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  • एयरस्ट्राइक के बाद अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव तेज

    एयरस्ट्राइक के बाद अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव तेज

    नई दिल्ली। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर तनाव तेजी से बढ़ गया है। पाकिस्तान द्वारा कथित तौर पर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाकर की गई एयरस्ट्राइक के बाद अब अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने जवाबी सैन्य कार्रवाई शुरू करने का दावा किया है।
    पिछले करीब 48 घंटों से जारी छिटपुट गोलीबारी अब भारी हथियारों के इस्तेमाल तक पहुंच गई है।

    तालिबान का जवाबी कार्रवाई का दावा
    तालिबान सरकार के प्रवक्ता ज़बिहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि नागरिकों की मौत के जवाब में अफगान बलों ने पाकिस्तानी सैन्य चौकियों और ठिकानों को निशाना बनाया। उनके अनुसार, कार्रवाई में मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर, टैंक, आर्टिलरी और मोर्टार जैसे भारी हथियारों का इस्तेमाल किया गया।

    15 चौकियों पर कब्जे का दावा
    तालिबान प्रवक्ता ने दावा किया कि नंगरहार-खैबर और कुनार-बाजौर सीमाई इलाकों में हमले कर पाकिस्तान की 15 चौकियों पर कब्जा कर लिया गया है।
    बताया गया कि नंगरहार सीमा के पास दो, गोश्ता क्षेत्र के आसपास तीन और कुनार सीमा पर दो चौकियों पर अफगान बलों की मौजूदगी है। हालांकि इन दावों की पाकिस्तान की ओर से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
    22 फरवरी की एयरस्ट्राइक से बढ़ा विवाद
    तनाव की शुरुआत 22 फरवरी को हुई, जब पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने नंगरहार प्रांत के खोग्यानी और गनी खेल जिलों तथा पक्तिका के बेरमल और अर्गुन क्षेत्रों में हवाई हमले किए।

    स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, इन हमलों में एक ही परिवार के 16 नागरिकों की मौत हुई।

    पाकिस्तान का कहना था कि कार्रवाई आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ की गई, जबकि तालिबान प्रशासन ने इसे नागरिकों पर हमला बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी थी।

    क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

    दोनों देशों के बीच सीमा पार गतिविधियों और उग्रवादी संगठनों को लेकर पहले भी आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। मौजूदा सैन्य टकराव ने क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो यह संघर्ष व्यापक रूप ले सकता है।

  • फ्लाइट रद्द होने पर यात्रियों का UAE सरकार उठाएगी ठहरने-खाने का पूरा खर्च

    फ्लाइट रद्द होने पर यात्रियों का UAE सरकार उठाएगी ठहरने-खाने का पूरा खर्च

    दुबई। संयुक्त अरब अमीरातकी सरकार और General Civil Aviation Authority (GCAA) ने यात्रियों के हक में एक बहुत बड़ा फैसला लिया है। क्षेत्र में चल रहे तनाव और एयरस्पेस बंद होने की वजह से जिनकी भी फ्लाइट्स रद्द हुई हैं, उनके रहने और खाने-पीने का पूरा इंतजाम अब सरकार की तरफ से किया जाएगा।

    बता दें कि क्षेत्रीय तनाव और एयरस्पेस बंद होने से प्रभावित हवाई यात्रियों को बड़ी राहत देते हुए संयुक्त अरब अमीरात सरकार ने विशेष सहायता योजना लागू की है। इस फैसले के तहत जिन यात्रियों की उड़ानें रद्द हुई हैं, उनके रहने, खाने-पीने और जरूरी सुविधाओं का पूरा खर्च अब सरकार वहन करेगी। यह व्यवस्था 1 मार्च 2026 से तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है।

    यह निर्णय General Civil Aviation Authority (GCAA) के साथ समन्वय में लिया गया है, ताकि एयरपोर्ट पर फंसे यात्रियों को असुविधा न हो और यात्रा व्यवस्था सुचारु बनी रहे।

