Category: Economy

  • 1 जून से पेट्रोल, डीजल और एटीएफ के निर्यात शुल्क में राहत, घरेलू ईंधन कीमतों पर नहीं पड़ेगा कोई असर

    1 जून से पेट्रोल, डीजल और एटीएफ के निर्यात शुल्क में राहत, घरेलू ईंधन कीमतों पर नहीं पड़ेगा कोई असर

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू निर्यात शुल्क की दरों में एक बार फिर संशोधन करते हुए 1 जून से नए शुल्क ढांचे को लागू करने का निर्णय लिया है। सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर लगने वाले शुल्क में बदलाव किया गया है, जबकि घरेलू बाजार में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल पर लागू उत्पाद शुल्क की दरों को यथावत रखा गया है। इस फैसले का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप कर ढांचे को संतुलित बनाए रखना और देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना माना जा रहा है।

    नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल के निर्यात पर 1.5 रुपये प्रति लीटर, डीजल के निर्यात पर 13.5 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ के निर्यात पर 9.5 रुपये प्रति लीटर शुल्क निर्धारित किया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन दरों का निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल तथा पेट्रोलियम उत्पादों की औसत कीमतों को ध्यान में रखकर किया गया है। समय-समय पर की जाने वाली समीक्षा के आधार पर इन शुल्कों में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं ताकि वैश्विक मूल्य परिवर्तनों का संतुलित प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़े।

    पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात शुल्क की व्यवस्था मार्च 2026 में लागू की गई थी। उस समय पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता के कारण सरकार ने देश के भीतर ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद घरेलू आपूर्ति प्रभावित न हो और आवश्यक ऊर्जा संसाधनों का संतुलित प्रबंधन किया जा सके।

    पिछले कुछ महीनों के दौरान सरकार ने बाजार परिस्थितियों के अनुसार कई बार शुल्क दरों में संशोधन किया है। मई के मध्य में हुए बदलाव के दौरान पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाया गया था, जबकि डीजल पर शुल्क में कटौती की गई थी। अब नई समीक्षा के बाद पेट्रोल और डीजल दोनों पर शुल्क को और कम किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की स्थिति और आपूर्ति संबंधी चिंताओं में कुछ हद तक सुधार देखा गया है।

    डीजल पर लागू निर्यात शुल्क में पिछले दो महीनों के दौरान कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। मार्च के अंत में निर्धारित दर को अप्रैल में काफी बढ़ाया गया था, लेकिन बाद में बाजार की परिस्थितियों में बदलाव आने पर इसे चरणबद्ध तरीके से कम किया गया। इसी तरह एटीएफ पर लागू शुल्क भी पहले बढ़ाया गया था, जिसके बाद लगातार समीक्षा के दौरान उसमें कटौती की गई है। नवीनतम संशोधन के बाद एटीएफ पर शुल्क पहले की तुलना में काफी कम स्तर पर पहुंच गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात शुल्क में यह संशोधन वैश्विक ऊर्जा बाजार की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया है। हालांकि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि पेट्रोल और डीजल पर लागू कर संरचना में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे आम उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की खुदरा कीमतों पर तत्काल कोई प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।

    सरकार की यह नीति ऊर्जा सुरक्षा, घरेलू आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आने वाले समय में वैश्विक तेल कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर शुल्क संरचना की आगे भी समीक्षा की जा सकती है।

  • वैश्विक और घरेलू आर्थिक घटनाक्रमों के बीच निवेशकों की बढ़ी सतर्कता, बाजार के लिए निर्णायक रहेगा आने वाला सप्ताह

    वैश्विक और घरेलू आर्थिक घटनाक्रमों के बीच निवेशकों की बढ़ी सतर्कता, बाजार के लिए निर्णायक रहेगा आने वाला सप्ताह

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए आने वाला सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि घरेलू और वैश्विक स्तर पर जारी होने वाले कई अहम आर्थिक संकेतक निवेशकों की धारणा और बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। पिछले सप्ताह बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला था और अब निवेशकों की निगाहें उन घटनाक्रमों पर टिकी हैं जो आने वाले दिनों में निवेश रणनीतियों को प्रभावित कर सकते हैं।

