Category: International

  • ईरान के विदेश मंत्री की रूस यात्रा से भड़के ट्रंप… बोले- 3 दिन में समझौता… नहीं तो होगा भयंकर विस्फोट….

    ईरान के विदेश मंत्री की रूस यात्रा से भड़के ट्रंप… बोले- 3 दिन में समझौता… नहीं तो होगा भयंकर विस्फोट….


    वाशिंगटन।
    ईरान के विदेश मंत्री (Iran Foreign Minister) की रूस की यात्रा (Russia Trip) से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और भड़क गए हैं। उन्होंने धमकी देते हुए कहा है कि अगर तीन दिन के अंदर ईरान समझौता नहीं करता है तो फिर उसकी तेल की पाइपलाइनों में भयंकर विस्फोट होगा। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि ईरान तेल निर्यात करने के लायक ही नहीं बचेगा। ट्रंप ने कहा कि नाकेबंदी की वजह से ईरान जहाजों के जरिए निर्यात नहीं कर पा रहा है। वहीं पाइपलाइन ध्वस्त होने के बाद उसका निर्यात एकदम से बंद हो जाएगा। बता दें कि ईरान के विदेश मंत्री पाकिस्तान से एक बार फिर रूस पहुंचे हैं और वह अब पुतिन से वार्ता करने वाले हैं। रूसी मीडिया ने इसकी पुष्टि की है।


    ईरानी विदेश मंत्री के रूस दौरे से नाराज ट्रंप?

    दरअसल ईरान के विदेश मंत्री अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता के लिए पाकिस्तान गए थे। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने प्रतिनिधिमंडल को भेजने से इनकार कर दिया। इसके बाद ईरानी विदेश मंत्री अराघची भी रूस और ओमान की यात्रा पर निकल गए। रूस के दौरे से वह एक बार फिर पाकिस्तान लौटे। उधर ट्रंप ने कहा कि अब उनकी टीम पाकिस्तान नहीं जाएगी बल्कि जो भी बात होगी, फोन पर ही होगी।


    ईरान ने भेजा अपना प्रस्ताव

    ईरान ने एक लिखित प्रस्ताव डोनाल्ड ट्रंप को भेजा था जिसे उन्होंने तुरंत खारिज कर दिया। ट्रंप ने दावा किया कि पहले प्रस्ताव खारिज होने के बाद ईरान ने दूसरा प्रस्ताव भेजा जो कि उससे बेहतर है। उन्होंने कहा कि वार्ता के लिए आने-जाने में सफर बहुत करना पड़ता है और अब सारी बातें फोन पर होंगी। ईरान जब चाहें उन्हें फोन कर सकता है। जानकारी के मुताबिक ईरानी विदेश मंत्री एक बार फिर रूस चले गए हैं और ईरान का कहना है कि मॉस्को में अब आगे की बातें होंगी।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने धमकी देते हुए कहा है कि उसकी तेल की पाइपलाइन को इस तरह तबाह किया जाएगा कि दोबारा वह वैसी पाइपलाइन नहीं बना पाएगा। जियो टीवी’ ने ईरानी समाचार एजेंसी ‘आईएसएनए’ के हवाले से बताया कि अराघची ”युद्ध को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए किसी भी समझौते के ढांचे पर ईरान के रुख और विचारों” से अवगत कराएंगे।

    ग्यारह और बारह अप्रैल को आयोजित शांति वार्ता का पहला दौर संघर्ष में शामिल पक्षों के लिए वांछित परिणाम लाने में विफल रहा। शनिवार को अराघची के ओमान रवाना होने के बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर अब ईरान के साथ वार्ता के लिए इस्लामाबाद नहीं जाएंगे। रविवार को ट्रंप ने दोहराया कि अमेरिकी और ईरानी अधिकारी संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए फोन पर बातचीत कर सकते हैं।

  • US: ट्रंप के कॉरेस्पोंडेंट डिनर कार्यक्रम में अंधाधुंध फायरिंग… एक हमलावर गिरफ्तार

    US: ट्रंप के कॉरेस्पोंडेंट डिनर कार्यक्रम में अंधाधुंध फायरिंग… एक हमलावर गिरफ्तार


    वॉशिंगटन।
    वाशिंगटन हिल्टन होटल में शनिवार की रात 8:45 बजे (अमेरिकी समय के अनुसार) के करीब कॉरेस्पोंडेंट डिनर कार्यक्रम (Correspondent Dinner Program) के दौरान जोरदार फायरिंग की आवाज सुनाई दी। इस कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) , उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप (Melania Trump) और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (Vice President J.D. Vance) भी शामिल हुए थे। इस घटना की जानकारी मिलते ही राष्ट्रपति सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे सीक्रेट सर्विस के एजेंट ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया और अमेरिकी राष्ट्रपति को सुरक्षित वहां से बाहर निकाल लिया। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल किसी के घायल होने की कोई सूचना नहीं है।

