपनियों की लागत बढ़ी, जिसका असर उत्पादों और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दिया। कई कंपनियों ने बढ़ती लागत के बीच अपने लाभ मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए कीमतों में आवश्यक बदलाव किए। इसके बावजूद रोजगार के मोर्चे पर स्थिति सकारात्मक बनी रही और कंपनियों ने कर्मचारियों की नियुक्ति जारी रखी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का निजी क्षेत्र अभी भी मजबूती का संकेत दे रहा है। निर्यात आधारित मांग, उत्पादन गतिविधियों की स्थिरता और रोजगार सृजन जैसे कारक आर्थिक विस्तार को समर्थन दे रहे हैं। हालांकि घरेलू मांग में सुधार और सर्विस सेक्टर की गति बढ़ाना आने वाले महीनों में आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

    कुल मिलाकर जुलाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था विस्तार के मार्ग पर बनी हुई है, लेकिन विकास की गति को बनाए रखने के लिए घरेलू मांग को मजबूत करना, निवेश बढ़ाना और वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव को सीमित करना आवश्यक होगा। यदि आने वाले महीनों में मांग और कारोबारी विश्वास में सुधार होता है तो निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां फिर से तेज रफ्तार पकड़ सकती हैं।

  • पेटीएम की ग्रोथ को मिला एआई का सहारा, लागत दक्षता बढ़ने के साथ ब्रोकरेज ने बढ़ाया लक्ष्य मूल्य

    पेटीएम की ग्रोथ को मिला एआई का सहारा, लागत दक्षता बढ़ने के साथ ब्रोकरेज ने बढ़ाया लक्ष्य मूल्य

    नई दिल्ली । डिजिटल वित्तीय सेवा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी पेटीएम ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में परिचालन प्रदर्शन के साथ लागत नियंत्रण के मोर्चे पर भी मजबूत प्रगति दर्ज की है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऑटोमेशन को अपनाने से कंपनी की लागत दक्षता लगातार बेहतर हुई है, जिससे बढ़ते कारोबार के बावजूद खर्चों पर प्रभावी नियंत्रण बना हुआ है। यही कारण है कि कंपनी का मुनाफा बाजार के कई अनुमानों से बेहतर रहा और भविष्य की विकास संभावनाओं को लेकर भी सकारात्मक संकेत मिले हैं।

    कंपनी ने कारोबार के विस्तार के साथ मर्चेंट और उपभोक्ता आधार बढ़ाने में निवेश जारी रखा है, लेकिन इसके बावजूद गैर-बिक्री संबंधी खर्च लगभग स्थिर बने हुए हैं। ग्राहक सेवा, कलेक्शन और मर्चेंट अधिग्रहण जैसी प्रक्रियाओं में एआई आधारित तकनीक के इस्तेमाल ने परिचालन को अधिक कुशल बनाया है। इससे कंपनी को बड़े पैमाने पर लागत बचत के साथ तेज गति से कारोबार बढ़ाने में मदद मिल रही है।

    पेटीएम के लिए वित्तीय सेवाओं का कारोबार सबसे तेजी से उभरता हुआ ग्रोथ इंजन बनकर सामने आया है। इस खंड में राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें मर्चेंट लेंडिंग और कंज्यूमर लेंडिंग की मजबूत मांग का अहम योगदान रहा। कंपनी के साथ काम करने वाले लेंडिंग पार्टनर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है और दोबारा ऋण लेने वाले व्यापारियों की हिस्सेदारी भी काफी मजबूत बनी हुई है। इससे इस कारोबार की गुणवत्ता और स्थिरता दोनों को बल मिला है।

    कंपनी के पास उपलब्ध लेंडिंग कैपिटल उसकी मौजूदा ऋण वितरण क्षमता से कई गुना अधिक बताई जा रही है। इससे स्पष्ट है कि भविष्य में ऋण वितरण बढ़ाने के लिए फंडिंग किसी प्रकार की बाधा नहीं बनेगी। साथ ही कंपनी केवल डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल पर काम कर रही है, जिसके कारण वह स्वयं ऋण जोखिम नहीं उठाती और अपने पास लोन बुक भी नहीं रखती। इससे जोखिम सीमित रहने के साथ कारोबार का विस्तार अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा रहा है।

