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  • सऊदी से रक्षा समझौते के बाद भी खामोश पाकिस्तान, ईरानी हमलों पर नहीं दिखी सैन्य प्रतिक्रिया

    सऊदी से रक्षा समझौते के बाद भी खामोश पाकिस्तान, ईरानी हमलों पर नहीं दिखी सैन्य प्रतिक्रिया


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुआ संघर्ष अब कई देशों को प्रभावित करता नजर आ रहा है। इसी बीच आशंका जताई जा रही है कि इसका असर पाकिस्तान तक भी पहुंच सकता है। इसकी वजह पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ सुरक्षा समझौता है, जिसके मुताबिक किसी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि हालिया हालात में पाकिस्तान इस समझौते के अनुरूप कदम उठाता नजर नहीं आ रहा है। ईरान पहले ही सऊदी अरब के कई इलाकों पर हमले कर चुका है।

    क्या है समझौते की शर्तें
    सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता (SMDA) हुआ था, जिसने दोनों देशों के सुरक्षा सहयोग को औपचारिक रूप दिया। समझौते के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया था कि किसी एक देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा और दोनों मिलकर उसका जवाब देंगे।

    रिपोर्ट के अनुसार इस समझौते में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी तीसरे देश द्वारा पाकिस्तान पर हमला होता है, तो उसे सऊदी अरब पर हमला माना जाएगा और सऊदी अरब को भी जवाब देने का अधिकार होगा।

    ईरान के हमले, लेकिन पाकिस्तान की चुप्पी
    हाल के समय में ईरान ने सऊदी अरब के कई शहरों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। सऊदी अरब की रिफाइनरी को भी निशाना बनाया गया। इसके बावजूद पाकिस्तान की ओर से समझौते के तहत किसी तरह की सैन्य कार्रवाई या जवाबी कदम सामने नहीं आए हैं।

    अपने ही समझौते में उलझा पाकिस्तान?
    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इन हमलों की निंदा करते हुए सऊदी अरब के साथ एकजुटता जताई है। हालांकि उन्होंने सऊदी अरब को सैन्य सहायता देने या ईरान के खिलाफ कार्रवाई की कोई घोषणा नहीं की। इससे यह संदेश जा रहा है कि पाकिस्तान फिलहाल इस समझौते को पूरी तरह लागू करने से बच रहा है।

    विदेश मंत्री ने क्या कहा
    पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने मंगलवार को कहा कि संघर्ष शुरू होने के समय वह सऊदी अरब और ईरान के नेताओं के संपर्क में थे। उन्होंने इस्लामाबाद में मीडिया को बताया कि उस समय वह इस्लामी सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेने के लिए सऊदी अरब में मौजूद थे और उन्होंने सऊदी अरब तथा ईरान के विदेश मंत्रियों से बातचीत की।

    डार के मुताबिक उन्होंने अपने ईरानी समकक्ष को बताया कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ पारस्परिक रक्षा समझौता है। इस पर ईरानी पक्ष ने उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा कि सऊदी अरब की जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ न हो।

    उन्होंने दावा किया कि इस बातचीत के बाद सऊदी अरब पर युद्ध का प्रभाव बेहद सीमित रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस संघर्ष को खत्म करने के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से उन्होंने तुर्की, बांग्लादेश, फिलिस्तीन, ईरान, उज्बेकिस्तान, सऊदी अरब, कतर, ओमान, इराक, बहरीन और अजरबैजान के विदेश मंत्रियों के अलावा यूरोपीय संघ के उपाध्यक्ष और संयुक्त अरब अमीरात के उपप्रधानमंत्री से भी फोन पर बातचीत की है।

  • नेपाल में बड़ा बदलाव…. आज हो रहा मतदान, ओली के गढ़ में चुनौती बने Gen Z नेता बालेन

    नेपाल में बड़ा बदलाव…. आज हो रहा मतदान, ओली के गढ़ में चुनौती बने Gen Z नेता बालेन


    काठमांडु।
    नेपाल (Nepal) में आज (गुरुवार) मतदान (Voting) हो रहा है और इस बार हिमालयी देश के राजनीतिक माहौल में एक बड़ा पीढ़ीगत बदलाव (Big Generational Change) देखने को मिल रहा है। यह चुनाव मुख्य रूप से नेपाल के पारंपरिक नेतृत्व और बदलाव की मांग कर रहे युवा मतदाताओं (Young Voters) के बीच का संघर्ष बन गया है।


    युवा आक्रोश और झापा-5 का महामुकाबला

    काठमांडू और नेपाल के अन्य शहरों में, ‘जेन जी’ यानी युवा मतदाताओं का वर्ग नेपाल के पुराने और पारंपरिक नेतृत्व से निराश व बेचैन हो चुका है। यह वही युवा वर्ग है जिसने केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था और 35 वर्षीय बालेन शाह जैसे युवा नेताओं को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया था।

    तमाम उथल-पुथल के बावजूद, केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति के सबसे कद्दावर और स्थायी चेहरों में से एक बने हुए हैं। पूर्वी नेपाल में भारत की सीमा से लगा उनका चुनाव क्षेत्र ‘झापा-5’ दशकों से उनके राजनीतिक करियर का मजबूत गढ़ रहा है। इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है क्योंकि युवा नेता बालेन ने सीधे तौर पर झापा-5 से ओली को चुनौती देने का फैसला किया है, मानो वे कोई बड़ा संदेश देना चाहते हों।


