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  • ट्रंप की टैरिफ नीति के उल्टे परिणाम, दावा विदेशी कंपनियों पर बोझ डालने का था….भुगत रहे US के लोग

    ट्रंप की टैरिफ नीति के उल्टे परिणाम, दावा विदेशी कंपनियों पर बोझ डालने का था….भुगत रहे US के लोग


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की बहुचर्चित टैरिफ नीति (Tariff policy) पर एक नई रिपोर्ट ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। दावा किया गया था कि आयात शुल्क (Import Duty) का बोझ विदेशी कंपनियों और सरकारों पर पड़ेगा, लेकिन ताजा अध्ययन में सामने आया है कि इन शुल्कों का करीब 90 प्रतिशत खर्च अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारियों ने ही उठाया। यह निष्कर्ष फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयार्क (Federal Reserve Bank of New York) से जुड़े अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण में सामने आया है।

    यूएसए टुडे ने बताया कि छह फरवरी को जारी एक नामी टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक अनुमान है कि 2025 में हर अमेरिकी परिवार पर 1000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ा, वहीं 2026 में यह बोझ बढ़कर 1300 डॉलर होने का अनुमान है।

    रिपोर्ट के मुताबिक आयातित वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क का अधिकांश हिस्सा कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में अमेरिकी बाजार में ही खपा दिया गया। विदेशी निर्यातकों ने अपने दामों में सीमित कटौती की, जिससे लागत का बोझ घरेलू कंपनियों और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच गया। ऐसे में यह अध्ययन न केवल ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि संरक्षणवादी कदमों का वास्तविक असर अक्सर घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता है।


    अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ा सीधा असर

    रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान चीन सहित कई देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए। ट्रंप ने दावा किया था कि इन शुल्कों का भुगतान विदेशी कंपनियां और सरकारें करेंगी। हालांकि अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वास्तविकता इससे अलग रही। विश्लेषण के अनुसार, आयातित वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी आयातकों ने चुकाया, जिसने आगे चलकर कीमतों में वृद्धि के रूप में उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर बोझ डाला। यानी टैरिफ एक तरह से घरेलू कर (टैक्स) की तरह काम करता रहा, जिसका प्रभाव रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ा।


    विदेशी निर्यातकों ने नहीं घटाए दाम

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विदेशी निर्यातकों ने अपने उत्पादों के दाम में बहुत कम कटौती की। इसका अर्थ यह है कि वे टैरिफ का बोझ खुद वहन करने के बजाय अमेरिकी खरीदारों पर डालने में सफल रहे। परिणामस्वरूप, आयातित सामान महंगे हुए और अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ी।


    महंगाई पर प्रभाव

    अध्ययन में यह संकेत भी दिया गया है कि टैरिफ का प्रभाव महंगाई दर पर पड़ा। जब कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी करती हैं। इससे व्यापक स्तर पर मूल्य वृद्धि देखने को मिलती है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि टैरिफ को अक्सर व्यापार घाटा कम करने या घरेलू उद्योगों की रक्षा के उपाय के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन यदि उसका भार मुख्य रूप से घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही पड़े तो नीति के लाभ सीमित हो सकते हैं।


    आगे की राह

    विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार नीति बनाते समय उसके व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन जरूरी है। यदि टैरिफ का अधिकांश भार घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता है, तो इससे उपभोक्ता खर्च, निवेश और प्रतिस्पर्धा पर नकारात्मक असर हो सकता है। रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक व्यापार की जटिलताओं के बीच किसी भी देश द्वारा उठाया गया संरक्षणवादी कदम अंततः उसके अपने बाजार को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भविष्य की व्यापार नीतियों को संतुलित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ तैयार करने की जरूरत है।

  • बांग्लादेश के 11वें प्रधानमंत्री बने तारिक रहमान, 25-सदस्यीय मंत्रिमंडल में शामिल एक हिंदू नेता

    बांग्लादेश के 11वें प्रधानमंत्री बने तारिक रहमान, 25-सदस्यीय मंत्रिमंडल में शामिल एक हिंदू नेता


    ढाका। बांग्लादेश में मंगलवार को एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ, जब तारिक रहमान ने देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। तारिक रहमान अब बांग्लादेश नेशनल पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय खालिदा जिया के पुत्र के रूप में देश की कमान संभालेंगे। वह बांग्लादेश के 11वें प्रधानमंत्री बने। आम चुनावों में बड़ी जीत के साथ ही उन्होंने अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनूस की जगह यह पद ग्रहण किया। शपथ ग्रहण समारोह ढाका स्थित संसद भवन के साउथ प्लाजा में शाम 4 बजे आयोजित किया गया। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने उन्हें शपथ दिलाई।