    इस घटना पर राष्ट्रपति ट्रंप की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। इस घटना के करीब एक घंटे बाद उन्होंने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया कि एक शूटर को पकड़ लिया गया है। ट्रंप ने आगे कहा, “डीसी में आज की शाम काफी गहमागहमी भरी रही। सीक्रेट सर्विस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने शानदार काम किया है।”

    रॉयटर्स के लिए काम करने वाले एक फ्रीलांस फोटोग्राफर ने आंखोदेखा हाल बताते हुए कहा कि होटल के भीतर फायरिंग की चार से छह राउंड आवाज सुनाई दी। हालांकि ये आवाजें मुख्य डाइनिंग हॉल के बिल्कुल पास नहीं थीं, लेकिन इनकी तीव्रता ने सभी को चौंका दिया। कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि होटल परिसर के भीतर एक सशस्त्र हमलावर देखा गया था, जिसके बाद सुरक्षा बलों ने मोर्चा संभाल लिया। जैसे ही आवाजें सुनाई दीं, मेहमानों ने चिल्लाना शुरू कर दिया। “गेट डाउन, गेट डाउन!” हॉल में मौजूद लगभग 2,600 मेहमान अपनी मेजों के नीचे छिप गए।

    इस घटना के बाद डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी और अमेरिका की पर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को भी कार्यक्रम स्थल से सुरक्षित निकाल लिया गया। सुरक्षाकर्मियों द्वारा मंच से हटाए जाने से कुछ ही देर पहले मेलानिया ने भीड़ में किसी बात पर प्रतिक्रिया दी और उनके चेहरे पर चिंता के भाव दिखाई दिए।

    प्रेस पूल ने सीक्रेट सर्विस के हवाले से बताया कि ट्रंप के डिनर के दौरान हुई कथित गोलीबारी के बाद एक संदिग्ध को हिरासत में ले लिया गया। यह सुरक्षा घटना उस कमरे के बाहर हुई, जहां राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य अधिकारी डिनर कर रहे थे। सीक्रेट सर्विस और अन्य अधिकारी बैंक्वेट हॉल पहुंचे। सैकड़ों मेहमान मेजों के नीचे छिपकर अपनी जान बचाने की कोशिश करने लगे।

    क्या होता है कॉरेस्पोंडेंट डिनर?
    वाशिंगटन डीसी में हर साल कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर का आयोजन किया जाता है, जिसकी मेज़बानी वाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन करता है। इस समारोह में पत्रकार, राजनेता और हॉलीवुड की मशहूर हस्तियां एक साथ जुटती हैं। यह समारोह प्रेस की आजादी का जश्न मनाता है, पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्तियां जुटाता है और इसमें हल्के-फुल्के अंदाज में राजनेताओं की रोस्टिंग (व्यंग्या) किया जाता है। अक्सर इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति भी शामिल होते हैं।

  • शांति वार्ता फिर विफल…! ईरानी विदेश मंत्री बिना बातचीत लौटे…. US डेलिगेट्स का दौरा भी रद्द

    शांति वार्ता फिर विफल…! ईरानी विदेश मंत्री बिना बातचीत लौटे…. US डेलिगेट्स का दौरा भी रद्द


    इस्लामाबाद।
    ईरान और अमेरिका (Iran and America) के बीच जंग और तनाव के बीच शनिवार को नई उम्मीद की किरण दिखी थी. लेकिन अब वह उम्मीद टूट गई है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Iran’s Foreign Minister Abbas Araghchi) अपनी एक बड़ी टीम के साथ पाकिस्तान (Pakistan) की राजधानी इस्लामाबाद (Islamabad.) में थे. पाकिस्तान (Pakistan) दोनों देशों के बीच बिचौलिया यानी मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाला था. लेकिन, ईरान का डेलिगेशन बिना अमेरिकी प्रतिनिधित्व के इस्लामाबाद में आए हुए ही पाकिस्तान से चले गए. अब अमेरिकी प्रतिनिधित्व ने भी पाकिस्तान का दौरा रद्द करने का ऐलान किया है।

    ईरान सीधे अमेरिका से बात करने को तैयार नहीं है इसलिए पाकिस्तान दोनों के बीच संदेश पहुंचाने का काम कर रहा. अमेरिका से भी स्पेशल दूत इस्लामाबाद आने वाले थे. लेकिन ईरानी प्रतिनिधित्व चले गए हैं तो उन्होंने भी अपने दौरे को रद्द कर दिया है. ये ऐलान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किया है।

    अराघची और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मुलाकात हुई. इस मीटिंग में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार और सेना प्रमुख जनरल सैयद आसिम मुनीर भी मौजूद थे. इस मुलाकात के बाद तेहरान के प्रतिनिधत्व पाकिस्तान से ओमान चले गए.

