Category: International

  • बड़ी सफलता…. 24 घंटे में होर्मुज से नहीं निकला कोई जहाज, लेकिन भारत के 2 LPG टैंकरों को मिली अनुमति

    बड़ी सफलता…. 24 घंटे में होर्मुज से नहीं निकला कोई जहाज, लेकिन भारत के 2 LPG टैंकरों को मिली अनुमति


    तेहरान।
    मिडिल ईस्ट में जंग (Middle East War) के बीच ईरान (Iran) ने सबसे अहम माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को ‘बंद’ कर रखा है। वह होर्मुज से चंद जहाजों को ही जाने की अनुमति दे रहा है, जबकि अन्य को मिसाइलों से समुद्र की तलहटी में डुबो दे रहा। इस बीच, शुक्रवार को पिछले 24 घंटे से ईरान ने होर्मुज से किसी भी देश के जहाज को निकलने नहीं दिया है, लेकिन इसके बावजूद भी भारत (India) को बड़ी सफलता मिली है। दो भारतीय एलपीजी टैंकरों (Two Indian LPG tankers) को इस स्ट्रेट को पार करने की अनुमति मिल गई है।

    न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने शिपिंग डेटा और सूत्रों के हवाले से बताया है कि यात्राओं में आए ठहराव के बाद, भारतीय झंडे वाले लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) के दो टैंकर आने वाले दिनों में होर्मुज से गुजरने की तैयारी कर रहे हैं। एजेंसी ने कहा, ”पिछले 24 घंटों में इस जलमार्ग से कोई भी कच्चा तेल टैंकर नहीं गुजरा है।” ईरान द्वारा उन जहाजों पर हमला करने की धमकी दिए जाने के बाद से सैकड़ों जहाजों ने लंगर डाल दिया है, जो होर्मुज के रास्ते खाड़ी से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे। इसी स्ट्रेट से दुनिया के लगभग 20 फीसदी तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का प्रवाह होता है।

    Kpler के डेटा और शिपिंग सूत्रों के अनुसार, ये दोनों टैंकर इस समय खाड़ी के पानी में लंगर डाले हुए हैं। शुक्रवार को सूत्रों से मिले बाजार के आकलन के अनुसार, और उपलब्ध डेटा के आधार पर, पिछले 24 घंटों में इस जलमार्ग से कच्चे तेल के टैंकरों की कोई यात्रा नहीं हुई है। एक अलग डेटा से पता चला कि 18 मार्च को, अमेरिका के प्रतिबंधों की मार झेल रहा एक खाली कच्चे तेल का टैंकर, ईरानी जलक्षेत्र की ओर लौट गया था।

    शुक्रवार को MarineTraffic के जहाज-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि भारतीय झंडे वाले LPG टैंकर ‘पाइन गैस’ और ‘जग वसंत’ ने संकेत दिया है कि वे यात्रा की तैयारी कर रहे हैं। भारत के केंद्रीय शिपिंग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने शुक्रवार को पूछे जाने पर कि क्या ये जहाज यात्रा की तैयारी कर रहे हैं, कहा कि इस बारे में तत्काल कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।


    एलपीजी सप्लाई में बनी हुई है कमी

    एलपीजी की सप्लाई में कमी शुक्रवार को लगातार तीसरे हफ्ते भी जारी रही। हालांकि सिलेंडर भरवाने को लेकर बुकिंग में कुछ कमी आई है जो स्थिति के धीरे-धीरे सामान्य होने के संकेत हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे माल की आपूर्ति में बाधा बनी रहने से होटल सहित व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति प्रतिबंध जारी हैं जिससे चिंता बनी हुई है। अमेरिका तथा इजरायल के ईरान पर हमलों और उसके जवाबी कार्रवाई करने से शुरू हुए युद्ध के कारण होर्मुज बंद हो गया है, जो एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इसके जरिये भारत अपने आयात का 60 प्रतिशत प्राप्त करता है। इतनी बड़ी मात्रा में आपूर्ति अचानक बंद होने से सरकार ने घरेलू रसोई के लिए आपूर्ति को प्राथमिकता दी है। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को आपूर्ति शुरू में पूरी तरह रोक दी गई थी लेकिन बाद में उनकी जरूरत का पांचवां हिस्सा बहाल किया गया।