    नई सरकार के मंत्रियों में शामिल प्रमुख चेहरे हैं:-

    डॉ. खलीलुर रहमान – विदेश मंत्री
    सलाहुद्दीन अहमद – गृह मंत्री
    डॉ. अमीर खसरू महमूद – वित्त एवं योजना मंत्री
    शमा ओबैद – विदेश राज्य मंत्री

    शपथ ग्रहण समारोह में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की उपस्थिति भी रही। भारत से लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भाग लिया। इसके अलावा मलेशिया, पाकिस्तान, मालदीव, तुर्की, श्रीलंका के प्रतिनिधि तथा चीन, सऊदी अरब, यूएई और ब्रुनेई को आमंत्रित किया गया।

    कैबिनेट मंत्रियों की सूची

    कुल 25 सदस्यों के मंत्रिमंडल में शामिल हैं:- मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर, अमीर खोशरू महमूद चौधरी, सलाहुद्दीन अहमद, इकबाल हसन महमूद, मेजर रिटायर्ड हाफिज उद्दीन अहमद बीर बिक्रम, अबू जफर मोहम्मद जाहिद हुसैन, डॉ. खलीलुर रहमान, अब्दुल अव्वल मिंटू, काजी शाह मोफज्जल हुसैन कैकोबाद, मिजानुर रहमान मीनू, निताई रॉय चौधरी (हिंदू नेता), खंडेकर अब्दुल मुक्तदिर, अरिफुल हक चौधरी, जहीर उद्दीन स्वपन, मोहम्मद अमीन उर रशीद, अफरोजा खानम रीटा, शाहिद उद्दीन चौधरी एनी, असदुल हबीब दुलु, मोहम्मद असदुज्जमां, जकारिया ताहिर, दीपेन दीवान (अल्पसंख्यक), एएनएम एहसानुल हक मिलन, सरदार मोहम्मद सखावत हुसैन, फकीर महबूब अनम और शेख रबीउल आलम।

    राज्य मंत्रियों में शामिल प्रमुख नाम
    एम रशीदुज्जमां मिल्लत, अनिंद्य इस्लाम अमित, एमडी शरीफुल आलम, शमा ओबैद इस्लाम, सुल्तान सलाहुद्दीन टुकू, बैरिस्टर कैसर कमाल, फरहाद हुसैन आजाद, एमडी अमीनुल हक टेक्नोक्रेट मीर मोहम्मद हेलाल उद्दीन, हबीबुर रशीद, एमडी राजीब अहसन, एमडी अब्दुल बारी, मीर शाहे आलम, जोनायद अब्दुर रहीम साकी, इशराक़ हुसैन, फरजाना शर्मिन, शेख फ़रीदुल इस्लाम, नुरुल हक नूर, यासर खान चौधरी, एम इकबाल हुसैन, एमए मुहिथ, अहमद सोहेल मंजूर, बॉबी हज्जाज और अली नेवाज महमूद खैयाम।

    संसदीय दल का नेता चुना गया

    बीएनपी ने शपथ ग्रहण से पहले संसदीय दल की बैठक में तारिक रहमान को दल का नेता चुना। उन्होंने विपक्षी दलों के नेताओं से भी मुलाकात की, जिनमें जमात-ए-इस्लामी चीफ शफीकुर रहमान और नेशनल सिटीजन पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम शामिल थे।

    चुनाव में बड़ी जीत

    हाल ही में हुए चुनाव में बीएनपी को 297 में से 209 सीटें मिलीं, जबकि जमात-ए-इस्लामी केवल 68 सीटों तक सीमित रही। शेख हसीना की आवामी लीग इस चुनाव में भाग नहीं ले सकी। अल्पसंख्यक समुदाय से चार उम्मीदवार जीतकर आए, जिनमें दो हिंदू बीएनपी के टिकट पर विजयी रहे। राजनीतिक अस्थिरता और छात्र आंदोलनों के बाद अब नई सरकार के गठन के साथ बांग्लादेश लोकतांत्रिक ढांचे के तहत सुचारू रूप से चलने लगा है।

  • बांग्लादेश की नई सरकार में एक हिंदू और एक बौद्ध मंत्री को मिली जगह, जानें कौन हैं ये दोनों नेता?

    बांग्लादेश की नई सरकार में एक हिंदू और एक बौद्ध मंत्री को मिली जगह, जानें कौन हैं ये दोनों नेता?