    बीते सप्ताह बाजार ने सकारात्मक शुरुआत की थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और पश्चिम एशिया से जुड़ी कुछ सकारात्मक उम्मीदों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया था। हालांकि सप्ताह आगे बढ़ने के साथ वैश्विक अनिश्चितताओं ने दोबारा बाजार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक जोखिमों को लेकर बढ़ी चिंता के कारण बाजार में मुनाफावसूली देखने को मिली। सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में बिकवाली का दबाव और बढ़ गया, जिससे प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए।

    अब निवेशकों का पूरा ध्यान अगले सप्ताह जारी होने वाले आर्थिक आंकड़ों और नीतिगत फैसलों पर केंद्रित है। सप्ताह की शुरुआत विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों के साथ होगी। मई महीने के मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई के आंकड़े देश की औद्योगिक गतिविधियों, मांग की स्थिति और कारोबारी माहौल की दिशा का शुरुआती संकेत देंगे। इसके साथ ही विभिन्न ऑटोमोबाइल कंपनियों की मासिक बिक्री रिपोर्ट भी बाजार के लिए अहम रहेगी, क्योंकि इससे उपभोक्ता मांग और आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाया जाता है।

    घरेलू स्तर पर औद्योगिक उत्पादन से जुड़े आंकड़ों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। ये आंकड़े विनिर्माण, खनन और बिजली क्षेत्र के प्रदर्शन की तस्वीर पेश करेंगे। मजबूत उत्पादन आंकड़े आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत दे सकते हैं, जबकि कमजोर प्रदर्शन बाजार में सतर्कता बढ़ा सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका से आने वाले आर्थिक आंकड़े भी वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिकी सेवा क्षेत्र और रोजगार से जुड़े प्रमुख संकेतकों को लेकर निवेशकों में विशेष रुचि बनी हुई है। इन आंकड़ों के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन किया जाएगा और यह भी तय होगा कि भविष्य में ब्याज दरों को लेकर वहां की केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ सकती है। इसका असर वैश्विक पूंजी प्रवाह, उभरते बाजारों में निवेश और विदेशी निवेशकों की रणनीतियों पर दिखाई दे सकता है।

    भारतीय शेयर बाजार के लिए सबसे बड़ा केंद्र बिंदु भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक होगी। तीन दिनों तक चलने वाली इस बैठक के बाद ब्याज दरों, महंगाई, आर्थिक विकास और वित्तीय प्रणाली की स्थिति को लेकर केंद्रीय बैंक का दृष्टिकोण सामने आएगा। बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के शेयरों पर इस निर्णय का सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा केंद्रीय बैंक द्वारा मानसून, खाद्य महंगाई और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर किए गए आकलन पर भी निवेशकों की विशेष नजर रहेगी।

    सप्ताह के अंत में देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किए जाएंगे। प्रारंभिक जीडीपी वृद्धि दर और मार्च तिमाही के प्रदर्शन से भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी। यदि वृद्धि दर अनुमान से बेहतर रहती है तो इससे निवेशकों का भरोसा मजबूत हो सकता है। वहीं कमजोर आंकड़े बाजार में दबाव बढ़ा सकते हैं।

    इसी दिन अमेरिका के रोजगार आंकड़े और बेरोजगारी दर भी जारी होगी। ये आंकड़े वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं और इनके आधार पर अंतरराष्ट्रीय निवेश धारणा प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया से जुड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक बने रहेंगे। ऐसे में आने वाला सप्ताह निवेशकों के लिए सतर्कता, विश्लेषण और रणनीतिक निवेश निर्णयों का सप्ताह साबित हो सकता है।

  • इंडिगो को ₹2,536 करोड़ का तिमाही घाटा: महंगे ईंधन और रुपये की कमजोरी से बढ़ा दबाव, किराया बढ़ने के संकेत

    इंडिगो को ₹2,536 करोड़ का तिमाही घाटा: महंगे ईंधन और रुपये की कमजोरी से बढ़ा दबाव, किराया बढ़ने के संकेत

    नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के वित्तीय नतीजों ने एविएशन सेक्टर में दबाव की तस्वीर को एक बार फिर सामने ला दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी को 2,536 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में कंपनी ने 3,068 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था। एक साल के भीतर मुनाफे से घाटे में पहुंचना इस बात का संकेत है कि एयरलाइन उद्योग इस समय बढ़ती लागत, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और परिचालन चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