  • दबाव के आगे नहीं झुका श्रीलंका अमेरिका को लैंडिंग से इनकार ईरानी जहाज को दी मानवीय मदद

    दबाव के आगे नहीं झुका श्रीलंका अमेरिका को लैंडिंग से इनकार ईरानी जहाज को दी मानवीय मदद

    नई दिल्ली:ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच श्रीलंका ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने हिंद महासागर क्षेत्र की कूटनीति को नया मोड़ दे दिया है। श्रीलंका ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी सैन्य टकराव का हिस्सा नहीं बनेगा और अपनी तटस्थ नीति पर कायम रहेगा। इसी नीति के तहत उसने अमेरिका के दो लड़ाकू विमानों को अपने यहां उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

    श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में खुलकर बताया कि अमेरिका ने 4 और 8 मार्च को दो बार अनुरोध किया था कि जिबूती स्थित अपने सैन्य अड्डे से उड़ान भरने वाले फाइटर जेट्स को दक्षिणपूर्व स्थित मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरने दिया जाए। इन विमानों में एंटी शिप मिसाइलें लगी हुई थीं जिससे स्थिति और संवेदनशील हो गई थी। राष्ट्रपति ने कहा कि भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद श्रीलंका ने इस मांग को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि वह किसी भी सैन्य कार्रवाई का मंच नहीं बनेगा।

    यह फैसला ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। 4 मार्च को अमेरिका की एक पनडुब्बी ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर टॉरपीडो हमला किया था। यह हमला श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 80 किलोमीटर दूर हुआ जिसमें बड़ी संख्या में ईरानी नौसैनिक मारे गए। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया।

    हमले के तुरंत बाद श्रीलंका ने मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए तेजी से रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। श्रीलंकाई नौसेना और वायुसेना ने मौके पर पहुंचकर शवों को बरामद किया और घायलों को बचाया। उन्हें गाले में इलाज के लिए ले जाया गया। बाद में मृतकों के शव पूरे सम्मान के साथ ईरान भेजे गए।

    इसी बीच एक अन्य ईरानी जहाज IRIS Bushehr ने तकनीकी खराबी का हवाला देते हुए श्रीलंका से मदद मांगी। श्रीलंका ने इसे भी पूरी तरह मानवीय आधार पर सहायता दी लेकिन सुरक्षा कारणों से उसे सीधे कोलंबो में प्रवेश नहीं दिया गया। पहले उसे समुद्र में रोका गया और बाद में त्रिंकोमाली की ओर निर्देशित किया गया। इस दौरान कई ईरानी नौसैनिकों को अस्थायी रूप से श्रीलंका में शरण भी दी गई।

    राष्ट्रपति दिसानायके ने संसद में दो टूक कहा कि मध्य पूर्व में चल रहा युद्ध पूरी दुनिया के लिए चुनौती है लेकिन श्रीलंका किसी पक्ष में खड़ा होकर अपने हितों को खतरे में नहीं डालेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका देश स्वतंत्र विदेश नीति पर चलता रहेगा और किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।

    यह घटनाक्रम हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन को दर्शाता है जहां छोटे देश भी अब अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती से स्थापित कर रहे हैं। श्रीलंका का यह कदम न सिर्फ उसकी तटस्थता का संकेत है बल्कि यह भी दिखाता है कि वह मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

  • उत्तर कोरियाः ‘सुप्रीम पीपल्स असेंबली’ के चुनाव में किम जोंग उन की पार्टी के सभी सदस्य जीते

    उत्तर कोरियाः ‘सुप्रीम पीपल्स असेंबली’ के चुनाव में किम जोंग उन की पार्टी के सभी सदस्य जीते


    नई दिल्ली।
     उत्तर कोरिया के चुनाव में मौजूदा तानाशाह किम जोंग उन की जीत हो गई है। अब आप में से कुछ लोग इस सोच में पड़ गए होंगे कि क्या उत्तर कोरिया में कोई चुनाव भी होता है? और अगर चुनाव होता भी है, तो क्या लोगों के पास किम जोंग को चुनने के अलावा दूसरा विकल्प भी होता है? दूसरा विकल्प हो भी तो क्या किम जोंग के राज में कोई शख्स उनके अलावा किसी और को वोट देने की गुस्ताखी कर सकता है! इंटरनेट पर हाल ही में यह इलेक्शन और इसके नतीजे पर लोग मजेदार प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

