Category: International

  • रूसी तेल ले जा रहे टैंकर ने अचानक लिया यू-टर्न, अब चीन नहीं भारत आएगा; क्यों बदला रास्ता?

    रूसी तेल ले जा रहे टैंकर ने अचानक लिया यू-टर्न, अब चीन नहीं भारत आएगा; क्यों बदला रास्ता?


    तेहरान। दुनियाभर में ईंधन आपूर्ति को लेकर मचे हाहाकार के बीच रूसी तेल को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक एक रूसी तेल से भरा टैंकर, जो चीन की तरफ बढ़ रहा था, दक्षिण चीन सागर में अपना रास्ता बदलकर अब तेजी से भारत की ओर बढ़ रहा है। ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक ‘एक्वा टाइटन’ 21 मार्च को न्यू मैंगलोर तट पर पहुंचने वाला है।
    यह टैंकर अपने साथ ‘यूराल’ तेल का कार्गो ला रहा है, जिसे जनवरी के आखिर में बाल्टिक सागर के एक बंदरगाह से लोड किया गया था।

    जानकारी के मुताबिक यह जहाज शुरुआत में चीन के रिझाओ पोर्ट की तरफ जा रहा था। लेकिन हाल ही में इसने अपनी मंजिल बदल ली। वहीं ‘वॉर्टेक्सा लिमिटेड’ के मुताबिक रूस से तेल ले जा रहे कम से कम सात टैंकर ने सफर के बीच में ही चीन की बजाय भारत की ओर मुड़ गए हैं।

    इसके अलावा ट्रैकिंग डेटा से यह भी पता चला है कि ‘स्वेज़मैक्स ज़ूज़ू एन.’ जहाज ने भारत के सिक्का बंदरगाह को अपनी अगली मंजिल बताया है और यह 25 मार्च को यहां पहुंच सकता है। यह टैंकर कजाखस्तान का कच्चा तेल ले जा रहा है।
    होर्मुज प्रभावी रूप से बंद

    यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद सबसे अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावी रूप से बंद हो गया है।

    अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान से इस रास्ते से जहाजों को ना गुजरने की धमकी दी है। बता दें कि इस रास्ते से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 से 25 फीसदी हिस्सा गुजरता है।
    रिफाइनर हुए सक्रिय

    जानकारी के मुताबिक यह मार्ग बाधित होने और अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीदने की ‘छूट’ मिलने के बाद भारत के सभी प्रमुख रिफाइनर रूसी कच्चे तेल को खरीदने के लिए सक्रिय हो गए हैं। भारतीय रिफाइनरियों ने बीते कुछ दिनों में रूस से करीब 30 मिलियन बैरल तेल खरीदा है। इससे पहले भारत ने स्पष्ट किया है कि वह ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अन्य स्रोतों के विकल्प भी तलाश रहा है और देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा।

  • मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत

    मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत



    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच हालात और गंभीर होते नजर आ रहे हैं। Iran, United States और Israel के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच अब संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका बड़ा कदम उठा सकता है, जिससे जंग और फैलने की आशंका बढ़ गई है।

    19 दिन से जारी भीषण टकराव
    पिछले करीब तीन हफ्तों से जारी संघर्ष में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के शीर्ष ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाया, वहीं ईरान ने जवाब में इजरायल और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं।

    हाल ही में ईरान ने Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates के तेल-गैस ठिकानों को भी निशाना बनाया, जिससे युद्ध का दायरा और बढ़ गया है।

    हजारों अमेरिकी सैनिक भेजने की तैयारी
    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर विचार कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का प्लान तैयार किया जा रहा है, ताकि ईरान के खिलाफ ऑपरेशन को और मजबूत किया जा सके।

    क्या है अमेरिका की रणनीति?
    सूत्रों के अनुसार, सैनिकों की तैनाती से अमेरिका को कई सैन्य विकल्प मिल सकते हैं। इनमें सबसे अहम है Strait of Hormuz में तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना।

    यह मिशन मुख्य रूप से एयरफोर्स और नेवी के जरिए चलाया जा सकता है। हालांकि कुछ विकल्प ऐसे भी हैं, जिनमें ईरान के तटीय इलाकों के पास सैनिकों की तैनाती की बात सामने आई है।

    खतरनाक योजना: खर्ग द्वीप पर नजर
    अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि Kharg Island पर जमीनी सेना भेजने के विकल्प पर चर्चा हुई है।