    नई दिल्ली। बांग्लादेश में तारिक रहमान की ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है। उनके साथ कई मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण की। खास बात यह है कि तारिक रहमान के मंत्रिमंडल में एक हिंदू और एक बौद्ध नेता को भी जगह मिली है। जानकारी के मुताबिक हिंदू नेता निताई रॉय चौधरी और बौद्ध नेता के तौर पर दीपेन दीवान चकमा ने तारिक सरकार में मंत्री पद की शपथ ली।

    कौन हैं निताई रॉय चौधरी और दीपेन दीवान चकमा?
    निताई रॉय चौधरी बीएनपी की नीति-निर्माण संबंधी शीर्ष स्थायी समिति के सदस्य हैं, जबकि निताई रॉय चौधरी पार्टी के प्रमुख उपाध्यक्षों में से एक होने के साथ-साथ इसके शीर्ष नेतृत्व के लिए एक वरिष्ठ सलाहकार और रणनीतिकार भी हैं। BNP के टिकट पर पश्चिमी मगुरा चुनाव क्षेत्र से निताई रॉय चौधरी ने जीत हासिल की। उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार को हराया। जनवरी 1949 में पैदा हुए निताई रॉय चौधरी बांग्लादेश के प्रतिष्ठित वकील हैं। वह पहले भी सांसद रह चुके हैं। वहीं दिपेन दीवान चमका बौद्ध बहुसंख्यक चकमा जातीय अल्पसंख्यक समूह से संबंधित हैं, जिन्होंने दक्षिण-पूर्वी रंगमती पहाड़ी जिले के एक निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की।

    चार अल्पसंख्यक नेताओं की मिली थी जीत
    दरअसल, बांग्लादेश में हुए संसदीय चुनावों में अल्पसंख्यक समुदायों के 4 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। विजयी हुए उम्मीदवारों में 2 हिंदू और 2 बौद्ध नेता थे। इनमें से एक हिंदू और एक बौद्ध नेता को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। आम चुनाव में जीत हासिल करने वाले चारों अल्पसंख्यक नेता बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के उम्मीदवार थे हैं। चुनाव में जीत हासिल करने वाले हिंदू नेताओं में गायेश्वर चंद्र रॉय और निताई रॉय चौधरी का नाम है, जबकि दो बौद्ध नेताओं की बात करें तो ये सचिन प्रू और दीपेन दीवान चकमा का नाम है।

    तारीक रहमान बने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री
    बता दें कि बांग्लादेश के आम चुनावों में अपनी पार्टी को जबरदस्त जीत दिलाने के कुछ दिनों बाद तारिक रहमान ने मंगलवार को बांग्लादेश के नए प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने लंबे समय से चली आ रही परंपरा से हटकर, 60 वर्षीय तारिक रहमान को बंगभवन के बजाय जातीय संसद के साउथ प्लाजा में पद की शपथ दिलाई। इससे पहले दिन में, तारिक रहमान को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के सांसदों द्वारा संसदीय दल के नेता के रूप में चुना गया था।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर मार्च तक लग सकती है मुहर, जल्‍द यूएस जाएगी भारतीय टीम

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर मार्च तक लग सकती है मुहर, जल्‍द यूएस जाएगी भारतीय टीम


    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को कानूनी रूप देने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव और भारत के मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन अगले हफ्ते अमेरिका जाने वाले हैं। उनका मकसद 7 फरवरी को जारी हुए संयुक्त बयान के आधार पर समझौते का कानूनी मसौदा फाइनल करना है।

    रेसिप्रोकल टैरिफ में कटौती

    वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर लगाए गए 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करने की तैयारी में है। उम्मीद है कि यह कटौती इसी हफ्ते लागू हो सकती है। उन्होंने बताया कि 27 अगस्त से पहले लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ, जो रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण थे, अब हटा दिए गए हैं। नई कटौती पर प्रक्रिया जारी है, और अगर किसी वजह से देरी होती है तो भारतीय टीम अमेरिका जाकर इसे फाइनल करेगी।

    कानूनी समझौते की तैयारी
    7 फरवरी को जो संयुक्त बयान जारी हुआ था, वह असल में इस फ्रेमवर्क डील का हिस्सा था। उस बयान में समझौते की रूपरेखा तय की गई थी। अब उसी रूपरेखा को कानूनी दस्तावेज में बदलकर दोनों देशों की ओर से हस्ताक्षर किए जाएंगे। दर्पण जैन अगली हफ्ते अपनी टीम के साथ अमेरिका जाएंगे ताकि समझौते के मसौदे को अंतिम रूप दिया जा सके। कोशिश है कि मार्च तक समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएं, हालांकि कुछ कानूनी मुद्दे अभी भी सुलझाए जाने हैं।