    विद्रोही से सत्ता के शिखर तक का सफर

    1952 में जन्मे ओली का राजनीतिक सफर नेपाल के ‘पंचायत युग’ के दौरान शुरू हुआ, जब देश में राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध था। 1970 में एक किशोर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने राजशाही की दल-विहीन व्यवस्था का कड़ा विरोध किया। अक्टूबर 1973 में ‘झापा विद्रोह’ और राजशाही विरोधी गतिविधियों के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने अपनी जिंदगी के 14 साल जेल में बिताए, जिनमें से चार साल उन्हें कालकोठरी में रखा गया था। 2018 में एक विश्लेषक ने बताया था कि पंचायत युग की जेलों से निकले नेताओं का मानना था कि सत्ता का प्रयोग निर्णायक रूप से होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने देखा था कि इसे कितनी आसानी से कुचला जा सकता है।


    लोकतंत्र की बहाली और ओली का उदय

    1990 के जन आंदोलन के बाद जब नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र बहाल हुआ, तो ओली ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी UML के जरिए खुली राजनीति में प्रवेश किया। संसद में उन्होंने जल्द ही अपनी स्पष्ट बयानबाजी और तीखे व्यंग्य के लिए पहचान बना ली। वे राजनीतिक बहसों को शांतिपूर्ण समझौते के बजाय “सहनशक्ति और हाजिरजवाबी की प्रतियोगिता” के रूप में देखते थे।


    2015 का संकट और ‘राष्ट्रवादी’ छवि

    राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक छलांग 2015 में आई। जब नेपाल ने अपना नया संविधान अपनाया, तो भारत के साथ उसके रिश्ते काफी खराब हो गए। दक्षिणी सीमा पर हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण नेपाल में ईंधन, दवाओं और जरूरी चीजों की भारी कमी हो गई, जिसे नेपाल में भारत की ‘अघोषित नाकेबंदी’ के रूप में देखा गया। ओली ने इस संकट को नेपाल की संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव का मुद्दा बना दिया। इसी राष्ट्रवादी लहर के दम पर वामपंथी गठबंधन ने 2017 के चुनावों में भारी जीत हासिल की और ओली एक दुर्लभ संसदीय बहुमत के साथ सत्ता में लौटे।


    संवैधानिक संकट और सत्ता से बाहर

    उनके द्वारा किया गया राजनीतिक स्थिरता का वादा ज्यादा दिन नहीं टिक सका। अपनी ही पार्टी में विरोध का सामना करते हुए, ओली ने दिसंबर 2020 में संसद भंग कर दी (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में बहाल किया)। मई 2021 में उन्होंने फिर से संसद भंग कर दी, जिससे एक नया संवैधानिक संकट पैदा हुआ और आखिरकार उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। आलोचकों का कहना था कि जिस नेता ने राज्य की सत्ता का विरोध करते हुए वर्षों जेल में बिताए, वही अब सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक सीमाओं को लांघ रहा था।


    बालेन का राजनीतिक सफर

    बालेन्द्र शाह (जिन्हें नेपाल में लोकप्रिय रूप से ‘बालेन’ कहा जाता है) का राजनीतिक सफर नेपाल के आधुनिक इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है। एक अंडरग्राउंड रैपर और स्ट्रक्चरल इंजीनियर से लेकर नेपाल के प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार बनने तक का उनका सफर, पारंपरिक राजनीति को सीधी चुनौती देने वाला रहा है। बालेन का जन्म 27 अप्रैल 1990 को काठमांडू में हुआ था। राजनीति में आने से पहले वे एक पेशेवर इंजीनियर रहे हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया और फिर भारत (कर्नाटक) से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री (MTech) हासिल की। वर्तमान में वे काठमांडू विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी (PhD) भी कर रहे हैं।


    रैपर के रूप में लोकप्रियता और सामाजिक चेतना

    म्यूजिक और ‘रैप बैटल’: 2013 के आसपास नेपाल के अंडरग्राउंड हिप-हॉप और ‘रैप बैटल’ (जैसे ‘Raw Barz’) के जरिए बालेन को खासी पहचान मिली। उनके गानों के बोल कोई सामान्य गीत नहीं थे; वे अक्सर भ्रष्टाचार, असमानता और राजनीतिक कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार करते थे। इसी संगीत ने उन्हें पहली बार युवाओं के बीच एक विद्रोही आइकन के रूप में स्थापित किया। राजनीति में उनका असली उदय 2022 के स्थानीय चुनावों में हुआ, जब उन्होंने एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर पद का चुनाव लड़ा।

    बिना किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन के, उन्होंने नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल (CPN-UML) जैसी मजबूत पार्टियों के दिग्गज उम्मीदवारों को भारी अंतर से हराकर पूरे देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। मेयर के रूप में बालेन ने कई कड़े और मुखर फैसले लिए। उन्होंने अवैध कब्जों को हटाने के लिए अभियान चलाया, दशकों पुरानी कचरा प्रबंधन की समस्या को सुलझाने की कोशिश की और नेपाल में पहली बार नगर निगम की बैठकों का सीधा प्रसारण शुरू किया। हालांकि, उनके कुछ आक्रामक फैसलों की आलोचना भी हुई, लेकिन युवाओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई।

