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  • अमेरिकी टैरिफ से सोलर शेयरों में बड़ी गिरावट, वारी और प्रीमियर एनर्जीज टॉप लूजर..

    अमेरिकी टैरिफ से सोलर शेयरों में बड़ी गिरावट, वारी और प्रीमियर एनर्जीज टॉप लूजर..

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बुधवार को भारतीय सोलर आयात पर 126 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद भारतीय सोलर शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली। यह टैरिफ उन देशों पर लगाया गया है जो अनुचित रूप से सब्सिडी देते हैं और अमेरिका के घरेलू सोलर उद्योग को नुकसान पहुंचाते हैं।

    इस फैसले के बाद वारी एनर्जीज के शेयर में कारोबार के दौरान 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। खबर लिखे जाने तक हल्की रिकवरी के बाद यह 10.83 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 2,697 रुपए पर कारोबार कर रहा था।

    प्रीमियर एनर्जीज का शेयर भी दबाव में रहा और फिलहाल यह 6.19 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 728.95 रुपए पर था। कारोबार के दौरान इस शेयर में करीब 14 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। इसके अलावा विक्रम सोलर का शेयर 5.67 प्रतिशत कमजोर होकर 174 रुपए पर था, जबकि कारोबार के दौरान 7.76 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई।

    ट्रंप प्रशासन ने भारत के अलावा इंडोनेशिया और लाओस के सोलर उत्पादों पर भी क्रमश: 143 प्रतिशत और 81 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। 2025 की पहली छमाही में अमेरिका के सोलर मॉड्यूल आयात में इन तीन देशों की हिस्सेदारी कुल 57 प्रतिशत रही है। 2024 में अमेरिका को भारतीय सोलर निर्यात की वैल्यू 792.6 मिलियन डॉलर थी, जो 2022 की तुलना में नौ गुना अधिक है।

    अमेरिकी प्रशासन ने यह कार्रवाई यूएस सोलर ग्रुप की याचिका के आधार पर की है। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ देशों की सब्सिडी अमेरिकी सोलर उद्योग को नुकसान पहुंचा रही है।

    निवेशकों के लिए यह टैरिफ भारतीय सोलर कंपनियों के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि आगामी कारोबारी सत्र में बिकवाली और दबाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • अमेरिका ने भारत के सोलर पैनलों पर लगाया 126% टैरिफ, निर्यात और व्यापार वार्ता पर पड़ेगा असर

    अमेरिका ने भारत के सोलर पैनलों पर लगाया 126% टैरिफ, निर्यात और व्यापार वार्ता पर पड़ेगा असर


    नई दिल्ली। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आयात होने वाले सोलर पैनलों पर 126% की शुरुआती टैरिफ लगाने का फैसला किया है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग का आरोप है कि भारत सरकार ने घरेलू निर्माताओं को अनुचित सब्सिडी दी, जिससे वे कम कीमत पर उत्पाद बेचकर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा रहे थे। इसी कार्रवाई के तहत इंडोनेशिया पर 86% से 143% और लाओस पर 81% तक शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

    भारतीय निर्यात पर असर

    ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, इस फैसले से भारतीय सोलर कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में कारोबार करना कठिन हो सकता है। वर्ष 2024 में भारत ने अमेरिका को 792.6 मिलियन डॉलर करीब 6,500 करोड़ रुपये के सोलर उत्पाद निर्यात किए, जो 2022 की तुलना में नौ गुना अधिक है। दूसरी ओर, अमेरिका में सोलर प्रोजेक्ट विकसित करने वाली कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ने की आशंका है।

    सामान्य टैरिफ से अलग कदम

    यह शुल्क ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए उन सामान्य टैरिफ से अलग है, जिन्हें हाल ही में अदालत ने खारिज कर दिया था। अदालत के फैसले के बाद ट्रंप ने नए 10% शुल्क लागू किए थे। मौजूदा सोलर टैरिफ एक अलग जांच प्रक्रिया के तहत प्रस्तावित हैं।

