Category: Entertainment

  • जब एक ही दिन में हाथ से निकल गए तीन बड़े प्रोजेक्ट, संघर्ष के दौर में मनोज बाजपेयी से दोस्त ने पूछा था- कहीं कोई गलत कदम तो नहीं उठाओगे?

    जब एक ही दिन में हाथ से निकल गए तीन बड़े प्रोजेक्ट, संघर्ष के दौर में मनोज बाजपेयी से दोस्त ने पूछा था- कहीं कोई गलत कदम तो नहीं उठाओगे?

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित और प्रतिभाशाली अभिनेताओं में शामिल मनोज बाजपेयी आज अभिनय की दुनिया में एक स्थापित नाम हैं। अपने दमदार अभिनय, अलग किरदारों और गंभीर भूमिकाओं के लिए पहचान बना चुके मनोज बाजपेयी की सफलता की कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उसका संघर्ष उतना ही कठिन रहा है। आज करोड़ों दर्शकों के पसंदीदा अभिनेता बनने से पहले उन्होंने लंबे समय तक असफलताओं, अस्वीकार किए जाने और आर्थिक चुनौतियों का सामना किया था।

    मनोज बाजपेयी ने कई मंचों पर अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया है कि मुंबई में शुरुआती दौर उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था। अभिनय के क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए वह लगातार ऑडिशन देते थे और छोटे-बड़े अवसरों की तलाश में रहते थे। हालांकि कई बार उन्हें सफलता के बजाय निराशा ही हाथ लगी। ऐसे ही एक कठिन अनुभव का जिक्र उन्होंने एक बातचीत के दौरान किया था, जिसने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

    अभिनेता के अनुसार एक समय ऐसा आया जब उनके पास एक साथ तीन अलग-अलग प्रोजेक्ट थे। इनमें एक टेलीविजन धारावाहिक में मुख्य भूमिका, एक कॉर्पोरेट फिल्म में प्रमुख किरदार और एक नए सीरियल में महत्वपूर्ण भूमिका शामिल थी। उन्हें लगने लगा था कि अब करियर धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा है। लेकिन परिस्थितियां अचानक इस तरह बदलीं कि एक ही दिन में तीनों अवसर उनके हाथ से निकल गए।

    उन्होंने बताया कि एक प्रोजेक्ट की शूटिंग के दौरान पहला दृश्य फिल्माए जाने के बाद उन्हें अलग बुलाया गया। कुछ देर की चर्चा के बाद यूनिट की ओर से उन्हें सूचित किया गया कि निर्माता और निर्देशक को उनकी भूमिका को लेकर कुछ संदेह है और फिलहाल उन्हें आगे काम नहीं करना होगा। यह सूचना उनके लिए बेहद अप्रत्याशित थी। सेट पर मौजूद अन्य लोगों के बीच इस तरह काम से हटाए जाने से उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुंचा।

    उस समय की स्थिति को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सबसे अधिक कठिनाई इस बात की थी कि उनके सामने भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। जिस काम को लेकर उम्मीदें थीं, वह अचानक समाप्त हो गया था। इसके बाद उन्होंने दूसरे प्रोजेक्ट की जानकारी लेने का प्रयास किया, लेकिन वहां भी उन्हें पता चला कि उनकी जगह किसी अन्य कलाकार को चुन लिया गया है। इससे उनका मनोबल और अधिक प्रभावित हुआ।

    स्थिति तब और गंभीर हो गई जब तीसरे प्रोजेक्ट से भी उनके बाहर होने की सूचना मिली। एक ही दिन में लगातार तीन झटके मिलने के बाद वे मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गए थे। संघर्ष के उन दिनों में आर्थिक असुरक्षा और भविष्य की चिंता भी लगातार उनके साथ थी। ऐसे समय में उनके करीबी मित्रों ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें निराशा से बाहर निकलने की कोशिश की।

    मनोज बाजपेयी ने स्वीकार किया कि कलाकारों के जीवन में असफलता और अस्वीकृति सामान्य बात होती है, लेकिन शुरुआती दौर में इन्हें स्वीकार करना आसान नहीं होता। उन्होंने बताया कि उस दौर ने उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाया और परिस्थितियों से लड़ना सिखाया। लगातार मिल रही निराशाओं के बावजूद उन्होंने अभिनय का सपना नहीं छोड़ा और अपने लक्ष्य पर डटे रहे।

    समय के साथ उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें ऐसे अवसर मिले जिन्होंने उनके करियर की दिशा बदल दी। बाद में उन्होंने कई यादगार फिल्मों और वेब सीरीज में शानदार अभिनय कर अपनी अलग पहचान बनाई। आज उनका नाम उन कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने प्रतिभा और मेहनत के बल पर फिल्म उद्योग में विशेष स्थान हासिल किया।

    मनोज बाजपेयी की यह कहानी केवल एक अभिनेता के संघर्ष की दास्तान नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा भी है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। उनका सफर यह संदेश देता है कि असफलताएं स्थायी नहीं होतीं और लगातार प्रयास करने वाले लोगों के लिए सफलता का रास्ता अंततः खुल ही जाता है।

  • ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा’ का असली मतलब जानकर चौंक जाएंगे आप, दशकों से गुनगुनाए जा रहे इस सुपरहिट गाने के पीछे छिपा है दिलचस्प अर्थ

    ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा’ का असली मतलब जानकर चौंक जाएंगे आप, दशकों से गुनगुनाए जा रहे इस सुपरहिट गाने के पीछे छिपा है दिलचस्प अर्थ

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों तक लोकप्रिय बने रहते हैं। वर्ष 1977 में रिलीज हुई फिल्म ‘इंकार’ का गीत ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा, मैं गुड़ की डली’ भी ऐसे ही सदाबहार गीतों में शामिल है। यह गाना आज भी शादियों, समारोहों और सांस्कृतिक आयोजनों में उतनी ही ऊर्जा और उत्साह के साथ सुना जाता है, जितना अपने दौर में सुना जाता था। हालांकि इस गीत को गुनगुनाने वाले अधिकांश लोग इसके वास्तविक अर्थ से अनजान रहते हैं।

    यह गीत अपने संगीत, लय और हेलेन के आकर्षक प्रदर्शन के कारण बेहद लोकप्रिय हुआ था। फिल्म में हेलेन ने मराठी लोक संस्कृति से प्रेरित लावणी शैली में प्रस्तुति दी थी, जिसने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। यही वजह है कि कई लोगों ने समय के साथ ‘मुंगड़ा’ शब्द को लावणी नृत्य या किसी विशेष शैली से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। जबकि वास्तविकता इससे अलग है।

    गीत के बोल प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, जबकि संगीतकार राजेश रोशन थे। इस गीत को स्वर दिया था ऊषा मंगेशकर ने। इन सभी की रचनात्मक प्रतिभा ने मिलकर एक ऐसा गीत तैयार किया, जो लगभग पांच दशकों बाद भी लोकप्रियता बनाए हुए है। लेकिन इसकी सबसे खास बात इसके शब्दों में छिपा सांकेतिक अर्थ माना जाता है।

    भाषाई और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार ‘मुंगड़ा’ शब्द का संबंध मराठी बोलचाल से माना जाता है। स्थानीय प्रयोग में इसका अर्थ बड़े चींटे या नर चींटे से जोड़ा जाता है। मराठी में चींटी के लिए ‘मुंगी’ और कुछ क्षेत्रों में बड़े चींटे के लिए ‘मुंगला’ या ‘मुंगड़ा’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यही संदर्भ इस गीत के अर्थ को समझने की कुंजी माना जाता है।

    गीत के मुखड़े में नायिका स्वयं को ‘गुड़ की डली’ कहती है और सामने वाले को ‘मुंगड़ा’ संबोधित करती है। यदि इस रूपक को समझा जाए तो गीत में एक रोचक तुलना दिखाई देती है। जिस प्रकार गुड़ की मिठास चींटियों को अपनी ओर आकर्षित करती है, उसी प्रकार गीत की नायिका अपने प्रशंसकों या चाहने वालों को संबोधित करते हुए स्वयं को आकर्षण का केंद्र बताती है। वह संकेत देती है कि यदि प्रेम या स्नेह चाहिए तो आगे बढ़ो, अन्यथा अवसर निकल जाएगा।

    यही कारण है कि इस गीत के शब्द पहली नजर में जितने सरल दिखाई देते हैं, उनके भीतर उतनी ही रचनात्मक कल्पना और सांस्कृतिक गहराई छिपी हुई है। गीतकार ने एक सामान्य ग्रामीण और लोक जीवन से जुड़े प्रतीक का उपयोग कर प्रेम और आकर्षण की भावना को बेहद सहज ढंग से व्यक्त किया है। यही विशेषता मजरूह सुल्तानपुरी की लेखनी को अलग पहचान देती है।

    फिल्म ‘इंकार’ में शामिल होने के बाद यह गीत तेजी से लोकप्रिय हुआ और बाद के वर्षों में कई फिल्मों तथा मंचीय प्रस्तुतियों में इसका पुनः उपयोग किया गया। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नई पीढ़ी के दर्शक भी इस गीत को उतनी ही रुचि से सुनते हैं। कई फिल्मों में इसके नए संस्करण बनाए गए, जिससे यह गीत लगातार चर्चा में बना रहा।

    संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि किसी गीत की दीर्घकालिक सफलता केवल उसके संगीत पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके शब्दों की गहराई और सांस्कृतिक जुड़ाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘मुंगड़ा-मुंगड़ा’ इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। वर्षों से लोगों को झूमने पर मजबूर करने वाला यह गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय लोक अभिव्यक्तियों और रचनात्मक प्रतीकों का भी एक दिलचस्प दस्तावेज है।

  • फर्जी वोटर आईडी मामले में अभिनेता प्रकाश राज की बढ़ीं मुश्किलें, अदालत में पेश नहीं होने पर जारी हुआ गैर-जमानती वारंट

    फर्जी वोटर आईडी मामले में अभिनेता प्रकाश राज की बढ़ीं मुश्किलें, अदालत में पेश नहीं होने पर जारी हुआ गैर-जमानती वारंट

