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  • RSP नेता बालेंद्र शाह होंगे नेपाल के नए PM, 27 मार्च को लेंगे पद की शपथ….

    RSP नेता बालेंद्र शाह होंगे नेपाल के नए PM, 27 मार्च को लेंगे पद की शपथ….


    काठमांडो।
    नेपाल (Nepal) में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) (Rashtriya Swatantra Party (RSP)) के वरिष्ठ नेता बालेंद्र शाह (Balendra Shah) 27 मार्च को प्रधानमंत्री (Prime Minister) पद की शपथ लेंगे। एक दिन पहले सांसदों को शपथ दिलाई जाएगी। 5 मार्च को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में आरएसपी ने 182 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। पार्टी ने चुनाव से पहले ही बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

    आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने, वरिष्ठ नेता शाह तथा उपाध्यक्ष द्वय डीपी अर्याल और स्वर्णिम वाग्ले के बीच हुई बैठक में शपथ की तारीख तय की गई। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पीएम पद की शपथ से पहले 26 मार्च को संघीय संसद सचिवालय ने 26 मार्च को दोपहर 2 बजे सांसदों के शपथ ग्रहण का कार्यक्रम तय है। इसके तुरंत बाद आरएसपी सरकार गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।


    अस्थायी हॉल में होगा शपथ ग्रहण

    संघीय संसद सचिवालय के प्रवक्ता एकराम गिरी के अनुसार सिंहदरबार परिसर के भीतर निर्माणाधीन नए संसद भवन के पूरी तरह तैयार न होने के कारण शपथ ग्रहण समारोह अस्थायी हॉल में होगा। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम स्थल पर माइक्रोफोन, प्रकाश व्यवस्था और अन्य आवश्यक आधारभूत संरचनाओं की स्थापना का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।


    नेपाल निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति पौडेल को आज सौंपेगा अंतिम चुनाव नतीजे

    नेपाल के निर्वाचन आयोग ने कहा है कि वह शुक्रवार दोपहर को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को चुनाव के अंतिम नतीजे पेश करेगा। प्रतिनिधि सभा के चुनाव पांच मार्च, 2026 को हुए, जिसमें 275 सदस्यीय निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) के लिए मतदान हुआ। निचले सदन में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को 182 सीटें, नेपाली कांग्रेस को 38 सीटें, सीपीएन-यूएमएल को 25, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को 17, श्रम संस्कृति पार्टी को सात और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को पांच सीटें मिली हैं।

    निचले सदन के 275 सदस्यों में से 165 सदस्य प्रत्यक्ष मतदान द्वारा और 110 सदस्य आनुपातिक मतदान द्वारा चुने जाते हैं। आरएसपी ने साधारण बहुमत यानी 138 सीटों से अधिक सीटें हासिल कर ली हैं। पार्टी को दो-तिहाई बहुमत से के लिए केवल दो सीटों की जरूरत है। राष्ट्रपति नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करेंगे।


    हार के बाद गगन थापा का कांग्रेस सभापति पद से इस्तीफा

    नेपाली कांग्रेस के सभापति गगन कुमार थापा ने प्रतिनिधि सभा चुनाव में पार्टी की करारी हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बुधवार को उन्होंने अपना त्यागपत्र पार्टी के उपसभापति विश्वप्रकाश शर्मा को सौंपा। थापा इसी वर्ष 15 जनवरी को विशेष महाधिवेशन के जरिये सभापति निर्वाचित हुए थे। 5 मार्च को हुए चुनावों में कांग्रेस ने बदला कांग्रेस, बदलेगा देश के नारे के साथ थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

    हालांकि, पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। खुद गगन थापा भी सर्लाही-4 सीट से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार अमरेश कुमार सिंह से चुनाव हार गए। इस हार के बाद पार्टी के भीतर शेरबहादुर देउवा गुट लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहा था। पार्टी विधान के अनुसार, थापा का इस्तीफा शुक्रवार को होने वाली केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में पेश किया जाएगा।

