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  • Passport Index 2026: पासपोर्ट रैंकिंग में भारत की तरक्की, लेकिन इन दो देशों में मिला तगड़ा झटका

    Passport Index 2026: पासपोर्ट रैंकिंग में भारत की तरक्की, लेकिन इन दो देशों में मिला तगड़ा झटका


    नई दिल्ली। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत की रैंकिंग में सुधार देखा गया है. इसमें सुधार की स्थिति 2026 के जनवरी महीने में भी देखी गई है. वहीं भारतीयों के लिए बिना वीजा के घूमने वाली जगह की संख्या कम हो गई है. कौन से वो देश हैं जहां भारत बिना वीजा के नहीं जा सकता है?
    हेनले पासपोर्ट इंडेक्स का लेटेस्ट एडिशन सामने आया है. इस इंडेक्स में भारत के लिए एक अजीब ट्विस्ट है. अगर कागजो पर गौर करें तो देश की ग्लोबल मोबिलिटी स्थिति में सुधार हुआ है. इसके बाद भी जब आप रॉ नंबर्स पर नजर डालें तो हैं, तो भारतीय पासपोर्ट होल्डर्स को पिछले साल की तुलना में बिना पहले से पेपरवर्क के असल में थोड़ी कम जगहों पर जाने का मौका मिलता है. यानी हेनले पासपोर्ट इंडेक्स में रैकिंग देखें तो भारत का सुधार हुआ है मगर बिना वीजा घूमने वाले देश थोड़े कम हो गए हैं. हेनले पासपोर्ट रैंकिंग पर गौर करें तो भारत 2026 में 75वें स्थान पर होगा. ये 2025 में 85वें स्थान पर था ऐसे में 10 अंकों की सुधार देखी गई है.
    एक तरफ गौर करें इस साल जनवरी की तो इसी महीने भी ये 80वें स्थान पर था और सिर्फ़ एक महीने में रैंकिंग में इस सुधार की स्थिति को देखा गया है. वहीं दूसरी तरफ वीजा लिए बिना जाने वाले कुल डेस्टिनेशन की संख्या अभी 56 है. यह जनवरी 2026 के 55 से ज्यादा है, लेकिन 2025 में रिकॉर्ड किए गए 57 डेस्टिनेशन से अभी भी कम है.
    हेनले पासपोर्ट इंडेक्स क्या है?
    हेनले एंड पार्टनर्स का पब्लिश किया हुआ, हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 227 अलग-अलग ट्रैवल डेस्टिनेशन के 199 पासपोर्ट को इस आधार पर रैंक करता है कि उनके होल्डर डिपार्चर से पहले बिना वीजा लिए कितनी डेस्टिनेशन तक जा सकते हैं. यह रैंकिंग इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के डेटा पर आधारित है.
    इसकी स्कोरिंग मेथडोलॉजी में वीजा-फ्री, वीजा-ऑन-अराइवल और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवल ऑथराइज़ेशन शामिल हैं. आसान शब्दों में कहें तो, बिना एडवांस पेपरवर्क के जितनी ज्यादा जगहों पर जाया जा सकता है, पासपोर्ट का मोबिलिटी स्कोर उतना ही मजबूत होता है.
    भारत ने ये दो देश खो दिए
    2025 में भारतीय पासपोर्ट होल्डर्स के पास 57 वीजा-फ़्री (वीजा-ऑन-अराइवल और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवल ऑथराइज़ेशन शामिल) जगहों तक एक्सेस था. 2026 की शुरुआत तक यह संख्या घटकर 55 (26 जनवरी) हो गई, फिर 56 (फरवरी 2026) पर आ गई. इस कमी के लिए ईरान और बोलीविया जिम्मेदार दो देश थे.

    ईरान ने नवंबर 2025 में आम भारतीय पासपोर्ट होल्डर्स के लिए अपनी वीजा-फ़्री एंट्री सस्पेंड कर दी थी. यह फैसला भारतीय नागरिकों से जुड़े धोखाधड़ी और ट्रैफिकिंग के कई मामलों के बाद आया, जिन्हें झूठे जॉब ऑफ़र देकर इस्लामिक रिपब्लिक में फुसलाया गया और फिर फिरौती के लिए किडनैप कर लिया गया.