    ‘Gen Z’ विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम
    जब नेपाल में भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ युवाओं (Gen Z) का भारी विरोध प्रदर्शन हुआ- जिसके कारण अंततः केपी शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा- तो बालेन ने मुखर होकर इस युवा क्रांति का समर्थन किया। प्रदर्शनों के दौरान वे एक अघोषित नेता के रूप में उभरे। हालांकि कई युवाओं ने उन्हें अंतरिम नेतृत्व संभालने को कहा, लेकिन बालेन ने स्पष्ट किया कि वे सत्ता हथियाने के बजाय लोकतांत्रिक तरीके (बैलेट बॉक्स) से व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हैं।

    2026 का राष्ट्रीय चुनाव: पुराने दिग्गजों को सीधी चुनौती
    राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के इरादे से, बालेन ने जनवरी 2026 में काठमांडू के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने पूर्व टीवी होस्ट रबि लामिछाने के नेतृत्व वाली युवाओं की लोकप्रिय ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) के साथ गठबंधन किया और इस चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए। किसी आसान या सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के बजाय, बालेन ने नेपाल के कद्दावर नेता और चार बार के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को उनके ही गढ़ ‘झापा-5’ में चुनौती देने का साहसिक फैसला किया।

    क्या विद्रोही का भविष्य अब भी बाकी है?
    ओली 2024 में गठबंधन सरकार के हिस्से के रूप में एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लौटे। लेकिन पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक ‘जेन जी’ विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें भारी जनआक्रोश का सामना करना पड़ा और अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। कई लोगों का मानना था कि उनका राजनीतिक करियर अब खत्म हो गया है। इसके बावजूद, ओली झापा-5 से एक बार फिर चुनावी मैदान में डटे हैं। जेल, राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता विरोधी लहरों को मात देने वाले इस नेता का सामना अब उन युवा मतदाताओं से है, जो यह तय करेंगे कि नेपाल की राजनीति में इस कद्दावर नेता का अब कोई भविष्य बचा है या नहीं।

  • टैरिफ विवाद पर ट्रंप का बड़ा झटका…. कोर्ट ने दिए रिफंड के आदेश, कहा- कंपनियों को लौटाएं पैसे

    टैरिफ विवाद पर ट्रंप का बड़ा झटका…. कोर्ट ने दिए रिफंड के आदेश, कहा- कंपनियों को लौटाएं पैसे


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) में टैरिफ विवाद (Tariff Dispute) में बड़ा मोड़ आ गया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट (American Supreme Court) के फैसले के बाद अब न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने भी ट्रंप प्रशासन को झटका दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जिन कंपनियों ने ट्रंप सरकार की तरफ से लगाए गए आयात टैरिफ का भुगतान किया था, उन्हें अब पैसा वापस किया जाएगा। यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के जज रिचर्ड ईटन ने कहा कि सभी आयातक कंपनियां यूएस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का लाभ पाने की हकदार हैं, जिसमें पिछले महीने ट्रंप के कई टैरिफ को असंवैधानिक बताया गया था।

    फैसला सुनाते हुए यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में न्यायाधीश रिचर्ड ईटन ने कहा कि सभी आयातक रिकॉर्ड के मालिक इस फैसले का लाभ पाने के हकदार हैं। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के बाद आया, जिसमें अमेरिकी टैरिफ को अवैध बताते हुए कहा गया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 1977 की अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए टैरिफ संविधान के खिलाफ हैं।


    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक नजर

    इतना ही नहीं अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा था कि राष्ट्रपति अकेले टैरिफ तय और बदल नहीं सकते, क्योंकि कर लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस का है। इस फैसले में पारस्परिक टैरिफ, जो लगभग सभी देशों पर लगाए गए थे, को भी अवैध घोषित किया गया।


    कंपनियों के रिफंड पर कोर्ट सख्त

    न्यायाधीश ईटन ने अपने फैसले में कहा कि वह अकेले आईईईपीए टैरिफ की वापसी के मामलों को सुनेंगे। इससे यह साफ हुआ कि कंपनियों को टैरिफ लौटाने की प्रक्रिया कैसे होगी, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसका जिक्र नहीं किया। इसपर वकील रयान मेजरस ने कहा कि सरकार शायद इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी या वापसी की प्रक्रिया को रोकने के लिए समय मांगेगी।


    ट्रंप ने 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर इकट्ठा किए थे

    बता दें कि अमेरिका सरकार ने अब तक इन टैरिफ से 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर इकट्ठा किए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार को कुल 175 बिलियन डॉलर तक की वापसी करनी पड़ सकती है। ऐसे में यह फैसला विशेष रूप से एटमस निस्पंदन, नाशविल, टेनेसी की कंपनी के मामले पर आया है, जिसने टैरिफ की वापसी का दावा किया था। यह कंपनी फिल्टर्स और अन्य फिल्ट्रेशन प्रोडक्ट बनाती है।

    इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जब कोई सामान अमेरिका में आता है, तो यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन उसका अंतिम हिसाब करती है, जिसे लिक्विडेशन कहते हैं। लिक्विडेशन के बाद आयातकों को 180 दिन का समय मिलता है, जिसके अंदर वे टैरिफ पर आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। इसके बाद यह हिसाब कानूनी रूप से अंतिम माना जाता है।


    न्यायाधीश ने कस्टम्स को दिए ये निर्देश

    न्यायाधीश ने आगे आदेश दिया कि कस्टम्स उन टैरिफ को इकट्ठा करना बंद करें, जो सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित किए। और यदि कोई सामान पहले ही लिक्विडेशन प्रक्रिया से गुजर चुका है, तो उसका हिसाब बिना टैरिफ के फिर से किया जाएगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद न्यूयॉर्क लॉ स्कूल के प्रोफेसर बैरी एप्पलटन ने कहा कि यह आयातकों और उपभोक्ताओं के लिए बहुत अच्छा फैसला है। इससे कस्टम्स ब्रोकरों की भी बहुत व्यस्तता बढ़ेगी और कोर्ट के लिए प्रक्रिया आसान होगी।


    पिछले सोमवार को भी संघीय अदालत ने दिया था फैसला

    गौरतलब है कि पिछले सोमवार को एक अन्य संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन की वापसी रोकने की कोशिश को खारिज कर दिया। इसके बाद अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने इसे न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट में भेजा, ताकि वहां वापसी की अगली प्रक्रिया शुरू हो सके। अब यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन को यह तय करना होगा कि बड़ी मात्रा में टैरिफ की वापसी कैसे की जाए। वकील एलेक्सिस अर्ली के मुताबिक, “कस्टम्स आमतौर पर गलती होने पर टैरिफ लौटाते हैं, लेकिन उनका सिस्टम बड़े पैमाने पर वापसी के लिए नहीं बना है। यहां सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक प्रक्रिया की होगी।

  • अमेरिका ने भारत की तरफ आ रहे ईरानी 'विध्वंसक' पोत को श्रीलंका के तट पर डुबोया, 87 लोगों की मौत

    अमेरिका ने भारत की तरफ आ रहे ईरानी 'विध्वंसक' पोत को श्रीलंका के तट पर डुबोया, 87 लोगों की मौत


    कोलंबो।
    अमेरिका (America) ने बुधवार (4 मार्च) को श्रीलंका (Sri Lanka) के तट के पास एक पनडुब्बी हमले की जिम्मेदारी ली है, जिसमें एक ईरानी नौसैनिक युद्धपोत (फ्रिगेट) (Iranian Naval Frigate) डूब गया। श्रीलंका के उप विदेश मंत्री ने बताया कि हिंद महासागर (Indian Ocean) में हुए इस हमले में कम से कम 87 लोगों की मौत हो गई है। ईरानी युद्धपोत ‘IRIS देना’ गैले के तटीय शहर से लगभग 40 समुद्री मील दूर, श्रीलंकाई क्षेत्र के बाहर लेकिन उसके आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर था। स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग 5:30 बजे जहाज से खतरे का सिग्नल भेजा गया।

    श्रीलंकाई नौसेना ने बीबीसी को बताया कि जहाज पर मौजूद अनुमानित 180 लोगों में से 32 को बचा लिया गया है। लापता लोगों की सटीक संख्या अभी अज्ञात है। श्रीलंका के पोर्ट शहर गाले के हॉस्पिटल अधिकारियों ने कहा कि 87 शव लाए गए हैं। श्रीलंकाई अधिकारियों ने कहा कि 32 और लोगों को बचा लिया गया और उनका हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है, और जहाज पर सवार लगभग 180 लोगों में से लगभग 60 लोगों का शायद कोई पता नहीं है।

    अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि एक अमेरिकी पनडुब्बी ने उस ईरानी युद्धपोत को टारपीडो से डुबा दिया, जो सोचता था कि वह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित है। उन्होंने इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से टारपीडो द्वारा किसी दुश्मन जहाज को डुबाने की पहली घटना करार दिया है। इस जहाज का डूबना ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका और इजरायल के एक समन्वित सैन्य अभियान में ईरानी सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया है और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ-साथ कई वरिष्ठ अधिकारियों को मार गिराया गया है। जवाबी कार्रवाई में, ईरान ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य संपत्तियों पर हमले किए हैं।


    भारत के ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू’ से लौट रहा था जहाज

    IRIS देना 17 और 18 फरवरी को विशाखापत्तनम में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 (IFR 2026) से वापस लौट रहा था। इस अभ्यास में 19 विदेशी युद्धपोतों सहित कुल 85 जहाजों ने हिस्सा लिया था। भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वदेश निर्मित अपतटीय गश्ती पोत INS सुमेधा से फ्लीट की समीक्षा की थी, जिसने इस अवसर पर ‘प्रेसिडेंशियल यॉट’ के रूप में काम किया। यह आयोजन भारतीय नौसेना के मेगा द्विवार्षिक अभ्यास ‘मिलन’ (MILAN) और ‘हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी’ (IONS) से जुड़ा हुआ था।

