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  • 932 किमी ड्राइव कर प्रेमिका को किया प्रपोज, कार पर लिखे मैसेज से वायरल हुई युवक की लव स्टोरी

    932 किमी ड्राइव कर प्रेमिका को किया प्रपोज, कार पर लिखे मैसेज से वायरल हुई युवक की लव स्टोरी

    बीजिंग। चीन (China) में एक युवक की अनोखी प्रेम कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। 26 वर्षीय युवक ने अपनी गर्लफ्रेंड को शादी के लिए प्रपोज करने के लिए करीब 932 किलोमीटर का लंबा सफर तय किया। इस रोमांटिक पहल ने इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींच लिया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक Tan नाम का युवक Jiangxi Province का रहने वाला है और फिलहाल Fujian Province में अपना कारोबार करता है।

    कार पर लगाया खास बैनर

    फरवरी में Chinese New Year के दौरान उसकी गर्लफ्रेंड अपने घर Guizhou गई हुई थी। इसी दौरान युवक ने उसे सरप्राइज देने और शादी के लिए प्रपोज करने का फैसला किया।

    यात्रा के दौरान ट्रैफिक में आसानी के लिए उसने अपनी कार की पिछली खिड़की पर एक लाल बैनर लगा दिया। उस पर लिखा था।
    “भाइयों, मुझे पहले जाने दें… मैं अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज करने जा रहा हूं।”

    12 घंटे से ज्यादा की ड्राइव

    हाईवे पर जैसे ही अन्य ड्राइवरों ने यह संदेश देखा, कई लोगों ने उसकी कार को रास्ता दे दिया। कुछ ने हॉर्न बजाकर और हाथ हिलाकर उसे शुभकामनाएं भी दीं।

    युवक ने करीब 12.5 घंटे लगातार ड्राइव कर यह लंबा सफर तय किया। उसने बताया कि शुरुआत में सफर लंबा और थकाऊ लग रहा था, लेकिन जैसे-जैसे वह अपनी प्रेमिका के करीब पहुंचता गया, उसकी उत्सुकता और खुशी बढ़ती चली गई।

    प्रेमिका को मिला बड़ा सरप्राइज

    युवक की गर्लफ्रेंड को इस सरप्राइज के बारे में बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी। दोनों की मुलाकात यूनिवर्सिटी में हुई थी और वे पिछले चार साल से रिलेशनशिप में हैं।

    जब युवक उसके घर पहुंचा और उसने शादी के लिए प्रपोज किया, तो युवती ने खुशी-खुशी उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

    सोशल मीडिया पर लोगों ने की तारीफ

    यह रोमांटिक कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई है। वीडियो को लाखों बार देखा जा चुका है और लोग युवक की इस अनोखी पहल की जमकर तारीफ कर रहे हैं।

    एक यूजर ने मजाकिया अंदाज में लिखा, “इतने लोगों ने रास्ता देकर मदद की है, अब अपनी मंगेतर को कभी निराश मत करना।”

  • ट्रंप के नए आयात टैरिफ पर बढ़ा विवाद, 20 से अधिक अमेरिकी राज्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया

    ट्रंप के नए आयात टैरिफ पर बढ़ा विवाद, 20 से अधिक अमेरिकी राज्यों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया

    वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) की नई वैश्विक आयात टैरिफ नीति को लेकर अमेरिका में बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। 20 से अधिक अमेरिकी राज्यों ने इस फैसले को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया है। राज्यों का आरोप है कि राष्ट्रपति अपने अधिकारों से आगे बढ़कर आयात शुल्क लागू कर रहे हैं, जिससे व्यापारियों और आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। इस मामले की सुनवाई United States Court of International Trade, न्यूयॉर्क में होगी।
    जानकारी के अनुसार, यह मुकदमा Oregon, Arizona, California और New York सहित कई डेमोक्रेटिक शासित राज्यों के अटॉर्नी जनरल की ओर से दायर किया गया है। उनका कहना है कि ट्रंप प्रशासन कई देशों से आने वाले उत्पादों पर लगभग 15 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने की योजना बना रहा है, जो कानून के दायरे से बाहर है।