    ट्रांजिट यात्रियों को सबसे ज्यादा राहत
    नई व्यवस्था विशेष रूप से उन यात्रियों के लिए मददगार साबित हो रही है जो दुबई और अबू धाबी जैसे प्रमुख हब पर ट्रांजिट के दौरान फंस गए थे। अब उन्हें होटल, भोजन और आवश्यक सेवाओं के लिए अपनी जेब से खर्च नहीं करना पड़ेगा।
    अब तक हजारों यात्रियों को मिली सुविधा
    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 24 घंटों में लगभग 20,200 यात्रियों को होटल आवास और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। अधिकारियों का कहना है कि सहायता प्रक्रिया को तेज और व्यवस्थित बनाने के लिए एयरपोर्ट-स्तर पर विशेष प्रबंधन किया गया है।

    वीज़ा ओवरस्टे पर भी राहत के संकेत
    जिन यात्रियों का वीज़ा इस दौरान समाप्त हो रहा है, उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

    संबंधित अधिकारियों ने संकेत दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ओवरस्टे को दंडात्मक कार्रवाई से छूट दी जा सकती है। यात्रियों को केवल अपना मूल बोर्डिंग पास सुरक्षित रखने की सलाह दी गई है।

    यात्रियों के लिए जारी की गई एडवाइजरी
    बिना कन्फर्म टिकट के एयरपोर्ट न पहुंचें। उड़ान की स्थिति पहले ऑनलाइन जांचें। जरूरत पड़ने पर संबंधित एयरलाइन के कस्टमर केयर से संपर्क करें। टर्मिनल पर भीड़ कम रखने के लिए तय प्रक्रिया का पालन करें। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य आपात स्थिति में फंसे यात्रियों को राहत देना, एयरपोर्ट संचालन को व्यवस्थित बनाए रखना और मानवीय सहायता सुनिश्चित करना है।

  • ईरान से तनाव कम करने जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने बातचीत बहाल करने पर दिया जोर

    ईरान से तनाव कम करने जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने बातचीत बहाल करने पर दिया जोर

    बर्लिन। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर ईरान से हमले रोकने और कूटनीतिक बातचीत फिर से शुरू करने की अपील की है। तीनों देशों ने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि हालिया घटनाएं हालात को और गंभीर बना सकती हैं।
    संयुक्त बयान में हमलों की निंदा
    तीनों देशों के नेताओं—फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर—ने संयुक्त बयान जारी कर क्षेत्र के अन्य देशों पर ईरानी हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की। बयान में कहा गया कि हालात को बिगाड़ने वाले कदमों से बचना जरूरी है और संवाद ही समाधान का रास्ता है।
    परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर भी चिंता
    नेताओं ने ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने, बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधियों पर रोक लगाने और अपने नागरिकों के खिलाफ कथित दमन व हिंसा बंद करने की अपील की।
    उनका कहना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए विश्वास बहाली के कदम आवश्यक हैं।
    सैन्य भागीदारी से किया इनकार
    तीनों देशों ने स्पष्ट किया कि वे हालिया हमलों में किसी भी तरह शामिल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अमेरिका, इजरायल और क्षेत्र के अन्य साझेदारों के साथ लगातार संपर्क में हैं, ताकि स्थिति को नियंत्रण में रखा जा सके।

    क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर
    बयान में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता मध्य पूर्व में स्थिरता बनाए रखना और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। साथ ही इस बात पर बल दिया गया कि अंततः ईरान की जनता को अपना भविष्य स्वयं तय करने का अवसर मिलना चाहिए।

  • ईरान के मिसाइल हमलों पर अमेरिका और खाड़ी देशों का कड़ा रुख, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा

    ईरान के मिसाइल हमलों पर अमेरिका और खाड़ी देशों का कड़ा रुख, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और खाड़ी देशों ने ईरान की ओर से किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों की तीखी आलोचना की है। घटनाक्रम तब तेज हुआ जब इजरायल और अमेरिका की कार्रवाई के बाद ईरान ने जवाबी हमले किए। इसके बाद जारी संयुक्त बयान में अमेरिका, बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इन हमलों को “लापरवाही भरा और अस्थिर करने वाला” बताया।

    अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से जारी बयान में कहा गया कि ईरान द्वारा संप्रभु क्षेत्रों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय नियमों का सीधा उल्लंघन है। बयान के मुताबिक, इन हमलों का असर बहरीन, इराक (जिसमें इराकी कुर्दिस्तान क्षेत्र भी शामिल है), जॉर्डन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई पर पड़ा। देशों ने आरोप लगाया कि हमलों में आम नागरिकों की जान जोखिम में डाली गई और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।