  • ईरान के हमले से कतर की LNG निर्यात क्षमता 17% खत्म… 20 अरब डॉलर का नुकसान

    ईरान के हमले से कतर की LNG निर्यात क्षमता 17% खत्म… 20 अरब डॉलर का नुकसान


    दोहा।
    कतर के गैस प्लांट (Qatar’s Gas Plant) पर हुए हालिया ईरानी हमलों (Iranian attacks) ने देश की तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG निर्यात क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इस हमले के कारण कतर की 17 प्रतिशत एलएनजी निर्यात क्षमता (LNG Export Capacity) तबाह हो गई है, जिससे उत्पादन अगले पांच वर्षों तक ठप रहने की आशंका है। देश की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी कतरएनर्जी के सीईओ साद अल-काबी के अनुसार, इन हमलों से सालाना लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है।


    वैश्विक गैस संकट बढ़ेगा

    इस नुकसान ने यूरोप और एशिया भर में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए सीधा और गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। यह हमला खाड़ी देशों के तेल और गैस संयंत्रों पर हमलों की एक अभूतपूर्व श्रृंखला का हिस्सा है। ईरान ने यह कदम तब उठाया जब इजरायल ने उसके (ईरान के) गैस बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया था।


    बुनियादी ढांचे को हुआ भारी नुकसान

    हमलों में कतर की प्रमुख गैस सुविधाओं को सटीक रूप से निशाना बनाया गया। कतर की 14 ‘एलएनजी ट्रेनों’ में से दो पूरी तरह प्रभावित हुई हैं। इसकी दो गैस-टू-लिक्विड (GTL) सुविधाओं में से एक को निशाना बनाया गया है। अल-काबी ने स्पष्ट किया कि बुनियादी ढांचे को हुए इस भारी नुकसान की मरम्मत करने और प्रति वर्ष 12.8 मिलियन टन एलएनजी क्षमता को फिर से बहाल करने में कम से कम तीन से पांच साल का समय लगेगा।

    साद अल-काबी ने हमले के समय और इसके स्रोत (ईरान) पर गहरी निराशा और अविश्वास व्यक्त किया। उन्होंने इस हमले के क्षेत्रीय निहितार्थों की ओर इशारा करते हुए कहा: मैंने अपने सबसे बुरे सपनों में भी नहीं सोचा था कि कतर और इस क्षेत्र पर इस तरह का हमला होगा, खासकर रमजान के पवित्र महीने में एक भाईचारे वाले मुस्लिम देश द्वारा हम पर इस तरह से हमला किया जाएगा।


    सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट पर ‘फोर्स मेजर’ का संकट

    इस भारी व्यवधान ने सरकारी स्वामित्व वाली कतरएनर्जी को इटली, बेल्जियम, दक्षिण कोरिया और चीन को होने वाली एलएनजी आपूर्ति के दीर्घकालिक कॉन्ट्रैक्ट पर ‘फोर्स मेजर’ घोषित करने पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। यहां ‘फोर्स मेजर’ का मतलब अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण अनुबंध पूरा न कर पाने से है। अल-काबी ने बताया कि छोटी अवधि के लिए ‘फोर्स मेजर’ पहले ही घोषित किए जा चुके थे, लेकिन बुनियादी ढांचे के नुकसान की गंभीरता को देखते हुए अब इसे लंबी अवधि के लिए लागू करना पड़ेगा।


    साझेदारों और अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव

    इस हमले का असर केवल कतर तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशी निवेशकों और गैस के अन्य उप-उत्पादों पर भी पड़ा है।

    एक्सॉनमोबिल का नुकसान: अमेरिकी तेल दिग्गज कंपनी एक्सॉनमोबिल प्रभावित बुनियादी ढांचे में एक प्रमुख भागीदार है। इसकी एलएनजी ट्रेन S4 में 34 प्रतिशत और ट्रेन S6 में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