    यह द्वीप ईरान के लगभग 90% तेल निर्यात का केंद्र है, इसलिए यहां कोई भी सैन्य कार्रवाई बेहद संवेदनशील और जोखिम भरी मानी जा रही है। ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता इसे और खतरनाक बना देती है।

    राजनीतिक जोखिम भी कम नहीं
    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैनिकों की सीधी तैनाती Donald Trump के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है।

    अमेरिकी जनता में इस युद्ध को लेकर समर्थन सीमित है

    ट्रंप पहले ही मिडिल ईस्ट में नए युद्ध से दूर रहने का वादा कर चुके हैं

    हाल में एक अमेरिकी अधिकारी ने नाराजगी जताते हुए इस्तीफा भी दिया है

    इसके अलावा, इस संघर्ष में अब तक 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत और करीब 200 के घायल होने की खबर है।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के संभावित सैन्य कदम हालात को और विस्फोटक बना सकते हैं। यदि सैनिकों की तैनाती होती है, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

  • कतर ने दिए ईरान के सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों को मुल्क छोड़ने के निर्देश

    कतर ने दिए ईरान के सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों को मुल्क छोड़ने के निर्देश


    तेहरान।
    ईरानी हमलों (Iranian attacks) के खिलाफ अब मिडिल ईस्ट (Middle East) के देश कार्रवाई शुरू कर चुके हैं। अब कतर (Qatar) ने ईरान के सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों को मुल्क छोड़ने के निर्देश दे दिए हैं। इसके लिए 24 घंटों का समय दिया गया है। अमेरिका और इजरायल (America and Israel) से युद्ध के बीच खाड़ी देशों में हमले करने को लेकर ईरान पहले ही कई मुल्कों के निशाने पर आ चुका है। खबर है कि सऊदी अरब की राजधानी रियाद में मुस्लिम देशों की बड़ी बैठक भी होने वाली है।

    कतर के विदेश मंत्रालय ने लिखा, ‘कतर के विदेश मंत्रालय ने देश में स्थित इस्लामी गणराज्य ईरान के दूतावास को एक आधिकारिक नोट सौंपा है। इसमें कहा गया है कि कतर, दूतावास के सैन्य अताशे (Military Attache) और सुरक्षा अताशे (Security Attache) के साथ-साथ इन दोनों कार्यालयों के समस्त स्टाफ को ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ घोषित करता है। कतर ने मांग की है कि ये सभी अधिकारी अधिकतम 24 घंटे के भीतर देश छोड़कर चले जाएं।’


    क्या होता है पर्सोना नॉन ग्राटा

    डिप्लोमेसी के लिहाज से जब कोई देश किसी विदेशी अधिकारी या अधिकारियों को अपने यहां रहने की अनुमति देने से मना कर देता है या उसे देश छोड़ने का आदेश देता है, तो उसे ‘persona non grata’ घोषित किया जाता है।

    हमले से नाराज होकर उठाया कदम
    मंत्रालय ने कहा कि ईरान की तरफ से बार-बार कतर को निशाना बनाने और कतर राज्य के खिलाफ किए गए खुले आक्रमण के जवाब में लिया गया है, जिसने कतर की संप्रभुता और सुरक्षा का उल्लंघन किया है। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2817 और अच्छे पड़ोस के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।

    चेतावनी भी दे दी
    कतर ने साफ किया है कि ईरान अगर इस तरह का रवैया जारी रखता है, तो आगे और भी कड़े उपाय किए जाएंगे। साथ ही कहा, ‘कतर अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रावधानों के अनुसार अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता है।’

    ईरान ने दी कतर समेत कई देशों को धमकी
    ईरान ने अपने ‘गैस फील्ड’ पर हमले के बाद धमकी दी है कि वह कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE ) में तेल और गैस के बुनियादी ढांचे पर हमला करेगा। हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब ईरान ने धमकी जारी की हो। ईरान ने विशेष रूप से सऊदी अरब की ‘समरेफ रिफाइनरी’ और उसके ‘जुबैल पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स’ को निशाना बनाने की धमकी दी है। उसने संयुक्त अरब अमीरात के ‘अल हसन गैस फील्ड’ और कतर में स्थित पेट्रोकेमिकल संयंत्रों तथा एक रिफाइनरी पर भी हमले की धमकी दी है।

  • समुद्र से आसमान तक एक्शन, अमेरिका ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर बरसाए भारी बम

    समुद्र से आसमान तक एक्शन, अमेरिका ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर बरसाए भारी बम