    इंटरग्लोब एविएशन के तहत संचालित इंडिगो का कुल कारोबार हालांकि इस अवधि में थोड़ा बढ़ा है, लेकिन मुनाफे पर भारी दबाव देखने को मिला है। कंपनी का परिचालन राजस्व 22,438 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि दर्शाता है। इसके बावजूद खर्चों में तेज बढ़ोतरी ने लाभ को घाटे में बदल दिया। कंपनी के अनुसार इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की बढ़ती कीमतें और भारतीय रुपये की कमजोरी रही है। डॉलर में होने वाले लीज, मेंटेनेंस और अन्य भुगतान के कारण मुद्रा विनिमय दर में बदलाव का सीधा असर लागत पर पड़ता है।

    इसके अलावा इस तिमाही में कंपनी पर लगभग 250 करोड़ रुपये का एकमुश्त खर्च भी आया, जिसने वित्तीय परिणामों को और प्रभावित किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और मध्य पूर्व में तनाव के कारण जेट फ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, जिसका असर वैश्विक विमानन उद्योग पर साफ दिखाई दे रहा है। इंडिगो ने संकेत दिए हैं कि यदि लागत में यह बढ़ोतरी जारी रहती है तो आने वाले समय में हवाई किरायों में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    कंपनी अब फ्यूल हेजिंग जैसी रणनीतियों पर भी विचार कर रही है, ताकि भविष्य में ईंधन की कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव से बचा जा सके। यह रणनीति दुनिया की कई बड़ी एयरलाइंस पहले से अपनाती रही हैं। इसके साथ ही इंडिगो ने लगभग 450 मिलियन डॉलर के प्रीपेमेंट को भी मंजूरी दी है, जिसका उपयोग विमान और इंजन जैसे एविएशन एसेट्स की खरीद में किया जाएगा। यह कदम कंपनी को लंबी अवधि में लीज निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

    प्रबंधन का कहना है कि वित्तीय दबाव के बावजूद कंपनी की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है। कंपनी की क्षमता में वृद्धि हुई है और कुल आय में भी सुधार दर्ज किया गया है। हालांकि यात्रियों की संख्या में हल्की गिरावट देखने को मिली है, जो इस तिमाही में 1.1 प्रतिशत घटकर 31.6 मिलियन रह गई। प्रति किलोमीटर आय और सीट भराव दर में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि उद्योग मानकों के अनुसार यह स्थिति अब भी स्थिर मानी जा रही है।

    शेयर बाजार में भी नतीजों का असर देखने को मिला और कंपनी के शेयर में दबाव रहा। हालांकि इंडिगो का बाजार पूंजीकरण अब भी मजबूत स्तर पर बना हुआ है, जो इसकी बाजार स्थिति को दर्शाता है। कुल मिलाकर यह तिमाही एयरलाइन उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण रही है, जहां बढ़ती लागत ने मजबूत मांग के बावजूद मुनाफे को प्रभावित किया है। आने वाले महीनों में किराया निर्धारण और ईंधन कीमतों की दिशा कंपनी के प्रदर्शन के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।

  • भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।

    वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है।

    महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है।

    विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।

  • वैश्विक तेल बाजार में गिरावट का दबाव, अमेरिका-ईरान कूटनीति से क्रूड प्राइस में बड़ी नरमी दर्ज

    वैश्विक तेल बाजार में गिरावट का दबाव, अमेरिका-ईरान कूटनीति से क्रूड प्राइस में बड़ी नरमी दर्ज

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच संभावित कूटनीतिक समझौते की उम्मीदों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव पैदा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और क्रूड छह सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया है। बाजार में यह गिरावट उस समय देखने को मिली है जब होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति सामान्य होने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं और भू-राजनीतिक तनाव में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। इस घटनाक्रम का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर पड़ा है, जिससे निवेशकों की धारणा में बदलाव देखा जा रहा है।

