Category: International

  • चीन के भरोसे शुरू हुआ पाकिस्तान का हैंगोर-क्लास पनडुब्बी प्रोजेक्ट, कराची शिपयार्ड में अटका काम; तकनीकी क्षमता पर उठे सवाल

    चीन के भरोसे शुरू हुआ पाकिस्तान का हैंगोर-क्लास पनडुब्बी प्रोजेक्ट, कराची शिपयार्ड में अटका काम; तकनीकी क्षमता पर उठे सवाल



    नई दिल्ली। पाकिस्तान की नौसेना को मजबूत करने के लिए शुरू किया गया हैंगोर-क्लास पनडुब्बी प्रोजेक्ट अब गंभीर चुनौतियों में फंसता नजर आ रहा है। चीन के सहयोग से चल रही इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर अब कराची शिपयार्ड एंड इंजीनियरिंग वर्क्स (KSEW) की तकनीकी क्षमता और निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।

    पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर कुल 8 आधुनिक हैंगोर-क्लास पनडुब्बियां बनाने का समझौता किया था, जिनमें से 4 का निर्माण पाकिस्तान में स्थानीय स्तर पर करने का दावा किया गया था। सरकार ने इसे देश की नौसैनिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया था, लेकिन अब स्थिति उम्मीद के मुताबिक नहीं दिख रही है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, कराची शिपयार्ड को जिन पनडुब्बियों के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई है, उसके पास पहले से किसी भी सबमरीन को बनाने का कोई अनुभव नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि पनडुब्बी निर्माण बेहद जटिल तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाली धातु, प्रेशर-रेजिस्टेंट ढांचा, एडवांस वेल्डिंग तकनीक और सख्त परीक्षण प्रणाली की जरूरत होती है।

    इसी वजह से दुनिया में केवल कुछ ही देश जैसे अमेरिका, रूस, चीन और जर्मनी इस तकनीक में पूरी तरह सक्षम माने जाते हैं। यहां तक कि कई विकसित देशों को भी पनडुब्बी तकनीक विकसित करने में दशकों लग गए हैं।

    रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के उदाहरण बताते हैं कि पनडुब्बी निर्माण क्षमता विकसित करना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। ऐसे में पाकिस्तान की ओर से तेजी से स्थानीय निर्माण का दावा तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, फरवरी 2025 में कराची शिपयार्ड में छठी पनडुब्बी की नींव रखी गई थी, लेकिन परियोजना की प्रगति धीमी बनी हुई है। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि इन पनडुब्बियों की पूरी डिलीवरी 2030 के दशक की शुरुआत तक ही संभव हो पाएगी।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस पूरे प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका बेहद अहम है और डिजाइन से लेकर तकनीकी सहायता तक अधिकांश काम उसी पर निर्भर है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान वास्तव में पनडुब्बी निर्माण में आत्मनिर्भर बन रहा है या सिर्फ असेंबली स्तर पर काम कर रहा है।

    रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि अगर निर्माण में गुणवत्ता और तकनीकी मानकों से समझौता किया गया, तो यह समुद्री सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। फिलहाल यह प्रोजेक्ट पाकिस्तान के लिए रणनीतिक महत्व का जरूर है, लेकिन इसकी रफ्तार और गुणवत्ता दोनों पर निगरानी बनी हुई है।

  • नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव, बालेन शाह ने बढ़ाया सत्ता केंद्रीकरण की ओर कदम, खुफिया एजेंसी सीधे PMO के अधीन

    नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव, बालेन शाह ने बढ़ाया सत्ता केंद्रीकरण की ओर कदम, खुफिया एजेंसी सीधे PMO के अधीन




    नई दिल्ली। नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है, जहां प्रधानमंत्री Balen Shah की सरकार ने सत्ता के केंद्रीकरण की दिशा में अहम कदम उठाया है। सरकार ने राष्ट्रीय जांच विभाग को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अधीन कर दिया है, जिससे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में नई बहस शुरू हो गई है।

    नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार को मंजूर की गई “सरकार कार्य विभाजन नियमावली” के तहत इस खुफिया एजेंसी को गृह मंत्रालय से हटाकर PMO के नियंत्रण में लाया गया है। यह फैसला ऐसे समय पर लिया गया है जब देश में यह चर्चा चल रही थी कि खुफिया तंत्र को फिर से गृह मंत्रालय के अधीन किया जाए या प्रधानमंत्री कार्यालय के सीधे नियंत्रण में रखा जाए।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम पूर्व प्रधानमंत्री KP Sharma Oli की नीतियों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में कई अहम विभागों को PMO के अधीन कर सत्ता को केंद्रीकृत किया था। उस समय उनकी सरकार पर विपक्ष और जनता ने तानाशाही शैली में शासन करने के आरोप लगाए थे।

    बाद में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश Sushila Karki के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने इन फैसलों को पलटते हुए खुफिया और अन्य एजेंसियों को उनके मूल मंत्रालयों के अधीन वापस कर दिया था। लेकिन अब बालेन शाह सरकार द्वारा इन्हें दोबारा PMO के अधीन लाने के फैसले ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।

    जानकारों के मुताबिक, इस बदलाव के साथ ही राजस्व जांच विभाग को भी भंग कर दिया गया है, जिसे पहले ओली सरकार के दौरान PMO के अधीन किया गया था। इसे सीधे तौर पर सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

    नेपाल की राजनीति में इस फैसले के बाद नई बहस छिड़ गई है कि क्या यह प्रशासनिक सुधार है या फिर सत्ता को एक ही केंद्र में सीमित करने की कोशिश। विपक्षी दलों और विशेषज्ञों का कहना है कि इससे संस्थागत संतुलन प्रभावित हो सकता है, जबकि सरकार इसे प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने वाला कदम बता रही है।

  • ताइवान-चीन तनाव बढ़ा, ट्रंप के बयान से कूटनीतिक हलचल तेज, हथियार सौदे पर भी सस्पेंस

    ताइवान-चीन तनाव बढ़ा, ट्रंप के बयान से कूटनीतिक हलचल तेज, हथियार सौदे पर भी सस्पेंस



    नई दिल्ली। ताइवान की संप्रभुता और चीन के दावे को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान के बाद ताइवान ने कड़ा रुख अपनाते हुए खुद को पूरी तरह स्वतंत्र और संप्रभु देश बताया है।

    ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका ताइवान के साथ किसी भी सैन्य टकराव में जल्दबाजी नहीं करना चाहता, क्योंकि यह अमेरिका से हजारों किलोमीटर दूर स्थित है। उनके इस बयान को ताइवान की सुरक्षा को लेकर नरम रुख के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे वहां चिंता बढ़ गई है।

    ताइवान के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि “बीजिंग को ताइवान पर कोई अधिकार नहीं है” और वह एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र राष्ट्र है। यह बयान ट्रंप की चेतावनी के बाद आया, जिसमें उन्होंने ताइवान को यह भी कहा कि वह अमेरिका के भरोसे अपनी स्वतंत्रता की घोषणा को और आगे न बढ़ाए।

    इस बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ट्रंप के बीच हुई बातचीत में ताइवान मुद्दा सबसे बड़ा विवाद बिंदु रहा। चीन इसे अपनी “रेड लाइन” मानता है, जबकि अमेरिका अब तक रणनीतिक अस्पष्टता की नीति अपनाता रहा है।

    इसी बीच ताइवान को दिए जाने वाले 11 अरब डॉलर के हथियार पैकेज पर भी अनिश्चितता बनी हुई है। ट्रंप ने साफ कहा कि इस डील को लेकर उन्होंने अभी अंतिम मंजूरी नहीं दी है और “यह आगे भी रद्द या मंजूर दोनों हो सकता है।”

    इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका, चीन और ताइवान के बीच पहले से चल रहे तनाव को और अधिक जटिल बना दिया है।

  • शी जिनपिंग-ट्रंप मुलाकात: G2 की चर्चा के बीच व्यापार और रणनीति पर टकराव, अमेरिका-चीन रिश्तों में नई खींचतान

    शी जिनपिंग-ट्रंप मुलाकात: G2 की चर्चा के बीच व्यापार और रणनीति पर टकराव, अमेरिका-चीन रिश्तों में नई खींचतान



    नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रंप के हालिया चीन दौरे को लेकर वैश्विक राजनीति में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। ट्रंप ने इस यात्रा को व्यापारिक सफलता बताया और दावा किया कि चीन ने अमेरिका से बड़े पैमाने पर खरीदारी पर सहमति जताई है, लेकिन बीजिंग ने इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच मतभेद फिर उजागर हो गए हैं।

