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  • भारत-चीन के बीच सुधरते रिश्ते….दोनों देशों के बीच पहली बार हुई SCO द्विपक्षीय वार्ता

    भारत-चीन के बीच सुधरते रिश्ते….दोनों देशों के बीच पहली बार हुई SCO द्विपक्षीय वार्ता


    शांघाई।
    द्विपक्षीय सहयोग (Bilateral Cooperation) को बढ़ावा देने के प्रयासों और हाल ही में दोनों देशों के बीच सुधरे संबंधों के बीच, भारत और चीन (India and China) ने 16-17 अप्रैल को अपनी पहली शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organization- SCO) द्विपक्षीय वार्ता आयोजित की। साल 2024 में पूर्वी लद्दाख में हुए सैन्य गतिरोध के सुलझने के बाद से यह कदम दोनों देशों के बीच सुधरते कूटनीतिक रिश्तों की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।


    बैठक के मुख्य विषय और चर्चा

    विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी बयान के अनुसार दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने SCO नेताओं द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करने और संगठन की भविष्य की रूपरेखा को लेकर अपने-अपने विचार साझा किए। भारत और चीन ने SCO से जुड़े मामलों में आपसी विचार-विमर्श और सहयोग को लगातार जारी रखने और उसे और अधिक मजबूत करने पर सहमति जताई है।

    दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने संयुक्त रूप से विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज से मुलाकात की। इस दौरान सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी (संपर्क) और दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंधों सहित SCO ढांचे के भीतर सहयोग की व्यापक समीक्षा की गई।


    बहुपक्षीय मंचों (BRICS और SCO) पर बढ़ता सहयोग

    साल 2024 में सीमा विवाद सुलझने के बाद से दोनों देश ब्रिक्स (BRICS) और SCO जैसे अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन गए थे।


    आगामी उच्च स्तरीय दौरे

    बीजिंग ने भारत की मौजूदा ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए अपना पूर्ण समर्थन जताया है। इसके तहत, चीनी विदेश मंत्री वांग यी 14-15 मई को ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत का दौरा कर सकते हैं। इसके अलावा, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी सितंबर में होने वाले मुख्य ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की उम्मीद है।


    SCO को लेकर भारत का स्पष्ट रुख

    भारत इस यूरेशियन समूह (SCO) में अपनी सदस्यता को अत्यधिक महत्व देता है और इसके उद्देश्यों को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। भारत का मानना है कि SCO का प्राथमिक और मूल उद्देश्य क्षेत्र में आतंकवाद, कट्टरपंथ और उग्रवाद का डटकर मुकाबला करना है।

    भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए SCO को एक महत्वपूर्ण मंच मानता है। लेकिन भारत की स्पष्ट शर्त है कि इस तरह की कोई भी पहल सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का पालन करे, जो कि SCO चार्टर का भी मुख्य हिस्सा है।


    पीएम मोदी का कड़ा संदेश

    भारत के इसी रुख को दोहराते हुए पिछले साल तियानजिन में SCO शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जो कनेक्टिविटी संप्रभुता को दरकिनार करती है, वह अंततः अपना भरोसा और अर्थ दोनों खो देती है।

  • होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी

    होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने ईरान (Iran) को चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर ईरान अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता। बता दें, शुक्रवार को लेबनान (Lebanon.) में हुए सीजफायर का स्वागत करते हुए ईरान (Iran) ने होर्मुज पर लगे प्रतिंबध को हटा दिया था। हालांकि, जब ट्रंप होर्मुज के पास लगे अमेरिकी ब्लाकेड को हटाने से इनकार कर दिया, तो शनिवार को ईरान ने फिर से होर्मुज के दरवाजे बंद कर दिए।

    होर्मुज पर बदलते हालात पर ट्रंप ने शनिवार को ओवेल ऑफिस में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा, “हम उनसे बात कर रहे हैं। वे स्ट्रेट को फिर से बंद करना चाहते हैं। जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे हैं और वे हमें ब्लैकमेल नहीं कर सकते।”