    अन्य निर्यातों में भारी गिरावट: एलएनजी क्षेत्र के अलावा, कतर के कंडेनसेट निर्यात में 24 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। वहीं, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) के उत्पादन में 13 प्रतिशत, हीलियम के उत्पादन में 14 प्रतिशत, और नेफ्था व सल्फर दोनों के उत्पादन में 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

    क्षतिग्रस्त इकाइयों के निर्माण की लागत पर बात करते हुए अल-काबी ने अनुमान लगाया कि इन्हें बनाने में लगभग 26 बिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च आया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि मरम्मत और उत्पादन का काम तभी फिर से शुरू हो सकता है जब यह युद्ध और संघर्ष पूरी तरह से समाप्त हो जाए।


    प्राकृतिक गैस की कीमतों में उछाल; ब्रेंट क्रूड 116.38 डॉलर

    ईरान के कतर में एक प्रमुख प्राकृतिक गैस सुविधा और दो तेल रिफाइनरी पर हमले के बाद वैश्विक बाजार में तेल एवं प्राकृतिक गैस की कीमतों में बृहस्पतिवार को तेज उछाल आया। कतर की यह गैस सुविधा दुनिया की करीब पांचवें हिस्से की गैस की आपूर्ति करती है। इन हमलों से यह आशंका बढ़ गई है कि टैंकर यातायात के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से उत्पन्न ऊर्जा संकट अपेक्षा से अधिक लंबा एवं व्यापक हो सकता है जिससे तेल एवं गैस उत्पादन को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत बढ़कर 116.38 डॉलर प्रति बैरल हो गई, जो युद्ध से पहले 73 डॉलर प्रति बैरल से कम थी। प्राकृतिक गैस की कीमतों के यूरोपीय टीटीएफ मानक में बृहस्पतिवार को 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

  • ब्रिटेन, फ्रांस समेत छह देश होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में मदद को तैयार, कतर ने ईरान से की युद्ध रोकने की अपील

    ब्रिटेन, फ्रांस समेत छह देश होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में मदद को तैयार, कतर ने ईरान से की युद्ध रोकने की अपील


    लंदन/मस्कट।
    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स और जापान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित नौवहन सुनिश्चित करने के लिए मदद की पेशकश की है। इन देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि वे क्षेत्र में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही में शामिल होने को तैयार हैं।

    साथ ही बयान में इन देशों ने ईरान के हालिया हमलों की निंदा की और उसे तुरंत रोकने की अपील की। उन्होंने कहा कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के लिए तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने वाले देशों के साथ मिलकर काम किया जाएगा। बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि जरूरत पड़ने पर अन्य कदम भी उठाए जाएंगे, ताकि तेल सप्लाई पर असर कम किया जा सके।

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते खतरे के कारण वैश्विक ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हो रही है और तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।

    कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने भी युद्ध तुरंत खत्म करने की अपील की। उन्होंने ईरान से अनुरोध किया कि वह अपने हमले रोके और संघर्ष को और न बढ़ाए।

    अल थानी ने विशेष रूप से रास लफ्फान गैस प्लांट पर हुए हमले का जिक्र किया और कहा कि इससे स्पष्ट है कि ईरान अब ऊर्जा ठिकानों को निशाना बना रहा है, जो न केवल कतर बल्कि पूरी दुनिया के लिए अहम हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे हमलों का असर दुनियाभर के लाखों लोगों पर पड़ेगा, क्योंकि इससे ऊर्जा सप्लाई प्रभावित होगी।

    उल्लेखनीय है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा की कमजोरी से अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। संयुक्त बयान और कतर की चेतावनी इस बात का संकेत हैं कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सुरक्षा और कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत बढ़ गई है।

    इस पहल से उम्मीद जताई जा रही है कि बड़े देशों की मदद और कतर की चेतावनी मिलकर क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकती है और वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने में योगदान दे सकती है।

  • इजरायल, मध्य पूर्व, रियाद बैठक, इस्लामिक देश, कतर, UAE, अंतरराष्ट्रीय कानून, सैन्य तनाव, वैश्विक राजनीति