    जीरो टैरिफ और बाजार तक पहुंच

    राजेश अग्रवाल ने कहा कि कुछ सामानों पर रेसिप्रोकल टैरिफ पूरी तरह खत्म (जीरो) किया जा सकता है। लेकिन यह तभी लागू होगा जब दोनों देशों के बीच कानूनी समझौते पर साइन हो जाएगा। भारत की तरफ से भी टैरिफ में कटौती या बाजार में रियायत केवल समझौते के आधिकारिक हस्ताक्षर के बाद ही संभव होगी।

    7 फरवरी का संयुक्त बयान
    7 फरवरी को जारी बयान में कहा गया था कि अमेरिकी टैरिफ भारतीय सामान पर 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाएंगे। साथ ही कुछ उत्पादों पर जीरो ड्यूटी, बाजार खोलने के कदम और दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने की बात कही गई। यह समझौता लगभग एक साल लंबी बातचीत के बाद संभव हुआ।

    ऐतिहासिक कदम: पीयूष गोयल

    वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ऐतिहासिक और संतुलित समझौता बताया। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, 30 ट्रिलियन डॉलर के बाजार में भारतीय निर्यात के लिए नए दरवाजे खुलेंगे। इससे छोटे और मझोले उद्योग, किसान, मछुआरे, युवा, महिलाएं और देश के हुनरमंद लोगों को बड़ा लाभ मिलेगा।

  • यूरोप का ब्रिक्स को लेकर भारत से दूरी बनाना बड़ी भूल थी… जर्मन विदेश मंत्री ने जयशंकर के सामने स्वीकारी गलती

    यूरोप का ब्रिक्स को लेकर भारत से दूरी बनाना बड़ी भूल थी… जर्मन विदेश मंत्री ने जयशंकर के सामने स्वीकारी गलती


    नई दिल्ली।
    जर्मनी (Germany) के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल (Foreign Minister Johan Wadephul) ने भारत को लेकर यूरोप की रणनीति में की गई गलती को स्वीकार किया है। उन्होंने माना कि यूरोप ने उस वक्त गलती की थी, जब उसने उभरती वैश्विक शक्तियों को केवल ब्रिक्स देशों (BRICS Countries) के ढांचे में होने की वजह से दूरी बनाई थी। उन्होंने कहा कि यह तरीका गलत था, इस नीति की वजह से भारत जैसे देशों के साथ अनावश्यक रूप से दूरी बन गई थी।

    म्यूनिक सुरक्षा सम्मलेन में विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ मिलकर एक इंटरव्यू दे रहे वेडफुल ने यूरोप की बदलती रणनीति का भी जिक्र किया। वेडफुल ने कहा कि यूरोप अब इन देशों के साथ अपने रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। भारत और ब्राजील जैसे साझेदार देशों के साथ साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और समान हितों पर अधिक ध्यान दे रहा है। यूरोप अब मानता है कि भारत जैसे देशों के साथ उनके रिश्ते अब केवल इसलिए प्रभावित नहीं होने चाहिए, क्योंकि भारत रूस और चीन के किसी समूह का सदस्य है।


    चीन और रूस के साथ तनाव

    वेडफुल ने यहां पर रूस और चीन के साथ यूरोप के तनाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि मॉस्को के साथ यूरोप का तनाव बहुत बुनियादी है। इसके अलावा चीन के साथ भी मतभेद हैं। उन्होंने कहा, “भारत और ब्राजील जैसे देशोंके साथ हमारे कई साझा हित और मूल्य हैं। क्यों न हम इन साझा हितों और मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करें। चीन और रूस के साथ हमारे मतभेद हैं, वह अलग बात है।”


    भारत, चीन से अलग साझेदार

    वेडफुल ने कहा कि चीन की तुलना में भारत की स्थिति एक विशिष्ट साझेदार के रूप में है। दोनों देशों के आपसी संबंधों में भरोसे को उजागर करते हुए उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि भारत कहां खड़ा है, वह भरोसेमंद है, हम उन पर भरोसा कर सकते हैं, और शायद वह भी हम पर भरोसा कर सकते हैं।” बकौल वेडफुल वैश्विक राजनीति में भारत चीन से ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद साथी है।

    इसके इतर जर्मन विदेश मंत्री ने भारत और जर्मनी के साझा मूल्यों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “हम दोनों ही लोकतंत्र हैं, हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। हमारे यहां कानून का शासन है और हमारे लिए यह बहुत मायने रखता है।”