    ‘खतरनाक बढ़त’ से क्षेत्रीय स्थिरता पर खतरा
    संयुक्त बयान में कहा गया कि इस तरह की कार्रवाई कई देशों की संप्रभुता का उल्लंघन है और यह पूरे इलाके की स्थिरता को खतरे में डालती है। सरकारों ने यह भी आरोप लगाया कि ईरान ने उन देशों को भी निशाना बनाया जो सीधे तौर पर किसी सैन्य टकराव में शामिल नहीं थे। इसे गैर-जिम्मेदाराना और उकसावे वाली कार्रवाई करार दिया गया।

    बयान में साफ कहा गया कि आम नागरिकों और तटस्थ देशों को टारगेट करना अस्वीकार्य है। सातों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि वे अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा के लिए एकजुट हैं और आत्मरक्षा के अधिकार को दोहराते हैं।

    एयर डिफेंस सहयोग पर जोर, सुरक्षा रणनीति मजबूत
    क्षेत्र में बढ़ते मिसाइल और ड्रोन खतरों के बीच संयुक्त बयान में एयर और मिसाइल डिफेंस सहयोग की सराहना की गई। देशों ने कहा कि समन्वित प्रयासों के कारण बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान को रोका जा सका। अमेरिका की खाड़ी क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी और बहरीन, कतर, कुवैत, सऊदी अरब व यूएई के साथ उसकी रक्षा साझेदारी लंबे समय से क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा रही है।

    पश्चिमी और खाड़ी देशों का मानना है कि हाल के वर्षों में ईरान ने अपनी बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं में उल्लेखनीय विस्तार किया है, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हुआ है। हालांकि तेहरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम पूरी तरह रक्षात्मक है। मौजूदा घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट में तनाव को और बढ़ा दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि कूटनीतिक प्रयास इस टकराव को कितना थाम पाते हैं या हालात और गंभीर मोड़ लेते हैं।

  • 45 साल तक दाहिना हाथ छिपाए रहे अयातुल्लाह अली खामेनेई, जानिए क्‍या थी वजह ?

    45 साल तक दाहिना हाथ छिपाए रहे अयातुल्लाह अली खामेनेई, जानिए क्‍या थी वजह ?


    नई दिल्ली। ईरान की सत्ता पर तीन दशक से अधिक समय तक मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिकी और इजरायली हमलों में उनके मारे जाने की सूचना के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है और कई देशों में विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। 36 वर्षों तक सर्वोच्च नेता रहे खामेनेई का राजनीतिक जीवन जितना प्रभावशाली रहा उतना ही विवादों से भी घिरा रहा। लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा पहलू भी था जिसने उन्हें 45 साल तक अपना दाहिना हाथ सार्वजनिक रूप से छिपाने पर मजबूर कर दिया।

    1981 का वह धमाका जिसने बदल दी तकदीर

    साल 1981 में जब खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति थे और ईरान-इराक युद्ध का दौर चल रहा था तभी उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। नमाज के बाद वह लोगों से बातचीत कर रहे थे कि एक व्यक्ति उनकी मेज पर टेप रिकॉर्डर रखकर चला गया। कुछ ही देर बाद उसमें विस्फोट हो गया। इस हमले की जिम्मेदारी फुरकान ग्रुप ने ली और इसे इस्लामिक रिपब्लिक के लिए तोहफा बताया।
    विस्फोट में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गए और कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। इस हमले का सबसे बड़ा असर उनके दाहिने हाथ पर पड़ा जो हमेशा के लिए निष्क्रिय हो गया। उसमें लकवा मार गया। बाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें एक हाथ की जरूरत नहीं अगर उनका दिमाग और जुबान काम करते रहें तो वही काफी है। इसके बाद से वह शपथ या सार्वजनिक कार्यक्रमों में बायां हाथ ही उठाते थे।

    खोमैनी की विरासत और सत्ता तक सफर
    1989 में रूहोल्ला खोमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता चुना गया। इससे पहले वह राष्ट्रपति रह चुके थे और क्रांति के शुरुआती दौर से ही सक्रिय थे। 1939 में मशहद में जन्मे खामेनेई ने नजफ और क़ुम के धार्मिक मदरसों में शिक्षा प्राप्त की। किशोरावस्था में ही उन्होंने क्रांतिकारी इस्लामी विचारधारा अपनाई जिसमें नवाब सफावी जैसे धर्मगुरुओं का प्रभाव था।