    इससे पहले कोरिया की सरकारी मीडिया आउटलेट KCNA ने बताया कि किम जोंग उन ने एक और बड़ी चुनावी जीत हासिल की है। उनकी ‘वर्कर्स पार्टी ऑफ़ कोरिया’ और उसके सहयोगियों ने 2026 के संसदीय चुनावों में 99.97% वोट और सभी सीटें जीत ली हैं। यह चुनाव 15 मार्च को 15वीं ‘सुप्रीम पीपल्स असेंबली’ (Supreme People’s Assembly) के सदस्यों को चुनने के लिए हुआ था।

  • आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक चुनाव में 99.99% रजिस्टर्ड वोटरों ने चुनाव में हिस्सा लिया। इनमें से सिर्फ 0.0037 फीसदी लोग विदेश में होने या समुद्र में काम करने की वजह से वोट नहीं डाल पाए। वहीं देश में मौजूद महज 0.00003 फीसदी लोग वोट डालने नहीं आए।

    चुनाव में जिन लोगों ने वोट डाला, उनमें से 99.93% ने किम जोंग की पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन किया। हालांकि 0.07 फीसदी ने उनके खिलाफ वोट दिया। चुनावों में इतनी बड़ी जीत के बाद भी यह एक असामान्य आंकड़ा माना जा रहा है। खास बात यह है कि सरकारी मीडिया ने 1957 के बाद पहली बार ‘सुप्रीम पीपल्स असेंबली’ के चुनाव में विरोध में पड़े वोटों की बात स्वीकार की है।

    सोशल मीडिया पर क्या कह रहे लोग
    सोशल मीडिया यूज़र्स ने इस पर खूब मजे ले रहे हैं। लोगों का कहना है कि आखिर किम जोंग के होते हुए 0.07 फीसदी लोगों ने उन्हें वोट ना देने की हिम्मत कैसे कर ली। एक यूजर ने इंटरनेट पर लिखा, “एक नई खबर: इस गर्मी में देश की आबादी 0.07% कम होने की उम्मीद है।” वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, “उन 0.07% लोगों के लिए थोड़ी देर का मौन।” एक दूसरे यूजर ने लिखा, “वो 0.07 फीसदी लोग अब देश के मोस्ट ‘वॉन्टेड’ लोग बन गए हैं।”

  • तेल-गैस के बाद इंटरनेट पर भी संकट? ईरान के कदम से वैश्विक कनेक्टिविटी पर खतरा, भारत भी प्रभावित हो सकता है

    तेल-गैस के बाद इंटरनेट पर भी संकट? ईरान के कदम से वैश्विक कनेक्टिविटी पर खतरा, भारत भी प्रभावित हो सकता है


    तेहरान।
     मध्य पूर्व में जारी तनाव अब सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क पर भी खतरा मंडराने लगा है। ईरान द्वारा हॉर्मुज में ऊर्जा आपूर्ति बाधित करने के बाद अब समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन केबलों को नुकसान पहुंचता है, तो दुनिया के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं ठप हो सकती हैं, जिसका असर India सहित कई देशों की बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं पर पड़ेगा।

    दो अहम समुद्री रास्ते खतरे में
    रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक कनेक्टिविटी के लिए दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गहॉर्मुज  और बाब-अल-मंदेब मार्ग इस समय जोखिम में हैं। इन दोनों इलाकों के समुद्र तल में फाइबर ऑप्टिक केबलों का विशाल नेटवर्क फैला हुआ है, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ता है।

    बताया जा रहा है कि हॉर्मुज क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों और संभावित सुरंगों के कारण शिपिंग और बीमा कंपनियां पहले ही सतर्क हो गई हैं। वहीं लाल सागर क्षेत्र में Houthis के हमलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