    आपको बता दें, अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप का शासन आने के बाद से यूरोप अपनी वैश्विक रणनीति में बदलाव करता नजर आया है। पहले अमेरिका का पिछलग्गू बनकर यूरोप के देश अपनी विदेश नीति को अमेरिका को केंद्र में रखकर बनाते थे। लेकिन ट्रंप के आने और फिर यूरोपीय देशों के साथ उनके सलूक को देखते हुए यूरोपीय देश अब दूसरे विकल्पों की तरफ देखने लगे हैं। एक मजबूत और लोकतांत्रिक साझेदार के रूप में भारत उनकी सभी जरूरतों को पूरा करता है, इसकी वजह से यूरोपीय देश लगातार भारत के करीब आने की कोशिश में लगे हुए हैं।

    हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच में हुआ व्यापारिक समझौता इस बात का उदाहरण है। यह समझौता कई वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ था। लेकिन अब यह समझौता हो चुका है और यूरोपीय देशों में यह जीत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते से भारत को ज्यादा फायदा होगा।

  • बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन: तारिक रहमान की शपथ से नई राजनीतिक दिशा की शुरुआत

    बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन: तारिक रहमान की शपथ से नई राजनीतिक दिशा की शुरुआत



    नई दिल्ली। बांग्लादेश की सियासत में बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक रहमान आज देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान की यह ताजपोशी सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा बदलने का संकेत मानी जा रही है। इस बार शपथ ग्रहण समारोह पारंपरिक बांगभवन के बजाय ढाका स्थित जाटिया सांग्सद भवन के साउथ प्लाज़ा में आयोजित किया जा रहा है, जो व्यवस्था में पारदर्शिता और संसदीय प्राथमिकता का प्रतीक बताया जा रहा है। राष्ट्रपति मोहम্মद शाहबुद्दीन नए प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे।

    हाल ही में हुए 13वें आम चुनाव में बीएनपी ने 297 में से 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ जब छात्र आंदोलनों और राजनीतिक अस्थिरता के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की लंबे समय से चली आ रही सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के कार्यकाल के दौरान आंतरिक और कूटनीतिक चुनौतियां चर्चा में रहीं, खासकर भारत के साथ संबंधों को लेकर। ऐसे में नई सरकार की विदेश नीति और आर्थिक रणनीति पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

    शपथ समारोह में क्षेत्रीय कूटनीति की झलक भी दिखाई देगी। भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला प्रतिनिधित्व करेंगे, जो दोनों देशों के रिश्तों में निरंतरता का संकेत है। राजनीतिक जीत के बाद तारिक रहमान ने विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर संवाद और सहमति की राजनीति का संदेश दिया है। 1991 के बाद पहली बार कोई पुरुष नेता बांग्लादेश की कमान संभालने जा रहा है, जिससे देश की राजनीति नए दौर में प्रवेश करती नजर आ रही है। अब चुनौती होगी—आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सद्भाव और क्षेत्रीय संतुलन को मजबूत दिशा देना।

  • बांग्लादेश की नई BNP सरकार में हिंदू नेता गोयेश्वर चंद्र रॉय को मंत्री बनाए जाने का अनुमान

    बांग्लादेश की नई BNP सरकार में हिंदू नेता गोयेश्वर चंद्र रॉय को मंत्री बनाए जाने का अनुमान


    नई दिल्ली । बांग्लादेश में हाल ही में हुए 13वें संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की है और नई सरकार गठन की तैयारी में है। पार्टी ने निर्वाचित सांसदों की आधिकारिक गजट अधिसूचना जारी कर दी है। इस बार पार्टी के 4 अल्पसंख्यक सांसद चुने गए, जिनमें दो हिंदू और दो बौद्ध समुदाय के नेता शामिल हैं।

    ढाका-3 सीट से जीतने वाले गोयेश्वर चंद्र रॉय को नई कैबिनेट में शामिल किए जाने की संभावना है। 1951 में जन्मे रॉय BNP के स्थायी समिति सदस्य और पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। वह खालिदा जिया की BNP सरकार में 1991-1996 के बीच राज्य मंत्री रह चुके हैं और पर्यावरण, वन, मत्स्य एवं पशुपालन मंत्रालयों का प्रभार संभाल चुके हैं। बांग्लादेशी मीडिया के अनुसार, गोयेश्वर चंद्र रॉय और उनके समधी निताई रॉय चौधरी ने हाल ही में चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवारों को हराया।

    BNP के प्रधान तारिक रहमान प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ रक्षा मंत्रालय और अन्य पांच मंत्रालय अपने पास रखने की संभावना पर विचार कर रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत निर्वाचित सांसद तीन दिन के भीतर शपथ लेंगे और उसी दिन कैबिनेट गठन की प्रक्रिया पूरी होगी।