    वैश्विक बाजार में अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड और अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से उस जोखिम प्रीमियम में कमी के कारण हुई है, जो लंबे समय से मध्य पूर्व में तनाव की वजह से तेल कीमतों में शामिल था। जैसे ही कूटनीतिक समाधान की संभावना बढ़ी, बाजार ने भविष्य की आपूर्ति को अधिक स्थिर मानते हुए कीमतों में कटौती शुरू कर दी।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है, जिसमें सीजफायर को आगे बढ़ाने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से अभी अंतिम सहमति की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संवाद की प्रक्रिया जारी रहने से बाजार में सकारात्मक संकेत बने हैं। इसी उम्मीद के चलते तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम हुई है और कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित और सुचारु रूप से कार्य करने लगे, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में और नरमी आ सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में अभी समय लग सकता है क्योंकि कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।

    इस बीच भारत सहित कई देशों में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति सामान्य बनी हुई है। रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं और सरकार की ओर से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के पर्याप्त भंडार बनाए रखने का दावा किया गया है। साथ ही आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाए रखने के लिए निगरानी और प्रवर्तन तंत्र को भी सक्रिय किया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की कमी या असंतुलन की स्थिति न बने।

    विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा पूरी तरह अमेरिका-ईरान वार्ता के परिणाम और वैश्विक आपूर्ति स्थिरता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की दिशा में प्रगति होती है तो कीमतों में और गिरावट संभव है, जबकि किसी भी प्रकार की रुकावट या तनाव बढ़ने पर बाजार फिर से अस्थिर हो सकता है। फिलहाल बाजार कूटनीतिक संकेतों पर नजर बनाए हुए है और निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

  • फ्यूल प्राइस हाई, गोल्ड डिमांड क्रैश: जानिए अपने शहर में पेट्रोल-डीजल और सोने का रेट

    फ्यूल प्राइस हाई, गोल्ड डिमांड क्रैश: जानिए अपने शहर में पेट्रोल-डीजल और सोने का रेट


    नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक बार फिर आम लोगों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। 30 मई 2026 को तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन पिछले दिनों हुई बढ़ोतरी के बाद कई शहरों में पेट्रोल की कीमत 102 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुकी है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई सहित कई प्रमुख महानगरों में ईंधन के दाम रिकॉर्ड स्तर पर बने हुए हैं।

    तेल कंपनियों के अनुसार, 25 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 2.50 रुपये प्रति लीटर से अधिक की बढ़ोतरी की गई थी, जिसके बाद से बाजार स्थिर जरूर है, लेकिन कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ईरान-अमेरिका तनाव के चलते स्थिति अनिश्चित बनी हुई है, जिसका असर भारत में भी देखने को मिल रहा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है। तेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत की 22 रिफाइनरियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात भी कर रही हैं। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि ईंधन का उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए और अनावश्यक खपत से बचा जाए।

    देश के प्रमुख शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम (प्रति लीटर)
    दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये पर स्थिर है। मुंबई में पेट्रोल 111.18 रुपये और डीजल 97.83 रुपये तक पहुंच गया है। कोलकाता में पेट्रोल 113.47 रुपये और डीजल 99.82 रुपये दर्ज किया गया है। चेन्नई में पेट्रोल 107.77 रुपये और डीजल 99.55 रुपये, जबकि बेंगलुरु में पेट्रोल 110.93 रुपये और डीजल 98.80 रुपये पर बना हुआ है। पटना और जयपुर जैसे शहरों में भी कीमतें 110 रुपये के ऊपर बनी हुई हैं। वहीं पोर्ट ब्लेयर में ईंधन सबसे सस्ता दर्ज किया गया है।

    इधर, सोने के बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी किए जाने के बाद बाजार में मांग तेजी से घट गई है। इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, सोने की मांग पिछले दो हफ्तों में लगभग 70 प्रतिशत तक गिरकर 7.5 टन रह गई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह करीब 25 टन थी।

    सोने पर बढ़े टैक्स का असर ग्राहकों की खरीदारी पर साफ दिखाई दे रहा है। अब सोने पर कुल प्रभावी टैक्स 18.45 फीसदी तक पहुंच गया है, जिससे इसकी कीमतें और बढ़ गई हैं। मुंबई के स्पॉट मार्केट में 999 शुद्धता वाला सोना लगभग 1.57 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि सोने की मांग में गिरावट केवल टैक्स बढ़ने से नहीं, बल्कि मौसमी कारणों और खरीदारी पर आई गिरावट से भी जुड़ी है। महंगाई, ईंधन की ऊंची कीमतें और त्योहारों से पहले की सुस्ती भी बाजार को प्रभावित कर रही है।