    ट्रंप ने दी नीति की सफाई
    राष्ट्रपति Donald Trump का कहना है कि यह कदम अमेरिका के लंबे समय से जारी व्यापार घाटे को कम करने के लिए जरूरी है। उनके मुताबिक यह शुल्क Trade Act of 1974 की धारा 122 के तहत लगाया गया है। इस प्रावधान के अनुसार राष्ट्रपति अधिकतम 15 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगा सकते हैं और यह व्यवस्था पांच महीने तक लागू रह सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इसकी अवधि बढ़ाने का अधिकार कांग्रेस के पास होता है।

    राज्यों ने उठाए कानूनी सवाल
    मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का तर्क है कि इस धारा का इस्तेमाल केवल विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है, न कि विभिन्न देशों से आने वाले सामान पर व्यापक रूप से टैरिफ लगाने के लिए। राज्यों का कहना है कि इससे स्थानीय कारोबार, उद्योग और उपभोक्ताओं पर महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।

    अदालत करेगी अंतिम फैसला
    मामले की सुनवाई न्यूयॉर्क स्थित United States Court of International Trade में होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि ट्रंप का नया टैरिफ कानून के अनुरूप है या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पिछले साल अदालत ने ट्रंप द्वारा आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए कुछ टैरिफ को रद्द कर दिया था। इससे संकेत मिलता है कि न्यायपालिका राष्ट्रपति के व्यापार संबंधी फैसलों की समीक्षा कर सकती है।

  • IRIS DENA पर मोदी सरकार की चुप्पी से भड़के खरगे, कहा-देश की विदेश नीति को बर्बाद कर रहे…

    IRIS DENA पर मोदी सरकार की चुप्पी से भड़के खरगे, कहा-देश की विदेश नीति को बर्बाद कर रहे…

    नई दिल्‍ली। इजरायल और अमेरिका द्वारा मिलकर ईरान पर किए गए हमले ने वैश्विक राजनीति के साथ-साथ भारत की घरेलू राजनीति को भी तेज कर दिया है। ईरानी जहाज को हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा डुबोए जाने पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर विपक्ष ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि हिंद महासागर में हुई इस घटना पर पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की चुप्पी से साफ है कि देश के रणनीतिक और राष्ट्रीय हितों की घोर उपेक्षा की जा रही है। यह न सिर्फ भारत के राष्ट्रीय सिद्धांतों का अपमान है, बल्कि हमारी उस विदेश नीति का भी अपमान है, जिसे तमाम सरकारों ने बड़ी मेहनत से बनाया और अपनाया है।

    सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखे एक पोस्ट में खरगे ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “ईरान का जो जहाज टारपीडो की चपेट में आने से डूबा है यह जहाज बिना सैन्य साजो सामान के था और भारत में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 से लौट रहा था।

    ईरानी नौसेना का जहाज ईरिस डेना भारत का आमंत्रित अतिथि था और यह विशाखापत्तनम में 15 से 26 फरवरी तक आयोजित अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 में शामिल हुआ था। इस आयोजन में 70 से ज्यादा देशों की नौसेनाएं शामिल हुईं थीं।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि आश्चर्य की बात यह है कि इस अतिथि के डूबने पर भारत की तरफ से कोई चिंता या संवेदना व्यक्त नहीं की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर चुप हैं। पीएम मोदी पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि जब आप अपने ही आंगन में हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं दे सकते हैं तो हमें महासागर सिद्धांतों और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ होने के सिद्धांतों पर उपदेश क्यों दे रहे हैं।
    होर्मुज की खाड़ी में फंसे 1100 भारतीय नाविक: खरगे

    कांग्रेस अध्यक्ष ने इस युद्ध की वजह से होर्मुज की खाड़ी में फंसे भारतीयों को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि होर्मुज की खाड़ी में 38 भारतीय ध्वज वाले जहाज और 1100 नाविक फंसे हुए हैं।

