Category: International

  • भारत–पाक संघर्ष पर ट्रम्प का बड़ा दावा, टैरिफ की धमकी से युद्ध टलने की बात, भारत ने बताया अलग सच

    भारत–पाक संघर्ष पर ट्रम्प का बड़ा दावा, टैरिफ की धमकी से युद्ध टलने की बात, भारत ने बताया अलग सच


    नई दिल्ली। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को उन्होंने टैरिफ की धमकी देकर रोका था। ट्रम्प के मुताबिक, उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी थी कि अगर संघर्ष जारी रहा तो अमेरिका 200 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकता है।

    ट्रम्प ने दावा किया कि इस आर्थिक दबाव के कारण दोनों देशों ने पीछे हटने का फैसला किया और संभावित बड़े युद्ध को टाल दिया गया। उन्होंने यहां तक कहा कि इस फैसले से 30 से 50 मिलियन लोगों की जान बचाई गई।

    इसके अलावा ट्रम्प ने यह भी कहा कि अपने कार्यकाल में उन्होंने दुनिया भर में करीब 8 संघर्षों को सुलझाने में भूमिका निभाई और कई देशों से उन्हें इसके लिए धन्यवाद पत्र भी मिले।

    भारत का रुख
    हालांकि भारत ने ट्रम्प के इस दावे को सिरे से खारिज किया है। भारतीय पक्ष के अनुसार, संघर्ष विराम किसी बाहरी दबाव से नहीं बल्कि सैन्य स्तर पर बातचीत के जरिए हुआ था। भारत का कहना है कि यह सहमति दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) के बीच सीधे संवाद के बाद बनी थी।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि हालिया तनाव की पृष्ठभूमि में Operation Sindoor के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की गई थी। इसके बाद स्थिति नियंत्रित हुई और दोनों देशों के बीच तनाव में कमी आई।

    स्थिति
    भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते लंबे समय से संवेदनशील रहे हैं। सीमापार आतंकवाद और सैन्य टकराव अक्सर तनाव का कारण बनते रहे हैं। ऐसे में किसी भी बाहरी शक्ति की भूमिका को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहते हैं।
    ट्रम्प का यह दावा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है, लेकिन भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया है।

  • अदृश्य खतरा, अचूक वार! फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन से हिज्बुल्लाह का नया हमला, इजरायल की सुरक्षा चुनौती में इजाफा

    अदृश्य खतरा, अचूक वार! फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन से हिज्बुल्लाह का नया हमला, इजरायल की सुरक्षा चुनौती में इजाफा


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब तकनीकी युद्ध के नए दौर में प्रवेश कर चुका है। Hezbollah ने ऐसे फाइबर-ऑप्टिक गाइडेड ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया है, जो पारंपरिक रडार और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से लगभग अछूते रहते हैं। इस नई तकनीक ने Israel की सुरक्षा प्रणाली के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।

    इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच बढ़ते तनाव के बीच अब युद्ध का नया चेहरा सामने आया है—फाइबर-ऑप्टिक नियंत्रित ड्रोन। ये ड्रोन आकार में छोटे, हल्के और बेहद तेज होते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये पतली फाइबर-ऑप्टिक केबल के जरिए सीधे ऑपरेटर से जुड़े रहते हैं, जिससे इन पर रेडियो सिग्नल आधारित जैमिंग का कोई असर नहीं पड़ता।

    रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, ये ड्रोन बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हैं और लक्ष्य के बेहद करीब पहुंचकर हमला करने में सक्षम होते हैं। लंदन स्थित Royal United Services Institute के विशेषज्ञ Robert Tolst का कहना है कि यदि ऑपरेटर को सही प्रशिक्षण मिला हो, तो यह तकनीक अत्यंत घातक साबित हो सकती है।