    इससे पहले ईरानी सेना की कमांड ने एक होर्मुज पर अमेरिकी कमांड को वादाखिलाफी बताया। ईरान की तरफ से कहा गया कि ईरानी बंदरगाहों के खिलाफ लगाए गए अमेरिकी ब्लाकेड को न हटाकर अमेरिका ने अपना वादा तोड़ा है। बयान में आगे कहा गया, “जब तक अमेरिका ईरान आने वाले सभी जहाजों के लिए आवाजाही की स्वतंत्रता बहाल नहीं करता, होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सख्त नियंत्रण में रहेगी।”

    शनिवार सुबह होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति को अपने देश और दुनिया के सामने रखते हुए ईरानी सरकारी टीवी ने बताया कि होर्मुज पर वापस नियंत्रण हासिल कर लिया गया है। ईरान की तरफ से होर्मुज पर नियंत्रण हासिल करने के प्रयास में ही दो भारतीय तेल टैंकरों के ऊपर गोलीबारी की खबर सामने आई है। इस घटना को लेकर सरकार ने ईरानी राजदूत को भी समन किया है।

    बता दें, 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हमले के बाद शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट ने पूरे विश्व को ऊर्जा संकट में धकेल दिया है। हमले के कुछ दिन बाद ही ईरान ने होर्मुज के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया, जिसकी वजह से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं। पांच हफ्तों की लड़ाई के बाद अमेरिका और ईरान ने सीजफायर की घोषणा कर दी, लेकिन इजरायल ने लेबनान पर हमला करना जारी रखा। इसकी वजह से ईरान ने होर्मुज को खोलने से इनकार कर दिया। अमेरिकी और ईरान के बीच हुई वार्ता के बाद इजरायल ने भी लेबनान के साथ सीजफायर का ऐलान कर दिया। इसके बाद ईरान ने शुक्रवार को सीजफायर की अवधि तक होर्मुज के रास्ते व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दिए। लेकिन फिर ट्रंप के बायन के बाद व्यवस्था बिगड़ गई।

  • F-47 Jet: अमेरिका का सबसे एडवांस और महंगा फाइटर जेट हो रहा तैयार, कीमत जानकर उड़ जाएंगे होश

    F-47 Jet: अमेरिका का सबसे एडवांस और महंगा फाइटर जेट हो रहा तैयार, कीमत जानकर उड़ जाएंगे होश


    नई दिल्ली । दुनियाभर में बदलते सामरिक हालात और बढ़ते एरियल थ्रेट के बीच आधुनिक फाइटर जेट्स की रेस और तेज हो गई है। लंबी दूरी की मिसाइलें और ड्रोन तकनीक ने सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बना दिया है, जिसके चलते कई देश नई पीढ़ी के एयर डिफेंस सिस्टम और फाइटर एयरक्राफ्ट विकसित कर रहे हैं। भारत का ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ और अमेरिका का ‘गोल्डन डोम’ इसी दिशा में बड़े प्रयास माने जा रहे हैं।

    6th जेनरेशन फाइटर जेट पर फोकस

    इसी बदलाव के बीच अब छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स पर दुनिया का ध्यान केंद्रित हो गया है। यूरोप, भारत और अमेरिका सभी अपने-अपने एडवांस एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। भारत ने जहां AMCA प्रोजेक्ट शुरू किया है, वहीं अमेरिका ने अपने नए फाइटर जेट प्रोग्राम के तहत Boeing को बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया है। अमेरिका के इस नए फाइटर जेट का नाम F-47 रखा गया है, जिसे F-22 Raptor का अगला और ज्यादा एडवांस संस्करण माना जा रहा है।

    कीमत ने उड़ाए होश

    F-47 को दुनिया का सबसे महंगा फाइटर जेट बताया जा रहा है। इसकी प्रति यूनिट कीमत करीब 300 मिलियन डॉलर (लगभग 3000 करोड़ रुपये) आंकी गई है। यह F-35 की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा महंगा है। इस कीमत में लगभग 4 से 5 हल्के लड़ाकू विमान HAL Tejas खरीदे जा सकते हैं, जिसकी एक यूनिट लागत करीब 600–650 करोड़ रुपये बताई जाती है।