    प्टन आशीष कुमार समेत दो भारतीय नाविकों की कथित तौर पर मौत हो गई है। समुद्री बचाव या राहत अभियान क्यों नहीं चलाया जा रहा है? पीएम मोदी कहते हैं कि कच्चे तेल और अन्य तेल का भंडार केवल 25 दिनों के लिए बचा है। तेल की बढ़ती कीमतों के बीच, हमारी ऊर्जा संबंधी इमरजेंसी योजना क्या है, खासकर भारत सरकार द्वारा रूसी तेल का आयात रोकने की मांग को लगभग स्वीकार करने के बाद। खाड़ी देशों के साथ अन्य प्रमुख वस्तुओं के व्यापार का क्या होगा।
    विदेश नीति को बर्बाद कर रहे हैं: खरगे

    कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए और कहा कि विदेश मंत्रालय के 3 मार्च के बयान के अनुसार, “कुछ भारतीय नागरिकों की जान चली गई है या वे लापता हैं”। खाड़ी देशों में एक करोड़ भारतीय रहते हैं। मेडिकल छात्र मदद की गुहार लगाते हुए हताश वीडियो संदेश जारी कर रहे हैं।

    भारत सरकार उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर रही है? क्या प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को निकालने की कोई योजना बनाई गई है? उन्होंने कहा कि इन सब स्थितियों के बीच “स्पष्ट रूप से, मोदी जी का आत्मसमर्पण राजनीतिक और नैतिक दोनों है। यह भारत के मूल राष्ट्रीय हितों का अपमान करता है और हमारी उस विदेश नीति को खत्म कर रहा है, जिसे वर्षों से लगातार सरकारों द्वारा सावधानीपूर्वक और मेहनत से बनाया और अपनाया गया है।”

    गौरतलब है कि इजरायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के साथ शुरू हुई यह जंग अब पश्चिम एशिया से आगे बढ़कर हिंद महासागर में पहुंच गई है।

    भारत में फ्लीट रिव्यू कार्यक्रम के तहत आए ईरानी युद्धपोत को अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के करीब डुबो दिया। इस घटना में 80 से ज्यादा ईरानी नौसैनिकों के मारे जाने की आशंका है। बाकियों को श्रीलंकाई नेवी से बचाव अभियान के तहत बचाया था। फिलहाल यह सैनिक श्रीलंका में मौजूद हैं।
  • ट्रंप बोले- जमीनी युद्ध की जरूरत ही नहीं, ईरान की नौसेना खत्म

    ट्रंप बोले- जमीनी युद्ध की जरूरत ही नहीं, ईरान की नौसेना खत्म

    नई दिल्‍ली। इजरायल-ईरान संघर्ष सातवें दिन और तेज हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार तेहरान ने अज़रबैजान और क़तर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर नए हमले किए। ईरान ने यह भी चेतावनी दी कि भारतीय महासागर में एक ईरानी युद्धपोत को टॉरपीडो से डुबाने के लिए अमेरिका को ‘पछतावा’ होगा। इसी बीच एक धार्मिक नेता ने डोनाल्ड ट्रंप के ‘खून’ की मांग करने वाला बयान दिया।
    दूसरी ओर, इजरायली सेना ने बताया कि पिछले 24 घंटों में लेबनान में ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के 80 ठिकानों पर हमला किया गया। साथ ही ईरान के अंदर भी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च साइट्स समेत कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हमलों की एक नई लहर चलाई गई।

    इस बीच एक बड़ी घटना में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा दागे गए टॉरपीडो से श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी युद्धपोत डूब गया जिसमें कम से कम 87 लोगों की मौत हो गई।

    लगभग 32 लोगों को बचाकर श्रीलंका के दक्षिणी शहर गाले के अस्पताल में भर्ती कराया गया। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस हमले की पुष्टि करते हुए कहा कि वह युद्धपोत ‘शांत तरीके से डूब गया।’ इसी दौरान कुवैत के पास खाड़ी क्षेत्र में एक तेल टैंकर में भी धमाका हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक जहाज के बाईं ओर बड़ा विस्फोट देखा गया जिसके बाद उसमें पानी भरने लगा। जहाज के कप्तान ने बताया कि धमाके के बाद एक छोटी नाव को उस इलाके से दूर जाते हुए देखा गया। यह घटना कुवैत के मुबारक अल कबीर पोर्ट से लगभग 30 नॉटिकल मील (करीब 56 किमी) दक्षिण-पूर्व में हुई
  • ग्लोबल एनर्जी वॉर में ईरान का मास्टरस्ट्रोक: अमेरिका और सहयोगियों के लिए हॉर्मुज पूरी तरह 'ब्लॉक', भारत-चीन के लिए खुली रहेगी तेल की सप्लाई।