    अराघची इस्लामाबाद के बाद मस्कट यानी ओमान पहुंचे हैं. इसके बाद वह मॉस्को यानी रूस भी जाएंगे. यानी ईरान एक साथ कई देशों से संपर्क करके रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है।


    ईरान ने सीधी बात से किया इनकार

    ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने साफ कहा कि इस दौर में ईरान और अमेरिका के बीच कोई सीधी मीटिंग नहीं होगी. ईरान पाकिस्तान के जरिए अपनी बात और अपनी चिंताएं अमेरिका तक पहुंचाएगा. उन्होंने अमेरिका के इस पूरे कदम को ‘अमेरिका का थोपा हुआ हमलावर युद्ध’ बताया और कहा कि पाकिस्तान शांति बहाल करने की कोशिश में जुटा है.


    ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने क्या कहा?

    ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने पाकिस्तान दौरे के बाद बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि उनका पाकिस्तान दौरा ‘काफी फलदायी’ रहा. यानी बातचीत अच्छी रही और कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई. उन्होंने यह भी बताया कि ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए एक व्यावहारिक फ्रेमवर्क पेश किया है. यानी ऐसा प्लान दिया गया है, जिससे स्थायी तौर पर संघर्ष खत्म किया जा सके. लेकिन साथ ही उन्होंने एक बड़ी बात भी कही. अभी तक यह साफ नहीं है कि अमेरिका सच में बातचीत को लेकर गंभीर है या नहीं.

    ईरान के फैसले पर डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका-ईरान बातचीत को लेकर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में 18 घंटे की लंबी यात्रा करके बातचीत करने का कोई मतलब नहीं है. उनके मुताबिक, फोन पर भी बातचीत उतनी ही अच्छी तरह हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर ईरान बात करना चाहता है, तो वह खुद फोन कर सकता है. अमेरिका सिर्फ बैठकर बेकार की बातचीत के लिए यात्रा नहीं करेगा.

    जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका मतलब है कि अमेरिका फिर से युद्ध शुरू करने जा रहा है, तो ट्रंप ने साफ किया कि ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि अभी इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया है. ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका मजबूत स्थिति में है. उनके शब्दों में, ‘हमारे पास सारे पत्ते हैं’ यानी अमेरिका के पास बातचीत में बढ़त है. उन्होंने कहा कि वे बेकार की चर्चा में समय नहीं गंवाना चाहते.

    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने क्या कहा?
    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और उनके प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया है. उन्होंने कहा कि यह मुलाकात काफी अच्छी और पॉजिटिव रही. दोनों नेताओं के बीच मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों पर खुलकर चर्चा हुई. साथ ही, पाकिस्तान और ईरान के आपसी संबंधों को और मजबूत करने पर भी बात हुई. यानी सिर्फ मौजूदा तनाव ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के मुद्दों पर भी बातचीत हुई.

  • नेपाल में नई सत्ता पर सवाल, छात्र राजनीति पर प्रतिबंध और सीमा शुल्क, नीति से जनता में असंतोष

    नेपाल में नई सत्ता पर सवाल, छात्र राजनीति पर प्रतिबंध और सीमा शुल्क, नीति से जनता में असंतोष


    नई दिल्ली । नेपाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है जहां नई सरकार बनने के बाद ही असंतोष और विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। राजधानी काठमांडू में राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और सरकार के हालिया फैसलों ने जनता के बीच बहस और नाराजगी दोनों बढ़ा दी हैं।

    केपी ओली सरकार के पतन के बाद हुए संसदीय चुनावों में युवाओं के समर्थन से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेतृत्व में नई सरकार बनी थी। इस सरकार का नेतृत्व बालेंद्र शाह कर रहे हैं जिन्हें जनरेशन-जेड आंदोलन के समर्थन से सत्ता मिली थी। शुरुआत में इसे बदलाव की बड़ी उम्मीद के रूप में देखा गया था लेकिन कुछ ही समय में स्थिति बदलती नजर आने लगी है।

    नई सरकार के गठन के बाद से ही राजनीतिक अस्थिरता के संकेत मिलने लगे जब दो मंत्रियों के इस्तीफे ने प्रशासनिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए। गृह मंत्री पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप और श्रमिक मंत्री पर अनुशासनहीनता के कारण सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा।