    अंतिम फैसला 6 जुलाई तक
    अमेरिका की कुछ सोलर निर्माता कंपनियों के समूह ने घरेलू उद्योग की सुरक्षा के लिए जांच की मांग की थी। इस मामले में अंतिम निर्णय 6 जुलाई तक आने की संभावना है। गौरतलब है कि 2025 की पहली छमाही में अमेरिका में आयात होने वाले 57% सोलर मॉड्यूल भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आए थे। ऐसे में भारी शुल्क का असर अमेरिकी सौर ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।

    भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर असर

    यह फैसला ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि अमेरिका में टैरिफ की स्थिति स्पष्ट होते ही भारत वार्ता दोबारा शुरू करेगा। उन्होंने यह भी बताया कि भारत और कनाडा के बीच मुक्त व्यापार समझौते एफटीए के लिए संदर्भ की शर्तों टीओआर को इस सप्ताह के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी 26 फरवरी को भारत दौरे पर आ रहे हैं, और इसी दौरान एफटीए वार्ता औपचारिक रूप से शुरू हो सकती है। उल्लेखनीय है कि 22 फरवरी को भारत और अमेरिका ने वाशिंगटन में प्रस्तावित मुख्य वार्ताकारों की बैठक स्थगित कर दी थी, जिसमें अंतरिम व्यापार समझौते के मसौदे को अंतिम रूप दिया जाना था।

  • दुनिया के सबसे महंगे अमेरिकी युद्धपोत USS पर ‘टॉयलेट संकट’, 4500 सैनिकों की बढ़ी मुश्किलें

    दुनिया के सबसे महंगे अमेरिकी युद्धपोत USS पर ‘टॉयलेट संकट’, 4500 सैनिकों की बढ़ी मुश्किलें

    वॉशिंगटन। दुनिया के सबसे आधुनिक और महंगे परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत ‘USS जेराल्ड आर फोर्ड’ (USS Gerald R. Ford) पर इन दिनों तकनीकी खराबी ने बड़ा संचालन संकट खड़ा कर दिया है। जहाज का सीवेज सिस्टम फेल होने से हजारों सैनिकों को रोजमर्रा की बुनियादी सुविधाओं के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।

    650 में से अधिकांश टॉयलेट बंद, लंबी कतारें
    मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जहाज पर मौजूद 650 टॉयलेट्स में से ज्यादातर काम नहीं कर रहे हैं। करीब 4,500 सैनिकों को इस्तेमाल के लिए 40–45 मिनट तक लाइन में लगना पड़ रहा है, जिससे जहाज पर तनाव और असंतोष का माहौल बन गया है।
    इस समस्या का खुलासा सबसे पहले The Wall Street Journal की रिपोर्ट में हुआ।

    हाई-टेक सिस्टम ही बना परेशानी की जड़
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, जहाज में लगा वैक्यूम-आधारित अत्याधुनिक सीवेज सिस्टम बेहद संवेदनशील है। एक वाल्व खराब होने पर पूरा सेक्शन बंद हो जाता है।
    NPR के अनुसार, मरम्मत दल को पाइपों में कपड़े, रस्सियां और ठोस जमाव जैसी चीजें मिल रही हैं, जिन्हें हटाने में घंटों लग जाते हैं। कैल्शियम जमा होने की सफाई पर हर बार लाखों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।

    8 महीने से समुद्र में तैनाती, थकान बढ़ी

    यह युद्धपोत जून 2025 से लगातार समुद्र में तैनात है। सामान्य तौर पर ऐसी तैनाती छह महीने की होती है, लेकिन मौजूदा मिशन लंबा खिंच गया है। रिटायर्ड रियर एडमिरल Mark Montgomery ने कहा कि इतनी लंबी तैनाती क्रू पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ा सकती है।

    मिडिल ईस्ट तनाव के बीच बढ़ी तैनाती
    क्षेत्रीय हालात, खासकर ईरान से जुड़े तनाव के चलते अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी बढ़ाई गई है। इस अभियान का नेतृत्व United States Navy कर रही है, जिसने क्षेत्र में कई युद्धपोत तैनात कर रखे हैं।