    इसे 2021 में ईरान के स्वदेश निर्मित ‘मौज क्लास’ मल्टी-रोल गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट के हिस्से के रूप में कमीशन किया गया था। ईरान इसे विध्वंसक कहता है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लाइट फ्रिगेट माना जाता है। यह युद्धपोत सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों, तोप, मशीनगनों और टारपीडो लॉन्चर से लैस था।

    यह स्वदेश निर्मित चार ‘बोनयान 4’ इंजनों (प्रत्येक 5,000 हॉर्सपावर) और बेहतर गतिशीलता के लिए बो-थ्रस्टर सिस्टम से लैस ईरान का पहला जहाज था। 2023 में, इसने IRIS मकरान (एक ऑयल टैंकर जिसे सपोर्ट शिप में बदला गया था) के साथ दुनिया का 360-डिग्री चक्कर लगाया था। फरवरी 2023 में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने इन दोनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।


    अंतरराष्ट्रीय कानून और हमले की वैधता पर सवाल

    श्रीलंका के पास हुए इस ताजा हमले ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सैन्य हमलों की वैधता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (UNCLOS) के अनुच्छेद 88 के तहत अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए आरक्षित माना जाता है, इसलिए वहां सैन्य हमले आमतौर पर प्रतिबंधित हैं। 2022 के ‘लीडेन जर्नल ऑफ इंटरनेशनल लॉ’ के अनुसार, कोई देश आत्मरक्षा में बल प्रयोग कर सकता है। इसके अलावा, रेड क्रॉस (ICRC) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति को भी एक आधार मानता है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ‘देना’ सीधे तौर पर किसी शत्रुतापूर्ण गतिविधि में शामिल था या नहीं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून UNCLOS के तहत आता है, जिसे ‘महासागरों का संविधान’ माना जाता है, लेकिन अमेरिका इसका हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।

  • ईरान पर हमले के लिए नाटो देश ने नहीं दिए सैन्य ठिकाने

    ईरान पर हमले के लिए नाटो देश ने नहीं दिए सैन्य ठिकाने

    वाशिंगटन। स्पेन द्वारा ईरान पर हमले के लिए अमेरिकी सेना को अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल से इनकार करने पर डोनाल्ड ट्रम्प भड़क गए हैं। ट्रम्प ने स्पेन पर पूर्ण व्यापार प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है और अपने 15 लड़ाकू विमान वापस बुला लिए हैं।

    अमेरिका और स्पेन के बीच तनाव अचानक गहरा गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो (NATO) और यूरोपीय सहयोगी स्पेन पर पूर्ण व्यापार प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है। यह विवाद स्पेन द्वारा अमेरिका को ईरान पर हमले से जुड़े मिशनों के लिए अपने सैन्य ठिकानों का उपयोग करने से रोकने के बाद उत्पन्न हुआ है।
    विवाद का मुख्य कारण
    सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल पर रोक: स्पेन के समाजवादी नेतृत्व ने अमेरिकी सेना को ईरान पर संभावित हमले के लिए स्पेन स्थित ठिकानों का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

    विमानों की वापसी: इसके परिणामस्वरूप, अमेरिका ने दक्षिणी स्पेन में स्थित रोटा और मोरन सैन्य ठिकानों से अपने 15 विमानों (जिनमें ईंधन भरने वाले टैंकर भी शामिल हैं) को हटा लिया है।
    डोनाल्ड ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया

    व्यापार खत्म करने की चेतावनी: जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ एक बैठक के दौरान ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा- स्पेन का रवैया बहुत खराब रहा है। उन्होंने अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट को स्पेन के साथ सभी लेन-देन और व्यापार बंद करने का निर्देश दिया है।

    रक्षा बजट पर निशाना: ट्रंप ने स्पेन द्वारा नाटो देशों के लिए तय की गई ‘जीडीपी के 5% रक्षा खर्च’ की मांग को अनसुना करने पर भी नाराजगी जताई।

    विशेषाधिकार का दावा: पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके व्यापक वैश्विक टैरिफ को अवैध ठहराए जाने से निराश ट्रंप ने जोर देते हुए कहा- स्पेन के साथ होने वाले सभी व्यापार को रोकने का मुझे अधिकार है… और हम स्पेन के साथ ऐसा कर सकते हैं।
    जर्मनी का स्पष्ट रुख: कोई अलग व्यवहार नहीं
    जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने ट्रंप के साथ बैठक के बाद स्पष्ट किया कि अमेरिका यूरोपीय संघ (EU) के एक सदस्य को अलग-थलग नहीं कर सकता। उन्होंने ट्रंप को निजी तौर पर बताया कि ब्रुसेल्स और वाशिंगटन के बीच हुए व्यापार समझौते से स्पेन को बाहर नहीं किया जा सकता।

    मर्ज ने कहा- हम अमेरिका के साथ टैरिफ पर एक साथ (यूरोपीय संघ के रूप में) बातचीत करते हैं या बिल्कुल नहीं करते हैं। स्पेन के साथ विशेष रूप से बुरा व्यवहार करने का कोई तरीका नहीं है। हालांकि, मर्ज ने यह भी कहा कि यूरोप भीतर से स्पेन पर रक्षा बजट बढ़ाकर 3% या 3.5% तक करने का दबाव बना रहा है, लेकिन इसका व्यापार से कोई लेना-देना नहीं है।
    क्या कानूनी तौर पर यह प्रतिबंध संभव है?
    अमेरिकी प्रशासन की तैयारी: ट्रेजरी सचिव बेसेंट और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमिसन ग्रीर ने कहा कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबंध के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और वाणिज्य विभाग इसकी जांच शुरू करेगा।