    इस बीच सितंबर 2025 में हुए जनरेशन-जेड आंदोलन ने नेपाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था। यह आंदोलन भ्रष्टाचार महंगाई बेरोजगारी और सोशल मीडिया प्रतिबंध जैसे मुद्दों के खिलाफ शुरू हुआ था जो बाद में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन में बदल गया। इसी आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था।

    लेकिन अब वही युवा वर्ग सरकार के कुछ फैसलों से असंतुष्ट नजर आ रहा है। हाल ही में नेपाल सरकार ने नेपाल और भारत की सीमा पर कस्टम ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया है जिसके तहत 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क लागू किया गया है। इस फैसले का सीमावर्ती इलाकों में व्यापक विरोध हो रहा है क्योंकि वहां के लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं।

    इसके अलावा सरकार द्वारा छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय भी बड़ा विवाद बन गया है। राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों को सीमित करने या बंद करने के कदम ने कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भारी विरोध को जन्म दिया है। हजारों छात्र सड़कों पर उतरकर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहे हैं।

    छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार को बातचीत और सुधार के जरिए समाधान निकालना चाहिए था न कि सीधे प्रतिबंध लगाकर युवाओं की आवाज को दबाना चाहिए। इसी कारण कई शैक्षणिक संस्थानों में प्रदर्शन और हड़ताल की स्थिति बन गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार ने जल्द ही इन विवादित फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया तो राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन और बढ़ सकते हैं जिससे देश की स्थिति फिर से पिछले आंदोलनों की तरह तनावपूर्ण हो सकती है। फिलहाल नेपाल की राजनीति एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है जहां एक तरफ बदलाव की उम्मीद है और दूसरी तरफ बढ़ता जनअसंतोष सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

  • सीधी बातचीत नहीं, लेकिन बातचीत जारी ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान के जरिए कूटनीतिक प्रयास तेज

    सीधी बातचीत नहीं, लेकिन बातचीत जारी ईरान-अमेरिका संकट में पाकिस्तान के जरिए कूटनीतिक प्रयास तेज


    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक बार फिर कूटनीतिक बातचीत की संभावना बनती दिखाई दे रही है, हालांकि इस बार दोनों देश सीधे बातचीत से दूरी बनाए रखते हुए अप्रत्यक्ष माध्यमों का सहारा ले सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच के रूप में उभरता दिख रहा है।

    जानकारी के अनुसार ईरान से एक प्रतिनिधिमंडल पहले ही पाकिस्तान पहुंच चुका है जबकि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के भी वहां पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। यह बातचीत किसी औपचारिक सीधी बैठक के बजाय मध्यस्थों के जरिए आगे बढ़ सकती है।

    ईरान ने पहले अमेरिका के साथ सीधे बातचीत करने से इनकार कर दिया था जिसके चलते पिछले दौर की वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी थी। हालांकि बाद में क्षेत्रीय दबाव और सीजफायर से जुड़े मुद्दों के चलते दोनों पक्षों ने फिर से संवाद की संभावना तलाशनी शुरू की है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार इस पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया में अब्बास अराघची की भूमिका महत्वपूर्ण है जो क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंचे हैं। उनका उद्देश्य सीधी बातचीत से ज्यादा क्षेत्रीय समन्वय और मध्यस्थता के जरिए समाधान तलाशना बताया जा रहा है।

    दूसरी तरफ अमेरिकी पक्ष से भी वरिष्ठ प्रतिनिधियों की सक्रियता देखी जा रही है जिनमें ट्रंप प्रशासन से जुड़े सलाहकार और दूत शामिल हैं। हालांकि दोनों देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल किसी औपचारिक आमने-सामने बैठक की योजना नहीं है।

    इस बीच क्षेत्रीय तनाव भी बना हुआ है जहां समुद्री मार्गों और जहाजों को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति देखी गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

    पिछले दौर की बातचीत में ओमान जैसे देशों की मध्यस्थता अहम रही थी और अब भी उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान सहित कुछ अन्य क्षेत्रीय देश इस प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।

    व्हाइट हाउस की ओर से संकेत दिए गए हैं कि अमेरिका बातचीत के लिए तैयार है लेकिन अंतिम निर्णय परिस्थितियों और प्रगति पर निर्भर करेगा। वहीं ईरान का रुख अब भी यह है कि वह सीधे नहीं बल्कि मध्यस्थों के जरिए ही अपनी बात रखेगा।