    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंचता नजर आ रहा है जब अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमला किया है यह कार्रवाई ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत की जा रही है जिसे अब और तेज कर दिया गया है

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM के अनुसार इन हमलों में भारी क्षमता वाले बमों का इस्तेमाल किया गया जो मजबूत और सुरक्षित ठिकानों को भी तबाह करने में सक्षम हैं ये मिसाइल ठिकाने ईरान के तटीय इलाके में स्थित थे और यहां तैनात एंटी शिप मिसाइलें अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए बड़ा खतरा बन रही थीं

    होर्मुज स्ट्रेट जिसे वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग माना जाता है इस समय अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार और तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है

    रिपोर्ट्स के मुताबिक इस अभियान के दौरान अमेरिकी नौसेना और वायुसेना ने सैकड़ों लड़ाकू उड़ानें भरी हैं अब तक 28 फरवरी से शुरू हुए इस ऑपरेशन में 7000 से ज्यादा लक्ष्यों पर हमले किए जा चुके हैं और 6500 से अधिक लड़ाकू उड़ानें भरी जा चुकी हैं

    हमलों में कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया है जिनमें बैलिस्टिक मिसाइल साइट एंटी शिप मिसाइल ठिकाने IRGC के मुख्यालय एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य संचार नेटवर्क शामिल हैं

    अमेरिका ने इस अभियान में अपनी अत्याधुनिक सैन्य ताकत का व्यापक इस्तेमाल किया है जिसमें बी 1 बी 2 और बी 52 जैसे बमवर्षक विमान एफ 22 और एफ 35 जैसे फाइटर जेट ड्रोन और निगरानी विमान शामिल हैं इसके अलावा समुद्र में परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत पनडुब्बियां और मिसाइल से लैस युद्धपोत तैनात किए गए हैं

    जमीन पर भी पैट्रियट और थाड जैसे उन्नत मिसाइल रक्षा सिस्टम के साथ रॉकेट आर्टिलरी और एंटी ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे साफ है कि यह ऑपरेशन हवा जमीन और समुद्र तीनों स्तरों पर एक साथ चलाया जा रहा है

    इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की स्थिति और भी संवेदनशील बनी रह सकती है

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज स्ट्रेट और तेल-एलएनजी आयात की चुनौतियां

    भारत की ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज स्ट्रेट और तेल-एलएनजी आयात की चुनौतियां


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। भारत अपनी सीक्रेट डिप्लोमेसी और रणनीतिक कदमों के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने की कोशिशों में लगा है। हालात ऐसे हैं कि अमेरिका को नाटो देशों से अपील करनी पड़ रही है कि होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने के लिए युद्धपोत भेजें।

    भारत ने इस चुनौती के बीच भी अपने दो तेल टैंकर शिप्स को होर्मुज स्ट्रेट से निकालकर भारतीय समुद्री तट पर पहुंचा दिया है जबकि कई अन्य शिप्स की वापसी की संभावना बनी हुई है। भारत लगभग 85-89 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है और इसमें से पहले लगभग 55 फीसदी तेल होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता था। अब यह आंकड़ा लगभग 70 फीसदी तक बढ़ गया है। भारत की दैनिक तेल खपत लगभग 55 लाख बैरल है और यह तेल लगभग 40 देशों से आयात किया जाता है।

    भारत का कच्चा तेल मुख्य रूप से रूस इराक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से आता है। इसके अलावा अमेरिका से तेल आयात बढ़ा है। खाड़ी और मिडिल ईस्ट में कुवैत कतर ओमान और मिस्र; अफ्रीका में नाइजीरिया अंगोला लीबिया और अल्जीरिया; अमेरिका महाद्वीप में कनाडा मेक्सिको और ब्राजील; मिडिल एशिया में कजाकिस्तान और अजरबैजान भारत के तेल आपूर्तिकर्ता हैं।

    प्राकृतिक गैस की बात करें तो भारत की कुल खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है जिसमें से घरेलू उत्पादन 97.5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है। अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण लगभग 47.4 मिलियन घन मीटर की आपूर्ति प्रभावित हुई है।

    रसोई गैस में भारत लगभग 60 फीसदी आयात पर निर्भर है। इस आयात का करीब 90 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है। हालात प्रभावित होने के बावजूद घरेलू एलपीजी उत्पादन में 25 फीसदी की वृद्धि कर इसे संतुलित किया गया है। भारत मुख्य रूप से कतर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से एलपीजी आयात करता है जबकि अमेरिका भी इस सूची में शामिल हो गया है।