    कैबिनेट में कुल 30 से 40 सदस्य शामिल होने की संभावना है। चर्चा के अनुसार, विदेश मंत्री पद के लिए हुमायूं कबीर, वित्त मंत्री के लिए डॉ. रेजा किब्रिया, वाणिज्य मंत्रालय के लिए आमिर खुसरो महमूद चौधरी और कानून मंत्रालय के लिए पूर्व अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्जमान पर विचार चल रहा है। अन्य मंत्रालयों की जिम्मेदारी जैसे गृह, स्थानीय सरकार, सड़क परिवहन, स्वास्थ्य और सूचना मंत्रालयों के लिए वरिष्ठ नेताओं के नामों पर चर्चा जारी है।

    गोयेश्वर चंद्र रॉय का BNP और जिया परिवार के साथ गहरा संबंध है और वे बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के प्रमुख चेहरों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने अपने भाषणों में बार-बार यह जताया है कि बांग्लादेश में हिंदू या अन्य अल्पसंख्यक नागरिक समान अधिकारों के हकदार हैं।

    इस चुनावी सफलता और कैबिनेट गठन के संकेतों के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व मजबूत होने की संभावना है। BNP की नई सरकार के गठन के बाद गोयेश्वर चंद्र रॉय की भूमिका पर सभी की नजर रहेगी।

  • 36 घंटे में बलूचिस्तान में 4 युवाओं की हत्या, 3 साल में 1700 से अधिक बलूच युवा जबरन गायब

    36 घंटे में बलूचिस्तान में 4 युवाओं की हत्या, 3 साल में 1700 से अधिक बलूच युवा जबरन गायब


    नई दिल्ली । बलूचिस्तान में पिछले 36 घंटों में चार बलूच छात्रों की हत्या ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवारों का आरोप है कि ये सभी छात्र पहले जबरन गायब किए गए और फिर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसी ISI के सशस्त्र गिरोहों ने उन्हें मार डाला।

    ह्यूमन राइट्स काउंसिल ऑफ़ बलूचिस्तान के डेटा के अनुसार, पिछले 3 सालों में बलूचिस्तान से 1713 युवा जबरन गायब हुए हैं। इसी अवधि में 390 से अधिक युवाओं के गायब होने और 80 से ज्यादा शव मिलने के मामले सामने आए। स्थानीय मानवाधिकार संगठन Baloch Yakjehti Committee का कहना है कि ये घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं बल्कि व्यवस्थित पैटर्न का हिस्सा हैं।

    जुनैद अहमद, 22 वर्षीय ग्रेजुएशन छात्र, सुराब का निवासी, 23 जनवरी 2026 को जबरन उठाया गया। क्वेटा के एक अस्पताल से ईगल फोर्स और काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट ने उसे बिना वारंट हिरासत में लिया। 15 फरवरी को उसका शव मिला, जिस पर गोली के निशान थे।

    पंजगुर के मैट्रिक छात्र जंगीयान बलोच को 26 मई 2025 को फ्रंटियर कॉर्प्स और ISI के डेथ स्क्वाड ने उठाया था। 15 फरवरी को उसका शव शापतान इलाके में मिला।

    17 वर्षीय मुहनास बलोच को 14 फरवरी को स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों ने उसके घर से उठाकर गोली मार दी। वहीं नवाब अब्दुल्ला, जिसे मई 2025 में उठाया गया था, का शव 14 फरवरी को घर के बाहर फेंक दिया गया।

    बलूचिस्तान में युवाओं को जबरन गायब करने की घटनाएं साल 2000 से लगातार हो रही हैं, जब से क्षेत्र में सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ। पाकिस्तानी सेना और ISI आज़ादी आंदोलन में शामिल युवाओं को अवैध हिरासत में लेने के बाद मार देती है या उनके गुटों में शामिल करवा देती है।

    बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाका है सोना, चांदी, यूरेनियम, रेयर अर्थ मिनरल्स और क़ीमती रत्नों से संपन्न। बावजूद इसके, गृह युद्ध और हिंसा की वजह से स्थानीय आबादी इन संसाधनों के लाभ से वंचित है। पाकिस्तान की सत्ता में बैठे नेता और विदेशी साझेदार इन संसाधनों का फायदा उठा रहे हैं, जबकि आम बलूच युवा हिंसा और जबरन गायब होने की त्रासदी का शिकार हो रहे हैं।

  • ईरान पर कभी भी हमला कर सकता है US…. मिडल ईस्ट में तैनात किया बड़ा सैन्य बेड़ा!

    ईरान पर कभी भी हमला कर सकता है US…. मिडल ईस्ट में तैनात किया बड़ा सैन्य बेड़ा!