    1958 में उनकी मुलाकात खोमैनी से हुई और उन्होंने उनकी विचारधारा को अपना लिया। खोमैनीवाद का मूल सिद्धांत विलायत-ए-फकीह था जिसके तहत सर्वोच्च धार्मिक नेता को व्यापक राजनीतिक और धार्मिक अधिकार मिलते हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यही व्यवस्था ईरान की सत्ता संरचना का आधार बनी।

    सत्ता सख्ती और विरोध

    सर्वोच्च नेता बनने के बाद खामेनेई ने घरेलू राजनीति पर मजबूत नियंत्रण स्थापित किया। उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर आईआरजीसी के साथ करीबी संबंध बनाए जो समय के साथ देश की सबसे प्रभावशाली ताकतों में से एक बन गई। उनके शासनकाल में आंतरिक विरोध को सख्ती से दबाया गया। हाल के वर्षों में हुए जनआंदोलनों को भी कठोरता से नियंत्रित किया गया जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत की खबरें सामने आईं।

    हालांकि उनकी नियुक्ति भी विवादों से घिरी रही। कुछ धर्मगुरुओं ने सवाल उठाया कि उनके पास ग्रैंड अयातुल्ला का दर्जा नहीं था जो संवैधानिक रूप से जरूरी माना जाता था। बाद में संविधान संशोधन और जनमत संग्रह के जरिए सर्वोच्च नेता बनने की शर्तों में बदलाव किया गया और उन्हें औपचारिक मान्यता दी गई।

    प्रभाव जो दशकों तक कायम रहा

    खामेनेई को अक्सर आधुनिक ईरान का सबसे शक्तिशाली नेता माना गया। भले ही इस्लामी क्रांति के जनक खोमैनी थे लेकिन लंबे समय तक सत्ता में बने रहकर खामेनेई ने राजनीतिक सैन्य और धार्मिक संस्थाओं पर गहरी पकड़ स्थापित की। उनका दाहिना हाथ भले ही निष्क्रिय रहा लेकिन सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत बनी रही। उनकी मृत्यु के बाद अब ईरान एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है लेकिन खामेनेई का नाम देश के राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।

  • अपने पहले राष्ट्र के नाम संबोधन में राष्ट्रपति पेजेश्कियान बोले- ‘प्रतिशोध हमारा अधिकार’

    अपने पहले राष्ट्र के नाम संबोधन में राष्ट्रपति पेजेश्कियान बोले- ‘प्रतिशोध हमारा अधिकार’


    तेहरान।
    ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद पहली बार राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीखी चेतावनी दी। उन्होंने इसे “मुसलमानों के खिलाफ युद्ध की घोषणा” बताया और कहा कि जिम्मेदार लोगों से बदला लेना ईरान का “वैध कर्तव्य और अधिकार” है।

    राष्ट्र के नाम अपने पहले संदेश में पेजेश्कियान ने कहा कि ईरानी सशस्त्र बल दुश्मनों के ठिकानों पर “शक्तिशाली हमले” जारी रखेंगे। उन्होंने खामेनेई को “शहीद” घोषित करते हुए कहा कि देश उनके पदचिह्नों पर आगे बढ़ेगा।

    नई नेतृत्व परिषद की घोषणा
    राष्ट्रपति ने यह भी पुष्टि की कि एक “नई नेतृत्व परिषद” ने कामकाज संभाल लिया है, जो संक्रमण काल में शासन व्यवस्था की देखरेख करेगी। उन्होंने जनता से अपील की कि वे मस्जिदों और सड़कों पर एकजुट होकर दुश्मनों की “साजिशों” को नाकाम करें।

    इस बीच ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इराकी कुर्दिस्तान के कुछ इलाकों पर नए हमलों की घोषणा की। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख अली लारिजानी ने कहा कि सशस्त्र बल हमले के जिम्मेदार पक्षों को “अविस्मरणीय सबक” सिखाएंगे।