    इजरायली अधिकारियों का मानना है कि हिज्बुल्लाह ने यह रणनीति इसलिए अपनाई है क्योंकि इजरायल का एयर डिफेंस सिस्टम पारंपरिक रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खिलाफ प्रभावी है। ऐसे में फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन उस सुरक्षा कवच को भेदने की नई कोशिश हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन ड्रोन को स्थानीय स्तर पर भी तैयार किया जा सकता है—साधारण कमर्शियल ड्रोन, सीमित विस्फोटक सामग्री और पारदर्शी फाइबर-ऑप्टिक तार के जरिए।

    पूर्व इजरायली वायु रक्षा प्रमुख Ran Kochav ने चेतावनी दी है कि इन ड्रोन को पहचानना और मार गिराना बेहद कठिन है। उनका कहना है कि ये छोटे आकार, तेज गति और कम ऊंचाई पर उड़ान के कारण पारंपरिक डिफेंस सिस्टम को चुनौती देते हैं।

    बचाव की सीमित संभावनाएं
    विशेषज्ञों के अनुसार, इन ड्रोन से निपटने के केवल दो प्रमुख तरीके हैं—या तो इन्हें उड़ान के दौरान ही मार गिराया जाए या फिर इन्हें नियंत्रित करने वाली फाइबर-ऑप्टिक केबल को काट दिया जाए। हालांकि, दोनों ही विकल्प व्यावहारिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि केबल पतली और लगभग अदृश्य होती है।

    इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए इजरायली सेना ने अपने सैन्य वाहनों पर सुरक्षात्मक जाल और विशेष कवच लगाने शुरू कर दिए हैं। साथ ही, उन्नत सेंसर, ध्वनि पहचान प्रणाली और अन्य तकनीकों के विकास पर भी काम तेज किया गया है।

    यूक्रेन युद्ध से मिली तकनीक:
    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक का तेजी से विकास Russia-Ukraine War के दौरान हुआ है, जहां रूस और यूक्रेन दोनों ही ड्रोन तकनीक में लगातार नए प्रयोग कर रहे हैं। कुछ मामलों में 50 किलोमीटर तक लंबी फाइबर-ऑप्टिक केबल वाले ड्रोन भी देखे गए हैं, जो इनकी क्षमता को और बढ़ाते हैं।

    हिज्बुल्लाह द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ये फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन आधुनिक युद्ध की बदलती रणनीति का प्रतीक हैं, जहां तकनीक के साथ खतरा और अधिक जटिल और अदृश्य होता जा रहा है।अब बड़ा सवाल यही है—क्या इजरायल इस नई चुनौती का समय रहते प्रभावी समाधान खोज पाएगा, या यह तकनीक आने वाले समय में युद्ध का नया मानक बन जाएगी?

  • ईरान पर फिर वार की आहट! इजरायल सतर्क, ट्रंप–नेतन्याहू रणनीति से मिडिल ईस्ट में बढ़ी हलचल

    ईरान पर फिर वार की आहट! इजरायल सतर्क, ट्रंप–नेतन्याहू रणनीति से मिडिल ईस्ट में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। Israel और Iran के बीच बढ़ती तल्खी ने क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इजरायल ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आवश्यकता पड़ने पर वह ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई कर सकता है।इजरायल के रक्षा मंत्री Israel Katz ने कहा है कि उनके देश को ईरान के खिलाफ “फिर से सैन्य कार्रवाई” करनी पड़ सकती है। उनका तर्क है कि यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि ईरान भविष्य में इजरायल, अमेरिका और सहयोगी देशों के लिए खतरा न बन सके।
    काट्ज ने यह भी संकेत दिया कि इस रणनीति पर Donald Trump और Benjamin Netanyahu के साथ समन्वय में काम हो रहा है। इससे साफ है कि यह केवल एक देश की रणनीति नहीं, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग का हिस्सा हो सकता है।
    इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान को “बहुत जल्द समझदार” बनना होगा और गैर-परमाणु समझौते की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका अब इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाने के मूड में है।