    नई दिल्ली । फिल्म जगत के चर्चित अभिनेता और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए पहचाने जाने वाले प्रकाश राज एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी कोई फिल्म या सार्वजनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक कानूनी मामला है। वोटर पहचान पत्र से जुड़े एक पुराने प्रकरण में अदालत द्वारा उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने के बाद मामला चर्चा का विषय बन गया है। न्यायालय के इस कदम ने अभिनेता की कानूनी चुनौतियों को बढ़ा दिया है और अब आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

    जानकारी के अनुसार मामला कई वर्ष पुरानी शिकायत से जुड़ा हुआ है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अभिनेता के नाम पर विभिन्न राज्यों में मतदाता पहचान पत्र दर्ज हैं। भारतीय चुनावी नियमों के अनुसार किसी भी नागरिक का नाम केवल एक ही निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के नाम पर एक से अधिक स्थानों पर मतदाता पंजीकरण पाया जाता है तो यह चुनावी नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।

    इस मामले में एक शिकायतकर्ता ने संबंधित पुलिस थाने में आवेदन देकर जांच की मांग की थी। शिकायत में दावा किया गया था कि अभिनेता के पास एक से अधिक राज्यों से जुड़े मतदाता पहचान पत्र मौजूद हैं। इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई और संबंधित दस्तावेजों तथा रिकॉर्ड की पड़ताल की गई। प्रारंभिक स्तर पर उठे सवालों ने मामले को कानूनी प्रक्रिया की ओर बढ़ा दिया।

    प्रकरण न्यायालय तक पहुंचने के बाद समय-समय पर सुनवाई होती रही। हालांकि हालिया घटनाक्रम में अदालत ने अभिनेता की अनुपस्थिति को गंभीरता से लेते हुए गैर-जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी मामले में आरोपी को निर्धारित तिथि पर उपस्थित होने के निर्देश दिए जाते हैं और पर्याप्त कारण के बिना वह उपस्थित नहीं होता, तब अदालत इस प्रकार की कार्रवाई कर सकती है। गैर-जमानती वारंट का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति की न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है।

    मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। चुनावी पहचान और मतदाता पंजीकरण से जुड़े मामलों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण ऐसे मामलों में संबंधित एजेंसियां दस्तावेजों की सत्यता और नियमों के अनुपालन की विस्तृत जांच करती हैं। यदि किसी व्यक्ति के नाम पर विभिन्न स्थानों पर पंजीकरण पाया जाता है तो संबंधित रिकॉर्ड को सत्यापित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

    प्रकाश राज लंबे समय से दक्षिण भारतीय और हिंदी फिल्म उद्योग का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उन्होंने कई भाषाओं की फिल्मों में अभिनय किया है और खलनायक से लेकर चरित्र अभिनेता तक विभिन्न भूमिकाओं में अपनी पहचान बनाई है। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता भी उन्हें अक्सर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में रखती है। ऐसे में उनके खिलाफ हुई यह कानूनी कार्रवाई स्वाभाविक रूप से व्यापक ध्यान आकर्षित कर रही है।

    कानूनी जानकारों का कहना है कि गैर-जमानती वारंट जारी होना अंतिम निर्णय नहीं माना जाता, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। संबंधित व्यक्ति अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकता है और कानून के तहत उपलब्ध उपायों का उपयोग कर सकता है। मामले के तथ्यों, दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की न्यायिक प्रक्रिया तय होगी।

    फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत के आदेश के बाद आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और संबंधित पक्ष अपनी प्रतिक्रिया किस प्रकार प्रस्तुत करता है। चुनावी दस्तावेजों से जुड़े इस विवाद ने एक बार फिर मतदाता पंजीकरण प्रणाली की पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में न्यायिक प्रक्रिया के आगे बढ़ने के साथ इस मामले की तस्वीर और स्पष्ट होने की संभावना है।

  • सिनेमाई मर्यादा और सेट अनुशासन पर गंभीर सवाल: जब इंटीमेट सीन्स के दौरान नियंत्रण खो बैठे थे दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना

    सिनेमाई मर्यादा और सेट अनुशासन पर गंभीर सवाल: जब इंटीमेट सीन्स के दौरान नियंत्रण खो बैठे थे दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कलाकारों की कला और उनके किरदारों की हमेशा प्रशंसा की जाती है, लेकिन कई बार सेट पर घटित कुछ अप्रत्याशित और असहज करने वाली घटनाएं वर्षों बाद भी गंभीर चर्चाओं का विषय बन जाती हैं। सत्तर और अस्सी के दशक के शीर्ष अभिनेताओं में शुमार दिवंगत सुपरस्टार विनोद खन्ना से जुड़े कुछ पुराने विवाद इस समय गलियारों में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। एक वरिष्ठ मनोरंजन पत्रकार द्वारा हाल ही में दिए गए साक्षात्कार के अनुसार, फिल्मों में रोमांटिक और संवेदनशील दृश्यों को फिल्माते समय विनोद खन्ना अक्सर अपने अभिनय में इस कदर डूब जाते थे कि वे पूरी तरह से अपना नियंत्रण खो बैठते थे। इसका खामियाजा उनके साथ काम करने वाली समकालीन और नवोदित अभिनेत्रियों को शारीरिक और मानसिक पीड़ा के रूप में भुगतना पड़ा था।