    ग्लोबल एनर्जी वॉर में ईरान का मास्टरस्ट्रोक: अमेरिका और सहयोगियों के लिए हॉर्मुज पूरी तरह 'ब्लॉक', भारत-चीन के लिए खुली रहेगी तेल की सप्लाई।


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की विभीषिका के बीच ईरान के ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर’IRGC ने एक ऐसी घोषणा की है, जिसने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया की ऊर्जा जीवनरेखा माना जाने वाला ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’Strait of Hormuz अब केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके पश्चिमी सहयोगियों के जहाजों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया है। ईरानी सरकारी प्रसारक IRIB के माध्यम से दी गई यह चेतावनी सीधे तौर पर उन देशों को निशाना बनाती है जो वर्तमान संघर्ष में ईरान के खिलाफ खड़े हैं। IRGC ने दो टूक कहा है कि यदि इन प्रतिबंधित देशों का कोई भी जहाज इस जलमार्ग से गुजरने की कोशिश करेगा, तो उसे निश्चित रूप से हमला करके नष्ट कर दिया जाएगा।

    हालाँकि, इस अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि भारत इस सख्त नाकेबंदी के दायरे से बाहर है। बुधवार को जहाँ केवल चीनी जहाजों को अनुमति देने की बात कही गई थी, वहीं अब नए ऐलान के बाद यह साफ हो गया है कि भारतीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों के लिए यह रास्ता सुरक्षित रहेगा। तेहरान का यह रुख भारत के साथ उसके पुराने और विश्वसनीय संबंधों को दर्शाता है। भारतीय अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार, इस छूट से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडरा रहा खतरा काफी हद तक टल गया है, क्योंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है।

    ईरानी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला देते हुए इस कार्रवाई को जायज ठहराया है। उनका कहना है कि युद्धकाल में इस्लामिक गणराज्य ईरान को अपनी सीमाओं से लगे जलमार्गों पर नियंत्रण करने का पूरा अधिकार है। यह कठोर फैसला अमेरिका और इजरायल द्वारा पिछले शनिवार को शुरू किए गए संयुक्त सैन्य अभियान के जवाब में लिया गया है। गौरतलब है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री तेल परिवहन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। इसकी रणनीतिक अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फारस की खाड़ी के तमाम बंदरगाहों, जिनमें दुबई का जेबेल अली भी शामिल है, के लिए यह एकमात्र निकास मार्ग है।

    वर्तमान स्थिति की गंभीरता को समुद्री ट्रैकिंग वेबसाइटों पर साफ देखा जा सकता है। कुवैत और दुबई के तटों के पास सैकड़ों टैंकर और कमर्शियल जहाज लंगर डाले खड़े हैं, जो इस नाकेबंदी के कारण आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इतिहास में यह पहली बार है जब हॉर्मुज को वाणिज्यिक जहाजों के लिए इस तरह पूरी तरह बंद किया गया है। यहाँ तक कि 1980 के दशक के भीषण ईरान-इराक युद्ध के दौरान भी इस मार्ग पर यातायात पूरी तरह ठप नहीं हुआ था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नाकेबंदी से भले ही एशिया-यूरोप के मुख्य मार्गों पर तुरंत असर न पड़े, लेकिन खाड़ी क्षेत्र से होने वाली तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने से दुनिया भर में ऊर्जा संकट और बढ़ सकता है। फिलहाल, भारत के लिए हॉर्मुज का यह ‘खुला दरवाजा’ एक बड़ी कूटनीतिक जीत और आर्थिक राहत का संकेत है।

  • ईरान में नेतृत्व का महासंग्राम: ट्रंप ने मोजतबा खामेनेई को बताया 'लाइटवेट', कहा- शांति के लिए अमेरिकी दखल जरूरी।

    ईरान में नेतृत्व का महासंग्राम: ट्रंप ने मोजतबा खामेनेई को बताया 'लाइटवेट', कहा- शांति के लिए अमेरिकी दखल जरूरी।