    कानूनी अड़चनें (हाई बार): जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की व्यापार कानून विशेषज्ञ जेनिफर हिलमैन के अनुसार, ट्रंप को ऐसा करने के लिए स्पेन को अमेरिका के लिए एक असामान्य और असाधारण खतरा घोषित करते हुए ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ लागू करना होगा। एनवाईयू के प्रोफेसर पीटर शेन ने कहा कि ईरान पर बिना उकसावे के हमले के लिए स्पेन द्वारा ठिकाने न देना, अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘असाधारण खतरा’ कैसे हो सकता है, यह साबित करना बेहद मुश्किल है।
    स्पेन की प्रतिक्रिया और आर्थिक स्थिति
    स्पेन का जवाब: स्पेन सरकार ने एक बयान में कहा कि अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय कानून, निजी व्यवसायों की स्वायत्तता और अमेरिका-यूरोपीय संघ के द्विपक्षीय व्यापार समझौतों का सम्मान करना चाहिए। मैड्रिड ने कहा कि उसके पास संभावित प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने और प्रभावित क्षेत्रों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं।

    पीएम पेड्रो सांचेज़ का रुख: स्पेन के वामपंथी विचारधारा वाले प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ इससे पहले भी ट्रम्प की नाराजगी मोल ले चुके हैं, जब उन्होंने इजरायल को हथियार ले जाने वाले जहाजों को स्पेन में रुकने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।

    आर्थिक आंकड़े (2025): स्पेन जैतून के तेल (olive oil) का दुनिया का शीर्ष निर्यातक है और अमेरिका को ऑटो पार्ट्स, स्टील और रसायन निर्यात करता है। 2025 में, अमेरिका और स्पेन के बीच व्यापार में अमेरिका 4.8 बिलियन डॉलर के फायदे में था (अमेरिका ने 26.1 बिलियन डॉलर का निर्यात किया, जबकि 21.3 बिलियन डॉलर का आयात किया)। अमेरिका स्पेन को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस (LNG) बेचता है।

  • अफगान-पाक संघर्ष: तालिबान का दावा- 5 दिन में मारे 150 PAK सैनिक, 40 पोस्ट पर किया कब्जा

    अफगान-पाक संघर्ष: तालिबान का दावा- 5 दिन में मारे 150 PAK सैनिक, 40 पोस्ट पर किया कब्जा


    नई दिल्ली। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दुर्गम डूरंड लाइन पर चल रहा तनाव अब खुले सशस्त्र संघर्ष में बदल चुका है। अफगान सीमा बलों के प्रवक्ता अबीदुल्लाह उकाब ने बताया कि बीते पांच दिनों में अफगान-तालिबान डिफेंस फोर्सेज ने पाकिस्तान की सेना को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार इस लड़ाई में अब तक लगभग 150 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए हैं, करीब 200 घायल हुए हैं और पाकिस्तान के 40 पोस्ट तालिबान-अफगान लड़ाकों के कब्जे में आ गए हैं।
    अफगान-तालिबान का दावा
    अफगान सीमा बलों के प्रवक्ता अबीदुल्लाह उकाब ने मंगलवार को बताया कि अफगान डिफेंस मिनिस्टर के हवाले से कहा गया है कि तालिबान- अफगान फोर्सेज पाकिस्तान की हरकतों का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पाकिस्तानी सेना की कई पोस्टों को बम के जरिए नष्ट किया गया।

    ड्रोन भी हुए तबाह
    अफगान फोर्स ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कई ड्रोन को नष्ट कर दिया गया। इनमें छोटे इंटेलिजेंस ड्रोन भी शामिल हैं, जो अफगान फोर्सेज की गतिविधियों की जासूसी के लिए भेजे गए थे।

    सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल
    अफगान-तालिबान ने कुछ वीडियो भी जारी किए हैं, जिनमें उनके लड़ाके पाकिस्तानी पोस्ट पर कब्जा करते हुए दिख रहे हैं। वीडियो में अफगान लड़ाके हथियार, वायरलेस सेट और अन्य सैन्य सामग्री लूटते नजर आए। कई पाकिस्तानी सैनिक हाथ उठाकर भागते हुए दिखे, और उनके उपकरण अफगान कब्जे में चले गए। ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं और दोनों पक्षों के बीच प्रचार युद्ध को और बढ़ा रहे हैं।

    पाकिस्तानी पक्ष का जवाब
    अफगान दावों पर पाकिस्तान की सेना या सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। वहीं पाकिस्तानी अधिकारियों ने अफगान पक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि उनकी कार्रवाई में अफगान तालिबान के सैकड़ों लड़ाके मारे गए हैं और कई ठिकानों पर पाकिस्तान ने कब्जा किया है। वर्तमान में सीमा पर तनाव चरम पर है और अफगान फोर्स अपनी जीत का दावा मजबूत कर रही है।