  • बांग्लादेश में BNP की ऐतिहासिक विजय…. जमात-ए-इस्लामी की जीत से बढ़ी भारत की चिंता, सीमावर्ती राज्यों में अलर्ट

    बांग्लादेश में BNP की ऐतिहासिक विजय…. जमात-ए-इस्लामी की जीत से बढ़ी भारत की चिंता, सीमावर्ती राज्यों में अलर्ट


    ढाका।
    बांग्लादेश (Bangladesh) में पिछले दो दशकों के राजनीतिक गतिरोध (Political Deadlock) को तोड़ते हुए, तारिक रहमान (Tariq Rahman.) के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) (Bangladesh Nationalist Party – BNP) ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आम चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। 297 घोषित सीटों में से 212 पर कब्जा कर BNP ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है। इस जीत के साथ ही 20 साल बाद देश में BNP की वापसी हुई है। हालांकि, इस चुनावी परिणाम ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। इसका मुख्य कारण जमात-ए-इस्लामी और उसके 11 सहयोगियों द्वारा 77 सीटों पर दर्ज की गई शानदार जीत है।

    भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि जमात-ए-इस्लामी ने जिन सीटों पर जीत हासिल की है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल और असम की सीमा से लगे बांग्लादेशी जिलों में स्थित है। सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम ने इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि शेख हसीना की अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद मुकाबला मूल रूप से जमात और BNP के बीच था।

    प्रोफेसर इस्लाम ने कहा, “BNP की जीत यह संकेत देती है कि बांग्लादेश में स्वतंत्र पहचान और राष्ट्रवाद का मुद्दा अभी भी जनता के लिए महत्वपूर्ण है। जमात ने 1971 के मुक्ति संग्राम के इतिहास को चुनौती देने की कोशिश की, जो व्यर्थ साबित हुई। हालांकि, जनमत संग्रह यह भी संकेत देता है कि अब 1972 के संविधान में संशोधन के प्रयास किए जाएंगे।”


    भारत के सीमावर्ती राज्य हाई अलर्ट पर

    जमात की चुनावी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने पश्चिम बंगाल के छह जिलों जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना से लगी सीमा के साथ-साथ असम के सिलचर से लगे क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व फिर से स्थापित कर लिया है। सुरक्षा जानकारों का मानना है कि यह स्थिति भारत के सीमा सुरक्षा बल (BSF) और खुफिया एजेंसियों के लिए चुनौती बन सकती है। सीमा के वे हिस्से जहां कंटीली तारें नहीं लगी हैं, वे लंबे समय से मानव तस्करी और तस्करी के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं। इस फैसले के बाद भारत को हाई अलर्ट पर रखा गया है।


    अल्पसंख्यकों की चिंता

    राजनीतिक विज्ञान की प्रोफेसर पांचाली सेन ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी ने भारत के प्रति अपनी सार्वजनिक मुद्रा को नरम किया है और पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों के लिए खुलापन दिखाया है, लेकिन भारत के लिए सुरक्षा और आतंकवाद एक प्रमुख चिंता बनी रहनी चाहिए। प्रोफेसर सेन ने जोर देकर कहा, “बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा, जिन पर पहले ही हमले हो चुके हैं, भारतीय सरकार की प्राथमिकता सूची में होनी चाहिए। चूंकि भारत ने इस फैसले का स्वागत किया है, दिल्ली ढाका के साथ राजनयिक संबंध बनाए रखने और क्षेत्र में शक्ति संतुलन सुनिश्चित करने के लिए एक सतर्क नीति अपना सकती है।”


    आतंकवाद का खतरा

    खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) जैसे आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों पर अभी कोई भी भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। JMB ने भारत में भी अपना नेटवर्क स्थापित किया है। अधिकारी ने कहा, “भारत में आतंकवादी समूहों के रूप में सूचीबद्ध छह बांग्लादेशी संगठनों में से JMB ने हाल के वर्षों में सबसे अधिक वृद्धि दिखाई है। 2020 और 2025 के बीच पश्चिम बंगाल और कोलकाता में एक दर्जन से अधिक JMB ऑपरेटरों को गिरफ्तार किया गया है। ये तत्व उन संगठनों की ओर देखते हैं जो जमात का समर्थन करते हैं।”

    दिसंबर 2025 में पश्चिम बंगाल और असम के विभिन्न हिस्सों से 2016 में गिरफ्तार किए गए JMB के पांच सदस्यों को कोलकाता की एक अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उनके पास से भारी मात्रा में विस्फोटक और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (IED) के घटक जब्त किए गए थे।

  • Bangladesh में हिंदुओं की आबादी 8% … मगर चुनाव में 300 सीटों में से मात्र 3 हिंदू चुने गए सांसद

    Bangladesh में हिंदुओं की आबादी 8% … मगर चुनाव में 300 सीटों में से मात्र 3 हिंदू चुने गए सांसद