    लेबनान सीमा पर बढ़ा तनाव
    दूसरी ओर, दक्षिण लेबनान में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। Israel Defense Forces ने स्पष्ट किया है कि Hezbollah के साथ जमीनी स्तर पर कोई युद्धविराम नहीं है।आईडीएफ प्रमुख Eyal Zamir ने सैनिकों को निर्देश दिए हैं कि वे ऑपरेशन जारी रखें और उत्तरी इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि जब तक खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक सुरक्षा बफर जोन नहीं हटाया जाएगा।

    हालांकि, अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन सीमा पर झड़पें, ड्रोन हमले और सैन्य गतिविधियां लगातार जारी हैं। इजरायली सेना ने हाल ही में हिज्बुल्लाह के एक रॉकेट लॉन्चर को नष्ट करने और दो ड्रोन मार गिराने का दावा किया है।

    लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियां और सख्त बयानबाजी इस बात का संकेत दे रही हैं कि मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ सकते हैं।अब सबसे बड़ा सवाल यही हैक्या इजरायल ईरान पर फिर हमला करेगा?और यदि ऐसा होता है, तो क्या यह टकराव एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकता है?

  • UAE का सख्त रुख: कर्ज वसूली के बाद अब पाकिस्तान से निवेश समेटने के संकेत

    UAE का सख्त रुख: कर्ज वसूली के बाद अब पाकिस्तान से निवेश समेटने के संकेत



    नई दिल्ली। आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहे Pakistan के लिए एक और चिंताजनक खबर सामने आई है। United Arab Emirates की प्रमुख दूरसंचार कंपनी e& (पूर्व में एतिसलात) पाकिस्तान में अपने निवेश की समीक्षा कर रही है और टेलीकॉम सेक्टर से बाहर निकलने पर विचार कर रही है।

    जानकारी के अनुसार, e& के पास PTCL में 26 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ प्रबंधन नियंत्रण भी है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी अब अपने शेयर बेचकर इस बाजार से बाहर निकलने की संभावनाएं तलाश रही है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज वापस लिया है। यह कर्ज लंबे समय से रोलओवर के जरिए टाला जाता रहा था, जिससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को राहत मिलती थी। हालांकि, अचानक भुगतान की मांग ने देश की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा दिया है।

    वहीं, एतिसलात और पाकिस्तान सरकार के बीच 2005 से चला आ रहा 800 मिलियन डॉलर का विवाद भी अब तक अनसुलझा है। उस समय कंपनी ने PTCL की हिस्सेदारी 2.6 अरब डॉलर में खरीदी थी, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े विवाद के कारण रोका गया था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति से प्रेरित नहीं है, बल्कि यूएई की व्यापक वैश्विक निवेश रणनीति का हिस्सा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और पूंजी के बेहतर उपयोग की नीति के तहत खाड़ी देश अपने निवेश पोर्टफोलियो का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं।

    पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यदि e& अपना निवेश वापस लेती है, तो वह Saudi Arabia और Qatar जैसे देशों से नए निवेश आकर्षित करने का प्रयास करेगी।

    यूएई के लगातार सख्त होते आर्थिक फैसले पाकिस्तान के लिए चेतावनी माने जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पाकिस्तान नई निवेश संभावनाएं तलाश कर पाता है या आर्थिक दबाव और बढ़ता है।

  • जब एक वफादार कुत्ता बना शहर का सर्वेसर्वा, जानें कैसे बिना किसी भाषण के जीत लिया चुनाव

    जब एक वफादार कुत्ता बना शहर का सर्वेसर्वा, जानें कैसे बिना किसी भाषण के जीत लिया चुनाव

    नई दिल्ली।  दुनिया भर में सत्ता के गलियारों में अक्सर तनाव और गंभीर चर्चाएं सुनाई देती हैं, लेकिन अमेरिका के एक छोटे से पहाड़ी कस्बे ने राजनीति की परिभाषा को एक सुखद और अनोखा मोड़ दे दिया है। इडलीवाइल्ड नामक इस क्षेत्र में जब चुनाव का बिगुल बजता है, तो उम्मीदवार कोई सफेदपोश राजनेता नहीं, बल्कि वफादार और प्यारे जानवर होते हैं। यहाँ पिछले कई वर्षों से एक कुत्ते को शहर का मानद मेयर चुनने की परंपरा चली आ रही है। यह परंपरा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी पहल है जो लोगों को राजनीति के मतभेदों से ऊपर उठकर एक साथ लाती है और समाज कल्याण के कार्यों में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित करती है।