    ट्रंप ने कहा कि चीन ने अमेरिका से 200 बोइंग विमान खरीदने और अरबों डॉलर के बीफ व सोयाबीन आयात पर सहमति दी है। हालांकि चीन की ओर से इस पर कोई औपचारिक पुष्टि नहीं आई, जिससे यह दावा विवादों में आ गया है। इसी बीच ट्रंप के साथ गए अमेरिकी बिजनेस डेलिगेशन को भी ठोस व्यापारिक समझौते के बिना लौटना पड़ा।

    दूसरी ओर चीन ने इस मुलाकात को कूटनीतिक रूप से बेहद सोच-समझकर आयोजित किया, जहां सैन्य प्रदर्शन, औपचारिक स्वागत और शी जिनपिंग के साथ निजी मुलाकातों के जरिए अपनी वैश्विक शक्ति का संदेश देने की कोशिश की गई। विश्लेषकों के मुताबिक, इस पूरे दौरे में चीन का आत्मविश्वास और रणनीतिक स्थिति मजबूत नजर आई।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और चीन के बीच चर्चा के केंद्र में तीन ‘B’ (Boeing, Beef, Beans) और तीन ‘T’ (Taiwan, Tariff, Technology) रहे। ट्रंप प्रशासन ने ताइवान मुद्दे पर नरम रुख दिखाया, जबकि चीन ने तकनीक और व्यापार नीति पर सख्त रुख बनाए रखा। इसी दौरान अमेरिका द्वारा हथियार आपूर्ति में देरी जैसी खबरों ने भी रणनीतिक संतुलन पर असर डाला है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन फिलहाल अमेरिका के साथ “G2 व्यवस्था” यानी वैश्विक शक्ति साझेदारी की अवधारणा को बढ़ावा देना चाहता है, ताकि दुनिया की नीतियों में उसकी बराबर की भागीदारी हो सके। हालांकि दीर्घकाल में उसका लक्ष्य वैश्विक नेतृत्व हासिल करना बताया जा रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि अमेरिका और चीन के रिश्ते सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच झूल रहे हैं, और आने वाले समय में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं।

  • होर्मुज संकट के बीच तेल बाजार में बढ़ा तनाव, रूस-अमेरिका से आई दो बड़ी खबरों ने बढ़ाई चिंता

    होर्मुज संकट के बीच तेल बाजार में बढ़ा तनाव, रूस-अमेरिका से आई दो बड़ी खबरों ने बढ़ाई चिंता



    नई दिल्ली। वैश्विक तेल बाजार पहले से ही होर्मुज स्ट्रेट में चल रहे तनाव के कारण दबाव में है, और अब दो नई घटनाओं ने स्थिति और गंभीर कर दी है। एक तरफ अमेरिका ने रूस के कच्चे तेल पर दी गई अस्थायी छूट (waiver) को समाप्त कर दिया है, तो दूसरी ओर रूस के रियाज़ान शहर में यूक्रेनी ड्रोन हमले ने एक बड़ी ऑयल रिफाइनरी को नुकसान पहुंचाया है।

    अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले के बाद अब रूस से तेल खरीदने पर पहले जैसी राहत कई देशों को नहीं मिलेगी। मार्च और अप्रैल में दी गई सीमित छूट केवल पहले से लदे टैंकरों तक ही सीमित थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से वैश्विक तेल आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब मिडिल ईस्ट में पहले से ही अस्थिरता बनी हुई है।

    दूसरी ओर रूस के रियाज़ान में हुए ड्रोन हमले में एक बड़ी रॉसनेफ्ट रिफाइनरी को निशाना बनाया गया, जिससे भीषण आग लग गई। इस घटना में कम से कम चार लोगों की मौत और कई के घायल होने की खबर है। यह रिफाइनरी सालाना करोड़ों टन कच्चा तेल प्रोसेस करती है, जिससे इसकी क्षति को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

    सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और सैटेलाइट इमेज में आग और धुएं का विशाल गुबार देखा गया, जिसने तेल बाजार को और अधिक अस्थिर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन घटनाओं का असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर सीधे तौर पर पड़ सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत समेत कई तेल-आयातक देशों पर दबाव बढ़ने की आशंका है, क्योंकि वैश्विक सप्लाई पहले से ही सीमित और अस्थिर बनी हुई है।