    कुल मिलाकर मौजूदा स्थिति में तनाव और बातचीत दोनों साथ-साथ चलते दिखाई दे रहे हैं जहां एक ओर टकराव की आशंका बनी हुई है वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक समाधान की हल्की उम्मीद भी जिंदा है।

  • तेल कारोबार पर शिकंजा अमेरिका का बड़ा एक्शन ईरानी शैडो फ्लीट और चीनी रिफाइनरी पर बैन

    तेल कारोबार पर शिकंजा अमेरिका का बड़ा एक्शन ईरानी शैडो फ्लीट और चीनी रिफाइनरी पर बैन


    नई दिल्ली । अमेरिका ने एक बार फिर ईरान के तेल व्यापार नेटवर्क पर बड़ा आर्थिक प्रहार करते हुए चीन की एक प्रमुख रिफाइनरी और दर्जनों शिपिंग कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह कार्रवाई ईरान की तेल से होने वाली कमाई को सीमित करने और उसके अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा बताई जा रही है।

    अमेरिकी वित्त विभाग के अधीन कार्यरत ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल ने चीन में स्थित हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान) रिफाइनरी कंपनी लिमिटेड को प्रतिबंध सूची में शामिल किया है। यह कंपनी ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाली बड़ी रिफाइनरियों में से एक मानी जाती है और इस पर अरबों डॉलर के तेल लेनदेन का आरोप है।

    इस कार्रवाई को लेकर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि आर्थिक दबाव ईरान के शासन की वित्तीय क्षमता को कमजोर कर रहा है और इससे उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों तथा परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका आगे भी उन सभी नेटवर्कों पर कार्रवाई जारी रखेगा जो ईरानी तेल को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने में मदद करते हैं।

    इस प्रतिबंध अभियान में लगभग 40 शिपिंग कंपनियों और जहाजों को भी निशाना बनाया गया है जिन्हें ईरान की तथाकथित शैडो फ्लीट का हिस्सा बताया गया है। इन जहाजों पर आरोप है कि वे तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाकर ईरान सरकार के लिए भारी राजस्व उत्पन्न करते हैं।

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियां जिन्हें “टीपॉट्स” कहा जाता है ईरान के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा खरीदती हैं और हेंगली उनमें दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है। इस कंपनी पर आरोप है कि उसने ईरान से बड़े पैमाने पर तेल खरीदकर प्रतिबंधित नेटवर्क को आर्थिक मजबूती दी है।

    रिपोर्ट के मुताबिक कई जहाजों ने समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल ट्रांसफर कर उसकी असली पहचान छिपाने की कोशिश की। कुछ जहाजों ने ईरान से तेल चीन, संयुक्त अरब अमीरात और बांग्लादेश जैसे देशों तक पहुंचाया। इन जहाजों के पनामा, हांगकांग और बारबाडोस जैसे देशों के झंडे के तहत संचालित होने की भी जानकारी दी गई है।

    यह पूरी कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन के उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र को आर्थिक रूप से कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। फरवरी 2025 से अब तक इस अभियान के तहत 1000 से अधिक व्यक्तियों, कंपनियों, जहाजों और विमानों पर प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं।

    अमेरिकी कानून के अनुसार जिन संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया जाता है उनकी संपत्तियां अमेरिका में फ्रीज कर दी जाती हैं और अमेरिकी नागरिकों के लिए उनके साथ किसी भी प्रकार का व्यापार करना प्रतिबंधित होता है। इसके अलावा विदेशी कंपनियों पर भी कार्रवाई का खतरा बना रहता है यदि वे ऐसे नेटवर्क से जुड़े पाए जाते हैं।

    वित्त विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इन नियमों का उल्लंघन करने पर सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार की कार्रवाई हो सकती है जिससे वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

  • सीमा पर बढ़ी हलचल के बीच कूटनीतिक बातचीत नेपाल के पत्रकारों ने भारत को दिया भरोसे का संदेश

    सीमा पर बढ़ी हलचल के बीच कूटनीतिक बातचीत नेपाल के पत्रकारों ने भारत को दिया भरोसे का संदेश


    नई दिल्ली । भारत और नेपाल के बीच जारी सीमा और व्यापारिक तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल देखने को मिली जब नेपाल के पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय पर हुई है जब नेपाल में सीमा पार व्यापार और कस्टम ड्यूटी को लेकर असंतोष और राजनीतिक हलचल बढ़ी हुई है।