  • सोना-चांदी की चमक पड़ी फीकी, एक हफ्ते में सोना ₹1,000 और चांदी ₹2,600 से ज्यादा सस्ती

    सोना-चांदी की चमक पड़ी फीकी, एक हफ्ते में सोना ₹1,000 और चांदी ₹2,600 से ज्यादा सस्ती


    नई दिल्ली ।
    इस सप्ताह घरेलू सर्राफा बाजार में कीमती धातुओं की चमक थोड़ी फीकी पड़ गई है। सोने और चांदी दोनों के दामों में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों और ज्वैलरी बाजार से जुड़े कारोबारियों के बीच हलचल देखने को मिल रही है। पिछले कुछ दिनों में लगातार उतार-चढ़ाव के बाद इस सप्ताह सोना करीब एक हजार रुपये से अधिक और चांदी दो हजार रुपये से ज्यादा सस्ती हो गई है। कीमतों में आई इस नरमी ने उन लोगों के लिए राहत भी दी है जो लंबे समय से खरीदारी की योजना बना रहे थे, जबकि निवेशकों के लिए यह एक अस्थिर संकेत माना जा रहा है।

    इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन के ताजा आंकड़ों के अनुसार 24 कैरेट सोने की कीमत इस सप्ताह लगभग 1,257 रुपये की गिरावट के साथ 1,56,463 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गई है। इससे पहले यह स्तर 1,58,720 रुपये प्रति 10 ग्राम के करीब था। इसी तरह 22 कैरेट और 18 कैरेट सोने की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली है, जिससे ज्वैलरी सेगमेंट में कीमतों का दबाव साफ नजर आ रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के दिनों में वैश्विक आर्थिक संकेतकों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का असर सीधे घरेलू कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

    इस सप्ताह सोने की कीमतों में दिन-प्रतिदिन उतार-चढ़ाव भी दर्ज किया गया, जहां 25 मई को इसका उच्चतम स्तर देखने को मिला, जबकि 27 मई को इसमें सबसे निचला स्तर दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि बाजार में अस्थिरता बनी हुई है और निवेशक अभी भी सुरक्षित निवेश विकल्पों की तलाश में हैं। दूसरी ओर चांदी के बाजार में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला, जहां कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई।

    चांदी की कीमत इस सप्ताह करीब 2,650 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट के साथ 2,63,350 रुपये पर पहुंच गई है। इससे पहले यह स्तर 2,66,000 रुपये के आसपास था। सप्ताह के दौरान चांदी ने 2,71,100 रुपये के उच्च स्तर और 2,60,917 रुपये के न्यूनतम स्तर को भी छुआ, जो इसकी अस्थिरता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। औद्योगिक मांग और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव का प्रभाव चांदी की कीमतों पर अधिक दिखाई देता है, जिसके कारण इसमें उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत तेज रहता है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमती धातुओं के भाव में नरमी देखने को मिली है। डॉलर आधारित बाजार में सोना और चांदी दोनों ही अपने हालिया उच्च स्तरों से नीचे आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई को लेकर बनी चिंताएं और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक कीमती धातुओं की कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं। इसके अलावा कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और वैश्विक व्यापार परिस्थितियां भी इस दबाव में योगदान दे रही हैं।

    हालांकि दीर्घकालिक दृष्टि से सोने और चांदी ने निवेशकों को मजबूत रिटर्न दिया है। पिछले एक वर्ष में इन दोनों धातुओं ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए ये अब भी आकर्षक विकल्प बने हुए हैं। मौजूदा गिरावट को बाजार विशेषज्ञ एक अस्थायी सुधार के रूप में भी देख रहे हैं, जो तेजी के लंबे दौर के बाद सामान्य बाजार प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

    वर्तमान स्थिति में सर्राफा बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है और निवेशक आगे के वैश्विक संकेतों पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों और डॉलर की चाल के आधार पर कीमती धातुओं की कीमतों में फिर से बदलाव देखने को मिल सकता है।

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  • CNG और PNG के दाम बढ़े, मुंबई में सफर से लेकर रसोई तक महंगा होगा जीवन; किराया बढ़ाने की मांग तेज