    युवा सैनिकों पर मानसिक दबाव

    जहाज पर तैनात बड़ी संख्या में 20–22 वर्ष के युवा सैनिक हैं, जो लंबे समय से परिवार से दूर हैं। ‘घोस्ट मोड’ यानी सीमित संचार वाले मिशन के कारण वे घर से संपर्क भी नहीं कर पा रहे।
    Daily Mail को मिले एक पत्र में कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन डेविड स्कारोसी ने भी क्रू की नाराजगी और थकान को स्वीकार किया है।

    पिछली घटनाओं से भी चिंता

    विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक थकान और ऑपरेशनल दबाव सुरक्षा जोखिम बढ़ा सकता है। इससे पहले भी क्षेत्र में तैनात USS Harry S. Truman से जुड़े अभियानों में क्रू पर काम के बोझ को लेकर सवाल उठ चुके हैं।
    फिलहाल अमेरिकी बेड़े में USS Abraham Lincoln सहित कई बड़े कैरियर मिडिल ईस्ट में सक्रिय हैं।

    13 अरब डॉलर से अधिक लागत वाले इस सुपरकैरियर को अमेरिकी नौसेना की तकनीकी ताकत का प्रतीक माना जाता है, लेकिन मौजूदा तकनीकी गड़बड़ी ने दिखाया है कि अत्याधुनिक सिस्टम भी संचालन के स्तर पर बड़ी चुनौती बन सकते हैं—खासकर तब, जब जहाज लंबे समय तक लगातार मिशन पर हो।

  • हिंद महासागर में अमेरिकी कार्रवाई तेज, 15,000 किमी पीछा कर ‘बर्था’ तेल टैंकर जब्त

    हिंद महासागर में अमेरिकी कार्रवाई तेज, 15,000 किमी पीछा कर ‘बर्था’ तेल टैंकर जब्त

    वाशिंगटन। संयुक्त राज्य अमेरिका ने प्रतिबंधित तेल कारोबार के खिलाफ अपनी समुद्री कार्रवाई को और सख्त करते हुए हिंद महासागर में एक और टैंकर जब्त किया है। अमेरिकी सेना ने ‘बर्था’ नामक जहाज का हजारों किलोमीटर तक पीछा करने के बाद उसे रोक लिया।

    कैरेबियन से हिंद महासागर तक चला ऑपरेशन

    अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के मुताबिक यह अभियान कैरेबियन सागर से शुरू हुआ और लगभग 15,000 किलोमीटर तक निगरानी के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में जाकर पूरा हुआ। इसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तीसरी बड़ी जब्ती बताया गया है।

    अमेरिका का दावा है कि यह टैंकर प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए वेनेजुएला से कच्चा तेल लेकर चीन जा रहा था और इसका संबंध ईरान से जुड़े प्रतिबंधित नेटवर्क से था।

    ट्रंप प्रशासन की सख्त नीति का हिस्सा

    यह कार्रवाई पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस रणनीति के तहत बताई जा रही है, जिसके जरिए प्रतिबंधों को दरकिनार कर तेल निर्यात करने वाले जहाजों पर नाकाबंदी बढ़ाई गई थी।
    अमेरिका पहले ही ऐसे कई जहाजों को निशाने पर ले चुका है जो प्रतिबंधित ऊर्जा व्यापार से जुड़े बताए जाते हैं।

    जहाज पर चढ़ाई कर की गई जब्ती

    अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा बलों ने रातभर चले ऑपरेशन में ‘बर्था’ पर चढ़ाई (Boarding Operation) की और बिना किसी टकराव के उसे अपने नियंत्रण में ले लिया।

    यह जहाज कुक आइलैंड्स के ध्वज तले चल रहा था और अमेरिकी ट्रेजरी के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) के प्रतिबंधों की सूची में शामिल संस्थाओं से जुड़ा बताया गया है।

    लाखों बैरल तेल लेकर जा रहा था टैंकर

    रिपोर्ट के अनुसार, यह टैंकर वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA से जुड़ा था और करीब 19 लाख बैरल भारी कच्चा तेल लेकर एशिया की ओर बढ़ रहा था।
    अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ऐसे जहाज प्रतिबंधों से बचने के लिए लंबी समुद्री मार्ग रणनीति अपनाते हैं।