    नेपाल में हाल ही में बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा भारत से आने वाले सामान पर नए कस्टम नियम लागू किए जाने के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में लोगों की नाराजगी बढ़ गई है। इन नियमों के अनुसार भारत से खरीदे गए सामान पर निर्धारित सीमा से अधिक मूल्य होने पर कस्टम ड्यूटी लागू की जा रही है जिससे स्थानीय लोगों की दैनिक जरूरतों पर सीधा असर पड़ा है।

    इस मुद्दे पर भारत की ओर से भी स्थिति स्पष्ट की गई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि भारत को नेपाल की तरफ से लागू किए गए इस नियम की जानकारी है और यह मुख्य रूप से अनौपचारिक व्यापार और तस्करी को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया कदम बताया जा रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि निजी उपयोग के लिए ले जाए जाने वाले घरेलू सामान पर रोक नहीं है।

    नेपाल के पत्रकारों के इस प्रतिनिधिमंडल ने विदेश सचिव से मुलाकात के दौरान भारत और नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों और भविष्य की साझेदारी पर भी चर्चा की। भारतीय पक्ष ने दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि सीमा पार रिश्तों को स्थिर और संतुलित बनाए रखना दोनों देशों के हित में है।

    सीमा क्षेत्रों में इस समय स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है क्योंकि स्थानीय लोगों की निर्भरता भारतीय बाजारों पर काफी अधिक है। रोजमर्रा के सामान राशन दवाइयों और कपड़ों के लिए सीमावर्ती इलाकों के लोग भारत पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में नए कस्टम नियमों के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पर असर पड़ रहा है और नाराजगी भी बढ़ रही है।

    मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में यह विवाद केवल व्यापारिक नीति तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें आर्थिक प्रबंधन शासन व्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर भी असंतोष शामिल है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बनता जा रहा है।

    इस बीच पत्रकारों की यह मुलाकात दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने की एक कोशिश के रूप में देखी जा रही है जिससे भविष्य में उत्पन्न होने वाले तनाव को कम किया जा सके और आपसी समझ को बढ़ाया जा सके।

  • पाकिस्तान ने चुकाया UAE का 3.45 अरब डॉलर का कर्जा…. जानें कहां से आई इतनी बड़ी रकम?

    पाकिस्तान ने चुकाया UAE का 3.45 अरब डॉलर का कर्जा…. जानें कहां से आई इतनी बड़ी रकम?


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) के केंद्रीय बैंक (स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान) (Central Bank (State Bank of Pakistan) ने बताया है कि उसने संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates.- UAE) का 3.45 अरब डॉलर का पूरा कर्ज चुका दिया है। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने शुक्रवार को घोषणा करते हुए कहा कि 23 अप्रैल को यूएई के अबू धाबी फंड फॉर डेवलपमेंट (ADFD) को 1 अरब डॉलर की अंतिम किस्त का भुगतान कर दिया गया है। इससे पहले पिछले सप्ताह UAE को 2.45 अरब डॉलर की राशि वापस की जा चुकी थी। इस तरह कुल 3.45 अरब डॉलर की जमा राशि UAE को पूरी तरह चुकता हो गई है।

    यह पैसा यूएई द्वारा पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में ‘स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ फॉरेन एक्सचेंज’ (SAFE) डिपॉजिट के तौर पर रखा गया था। इस पर पाकिस्तान लगभग 6% ब्याज भी दे रहा था। पाकिस्तान के प्रवक्ता ने बताया कि जमा राशि की अवधि पूरी होने के बाद सभी पैसे यूएई को ट्रांसफर कर दिए गए हैं। केंद्रीय बैंक का दावा है कि नए फंड्स के आने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल स्थिर बना हुआ है।

    यूएई ने अचानक वापस क्यों मांगे पैसे?
    रिपोर्ट्स के अनुसार, यूएई ने पाकिस्तान को भुगतान संतुलन को सहारा देने के लिए 3.5 अरब डॉलर दिए थे। पाकिस्तान इस कर्ज पर यूएई को करीब 6% का ब्याज चुका रहा था। पहले यूएई हर साल इस जमा राशि की अवधि बढ़ा देता था। दिसंबर 2025 में इसे पहले एक महीने के लिए और फिर 17 अप्रैल तक के लिए बढ़ाया गया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे हालिया तनाव (ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध की स्थिति) के मद्देनजर यूएई ने अपने फंड की तत्काल वापसी की मांग की थी।