    वाशिंगटन।
    ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Iranian Foreign Minister Abbas Araghchi) और उनका प्रतिनिधिमंडल पिछले सप्ताह ओमान (Oman) में हुए अप्रत्यक्ष वार्ता के पहले दौर के बाद रविवार को स्विट्जरलैंड (Switzerland) की राजधानी जिनेवा (Geneva) पहुंचा है। ओमान जिनेवा में होने वाली वार्ता में मध्यस्थता करेगा।
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    अमेरिका (America) ईरान पर कभी भी हमला कर सकता है और अगर दोनों देशों के बीच जारी परमाणु वार्ता फेल हुई तो ईरान को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह दावे पूर्व अमेरिकी रक्षा अधिकारी (Former US Defense Official) ने किए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बीते कई हफ्तों से जारी तनाव के बीच अमेरिका की पूर्व असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी अफेयर्स सेलेस्टे ए. वॉलेंडर (Celeste A. Wallander) ने कहा है कि अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में बहुत बड़ा सैन्य बेड़ा तैनात कर दिया है और यह इस बात का इशारा है कि अगर बातचीत फेल होती है तो अमेरिका ईरान पर हमले के लिए पूरी तरह तैयार है।

    पूर्व पेंटागन अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह बातें कही हैं। वॉलेंडर के मुताबिक अमेरिका ने इलाके में अपना सबसे बड़ा सैन्य बेड़ा यूंही नहीं भेजा है या यह सिर्फ संदेश देने के लिए नहीं है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका ने ईरान पर पहले से कहीं ज्यादा दबाव बनाया है और उसे सामान्य डिटरेंस सिग्नलिंग के बजाय संभावित मिलिट्री एक्शन की चेतावनी के तौर पर समझा जाना चाहिए।

    युद्ध की तैयारी कर रहा अमेरिका
    वॉलेंडर ने कहा कि अमेरिका इमरजेंसी की तैयारी कर रहा है। उन्होंने कहा, “अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में जिस तरह के मिलिट्री एयरक्राफ्ट कैरियर भेजे हैं, वे ईरान पर दबाव डालने के लिए अमेरिका द्वारा पहले की गई मिलिट्री डिप्लॉयमेंट की तुलना में काफी अलग हैं।” उन्होंने आगे कहा कि हालांकि इस तरह की तैनाती संदेश देने और डराने के लिए काम आ सकती हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति से पता चलता है कि अमेरिका सिर्फ ताकत नहीं दिखा रहा है। बल्कि अमेरिका इमरजेंसी के लिए तैयारी कर रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान को अमेरिका के साथ बातचीत करने के तरीके खोजने होंगे।”


    एक और युद्धपोत तैनात

    पूर्व पेंटागन अधिकारी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सबसे उन्नत और परमाणु संचालित विमानवाहक पोत ‘यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड’ और उसके स्ट्राइक ग्रुप को कैरिबियन सागर से हटाकर पश्चिम एशिया में तैनात करने का आदेश दिया है। यह युद्धपोत अब फारस की खाड़ी और अरब सागर क्षेत्र में पहले से मौजूद ‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ और उसके सहायक बेड़े के साथ शामिल हो गया है। इससे ईरान पर कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर दबाव बढ़ गया है। बताया जा रहा है कि ओमान में ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम पर चल रही अप्रत्यक्ष वार्ता में कोई ठोस परिणाम ना मिलने से अमेरिका असंतुष्ट है।


    ट्रंप ने फिर दिया सत्ता परिवर्तन का इशारा

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने बीते दिनों एक बार फिर कहा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। ईरान में इस्लामी शासन के अंत के प्रयासों के बारे में पत्रकारों के सवाल पर ट्रंप ने कहा, ”इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता। वे 47 सालों से सिर्फ बातें कर रहे हैं।” वहीं विमानवाहक पोत की तैनाती के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा, “अगर हम कोई समझौता नहीं कर पाए, तो हमें इसकी जरूरत पड़ेगी।” हालांकि अरब देशों ने पहले ही चेतावनी दी है कि किसी भी हमले से क्षेत्रीय संघर्ष भड़क सकता है, खासकर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया अब भी गाजा पट्टी में इजराइल-हमास युद्ध के प्रभाव से उबरने की कोशिश कर रहा है।