    इंडो-पैसिफिक कमांड के तहत हुई कार्रवाई

    यह अभियान INDOPACOM के जिम्मेदारी क्षेत्र में अंजाम दिया गया। अमेरिकी सेना के अनुसार, तीन संदिग्ध जहाजों की पहचान की गई थी और अब तीनों को पकड़ लिया गया है।

    मालदीव के पास मिला अंतिम लोकेशन सिग्नल

    समुद्री ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार, जहाज की अंतिम लोकेशन मालदीव के तट के पास दर्ज की गई थी, जिसके बाद अमेरिकी बलों ने उसे इंटरसेप्ट किया।

    क्या है संदेश?
    विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर निगरानी और प्रतिबंधों के सख्त अनुपालन का संकेत है। अमेरिका स्पष्ट कर चुका है कि प्रतिबंधों को दरकिनार कर होने वाले समुद्री तेल व्यापार पर वह लंबी दूरी तक पीछा कर कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेगा।

  • London में पाकिस्तानियों के हमले से परेशान भारतीय मूल का रेस्टोरेंट मालिक…कारोबार बंद करने को मजबूर

    London में पाकिस्तानियों के हमले से परेशान भारतीय मूल का रेस्टोरेंट मालिक…कारोबार बंद करने को मजबूर


    लंदन।
    ब्रिटेन (Britain) की राजधानी लंदन (London) में भारतीय मूल (Indian-origin) के एक रेस्टोरेंट मालिक (Restaurant Owne) ने 16 वर्षों तक रेस्टोरेंट के सफल संचालन के बाद अब अपना कारोबार बंद करने का ऐलान लिया है। बड़ी बात यह है कि रेस्टोरेंट बंद करने के पीछे की वजह पाकिस्तानी हैं। लंदन के हैमरस्मिथ में ‘रंगरेज’ नामक इस रेस्टोरेंट के मालिक हरमन सिंह कपूर (Harman Singh Kapoor) ने दावा किया है कि पाकिस्तानी उन पर कथित तौर पर लगातार हमले कर रहे हैं। कपूर ने कहा कि वह अगले महीने इंडियन रेस्टोरेंट बंद कर देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें लगातार परेशानियों, ऑनलाइन उत्पीड़न और कथित हमलों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके चलते उन्हें यह कठिन निर्णय लेना पड़ा है।

    कपूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए यह जानकारी साझा की है। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा कि बढ़ती लागत, ऑनलाइन ट्रोलिंग, बार-बार होने वाली अशांति और कथित तौर पर पाकिस्तानी समूहों द्वारा किए गए हमले, साथ ही लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलस से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलना—इन सभी कारणों ने उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया। कपूर ने यह भी कहा कि अब वह पूरी तरह से सामाजिक और वैचारिक सक्रियता (एक्टिविज़्म) पर ध्यान केंद्रित करेंगे। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि उनके व्यवसाय को भले ही बाधित किया गया हो, लेकिन उनके इरादों को कमजोर नहीं किया जा सकता।


    खालिस्तानियों से जुड़ा है विवाद

    इस पूरे विवाद की जड़ मार्च 2023 की एक घटना से जुड़ी बताई जा रही है, जब कपूर ने आरोप लगाया था कि उनके रेस्टोरेंट पर खालिस्तानी समर्थकों द्वारा हमला किया गया। यह विवाद तब शुरू हुआ जब उन्होंने खालिस्तान मूवमेंट की आलोचना करते हुए वीडियो पोस्ट किए थे। इन वीडियो में उन्होंने खालिस्तान के नाम पर चल रही गतिविधियों पर सवाल उठाए थे।

    कपूर ने अपने वीडियो में अमृतपाल सिंह और उनके सहयोगियों का भी मजाक उड़ाया था, जिसके बाद विवाद और बढ़ गया। एक वायरल वीडियो में उनके एक सहयोगी को पुलिस से बचते हुए “पुलिस आ गई” कहते हुए सुना गया था, जिस पर कपूर ने टिप्पणी की थी। फिलहाल, ‘रंगरेज’ के बंद होने की खबर से स्थानीय भारतीय समुदाय में निराशा है, वहीं इस मामले ने प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