    इस दिलचस्प चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत एक दशक से भी पहले हुई थी, जब पशु कल्याण के लिए काम करने वाली एक संस्था ने फंड जुटाने के लिए एक अनूठा प्रयोग किया। यहाँ ‘एक वोट’ का मतलब ‘एक दान’ होता है। लोग अपने पसंदीदा पशु उम्मीदवार के पक्ष में अपनी इच्छानुसार राशि दान करते हैं और जिस उम्मीदवार के खाते में सबसे ज्यादा दान जमा होता है, उसे ही विजेता घोषित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इससे मिलने वाली पूरी राशि बेजुबान जानवरों की सुरक्षा और स्थानीय सामुदायिक विकास पर खर्च की जाती है। इस चुनावी रण में सबसे पहले बाजी एक गोल्डन रिट्रीवर ने मारी थी, जिसे पूरे सम्मान के साथ शहर की कमान सौंपी गई थी।

    मेयर का पद संभालने के बाद इन ‘डॉग मेयर्स’ का जीवन भी किसी वीआईपी नेता से कम नहीं होता। ये निर्वाचित नेता केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इन्हें बकायदा शहर के विभिन्न हिस्सों के दौरे पर ले जाया जाता है। ये कुत्ते स्थानीय स्कूलों में जाते हैं ताकि बच्चों में पशुओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़े और वे विभिन्न सामाजिक समारोहों में मुख्य आकर्षण का केंद्र भी बनते हैं। यहाँ आने वाले पर्यटक इस अनोखे मेयर के साथ फोटो खिंचवाने के लिए उत्साहित रहते हैं। यह सिलसिला केवल एक कुत्ते तक नहीं थमा, बल्कि एक के बाद एक कई वफादार साथियों ने इस पद की गरिमा को बढ़ाया है और इस छोटे से कस्बे को वैश्विक पर्यटन के नक्शे पर चमका दिया है।

    स्थानीय निवासियों का मानना है कि यह परंपरा उनके कस्बे की सामुदायिक भावना और सरलता को दर्शाती है। जहाँ बड़े शहरों में चुनाव अक्सर कड़वाहट और विवादों का कारण बनते हैं, वहीं इडलीवाइल्ड का यह चुनाव खुशी और भाईचारे का संदेश देता है। यहाँ का मेयर कोई आदेश नहीं देता, बल्कि वह कस्बे में प्यार और एकता का प्रतीक माना जाता है। यह अनूठी पहल इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादा नेक हो और तरीका रचनात्मक, तो समाज को जोड़ने के लिए किसी बड़ी राजनैतिक शक्ति की आवश्यकता नहीं होती। आज यह कस्बा अपनी इसी विचित्र और दिल जीत लेने वाली रस्म के कारण दुनिया भर के लोगों के लिए एक प्रेरणा बन गया है।

  • ईरान के मुद्दे पर US-जर्मनी आमने-सामने….. ट्रंप की चेतावनी के बाद जर्मन विदेश मंत्री का पलटवार

    ईरान के मुद्दे पर US-जर्मनी आमने-सामने….. ट्रंप की चेतावनी के बाद जर्मन विदेश मंत्री का पलटवार


    बर्लिन।
    जर्मनी (Germany) ने अमेरिका (America) द्वारा अपने सैनिकों की संख्या घटाने की किसी भी संभावना के लिए खुद को पूरी तरह ‘तैयार’ बताया है। जर्मन विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल (German Foreign Minister Johann Wadephul) ने गुरुवार को कहा कि उनकी सरकार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) की धमकी के बावजूद नाटो और ट्रांसअटलांटिक साझेदारी को मजबूत बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। बता दें कि ट्रंप ने बुधवार को ईरान मुद्दे पर चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ विवाद के बीच जर्मनी में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों को कम करने का संकेत दिया था।