    F-47 को केवल एक लड़ाकू विमान नहीं बल्कि डिजिटल क्वार्टरबैक की तरह डिजाइन किया जा रहा है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑल-एंगल स्टील्थ और एडवांस मिशन सिस्टम जैसी तकनीकें शामिल होंगी। यह विमान मानव रहित ड्रोन (CCA) के साथ मिलकर काम करेगा और पूरे नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध संचालन का नेतृत्व करेगा।

    भारी-भरकम बजट खर्च

    इस प्रोजेक्ट पर अब तक अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं और आने वाले वर्षों में इसमें और तेजी लाई जा रही है। अमेरिकी वायुसेना का लक्ष्य 185 से अधिक F-47 विमान तैयार करने का है, जो F-22 बेड़े के बराबर होंगे। हालांकि, इस परियोजना को फंडिंग और अन्य रक्षा कार्यक्रमों से प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।

    F-22 की विरासत और आगे की रणनीति

    F-47 को F-22 की तकनीकी विरासत को आगे बढ़ाने वाला विमान माना जा रहा है, लेकिन इसकी भूमिका और भी व्यापक होगी। यह अकेले लड़ाई लड़ने के बजाय ड्रोन और अन्य सिस्टम के साथ मिलकर एक समन्वित युद्ध नेटवर्क का हिस्सा होगा।

    वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज

    एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा और चीन जैसे देशों द्वारा छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स पर काम करने के चलते अमेरिका इस प्रोजेक्ट को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मान रहा है।

  • होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट

    होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट


    नई दिल्‍ली । ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका ने अपने रुख में बदलाव करते हुए बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद पर एक बार फिर अस्थायी छूट दे दी है। खास बात यह है कि यह निर्णय उस घोषणा के दो दिन बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि इस राहत को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

    एक महीने के लिए मिली नई छूट

    अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 17 अप्रैल से लागू नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत देशों को 16 मई तक रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति दी गई है। यानी लगभग एक महीने तक समुद्र में लोड किए गए रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। इससे पहले दी गई 30 दिन की छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी और संकेत मिल रहे थे कि अब अमेरिका सख्ती अपनाएगा, लेकिन बदलते हालात ने फैसले को भी बदल दिया।

    क्या वजह रही इस फैसले की?
    ईरान के साथ टकराव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। इस रूट पर खतरा बढ़ने से तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ऐसे में अमेरिका के सामने चुनौती थी कि सप्लाई घटने से कीमतें और न बढ़ जाएं, जिसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए यह अस्थायी राहत देने का फैसला किया।

    रूस के राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रिएव के अनुसार, पहले दी गई छूट से लगभग 100 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल बाजार में आ सकता था, जो एक दिन की वैश्विक खपत के बराबर है। नई छूट से भी सप्लाई को सहारा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    सहयोगी देशों की नाराजगी बढ़ी

    अमेरिका के इस कदम से उसके सहयोगी देशों में असंतोष बढ़ सकता है। यूरोप लगातार रूस पर कड़े प्रतिबंध बनाए रखने के पक्ष में रहा है। यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल रूस पर नरमी दिखाने का समय नहीं है। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला पश्चिमी देशों की एकजुट रणनीति को कमजोर कर सकता है और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी नीतियों पर सवाल खड़े कर सकता है।

    तेल बाजार को मिली राहत
    इस घोषणा के बाद तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 9% गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई, जो पिछले एक महीने का न्यूनतम स्तर है। इस गिरावट की एक वजह यह भी है कि ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि सीजफायर के दौरान होर्मुज स्ट्रेट को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोल दिया गया है।