    इजरायल, मध्य पूर्व, रियाद बैठक, इस्लामिक देश, कतर, UAE, अंतरराष्ट्रीय कानून, सैन्य तनाव, वैश्विक राजनीति


    नई दिल्ली। ईरान और इजरायल के बीच जारी तनावपूर्ण संघर्ष अब पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। इसी बीच 12 अरब और इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान से हमले तुरंत रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने की अपील की है।

    सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुई बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में इन देशों ने ईरान की सैन्य कार्रवाई की कड़ी निंदा की। बयान जारी करने वाले देशों में अजरबैजान बहरीन मिस्र जॉर्डन कुवैत लेबनान पाकिस्तान कतर सऊदी अरब सीरिया तुर्किए और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।

    विदेश मंत्रियों ने आरोप लगाया कि ईरान ने रिहायशी इलाकों तेल सुविधाओं एयरपोर्ट डीसेलिनेशन प्लांट और राजनयिक परिसरों को निशाना बनाया जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। उन्होंने खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते हमलों पर गहरी चिंता जताई और कहा कि इससे क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

    संयुक्त बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान ने कतर और यूएई के ऊर्जा ढांचे पर हमला किया। कतर के रास लफ्फान इंडस्ट्रियल सिटी को निशाना बनाए जाने के बाद वहां आग लगने की खबरें सामने आईं जबकि सऊदी अरब में बैलिस्टिक मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया गया।

    कतर ने इस हमले को अपनी संप्रभुता का खुला उल्लंघन बताया और कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी दूतावास के सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों को “पर्सोना नॉन ग्राटा” घोषित कर दिया। उन्हें 24 घंटे के भीतर देश छोड़ने का निर्देश दिया गया। कतर ने कहा कि यह कदम उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक था।

    संयुक्त बयान में यह भी चेतावनी दी गई कि ईरान के साथ भविष्य के संबंध इस बात पर निर्भर करेंगे कि वह अन्य देशों की संप्रभुता का सम्मान करता है या नहीं। विदेश मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और सैन्य दबाव की नीति स्वीकार नहीं की जाएगी।

    इस बीच ईरानी मीडिया ने अमेरिका और इजरायल पर उसके तेल और गैस उत्पादन केंद्रों पर हमले का आरोप लगाया है जिससे हालात और अधिक जटिल हो गए हैं। कुल मिलाकर मध्य पूर्व में बढ़ता यह तनाव अब क्षेत्रीय संघर्ष का रूप लेता जा रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार शांति और संयम की अपील कर रहा है।

  • अमेरिकी हमलों से कमजोर हुआ ईरान, लेकिन खतरा बरकरार: इंटेलिजेंस एजेंसियों की चेतावनी

    अमेरिकी हमलों से कमजोर हुआ ईरान, लेकिन खतरा बरकरार: इंटेलिजेंस एजेंसियों की चेतावनी


    वॉशिंगटन। हाल ही में हुए अमेरिकी सैन्य अभियानों के बाद ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमताओं को बड़ा झटका लगा है लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने सीनेट को जानकारी देते हुए कहा है कि ईरानी शासन कमजोर जरूर हुआ है पर अब भी क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिकी हितों के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।

    अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने सीनेट सिलेक्ट इंटेलिजेंस कमेटी को बताया कि हमलों के चलते ईरान की पारंपरिक सैन्य ताकत काफी हद तक प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य शक्ति प्रदर्शित करने की क्षमता कमजोर पड़ी है जिससे उसके विकल्प सीमित हो गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी सरकार अभी कायम है और समय के साथ अपनी सैन्य ताकत फिर से खड़ी करने की क्षमता रखती है।

    CIA के निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान लंबे समय से अमेरिका के लिए खतरा रहा है और वर्तमान में यह खतरा और अधिक तात्कालिक हो गया है। उन्होंने ईरान की मिसाइल और स्पेस लॉन्च तकनीक को लेकर चिंता जताई और कहा कि यदि इसे बिना रोक-टोक जारी रहने दिया गया तो भविष्य में ईरान के पास पूरे अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइल क्षमता हो सकती है।