    जर्मन विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने मोरक्को की यात्रा के दौरान कहा कि हम इसके लिए तैयार हैं। हम नाटो के सभी निकायों में इस मुद्दे पर गहन और विश्वासपूर्ण चर्चा कर रहे हैं तथा अमेरिका से निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी फैसले पर सहयोगियों के साथ उचित परामर्श किया जाएगा। इससे पहले चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने भी कहा था कि मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध को लेकर जर्मनी का रुख एक मजबूत और एकीकृत नाटो तथा विश्वसनीय ट्रांसअटलांटिक साझेदारी पर केंद्रित है। मर्ज ने ट्रंप के बयान का सीधा जिक्र किए बिना कहा कि बर्लिन वाशिंगटन समेत अपने सभी सहयोगियों के साथ लगातार संपर्क में है।


    जर्मनी का भरोसा: पुराना मुद्दा, कोई नई चिंता नहीं

    विदेश मंत्री वाडेफुल ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटाने का विचार ईमानदारी से कहें तो बिल्कुल नया नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों के समय भी यह मुद्दा उठ चुका है। वाडेफुल ने जर्मनी में बड़े अमेरिकी सैन्य अड्डों पर किसी भी तरह की चर्चा से इनकार किया। उन्होंने रामस्टीन एयर बेस का उदाहरण देते हुए कहा कि यह अमेरिका और जर्मनी दोनों के लिए अपूरणीय है। उन्होंने कहा कि जर्मनी इस पूरे मामले पर पूरी तरह निश्चिंत है।

    ट्रंप का गुस्सा और सैनिकों की तैनाती पर सवाल
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा था कि ईरान संबंधी मुद्दे पर चांसलर मर्ज के साथ विवाद के चलते अमेरिका जर्मनी में तैनात हजारों सैनिकों में से कुछ को वापस बुलाने या फिर से तैनात करने पर विचार कर रहा है। ट्रंप ने मर्ज पर आरोप लगाया था कि उन्हें ईरान के परमाणु कार्यक्रम की सही जानकारी नहीं है। ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए इस बात की पुष्टि की। इससे पहले मंगलवार को उन्होंने कहा था कि ईरान वाशिंगटन को अपमानित कर रहा है।

  • इमरान खान ने मांगी मानवीय आधार पर रिहाई, एकांत कारावास और आंखों की गंभीर समस्या को बताई वजह

    इमरान खान ने मांगी मानवीय आधार पर रिहाई, एकांत कारावास और आंखों की गंभीर समस्या को बताई वजह

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट में मानवीय आधार पर रिहाई की अपील की है। उन्होंने अपने वकील के जरिए अदालत को बताया कि उन्हें लंबे समय से एकांत कारावास में रखा गया है और उनकी आंखों में गंभीर संक्रमण की समस्या बनी हुई है।

    यह याचिका इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी की ओर से 190 मिलियन पाउंड भ्रष्टाचार मामले में दी गई सजा के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई के दौरान पेश की गई। इस मामले में पिछले वर्ष जनवरी में जवाबदेही अदालत ने इमरान खान को 14 साल और बुशरा बीबी को 7 साल की कैद की सजा सुनाई थी। यह मामला नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB) द्वारा दर्ज किया गया था।

    सुनवाई के दौरान इमरान खान के वकील सलमान सफदर ने सजा निलंबित करने की मांग की। उन्होंने अदालत में कहा कि मामला 16 महीनों से लंबित है और अब तक 17 से अधिक सुनवाई हो चुकी हैं। वकील ने दावा किया कि इमरान खान की आंखों की स्थिति गंभीर है और उनकी दृष्टि काफी कमजोर हो गई है। उनके अनुसार, “उनकी आंखों की रोशनी लगभग 15% रह गई है और 85% तक नुकसान हो चुका है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह नुकसान स्थायी हो सकता है।