  • चीन के 4 कार्गो विमान गुपचुप तरीके से ईरान पहुंचे…. हथियार भेजने का दावा

    चीन के 4 कार्गो विमान गुपचुप तरीके से ईरान पहुंचे…. हथियार भेजने का दावा


    तेहरान।
    मध्य एशिया (Central Asia) में जारी तनाव के बीच एक नई घटना सामने आई है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करते हुए कमेंटेटर मारियो नॉफाल (Commentator Mario Nofal.) ने दावा किया है कि चीन के चार कार्गो विमान (Four Cargo Planes) ईरान (Iran) में गुपचुप तरीके से उतरे हैं। उन्होंने दावा किया कि लैंडिंग से पहले विमानों ने अपने ट्रांसपॉन्डर बंद कर दिए जिससे उनकी जानकारी किसी को हासिल ना हो सके। एक दिन पहले ही शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने अमेरिका से वादा किया था कि वह ईरान को हथियारों की कोई सप्लाई नहीं करेंगे।

    अब इस मामले के जानकारों कहना है कि चारों विमानों का इस तरह से लैंडिंग से पहले ट्रांसपॉन्डर बंद करना कोई तकनीकी खामी नहीं हो सकती है। हालांकि इन विमानों को लेकर ना तो ईरान की तरफ से और ना ही चीन की तरफ से कोई आधिकारिक जानकारी सामने आई है। चीन ने ईरान को किसी तरह के सहयोग देने के आरोपों को खारिज किया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बुधवार को कहा कि इस तरह की रिपोर्ट एकदम झूठी हैं। चीन ने ईरान को कोई सैटलाइट हेल्प भी नहीं की है।

    मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि पड़ोसी देशों में अमेरिका के बेस ध्वस्त करने के लिए चीन उनसकी सहायता कर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने भी चीन को धमकी दी थी कि वह अगर किसी भी रूप में दखल देता है तो इसके परिणाम बहुत बुरे होंगे। एविएशन एक्सपर्ट का कहना है कि इस तरह से विमानों का ट्रांसपॉन्डर बंद कर लेना सामान्य तो नहीं है। हो सकता है कि किसी ऑपरेशनल या फिर सुरक्षा कारणों से ऐसा किया गया हो।

    जानकारों का कहना है कि लगातार कई विमानों का एक ही पैटर्न पर लैंड करना संदेह बढ़ाता है। अमेरिका और इजरायल के बीच थोड़ा तनाव इस बात से कम होता नजर आ रहा है कि दोनों ही देशों ने दावा किया है कि कमर्शल जहाजों के लिए होर्मुज को खोल दिया गया है। ट्रंप ने कहा कि होर्मुज सभी जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। हालांकि ईरान के लिए उनकी नाकेबंदी जारी रहेगी।

    वाशिंगटन और तेहरान ने 7 अप्रैल को दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की। इस्लामाबाद में हुई बाद की बातचीत बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। हालांकि शत्रुता की पुनः शुरुआत की कोई घोषणा नहीं की गई, लेकिन अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी शुरू कर दी। अब वार्ता और युद्ध को लेकर एक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। होर्मुज की खबर आने के बाद वैश्विक बाजार में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है।

  • Pakistan के बलूचिस्तान में सेना और विद्रोहियों में हुई भारी गोलीबारी, सैकड़ों घायल

    Pakistan के बलूचिस्तान में सेना और विद्रोहियों में हुई भारी गोलीबारी, सैकड़ों घायल


    इस्लामाबाद ।
    पाकिस्तान (Pakistan) के बलूचिस्तान प्रांत (Balochistan Province) में सेना व बलोच विद्रोहियों (Army and Baloch rebels) में भीषण गोलीबारी चल रही है। स्थिति यह है कि सैन्य अभियानों के बीच खारान, खुजदार और मस्तुंग सहित कई जिलों में हिंसा से विद्रोह और व्यापक हो गया है। सेना-विद्रोहियों में सशस्त्र झड़पों के बीच बड़ी संख्या में सैकड़ों की संख्या में आम नागरिक हताहत हुए हैं। हालांकि, सीमित पहुंच के कारण इन खबरों पर पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बल खामोशी बनाए हैं। जबकि खारान में नया सैन्य अभियान शुरू होने का दावा निवासियों ने किया। सेना ने अलमार्क और किसान जैसे इलाकों में तड़के एक अभियान शुरू कर दिया।