  • अमेरिका में भारतीय आम की धूम: Costco स्टोर्स तक पहुंचा केसर आम, कीमत और डिमांड दोनों ने खींचा ध्यान

    अमेरिका में भारतीय आम की धूम: Costco स्टोर्स तक पहुंचा केसर आम, कीमत और डिमांड दोनों ने खींचा ध्यान


    नई दिल्ली(New Delhi)।
    अमेरिका के सिएटल और आसपास के शहरों में इस समय भारतीय आमों की जबरदस्त एंट्री देखने को मिल रही है। खासकर केसर आम (Kesar Mangoes) अब सिर्फ छोटे इंडियन स्टोर्स तक सीमित नहीं रहे, बल्कि बड़े रिटेल चेन Costco में भी बिकने लगे हैं। इससे भारतीय आमों की ग्लोबल डिमांड और मजबूत होती दिख रही है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 के पैक में केसर आम करीब 19.99 डॉलर (लगभग ₹1,900) में बिक रहे हैं। सिएटल, लिनवुड, एडिसन और नॉर्थ ब्रंसविक जैसे शहरों में इनकी कीमत लगभग समान है। हालांकि भारत की तुलना में यह कीमत ज्यादा लगती है, लेकिन अमेरिका में यह प्रीमियम फ्रूट कैटेगरी में गिना जा रहा है।

    अमेरिका में भारतीय आमों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सिएटल स्थित भारतीय कॉन्सुल जनरल ने भी सक्रिय भूमिका निभाई है। हाल ही में उन्होंने मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भारतीय आमों को प्रमोट करते हुए बताया कि पिछले एक साल से लगातार प्रयास किए जा रहे थे ताकि भारतीय आम बड़े सुपरमार्केट नेटवर्क तक पहुंच सकें। अब इसका असर साफ दिख रहा है।

    भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है, जहां से वैश्विक उत्पादन का करीब आधा हिस्सा आता है। केसर, अल्फांसो, दशहरी और लंगड़ा जैसे आम अपनी मिठास और खुशबू के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं। फिलहाल अमेरिकी बाजार में केसर आम सबसे पहले पहुंचे हैं और आने वाले समय में अन्य किस्मों के भी आने की संभावना है।

    अब तक भारतीय आम अमेरिका में केवल कुछ चुनिंदा एथनिक स्टोर्स में ही मिलते थे, लेकिन अब उनकी पहुंच मुख्यधारा के रिटेल बाजार तक बढ़ रही है। इसे विशेषज्ञ भारतीय कृषि निर्यात और ‘मैंगो डिप्लोमेसी’ के तौर पर भी देख रहे हैं, जिससे भारत के फलों की वैश्विक पहचान और मजबूत हो रही है।

  • इजरायल-ईरान तनाव चरम पर, लेबनान और गाजा में भीषण हमले, होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी वैश्विक चिंता

    इजरायल-ईरान तनाव चरम पर, लेबनान और गाजा में भीषण हमले, होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी वैश्विक चिंता




    नई दिल्ली(New Delhi)।
    पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है, जहां इजरायल, ईरान, अमेरिका और हिजबुल्लाह के बीच हालात और ज्यादा विस्फोटक हो गए हैं। इजरायल में एक टेस्टिंग ग्राउंड पर हुए बड़े धमाके के बाद आसमान में उठे धुएं के बाद ‘मशरूम क्लाउड’ जैसे दृश्य देखे जाने से दहशत फैल गई, हालांकि इसे एक पहले से तय परीक्षण बताया जा रहा है।

    इसी बीच इजरायल डिफेंस फोर्सेस (IDF) ने दावा किया है कि उसने सीजफायर के बावजूद लेबनान में हिजबुल्लाह के करीब 100 ठिकानों पर हवाई और जमीनी हमले किए हैं। इन हमलों में आतंकी ढांचे, ऑब्जर्वेशन पोस्ट और हथियार डिपो को निशाना बनाया गया। दूसरी ओर, हिजबुल्लाह भी इजरायली सेना पर ड्रोन और मोर्टार हमलों के वीडियो जारी कर रहा है, जिससे तनाव और गहराता जा रहा है।

    लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, हालिया संघर्ष में अब तक लगभग 2,969 लोगों की मौत और 9,000 से अधिक घायल होने की पुष्टि हुई है। सिर्फ पिछले कुछ दिनों में दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है, जिससे स्थिति गंभीर बनी हुई है।