    नई दिल्ली । ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हालिया मृत्यु ने न केवल तेहरान में सत्ता का शून्य पैदा किया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक युद्ध को भी जन्म दे दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए ‘एक्सियोस’ को दिए एक इंटरव्यू में सनसनीखेज बयान दिया है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें मोजतबा खामेनेई, जो अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं, बिल्कुल भी मंजूर नहीं हैं। ट्रंप ने मोजतबा को एक ‘लाइटवेट’हल्का खिलाड़ी करार देते हुए कहा कि वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे जो खामेनेई की पुरानी और कट्टरपंथी नीतियों को आगे बढ़ाए।

    ट्रंप का यह दावा केवल विरोध तक सीमित नहीं है; उन्होंने ईरान के अगले नेता की नियुक्ति में प्रत्यक्ष अमेरिकी भागीदारी की मांग की है। इसके लिए उन्होंने वेनेजुएला का उदाहरण दिया, जहाँ राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारीजनवरी 2026 के बाद डेल्सी रोड्रिगेज के साथ ‘मैनेज्ड ट्रांजिशन’ किया गया था। ट्रंप का मानना है कि यदि ईरान में शांति और सौहार्द लाना है, तो वाशिंगटन को नेतृत्व चयन की प्रक्रिया का हिस्सा बनना होगा। उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि ईरान ने फिर से किसी कट्टरपंथी को अपना नेता चुना, तो अमेरिका को अगले पांच वर्षों के भीतर दोबारा युद्ध के मैदान में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

    दूसरी ओर, ईरान का आंतरिक ढांचा इस समय भारी दबाव में है। 88 सदस्यीय विशेषज्ञों का पैनलAssembly of Experts नया उत्तराधिकारी चुनने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। मोजतबा खामेनेई, जिनके ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्सIRGC के साथ बेहद गहरे और मजबूत रिश्ते हैं, फिलहाल मौलवी संगठन में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माने जा रहे हैं। हालांकि, ईरान का संविधान वंशानुगत शासन की अनुमति नहीं देता, लेकिन मोजतबा का प्रभाव उन्हें इस दौड़ में सबसे आगे रखता है। ट्रंप के इस हस्तक्षेप ने अब ईरान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या एक संप्रभु राष्ट्र के सर्वोच्च धार्मिक नेता का चुनाव बाहरी शक्तियों के दबाव में हो सकता है।

    ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का भी मानना है कि ट्रंप का यह रुख ईरान के साथ भविष्य के परमाणु समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। फिलहाल, ईरान ने आधिकारिक रूप से नए नेता के नाम की घोषणा को टाल दिया है, लेकिन ट्रंप के इस ताजा बयान ने तेहरान और वाशिंगटन के बीच पहले से ही जारी तनाव की आग में घी डालने का काम किया है। अब पूरी दुनिया की नजरें विशेषज्ञों के उस पैनल पर टिकी हैं, जिसे कानून के अनुसार जल्द ही नया उत्तराधिकारी घोषित करना है।

  • ईरान पर हमले के विरोध में सीनेट में हंगामा, पूर्व मरीन का टूटा हाथ; सांसद की भूमिका पर विवाद, VIDEO वायरल

    ईरान पर हमले के विरोध में सीनेट में हंगामा, पूर्व मरीन का टूटा हाथ; सांसद की भूमिका पर विवाद, VIDEO वायरल


    नई दिल्ली । अमेरिका में ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच विरोध के स्वर भी तेज होते जा रहे हैं। इसी कड़ी में यूनाइटेड स्टेट्स सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति की सुनवाई के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई जब एक पूर्व अमेरिकी मरीन ने ईरान पर हमले के विरोध में जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प में पूर्व सैनिक का हाथ टूट गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और अमेरिकी राजनीति में नई बहस को जन्म दे रहा है।

    घायल प्रदर्शनकारी की पहचान ब्रायन मैकगिनेस के रूप में हुई है जो वर्ष 2000 से 2004 तक यूनाइटेड स्टेट्स मरीन कॉर्प्स में सार्जेंट के पद पर तैनात रह चुके हैं। जानकारी के मुताबिक मैकगिनेस सीनेट की सुनवाई के दौरान अचानक खड़े हो गए और ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध करने लगे। उन्होंने पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य भूमिका और इजरायल के समर्थन पर भी सवाल उठाए।