    पाकिस्तान के पास कर्ज चुकाने के पैसे कहां से आए?
    यह कर्ज वापसी ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान भयंकर ‘कंगाली’ के दौर से गुजर रहा है। इस भुगतान से पहले, स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में सिर्फ 16.4 अरब डॉलर बचे थे। UAE को 3.45 अरब डॉलर एकमुश्त चुकाने का मतलब था कि पाकिस्तान को अपने कुल खजाने का लगभग 18% हिस्सा एक झटके में खाली करना पड़ता। पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के 7 अरब डॉलर के कार्यक्रम के तहत काम कर रहा है। खजाना अचानक खाली होने से IMF की शर्तें टूट जातीं और देश के डिफॉल्ट होने का खतरा बढ़ जाता। ऐसे हालात में बिना किसी बाहरी मदद के UAE को इतनी बड़ी रकम लौटाना पाकिस्तान के लिए नामुमकिन था। इस कंगाली के बीच पाकिस्तान के पास अचानक इतने पैसे कहां से आए? इसका सीधा जवाब है- सऊदी अरब का बेलआउट पैकेज।

    सऊदी अरब की संजीवनी: कैसे हुई कर्ज वापसी?
    यहीं पर पाकिस्तान के पुराने सहयोगी सऊदी अरब ने ‘संकटमोचक’ की भूमिका निभाई। UAE के कर्ज चुकाने की समयसीमा (अप्रैल के अंत) से ठीक पहले, पर्दे के पीछे कई कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाए गए। कर्ज की डेडलाइन से कुछ दिन पहले, सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल्ला अल-जदान ने इस्लामाबाद का दौरा किया और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात की।

    वाशिंगटन में IMF की बैठकों के दौरान पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने इस बात की पुष्टि की कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की नई वित्तीय सहायता देने पर सहमति जता दी है। सऊदी अरब से मिले इन 3 अरब डॉलर के ताजा डिपॉजिट ने पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को अचानक गिरने से बचा लिया। यानी पाकिस्तान ने अपना खजाना खाली होने से बचाने के लिए सऊदी अरब से 3 अरब डॉलर का नया फंड अपने खाते में डलवाया और उसी बैलेंस की बदौलत बिना दिवालिया हुए UAE का 3.45 अरब डॉलर का पुराना कर्ज चुका दिया।

  • फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों का बड़ा ऐलान, बोले- अपने दूसरे कार्यकाल के बाद छोड़ दूंगा राजनीति

    फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों का बड़ा ऐलान, बोले- अपने दूसरे कार्यकाल के बाद छोड़ दूंगा राजनीति


    पेरिस।
    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (French President Emmanuel Macron) ने घोषणा की है कि वे 2027 में अपने दूसरे और अंतिम कार्यकाल के बाद राजनीति छोड़ (Leave Politics) देंगे। साइप्रस की यात्रा के दौरान निकोसिया में छात्रों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति बनने से पहले राजनीति में शामिल नहीं था और उसके बाद भी नहीं रहूंगा।” यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ महीने पहले उन्होंने अपने भविष्य को लेकर लंबी राजनीतिक संभावनाओं का संकेत दिया था। जुलाई 2025 में पेरिस में अपनी पार्टी के युवा विंग की 10वीं वर्षगांठ पर उन्होंने कहा था कि मुझे दो साल, पांच साल और दस साल बाद भी आपकी जरूरत पड़ेगी। अब यह स्पष्ट है कि मैक्रों फ्रांस की राजनीति में कोई नई भूमिका नहीं निभाएंगे।

    मैक्रों 2017 में मात्र 39 वर्ष की आयु में फ्रांस के राष्ट्रपति बने थे, जो 1958 में पांचवीं गणराज्य की स्थापना के बाद सबसे युवा राष्ट्रपति थे। 2022 में वे दोबारा चुने गए, लेकिन फ्रांसीसी संविधान के अनुसार तीसरा लगातार कार्यकाल नहीं मिल सकता। राष्ट्रपति बनने से पहले वे 2014 से 2016 तक फ्रांसुआ ओलांद की सरकार में अर्थव्यवस्था मंत्री रह चुके थे। साइप्रस में उन्होंने अपने शेष कार्यकाल की चुनौतियों पर भी चर्चा की और कहा कि 9 वर्ष बाद अच्छे कार्यों को बनाए रखना और गलतियों को सुधारना सबसे कठिन काम है।

    कैसा रहा अब तक का राजनीतिक सफर
    इमैनुएल मैक्रों ने अपने भविष्य की कोई योजना नहीं बताई, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि अब राजनीति से दूर रहेंगे। मैक्रों के कार्यकाल में सबसे प्रमुख सुधार पेंशन सुधार था, जिसमें रिटायरमेंट की आयु 62 से बढ़ाकर 64 वर्ष कर दी गई। इस फैसले के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए और ट्रेड यूनियनों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनके दूसरे कार्यकाल में संसद भी बंटी हुई रही। 2022 के संसदीय चुनावों में उनकी पार्टी का बहुमत चला गया, जिससे बड़े सुधारों को पास करना मुश्किल हो गया।