    इस अभियान के दौरान, कुछ अज्ञात हथियारबंद लोगों ने सेना के दस वाहनों के काफिले पर घात लगाकर हमला किया और दोनों पक्षों में गोलीबारी शुरू हो गई। स्थानीय लोगों ने अपने ऊपर ड्रोन उड़ने की भी जानकारी दी, लेकिन हताहतों या अभियान के नतीजों के बारे में कोई भी पुष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। अधिकारी इन घटनाक्रमों पर चुप्पी साधे हैं। इसके बाद सोहिंदा में काफी देर तक गोलीबारी होती रही। यह झड़प कई घंटों तक चली। इस दौरान क्षेत्र में ड्रोन उड़ते भी देखे गए।

    बलूचिस्तान के बरखान जिल में अंधाधुंध सैन्य गोलीबारी में आम नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आई हैं। यहां बलोच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) ने हाल ही में हुई बमबारी और गोलाबारी की निंदा कर इसे सामूहिक सजा का कृत्य बताया है। इस अभियान में कई गैर-लड़ाकों की मौत हो गई, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुज़ुर्ग शामिल हैं। बीवाईसी ने घटना को बेहद दुखद और निंदनीय त्रासदी बताया।

  • भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर

    भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर


    नई दिल्ली ।
    भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 19 और 20 अप्रैल 2026 को दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर श्रीलंका जाएंगे। यह दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह उपराष्ट्रपति के रूप में उनका पहला द्विपक्षीय श्रीलंका दौरा होगा और इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    इस दौरे के दौरान उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके और प्रधानमंत्री डॉ हरिनी अमरसूर्या से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वह अन्य वरिष्ठ नेताओं अधिकारियों और श्रीलंका में रह रहे भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी संवाद करेंगे।

    भारत और श्रीलंका के संबंध ऐतिहासिक सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद मजबूत रहे हैं। श्रीलंका भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” और “विजन महासागर” नीति का एक महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे में यह दौरा हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करेगा।

    इस बीच वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की स्थिति ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका असर श्रीलंका पर भी पड़ा जहां ईंधन संकट की स्थिति बनने लगी थी। ऐसे समय में भारत ने आगे बढ़कर मदद करते हुए 38 000 मीट्रिक टन ईंधन की आपूर्ति की जिससे श्रीलंका को राहत मिली।

    भारत की इस सहायता के लिए श्रीलंका के नेताओं ने आभार व्यक्त किया। सांसद नमल राजपक्षे ने भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति की सराहना करते हुए कहा कि भारत संकट के समय हमेशा श्रीलंका के साथ खड़ा रहा है। उन्होंने श्रीलंका सरकार को भारत की आर्थिक नीतियों विशेष रूप से फ्यूल टैक्स एडजस्टमेंट मॉडल को अपनाने की सलाह भी दी।

    वहीं राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने भी भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनकी प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत हुई थी जिसमें उन्होंने ईंधन संकट की स्थिति साझा की थी और भारत ने तुरंत सहायता उपलब्ध कराई। कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति का यह दौरा न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह दोनों देशों के बीच सहयोग विश्वास और साझेदारी को और गहरा करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

  • ऑस्ट्रेलिया में तेल रिफाइनरी हादसा सरकार बोली सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

    ऑस्ट्रेलिया में तेल रिफाइनरी हादसा सरकार बोली सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया में तेल रिफाइनरी में लगी आग के बाद ईंधन आपूर्ति को लेकर उठी चिंताओं के बीच प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस घटना का देश की फ्यूल सप्लाई पर बहुत कम असर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि रिफाइनरी में लगी आग गंभीर जरूर थी, लेकिन उत्पादन काफी हद तक सामान्य बना हुआ है।