    यह पहली बड़ी घटना फिल्म ‘प्रेम धरम’ के निर्माण के दौरान सामने आई थी, जिसका निर्देशन जाने-माने फिल्म निर्माता महेश भट्ट कर रहे थे। इस फिल्म के एक मुख्य दृश्य में विनोद खन्ना और अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया के बीच एक बेहद संवेदनशील और इंटीमेट दृश्य को फिल्माया जा रहा था। जैसे ही कैमरे ने काम करना शुरू किया, अभिनेता दृश्य के प्रभाव में इस कदर खो गए कि उन्हें आसपास के माहौल का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रहा। दृश्य की समाप्ति पर जब निर्देशक महेश भट्ट ने लाउडस्पीकर के माध्यम से बार-बार ‘कट’ बोला, तब भी विनोद खन्ना नहीं रुके। डिंपल कपाड़िया उस समय फिल्म उद्योग में बहुत नई थीं और वे निर्देशक के निर्देश और अभिनेता के इस व्यवहार के बीच पूरी तरह असमंजस में फंस गईं। आखिरकार, स्थिति को नियंत्रण से बाहर होते देख निर्देशक और सेट पर मौजूद चार-पांच क्रू सदस्यों को खुद आगे आकर दोनों को अलग करना पड़ा था।

    इसके बाद, साल 1988 में रिलीज हुई फिल्म ‘दयावान’ के सेट पर एक और अधिक गंभीर वाकया हुआ, जिसने फिल्म जगत को स्तब्ध कर दिया था। इस फिल्म में विनोद खन्ना के साथ मुख्य भूमिका में अभिनेत्री माधुरी दीक्षित थीं, जो उस समय उम्र और अनुभव में अभिनेता से काफी छोटी थीं। फिल्म के एक गीत के दौरान दोनों के बीच एक बेहद नजदीकी किसिंग सीन फिल्माया जाना तय हुआ था। इस दौरान अभिनेता ने एक बार फिर अपना आपा खो दिया और निर्देशक द्वारा दृश्य समाप्त करने की घोषणा के बाद भी वे नहीं रुके।

    यह स्थिति तब और अधिक दर्दनाक हो गई जब उत्तेजना के प्रवाह में आकर विनोद खन्ना ने सह-अभिनेत्री के होठों को दांतों से काट लिया। घाव इतना गहरा था कि माधुरी दीक्षित के होठों से तत्काल खून बहने लगा, जिसे देखकर सेट पर उपस्थित सभी लोग सन्न रह गए। इसके बाद ही अभिनेता होश में आए और पीछे हटे। इस पूरे वाकये ने युवा अभिनेत्री को गहरे मानसिक आघात में डाल दिया था। अपमान और दर्द से भरी माधुरी दीक्षित तुरंत सेट छोड़कर अपनी वैनिटी वैन में चली गईं और फूट-फूटकर रोने लगीं। इस कटु अनुभव का उनके मन पर इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने भविष्य में कभी भी फिल्मों में इस तरह के अत्यधिक इंटीमेट दृश्यों को न करने की शपथ ले ली थी। सिनेमाई सेटों पर सुरक्षा और गरिमा के लिहाज से यह ऐतिहासिक संदर्भ आज भी प्रासंगिक माना जाता है।

  • इंडस्ट्री की चमक के पीछे का कड़वा सच कैरेक्टर आर्टिस्ट्स के साथ होता है भेदभाव

    इंडस्ट्री की चमक के पीछे का कड़वा सच कैरेक्टर आर्टिस्ट्स के साथ होता है भेदभाव


    नई दिल्ली  । बॉलीवुड और टेलीविजन इंडस्ट्री की चमक दमक दूर से जितनी आकर्षक दिखाई देती है वास्तविकता उतनी ही अलग और कई बार चौंकाने वाली होती है। पर्दे पर अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों का दिल जीतने वाले कई कलाकारों को पर्दे के पीछे सम्मान और सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हाल ही में वेब सीरीज पंचायत में क्रांति देवी का किरदार निभाकर लोकप्रिय हुईं अभिनेत्री सुनीता राजवार और अभिनेता जतिन नेगी ने इंडस्ट्री के इसी कड़वे सच को सामने रखा है।

    एक बातचीत के दौरान दोनों कलाकारों ने बताया कि फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कलाकारों के साथ उनकी भूमिका और लोकप्रियता के आधार पर व्यवहार किया जाता है। जतिन नेगी का कहना है कि कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को तब तक पूरा सम्मान नहीं मिलता जब तक वे परेश रावल या अनुपम खेर जैसे बड़े नाम न बन जाएं। उन्होंने बताया कि बड़े कलाकारों को कई वैनिटी वैन और पूरा स्टाफ उपलब्ध कराया जाता है जबकि कैरेक्टर आर्टिस्ट्स को सीमित सुविधाएं मिलती हैं। कई बार उन्हें अन्य कलाकारों के साथ वैनिटी वैन साझा करनी पड़ती है।

    जतिन ने कहा कि छोटे और बैकग्राउंड कलाकारों की स्थिति और भी मुश्किल होती है। उन्हें कई कलाकारों के साथ एक ही वैन शेयर करनी पड़ती है और अक्सर बुनियादी सुविधाओं के लिए भी इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार कलाकारों को उनके काम का भुगतान 90 दिनों बाद मिलता है जिससे आर्थिक परेशानियां बढ़ जाती हैं।