    दूसरे दौर की बातचीत जल्द

    इस बीच ईरान और अमेरिका मंगलवार को जिनेवा में अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता के दूसरे दौर में प्रवेश करेंगे। ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त रवांची ने तेहरान में बीबीसी को दिए साक्षात्कार में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि किसी समझौते तक पहुंचने के लिए अमेरिका को अपनी गंभीरता साबित करनी होगी। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ईमानदारी दिखाता है, तो दोनों पक्षों के बीच पुनः शुरू हुई अप्रत्यक्ष वार्ताएं किसी समझौते तक पहुंच सकती हैं। बता दें कि दोनों देशों के बीच वार्ता का पहला दौर छह फरवरी को ओमान की राजधानी मस्कट में हुआ था। रवांची ने कहा कि ईरान की ओर से 60 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम को काफी हद तक निष्क्रिय (डायल्यूट) करने की पेशकश इस बात का प्रमाण है कि देश समझौता करना चाहता है। उन्होंने कहा, “अगर वे प्रतिबंधों पर बात करने को तैयार हैं, तो हम इस मुद्दे और अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अन्य विषयों पर चर्चा के लिए तैयार हैं।”

  • म्यूनिख इवेंट में Pak आर्मी चीफ आसिम मुनीर की घोर बेईज्जती… एंट्री गेट पर ID दिखाने को कहा

    म्यूनिख इवेंट में Pak आर्मी चीफ आसिम मुनीर की घोर बेईज्जती… एंट्री गेट पर ID दिखाने को कहा


    म्यूनिख।
    पाकिस्तान के सेना प्रमुख (Pakistan Army Chief) फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ( Field Marshal Asim Munir) म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस (Munich Security Conference) में भाग लेने के लिए जर्मनी पहुंचे थे। यह सम्मेलन विश्व के प्रमुख नेताओं, राजनयिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों को एक मंच मुहैया कराता है, जहां अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। मुनीर और उनकी टीम इस उच्च स्तरीय आयोजन में शामिल होने पहुंची, लेकिन एंट्री गेट पर एक सामान्य सुरक्षा प्रक्रिया के कारण एक घटना घट गई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

    इस वीडियो में दिखाया गया कि एक सुरक्षा अधिकारी ने मुनीर से उनकी आईडी कार्ड को सामने की ओर घुमाने के लिए कहा। यह घटना सम्मेलन के प्रवेश द्वार पर हुई, जहां अधिकारी ने उनके नेम बैज पर टैप करते हुए कहा, ‘क्या आप इसे घुमा सकते हैं?’ मुनीर ने तुरंत इसका पालन किया और अंदर चले गए।

    यह घटना किसी बड़े विवाद या अपमान का रूप नहीं ले पाई, क्योंकि सूत्रों के अनुसार यह सम्मेलन में सभी प्रतिभागियों के लिए मानक सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा थी। हर व्यक्ति को अपनी पहचान पत्र स्पष्ट रूप से दिखाना होता है, चाहे वह कितना भी उच्च पदाधिकारी क्यों न हो। कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसे लगभग रोका जाना बताया गया, लेकिन वास्तव में यह केवल आईडी कार्ड को सही दिशा में करने की छोटी सी बात बताई जा रही है। वीडियो में सुरक्षा अधिकारी महिला दिखाई दे रही है, जो स्पष्ट रूप से स्टॉप… वेयर इज योर आईडी? प्लीज फ्लिप योर आईडी कार्ड जैसी बात कहती है। इस घटना ने सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी, जहां कुछ लोगों ने इसे प्रोटोकॉल स्नब बताया, जबकि अन्य ने इसे सामान्य सुरक्षा चेक माना।

    https://twitter.com/veer_tapariya/status/2022949126518849731
    आसिम मुनीर की भागीदारी का विरोध

    इसके अलावा, आसिम मुनीर की भागीदारी पर विरोध भी दर्ज किया गया। जर्मनी में स्थित सिंधी राजनीतिक संगठन JSMM ने उनकी उपस्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई। संगठन के अध्यक्ष शफी बुरफत ने संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, जर्मन सरकार और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं को पत्र लिखकर कहा कि मुनीर को आमंत्रित करना बेहद अफसोसजनक है। उन्होंने पाकिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों का हवाला देते हुए प्रदर्शन किया और आयोजकों से उनकी भागीदारी पर फिर से विचार करने की मांग की। JSMM के सदस्यों ने सम्मेलन स्थल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें पाकिस्तान में दमन और क्षेत्रीय अस्थिरता के आरोप लगाए गए।


    बैठक में किन मुद्दों पर हुई चर्चा

    कुल मिलाकर, यह घटना म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस 2026 के दौरान हुई, जहां आसिम मुनीर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो सहित अन्य अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान वैश्विक व क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई। वायरल वीडियो ने मीडिया में सुर्खियां बटोरीं, लेकिन यह मुख्य रूप से एक रूटीन सुरक्षा जांच बताई गई। बता दें कि आसिम मुनीर ने सम्मेलन में पाकिस्तान की स्थिति को मजबूती से रखा, जबकि विरोध प्रदर्शन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर बहस छेड़ दी।