    इंटरनेट की रीढ़ हैं ये केबल
    समुद्र के नीचे बिछी ये फाइबर केबलें हजारों किलोमीटर लंबी होती हैं और दुनिया के अधिकांश डेटा ट्रांसफर का आधार हैं। वीडियो कॉल, ईमेल, ऑनलाइन बैंकिंग से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेवाएं—सब कुछ इन्हीं पर निर्भर करता है।

    हॉर्मुज के संकरे हिस्सों में समुद्र की गहराई लगभग 200 फीट तक ही है, जिससे इन केबलों को निशाना बनाना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

    करीब 20 केबलों पर मंडरा रहा खतरा
    लाल सागर और हॉर्मुज क्षेत्र में करीब 20 प्रमुख केबल मौजूद हैं, जिनमें 17 लाल सागर से होकर गुजरती हैं। हॉर्मुज मार्ग में AAE-1, Falcon, Gulf Bridge International और Tata TGN-Gulf जैसी महत्वपूर्ण लाइनें शामिल हैं। ये केबल सीधे तौर पर भारत के अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक को सपोर्ट करती हैं।

    डिजिटल दुनिया पर बड़ा असर संभव
    Amazon, Microsoft और Google जैसी बड़ी टेक कंपनियों के मिडिल ईस्ट में स्थापित डाटा सेंटर भी इन्हीं केबलों से जुड़े हैं। ऐसे में अगर कनेक्टिविटी प्रभावित होती है, तो क्लाउड सेवाएं, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर, यह संकट दिखाता है कि आधुनिक दुनिया की डिजिटल लाइफलाइन कितनी नाजुक है—जहां एक क्षेत्रीय संघर्ष भी वैश्विक इंटरनेट और अर्थव्यवस्था को झकझोर सकता है।

  • ईरान युद्ध में अमेरिकी सैनिक नहीं भेजेंगे: ट्रंप का यू-टर्न, बोले-‘कहीं भी सेना तैनात नहीं कर रहा’

    ईरान युद्ध में अमेरिकी सैनिक नहीं भेजेंगे: ट्रंप का यू-टर्न, बोले-‘कहीं भी सेना तैनात नहीं कर रहा’


    वॉशिंगटन। अमेरिका 
    राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच बड़ा बयान देते हुए साफ कर दिया है कि वह ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी जमीनी सैनिक नहीं भेजेंगे। यह बयान ऐसे समय आया है, जब युद्ध चौथे सप्ताह में पहुंच चुका है और अमेरिका की भूमिका को लेकर अटकलें तेज थीं।

    व्हाइट हाउस में Sanae Takaichi के साथ बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “मैं कहीं भी सैनिक नहीं भेज रहा हूं… और अगर भेज भी रहा होता, तो आपको नहीं बताता। लेकिन स्पष्ट कर दूं—हम वहां सैनिक नहीं भेज रहे।”

    गौरतलब है कि युद्ध की शुरुआत के कुछ दिन बाद ट्रंप ने जमीनी सेना भेजने की संभावना से इनकार नहीं किया था, लेकिन अब उनका रुख बदलता नजर आ रहा है।

    ‘जरूरत पड़ी तो कार्रवाई करेंगे’
    हालांकि ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका पूरी तरह पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने कहा कि हालात के मुताबिक जो जरूरी होगा, वह किया जाएगा। ट्रंप लंबे समय से विदेशी जमीन पर अमेरिकी सैनिक भेजने के आलोचक रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में भी उन्होंने Afghanistan से सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया शुरू की थी।

    ईरान को बताया बड़ा खतरा
    ट्रंप ने Iran को वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताते हुए कहा कि “जब यह अभियान खत्म होगा, तो दुनिया पहले से ज्यादा सुरक्षित होगी।”

    उन्होंने अमेरिकी सेना की ताकत का जिक्र करते हुए दावा किया कि हालिया हमलों में दागे गए 114 रॉकेट्स को एयर डिफेंस सिस्टम ने सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया।

    जंग लंबी खिंचने के संकेत
    28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष में United States और Israel एक ओर हैं, जबकि दूसरी ओर Iran डटा हुआ है। शुरुआती आकलन था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन जल्दी हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

    विशेषज्ञों का मानना है कि केवल हवाई हमलों के जरिए न तो सत्ता परिवर्तन संभव है और न ही ईरान के संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है, क्योंकि इसे गहरे भूमिगत ठिकानों में सुरक्षित रखा गया है।