    एलएनजी में भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता कतर है जिससे कुल एलएनजी का 47-50 फीसदी आता है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात ओमान नाइजीरिया अंगोला ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से भी एलएनजी आती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट इसलिए इतना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दुनिया के तेल और गैस व्यापार का मुख्य मार्ग है। यदि यहां किसी तरह की बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और तेल व गैस की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

    भारत ने रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक मार्गों के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय और द्विपक्षीय सहयोग के जरिए भारतीय समुद्री शिप्स को सुरक्षित मार्ग मुहैया कराया जा रहा है।

  • अमेरिका ने होर्मुज के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमला किया, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तेज

    अमेरिका ने होर्मुज के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमला किया, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तेज


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर नए हमले किए हैं। अमेरिकी सेना के अधिकारियों के अनुसार ये ठिकाने अंतरराष्ट्रीय जहाजों और समुद्री व्यापार के लिए खतरा बन रहे थे। यह कार्रवाई ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत की जा रही है और अब इसे और तेज कर दिया गया है।

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड सेंटकॉम ने बताया कि इन हमलों में भारी वजन वाले बमों का इस्तेमाल किया गया जो मजबूत और सुरक्षित ठिकानों को भी नष्ट करने में सक्षम हैं। ये मिसाइल ठिकाने ईरान के तटीय इलाके में होर्मुज स्ट्रेट के पास स्थित थे और यहां तैनात एंटी शिप मिसाइलें गुजरने वाले जहाजों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही थीं।

    सेंटकॉम ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी नौसेना के विमानों ने सैकड़ों लड़ाकू उड़ानें भरी हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका समुद्र से भी अपनी हवाई ताकत बनाए रखने में सक्षम है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस अभियान में अब तक 7,000 से ज्यादा लक्ष्यों पर हमला किया जा चुका है जिसमें बैलिस्टिक मिसाइल साइट एंटी शिप मिसाइल ठिकाने आईआरजीसी मुख्यालय एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य संचार से जुड़े सिस्टम शामिल हैं।

    इसके अलावा अब तक 100 से ज्यादा ईरानी जहाजों को नुकसान पहुंचाया गया या नष्ट कर दिया गया है जबकि अमेरिकी सेना ने 6,500 से अधिक लड़ाकू उड़ानें पूरी कर ली हैं। इस अभियान में अमेरिका ने हवा जमीन और समुद्र तीनों मोर्चों पर अपनी ताकत का इस्तेमाल किया है। बी 1 बी 2 और बी 52 जैसे बमवर्षक एफ 22 और एफ 35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट निगरानी विमान और ड्रोन इस ऑपरेशन का हिस्सा रहे। समुद्र में परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत पनडुब्बियां और मिसाइल से लैस युद्धपोत तैनात किए गए हैं।

    जमीन पर पैट्रियट और थाड जैसे मिसाइल रक्षा सिस्टम रॉकेट आर्टिलरी और ड्रोन निवारक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे साफ है कि ऑपरेशन कई स्तरों पर एक साथ चलाया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार विशेष रूप से एंटी शिप मिसाइल ठिकानों पर ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया में तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। यदि यहां कोई बाधा आती है तो इसका असर वैश्विक व्यापार और तेल बाजार पर पड़ सकता है।

    ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने साफ कर दिया है कि अमेरिका ईरानी ठिकानों और उनके समुद्री खतरों को गंभीरता से ले रहा है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई न केवल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की रक्षा के लिए भी अहम है।

  • भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने की नाकाम कोशिश: म्यांमार के विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे थे विदेशी नागरिक, दिल्ली से कोलकाता तक NIA की बड़ी कार्रवा

    भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने की नाकाम कोशिश: म्यांमार के विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे थे विदेशी नागरिक, दिल्ली से कोलकाता तक NIA की बड़ी कार्रवा


    नई दिल्ली। भारत की आंतरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA ने एक सनसनीखेज अंतरराष्ट्रीय साजिश का पर्दाफाश किया है। एनआईए ने म्यांमार में जातीय विद्रोही समूहों को हथियारों की आपूर्ति, आतंकी सामग्री और सैन्य प्रशिक्षण देने के गंभीर आरोपों में सात विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए आरोपियों में एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक और यूक्रेन के छह नागरिक शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इस कार्रवाई को अंजाम देते हुए तीन यूक्रेनी नागरिकों को देश की राजधानी दिल्ली, तीन को लखनऊ और अमेरिकी नागरिक मैथ्यू को कोलकाता से हिरासत में लिया है।