    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
    संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील की है। इस संघर्ष ने क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ा दी है और हजारों नागरिक विस्थापित हो चुके हैं।

  • ‘पहले वार नहीं करते तो वे कर देते’, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान हमलों को ठहराया जरूरी कदम

    ‘पहले वार नहीं करते तो वे कर देते’, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान हमलों को ठहराया जरूरी कदम


    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हालिया अमेरिकी सैन्य हमलों का जोरदार बचाव करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई मजबूरी में की गई। उनके मुताबिक खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर आशंका थी कि तेहरान पहले हमला कर सकता है। ट्रंप ने दावा किया कि यदि अमेरिका ने पहले कदम नहीं उठाया होता तो स्थिति परमाणु टकराव तक पहुंच सकती थी।

    पश्चिम एशिया में चौथे दिन भी तनाव बरकरार
    पश्चिम एशिया में तनाव लगातार चौथे दिन भी बना हुआ है। 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल की ओर से किए गए हवाई हमलों में अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मारे जाने की खबर है। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इज़राइल से जुड़े ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन घटनाओं ने पूरे इलाके की सुरक्षा स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

    ‘ईरान एक महीने में बना सकता था परमाणु हथियार’
    व्हाइट हाउस में फ्रेडरिक मर्ज के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका बातचीत के पक्ष में था, लेकिन उन्हें अचानक हमले की आशंका थी। उनका कहना था, “अगर हमने अभी जो किया, वह नहीं किया होता, तो वे पहले हमला कर देते।” ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान एक महीने के भीतर परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में पहुंच सकता था। उन्होंने ईरानी शासन को ‘खतरनाक और चरमपंथी विचारधारा वाला’ बताते हुए आरोप लगाया कि पिछले 47 वर्षों से वह वैश्विक अस्थिरता को बढ़ावा देता रहा है।

    ट्रंप ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि ओबामा प्रशासन ने ईरान के साथ ‘सबसे खराब समझौता’ किया था, जिसे उन्होंने अपने कार्यकाल में समाप्त कर दिया।

    ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ से ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर
    ट्रंप ने इस सैन्य अभियान को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम देते हुए दावा किया कि इस कार्रवाई में ईरान की मिसाइल क्षमता और एयर डिफेंस सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचा है। उनके अनुसार अब ईरान की सैन्य ताकत काफी हद तक कमजोर हो चुकी है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी ईरान के मौजूदा शासन को लेकर अमेरिका के साथ समान चिंता जताई। हालांकि ट्रंप ने कुछ यूरोपीय देशों के रुख पर नाराजगी जाहिर की और स्पेन तथा ब्रिटेन की आलोचना की, जबकि जर्मनी की सराहना की।

    खाड़ी देशों में भी बढ़ी चिंता
    तनाव का असर बहरीन, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक महसूस किया जा रहा है। ईरान की ओर से इन क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद आम नागरिकों और प्रवासी कामगारों की चिंताएं बढ़ गई हैं। लगातार बढ़ते सैन्य टकराव और तीखे बयानों के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है, और दुनिया की निगाहें अब आने वाले कूटनीतिक और सैन्य कदमों पर टिकी हैं।

  • ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच संघर्ष चौथे दिन भी जारी, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, खेल और तेल रूट भी प्रभावित

    ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच संघर्ष चौथे दिन भी जारी, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा, खेल और तेल रूट भी प्रभावित


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया से बड़ी खबर है, जहाँ एशियाई महिला फुटबॉल कप के उद्घाटन मैच में ईरानी महिला फुटबॉल टीम ने राष्ट्रगान नहीं गाया। खिलाड़ी लाइन में खड़ी रहीं, लेकिन चुप रहीं। कोच मारजियेह जाफरी मुस्कुराती रहीं। यह कदम हाल के अमेरिका और इजराइल के हमलों और ईरान के नेताओं की मौत के विरोध का प्रतीक माना जा रहा है। कप्तान जहरा घानबरी और कोच से खामेनेई की मौत पर सवाल किए गए, लेकिन उन्हें जवाब नहीं देने दिया गया।

    हार्मुज स्ट्रेट बंद: ईरान ने चेतावनी दी है कि इस रणनीतिक तेल रूट से गुजरने वाले जहाजों पर हमला किया जाएगा। भारत का करीब 50% तेल इसी मार्ग से आता है। अगर इस मार्ग को अवरुद्ध रखा गया, तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों में तेजी आने की संभावना है और भारत सहित तेल आयातक देशों पर दबाव बढ़ सकता है।

    जंग का हाल: चार दिन में 787 लोग मारे गए हैं। 153 शहरों को निशाना बनाया गया और कुल 1,039 हमले हुए। यह जानकारी ईरानियन रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने दी। बढ़ता हिंसक संघर्ष क्षेत्रीय सुरक्षा और मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन गया है।

    लेबनान में हिजबुल्लाह पर प्रतिबंध: राष्ट्रपति मिशेल औन ने घोषणा की कि हिजबुल्लाह को अपने हथियार सरकार को सौंपने होंगे। यह कदम लेबनान-इजराइल सीमा पर हालिया रॉकेट हमलों और बढ़ते तनाव के बीच उठाया गया। उनका कहना है कि अब युद्ध और शांति का निर्णय केवल लेबनानी राज्य के हाथ में होगा।