    जमीनी युद्ध से क्यों बच रहा अमेरिका?
    विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान में जमीनी युद्ध बेहद महंगा और जोखिम भरा साबित हो सकता है। वहां की भौगोलिक परिस्थितियां और सैन्य ताकत अमेरिकी सेना के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

    ऐसे में ट्रंप का सैनिक न भेजने का फैसला संकेत देता है कि अमेरिका फिलहाल इस युद्ध को सीमित दायरे में रखकर ही आगे बढ़ना चाहता है, ताकि बड़े और लंबे जमीनी संघर्ष से बचा जा सके।

  • लेबनान में लाइव रिपोर्टिंग के दौरान धमाका, पत्रकार के पीछे गिरी इजरायली मिसाइल; दो घायल

    लेबनान में लाइव रिपोर्टिंग के दौरान धमाका, पत्रकार के पीछे गिरी इजरायली मिसाइल; दो घायल

    तेल अवीव/बेरूत। दक्षिण लेबनान से सामने आए एक वीडियो ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टिंग के दौरान एक पत्रकार के ठीक पीछे मिसाइल गिरने का दृश्य कैमरे में कैद हुआ, जिसमें दो पत्रकार घायल हो गए।

    वीडियो में RT के पत्रकार Steve Sweeney लाइव रिपोर्टिंग कर रहे थे। तभी अचानक वे झुकते हैं और उनके पीछे कुछ ही दूरी पर मिसाइल आकर फट जाती है। इस विस्फोट में स्टीव स्विनी और उनके कैमरामैन Ali Rida घायल हो गए। दोनों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

    ‘PRESS’ पहचान के बावजूद हमला?
    रिपोर्ट के अनुसार, टीम दक्षिण लेबनान के अल-कासमिया ब्रिज के पास कवरेज कर रही थी। कैमरामैन अली रिदा ने दावा किया कि उनकी टीम स्पष्ट रूप से ‘PRESS’ चिन्ह के साथ काम कर रही थी, इसके बावजूद हमला हुआ। Russia से जुड़े अधिकारियों ने भी आशंका जताई है कि यह हमला जानबूझकर किया गया हो सकता है।

    Margarita Simonyan ने सोशल मीडिया पर बताया कि कथित तौर पर Israel Defense Forces (IDF) के फाइटर जेट ने उस वाहन को निशाना बनाया, जिसमें पत्रकार सवार थे।

    इजरायल का जवाब
    वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए Israel Defense Forces ने कहा कि जिस कासमिया क्रॉसिंग क्षेत्र में पत्रकार मौजूद थे, उसे पहले ही खाली करने की चेतावनी जारी की गई थी। सेना के अनुसार, पर्याप्त समय देने के बाद ही हमला किया गया और इजरायल पत्रकारों को निशाना नहीं बनाता तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कार्रवाई करता है।

    यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब Israel और Lebanon के बीच तनाव चरम पर है। इस वीडियो ने युद्ध क्षेत्र में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • 2 मुस्लिम देशों की ईरान को चेतावनी, क्या सऊदी-पाकिस्तान जंग में उतरेंगे

    2 मुस्लिम देशों की ईरान को चेतावनी, क्या सऊदी-पाकिस्तान जंग में उतरेंगे


    रियाद।
     मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ईरान  के खिलाफ 12 मुस्लिम देशों ने एकजुट होकर कड़ा रुख अपनाया है। साउदी अरब  की राजधानी में हुई अहम बैठक में पाकिस्‍तान समेत कई देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान से तुरंत हमले रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की मांग की।

    बैठक में । अज़रबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात  जैसे देश शामिल रहे। सभी ने नागरिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की कड़ी निंदा की।

    ईरान को सख्त संदेश

    बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में तेल संयंत्रों, हवाई अड्डों, रिहायशी इलाकों और राजनयिक मिशनों पर हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया। देशों ने United Nations चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार का भी जिक्र किया और United Nations Security Council के प्रस्तावों के पालन की मांग की।

    साथ ही ईरान से हॉर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में हस्तक्षेप न करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की अपील की गई।