    इंटेलिजेंस असेसमेंट के मुताबिक ईरान और उसके सहयोगी संगठन मध्य पूर्व में लगातार अमेरिकी हितों को निशाना बना रहे हैं। तुलसी गबार्ड ने बताया कि ईरान के प्रॉक्सी समूह क्षेत्र में सक्रिय हैं और समय-समय पर हमले करते रहते हैं।

    हालांकि सैन्य नुकसान के बावजूद ईरान की आंतरिक स्थिति पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ने से देश के भीतर तनाव जरूर बढ़ सकता है लेकिन शासन अभी भी स्थिर बना हुआ है।

    अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी कहा कि हाल के ऑपरेशनों जैसे ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने ईरान की न्यूक्लियर और मिसाइल क्षमताओं को बाधित किया है। इसके बावजूद सीनेटरों ने सवाल उठाया कि क्या ईरान से खतरा पूरी तरह खत्म हुआ है या नहीं।

    कुल मिलाकर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि ईरान को भले ही सैन्य झटका लगा हो लेकिन वह अभी भी एक बड़ा रणनीतिक खतरा बना हुआ है और भविष्य में अपनी ताकत फिर से खड़ी कर सकता है।

  • ईरान युद्ध के बीच अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण 39 ट्रिलियन डॉलर पार, आम नागरिकों पर बढ़ सकता है दबाव

    ईरान युद्ध के बीच अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण 39 ट्रिलियन डॉलर पार, आम नागरिकों पर बढ़ सकता है दबाव


    नई दिल्ली । ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका पर दोहरे आर्थिक दबाव की चिंता बढ़ गई है। एक तरफ युद्ध पर लगातार बढ़ता खर्च है तो दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण रिकॉर्ड स्तर 39 ट्रिलियन डॉलर पार कर गया है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका इस्राइल और ईरान के बीच टकराव जारी है।

    सरकारी जवाबदेही कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ता ऋण सीधे अमेरिकी नागरिकों पर असर डाल सकता है। इसका मतलब है घर कार और अन्य जरूरतों के लिए लोन महंगे हो सकते हैं निजी व्यवसायों के पास निवेश की रकम घट सकती है जिससे मजदूरी में कमी आए और वस्तुएं व सेवाएं महंगी हो सकती हैं। संतुलित बजट के समर्थक चेतावनी देते हैं कि उच्च उधारी और बढ़ते ब्याज भुगतान की प्रवृत्ति भविष्य में आम अमेरिकियों को कठिन वित्तीय निर्णय लेने पर मजबूर करेगी।

    पीटर जी. पीटरसन फाउंडेशन के अध्यक्ष माइकल पीटरसन ने कहा कि इस तरह की ऋण वृद्धि से अगली पीढ़ी पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। उनके अनुसार अगर यही रफ्तार जारी रही तो इस शरद ऋतु के चुनावों से पहले राष्ट्रीय ऋण 40 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस के आर्थिक सलाहकार केविन हैसेट के मुताबिक ईरान युद्ध पर अब तक लगभग 12 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं और यह स्पष्ट नहीं कि संघर्ष कब समाप्त होगा।

    ऋण में तेजी केवल वर्तमान प्रशासन तक सीमित नहीं है। संघीय ऋण रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों के कार्यकाल में बढ़ा है और हाल के वर्षों में युद्ध महामारी राहत पैकेज और कर कटौती ने इसे और बढ़ावा दिया है। पांच महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण 38 ट्रिलियन और दो महीने पहले 37 ट्रिलियन डॉलर था जिससे पता चलता है कि यह तेजी से बढ़ रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के साथ साथ बढ़ते राष्ट्रीय ऋण ने अमेरिका की आर्थिक स्थिरता पर गंभीर दबाव डाल दिया है। आने वाले समय में सरकार को यह संतुलन बनाना होगा कि सुरक्षा खर्च और आर्थिक स्थिरता के बीच कैसे फैसले लिए जाएं ताकि आम नागरिकों पर असर कम से कम पड़े।