    प्रधानमंत्री अल्बानीज अपने ब्रुनेई और मलेशिया के आधिकारिक दौरे को बीच में छोड़कर वापस लौटे और Viva Energy की रिफाइनरी का निरीक्षण किया। यह रिफाइनरी जिलॉन्ग शहर के पास स्थित है, जो मेलबर्न से करीब 65 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है।

    बताया गया कि बुधवार रात उपकरण में खराबी के कारण रिफाइनरी में आग लग गई थी, जिसे गुरुवार दोपहर तक काबू में कर लिया गया। घटना के समय को लेकर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसी समय मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पहले से प्रभावित है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की स्थिति नियंत्रण में है।

    रिफाइनरी के दौरे के दौरान मीडिया से बातचीत में अल्बानीज ने बताया कि डीजल और एविएशन फ्यूल का लगभग 80 प्रतिशत उत्पादन जारी है। वहीं पेट्रोल उत्पादन, जो देश की कुल सप्लाई का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा देता है, फिलहाल 60 प्रतिशत क्षमता पर चल रहा है और आने वाले दिनों में इसके बढ़ने की उम्मीद है।

    सरकार ने भरोसा दिलाया है कि ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही शनिवार को फ्यूल स्टॉकपाइल के स्तर को लेकर नियमित साप्ताहिक अपडेट भी जारी किया जाएगा, जिससे स्थिति पर नजर रखी जा सके।

    गौरतलब है कि यह रिफाइनरी ऑस्ट्रेलिया की केवल दो सक्रिय रिफाइनरियों में से एक है, इसलिए इस तरह की घटना का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि शुरुआती आशंकाओं के विपरीत, उत्पादन पर सीमित असर की खबर ने राहत दी है। फायर और रेस्क्यू अधिकारियों के अनुसार, आग लगने की वजह तकनीकी खराबी थी और घटना की जांच जारी है। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और सप्लाई चेन को सुचारु बनाए रखने पर ध्यान दिया जा रहा है।

  • भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जंग रहे युद्ध के बीच अमेरिका साउथ ईस्ट एशिया में स्थित एक मुस्लिम देश संग मिलकर बड़ा खेल करने की तैयारी में था। हालांकि एक भारतीय रिपोर्ट ने इस प्लान पर पानी फेर दिया है। बीते दिनों अमेरिका और दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया के बीच एक सीक्रेट समझौते की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब इंडियन मीडिया की एक रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है।

    दरअसल अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक डिफेंस डील साइन होनी थी। हालांकि डील साइन होने से ठीक पहले 12 अप्रैल को एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अमेरिका इंडोनेशिया के एयरस्पेस में अपने सैन्य विमानों को पूरी इजाजत देने की योजना बना रहा है। इस लीक के बाद इंडोनेशिया में भारी हंगामा हुआ और आखिरकार इस प्रावधन को फाइनल डील से बाहर कर दिया गया है।
    रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    इस डील की पूरी जानकारी रिपोर्ट ‘संडे गार्जियन’ में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच कई महीने से इस गुप्त योजना पर काम कर रही थी। फरवरी में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच वाइट हाउस में हुई बैठक में भी इस पर चर्चा हुई थी। इसे 13 अप्रैल को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री शाफ्री जमसोएद्दीन की बैठक में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना था, लेकिन विवाद के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

    डील में क्या था?

    इस प्रस्तावित डील के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशिया के एयरस्पेस में बिना किसी रोक-टोक के उड़ान भरने की इजाजत मिल जाती। आधिकारिक तौर पर इसे इमरजेंसी और संकट के समय इस्तेमाल के लिए बताया गया, लेकिन इसका असली मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निगरानी बढ़ाना था, खासकर उस समय जब ईरान ने होर्मुज पर दबाव बढ़ा दिया है और ग्लोबल ऑयल सप्लाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर पकड़ मजबूत करना चाहता था, जो दुनिया का सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्ग है और जहां से करीब 30 प्रतिशत समुद्री तेल और 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार गुजरता है।
    इंडोनेशिया ही क्यों?

    इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति इस रणनीति के केंद्र में है, क्योंकि वह मलक्का के पास स्थित है।

    अमेरिका के लिए यह डील इंडो-पैसिफिक में चीन पर नजर रखने के लिए अहम साबित हो सकती थी, क्योंकि फिलहाल उसे उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के सैन्य ठिकानों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो दूरी के लिहाज से कम प्रभावी हैं।
    क्यों हटना पड़ा पीछे?

    हालांकि जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, इंडोनेशिया में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया। जकार्ता में सांसदों ने इस तरह के किसी भी समझौते की वैधता पर सवाल उठाए। संसद के डिप्टी चेयर सुकामता ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी सैन्य सहयोग के लिए संसद से सलाह लेना जरूरी है और बिना कानूनी आधार के एयरस्पेस देना संभव नहीं है।

    इस विरोध के बाद प्रबोवो सरकार दबाव में आ गई। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि अमेरिकी विमानों को ओवरफ्लाइट एक्सेस देने का प्रस्ताव फाइनल डील का हिस्सा नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह सिर्फ “लेटर ऑफ इंटेंट” के स्तर पर चर्चा में था और अभी न तो अंतिम है और न ही बाध्यकारी। साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी समझौते में इंडोनेशिया की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह डील फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।
  • होर्मुज के पास आमने-सामने भारत-पाक नौसेना, बढ़ते तनाव के बीच 18 समुद्री मील की दूरी पर जहाज

    होर्मुज के पास आमने-सामने भारत-पाक नौसेना, बढ़ते तनाव के बीच 18 समुद्री मील की दूरी पर जहाज


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास एक असामान्य स्थिति देखने को मिली, जब भारत और पाकिस्तान की नौसेनाएं बेहद कम दूरी पर सक्रिय नजर आईं। अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बावजूद इलाके में तनाव बरकरार है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों से जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाई है, जबकि ईरान का दावा है कि होर्मुज पर उसका नियंत्रण कायम है।

    ओमान तट के पास दिखा असामान्य सैन्य मूवमेंट

    ओपन सोर्स इंटेलिजेंस एनालिस्ट डेमियन साइमन के अनुसार, ओमान के तट के पास भारत और पाकिस्तान के नौसैनिक जहाज एक-दूसरे से केवल 18 समुद्री मील की दूरी पर देखे गए। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि दोनों देश पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच अपने-अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा में जुटे हैं।

    समुद्री मार्गों की सुरक्षा में जुटी भारतीय नौसेना

    भारतीय नौसेना ने ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अहम समुद्री रास्तों पर अपनी तैनाती बढ़ा दी है। इसका उद्देश्य भारत आने वाले एलपीजी, एलएनजी और कच्चे तेल के जहाजों को सुरक्षित रास्ता देना है। नौसेना के अनुसार, फारस की खाड़ी से लेकर होर्मुज और अरब सागर तक जहाजों को सुरक्षा प्रदान की जा रही है, ताकि वे बिना किसी बाधा के अपनी यात्रा पूरी कर सकें। बताया जा रहा है कि 10 से अधिक भारतीय जहाज फिलहाल होर्मुज क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिन्हें सुरक्षित निकालने के प्रयास जारी हैं।

    अमेरिका-ईरान संबंधों में तनाव, बातचीत जारी
    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिका जहां ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर पीछे हटने की मांग कर रहा है, वहीं ईरान इस पर पूरी तरह सहमत नहीं है। हालांकि, दोनों देशों के बीच मतभेद कम करने और होर्मुज क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए बातचीत जारी है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह ओमान की दिशा से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, बशर्ते कोई ठोस समझौता हो।

    समझौते की उम्मीद और ट्रंप का संकेत

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ वार्ता में प्रगति हो रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि शांति समझौता होता है, तो वह हस्ताक्षर प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं। ट्रंप ने कहा कि अगर समझौता इस्लामाबाद में होता है, तो वे वहां जाने पर भी विचार कर सकते हैं।