    एनआईए द्वारा विशेष अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, ये सभी आरोपी वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन इनका असली मकसद बेहद खतरनाक था। जांच में सामने आया है कि ये आरोपी मिजोरम के रास्ते म्यांमार पहुंचे, जहाँ उन्होंने उन जातीय संघर्ष समूहों से संपर्क साधा जो भारत में सक्रिय प्रतिबंधित विद्रोही संगठनों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने यूरोप से भारत के रास्ते ड्रोन की एक बड़ी खेप म्यांमार पहुंचाई और वहां विद्रोहियों को एके-47 राइफलों जैसे घातक हथियारों का प्रशिक्षण दिया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए माना कि यह कोई सामान्य अपराध नहीं है और प्रथम दृष्टया गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा-18 के तहत आतंकी साजिश का मामला बनता है, जिसके बाद सातों आरोपियों को 11 दिन की एनआईए रिमांड पर भेज दिया गया है।

    इस हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारी के बाद कूटनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। यूक्रेन सरकार ने अपने नागरिकों की गिरफ्तारी पर कड़ा ऐतराज जताते हुए भारत को आधिकारिक विरोध पत्र (Note Verbale) सौंपा है। भारत में यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से मुलाकात कर अपने नागरिकों की तत्काल रिहाई और उनसे मिलने की अनुमति मांगी है। वहीं, गिरफ्तार अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक का प्रोफाइल बेहद संदिग्ध बताया जा रहा है; वह पूर्व में लीबिया, सीरिया और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों में शामिल रह चुका है। एनआईए अब इस बात की तह तक जाने की कोशिश कर रही है कि इस पूरी साजिश के पीछे किन अंतरराष्ट्रीय ताकतों का हाथ है और भारत की सुरक्षा को इससे कितना बड़ा खतरा हो सकता था।

  • ईरान युद्ध के बीच अमेरिका में गैस कीमतें बढ़ीं, ट्रंप के लिए बढ़ी राजनीतिक चुनौती

    ईरान युद्ध के बीच अमेरिका में गैस कीमतें बढ़ीं, ट्रंप के लिए बढ़ी राजनीतिक चुनौती


    नई दिल्ली । अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध अब सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है बल्कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के घरेलू राजनीतिक भविष्य को भी प्रभावित करने लगा है। युद्ध के तीसरे सप्ताह में ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ा जिससे अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें तेज़ी से बढ़ीं और औसत कीमत एक महीने में 2.94 डॉलर से बढ़कर 3.72 डॉलर प्रति गैलन हो गई।

    महंगाई और जीवनयापन की लागत पहले से ही अमेरिकी मतदाताओं की चिंता का बड़ा कारण हैं। बढ़ती गैस कीमतें ट्रंप प्रशासन के अफोर्डेबिलिटी एजेंडा पर भी दबाव डाल रही हैं। विशेषज्ञ क्लिफर्ड यंग के अनुसार यह स्थिति राष्ट्रपति की घरेलू रणनीति को प्रभावित कर सकती है और उनकी लोकप्रियता पर असर डाल सकती है।

    सैन्य मोर्चे पर ट्रंप प्रशासन ने जापान से लगभग 5 000 सैनिकों और नाविकों वाली मरीन उभयचर इकाई को मध्य पूर्व भेजने का आदेश दिया है। यह कदम अमेरिका को सैन्य विकल्प खुले रखने की दिशा में देखा जा रहा है लेकिन इससे क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को लेकर जोखिम भी बढ़ सकता है।

    ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते खतरे के बीच इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की अपील की। उन्होंने चीन फ्रांस जापान दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन से इसमें शामिल होने का अनुरोध किया। हालांकि कई यूरोपीय देश और ऑस्ट्रेलिया इस पहल में शामिल होने से इन्कार कर चुके हैं।

    व्यक्तिगत और राजनीतिक मोर्चे पर ट्रंप ने अप्रैल में प्रस्तावित चीन यात्रा को युद्ध के कारण एक महीने के लिए टाल दिया। व्हाइट हाउस प्रेस सचिव ने बताया कि कमांडर-इन-चीफ के रूप में राष्ट्रपति की सर्वोच्च जिम्मेदारी ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की सफलता सुनिश्चित करना है।