    कंज्यूमर लेंडिंग कारोबार में भी तेज वृद्धि देखने को मिली है। वित्तीय सेवाओं का उपयोग करने वाले ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पेटीएम पोस्टपेड की मांग पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यही कारोबार कंपनी के राजस्व और परिचालन लाभ में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसके साथ ही मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी, ब्रोकिंग और म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूशन जैसे वेल्थ मैनेजमेंट कारोबार भी कंपनी की नई विकास रणनीति का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं।

    भुगतान कारोबार में भी कंपनी का प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है। ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों में लेनदेन बढ़ने से कुल भुगतान मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। कार्ड-ऑन-यूपीआई और पोस्टपेड भुगतान की हिस्सेदारी बढ़ने से पेमेंट प्रोसेसिंग मार्जिन में भी संरचनात्मक सुधार देखने को मिला है। इससे कंपनी की आय की गुणवत्ता पहले की तुलना में और मजबूत हुई है।

    परिचालन स्तर पर कंपनी का ईबीआईटीडीए मार्जिन भी पिछली तिमाही की तुलना में बेहतर हुआ है। मजबूत ऑपरेटिंग लीवरेज और राजस्व की तुलना में खर्चों की नियंत्रित वृद्धि के कारण लाभ में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। इसी आधार पर कंपनी के लिए निर्धारित दीर्घकालिक मार्जिन लक्ष्य को तय समय से पहले हासिल करने की संभावना भी मजबूत मानी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि एआई आधारित ऑटोमेशन, भुगतान कारोबार का विस्तार और तेजी से बढ़ती वित्तीय सेवाएं आने वाले वर्षों में पेटीएम की आय और लाभप्रदता को नई ऊंचाई तक पहुंचा सकती हैं। इसी सकारात्मक दृष्टिकोण को देखते हुए कंपनी के भविष्य के लाभ अनुमान में बढ़ोतरी की गई है और निवेश के प्रति भरोसा भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है।

  • सोना-चांदी लगातार दूसरे दिन फिसले, मजबूत डॉलर के दबाव में कीमती धातुओं में 0.6% तक की गिरावट

    सोना-चांदी लगातार दूसरे दिन फिसले, मजबूत डॉलर के दबाव में कीमती धातुओं में 0.6% तक की गिरावट

    नई दिल्ली । घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में शुक्रवार को लगातार दूसरे कारोबारी दिन सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। मजबूत अमेरिकी डॉलर और वैश्विक बाजारों में बने दबाव के कारण दोनों कीमती धातुओं में कमजोरी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों और विदेशी मुद्रा बाजार में आए बदलाव का सीधा असर कीमती धातुओं की कीमतों पर पड़ रहा है। निवेशकों की सतर्कता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच फिलहाल बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के अगस्त डिलीवरी वाले वायदा अनुबंध की शुरुआत पिछले बंद भाव की तुलना में कमजोर स्तर पर हुई। कारोबार के दौरान सोने की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की गई और यह करीब 0.61 प्रतिशत टूटकर 1.42 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम से नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सोने ने दिन का निचला और ऊपरी स्तर भी दर्ज किया, जिससे बाजार में अस्थिरता का संकेत मिला। लगातार दूसरे दिन आई इस गिरावट ने अल्पकालिक निवेशकों को सतर्क कर दिया है।