  • लश्कर कमांडर सैफुल्लाह कसूरी ने भारत के खिलाफ फिर उगला जहर… 26/11 जैसे हमले की दी धमकी

    लश्कर कमांडर सैफुल्लाह कसूरी ने भारत के खिलाफ फिर उगला जहर… 26/11 जैसे हमले की दी धमकी


    नई दिल्ली।
    बीते साल मई महीने में भारत (India) ने ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) चलाकर जिस तरह आतंकियों को करारा सबक सिखाया था, उससे आतंकी सरगना अब तक बौखलाए हुए हैं। हाल ही में इसके सबूत देखने को मिले हैं। पहलगाम हमले (Pahalgam Attack) के कथित मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba) के नंबर दो के कमांडर सैफुल्लाह कसूरी ने एक बार फिर भारत के खिलाफ जहर उगला है। इस दौरान उसने भारत में 26/11 जैसे हमले की धमकी भी दी है।

    बता दें कि पिछले साल 22 अप्रैल को आतंकियों ने पहलगाम में स्थित खूबसूरत बैसरन की घाटी में 26 लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। आतंकियों ने इस दौरान लोगों को धर्म पूछकर उनपर गोलियां बरसाईं थीं। इस हमले का मास्टरमाइंड कसूरी को ही माना जाता है। कसूरी अक्सर अपनी भारत विरोधी बयानबाजियों के लिए जाना जाता है।

    एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल ही में सैफुल्लाह कसूरी ने 2008 के मुंबई हमले की याद दिलाते हुए एक चेतावनी दी है। इसमें उसने समुद्री रास्ते से भारत में फिर से 26/11 जैसा हमला करने की धमकी दी है। वीडियो में, कसूरी कहता है कि पाकिस्तान ने 2025 में हवा पर कब्जा कर लिया था और अब 2026 में वे समुद्र पर कब्जा कर लेंगे। कथित तौर पर कसूरी ने कहा कि जमीन, हवा या समुद्र, दुश्मन के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।

    वीडियो में कसूरी मुरीद के और बहावलपुर पर भारत के किए हमलों से बहुत बौखलाया लग रहा है। कसूरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चेतावनी देते हुए भारत पर वॉटर टेररिज्म का आरोप लगाया, और धमकी दी कि कश्मीर पर दबाव का जवाब बलूचिस्तान समेत दूसरी जगहों पर अशांति से दिया जाएगा।

  • दक्षिण कोरिया के इस द्वीप पर जाने वालों सावधान! भारतीय दूतावास ने क्यों जारी की ट्रैवल एडवायजरी

    दक्षिण कोरिया के इस द्वीप पर जाने वालों सावधान! भारतीय दूतावास ने क्यों जारी की ट्रैवल एडवायजरी

    नई दिल्‍ली। अधिकारियों के अनुसार, यात्रियों को यह साबित करने में सक्षम होना चाहिए कि उनके पास पूरे प्रवास के दौरान खर्च उठाने के लिए पर्याप्त धन है। इमिग्रेशन जांच के दौरान पूछे गए सवालों का शांत और सुसंगत तरीके से जवाब देना भी जरूरी बताया गया है।

    दक्षिण कोरिया का राजधानी सियोल स्थित भारतीय दूतावास ने मंगलवार को भारतीय नागरिकों के लिए एक अहम एडवायजरी जारी करते हुए दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप की यात्रा के दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।

    यह चेतावनी कंटेंट क्रिएटर सचिन अवस्थी को हाल ही में हिरासत में लिए जाने की घटना के बाद जारी की गई है, जिसने यात्रियों के बीच चिंता बढ़ा दी है। दूतावास ने अपने बयान में कहा कि समय-समय पर भारतीय यात्रियों को जेजू द्वीप पर प्रवेश से इनकार या वापस भेजे जाने की घटनाएं सामने आती रहती हैं, खासकर वीज़ा-फ्री सुविधा के तहत यात्रा करने वालों के साथ।