    सऊदी विदेश मंत्री की कड़ी चेतावनी
    सऊदी विदेश मंत्री Faisal bin Farhan Al Saud ने साफ कहा कि ईरान पर भरोसा “पूरी तरह खत्म” हो चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि तेहरान दबाव और आक्रामक रणनीति के जरिए क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

    उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जरूरत पड़ी तो सऊदी अरब “उचित कदम” उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनका यह बयान सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाई की संभावना की ओर इशारा माना जा रहा है।

    क्या पाकिस्तान भी जंग में खिंच सकता है?
    विश्लेषकों का मानना है कि यदि Saudi Arabia सीधे संघर्ष में उतरता है, तो उसका रक्षा सहयोग समझौता Pakistan के साथ सक्रिय हो सकता है। ऐसे में इस्लामाबाद भी इस टकराव का हिस्सा बन सकता है, जिससे संघर्ष और व्यापक हो सकता है।

    खाड़ी देशों पर हमलों से बढ़ा तनाव
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद ईरान ने खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सभी छह देशों को निशाना बनाया है। Abu Dhabi और Dubai में हुए हमलों में कई नागरिकों की मौत हुई, जबकि Kuwait, Oman और Bahrain में भी नुकसान की खबरें हैं।

    Qatar के अल-उदीद एयरबेस और Saudi Arabia के तेल ठिकानों पर भी हमले किए गए, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

    स्थिति बेहद संवेदनशील
    मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहा। अगर सऊदी अरब और उसके सहयोगी सीधे मैदान में उतरते हैं, तो यह टकराव पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकता है—जिसके वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक असर भी गंभीर हो सकते हैं।

  • अमेरिकी कांग्रेस में एच-1बी वीजा प्रणाली पर बहस तेज: कौशल आधारित सुधार और नौकरी बदलाव की स्वतंत्रता पर जोर

    अमेरिकी कांग्रेस में एच-1बी वीजा प्रणाली पर बहस तेज: कौशल आधारित सुधार और नौकरी बदलाव की स्वतंत्रता पर जोर


    वॉशिंगटन। अमेरिका में एच-1बी वीजा कार्यक्रम जिसके तहत बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर वहां काम करते हैं इस हफ्ते अमेरिकी कांग्रेस में चर्चा का मुख्य विषय बना। संयुक्त आर्थिक समिति की बैठक में नेताओं और विशेषज्ञों ने मौजूदा लॉटरी आधारित वीजा प्रणाली की समीक्षा की और इसमें सुधार के सुझाव दिए।

    बैठक में प्रमुख मुद्दा यह था कि अमेरिका की बदलती जनसांख्यिकी और कामगारों की कमी को देखते हुए वीजा वितरण प्रणाली को अधिक लचीला और कुशलता आधारित बनाया जाए। कांग्रेस के सदस्य डेविड श्वाइकर्ट ने बताया कि रिटायर होने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जबकि काम करने वाले युवा स्थिर हैं। ऐसे में विदेशी कुशल कामगारों की भूमिका अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो गई है।

    विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा सिस्टम में कर्मचारी अधिकतर एक ही नियोक्ता पर निर्भर रहते हैं जिससे उनके वेतन पर दबाव पड़ता है। डॉ. ल्यूक पार्ड्यू ने सुझाव दिया कि अगर कर्मचारियों को नौकरी बदलने की अधिक स्वतंत्रता मिले तो उनकी उत्पादकता और वेतन दोनों बढ़ सकते हैं। हालांकि उन्होंने अंक आधारित (पॉइंट) सिस्टम बनाते समय सावधानी बरतने की चेतावनी दी।

    डैनियल डी. मार्टिनो ने कहा कि स्थायी निवास में देरी और लॉटरी सिस्टम की खामियां हैं। उन्होंने वीजा आवंटन में वेतन और कौशल आधारित चयन की वकालत की ताकि युवा और कुशल कामगारों को प्राथमिकता मिल सके। डॉ. डगलस होल्ट्ज-ईकिन ने भी कौशल आधारित इमिग्रेशन को बढ़ावा देने का समर्थन किया और कहा कि सुधार केवल एच-1बी तक सीमित नहीं होना चाहिए।