    उल्लेखनीय है कि पेजेश्कियान 2024 में सुधारवादी उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे। उन्होंने सितंबर 2024 में यूएन आम सभा में अपने पहले संबोधन में “राष्ट्रीय एकता” और “विश्व के साथ रचनात्मक संवाद” पर जोर दिया था। उस समय उन्होंने कहा था कि ईरान परमाणु हथियार नहीं चाहता और पश्चिमी देशों के साथ तनाव कम करने के लिए तैयार है।

    हालांकि, अपने पहले संबोधन में नवविर्वाचित ईरानी राष्ट्रपति का रुख पूरी तरह से रक्षात्मक और प्रतिशोधी दिखाई दिया। क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव और सर्वोच्च नेता की मौत की खबरों के बीच ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह जवाबी कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा

  • ईरान में तबाही: खामनेई की मौत के बाद अयातुल्ला आराफी बने अंतरिम सुप्रीम लीडर, अमेरिका-इजराइल पर ईरानी पलटवार

    ईरान में तबाही: खामनेई की मौत के बाद अयातुल्ला आराफी बने अंतरिम सुप्रीम लीडर, अमेरिका-इजराइल पर ईरानी पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई की मौत के अगले दिन ही देश के राजनीतिक और धार्मिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया। 67 वर्षीय अयातुल्ला अलीरेजा आराफी को अंतरिम सुप्रीम लीडर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आराफी लंबे समय से ईरान की धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहे हैं। वे असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के उपाध्यक्ष हैं और गार्जियन काउंसिल के सदस्य रह चुके हैं। वर्तमान में वे ईरान की सेमिनरी प्रणाली का नेतृत्व कर रहे हैं। अब असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स स्थायी सुप्रीम लीडर का चयन करेगी।

    खामनेई की मौत के बाद ईरान में 40 दिन का राजकीय शोक और सात दिन की छुट्टी घोषित की गई। ईरानी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि देश ने एक महान नेता खो दिया है। वहीं, ईरानी सेना ने खतरनाक अभियान की चेतावनी दी और अमेरिकी ठिकानों पर हमले की योजना बनाई।

    अमेरिका-इजराइल ने किया आक्रमण

    इजराइल और अमेरिका ने संयुक्त हमले में ईरान पर 24 घंटे में 1,200 से अधिक बम गिराए। इस हमले में सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत हुई। उनके ऑफिस कॉम्प्लेक्स पर 30 मिसाइलों से हमला हुआ। हमले में उनके परिवार के सदस्य और 40 कमांडर्स भी मारे गए। इजराइल के पीएम नेतन्याहू और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने खामनेई की मौत की पुष्टि की।

    इस हमले में 200 से अधिक लोग मारे गए और 740 से ज्यादा घायल हुए। एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 148 छात्राओं की मौत हो गई।

    ईरान का जवाबी हमला

    ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों का जवाब देते हुए 9 देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमला किया। इसमें इजराइल पर करीब 400 मिसाइलें दागी गईं। इसके अलावा कतर, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, UAE में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। दुबई में पाम होटल एंड रिसॉर्ट और बुर्ज खलीफा के पास ड्रोन हमला हुआ।

    पृष्ठभूमि और विवाद

    ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच विवाद के मुख्य कारण हैं: न्यूक्लियर प्रोग्राम पर शक, बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास, क्षेत्रीय अस्थिरता और मिडिल ईस्ट में राजनीतिक दखल। अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इसके जवाब में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज करने और कठोर बयान देने जैसे कदम उठाए।

    अयातुल्ला अली खामनेई का जीवन

    खामनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को मशहद में हुआ। उन्होंने 1963 में शाह के खिलाफ भाषण दिया और गिरफ्तार हुए। 1979 की इस्लामी क्रांति में वे प्रमुख आंदोलनकारी बने। 1981 में उन पर बम हमले हुए, उसी वर्ष वे ईरान के राष्ट्रपति बने। 1989 में खोमैनी की मौत के बाद उन्हें सुप्रीम लीडर बनाया गया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का मजबूत रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक कट्टर शासन का आरोप लगाते हैं।

  • इजरायल-ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति संकट, कीमतों में सोमवार को उछाल की संभावना

    इजरायल-ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति संकट, कीमतों में सोमवार को उछाल की संभावना