    सफदर ने अदालत को बताया कि इमरान खान को एकांत कारावास में रखा गया है, जिस पर सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि जेल में उचित चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं और कई बार उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा है। वकील ने यह भी आग्रह किया कि जेल अधिकारियों और संबंधित चिकित्सा रिकॉर्ड को अदालत में पेश किया जाए, ताकि उनकी स्थिति की सही जांच हो सके। साथ ही उन्होंने आईजी जेल और अन्य अधिकारियों को तलब करने की मांग भी दोहराई।

    सुनवाई के दौरान इस्लामाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सरफराज डोगर ने सुझाव दिया कि अपील की मुख्य सुनवाई पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि मामले का शीघ्र निपटारा हो सके। हालांकि, बचाव पक्ष ने पहले सजा निलंबन पर निर्णय लेने पर जोर दिया। इसके बाद अदालत ने सुनवाई को आगे के लिए स्थगित कर दिया।

  • अमेरिका में 76 दिन बाद खत्म हुआ सरकारी शटडाउन, DHS फंडिंग बिल सर्वसम्मति से पारित

    अमेरिका में 76 दिन बाद खत्म हुआ सरकारी शटडाउन, DHS फंडिंग बिल सर्वसम्मति से पारित

    वॉशिंगटन। अमेरिका में 76 दिनों से जारी सरकारी शटडाउन आखिरकार समाप्त हो गया है, जिसे अब तक का सबसे लंबा आंशिक सरकारी ठहराव बताया जा रहा है। अमेरिकी संसद के निचले सदन ने गुरुवार को डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) के अधिकांश हिस्सों के लिए फंडिंग से जुड़े विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया। इसके साथ ही विभिन्न संघीय एजेंसियों पर पड़े लंबे गतिरोध का औपचारिक रूप से अंत हो गया।

    DHS के सुरक्षा सचिव मार्कवेने मुलिन ने सोशल मीडिया पर घोषणा करते हुए बताया कि विभाग फिर से कामकाज शुरू कर चुका है। उन्होंने कहा कि आव्रजन और सीमा प्रवर्तन (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) और सीमा सुरक्षा (यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन) जैसी एजेंसियों के लिए फंडिंग सुलह प्रक्रिया के जरिए सुनिश्चित की जाएगी, जिसमें डेमोक्रेटिक समर्थन की आवश्यकता नहीं पड़ी।

    मुलिन ने इस शटडाउन के लिए डेमोक्रेट्स को जिम्मेदार ठहराया और उन संघीय कर्मचारियों की सराहना की जिन्होंने बिना वेतन गारंटी के भी काम जारी रखा। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और DHS नेतृत्व का भी धन्यवाद किया।

    यह विधेयक अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया है। शटडाउन 14 फरवरी को शुरू हुआ था और कई हफ्तों तक संघीय सेवाएं प्रभावित रहीं। हालांकि ICE और बॉर्डर गश्ती जैसी कुछ एजेंसियां पहले से मौजूद फंडिंग के कारण अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुईं, लेकिन फेडरल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी (FEMA), ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन (TSA) और तटरक्षक बल जैसी संस्थाओं को गंभीर संचालन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

    हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने कहा कि रणनीति के तहत पहले DHS की फंडिंग सुरक्षित की गई ताकि अहम एजेंसियां प्रभावित न हों, और उसके बाद आगे के विधायी कदम उठाए गए। अमेरिकी तटरक्षक बल के अधिकारी केविन लुंडे ने लंबे समय तक फंडिंग की कमी को कर्मचारियों के मनोबल के लिए बेहद कठिन बताया। यह समाधान हफ्तों चले राजनीतिक गतिरोध के बाद सामने आया, जिसमें रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच आव्रजन प्रवर्तन और सुरक्षा एजेंसियों के बजट को लेकर गहरी असहमति बनी हुई थी। अब आने वाले समय में अतिरिक्त वित्तीय उपायों पर भी काम होने की उम्मीद है।