    जेरेमी न्युफेल्ड ने बताया कि अन्य देशों के अनुभव से पता चलता है कि सिर्फ पॉइंट सिस्टम पर्याप्त नहीं है। नौकरी का ऑफर मिलने पर अतिरिक्त अंक देने वाला मिश्रित सिस्टम अधिक प्रभावी हो सकता है। बैठक में यह भी चर्चा हुई कि कुशल विदेशी कामगार अमेरिकी अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़ाते हैं और लंबे समय में वेतन में सुधार करते हैं।

    प्रतिनिधि लॉयड स्मकर ने पूछा कि क्या इमिग्रेशन बढ़ाने से आर्थिक विकास और राष्ट्रीय कर्ज की समस्या में मदद मिल सकती है। इस पर होल्ट्ज-ईकिन ने सहमति जताई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर भी चर्चा हुई जिसमें पार्ड्यू ने कहा कि एआई नौकरियां कम नहीं करेगा बल्कि नई तरह के कौशल की मांग बढ़ाएगा।

    कांग्रेस सदस्य विक्टोरिया स्पार्ट्ज और अन्य विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि इमिग्रेशन नीति में मेहनती और कुशल लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और सिस्टम को समय के साथ बदलना चाहिए ताकि यह बदलती आर्थिक और बाजार की जरूरतों के अनुरूप काम करे।

    अंत में श्वाइकर्ट ने कहा कि प्रतिभा आधारित इमिग्रेशन सुधार अमेरिकी आर्थिक विकास उत्पादकता वेतन और स्थिरता के लिए आवश्यक है। एच-1बी वीजा अभी भी तकनीक और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में विदेशी कुशल पेशेवरों के लिए मुख्य मार्ग है और इस पर किसी भी बदलाव पर भारत भी नजर रखता है।

  • मिडिल ईस्ट में हवाई संघर्ष तेज, ईरान ने अमेरिका के 16 फाइटर और 10 रीपर ड्रोन किए नष्ट

    मिडिल ईस्ट में हवाई संघर्ष तेज, ईरान ने अमेरिका के 16 फाइटर और 10 रीपर ड्रोन किए नष्ट

    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब भीषण हवाई युद्ध का रूप ले चुका है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिकी वायुसेना को दुश्मन हमलों के साथ-साथ तकनीकी खराबी और आपसी तालमेल की कमी के कारण भी भारी नुकसान झेलना पड़ा है। ब्लूमबर्ग और सीएनएन की रिपोर्ट्स में बताया गया है कि युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका के कम से कम 16 सैन्य विमान नष्ट हो चुके हैं, जिनमें महंगे ड्रोन और रिफ्यूलिंग टैंकर शामिल हैं।

    इस दौरान 10 MQ-9 रीपर ड्रोन भी तबाह हो चुके हैं। इनमें से 9 को ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया, जबकि एक ड्रोन जॉर्डन के एयरफील्ड पर मिसाइल हमले की चपेट में आया और दो तकनीकी कारणों से नष्ट हुए। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ये मानव रहित ड्रोन जानबूझकर उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में भेजे जाते हैं ताकि नुकसान न्यूनतम रहे।

    रिपोर्ट में तकनीकी खराबी और गलतियों के कारण हुए नुकसान पर भी ध्यान दिया गया है। एक ऑपरेशन के दौरान KC-135 रिफ्यूलिंग टैंकर के दुर्घटनाग्रस्त होने से चालक दल के सभी 6 सदस्यों की मौत हुई। वहीं, कुवैत में अपनी ही सेना की गलत पहचान के चलते तीन अमेरिकी F-15 फाइटर मार गिराए गए। इसी बीच सऊदी अरब के बेस पर ईरानी मिसाइल हमले में पांच KC-135 विमान क्षतिग्रस्त हुए।

    आम तौर पर अमेरिकी वायुसेना युद्ध में एयर सुपीरियरिटी हासिल कर लेती है, लेकिन ईरान के खिलाफ यह चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। अधिकारियों ने माना है कि अमेरिका केवल स्थानीय स्तर पर हवाई हमलों में दक्ष है, पूरे ईरानी आकाश पर उनका कब्जा नहीं है। हाल ही में एक F-35 फाइटर जेट को ईरानी गोलाबारी के बाद इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी; पायलट सुरक्षित बच गए।