    जून 2024 में यूरोपीय संसद चुनावों में दक्षिणपंथी नेशनल रैली की मजबूत प्रदर्शन के बाद मैक्रों ने संसद भंग कर स्नैप चुनाव कराए। इस फैसले की उनकी अपनी पार्टी में भी आलोचना हुई और इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। 2025 के नए साल के संबोधन में उन्होंने खुद स्वीकार किया कि यह कदम फ्रांसीसी लोगों के लिए समाधान लाने के बजाय अस्थिरता का कारण बना। मैक्रों का यह फैसला फ्रांस की राजनीति में एक नई शुरुआत का संकेत देता है। 2027 के चुनाव के बाद नया राष्ट्रपति चुना जाएगा और मैक्रों सक्रिय राजनीति से दूर होकर शायद निजी जीवन या अन्य क्षेत्रों में काम करेंगे।

  • जापान में भीषण जंगल आग 1200 हेक्टेयर राख में तब्दील हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट

    जापान में भीषण जंगल आग 1200 हेक्टेयर राख में तब्दील हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट


    नई दिल्ली । जापान के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र इवाते में लगी भीषण जंगल आग लगातार भयावह रूप लेती जा रही है और इस पर काबू पाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आग ने अब तक लगभग 1200 हेक्टेयर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है जिससे जंगल पूरी तरह से राख में तब्दील हो चुके हैं।

    यह आग बुधवार को ओत्सुची टाउन के पहाड़ी इलाके में शुरू हुई थी और देखते ही देखते तेजी से फैल गई। आग की तीव्रता इतनी अधिक थी कि आसपास के रिहायशी इलाकों तक पहुंच गई और आठ इमारतें पूरी तरह जलकर नष्ट हो गईं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए लगभग 2600 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के आदेश जारी किए हैं। यह संख्या ओत्सुची टाउन की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।

    आग बुझाने के लिए बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है। इवाते प्रीफेक्चरल सरकार के साथ सेल्फ डिफेंस फोर्सेज के हेलीकॉप्टरों को भी पानी छिड़कने के काम में लगाया गया है। इसके अलावा दमकल विभाग की कई टीमें लगातार मौके पर तैनात हैं और आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रही हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए होक्काइडो यामागाटा फुकुशिमा तोचिगी और निगाटा जैसे अन्य क्षेत्रों से भी अतिरिक्त मदद मंगाई गई है।

    इस बीच जापान में हाल ही में आए भूकंप ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। सोमवार को उत्तर-पूर्वी जापान में 7.7 तीव्रता का भूकंप आया था जिसके बाद जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने इवाते समेत सात क्षेत्रों की 182 नगरपालिकाओं के लिए एक सप्ताह का विशेष भूकंप अलर्ट जारी किया है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि राहत कार्यों के दौरान भूकंप के संभावित खतरों को देखते हुए अत्यधिक सावधानी बरती जाए।

    जापान में जंगलों की आग लगने के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण माने जाते हैं। यहां सर्दियों के अंत और वसंत की शुरुआत में मौसम अत्यधिक शुष्क हो जाता है जिससे पेड़ पौधे सूख जाते हैं और आग लगने की संभावना बढ़ जाती है। नमी की कमी आग को तेजी से फैलने में मदद करती है।

    इसके अलावा जापान के घने जंगलों में मुख्य रूप से देवदार और चीड़ जैसे शंकुधारी पेड़ पाए जाते हैं जिनमें मौजूद रेजिन अत्यधिक ज्वलनशील होता है। यही कारण है कि एक बार आग लगने के बाद यह तेजी से पूरे जंगल में फैल जाती है। घनी वनस्पति भी आग के फैलाव को और तेज कर देती है।

    मानवीय लापरवाही भी ऐसी घटनाओं की एक बड़ी वजह मानी जाती है। बिना निगरानी के कैंपफायर फेंकी गई सिगरेट या कृषि कार्यों के दौरान उठी चिंगारी भी जंगलों में आग का कारण बन सकती है। जापान में आबादी का बड़ा हिस्सा जंगलों के करीब रहता है जिससे इंसानी गतिविधियों और प्राकृतिक वातावरण के बीच संपर्क बढ़ता है और जोखिम भी अधिक हो जाता है।

    फिलहाल जापानी प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमें आग पर काबू पाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं लेकिन तेज हवाओं और सूखे मौसम के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे सुरक्षित स्थानों पर रहें और राहत कार्यों में सहयोग करें।