    सोने के साथ-साथ चांदी की कीमतों में भी कमजोरी बनी रही। एमसीएक्स पर सितंबर डिलीवरी वाले चांदी के वायदा अनुबंध में शुरुआती कारोबार से ही दबाव देखा गया। कारोबार के दौरान चांदी की कीमत करीब 0.40 प्रतिशत तक फिसल गई। बाजार में खरीदारी सीमित रहने और वैश्विक संकेत कमजोर होने के कारण चांदी में भी गिरावट का रुख बना रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक मांग और निवेशकों की रणनीति दोनों का प्रभाव चांदी की कीमतों पर लगातार पड़ रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोना और चांदी दबाव में रहे। कॉमैक्स पर सोने और चांदी दोनों में गिरावट दर्ज की गई, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया। वैश्विक निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों को लेकर नई रणनीति अपनाई, जिससे कीमती धातुओं की कीमतों में नरमी बनी रही। विदेशी बाजारों की चाल का असर भारतीय वायदा बाजार पर तेजी से देखने को मिला और घरेलू कीमतें भी उसी दिशा में आगे बढ़ीं।

    विशेषज्ञों के अनुसार डॉलर इंडेक्स में मजबूती इस गिरावट की प्रमुख वजहों में शामिल है। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने पर सोने और चांदी जैसी धातुएं विदेशी निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत महंगी हो जाती हैं, जिससे उनकी मांग प्रभावित होती है। हाल के दिनों में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक घटनाक्रमों के कारण डॉलर में मजबूती देखने को मिली है। इसी का असर कीमती धातुओं के बाजार पर भी पड़ा है।

    बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, डॉलर की चाल और वैश्विक आर्थिक संकेतक सोने और चांदी की कीमतों की दिशा तय करेंगे। यदि डॉलर मजबूत बना रहता है तो कीमती धातुओं पर दबाव जारी रह सकता है, जबकि वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने की स्थिति में सुरक्षित निवेश की मांग फिर से बढ़ सकती है। फिलहाल निवेशकों को बाजार की बदलती परिस्थितियों पर नजर रखते हुए सोच-समझकर निवेश करने की सलाह दी जा रही है।

  • फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    नई दिल्ली । अमेरिका ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात को लेकर अपनी नई व्यापारिक कार्रवाई के तहत भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि यह दर उन कई देशों की तुलना में कम है, जिन पर 12.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत ने जांच प्रक्रिया के दौरान फोर्स लेबर से निर्मित उत्पादों के आयात पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए, जिसके कारण उसे अपेक्षाकृत कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया।

    यह निर्णय अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा सेक्शन 301 के तहत की गई व्यापक जांच के बाद लिया गया है। जांच में 60 प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। अमेरिकी प्रशासन का आरोप था कि इन देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने या उसके पालन को सुनिश्चित करने में पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इसी आधार पर विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय की गई हैं।

    यूएसटीआर के अनुसार, भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें 10 प्रतिशत टैरिफ की श्रेणी में रखा गया है। इस समूह में बांग्लादेश, कनाडा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू किया जाएगा। यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान के लिए अलग व्यवस्था अपनाई गई है।

    अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जून में प्रस्तावित कार्रवाई सार्वजनिक किए जाने के बाद भारत ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लागू करने की दिशा में कदम उठाए। इसी पहल को ध्यान में रखते हुए भारत को अधिक अनुकूल श्रेणी में रखा गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जबरन श्रम को समाप्त करने और व्यापारिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    इस जांच प्रक्रिया के दौरान दो चरणों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की गई, 45 से अधिक सरकारों से परामर्श किया गया और दो हजार से अधिक सार्वजनिक टिप्पणियां प्राप्त हुईं। इसके आधार पर यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि समीक्षा के दायरे में शामिल सभी अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों में सुधार की आवश्यकता है। इसी कारण 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत कार्रवाई का निर्णय लिया गया।

    हालांकि अमेरिका ने कुछ आवश्यक उत्पादों को इस कार्रवाई से बाहर भी रखा है। इनमें दवाएं, सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, चुनिंदा कच्चा माल और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण वस्तुएं शामिल हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा जाना द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, हालांकि आगे इसका प्रभाव दोनों देशों के व्यापार और निर्यात पर नजर रखने के बाद ही स्पष्ट होगा।