    ईरान ने अपने ‘साउथ पार्स’ गैस फील्ड पर हुए हमलों का बदला लेने के लिए कतर और सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले तेज कर दिए हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्गों को सुरक्षित करना अमेरिका के लिए चुनौती बना हुआ है, क्योंकि ईरान का सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम लगातार खतरा पैदा कर रहा है।

  • सोशल मीडिया के बिना भी खुशी, फिनलैंड लगातार नौवीं बार बना दुनिया का सबसे खुशहाल देश

    सोशल मीडिया के बिना भी खुशी, फिनलैंड लगातार नौवीं बार बना दुनिया का सबसे खुशहाल देश


    नई दिल्ली। दुनिया भर में युवा सोशल मीडिया के बिना भी अधिक खुश और संतुष्ट महसूस कर रहे हैं। डिजिटल दुनिया के शोर और स्क्रीन टाइम से दूरी बनाने वाले 25 वर्ष से कम उम्र के युवा उन लोगों की तुलना में बेहतर जीवन स्तर का अनुभव कर रहे हैं जो घंटों सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं।ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर की विश्व खुशहाली रिपोर्ट-2026 में बताया गया है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग युवाओं की खुशहाली पर नकारात्मक असर डाल रहा है।
    अमेरिका और यूरोप के कॉलेज छात्र अब निजी तौर पर मानने लगे हैं कि वे सोशल मीडिया के बिना भी अधिक शांत और संतुलित जीवन जी सकते हैं जबकि कई इसे केवल सामाजिक मजबूरी के कारण उपयोग कर रहे हैं। रिपोर्ट में फिनलैंड लगातार नौवें वर्ष दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना। 147 देशों की रैंकिंग में भारत 116वें स्थान पर है जो 2025 की 118वीं रैंक से दो पायदान ऊपर है।

    विशेषज्ञ क्या कहते हैं

    विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में भी डिजिटल खपत और सामाजिक संबंधों के बीच असंतुलन युवाओं की खुशहाली को प्रभावित कर रहा है। जिन देशों में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या सीमित उपयोग है वहां के युवा मानसिक रूप से अधिक स्वस्थ और संतुष्ट हैं क्योंकि वे परिवार दोस्त और शारीरिक गतिविधियों पर अधिक ध्यान दे पाते हैं।

    डिजिटल दुनिया से युवाओं का मोहभंग

    अमेरिका और अन्य देशों के कॉलेज छात्रों में सोशल मीडिया से दूरी बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई छात्र महसूस करते हैं कि वे इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल केवल सामाजिक दबाव के चलते कर रहे हैं और वे ऐसी दुनिया को प्राथमिकता देंगे जहां सोशल मीडिया की आवश्यकता ही न हो।

    अमेरिका कनाडा में गिरावट

    आइसलैंड डेनमार्क स्वीडन और नॉर्वे जैसे नॉर्डिक देश शीर्ष-10 में शामिल रहे। वहीं अमेरिका कनाडा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं के जीवन मूल्यांकन में पिछले एक दशक में गिरावट आई है। यह अध्ययन 140 देशों के लगभग 1 लाख लोगों के उत्तरों पर आधारित है।

    खुशहाली केवल आर्थिक समृद्धि नहीं

    रिपोर्ट में कहा गया है कि खुशहाली सिर्फ आर्थिक स्थिति पर निर्भर नहीं करती। नॉर्डिक देशों की सफलता के पीछे मजबूत कल्याणकारी प्रणाली समानता और लंबी जीवन प्रत्याशा है। इसके विपरीत अफगानिस्तान सिएरा लियोन और मलावी जैसे देश सूची में सबसे नीचे हैं।

    फिनलैंड और कोस्टा रिका का मॉडल

    फिनलैंड (1) और कोस्टा रिका (4) में लोग तकनीक से ज्यादा सामाजिक समानता प्रकृति और आपसी सहयोग को महत्व देते हैं। ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर जान-इमैनुअल डी नेवे के अनुसार यह उनके सामाजिक जीवन की गुणवत्ता और स्थिरता के कारण है जो उन्हें खुशहाल बनाती है।