    नई दिल्ली। इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने खाड़ी क्षेत्र में कच्चे तेल की आपूर्ति पर संकट खड़ा कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि युद्ध जारी रहता है तो सोमवार को बाजार खुलते ही कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल देखने को मिल सकता है।

    हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल की परिवहन में अभी कोई बाधा की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन टैंकरों के जोखिम में फंसने और टारगेट बनने की आशंका के कारण कई प्रमुख तेल व्यापारी माल ढुलाई को निलंबित करने पर मजबूर हैं। ईरान और ओमान के बीच स्थित इस जलडमरूमध्य से प्रतिदिन करीब 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल और उससे बने उत्पाद निकलते हैं, जो वैश्विक आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    विशेषज्ञों ने बताया कि टैंकर माल ढुलाई दरें पहले ही बढ़ चुकी हैं। मध्य पूर्व से चीन तक जाने वाले बड़े कच्चे तेल वाहकों के लिए 2026 में दरें अब तक तीन गुना बढ़ चुकी हैं, जो जोखिम लेने में कंपनियों की हिचक को दर्शाता है। खाड़ी देश विश्व की लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति करते हैं। आपूर्ति में कमी का पैमाना इस बात पर निर्भर करेगा कि युद्ध के दौरान एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को सीधे निशाना बनाया जाएगा या नहीं और समुद्री मार्गों पर सेवाएं कितनी जल्दी बहाल होती हैं।

    अब तक, ईरान और संयुक्त अमेरिकी-इजरायली बलों के बीच युद्ध में किसी प्रमुख तेल और गैस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमले की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर और कुवैत में विस्फोटों की खबरें आई हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के खारग द्वीप के पास धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जो तेहरान के अधिकांश कच्चे तेल निर्यात का प्रमुख टर्मिनल है।

    विश्लेषकों ने 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध का हवाला देते हुए चेतावनी दी है कि अल्पकालिक संघर्षों का भी तेल की कीमत और आपूर्ति पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इस संघर्ष के चलते वैश्विक तेल बाजार अस्थिर हो सकता है, और निवेशक सतर्क हो गए हैं।

    इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स (आईआरजीसी) ने मध्य पूर्व में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर हमलों की नई लहर की घोषणा की है। ये हमले हाल ही में ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों का बदला लेने के लिए किए जा रहे हैं। कथित तौर पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई इस हमले में मारे गए।

    ईरान सरकार ने एक आधिकारिक बयान में कहा है इस जघन्य अपराध का जवाब जरूर दिया जाएगा और यह इस इस्लामी दुनिया के इतिहास में नया अध्याय लिखेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबी अवधि तक चलता है तो कच्चे तेल की आपूर्ति में बड़ी कमी आ सकती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी और कीमतों में तेजी आएगी। निवेशक फिलहाल सतर्क हैं और भविष्य की स्थिति के स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं।

  • इजरायल-ईरान संघर्ष का असर दुबई रियल एस्टेट पर, बिक्री में गिरावट के संकेत

    इजरायल-ईरान संघर्ष का असर दुबई रियल एस्टेट पर, बिक्री में गिरावट के संकेत


    नई दिल्ली। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध तनाव ने दुबई के रियल एस्टेट बाजार में चिंता पैदा कर दी है। दुबई के रियल एस्टेट डेवलपर्स और ब्रोकर्स का कहना है कि हाल के दिनों में प्रॉपर्टी बुल रन थम सकता है और आने वाले समय में बिक्री में गिरावट देखने को मिल सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए मिसाइल हमलों ने लंबे समय से चली आ रही धारणा को चुनौती दी है कि दुबई संघर्षों के समय धन रखने के लिए सुरक्षित ठिकाना है। पिछली बार, रूस, यूक्रेन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों के निवेशकों को यही धारणा आकर्षित करती रही थी, जिससे दुबई में निवेश बढ़ा।

    ब्रोकर्स के मुताबिक, ईरानी मिसाइल हमलों के बाद निवेशक स्पष्टता की प्रतीक्षा कर सकते हैं कि क्या यह संघर्ष लंबे युद्ध में बदल सकता है या जल्दी समाप्त हो जाएगा। हालांकि, दुबई रियल एस्टेट में मांग में कमी आ सकती है, लेकिन कीमतों में फिलहाल कोई गिरावट की संभावना नहीं है।