  • ईरान और सऊदी टकराव से बढ़ेगा परमाणु युद्ध का खतरा! पाकिस्तान की हो सकती है एंट्री

    ईरान और सऊदी टकराव से बढ़ेगा परमाणु युद्ध का खतरा! पाकिस्तान की हो सकती है एंट्री


    रियाद। मिडिल ईस्ट में ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां एक हमला पूरे क्षेत्र को ज्वालामुखी की तरह हिला सकता है। ईरान ने सऊदी अरब, कतर और UAE के प्रमुख तेल-गैस ठिकानों को खाली करने की चेतावनी दी है। इससे स्पष्ट है कि यह केवल मिसाइल और ड्रोन हमलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगे का चेन रिएक्शन पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है।

    ईरान का खतरनाक कदम

    इजरायल ने हाल ही में ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया था। इसके जवाब में ईरान ने कतर के गैस फील्ड को निशाना बनाया। UAE की एक गैस फील्ड को मलबा गिरने के कारण खाली करना पड़ा। सऊदी अरब ने भी मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने का दावा किया है। इस जंग का सबसे बड़ा डर अब केवल हमला नहीं, बल्कि इसके बाद होने वाले प्रभाव और देशों की संभावित भागीदारी को लेकर है।

    सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौता और न्यूक्लियर छतरी

    सऊदी और पाकिस्तान के बीच साल 2022 में द्विपक्षीय रक्षा समझौता हुआ था। मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी विश्लेषक सलमान अल-अंसारी का कहना है कि अगर सऊदी पूरी ताकत के साथ जंग में उतरता है, तो पाकिस्तान को अपने द्विपक्षीय समझौते के तहत मदद करनी होगी। इसमें सैन्य सहायता के साथ ‘न्यूक्लियर छतरी’ यानी परमाणु सुरक्षा का भी जिक्र किया गया है। इसे NATO के आर्टिकल-5 से जोड़कर देखा जा रहा है, यानी सऊदी पर हमला पाकिस्तान को भी सक्रिय करने का दबाव पैदा कर सकता है।

    ईरान की प्रतिक्रिया और पाकिस्तान की दुविधा

    हाल के हफ्तों में सऊदी अरब ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना किया है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसकी जमीन का इस्तेमाल सऊदी या उसके सहयोगियों के खिलाफ नहीं किया जाएगा। पाकिस्तान इस समय सऊदी का करीबी सहयोगी है, लेकिन खाड़ी देशों से उसकी तेल और गैस पर निर्भरता भी काफी अधिक है। साथ ही, पाकिस्तान ईरान के साथ पाइपलाइन प्रोजेक्ट में भी शामिल है, जो अमेरिका के दबाव के कारण पूरी नहीं हो पाई।

    हाल ही में पाकिस्तान का ‘द कराची’ जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकला, जिसे ईरान के साथ समझौते के तहत माना जा रहा है। अगर सऊदी अरब सीधे जंग में उतरता है, तो पाकिस्तान के जहाजों और संसाधनों पर हमले का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं पाकिस्तान अफगानिस्तान में भी फंसा हुआ है, जिससे उसकी भूमिका और जटिल बन रही है।

    संभावित वैश्विक खतरा

    विश्लेषकों का कहना है कि अगर सऊदी अरब सीधे इस संघर्ष में शामिल होता है और पाकिस्तान भी इसमें एंट्री करता है, तो यह संघर्ष केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। क्षेत्रीय टकराव बड़े पैमाने पर फैल सकता है और इससे वर्ल्ड वार 3 जैसी वैश्विक स्थिति बनने की आशंका भी जताई जा रही है।

  • ईरान ने कतर की गैस फैसिलिटी पर किया मिसाइल हमला, भारत में LPG महंगा होने का खतरा