    स्थिति बिगड़ती देख यूएस कैपिटल पुलिस ने उन्हें हॉल से बाहर निकालने की कोशिश की। इसी दौरान मैकगिनेस ने दरवाजे के फ्रेम को पकड़ लिया और बाहर जाने से इनकार कर दिया। वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिसकर्मी उन्हें हटाने की कोशिश कर रहे हैं और खींचतान के दौरान उनका हाथ दरवाजे में फंस जाता है। इसी अफरा-तफरी में उनका हाथ टूट जाता है। कमरे में मौजूद लोगों की आवाजें भी वीडियो में सुनाई देती हैं जहां कुछ लोग चिल्लाते हुए कहते हैं उसका हाथ… उसका हाथ… ओह माय गॉड! वहीं पुलिस अधिकारी लगातार उन्हें दरवाजा छोड़ने के लिए कहते हुए सुनाई देते हैं।

    इस घटना में एक अमेरिकी सांसद की भूमिका भी सामने आई है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस अधिकारियों के साथ अमेरिकी सीनेटर टिम शीही भी प्रदर्शनकारी को बाहर निकालने में मदद करते नजर आ रहे हैं। हालांकि झड़प के दौरान उनका हाथ किस तरह टूटा इसे लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।

    हॉल से बाहर ले जाए जाने के दौरान मैकगिनेस जोर-जोर से चिल्लाते हुए कहते सुने गए कोई भी सैनिक इजरायल के लिए लड़ना नहीं चाहता। उनका यह बयान पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य नीतियों के विरोध को दर्शाता है और इसी वजह से यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया है।

    घटना के बाद सीनेटर टिम शीही ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने कहा कि कैपिटल पुलिस एक असंतुलित प्रदर्शनकारी को हटाने की कोशिश कर रही थी और वह केवल स्थिति को शांत करने में मदद कर रहे थे। उन्होंने लिखा कि यह व्यक्ति टकराव के इरादे से कैपिटल आया था और पुलिस अपनी ड्यूटी निभा रही थी। शीही ने उम्मीद जताई कि घायल व्यक्ति को उचित मदद मिलेगी और भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं होंगी।

    वीडियो सामने आने के बाद अमेरिका में ईरान नीति इजरायल के समर्थन और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप को लेकर नई बहस छिड़ गई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना अमेरिकी राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण और विदेश नीति को लेकर गहरी असहमति को भी उजागर करती है।

  • Gen Z' आंदोलन का असर: नेपाल चुनाव में पारंपरिक पार्टियों का अंत, बालेन शाह की RSP ने रचा इतिहास।

    Gen Z' आंदोलन का असर: नेपाल चुनाव में पारंपरिक पार्टियों का अंत, बालेन शाह की RSP ने रचा इतिहास।


    नई दिल्ली । नेपाल की सियासत में 5 मार्च 2026 का दिन एक ऐसी तारीख के रूप में दर्ज हो गया है, जिसने हिमालयी राष्ट्र के पूरे राजनीतिक मानचित्र को बदल कर रख दिया है। पिछले साल सितंबर 2025 में हुए ऐतिहासिक ‘जनरेशन जेड’ (Gen Z) आंदोलन की धमक अब मतपेटियों से निकल रही है। शुरुआती मतगणना के रुझान किसी बड़े राजनीतिक भूचाल से कम नहीं हैं। काठमांडू के पूर्व मेयर और रैपर बालेन शाह (बालेंद्र शाह) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) एक ऐसी प्रचंड सुनामी बनकर उभरी है, जिसमें नेपाल की पुरानी और पारंपरिक पार्टियों, विशेष रूप से वामपंथी धड़े का अस्तित्व खतरे में नजर आ रहा है।