    ढाका।
    बांग्लादेश चुनाव (Bangladesh Election) पूरा हो गया है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (Bangladesh Nationalist Party) को 209 सीटों पर जीत हासिल हुई है. तारिक रहमान (Tariq Rahman) पीएम बन सकते हैं. जमात-ए-इस्लामी (Jamaat-e-Islami) को 68 और छात्रों वाली पार्टी NCP को सिर्फ 6 सीटों पर वोट मिला. चुनाव के बाद अब जो आंकड़े आए हैं, वह हैरान करने वाले हैं. खासकर हिंदुओं की जीत को लेकर. दरअसल बांग्लादेश की कुल आबादी करीब 16.5 करोड़ है. 2022 की जनगणना के मुताबिक इनमें 1 करोड़ 31 लाख से ज्यादा हिंदू हैं. यानी देश की करीब 8 प्रतिशत आबादी हिंदू समुदाय से आती है. यह कोई छोटी संख्या नहीं है. लेकिन 2026 के ताजा संसदीय चुनाव में हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद कम रह गया है. 300 सीटों वाली संसद में इस बार सिर्फ 3 हिंदू सांसद चुने गए हैं. यह आंकड़ा तब आया है जब हाल के दिनों में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा देखी गई है।


    बांग्लादेश चुनाव में कितने हिंदू जीते?

    पहले हिंदुओं की बड़ी संख्या अवामी लीग (AL) से होती थी. AL क्योंकि बैन है, इसलिए तीनों हिंदू उम्मीदवार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से जीते हैं.
    गायेश्वर चंद्र रॉय- ढाका-3 सीट से
    निताई रॉय चौधरी – मगरी-2 सीट से
    एडवोकेट दिपेन देवान – रंगामाटी सीट से
    इसके अलावा साचिंग प्रू नाम के एक और अल्पसंख्यक उम्मीदवार ने बंदरबन से जीत दर्ज की, लेकिन कुल संख्या फिर भी बहुत कम है.


    जमात का हिंदू कैंडिडेट हारा

    ध्यान देने वाली बात यह है कि जमात-ए-इस्लामी ने इस बार एक हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी को खुलना-1 सीट से मैदान में उतारा था. लेकिन वे चुनाव हार गए. इसका मतलब यह हुआ कि जमात के टिकट पर कोई भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार जीत नहीं पाया.


    पहले क्या स्थिति थी?

    रिपोर्ट्स के मुताबिक शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान संसद में हिंदू सांसदों की संख्या इससे कहीं ज्यादा रही थी.
    2009-2014 की संसद में 16 हिंदू सांसद थे
    2014-2019 में यह संख्या बढ़कर 17 (और आरक्षित सीटों के साथ 20 तक) पहुंची
    2019-2024 में करीब 14 अल्पसंख्यक सांसद थे
    यानी पहले जहां 14 से 20 के बीच हिंदू सांसद होते थे, अब संख्या घटकर सिर्फ 3 रह गई है. 2006-09 तक बांग्लादेश में केयरटेकर सरकार रही. ऐसे में हम कह सकते हैं कि यह 20 साल में सबसे कम संख्या है. यह गिरावट काफी बड़ी मानी जा रही है।


    कितने हिंदू उम्मीदवार मैदान में थे?

    इस चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं. 60 में से 22 राजनीतिक दलों ने अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे थे. BNP ने 6 अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 4 जीत पाए. लेकिन कुल संख्या फिर भी बहुत कम रही.


    सवाल क्यों उठ रहे हैं?

    देश की लगभग 8 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद संसद में 1 प्रतिशत से भी कम प्रतिनिधित्व होना चिंता का विषय माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय कई इलाकों में निर्णायक भूमिका निभाता है, लेकिन टिकट वितरण और चुनावी गणित में उनकी हिस्सेदारी सीमित रह जाती है. इसके अलावा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा में रहा।

    बांग्लादेश चुनाव में कितनी महिलाएं जीतीं?
    इस बार चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या भी बहुत कम रही. हालांकि 7 महिलाओं ने जीत दर्ज की, जिनमें ज्यादातर बीएनपी से थीं. जमात-ए-इस्लामी के कुछ बयानों ने महिलाओं की भागीदारी पर भी विवाद खड़ा किया था।

  • ईरान पर दबाव बढ़ाने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भेजा सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर

    ईरान पर दबाव बढ़ाने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भेजा सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर

    नई दिल्ली। ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया कि वह अपने सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड को पूरी टीम के साथ मध्य एशिया की ओर भेज रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम को लेकर मतभेद अभी भी कायम हैं।

    यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड की तैनाती
    ट्रंप ने कहा कि एयरक्राफ्ट कैरियर को जल्द ही रवाना किया जाएगा और यदि ईरान के साथ समझौता नहीं होता है तो इसकी आवश्यकता पड़ेगी। इसके साथ ही यूएसएस अब्राहम लिंकन को भी भेजा गया है, जो पहले से अरब सागर में गाइडेड मिसाइलों के साथ तैनात है। पिछले सप्ताह इसी युद्धपोत ने ईरानी ड्रोन को निशाना बनाकर मार गिराया था।