    इस बीच ट्रंप युद्ध को लेकर सार्वजनिक रूप से दबाव में नहीं दिखते। सोमवार रात उन्होंने एक घंटे से अधिक लंबे संबोधन में युद्ध के अलावा केनेडी सेंटर के नवीनीकरण व्हाइट हाउस बॉलरूम निर्माण वर्ल्ड कप और अन्य घरेलू मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा की।

    अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य में यह स्थिति ट्रंप के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है। युद्ध लंबा खिंचता है और ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो यह उनके कार्यकाल और आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं।

  • ट्रंप बोले पागलों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं ; ईरान युद्ध अभी लंबा खिंच सकता है

    ट्रंप बोले पागलों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं ; ईरान युद्ध अभी लंबा खिंच सकता है


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध अब और लंबा चल सकता है। वॉशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दुनिया पागलों के नियंत्रण में परमाणु हथियार नहीं रहने दे सकती। ट्रंप ने बताया कि अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई करके यह सुनिश्चित किया कि यह देश कभी परमाणु खतरा न बने।

    28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। ट्रंप ने बताया कि बिना इस कार्रवाई के ईरान पहले ही परमाणु ताकत बन चुका होता। उन्होंने कहा कि उस समय ईरान परमाणु हथियार हासिल करने से सिर्फ दो हफ्ते दूर था और कूटनीतिक बातचीत काम नहीं आती।

    राष्ट्रपति ने कहा युद्ध बहुत अच्छे से आगे बढ़ रहा है। हम बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि यह संघर्ष कब तक चलेगा। ट्रंप ने यह भी बताया कि अमेरिका भविष्य में लौट सकता है लेकिन अब तक मकसद यह सुनिश्चित करना था कि किसी और राष्ट्रपति को ऐसी परेशानी न झेलनी पड़े।

    इस बीच ट्रंप प्रशासन को अंदरूनी झटका भी लगा है। नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के प्रमुख जोसेफ केंट ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई के विरोध में इस्तीफा दे दिया। केंट ने सोशल मीडिया पर अपने त्याग पत्र में लिखा कि अमेरिका पर ईरान की ओर से कोई आसन्न खतरा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह युद्ध इज़रायल और उसके प्रभावशाली लॉबी समूहों के दबाव में शुरू किया गया। केंट ने साफ शब्दों में कहा कि वह अपनी अंतरात्मा के खिलाफ इस युद्ध का समर्थन नहीं कर सकते।

    इस इस्तीफे के समय ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि ईरान संकट न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बल्कि अमेरिकी प्रशासन के अंदर भी गंभीर बहस का विषय बन गया है।

  • समलैंगिक हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा? सुनकर हंस पड़े ट्रंप

    समलैंगिक हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा? सुनकर हंस पड़े ट्रंप


    वॉशिंगटन/तेहरान।
     अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े एक नए विवाद ने चर्चा छेड़ दी है। एक रिपोर्ट में मोजतबा खामेनेई की निजी जिंदगी को लेकर सनसनीखेज दावे किए गए हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    New York Post की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक खुफिया ब्रीफिंग में यह जानकारी दी गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस इनपुट पर ट्रंप ने हैरानी जताई, लेकिन इस पर उनकी कथित प्रतिक्रिया को लेकर भी कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

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  • खुफिया दावों पर भरोसे को लेकर सवाल
    रिपोर्ट में कुछ अनाम सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि यह जानकारी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों तक पहुंची और इसे “कुछ हद तक विश्वसनीय” माना गया। हालांकि, किसी भी एजेंसी या सरकार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि खुफिया इनपुट अक्सर अपुष्ट या प्रारंभिक स्तर के होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक तौर पर सत्य मान लेना उचित नहीं होता।

    कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं
    रिपोर्ट में किए गए दावों-जैसे व्यक्तिगत संबंध या विदेश में इलाज-के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड या स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं कराई गई है।

    ईरान के कानून और संवेदनशीलता
    ईरान में समलैंगिकता कानूनन अपराध है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। ऐसे में इस तरह के आरोप न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।

    मौजूदा हालात में यह मामला अधिकतर अपुष्ट रिपोर्ट्स और अनाम सूत्रों पर आधारित नजर आता है। ऐसे में इसे तथ्य की तरह नहीं, बल्कि एक विवादित दावे के रूप में ही देखा जा रहा है।