    गाजा पट्टी में भी हालात खराब हैं, जहां खान यूनिस से लेकर गाजा सिटी तक इजरायली सेना की भारी गोलाबारी और नौसैनिक हमले जारी हैं। शरणार्थी कैंप और रिहायशी इलाकों में भी फायरिंग से आम नागरिकों में दहशत का माहौल है।

    इधर ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बड़ा कदम उठाने का संकेत दिया है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने कहा है कि नया ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लागू किया जाएगा, जिसके तहत जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित किया जाएगा और कुछ जहाजों पर प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है। ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि अमेरिकी दबाव और नाकेबंदी की रणनीति का जवाब दिया जाएगा।

    अमेरिका की सेंट्रल कमांड ने दावा किया है कि होर्मुज क्षेत्र में तनाव के कारण कई जहाजों को वापस लौटाया गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच खाड़ी देशों पर भी दबाव बढ़ रहा है, जहां ईरान ने कुछ देशों को चेतावनी दी है कि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल उसके विरोधियों के लिए न होने दें। वहीं क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव और बयानबाजी ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है।

  • बड़ी रणनीतिक तैयारी में जुटा चीन…. एशिया के विवादित समुद्री इलाकों में तैनात किए बड़े बेड़े

    बड़ी रणनीतिक तैयारी में जुटा चीन…. एशिया के विवादित समुद्री इलाकों में तैनात किए बड़े बेड़े


    बीजिंग।
    नई चाल के तह चीन (China) एशिया (Asia) के विवादित समुद्री इलाकों (Maritime areas) में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। इसके लिए वह मछली पकड़ने वाली नावों, कोस्ट गार्ड जहाजों (Coast Guard vessels.) और समुद्री मिलिशिया यूनिट्स (Maritime Militia Units) के बड़े बेड़े तैनात कर रहा है। यह एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद बिना किसी सीधी सैन्य टकराव के अपना नियंत्रण मजबूत करना है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट और ताइवान न्यूज के हवाले से यह जानकारी दी गई है। हाल ही में चीन की लगभग 200 मछली पकड़ने वाली नावें येलो सी में और अंदर तक चली गईं।

    ये नावें उन समुद्री इलाकों के और करीब पहुंच गईं, जिन पर चीन और दक्षिण कोरिया दोनों अपना दावा करते हैं। जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस कंपनी Ingenispace द्वारा जुटाए गए डेटा से पता चला है कि अहम शिपिंग मार्गों और विवादित समुद्री क्षेत्रों में जहाजों की आवाजाही असामान्य रूप से बहुत ज्यादा बढ़ गई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बीजिंग अपनी ‘ग्रे-जोन’ रणनीति के तहत अब ज्यादा से ज्यादा नागरिक मछली पकड़ने वाले बेड़ों पर निर्भर हो रहा है। ये बेड़े दोहरे इस्तेमाल वाले ऑपरेशन्स के लिए तैयार किए गए हैं। इस रणनीति का मकसद धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाना है, लेकिन साथ ही खुले युद्ध की स्थिति से भी बचना है।

    Ingenispace के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर जेसन वांग ने कहा कि इन जहाजों की तैनाती से यह जाहिर होता है कि चीन अनियमित समुद्री ऑपरेशन्स के जरिए क्षेत्रीय समुद्री इलाकों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि जहाजों की यह बढ़ती संख्या चीन की उस संभावित क्षमता को भी दर्शाती है, जिसके तहत वह तनाव बढ़ने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक शिपिंग मार्गों को बाधित कर सकता है। पूर्वी चीन सागर में भी चीन की समुद्री गतिविधियां तेज हो गई हैं। 3 अप्रैल को 600 से ज्यादा चीनी मछली पकड़ने वाली नावें लगभग 18 घंटों तक एक लंबी कतार बनाकर खड़ी देखी गईं।


    कोस्ट गार्ड की गश्त भी बढ़ी

    इसके साथ ही, बीजिंग ने विवादित डियाओयुताई द्वीपों के आसपास कोस्ट गार्ड की गश्त भी बढ़ा दी। साउथ चाइना सी में, चीन ने पिछले एक साल में स्कारबोरो शोल के पास अपने कोस्ट गार्ड ऑपरेशन्स को कथित तौर पर दोगुना कर दिया है और इस इलाके को ‘नेशनल नेचर रिजर्व’ घोषित करने के बाद ज्यादा सख्त प्रशासनिक उपाय लागू किए हैं। वियतनाम के पास पैरासेल आइलैंड्स में नई कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी देखी गई है।


    क्या कह रहे एक्सपर्ट्स?

    सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘सीलाइट प्रोजेक्ट’ के रिसर्चर्स ने बताया कि चीन ने पिछले साल समुद्री मिलिशिया और कोस्ट गार्ड जहाजों की सुरक्षा में ‘एंटेलोप रीफ’ का विस्तार करना शुरू कर दिया था। एक्सपर्ट्स ने कहा कि चीन का लंबे समय का मकसद विवादित पानी में अपने दबदबे को धीरे-धीरे सामान्य बनाना है, और साथ ही सीधे टकराव से बचना है। CSIS में जियोपॉलिटिक्स और विदेश नीति विभाग के प्रेसिडेंट विक्टर चा ने कहा कि चीन की कार्रवाइयां बहुत सोच-समझकर की गई हैं, ताकि बिना युद्ध छेड़े क्षेत्रीय नियंत्रण को मजबूत किया जा सके।

  • अपना रक्षा बजट बजट बढ़ाएगा पाकिस्तान…. 100 अरब की कर सकता है बढ़ोतरी

    अपना रक्षा बजट बजट बढ़ाएगा पाकिस्तान…. 100 अरब की कर सकता है बढ़ोतरी


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान सरकार (Pakistan Government) अगले वित्त वर्ष में रक्षा बजट (Defense Budget) में करीब 100 अरब पाकिस्तानी रुपये की बढ़ोतरी कर सकती है। सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) (International Monetary Fund – IMF) समर्थित सुधार कार्यक्रम के तहत अपना बजट तैयार कर रही है, जिसमें राजस्व में भारी वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। एक मीडिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।

    मालूम हो कि पाकिस्तान ने पिछले साल भारत के खिलाफ बड़ा युद्ध हारा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तानी सेना को बुरी तरह से पराजित करते हुए कई ठिकानों पर मिसाइलों से हमले किए थे। संघर्ष के दौरान पाकिस्तान भारत से बुरी तरह से ‘पिटा’ था। ऐसे में अब अगले साल से रक्षा बजट के इतना बढ़ाए जाने से आशंका जताई जा रही है कि क्या पाकिस्तानी सेना कोई बड़ी तैयारी तो नहीं कर रही है और भारत के लिए बड़ा खतरा तो नहीं पैदा होने जा रहा? माना जा रहा है कि इसके जरिए वह अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाएगा और हथियारों की खरीद भी बढ़ा सकता है, जिससे मुनीर की सेना की ताकत में इजाफा होगा।

    अखबार ‘डॉन’ ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि 2026-27 के लिए रक्षा खर्च 2.66 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये रहने का अनुमान है, जो चालू वित्त वर्ष में 2.56 लाख करोड़ रुपये है। रिपोर्ट के अनुसार, आईएमएफ ने 2026-27 में पाकिस्तान की कुल संघीय आय 17.14 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये रहने का अनुमान लगाया है। यह मौजूदा वित्त वर्ष की तुलना में दो लाख करोड़ रुपये से अधिक और करीब 13.5 प्रतिशत ज्यादा है।

    रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ने केंद्र और प्रांतीय सरकारों के कुल खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.2 प्रतिशत तक बढ़ाकर 4.23 लाख करोड़ रुपये करने का वादा किया है। साथ ही जून 2027 तक केंद्र और प्रांतीय सरकारों के सभी भुगतानों को डिजिटल माध्यम से करने की योजना है। आईएमएफ कार्यक्रम से जुड़े व्यापक सुधारों के तहत सरकार इस वर्ष के अंत तक सबसे अधिक भ्रष्टाचार प्रभावित 10 संस्थानों की पहचान कर उनका विस्तृत अध्ययन और लेखा जांच करेगी। प्रांतीय भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों को भी मजबूत किया जाएगा।