    ईरान में विरोध और बढ़ता तनाव
    ईरान में हाल के विरोध प्रदर्शनों और उन्हें दबाने के लिए आयातुल्ला खामेनेई के कदमों के बाद अमेरिका-ईरान संबंध और तनावपूर्ण हो गए हैं। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी शर्तों का पालन नहीं करता है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

    दबाव बढ़ाने की रणनीति
    यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड, जो पहले वेनेजुएला अभियान पर था, अब सीधे मध्य एशिया की ओर भेजा गया है। दोनों देशों के बीच ओमान में हुई बातचीत के बावजूद कोई ठोस समझौता नहीं हुआ। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच वाशिंगटन की सैन्य क्षमता दिखाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि दो विमानवाहक पोतों की एक साथ मौजूदगी अमेरिका की नौसैनिक ताकत को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाएगी और ईरान पर कूटनीतिक और सैन्य दबाव मजबूत करेगी। इस तैनाती में गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक और निगरानी विमान भी शामिल हैं।

  • भारत-अमेरिका महा-डील: वाशिंगटन से आएंगे 'खतरनाक' हथियार, टैरिफ युद्ध खत्म होने के बाद रक्षा संबंधों में नई गर्मी

    भारत-अमेरिका महा-डील: वाशिंगटन से आएंगे 'खतरनाक' हथियार, टैरिफ युद्ध खत्म होने के बाद रक्षा संबंधों में नई गर्मी


    नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच हाल ही में हुई ऐतिहासिक ट्रेड डील ने दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में नई गर्मजोशी भर दी है। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वाशिंगटन अब भारत को और भी खतरनाक हथियार प्रणालियों की आपूर्ति करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इस कदम का सीधा उद्देश्य भारत की रक्षा क्षमता और सैन्य आधुनिकीकरण को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत करना है। यह महत्वपूर्ण विकास ऐसे समय में हुआ है, जब पिछले कुछ वर्षों में दोनों महाशक्तियों के बीच रणनीति और व्यापार को लेकर कई उतार-चढ़ाव देखे गए थे।

    पिछले कुछ समय में राष्ट्रपति ट्रंप के शासनकाल के दौरान भारत और अमेरिका के संबंधों में काफी ठंडापन महसूस किया गया था। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर कड़ी टिप्पणियां की थीं और कई कड़े अमेरिकी टैरिफ भारत पर थोप दिए थे, जिससे आपसी सहयोग पर दबाव बढ़ गया था। लेकिन नई ट्रेड डील के बाद हालात तेजी से बदलते दिख रहे हैं। अमेरिका ने भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत के भारी टैरिफ को घटाकर अब मात्र 18 प्रतिशत कर दिया है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत है। इसके बदले में भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की संभावना जताई है।

    अमेरिकी विदेश विभाग में एशियाई मामलों के सहायक सचिव पॉल कपूर ने आधिकारिक पुष्टि की है कि दोनों देश रक्षा संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि अमेरिका और भारत अधिक उन्नत हथियार प्रणालियों की खरीद पर चर्चा कर रहे हैं, जिससे न केवल भारत की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि अमेरिका में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। यह सप्लाई श्रृंखला दोनों देशों के बीच एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारी को दर्शाती है, जिसमें ऊर्जा उत्पादों से लेकर उच्च तकनीक वाले सैन्य उपकरणों तक सब कुछ शामिल है।

    वर्तमान रक्षा परिदृश्य की बात करें तो भारत ने 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही अमेरिका के साथ समुद्री निगरानी विमानों और अन्य बड़ी सैन्य प्रणालियों पर गहन चर्चा जारी है। हालांकि, इस सौदे में फिलहाल एफ-35 जैसे पांचवीं पीढ़ी के फाइटर विमानों की खरीद पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिका लगातार भारत को अपने रक्षा खेमे में लाने के प्रयास कर रहा है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अपनी जरूरतों के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ तकनीक का चयन कर रहा है।

    भारत के लिए यह संतुलन बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि रूस स्वतंत्रता के बाद से ही भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार रहा है। अमेरिका ने कई बार भारत को पूरी तरह अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की स्वायत्तता वाली विदेश नीति ने दोनों देशों के साथ संतुलन बनाए रखा है। इस नई डील के बाद यह साफ हो गया है कि भारत-अमेरिका रिश्तों में एक नया भरोसा पैदा हुआ है। यह समझौता न केवल सैन्य मोर्चे पर बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी भविष्य की सुनहरी तस्वीर पेश करता है, जहाँ दोनों देश मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना करेंगे।