    अभिनेत्री सुनीता राजवार ने भी सेट पर होने वाले भेदभाव को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि यदि कोई कलाकार लीड रोल में होता है तो पूरा सेट उसी के इर्द गिर्द घूमता है। उसे बेहतर कमरे बेहतर सुविधाएं और पूरा सहयोग मिलता है। वहीं छोटे किरदार निभाने वाले कलाकारों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई बार स्पॉटबॉय तक उन्हें महत्व नहीं देते।

    जतिन नेगी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक समय ऐसा भी था जब वह बैकग्राउंड रोल कर रहे थे और सेट पर उन्हें खाने तक के लिए संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री में कलाकारों को ए बी और सी कैटेगरी में बांट दिया जाता है। वरिष्ठ और लोकप्रिय कलाकारों के लिए अलग भोजन व्यवस्था होती है जबकि जूनियर और बैकग्राउंड कलाकारों को अलग सेक्शन में खाना दिया जाता है।

    उन्होंने एक पुराना अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक शूटिंग के दौरान उन्हें उनके गेटअप की वजह से खाने के सेक्शन में प्रवेश नहीं दिया गया। काफी देर तक समझाने और प्रोडक्शन टीम से संपर्क करने के बाद उन्हें खाना मिला। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उन्हें समाज से अलग कर दिया गया हो। इतना ही नहीं अलग-अलग कैटेगरी के कलाकारों को दिए जाने वाले खाने की गुणवत्ता में भी बड़ा अंतर होता है।

    दोनों कलाकारों का मानना है कि इंडस्ट्री में यह भेदभाव केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं है बल्कि सम्मान और व्यवहार में भी साफ दिखाई देता है। उनका कहना है कि प्रतिभा और मेहनत के आधार पर सभी कलाकारों को बराबरी का सम्मान मिलना चाहिए क्योंकि किसी भी फिल्म या शो की सफलता में हर कलाकार का योगदान महत्वपूर्ण होता है।

    इन खुलासों ने एक बार फिर मनोरंजन जगत की उस सच्चाई को सामने ला दिया है जिस पर अक्सर चर्चा कम होती है। दर्शकों के लिए पर्दे पर दिखने वाली भव्य दुनिया के पीछे कई ऐसे कलाकार हैं जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष के साथ-साथ असमानता का भी सामना कर रहे हैं।

  • 19 साल की दीया मिर्जा से सलमान खान ने कही थी ऐसी बात, आज भी नहीं भूलीं एक्ट्रेस

    19 साल की दीया मिर्जा से सलमान खान ने कही थी ऐसी बात, आज भी नहीं भूलीं एक्ट्रेस


    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा ने हाल ही में फिल्म निर्माता और कोरियोग्राफर फराह खान के व्लॉग में अपने करियर के शुरुआती दिनों से जुड़ा एक दिलचस्प और मजेदार किस्सा साझा किया। बातचीत के दौरान दीया ने न सिर्फ अपने घर और करियर की यादें ताजा कीं बल्कि सलमान खान के साथ फिल्म तुमको न भूल पाएंगे की शूटिंग के दौरान हुई एक मजेदार घटना का भी जिक्र किया।

    फराह खान अपने कुक दिलीप के साथ दीया मिर्जा के घर पहुंचीं थीं। बातचीत के दौरान दीया ने बताया कि उन्होंने यह घर अपनी शुरुआती फिल्म तुमको न भूल पाएंगे से मिली फीस से खरीदा था। उन्होंने कहा कि यह जगह उनके लिए बेहद खास है और शहर की भागदौड़ से दूर उन्हें यहां सुकून मिलता है।

    बातचीत के दौरान दोनों ने फिल्म की शूटिंग से जुड़ी पुरानी यादों को भी साझा किया। दीया ने फराह से पूछा कि क्या उन्हें वह गाना याद है जिसकी शूटिंग के दौरान लाखों लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। इस पर फराह ने बताया कि उस दौर में कलाकारों के पास आज जैसी सुविधाएं नहीं होती थीं। कई बार कलाकारों को पेड़ों के पीछे या अस्थायी जगहों पर कपड़े बदलने पड़ते थे। फराह ने हंसते हुए कहा कि सलमान खान भी बिना किसी झिझक के वहीं कपड़े बदल लिया करते थे।

    इसके बाद बातचीत का सबसे दिलचस्प हिस्सा सामने आया। जब फराह ने दीया से कहा कि उन्हें दोबारा सलमान खान के साथ काम करना चाहिए तो दीया ने एक पुराना किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि जब वह महज 19 साल की थीं तब एक शूटिंग के दौरान उन्होंने फिल्म में सलमान खान की मां का किरदार निभा रही अभिनेत्री को देखा। दीया को लगा कि वह अभिनेत्री उम्र में काफी युवा थीं और उन्होंने इस बात का जिक्र सलमान से कर दिया।

    दीया के मुताबिक उनकी बात सुनकर सलमान खान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि चिंता मत करो एक दिन तुम भी मेरी मां का रोल करोगी। सलमान की यह बात सुनकर उस समय सभी हंस पड़े थे। सालों बाद भी यह मजेदार टिप्पणी दीया को याद है और उन्होंने इसे बड़े ही हल्के अंदाज में साझा किया।