  • ट्रंप का बड़ा फैसला, ब्रिटेन के शाही दौरे के सम्मान में स्कॉच व्हिस्की पर टैरिफ हटाने का किया ऐलान

    ट्रंप का बड़ा फैसला, ब्रिटेन के शाही दौरे के सम्मान में स्कॉच व्हिस्की पर टैरिफ हटाने का किया ऐलान

    वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन के शाही परिवार के सम्मान में एक बड़ा व्यापारिक फैसला लिया है। उन्होंने ब्रिटिश स्कॉच और व्हिस्की पर लगाए गए टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंध हटाने की घोषणा की है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट साझा करते हुए कहा कि यह फैसला किंग चार्ल्स तृतीय और रानी कैमिला के हालिया अमेरिका दौरे के सम्मान में लिया गया है। उन्होंने बताया कि यह कदम स्कॉटलैंड और केंटकी के बीच व्हिस्की और बॉर्बन के व्यापार को बढ़ावा देगा, जो दोनों क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण उद्योग हैं।

    ट्रंप ने अपने संदेश में यह भी लिखा कि लंबे समय से इस फैसले की मांग की जा रही थी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि राजा और रानी ने उनसे वह काम करवा दिया, जो अब तक कोई नहीं कर सका—वह भी बिना सीधे आग्रह किए। साथ ही उन्होंने अमेरिका में शाही मेहमानों की मौजूदगी को अपने लिए सम्मान बताया।

    राष्ट्रपति ने इस फैसले से जुड़े कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। इस दौरान किंग चार्ल्स तृतीय और रानी कैमिला ने बुधवार को न्यूयॉर्क स्थित 9/11 Memorial जाकर आतंकी हमलों के पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और पूर्व मेयर माइकल ब्लूमबर्ग से भी मुलाकात की।

  • तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल

    तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल


    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है जहां United Arab Emirates ने 1 मई से OPEC से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासतौर पर भारत जैसे आयातक देशों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

    भारत के पूर्व राजदूत Navdeep Singh Suri के मुताबिक यूएई का यह फैसला अचानक नहीं है बल्कि पिछले पांच वर्षों से इसकी तैयारी चल रही थी। उनका कहना है कि यूएई लंबे समय से ओपेक द्वारा तय किए गए उत्पादन कोटे से असंतुष्ट था। शुरुआत में उसे करीब 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन की अनुमति थी जिसे बाद में बढ़ाकर 3.4 मिलियन बैरल किया गया लेकिन यह भी उसकी बढ़ती क्षमता के अनुरूप नहीं था।

    सूरी ने बताया कि यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी तेल उत्पादन क्षमता में भारी निवेश किया है और वह जल्द ही 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन करने की स्थिति में पहुंच सकता है। ऐसे में वह ओपेक के कड़े नियमों और सऊदी अरब के प्रभाव वाले फैसलों से मुक्त होकर अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चाहता है। यही वजह है कि उसने स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

    हालांकि इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत देखने को मिल सकता है। मौजूदा समय में Strait of Hormuz में तनाव और रुकावट के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है जिससे कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर होना बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आने वाले समय में होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सामान्य होती है और तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से शुरू हो जाती है तो यूएई का अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इससे भारत जैसे देशों को राहत मिल सकती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं।

    लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा खतरा भी सामने आता है। ओपेक लंबे समय से तेल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है जिससे कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। यदि यूएई जैसे बड़े उत्पादक देश इस संगठन से बाहर निकलते हैं तो ओपेक की पकड़ कमजोर हो सकती है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच Iran और United States के बीच जारी तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पूर्व राजदूत सूरी ने स्पष्ट कहा कि इन हालातों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उनका मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और आपूर्ति में रुकावट वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

    कुल मिलाकर यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देश इस फैसले के बाद क्या रणनीति अपनाते हैं और बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है।