    एडवायजरी में स्पष्ट किया गया है कि जेजू का वीज़ा-मुक्त प्रवेश केवल अल्पकालिक पर्यटन के लिए मान्य है और अंतिम निर्णय वहां के इमिग्रेशन अधिकारियों के हाथ में होता है। यानी, वीज़ा-फ्री सुविधा होने के बावजूद प्रवेश की गारंटी नहीं होती। यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे सभी आवश्यक दस्तावेज अपने साथ रखें, जिनमें कन्फर्म रिटर्न टिकट, पूरे प्रवास की होटल बुकिंग, दिन-वार यात्रा योजना, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का प्रमाण, कम से कम छह महीने का वैध पासपोर्ट, ट्रैवल इंश्योरेंस और ठहरने के स्थान की संपर्क जानकारी शामिल हैं।
    वित्तीय तैयारी पर विशेष जोर

    दूतावास ने यह भी चेतावनी दी कि यदि यात्री अपनी यात्रा योजना स्पष्ट रूप से नहीं बता पाते, तो उन्हें प्रवेश से रोका जा सकता है। एडवायजरी में वित्तीय तैयारी पर भी विशेष जोर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, यात्रियों को यह साबित करने में सक्षम होना चाहिए कि उनके पास पूरे प्रवास के दौरान खर्च उठाने के लिए पर्याप्त धन है।

    इमिग्रेशन जांच के दौरान पूछे गए सवालों का शांत और सुसंगत तरीके से जवाब देना भी जरूरी बताया गया है।
    जेजू वीजा-फ्री योजना का हिस्सा नहीं

    दूतावास ने यह भी स्पष्ट किया कि जेजू वीज़ा-फ्री योजना के तहत मुख्य भूमि दक्षिण कोरिया की यात्रा की अनुमति नहीं है। यदि कोई यात्री बिना वीज़ा के वहां जाने की कोशिश करता है या निर्धारित अवधि से अधिक समय तक रुकता है, तो उस पर भविष्य में यात्रा प्रतिबंध लगाया जा सकता है। प्रवेश से इनकार की स्थिति में यात्रियों को अगले उपलब्ध विमान से वापस भेज दिया जाता है और तब तक उन्हें अस्थायी हिरासत केंद्र में रखा जा सकता है।

    सचिन अवस्थी को 38 घंटे हिरासत में रखा गया

    यह एडवायजरी उस घटना के बाद आई है, जिसमें सचिन अवस्थी और उनकी पत्नी को जेजू पहुंचने पर करीब 38 घंटे तक हिरासत में रखा गया और अंततः उन्हें महंगा वापसी टिकट लेकर लौटना पड़ा। अवस्थी ने इस अनुभव को साझा करते हुए कहा कि इमिग्रेशन का निर्णय उनका अधिकार है, लेकिन उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए था। बता दें कि जेजू द्वीप दक्षिण कोरिया का एक विशेष स्वायत्त प्रांत है, जहां विदेशी पर्यटकों के लिए सीमित वीज़ा-फ्री प्रवेश की व्यवस्था है। हालांकि, इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए यात्रियों को सीधे किसी विदेशी देश से जेजू पहुंचना आवश्यक होता है; मुख्य भूमि दक्षिण कोरिया के रास्ते जाने पर वीज़ा अनिवार्य है।

  • नई दिल्ली घोषणापत्र: 91 देशों और वैश्विक संगठनों ने किया एआई सहयोग का ऐतिहासिक समर्थन

    नई दिल्ली घोषणापत्र: 91 देशों और वैश्विक संगठनों ने किया एआई सहयोग का ऐतिहासिक समर्थन


    नई दिल्ली, फ़रवरी 2026 । आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ ने दुनिया भर के देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, अब तक इस घोषणापत्र में 91 देशों और वैश्विक संगठनों ने समर्थन दिया है।

    पिछले सप्ताह नई दिल्ली में आयोजित ‘एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का समापन इस घोषणापत्र को अपनाने के साथ हुआ। यह घोषणा एआई के उपयोग को आर्थिक विकास, सामाजिक कल्याण और समावेशी प्रौद्योगिकी के लिए वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने का एक संकेतक माना जा रहा है। प्रारंभ में 21 फ़रवरी 2026 तक 88 देशों और संगठनों ने इसका समर्थन किया था। इसके तुरंत बाद बांग्लादेश, कोस्टा रिका और ग्वाटेमाला के शामिल होने से इस संख्या बढ़कर 91 हो गई।