    ईरान ने कतर की गैस फैसिलिटी पर किया मिसाइल हमला, भारत में LPG महंगा होने का खतरा


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष अब सीधे ऊर्जा अवसंरचना पर बढ़ते हमलों की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में ईरान ने कतर की अहम गैस फैसिलिटी रास लाफान पर मिसाइल हमला किया, जिससे आग लगी और ढांचागत नुकसान हुआ। इस हमले के बाद वैश्विक गैस और तेल बाजार में हलचल मच गई है।

    ईरान का एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला

    ईरान ने इस कदम के जरिए इजरायल पर साउथ पार्स गैस फील्ड पर हुए हमले का बदला लेना शुरू किया। मिसाइल हमले से कतर की प्रमुख LNG लिक्विफाइड नेचुरल गैस उत्पादन सुविधाएं प्रभावित हुईं और रास लाफान कॉम्प्लेक्स ने तुरंत अपना उत्पादन रोक दिया। इसके अलावा ईरान ने सऊदी अरब और यूएई में तेल और गैस ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी भी दी है।

    कतर के गैस हब पर आग और नुकसान

    रास लाफान कॉम्प्लेक्स, कतर की सबसे महत्वपूर्ण गैस सुविधाओं में से एक है। इस हमले से वैश्विक ऊर्जा मार्केट में अनिश्चितता बढ़ गई है। इससे साफ संकेत मिलता है कि यह संघर्ष अब केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरा बन गया है।

    भारत पर असर क्यों होगा

    भारत अपनी गैस जरूरतों का करीब 47% हिस्सा कतर से आयात करता है। सालाना 27 मिलियन टन LNG में से लगभग 12-13 मिलियन टन कतर से आती है। रास लाफान पर हमले के कारण भारत को गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा होर्मुज जलसंधि में बढ़ता तनाव पहले से ही भारत के गैस टैंकरों की आवाजाही में बाधा डाल रहा है।

    एलपीजी और घरेलू गैस की कीमतें बढ़ने का खतरा

    भारत में घरेलू एलपीजी रसोई गैस का बड़ा हिस्सा LNG पर आधारित है। अगर कतर की गैस फैसिलिटी लंबे समय तक ठप रही, तो भारत को दूसरी जगह से महंगी गैस खरीदनी पड़ सकती है। इसका असर सीधे सिलेंडर की कीमतों पर और आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

    अनिश्चित भविष्य और बढ़ता जोखिम
    विश्लेषकों के मुताबिक, यदि ईरान के हमले जारी रहे और रास लाफान पूरी तरह बंद हो जाए, तो गैस और तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर और बढ़ सकती हैं। भारत की मिडिल ईस्ट पर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बढ़ता जोखिम बनती जा रही है। आम जनता पर इसका असर आने वाले महीनों में घरेलू गैस और पेट्रोल-डीजल के महंगे होने के रूप में दिख सकता है।

  • मिडिल ईस्ट में सैन्य ताकत बढ़ाने की तैयारी में ट्रंप, ईरान को लेकर क्या है अगला कदम?

    मिडिल ईस्ट में सैन्य ताकत बढ़ाने की तैयारी में ट्रंप, ईरान को लेकर क्या है अगला कदम?


    नई दिल्ली। अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। हाल ही में इजरायली हमले में ईरान के सुरक्षा सचिव अली लारीजानी की मौत के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं। इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मिडिल-ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी को बड़े स्तर पर बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं।

    न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार ट्रंप आगामी रणनीति के तहत हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती कर सकते हैं। अमेरिकी अधिकारियों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य क्षेत्र में अमेरिका की स्थिति को और मजबूत करना है।

    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बताया कि प्रशासन मिडिल-ईस्ट में चल रहे अभियानों को मजबूती देने के लिए बड़े पैमाने पर सैनिक भेजने की योजना पर विचार कर रहा है। हालांकि अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप ने फिलहाल जमीनी सेना भेजने का फैसला नहीं किया है लेकिन सभी विकल्प खुले रखे गए हैं।

    बताया जा रहा है कि अतिरिक्त सैन्य तैनाती के जरिए अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग से गुजरने वाले टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। इसके लिए हवाई और नौसैनिक संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है साथ ही ईरान की तटरेखा के पास जमीनी सैनिकों की तैनाती भी संभव है।