  • जेफ्री एपस्टीन की 30 लाख फाइलों का महा-खुलासा: सोशल मीडिया के शोर के बीच इन डॉक्यूमेंट्रीज में छिपा है असली सच

    जेफ्री एपस्टीन की 30 लाख फाइलों का महा-खुलासा: सोशल मीडिया के शोर के बीच इन डॉक्यूमेंट्रीज में छिपा है असली सच


    नई दिल्ली।जेफ्री एपस्टीन का नाम सुनते ही दुनिया भर में एक बार फिर सनसनी फैल गई है। अमेरिकी न्याय विभाग DOJ ने जनवरी 2026 में 30 लाख से अधिक पन्नों की फाइलें सार्वजनिक की हैं, जिनमें रसूखदार लोगों के ईमेल, फोटो और चौंकाने वाले रिकॉर्ड शामिल हैं। यह पूरा मामला नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और अंतरराष्ट्रीय सेक्स ट्रैफिकिंग के नेटवर्क से जुड़ा है। इन फाइलों के बाहर आने के बाद सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अपुष्ट खबरों और वीडियो की बाढ़ आ गई है। ऐसे में इस जटिल और संवेदनशील केस की सच्चाई को समझने के लिए फैक्ट-बेस्ड डॉक्यूमेंट्रीज ही सबसे भरोसेमंद जरिया बनकर उभरी हैं।

    इस केस की शुरुआत को समझने के लिए नेटफ्लिक्स इंडिया पर उपलब्ध जेफ्री एपस्टीन: फिल्थी रिच सबसे सटीक चुनाव है। यह चार एपिसोड की डॉक्यूमेंट्री सीरीज एपस्टीन की अथाह दौलत और राजनीतिक पैठ के इस्तेमाल से बनाए गए ट्रैफिकिंग साम्राज्य को बेनकाब करती है। इसमें उन साहसी पीड़ितों के प्रत्यक्ष बयान दर्ज हैं, जिन्होंने सिस्टम से लड़कर अपनी आवाज बुलंद की। भारतीय दर्शकों के लिए यह सीरीज इस डरावने नेटवर्क को समझने का सबसे सरल और प्रभावशाली तरीका पेश करती है, जो दिखाता है कि कैसे सत्ता की आड़ में अपराध फलता-फूलता रहा।

    यदि आपकी रुचि पत्रकारिता और पावर की जंग में है, तो नेटफ्लिक्स की फिल्म स्कूप 2024 एक मास्टरपीस है। यह फिल्म उस ऐतिहासिक क्षण को दिखाती है जब बीबीसी की महिला पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर प्रिंस एंड्रयू का वह विनाशकारी इंटरव्यू लिया था। इस एक इंटरव्यू ने ब्रिटेन के शाही परिवार की नींव हिलाकर रख दी थी। यह फिल्म केवल अपराध नहीं दिखाती, बल्कि यह भी साबित करती है कि कैसे एक खोजी पत्रकार की हिम्मत दुनिया की सबसे बड़ी हस्तियों को कटघरे में खड़ा कर सकती है।

    डिजिटल प्लेटफॉर्म अमेज़न प्राइम वीडियो पर हाल ही में रिलीज हुई मिनी-सीरीज ए वेरी रॉयल स्कैंडल एपस्टीन और प्रिंस एंड्रयू के रिश्तों को और भी गहराई से फिल्मी अंदाज में पेश करती है। इसकी बेहतरीन एक्टिंग और थ्रिलर जैसा ड्रामा दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। यह सीरीज दिखाती है कि कैसे व्यक्तिगत संबंध राजनीतिक और सामाजिक पतन का कारण बन जाते हैं। इस स्कैंडल के हर पहलू को इतनी सूक्ष्मता से फिल्माया गया है कि दर्शक इसे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक गंभीर सबक के रूप में देखते हैं।

    सत्य और तथ्यों की तलाश करने वालों के लिए सीक्रेट्स ऑफ प्रिंस एंड्रयू Apple TV/YouTube और द प्रिंस एंड एपस्टीन स्कैंडल BBC जैसी डॉक्यूमेंट्रीज अनिवार्य हैं। इनमें कोर्ट में पेश किए गए ईमेल्स, फ्लाइट लॉग्स और उन तस्वीरों का बारीक जिक्र है, जिन्होंने दुनिया के बड़े नामों को एपस्टीन की संपत्तियों पर मौजूद साबित किया। इन शोज को देखकर साफ होता है कि एपस्टीन का मामला सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं था, बल्कि यह सिस्टम की कमजोरियों और दौलत के अहंकार का एक भयावह मेल था। सोशल मीडिया की अफवाहों से बचकर इन प्रामाणिक माध्यमों से सत्य को जानना ही आज की जरूरत है।