    CNG और PNG के दाम बढ़े, मुंबई में सफर से लेकर रसोई तक महंगा होगा जीवन; किराया बढ़ाने की मांग तेज

    नई दिल्ली। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और उससे जुड़े महानगर क्षेत्र के लाखों लोगों को महंगाई का एक और झटका लगा है। घरेलू रसोई से लेकर रोजमर्रा के सफर तक अब अतिरिक्त खर्च का बोझ बढ़ने वाला है। महानगर क्षेत्र में संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की कीमतों में बढ़ोतरी लागू कर दी गई है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं, वाहन चालकों और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाले यात्रियों पर पड़ेगा। गैस दरों में हुई इस वृद्धि ने एक बार फिर शहरी जीवनयापन की बढ़ती लागत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    नई दरों के अनुसार CNG की कीमत में प्रति किलोग्राम 2 रुपये की बढ़ोतरी की गई है, जिसके बाद इसकी कीमत 86 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। वहीं घरेलू उपयोग के लिए उपलब्ध पाइप्ड नेचुरल गैस की दर में 50 पैसे प्रति यूनिट की वृद्धि की गई है और अब उपभोक्ताओं को 52 रुपये प्रति यूनिट की दर से भुगतान करना होगा। इस फैसले का असर महानगर क्षेत्र के 31 लाख से अधिक परिवारों पर पड़ेगा, जो घरेलू रसोई के लिए पाइप्ड गैस का उपयोग करते हैं। इसके साथ ही लाखों लोग जो रोजाना CNG आधारित वाहनों से यात्रा करते हैं, उन्हें भी अप्रत्यक्ष रूप से अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ सकता है।

    गैस वितरण क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और गैस खरीद की लागत में लगातार हो रही वृद्धि के कारण कीमतों में संशोधन आवश्यक हो गया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, महंगे गैस स्रोतों पर निर्भरता और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव जैसे कारकों ने गैस खरीद को पहले की तुलना में अधिक महंगा बना दिया है। इसी बढ़ी हुई लागत का प्रभाव अब उपभोक्ताओं तक पहुंचा है।

    गैस कीमतों में वृद्धि के बाद ऑटो-रिक्शा और टैक्सी संगठनों ने भी किराए में संशोधन की मांग को तेज कर दिया है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती ईंधन लागत के बीच मौजूदा किराया ढांचा वाहन संचालन की वास्तविक लागत को पूरा नहीं कर पा रहा है। परिवहन क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों का मानना है कि यदि किराए में समय रहते संशोधन नहीं किया गया तो वाहन चालकों की आय पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसी कारण बेस किराए में वृद्धि की मांग संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष रखे जाने की तैयारी की जा रही है।

    टैक्सी संगठनों ने भी ईंधन लागत बढ़ने का हवाला देते हुए किराए में बढ़ोतरी की आवश्यकता जताई है। उनका तर्क है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान CNG की कीमतों में कई बार संशोधन किया गया है, जिससे संचालन व्यय लगातार बढ़ा है। यदि किराए में संशोधन की अनुमति मिलती है तो इसका असर प्रतिदिन यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों की जेब पर भी दिखाई देगा।

    विशेष रूप से चिंता की बात यह है कि मई महीने में CNG की कीमतों में यह दूसरी बड़ी बढ़ोतरी है। इससे पहले भी इसी महीने कीमतों में वृद्धि की गई थी, जबकि अप्रैल में भी दरों में इजाफा देखा गया था। लगातार बढ़ती कीमतों के कारण परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ रही हैं।

    मुंबई महानगर क्षेत्र में 12 लाख से अधिक वाहन CNG पर निर्भर हैं। इनमें बड़ी संख्या में ऑटो-रिक्शा, टैक्सियां, निजी कारें, बसें और मालवाहक वाहन शामिल हैं। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में भी CNG की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसके कारण कीमतों में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे तौर पर लाखों यात्रियों और पूरे शहरी परिवहन तंत्र को प्रभावित करता है। ऐसे में आने वाले दिनों में गैस दरों के प्रभाव और संभावित किराया वृद्धि पर सभी की नजर बनी रहेगी।