    घोषणापत्र का मूल संदेश ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत से प्रेरित है। इसका मकसद एआई के लाभ को पूरी मानवता तक समान रूप से पहुँचाना और तकनीकी असमानताओं को कम करना है। बयान में यह स्पष्ट किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहु-हितधारक भागीदारी को मजबूत करना, राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करना और भरोसेमंद तथा सुलभ ढांचे के माध्यम से एआई को आगे बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    घोषणापत्र में आर्थिक परिवर्तन में एआई की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया है। ओपन-सोर्स और सुलभ एआई इकोसिस्टम को बढ़ावा देना, ऊर्जा-कुशल एआई अवसंरचना का निर्माण और विज्ञान, शासन तथा सार्वजनिक सेवा वितरण में एआई की भूमिका को मजबूत करना इसमें शामिल हैं। इसके साथ ही वैश्विक सहयोग को मजबूत करना और डिजिटल अवसंरचना तथा किफ़ायती कनेक्टिविटी के माध्यम से एआई की पूरी क्षमता का उपयोग सुनिश्चित करना भी प्रमुख बिंदु हैं।

    ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत के अनुसार, घोषणापत्र एआई संसाधनों की वहनीयता और पहुँच बढ़ाने के महत्व को स्वीकार करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी देश अपने नागरिकों के लिए एआई का विकास, अपनाना और उपयोग कर सकें। इसके अतिरिक्त, सुरक्षित, भरोसेमंद और मजबूत एआई को बढ़ावा देना समाज और अर्थव्यवस्था के लिए विश्वास निर्माण की बुनियाद के रूप में देखा गया है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घोषणापत्र केवल तकनीकी सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नीति और नैतिकता के स्तर पर भी एआई के संतुलित और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देता है। नई दिल्ली घोषणापत्र 91 देशों और संगठनों के हस्ताक्षर से यह संदेश देता है कि एआई अब केवल तकनीकी क्षेत्र की बात नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक विकास, सामाजिक कल्याण और समान अवसरों की दिशा में एक साझा प्रयास बन गया है।

  • PAK: सख्त पहरे में जेल से अस्पताल ले जाए गए इमरान खान…आंखों में लगा दूसरा इंजेक्शन

    PAK: सख्त पहरे में जेल से अस्पताल ले जाए गए इमरान खान…आंखों में लगा दूसरा इंजेक्शन


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पीटीआई संस्थापक इमरान खान (Imran Khan) को आंखों के इलाज के लिए अडियाला जेल से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच Pakistan Institute of Medical Sciences (PIMS) लाया गया। निर्धारित फॉलो-अप जांच के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टरों ने उनकी प्रभावित आंख में दूसरा एंटी-VEGF इंट्राविट्रियल इंजेक्शन लगाया। उपचार पूरा होने के बाद उन्हें वापस अडियाला जेल भेज दिया गया।

    अस्पताल प्रशासन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि सुबह के समय उन्हें तय कार्यक्रम के अनुसार अस्पताल लाया गया। इंजेक्शन का उद्देश्य उनकी दृष्टि में सुधार लाना है। प्रक्रिया से पहले विशेषज्ञों के एक मेडिकल बोर्ड ने उनका विस्तृत परीक्षण किया।


    कार्डियक जांच भी की गई

    जांच टीम में कार्डियोलॉजिस्ट और फिजिशियन शामिल थे। कार्डियोलॉजिस्ट ने इकोकार्डियोग्राफी और ईसीजी जांच भी की। सभी परीक्षणों में उन्हें क्लिनिकली स्थिर पाया गया, जिसके बाद नेत्र संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

    पीआईएमएस प्रशासन के अनुसार, यह उपचार डे-केयर सर्जरी के तहत किया गया। पूरी प्रक्रिया पीआईएमएस और Shifa International Hospital के सलाहकार नेत्र रोग विशेषज्ञों और विट्रियोरेटिनल सर्जन की निगरानी में संपन्न हुई।