    40 फीसदी आबादी आर्थिक रूप से कमजोर

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जो लोग घोर गरीबी में जी रहे हैं और जिन्हें सामाजिक सहायता मिल रही है, उनके अलावा भी लगभग 40 फीसदी आबादी आर्थिक रूप से कमजोर बनी हुई है। IMF का एक मिशन इस समय पाकिस्तान में है, जो 2026-27 के बजट से पहले बजट पर होने वाली चर्चाओं को अंतिम रूप देने के लिए आया है। उम्मीद है कि यह बजट अगले महीने की शुरुआत में कैबिनेट और संसद के सामने पेश किया जाएगा।

  • ब्रिटेन में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल, पद छोड़ने को हुए तैयार PM कीर… जल्द दे सकते हैं इस्तीफा

    ब्रिटेन में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल, पद छोड़ने को हुए तैयार PM कीर… जल्द दे सकते हैं इस्तीफा


    लंदन।
    ब्रिटेन (Britain) में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से प्रधानमंत्री कीर स्टारमर (Prime Minister Keir Starmer) अपना पद छोड़ने को तैयार हो गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने अपने करीबियों से कहा है कि वह इस्तीफा देने को तैयार हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री कीर स्टारमर अपने हिसाब से आगे का कदम उठाएंगे। उन्हें इस्तीफा कब देना है, इसका विचार भी वह खुद ही करेंगे।


    क्यों खतरे में है कीर स्टारमर की सरकार

    जानकारी के मुताबिक यूके की लेबर सरकार संकटों से जूझ रही है। लोगों की इस सरकार में विश्वास कम हो गया है। लेबर पार्टी के पीटर मैंडलसन (Peter Mandelson.) का नाम एपस्टीन फाइल्स ( Epstein Files) में आने के बाद लोगों ने लेबर पार्टी पर अविश्वास जताया और स्थानीय चुनावों में इसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसी वजह से कीर स्टारमर पर भी इस्तीफा देने का दबाव बढ़ गया है।

    गुरुवार को ब्रिटेन में क्षेत्रीय चुनाव हुए। यह चुनाव 136 क्षेत्रों में आयोजित किए गए। अंतिम नतीजों के अनुसार लेबर पार्टी ने परिषद की उन 2,200 से ज़्यादा सीटों में से लगभग 1,200 सीटें गंवा दीं, जिन पर पहले उसका कब्ज़ा था। दक्षिणपंथी ‘रिफॉर्म यूके ‘ पार्टी स्पष्ट विजेता के तौर पर उभरी और उसने लगभग 1,400 सीटें जीतीं।

    बता दें कि लेबर पार्टी के ही 80 से ज्यादा सांसदों ने उनसे पद छोड़ने की अपील की है। बीते दिनों सरकार के तीन सदस्यों के इस्तीफा देने की बात भी सामने आई थी।

    निगेल फराज के नेतृत्व वाली रिफॉर्म यूके को चुनावों का सबसे बड़ा विजेता माना जा रहा है। स्काई न्यूज के अनुसार, इसने अब तक 1,422 सीटें जीती हैं। लेबर पार्टी 980 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि लिबरल डेमोक्रेट्स और कंजरवेटिव पार्टी क्रमशः 834 और 754 सीटों के साथ तीसरे और चौथे स्थान पर हैं।प्लाइड सिमरु, जो वेल्स की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध एक मध्य-वामपंथी पार्टी है, 43 सीटों के साथ वेल्स सेनेड में सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। रिफॉर्म यूके 34 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है जबकि लेबर पार्टी नौ सीटों के साथ बहुत पीछे तीसरे स्थान पर है। वेल्स में 27 साल सत्ता में रहने के बाद लेबर पार्टी ने पहले ही हार स्वीकार कर ली थी।


    स्टारमर ने इस्तीफा देने से कर दिया था इनकार

    वहीं स्कॉटलैंड में, स्कॉटिश नेशनल पार्टी ने सबसे अधिक 58 सीटें जीतीं लेकिन बहुमत के लिए आवश्यक 65 सीटों से पीछे रह गई। लेबर और रिफॉर्म यूके 17-17 सीटों पर बराबरी पर हैं जबकि कंजर्वेटिव पार्टी की सीटें घटकर 12 रह गईं। अपनी पार्टी के लिए निराशाजनक नतीजों के बावजूद, स्टारमर ने इस्तीफा देने से मना करते हुए कहा था कि वह पीछे नहीं हटेंगे और देश को अराजकता में नहीं धकेलेंगे।