  • रूस ने व्हाट्सएप को किया पूरी तरह ब्लॉक… स्थानीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप

    रूस ने व्हाट्सएप को किया पूरी तरह ब्लॉक… स्थानीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप


    मास्को।
    रूस (Russia) ने मेटा (Meta) के स्वामित्व वाले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप (Messaging Platform Whatsapp) को स्थानीय कानूनों के कथित उल्लंघन के आरोप में ब्लॉक कर दिया है। क्रेमलिन ने गुरुवार को समाचार एजेंसी एएफपी से इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह निर्णय घरेलू कानूनों के अनुपालन न करने के कारण लिया गया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव (Dmitry Peskov) ने प्रतिबंध के बारे में पूछे जाने पर कहा कि वास्तव में ऐसा निर्णय लिया गया और उसे लागू किया गया है। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि व्हाट्सएप ने रूसी कानून के मानदंडों और अक्षरशः पालन करने में अनिच्छा दिखाई, जिसके बाद यह कदम उठाया गया।

    इससे पहले व्हाट्सएप ने दावा किया था कि रूसी अधिकारी ऐप तक पहुंच को सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं। कंपनी का यह बयान टेलीग्राम के संस्थापक पावेल दुरोव द्वारा मॉस्को पर अपने प्लेटफॉर्म की पहुंच बाधित करने का आरोप लगाने के तुरंत बाद आया।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी एक बयान में व्हाट्सएप ने कहा था कि आज रूसी सरकार ने लोगों को सरकारी निगरानी ऐप की ओर धकेलने के प्रयास में व्हाट्सएप को पूरी तरह से ब्लॉक करने की कोशिश की। 10 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं को निजी और सुरक्षित संचार से अलग करने का प्रयास एक पिछड़ा कदम है और इससे रूस में लोगों की सुरक्षा में कमी आएगी। हम उपयोगकर्ताओं को जोड़े रखने के लिए हर संभव प्रयास जारी रखेंगे।

    रूसी समाचार एजेंसी TASS से बातचीत में पेस्कोव ने संकेत दिया कि यदि इसकी मूल कंपनी मेटा स्थानीय नियमों का पालन करती है तो प्लेटफॉर्म को बहाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह रूसी कानूनों के अनुपालन का मामला है। यदि मेटा अनुपालन करती है, तो वह रूसी अधिकारियों के साथ बातचीत करेगी और फिर समझौते की संभावना बन सकती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कंपनी अपने रुख पर कायम रहती है और रूसी कानूनों का पालन करने में अनिच्छा दिखाती है, तो बहाली की संभावना नहीं होगी।

    इस बीच सरकारी एजेंसी TASS ने रिपोर्ट दी कि रूस के दूरसंचार नियामक Roskomnadzor ने राष्ट्रीय कानून के कथित उल्लंघन के आरोप में व्हाट्सएप की गति धीमी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। रूसी अधिकारियों का दावा है कि इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के आयोजन और क्रियान्वयन के लिए किया गया है। साथ ही इसे रूसी नागरिकों को निशाना बनाकर धोखाधड़ी और जबरन वसूली के प्रमुख माध्यमों में से एक बताया गया है।

    रिपोर्टों के अनुसार, सरकार समर्थित विकल्प ‘मैक्स’ नामक ऐप को रूस में बेचे जाने वाले सभी नए स्मार्टफोन और टैबलेट में पहले से इंस्टॉल करना अनिवार्य किया गया है। इस ऐप के जरिए उपयोगकर्ता संदेश भेजने, पैसे ट्रांसफर करने और ऑडियो-वीडियो कॉल करने जैसी सुविधाएं प्राप्त कर सकते हैं।

  • माइक्रोसॉफ्ट AI के CEO ने मचाई दुनिया में हलचल… बोले- 12 से 18 माह में व्हाइट-कॉलर जॉब्स की जगह ले लेगा AI

    माइक्रोसॉफ्ट AI के CEO ने मचाई दुनिया में हलचल… बोले- 12 से 18 माह में व्हाइट-कॉलर जॉब्स की जगह ले लेगा AI


    नई दिल्ली।
    माइक्रोसॉफ्ट एआई (Microsoft AI) के सीईओ मुस्तफा सुलेमान (CEO Mustafa Suleiman) का ताजा बयान एआई की दुनिया में तहलका मचा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में सुलेमान ने चेतावनी दी है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अगले 12 से 18 महीनों के भीतर अधिकांश व्हाइट-कॉलर नौकरियों (White-Collar Jobs) के ज्यादातर कामों को पूरी तरह से स्वचालित (ऑटोमेट) कर देगी। उन्होंने कहा कि व्हाइट-कॉलर जॉब्स, यानी वे काम जो लोग कंप्यूटर के सामने बैठकर करते हैं, चाहे वो वकील हों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, प्रोजेक्ट मैनेजर या मार्केटिंग प्रोफेशनल, इनमें से अधिकांश टास्क अगले 12-18 महीनों में एआई द्वारा पूरी तरह ऑटोमेट हो जाएंगे।