    बात को आगे बढ़ाते हुए फराह खान ने भी मजाक किया और अपने कुक दिलीप से पूछा कि क्या दीया सलमान खान की मां जैसी लगती हैं। इस पर दिलीप ने जवाब दिया कि नहीं वह तो उनकी छोटी बहन जैसी लगती हैं। दिलीप का जवाब सुनकर वहां मौजूद सभी लोग हंस पड़े।

    यह पूरा किस्सा न सिर्फ बॉलीवुड के पुराने दिनों की झलक दिखाता है बल्कि यह भी बताता है कि सेट पर कलाकारों के बीच किस तरह का दोस्ताना माहौल हुआ करता था। सलमान खान की मजाकिया शैली और दीया मिर्जा की सादगी ने इस यादगार घटना को एक बार फिर चर्चा में ला दिया।

  • राज कुमार की बेबाकी के आगे क्यों टिक गए ओम पुरी जानिए दिलचस्प किस्सा

    राज कुमार की बेबाकी के आगे क्यों टिक गए ओम पुरी जानिए दिलचस्प किस्सा


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई कलाकार अपनी मजबूत पर्सनैलिटी और बेबाक अंदाज के लिए जाने जाते रहे हैं और राज कुमार उनमें सबसे अलग माने जाते थे। उनकी छवि ऐसे अभिनेता की थी जो सेट पर किसी से भी बिना झिझक अपनी बात कह देते थे और कई बार यह बात सीधे तौर पर किसी की बेइज्जती जैसी लगती थी। लेकिन इसी इंडस्ट्री में एक ऐसा भी किस्सा सामने आता है जिसमें उनके सामने एक ऐसे अभिनेता आए जिनके बारे में कहा जाता है कि राज कुमार भी उनके सामने कुछ कहने से बच गए।

    यह कहानी जुड़ी है ओम पुरी से जिनका शुरुआती फिल्मी सफर काफी संघर्षों से भरा रहा। ओम पुरी जब इंडस्ट्री में आए तो उन्हें अपने लुक्स और साधारण पृष्ठभूमि के कारण कई तरह की टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। उस दौर में शबाना आजमी ने भी उनके लुक्स को लेकर हल्का सा कमेंट किया था जिससे उन्हें यह अहसास हुआ कि फिल्म इंडस्ट्री में स्वीकार किए जाना आसान नहीं होता।

    इसी माहौल में ओम पुरी के मन में यह डर भी बैठ गया था कि जब वे राज कुमार जैसे सख्त और बेबाक अभिनेता के साथ काम करेंगे तो शायद उन्हें भी किसी तरह की तीखी टिप्पणी सुननी पड़ सकती है। इस डर की वजह से उन्होंने मन ही मन यह तय कर लिया था कि अगर शूटिंग के दौरान कुछ अपमानजनक हुआ तो वह फिल्म बीच में ही छोड़ देंगे।

    लेकिन वास्तविकता उनके डर से बिल्कुल अलग साबित हुई। ओम पुरी की एक्स वाइफ सीमा कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया कि इंडस्ट्री में नए कलाकारों को कई बार उनके सीनियर्स द्वारा टारगेट किया जाता था और उन्हें मानसिक रूप से परेशान करने की कोशिश भी होती थी। लेकिन ओम पुरी ने अपने करियर में आगे बढ़ते हुए कभी भी किसी जूनियर के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया।

    सीमा कपूर के अनुसार जब ओम पुरी ने राज कुमार के साथ काम किया तो एक अलग ही स्थिति देखने को मिली। राज कुमार की पर्सनैलिटी और उनके अभिनय का स्तर इतना मजबूत था कि वह सामने वाले को अपने आप सम्मान देने पर मजबूर कर देता था। ओम पुरी को पूरा डर था कि शायद उनके साथ भी कुछ अपमानजनक व्यवहार होगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

    बताया जाता है कि राज कुमार ने ओम पुरी के साथ किसी तरह की बेइज्जती या तंज जैसी बात नहीं की। इसका कारण यह माना जाता है कि ओम पुरी का अभिनय और उनका गंभीर रवैया इतना प्रभावशाली था कि राज कुमार ने उनके प्रति एक अलग सम्मान बनाए रखा। यह वही दौर था जब ओम पुरी अपने काम को लेकर पूरी तरह समर्पित थे और उनकी एक्टिंग इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना रही थी।

    सीमा कपूर ने यह भी बताया कि उस समय फिल्म इंडस्ट्री में नए कलाकारों को कई तरह की मानसिक चुनौतियों से गुजरना पड़ता था लेकिन टैलेंट और आत्मविश्वास धीरे धीरे उन्हें मजबूत बनाता था। ओम पुरी ने भी इसी संघर्ष से सीखकर अपने करियर में आगे बढ़ते हुए कभी किसी के साथ गलत व्यवहार नहीं किया।

    यह किस्सा आज भी फिल्म इंडस्ट्री के उस दौर की झलक दिखाता है जब पर्सनैलिटी और टैलेंट दोनों ही किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ी ताकत होते थे।