    इसके अलावा अमेरिकी अधिकारी ईरान के खार्ग द्वीप पर भी नजर बनाए हुए हैं जहां से देश के लगभग 90 प्रतिशत तेल का निर्यात होता है। हालांकि इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य कार्रवाई को बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है क्योंकि ईरान मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए इसे आसानी से निशाना बना सकता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ईरान के यूरेनियम भंडार पर नियंत्रण पाने की रणनीति भी बना रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा कोई भी ऑपरेशन अमेरिकी विशेष बलों के लिए काफी कठिन और खतरनाक साबित हो सकता है।

  • ईद पर थमेगा संघर्ष: पाकिस्तान-अफगानिस्तान ने किया अस्थायी सीजफायर का ऐलान

    ईद पर थमेगा संघर्ष: पाकिस्तान-अफगानिस्तान ने किया अस्थायी सीजफायर का ऐलान

    । ईद-उल-फितर के मौके पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी तनाव को लेकर राहत भरी खबर आई है। दोनों देशों ने सऊदी अरब, तुर्किये और कतर की अपील पर सीमित अवधि के लिए संघर्ष विराम (सीजफायर) लागू करने की घोषणा की है।
    ईद के मद्देनजर लिया गया फैसला
    पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने बताया कि उनके देश ने चल रहे सैन्य अभियान ‘गजब-लिल-हक’ के बीच अस्थायी विराम का फैसला किया है। यह निर्णय ईद-उल-फितर को ध्यान में रखते हुए और मित्र इस्लामी देशों के अनुरोध पर लिया गया है।

    कब तक रहेगा सीजफायर लागू
    यह संघर्ष विराम 18/19 मार्च की मध्यरात्रि से शुरू होकर 23/24 मार्च की मध्यरात्रि तक प्रभावी रहेगा। हालांकि पाकिस्तान ने साफ किया है कि अगर इस दौरान सीमा पार से हमला, ड्रोन अटैक या आतंकी गतिविधि होती है, तो कार्रवाई तुरंत फिर शुरू कर दी जाएगी।

    अफगानिस्तान ने भी रोकी सैन्य कार्रवाई
    पाकिस्तान की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद अफगानिस्तान की ओर से भी जवाब आया।

    सरकार के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने कहा कि ईद के अवसर पर सुरक्षा बलों को रक्षात्मक अभियानों को अस्थायी रूप से रोकने का निर्देश दिया गया है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी खतरे की स्थिति में जवाबी कार्रवाई की जाएगी।

    हमलों के बाद बढ़ा तनाव
    यह सीजफायर ऐसे समय में सामने आया है जब अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर काबुल स्थित एक पुनर्वास केंद्र पर हमले का आरोप लगाया है। अफगान अधिकारियों का दावा है कि इस हमले में 400 से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।

    वहीं पाकिस्तान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसके हमले केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए थे और नागरिक हताहतों के आंकड़े भ्रामक हैं।

    सामूहिक अंतिम संस्कार की खबरें
    अफगानिस्तान में हमलों के बाद बड़ी संख्या में मृतकों का सामूहिक अंतिम संस्कार किए जाने की जानकारी सामने आई है। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक, भारी मशीनों की मदद से कब्रें खोदकर पीड़ितों को दफनाया गया। हालांकि मृतकों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो पाई है।

    संयुक्त राष्ट्र की कड़ी प्रतिक्रिया
    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (UNHCHR) ने इस घटना पर चिंता जताते हुए निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है।

    संगठन ने कहा है कि हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और पीड़ितों को न्याय व मुआवजा मिलना चाहिए।

    ईद के मौके पर घोषित यह अस्थायी सीजफायर भले ही कुछ दिनों की राहत दे, लेकिन दोनों देशों के बीच गहराते अविश्वास और हालिया हमलों ने क्षेत्र में तनाव को गंभीर बना दिया है।