    एआई की मदद से कोडिंग

    उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का उदाहरण देते हुए बताया कि अब इंजीनियर एआई की मदद से अपना अधिकांश कोड बनवा रहे हैं। उनकी भूमिका अब ‘रणनीतिक’ कार्यों जैसे आर्किटेक्चर डिजाइन करने और उत्पादन में लाने की ओर स्थानांतरित हो गई है। सुलेमान के अनुसार, यह बदलाव पिछले छह महीनों में ही देखने को मिला है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि आज मौजूद एआई मॉडल अधिकांश मानव कोडर्स से बेहतर कोडिंग कर सकते हैं, शायद अब तक के सभी कोडर्स से भी बेहतर। उन्होंने जोर देकर कहा कि नए एआई मॉडल बनाना अब ‘पॉडकास्ट बनाने या ब्लॉग लिखने’ जितना आसान हो जाएगा। संस्थान और संगठन अपनी जरूरतों के अनुसार खुद एआई डिजाइन कर सकेंगे। इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि अगले दो से तीन वर्षों में एआई एजेंट बड़े संस्थानों के वर्कफ्लो को और भी कुशलता से संभालने में सक्षम हो जाएंगे।


    माइक्रोसॉफ्ट का सुपरइंटेलिजेंस मिशन

    अपने विजन के बारे में बात करते हुए सुलेमान ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट का लक्ष्य एक सुपरइंटेलिजेंस का निर्माण करना है। उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले कंपनी ने ओपनएआई के साथ दीर्घकालिक समझौते को फिर से बातचीत करके 2032 तक आईपी लाइसेंस बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि हमने यह भी तय किया है कि अब वास्तविक एआई आत्मनिर्भरता हासिल करने का समय आ गया है। सुलेमान ने माइक्रोसॉफ्ट के अपने स्वतंत्र बेसिक एआई मॉडल विकसित करने की योजना पर चर्चा की, जिसमें मजबूत प्रशिक्षण टीम होगी और डेटा को व्यवस्थित व क्रमबद्ध तरीके से तैयार किया जाएगा।

    माइक्रोसॉफ्ट एआई प्रमुख की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब एआई के कारण मानव कार्यों के प्रतिस्थापित होने और बड़े पैमाने पर छंटनी की चिंताएं बढ़ रही हैं। इससे पहले अमेजन ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा था कि एआई से जुड़ी बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण लगभग 16000 कंपनियों की नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। पिछले साल माइक्रोसॉफ्ट ने एक ब्लॉग पोस्ट में बताया था कि उसने ओपनएआई के साथ नए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो दोनों संगठनों के बीच मजबूत होती साझेदारी पर आधारित है। इस समझौते के तहत ओपनएआई माइक्रोसॉफ्ट का प्रमुख मॉडल पार्टनर बना रहेगा और दोनों कंपनियों के बीच अनन्य बौद्धिक संपदा अधिकारों का विस्तार होगा।

  • बांग्लादेश चुनाव में गठबंधन के साथ आगे चल रही BNP…. नतीजों पर भारत की पैनी नजर

    बांग्लादेश चुनाव में गठबंधन के साथ आगे चल रही BNP…. नतीजों पर भारत की पैनी नजर


    नई दिल्ली।
    बांग्लादेश चुनाव (Bangladesh Elections) पर भारत (India) की पैनी नजर बनी हुई है। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने बताया है कि पड़ोसी मुल्क के निमंत्रण के बाद भी भारत (India) की तरफ से पर्यवेक्षक (Supervisor) नहीं भेजे गए थे। साथ ही सरकार ने इसकी वजह भी बताई है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि तारिक रहमान (Tariq Rahman) की अगुवाई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (Bangladesh Nationalist Party) और गठबंधन के साथ चुनाव में आगे चल रहे हैं।


    भारत ने क्यों नहीं भेजे पर्यवेक्षक

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘हमें पर्यवेक्षक भेजने का निमंत्रण मिला था। हमने बांग्लादेश में अपने पर्यवेक्षकों को नहीं भेजा है।’ उन्होंने कहा, ‘बांग्लादेश में चुनाव हे रहा है। हमें चुनाव परिणामों का इंतजार करना चाहिए ताकि पता चल सके कि किस तरह का जनादेश आया है…और उसके बाद हम सामने आने वाले मुद्दों पर विचार करेंगे। चुनाव के संबंध में, आप जानते हैं कि हमारा रुख क्या रहा है। हम बांग्लादेश में स्वतंत्र, निष्पक्ष, समावेशी और विश्वसनीय चुनावों के पक्षधर हैं।’