  • फिल्मफेयर 1962 की वह रात जब दिलीप कुमार रह गए पीछे राज कपूर ने मारी बाजी

    फिल्मफेयर 1962 की वह रात जब दिलीप कुमार रह गए पीछे राज कपूर ने मारी बाजी


    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसे मौके आए जब दर्शकों की पसंद और अवॉर्ड के फैसलों में अंतर देखने को मिला। ऐसा ही एक यादगार किस्सा साल 1962 के फिल्मफेयर अवॉर्ड से जुड़ा है। उस समय दिलीप कुमार और राज कपूर दोनों ही अपने करियर के शिखर पर थे और दोनों की फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी थी। यह मुकाबला केवल दो कलाकारों के बीच नहीं था बल्कि दो अलग अलग तरह की फिल्मों और सोच के बीच भी था।

    साल 1961 में दिलीप कुमार की फिल्म गंगा जमुना ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की। इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ मुख्य भूमिका निभाई बल्कि इसकी कहानी और पटकथा में भी योगदान दिया। यह फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित थी और इसमें भाईचारे सामाजिक संघर्ष और पारिवारिक भावनाओं को गहराई से दिखाया गया था। दिलीप कुमार ने गंगा नाम के किरदार में ऐसा अभिनय किया जिसे आज भी उनके सबसे मजबूत प्रदर्शनों में गिना जाता है। वैजयंती माला ने भी इस फिल्म में अहम भूमिका निभाई और कहानी को और प्रभावशाली बनाया। यह फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही और इसे आलोचकों की भी खूब सराहना मिली।

    इसी दौरान राज कपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है भी चर्चा में थी। इस फिल्म में राज कपूर ने राजू नाम के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया था जो अनाथ होता है और बाद में डाकुओं के समूह में पहुंच जाता है। कहानी में वह देखता है कि यह समूह अमीरों से लूटकर गरीबों की मदद करता है। धीरे धीरे उसका नजरिया बदलता है और वह अहिंसा और सुधार की राह पर चलता है। इस फिल्म का सामाजिक संदेश बहुत मजबूत था और यह आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई।

    जब फिल्मफेयर अवॉर्ड 1962 में घोषणा हुई तो सभी को उम्मीद थी कि बेस्ट एक्टर का पुरस्कार दिलीप कुमार को मिलेगा क्योंकि गंगा जमुना को एक मास्टरपीस माना जा रहा था। लेकिन नतीजा चौंकाने वाला रहा और यह अवॉर्ड राज कपूर को मिल गया। उनके किरदार की सामाजिक न्याय की भावना और बदलाव की कहानी को निर्णायक माना गया। उस समय जूरी ने माना कि राज कपूर का किरदार समाज में सकारात्मक संदेश देने वाला था और यही उन्हें बढ़त दिला गया।

    इस फैसले ने फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक चर्चा पैदा की। एक तरफ दिलीप कुमार की गहरी भावनात्मक अभिनय शैली थी और दूसरी तरफ राज कपूर का सामाजिक संदेश से भरा चरित्र था। अंत में पुरस्कार उस किरदार को मिला जिसने सामाजिक बदलाव की सोच को दर्शाया।

    यह घटना आज भी बॉलीवुड इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में याद की जाती है जब कला की श्रेष्ठता केवल अभिनय से नहीं बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से भी तय हुई।

  • वेलकम टू द जंगल में सेंसर की बड़ी कार्रवाई, अक्षय कुमार की फिल्म में लगे 18 कट, बना अनोखा रिकॉर्ड

    वेलकम टू द जंगल में सेंसर की बड़ी कार्रवाई, अक्षय कुमार की फिल्म में लगे 18 कट, बना अनोखा रिकॉर्ड


    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार की आगामी फिल्म ‘वेलकम टू द जंगल’ रिलीज से पहले ही चर्चा में आ गई है। इस फिल्म में सेंसर बोर्ड ने कुल 18 बदलाव किए हैं, जिसके बाद यह अक्षय कुमार के करियर की अब तक की सबसे ज्यादा सेंसर की गई फैमिली कॉमेडी फिल्म बन गई है। फिल्म में किए गए ये बदलाव डायलॉग्स से लेकर कुछ दृश्यों तक फैले हुए हैं।

    रिपोर्ट्स के अनुसार सेंसर बोर्ड ने फिल्म में मौजूद कई डबल मीनिंग डायलॉग्स को हटाने या बदलने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा कुछ संवेदनशील संदर्भ, जिनमें कश्मीर से जुड़े जिक्र भी शामिल बताए जा रहे हैं, उन्हें भी संशोधित किया गया है। फिल्म के कुछ हिस्सों में अभिनेत्री दिशा पाटनी और जैकलीन फर्नांडिस के बिकिनी सीन्स पर भी सेंसर की नजर पड़ी है, जहां क्लोजअप शॉट्स को हटाया गया या एडिट किया गया है।

    यह पहली बार नहीं है जब अक्षय कुमार की फिल्मों पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली हो। इससे पहले उनकी फिल्म ‘ओह माय गॉड 2’ में भी 27 कट लगाए गए थे। उस फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला था और बाद में यह बॉक्स ऑफिस पर सफल रही थी। वहीं ‘भूत बंगला’ में भी 5 कट किए गए थे, जिनमें कुछ एडल्ट या डबल मीनिंग कंटेंट शामिल थे।