  • बाजार में भारी बिकवाली के बीच चुनिंदा शेयरों का दमदार प्रदर्शन, एक महीने में 20% तक का रिटर्न

    बाजार में भारी बिकवाली के बीच चुनिंदा शेयरों का दमदार प्रदर्शन, एक महीने में 20% तक का रिटर्न

    नई दिल्ली । सप्ताह और महीने के अंतिम कारोबारी दिन घरेलू शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 1092 अंकों की बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ, जिससे बाजार में व्यापक दबाव का माहौल बना रहा। अधिकांश क्षेत्रों में बिकवाली हावी रही और निवेशकों की सतर्कता साफ दिखाई दी। इसके बावजूद कुछ चुनिंदा लार्ज-कैप शेयरों ने बाजार की इस कमजोरी को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए नया 52-वीक हाई हासिल किया। इन कंपनियों के प्रदर्शन ने यह संकेत दिया कि मजबूत बुनियादी स्थिति और भविष्य की विकास संभावनाएं रखने वाले शेयरों में निवेशकों का भरोसा अब भी कायम है।

    बाजार में गिरावट के बीच नौ प्रमुख कंपनियों के शेयर एक साल के अपने सर्वोच्च स्तर तक पहुंचने में सफल रहे। किसी भी शेयर का 52-वीक हाई पर पहुंचना निवेशकों के सकारात्मक दृष्टिकोण और उस कंपनी की संभावित विकास क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। ऐसे समय में जब व्यापक बाजार दबाव में हो और प्रमुख सूचकांक लाल निशान में कारोबार कर रहे हों, तब चुनिंदा शेयरों का रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचना उनकी विशेष मजबूती को दर्शाता है।

    सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला शेयर सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया रहा। कंपनी के शेयर ने नया उच्च स्तर बनाते हुए पिछले एक महीने में लगभग 20 प्रतिशत का मजबूत रिटर्न दिया। इसी तरह अक्षय ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी अडानी ग्रीन एनर्जी ने भी शानदार प्रदर्शन किया और करीब 19 प्रतिशत की बढ़त दर्ज करते हुए नया 52-वीक हाई हासिल किया। ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती मांग और दीर्घकालिक निवेश संभावनाओं ने इन कंपनियों के प्रति निवेशकों का विश्वास मजबूत किया है।

    सीमेंस एनर्जी इंडिया और पॉलीकैब इंडिया भी इस सूची में प्रमुख रूप से शामिल रहे। दोनों कंपनियों के शेयरों में पिछले एक महीने के दौरान लगभग 17 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। बिजली, ऊर्जा अवसंरचना और औद्योगिक विकास से जुड़ी परियोजनाओं में बढ़ती गतिविधियों का लाभ इन कंपनियों को मिलता दिखाई दे रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि देश में जारी इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं इन कंपनियों के लिए सकारात्मक कारक बनी हुई हैं।

    ऑटो कंपोनेंट क्षेत्र की प्रमुख कंपनी समवर्धना मदरसन इंटरनेशनल ने भी निवेशकों को प्रभावित किया। कंपनी के शेयर ने नया रिकॉर्ड स्तर छूते हुए पिछले एक महीने में करीब 14 प्रतिशत का रिटर्न दिया। वहीं अडानी पावर ने लगभग 12 प्रतिशत की तेजी के साथ नया 52-वीक हाई बनाया, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में निवेशकों की बढ़ती रुचि का संकेत मिला।

    धातु क्षेत्र की बड़ी कंपनी हिंदाल्को इंडस्ट्रीज भी नए उच्च स्तर तक पहुंचने में सफल रही। वैश्विक मांग में सुधार और औद्योगिक गतिविधियों में तेजी की उम्मीदों ने कंपनी के शेयरों को समर्थन दिया। इसी क्रम में अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस ने भी नया रिकॉर्ड स्तर हासिल किया और पिछले एक महीने में सकारात्मक रिटर्न दर्ज किया। ऊर्जा ट्रांसमिशन और वितरण क्षेत्र में कंपनी की मजबूत उपस्थिति निवेशकों को आकर्षित करती रही है।

    JSW एनर्जी भी उन चुनिंदा कंपनियों में शामिल रही जिन्होंने बाजार की कमजोरी के बीच मजबूती दिखाई। भले ही इसकी मासिक बढ़त अन्य शेयरों की तुलना में अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन नया 52-वीक हाई बनाना कंपनी के प्रति निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।