    इलाज के बाद तुरंत जेल वापसी

    अस्पताल की ओर से कहा गया कि इंजेक्शन के दौरान और उसके बाद उनकी स्थिति स्थिर रही। इलाज पूरा होने पर उन्हें फॉलो-अप से जुड़ी सलाह, जरूरी सावधानियां और मेडिकल दस्तावेज उपलब्ध कराए गए। इसके तुरंत बाद सुरक्षा घेरे में उन्हें पुनः अडियाला जेल ले जाया गया।


    15 गाड़ियों का काफिला, तीन सिग्नल जैमर तैनात

    पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इमरान खान को लगभग 15 वाहनों के काफिले में अस्पताल लाया गया। काफिले में काली गाड़ियां शामिल थीं और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तीन सिग्नल जैमर भी लगाए गए थे। अस्पताल परिसर और आसपास के इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात रहे। इलाज की पूरी प्रक्रिया सख्त सुरक्षा और चिकित्सकीय निगरानी में पूरी की गई।

  • पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार

    पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार


    फैसलाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) की आर्थिक बदहाली (Economic Distress) की खबरें नई नहीं हैं। खस्ताहाल पाकिस्तान दुनिया की कई वैश्विक संस्थानों (Global Institutions) से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है। अब हाल ही में यह खबरें सामने आई हैं कि पाकिस्तान में दाल (Lentils) के लिए हाहाकार मचा हुआ है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान अब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर हो चुका है। पाकिस्तान में दाल का उत्पादन लगातार घट रहा है, जिससे देश को जरूरतें पूरी करने के लिए हर साल करीब 98 करोड़ डॉलर आयात पर खर्च करने पड़ रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक कृषि विशेषज्ञों ने इस हालात पर गंभीर चिंता जताई है और कहा है कि अगर उत्पादन नहीं बढ़ा तो आयात पर निर्भरता और बढ़ेगी। पंजाब पल्सेज इंपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और ग्रेन मार्केट के चेयरमैन राणा मुहम्मद तैय्यब ने बताया कि 1998 से पहले पाकिस्तान दाल का प्रमुख निर्यातक देश था। लेकिन परवेज मुशर्रफ के दौर में लगाए गए निर्यात बैन के बाद किसानों का उत्साह कम हो गया, क्योंकि दाल कम मुनाफे वाली फसल बन गई। जानकारों के मुताबिक देश में हर साल करीब 16.2 लाख टन दाल की खपत होती है, जिसमें से लगभग 10.7 लाख टन आयात की जाती है। यानी पाकिस्तान को देश में खपत होने वाली करीब 80 प्रतिशत दाल आयात करनी पड़ती है।


    बारिश ने भी तरसाया

    तैय्यब ने जलवायु परिवर्तन के असर का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि थल जैसे वर्षा आधारित इलाकों में समय पर बारिश हो जाए तो पैदावार 35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, लेकिन बारिश कम होने पर भारी नुकसान होता है और किसान अगले सीजन में दाल बोने से हिचकते हैं।

    जानकारों ने जताई चिंता
    ये मुद्दे विश्व दाल दिवस के मौके पर आयूब एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के पल्सेज रिसर्च इंस्टीट्यूट में आयोजित एक सेमिनार में उठाए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि पाकिस्तान की सालाना जरूरत करीब 15 लाख टन है, लेकिन लोकल उत्पादन इसका सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर पा रहा है। इसी कारण हर साल करीब 10 लाख टन दाल आयात करनी पड़ती है।

    AARI के पल्सेज सेक्शन के चीफ साइंटिस्ट खालिद हुसैन ने कहा कि दाल मानव पोषण और मिट्टी की उर्वरता दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन सीमित मुनाफा और निर्यात बैन के कारण किसान इसकी खेती से बच रहे हैं। दाल उत्पादन बढ़ाने के मकसद से एक प्रस्ताव तैयार कर संबंधित अधिकारियों को भेजा गया है, लेकिन उसे अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।