    इजराइल पर ईरान का मिसाइल हमला: ईरान की मिसाइल ने इजराइल के सेंट्रल शहर पेटाह टिकवा को निशाना बनाया। मिसाइल के टुकड़े शहर में गिरे, जिससे कुछ नुकसान हुआ। इजराइली मीडिया के अनुसार यह हमला अमेरिका और इजराइल की ईरान विरोधी सैन्य कार्रवाइयों के जवाब में किया गया।

    पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि ईरान पर चल रही जंग पाकिस्तान के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा कर रही है। उन्होंने जायनिस्ट विचारधारा और इजराइल की गतिविधियों को मुस्लिम दुनिया में अस्थिरता का मुख्य कारण बताया। पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने भी कहा कि पाकिस्तान को ट्रम्प द्वारा बनाए “बोर्ड ऑफ पीस” से बाहर निकलना चाहिए।

    फ्रांस तैयार: विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने कहा कि अगर फ्रांस के सहयोगी देशों को मदद की जरूरत पड़ी, तो फ्रांस रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। करीब 4 लाख फ्रांसीसी नागरिक प्रभावित देशों में मौजूद हैं, जिन्हें सुरक्षित लाने के लिए कमर्शियल और सैन्य उड़ानों की व्यवस्था की जाएगी।

    अंतरराष्ट्रीय असर: हार्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, क्षेत्रीय तनाव और ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।

  • ओमान में ईरान का हमला: भारतीय शिप पर भीषण हमला-तेल बाजार में भारी उछाल

    ओमान में ईरान का हमला: भारतीय शिप पर भीषण हमला-तेल बाजार में भारी उछाल


    नई दिल्ली।
     ओमान के समुद्री क्षेत्र में ईरानी हमलों के बीच भारतीय शिप एमकेडी वीओएम पर भयंकर हादसा हुआ, जिसमें कम से कम तीन भारतीयों की मौत हुई और 20 से अधिक लोग घायल हुए। हादसा मार्शैल आइलैंड्स के झंडे वाले जहाज पर मस्कट से 52 नॉटिकल माइलेज दूर हुआ। चालक दल के अन्य सदस्यों को पनामा झंडे वाले वाणिज्यिक पोत एमवी सैंड की मदद से सुरक्षित निकाल लिया गया।

    इस हमले के पीछे ईरान का ओमान की समुद्री सीमा पर हमला करना और अमेरिका–इजरायल के हालिया हमलों के जवाब में उठाया गया कदम माना जा रहा है। ओमान की रॉयल नेवी ने प्रभावित टैंकर की निगरानी शुरू कर दी है और समुद्री क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों को सतर्क किया गया है।

    इस हमले से वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मच गया। अमेरिकी क्रूड की कीमत 7.6 प्रतिशत बढ़कर 72.12 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड 8.6 प्रतिशत बढ़कर 79.11 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यूरोप में प्राकृतिक गैस वायदा कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की उछाल आई।

    ओमान में भारतीय मिशन लगातार स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है और सभी लापता चालक दल के सदस्यों को खोजने के प्रयास जारी हैं। इस हमले ने न केवल भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को चुनौती दी है बल्कि मध्यपूर्व और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर भी गंभीर प्रभाव डाला है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव के बीच कुवैत में 5-6 मार्च की सीबीएसई परीक्षाएं स्थगित

    अमेरिका-ईरान तनाव के बीच कुवैत में 5-6 मार्च की सीबीएसई परीक्षाएं स्थगित


    कुवैत सिटी। अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण खाड़ी क्षेत्र में बने तनावपूर्ण हालात को देखते हुए कुवैत में 5 और 6 मार्च को होने वाली 10वीं और 12वीं कक्षा की परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं। कुवैत स्थित भारतीय दूतावास ने मंगलवार को जानकारी दी कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने एहतियाती कदम के तौर पर यह फैसला लिया है।

    दूतावास की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि क्षेत्र में मौजूदा घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों की सुरक्षा और सुविधा को प्राथमिकता देते हुए यह निर्णय लिया गया है। स्थगित की गई परीक्षाओं की नई तिथियों की घोषणा बाद में की जाएगी।

    विज्ञप्ति के अनुसार, सीबीएसई 5 मार्च को स्थिति की समीक्षा करेगा और 7 मार्च से निर्धारित परीक्षाओं के संबंध में उचित निर्णय लेगा। विद्यार्थियों को सलाह दी गई है कि वे आगे की जानकारी के लिए अपने-अपने स्कूलों के संपर्क में रहें और केवल आधिकारिक घोषणाओं पर ही भरोसा करें।

    गौरतलब है कि इससे पहले बोर्ड ने बहरीन, ईरान सहित कुछ अन्य पश्चिम एशियाई देशों में 2 मार्च को निर्धारित 10वीं और 12वीं कक्षा की परीक्षाएं भी स्थगित कर दी थीं। क्षेत्र में जारी अस्थिर हालात को देखते हुए आगे की परीक्षाओं पर भी स्थिति की समीक्षा के बाद निर्णय लिया जाएगा।