    इस चुनाव का सबसे हाई-प्रोफाइल और दिलचस्प मुकाबला झापा-5 सीट पर देखने को मिल रहा है। यहाँ से आ रहे आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि देश की बदलती सोच का आईना भी हैं। चार बार के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, जिन्हें नेपाल की राजनीति का ‘चाणक्य’ माना जाता था, अपने ही गढ़ में RSP के बालेन शाह से बुरी तरह पिछड़ते दिख रहे हैं। शुरुआती गिनती में जहाँ बालेन शाह ने 1,478 वोटों के साथ मजबूत बढ़त बनाई है, वहीं ओली महज 384 वोटों पर टिके हुए हैं। यह केवल एक सीट की हार-जीत नहीं है, बल्कि नेपाल के युवाओं द्वारा पुरानी व्यवस्था को नकारने का स्पष्ट संदेश है।

    काठमांडू के सभी 10 निर्वाचन क्षेत्रों में RSP का ‘क्लीन स्वीप’ होता दिख रहा है। पार्टी की युवा उम्मीदवार रंजू दर्शना ने काठमांडू-1 से भारी अंतर से जीत हासिल की है, उन्हें अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी नेपाली कांग्रेस के प्रबल थापा छेत्री से लगभग दोगुने वोट मिले हैं। इसी तरह बिराज भक्त श्रेष्ठ और गणेश पराजुली जैसे नए चेहरों ने भी अपनी सीटों पर जीत का परचम लहराया है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार 60% मतदान हुआ, जिसमें करीब 10 लाख नए युवा वोटरों ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई। इन युवाओं ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और खराब गवर्नेंस के खिलाफ मतदान कर ‘घंटी’ (RSP का चुनाव चिह्न) को अपनी पहली पसंद बनाया है।

    दूसरी तरफ, वामपंथी दलों और नेपाली कांग्रेस के लिए ये नतीजे किसी दुःस्वप्न से कम नहीं हैं। पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ और केपी शर्मा ओली की पार्टियां अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने में नाकाम रही हैं। यहाँ तक कि गगन थापा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस भी RSP की आंधी के आगे बेबस नजर आ रही है। भारत ने भी नेपाल की इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नेपाल की जनता को इस ऐतिहासिक चुनाव के सफल आयोजन के लिए बधाई देते हुए शांति और प्रगति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई है। मतगणना 9 मार्च तक पूरी होने की उम्मीद है, लेकिन रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि नेपाल अब एक नए और युवा नेतृत्व की ओर मजबूती से कदम बढ़ा चुका है।

  • ईरान-इजरायल युद्ध का वैश्विक ऊर्जा संकट: दुनिया भर में महंगी हुई रसोई गैस, जानें भारत पर क्या होगा असर?

    ईरान-इजरायल युद्ध का वैश्विक ऊर्जा संकट: दुनिया भर में महंगी हुई रसोई गैस, जानें भारत पर क्या होगा असर?

    नई दिल्ली ।  पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने न केवल वैश्विक भू-राजनीति को प्रभावित किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भी भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। मार्च 2026 की शुरुआत के साथ ही वैश्विक बाजार में रसोई गैस LPG की कीमतों में बड़ी हलचल देखी जा रही है। globalpetrolprices.com द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2 मार्च 2026 तक दुनिया भर में एलपीजी की औसत कीमत 71.96 भारतीय रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गई है। यह उछाल मुख्य रूप से ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी सैन्य संघर्ष और लॉजिस्टिक बाधाओं का परिणाम माना जा रहा है।

    वैश्विक स्तर पर कीमतों का विश्लेषण करें तो यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है कि अमीर और ऊर्जा आयात करने वाले देशों में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। अल्जीरिया, अंगोला, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हाल के दिनों में एलपीजी की दरों में वृद्धि दर्ज की गई है। इसके विपरीत, रूस और बेलारूस जैसे देशों में मामूली गिरावट देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों तक सबकी पहुंच समान है, लेकिन विभिन्न देशों द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स और दी जाने वाली सब्सिडी के कारण खुदरा कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर पैदा हो जाता है।

    भारतीय उपभोक्ताओं के लिए इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है। जहां दुनिया भर के कई देशों में गैस की कीमतें बढ़ रही हैं, वहीं भारत में फिलहाल एलपीजी की कीमतें 59.9 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर बनी हुई हैं। इंडियन ऑयल के ताजा डेटा के अनुसार, देश की राजधानी दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाला घरेलू सिलेंडर ₹853 में उपलब्ध है, जबकि मुंबई में यह ₹852.50 की दर से बिक रहा है। हालांकि, भौगोलिक स्थिति के कारण पटना में इसकी कीमत ₹951 और लखनऊ में ₹890.50 तक पहुंच गई है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों जैसे कारगिल में सिलेंडर ₹985.5 और पुलवामा में ₹969 में मिल रहा है।