    इसके अलावा ‘बच्चन पांडे’ और ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ जैसी फिल्मों में भी मामूली स्तर पर कट्स किए गए थे, लेकिन ‘वेलकम टू द जंगल’ इस मामले में खास इसलिए बन गई है क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा 18 बदलाव दर्ज किए गए हैं।

    फिल्म के निर्देशक अहमद खान हैं और यह फिल्म 26 जून को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। पहले ही फ्रेंचाइजी की लोकप्रियता को देखते हुए फिल्म से काफी उम्मीदें जुड़ी हैं। हालांकि सेंसर बोर्ड द्वारा किए गए इन बदलावों का असर फिल्म की कहानी और प्रस्तुति पर कितना पड़ेगा, यह रिलीज के बाद ही साफ हो सकेगा।

    फिलहाल यह फिल्म सिर्फ अपनी स्टारकास्ट या कॉमेडी के लिए नहीं, बल्कि सेंसर रिकॉर्ड के कारण भी सुर्खियों में बनी हुई है।

  • ट्रेजेडी क्वीन की असली कहानी पिता ने बचपन छीना कमाई ली और फिर उसी बेटी के लिए बंद कर दिया घर का दरवाजा

    ट्रेजेडी क्वीन की असली कहानी पिता ने बचपन छीना कमाई ली और फिर उसी बेटी के लिए बंद कर दिया घर का दरवाजा


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की दुनिया में ट्रेजेडी क्वीन के नाम से मशहूर मीना कुमारी ने अपनी अदाकारी से करोड़ों दिलों पर राज किया। पर्दे पर उनके आंसुओं ने दर्शकों को भावुक किया लेकिन उनकी असली जिंदगी का दर्द किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। जिस बेटी ने अपने परिवार को गरीबी से निकालकर सम्मान और सुख सुविधाओं से भरी जिंदगी दी उसी बेटी को एक दिन उसके पिता ने अपने ही घर से बेघर कर दिया था।

    साल 1933 में मुंबई के दादर इलाके की एक साधारण चाल में जन्मी माहजबीन बानो का बचपन अभावों और संघर्षों के बीच बीता। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल था। कहा जाता है कि जन्म के बाद हालात इतने कठिन थे कि उनके पिता ने उन्हें एक अनाथालय के बाहर छोड़ दिया था हालांकि बाद में वे उन्हें वापस घर ले आए। लेकिन गरीबी का दबाव लगातार परिवार पर बना रहा।

    जब माहजबीन मात्र चार साल की थीं तब उनके पिता ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए भेज दिया। वह स्कूल जाना चाहती थीं और सामान्य बच्चों की तरह खेलना कूदना चाहती थीं लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म लेदर फेस से उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत की और पहली बार 25 रुपये की कमाई की। यही वह शुरुआत थी जिसने आगे चलकर पूरे परिवार की तस्वीर बदल दी।

    समय के साथ माहजबीन फिल्मों की दुनिया में पहचान बनाने लगीं। उनकी कमाई बढ़ी और परिवार की आर्थिक परेशानियां दूर होने लगीं। धीरे धीरे उनकी बहनें भी फिल्मों में काम करने लगीं और परिवार चाल से निकलकर बांद्रा के एक बेहतर घर में रहने लगा। हालांकि आर्थिक स्थिति बदलने के बावजूद घर का माहौल नहीं बदला। बेटियों की जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार अब भी परिवार के मुखिया के पास ही था।

    यही वह दौर था जब माहजबीन की जिंदगी में निर्देशक कमाल अमरोही आए। दोनों एक दूसरे के करीब आए और उन्होंने चुपचाप शादी कर ली। माहजबीन जानती थीं कि उनके पिता इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए उन्होंने इस विवाह को लंबे समय तक छिपाकर रखा। लेकिन जब यह राज खुला तो परिवार में बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

    हालात उस समय और बिगड़ गए जब मीना कुमारी ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध कमाल अमरोही की फिल्म में काम करने का फैसला किया। पिता को यह मंजूर नहीं था। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपनी ही बेटी के लिए घर के दरवाजे बंद कर दिए। विडंबना यह थी कि जिस घर से उन्हें निकाला गया था वह उनकी मेहनत और कमाई से ही खरीदा गया था।

    घर छोड़ते समय मीना कुमारी ने अपने पिता को एक भावुक पत्र लिखा। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें घर से अपने कपड़ों और किताबों के अलावा कुछ नहीं चाहिए। यहां तक कि अपनी कार भी वापस भेजने की बात कही। यह पत्र उनकी संवेदनशीलता और परिवार के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

    मीना कुमारी ने अपने पूरे जीवन में परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं लेकिन जब उनकी अपनी जिंदगी कठिन दौर से गुजरी तो वह काफी हद तक अकेली रहीं। शायद यही वजह थी कि पर्दे पर उनका दर्द इतना वास्तविक लगता था। बैजू बावरा परिणीता साहिब बीबी और गुलाम तथा पाकीजा जैसी कालजयी फिल्मों में उनका अभिनय आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित है। उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि त्याग संघर्ष और दर्द से भरे उस जीवन की कहानी है जिसने भारतीय सिनेमा को अमूल्य विरासत दी।