    करीब 81 स्थानीय संगठनों के 55,454 पर्यवेक्षकों ने चुनाव की निगरानी की, जबकि विदेशी चुनाव पर्यवेक्षकों की संख्या 394 रही। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों में से 80 अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय संगठनों की तरफ से हैं, जबकि बाकी अलग-अलग देशों से हैं, जिनमें स्वतंत्र यूरोपीय पर्यवेक्षक भी शामिल हैं।


    किसके पक्ष में जा रहा है चुनाव

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुल 299 सीटों में से 174 निर्वाचन क्षेत्रों में मतगणना पूरी हो चुकी है। वहीं, 125 अभी बाकी हैं। बीएनपी और गठबंधन 135 पर आगे चल रहा है। वहीं, जमात और गठबंधन 34 पर आगे है। इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश 1 सीट पर आगे है। अन्य 4 पर बढ़त बनाए हुए है।


    बांग्लादेश चुनाव

    इस चुनाव में दो पूर्व सहयोगी दलों बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच सीधा मुकाबला है। जनमत सर्वेक्षणों में बीएनपी को मामूली बढ़त दी गई थी। गुरुवार को मुल्क की 300 में से 299 सीटों पर 60 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था। खास बात है कि अगस्त 2024 में हुई हिंसा और शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद पहली बार आम चुनाव हो रहे हैं।


    शेख हसीना की पार्टी का नाम ही नहीं

    बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शेख हसीना की अवामी लीग को पिछले साल भंग कर दिया था और पार्टी के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। बांग्लादेश में 30 साल के इतिहास में यह पहली बार है जब हसीना की अवामी लीग का चुनाव चिन्ह ‘नाव’ मतपत्र पर नहीं दिखाई दिया।

  • गाजा संघर्ष: युद्धविराम के बावजूद हिंसा जारी, मानवाधिकार संगठनों ने जांच की मांग की..

    गाजा संघर्ष: युद्धविराम के बावजूद हिंसा जारी, मानवाधिकार संगठनों ने जांच की मांग की..


    नई दिल्ली। वाशिंगटन/गाजा। गाजा संघर्ष में हालिया रिपोर्टों ने इजराइल पर कथित रूप से ‘वैक्यूम’ या थर्मोबैरिक बम इस्तेमाल करने के आरोप लगाए हैं। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इन आरोपों की गंभीरता पर ध्यान देते हुए जांच की मांग तेज कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार यह हथियार पहले हवा में ज्वलनशील कणों का बादल फैलाते हैं और फिर उसे विस्फोटित करते हैं, जिससे अत्यधिक ताप और दबाव उत्पन्न होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बंद या घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इसका असर व्यापक विनाशकारी होता है।

    गाजा की सिविल डिफेंस एजेंसियों के अनुसार कई घटनाओं में शव तक नहीं मिले और हजारों लोग अभी भी लापता हैं। आधिकारिक युद्धविराम लागू होने के बावजूद हिंसा जारी है। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, युद्धविराम के बाद भी सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं। इस स्थिति ने क्षेत्र में मानवीय संकट और सामाजिक अस्थिरता को और बढ़ा दिया है।

    मानवाधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि यदि घनी आबादी वाले क्षेत्रों में इस प्रकार के हथियारों का इस्तेमाल हुआ, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन माना जा सकता है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से तत्काल जांच की अपील की है। हालांकि इन आरोपों पर इजराइल की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से नहीं आई है।

    संघर्ष के कारण गाजा का बुनियादी ढांचा व्यापक रूप से क्षतिग्रस्त हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के आकलनों के अनुसार बड़ी आबादी विस्थापन, भोजन और पानी की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रही है। राहत एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि युद्ध की लंबी अवधि का प्रभाव क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर गहरा पड़ेगा।

    इसी बीच अमेरिका और इजराइल के शीर्ष नेतृत्व के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, मानवीय सहायता और युद्धविराम को लेकर उच्चस्तरीय बातचीत भी हुई। कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि चर्चा जारी है, लेकिन ठोस प्रगति की अभी पुष्टि नहीं हुई है। क्षेत्रीय स्थिरता, मानवाधिकारों की रक्षा और मानवीय सहायता वितरण इस समय अंतरराष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बने हुए हैं।

    वैश्विक समुदाय इस पर नजर बनाए हुए है कि क्या गाजा में हथियारों के कथित इस्तेमाल की जांच की जाएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। युद्धविराम के बावजूद जारी हिंसा और नागरिक हताहतों की संख्या ने अंतरराष्ट्रीय चिंता को और बढ़ा दिया है।