    दुबई में 2025 में रियल एस्टेट से जुड़े 2.15 लाख से अधिक लेनदेन दर्ज किए गए थे, जिनकी कुल वैल्यू करीब 187 अरब डॉलर थी। इसकी मुख्य वजह लग्जरी प्रॉपर्टी की मांग और भारत समेत अन्य विदेशी निवेशकों की रुचि थी।

    हाल ही में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों के वीडियो वायरल हुए हैं, जो अमेरिकी और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों की ओर बढ़ते हुए दिखाए गए। स्थानीय सुरक्षा बलों ने इन हमलों को रोकने में सफलता हासिल की। यूएई के सरकारी मीडिया ने बताया कि इन हमलों में एक व्यक्ति की मौत हुई और पाम जुमेराह परिसर में एक इमारत पर हमला हुआ जिसमें चार लोग घायल हुए। बुर्ज खलीफा को भी एहतियात के तौर पर खाली करवा लिया गया।

    इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने रविवार को अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाकर हमलों की नई लहर की घोषणा की। ये हमले हाल ही में ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों का बदला लेने के लिए किए गए थे, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु शामिल थी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबी अवधि तक चलता है, तो दुबई की प्रॉपर्टी बिक्री और निवेश में और गिरावट आ सकती है। निवेशक फिलहाल सतर्क हैं और बाजार में किसी स्थिर संकेत का इंतजार कर रहे हैं।

    दुबई रियल एस्टेट बाजार की यह संवेदनशीलता दिखाती है कि क्षेत्रीय संघर्ष सीधे तौर पर विदेशी निवेश और संपत्ति मूल्यांकन को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक कीमतों में स्थिरता बनी हुई है, लेकिन बिक्री और लेनदेन की गति धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

  • युद्ध की आशंका के बीच अमेरिका-इजरायल का ईरान पर बड़ा हमला, तनाव चरम पर!

    युद्ध की आशंका के बीच अमेरिका-इजरायल का ईरान पर बड़ा हमला, तनाव चरम पर!



    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को एक संयुक्त सैन्य हमला शुरू किया, जिसे कोड‑नेम “Operation Epic Fury / Lion’s Roar” कहा जा रहा है। इस बड़े ऑपरेशन में दोनों देशों ने ईरान के कई शहरों और सैन्य‑रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें तेहरान, इस्फ़हान, नतांज़ और फ़ोर्डो सहित कई प्रमुख लक्ष्य शामिल थे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरानी जनता से अपील की कि वे “अपने भाग्य की बागडोर अपने हाथ में लें” और **1979 से शासन कर रहे इस्लामी नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह करें।” इस हमले को उन्होंने “आगामी खतरों को ख़त्म करने” और ईरान की सैन्य क्षमता को क्षतिग्रस्थ बनाने का लक्ष्य बताया।

    हमले की मौजूदा स्थिति
    संयुक्त हमले में 200 से अधिक लक्ष्य पर हमला किया गया, और ईरानी सुरक्षा नेतृत्व के कई वरिष्ठ अधिकारी मारे गए या प्रभावित हुए हैं।

    ईरान की ओर से जवाबी मिसाइलें दागी गईं, जिसमें मिसाइल और ड्रोन हमले शामिल हैं और कई देशों में (जैसे अरब अमीरात, कुवैत, बहरैन और कतर) सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय कर दी गई है।

    ईरानी नागरिकों में भय और पैनिक फैल चुका है; लोगों ने राजधानी से बाहर भागने और पेट्रोल आदि सामान जमा करने जैसे हालात देखे जा रहे हैं।
    नागरिक असर और क्षेत्रीय तनाव

    बड़े पैमाने पर विस्फोटों और हमलों के कारण ईरान में भारी जनहानि और जन‑जीवन प्रभावित हुआ है, और कई देशों ने अपने नागरिकों को सावधानी बरतने की चेतावनी जारी की है। इस तनाव के चलते कई देशों का एयरस्पेस भी अस्थायी रूप से बंद हुआ है और यात्रियों की उड़ानों में व्यवधान आया है।
    ये हमला एक मध्य पूर्व में सबसे बड़े सैन्य संघर्षों में से एक माना जा रहा है, जो पहले की 12‑दिन की जंग के बाद क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा रहा है।