    वाणिज्यिक मोर्चे पर भी कीमतों में स्थिरता देखी जा रही है। दिल्ली में 19 किलो वाला कमर्शियल सिलेंडर 1768.50 रुपये और मुंबई में 1720 रुपये में मिल रहा है, जबकि चेन्नई में इसकी कीमत 1929 रुपये है। लेकिन यह स्थिरता कितनी लंबी टिकेगी, यह हॉर्मुज जलमार्ग की स्थिति पर निर्भर करता है। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की एक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लंबा खिंचता है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य Strait of Hormuz को अवरुद्ध कर दिया जाता है, तो पूरा एशिया ऊर्जा संकट की चपेट में आ सकता है।

    चूँकि एशिया के अधिकांश देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी जलमार्ग पर निर्भर हैं, इसलिए हॉर्मुज की नाकेबंदी कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह ध्वस्त कर सकती है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यदि वैश्विक तनाव और बढ़ता है, तो कच्चे तेल और गैस के दामों में होने वाला उतार-चढ़ाव भारतीय बाजार को भी प्रभावित कर सकता है। फिलहाल सरकार की सब्सिडी नीतियों और स्टॉक प्रबंधन ने आम आदमी की जेब को सुरक्षित रखा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

  • US-Iran संघर्ष के बीच PM मोदी ने की फ्रांस के राष्ट्रपति से चर्चा, जानें किन मुद्दों पर हुई बात

    US-Iran संघर्ष के बीच PM मोदी ने की फ्रांस के राष्ट्रपति से चर्चा, जानें किन मुद्दों पर हुई बात


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में तेजी से बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष (US-Iran conflict) के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने गुरुवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (French President Emmanuel Macron) से टेलीफोन पर बातचीत की। इस बातचीत में पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति पर भारत और फ्रांस की साझा चिंताओं पर विस्तार से चर्चा हुई, साथ ही संवाद और कूटनीति के माध्यम से शांति बहाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक पश्चिम एशिया के कई नेताओं से बात की है। भारत क्षेत्र में शांति और स्थिरता की बहाली के लिए कूटनीतिक प्रयासों को मजबूती से समर्थन दे रहा है, ताकि यह संघर्ष और व्यापक न हो सके।

    प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि आज मैंने अपने मित्र राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बात की। हमने पश्चिम एशिया में बदलती स्थिति पर अपनी साझा चिंताओं और संवाद एवं कूटनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा की। हम क्षेत्र में शांति और स्थिरता की शीघ्र बहाली के लिए घनिष्ठ रूप से जुड़े रहेंगे और प्रयासों का समन्वय करेंगे।

    दरअसल, यह फोन कॉल ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व का संघर्ष तेजी से फैल रहा है और अब यह भारत के निकटवर्ती क्षेत्रों तक पहुंच गया है। बुधवार को श्रीलंका के तट से कुछ दूर अंतरराष्ट्रीय जल में अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना को टॉरपीडो से नष्ट कर दिया। इस हमले में कम से कम 80 से अधिक नाविकों की मौत हो गई, जबकि श्रीलंका की नौसेना ने 32 लोगों को बचाया। जहाज में कुल 180 लोग सवार थे। बता दें कि यह ईरानी फ्रिगेट कुछ दिन पहले ही भारत में हुए अंतरराष्ट्रीय नौसेना अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद लौट रहा था।

    बता दें कि ईरान इजरायल और अमेरिका संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संयुक्त सैन्य हमलों से हुई, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इसके बाद ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर जवाबी हमलों की शुरूआत की, जिससे स्थिति और भयावह हो गई। पिछले कुछ दिनों में दोनों पक्षों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का दौर जारी है। इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने श्रीलंका तट पर हुए हमले की कड़ी निंदा की और इसे ‘बिना किसी चेतावनी के अत्याचार’ करार दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका को इस मिसाल पर गहरा अफसोस होगा।