    बाजार विश्लेषकों के अनुसार, व्यापक गिरावट के बावजूद इन शेयरों का रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचना यह बताता है कि निवेशक अभी भी मजबूत व्यवसाय मॉडल, बेहतर आय संभावनाओं और दीर्घकालिक विकास क्षमता वाली कंपनियों पर दांव लगाने को तैयार हैं। आने वाले समय में इन शेयरों की चाल पर बाजार प्रतिभागियों और निवेशकों की विशेष नजर बनी रहने की संभावना है।

  • ग्लोबल संकेतों के बीच बाजार धड़ाम, निफ्टी 1.5% गिरा और 23,500 के अहम स्तर से नीचे फिसला

    ग्लोबल संकेतों के बीच बाजार धड़ाम, निफ्टी 1.5% गिरा और 23,500 के अहम स्तर से नीचे फिसला

    नई दिल्ली ।  सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली, जिससे निवेशकों की संपत्ति को बड़ा नुकसान हुआ। वैश्विक बाजारों से मिले-जुले संकेतों और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच घरेलू बाजार दबाव में आ गया। कारोबार की शुरुआत भले ही सकारात्मक रही हो, लेकिन दिन के आगे बढ़ने के साथ बाजार में कमजोरी बढ़ती गई और अंतिम घंटे में तेज बिकवाली ने स्थिति को और बिगाड़ दिया।

    कारोबार के अंत में 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 1,092.06 अंक यानी 1.44 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,775.74 पर बंद हुआ। वहीं एनएसई का निफ्टी 50 भी 359.40 अंक यानी 1.50 प्रतिशत टूटकर 23,547.75 के स्तर पर बंद हुआ। दिनभर के कारोबार में सेंसेक्स ने 76,220.02 का ऊपरी स्तर और 74,589.11 का निचला स्तर छुआ, जबकि निफ्टी 24,002.80 के हाई से फिसलकर 23,484.75 के निचले स्तर तक पहुंच गया।

    बाजार में यह गिरावट व्यापक स्तर पर देखने को मिली, जहां मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स भी दबाव में रहे। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 1.33 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। सेक्टरवार देखें तो तेल एवं गैस, मेटल और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे प्रमुख सेक्टरों में दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट ने बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनाया। वहीं ऑटो, फार्मा, हेल्थकेयर और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर भी कमजोर रहे, जबकि आईटी सेक्टर में हल्की बढ़त देखने को मिली।

    निफ्टी 50 के प्रमुख शेयरों में टेक महिंद्रा, एचसीएल टेक, विप्रो, नेस्ले इंडिया और एलएंडटी जैसे स्टॉक्स में मामूली तेजी रही, लेकिन दूसरी ओर पावरग्रिड, इंडिगो, ओएनजीसी, मैक्स हेल्थ, आयशर मोटर्स और टाटा कंज्यूमर जैसे शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। कुल मिलाकर बाजार में बिकवाली का दबाव इतना अधिक रहा कि एक ही सत्र में निवेशकों को लगभग 6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ा।

    विशेषज्ञों के अनुसार बाजार में यह गिरावट मुख्य रूप से वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण देखने को मिली। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में हालिया नरमी से कुछ राहत के संकेत मिले हैं, लेकिन मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम अभी भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में गिरावट से आयात बिल और महंगाई पर कुछ सकारात्मक असर की उम्मीद जरूर जताई जा रही है, लेकिन निवेशकों का भरोसा अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है।

    मुद्रा बाजार में रुपये ने डॉलर के मुकाबले हल्की मजबूती दिखाई है, जिससे कुछ हद तक घरेलू बाजार को सहारा मिला है। लेकिन तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि निफ्टी के 23,500 के नीचे फिसलने से निकट भविष्य में बाजार पर दबाव बना रह सकता है और इसमें आगे और गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    कुल मिलाकर, सप्ताह का अंत भारतीय शेयर बाजार के लिए कमजोर रहा और आने वाले सत्रों में वैश्विक संकेत, कच्चे तेल की चाल और भू-राजनीतिक घटनाक्रम बाजार की दिशा तय करेंगे।