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  • ट्रप ने 500% तक टैरिफ की अनुमति वाले बिल को दी मंजूरी… भारत-चीन ही नहीं, EU के लिए भी बड़ा अलार्म

    ट्रप ने 500% तक टैरिफ की अनुमति वाले बिल को दी मंजूरी… भारत-चीन ही नहीं, EU के लिए भी बड़ा अलार्म


    नई दिल्‍ली.
    रूस (Russia) से पेट्रोलियम आयात (Import Petroleum) करने वाले देशों (Countries) पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देने वाले नए विधेयक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) द्वारा मंजूरी दिए जाने से दुनिया में खलबली मची है. यह कदम सिर्फ भारत और चीन की नींद उड़ाने वाला नहीं है, बल्कि यूरोपीय संघ के लिए भी एक बड़ा ‘अलार्म’ है. अक्सर माना जाता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का निशाना सिर्फ प्रतिद्वंद्वी देश होते हैं, लेकिन यह नया विधेयक एक अलग ही कहानी बयां कर रहा है. भले ही यूरोपीय संघ (EU) ने यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर मॉस्को की कड़ी निंदा की हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अब भी रूसी संसाधनों पर निर्भर है.

    यूरोपीय संघ (EU) में 27 सदस्य देश हैं, जिनमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, क्रोएशिया, साइप्रस, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, आयरलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्ज़मबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन और स्वीडन शामिल हैं. पहले ब्रिटेन (UK) भी ईयू में शामिल था लेकिन यह 2020 में इससे अलग हो गया था.

    ईयू भी खूब खरीद रहा रूसी तेल

    एक रिपोर्ट के अनुसार, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. फरवरी 2022 से अब तक रूस ने ईंधन निर्यात से लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर की कमाई की है. रूस के खजाने को भरने में तेल का हिस्सा 68 प्रतिशत रहा है, जबकि बाकी हिस्सा गैस और कोयले से आया है. आयातकों की सूची में चीन 245 अरब डॉलर की खरीद के साथ शीर्ष पर बैठा है, जबकि भारत 168 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है. यूरोपीय संघ ने 125 अरब डॉलर का रूसी ईंधन खरीदा है. यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि ट्रंप की ‘टैरिफ गन’ की रेंज में यूरोपीय संघ के देश भी आएंगे.

    ट्रंप की धमकी का भारत पर असर नहीं
    नवंबर में चीन का रूस से तेल आया थोड़ा घटा, वहीं भारत का आयात अक्टूबर के 2.5 अरब यूरो से बढ़कर नवंबर में 2.6 अरब यूरो हो गया. भारत ने हमेशा अपने ‘व्यावसायिक हितों’ और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखा है, लेकिन ट्रंप का यह 500% वाला नया समीकरण इस रणनीति की कड़ी परीक्षा लेने वाला है.

    दबाव की राजनीति या बातचीत का नया पैंतरा?
    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह कड़ा रुख वास्तव में रूस को झुकाने की सोची-समझी बिसात है. वे चाहते हैं कि रूस बातचीत की मेज पर आए और उन शर्तों को माने जो ट्रंप तय करना चाहते हैं. यह विधेयक रूस के आर्थिक रडार पर चलने वाले हर देश को एक संदेश है कि या तो वे अमेरिका के साथ व्यापार करें या फिर रूसी तेल की भारी कीमत चुकाने को तैयार रहें. हालांकि, ऊर्जा नीति विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा जैसे जानकारों का मानना है कि हमें जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए. उनका तर्क है कि विधेयक का पारित होना एक बात है और प्रशासन द्वारा उसे पूरी कड़ाई से लागू करना दूसरी.


    भारत की चुनौतियां

    रूस फिलहाल भारत के कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. हालांकि, लुकोइल और रोसनेफ्ट जैसी रूसी कंपनियों पर बढ़ते प्रतिबंधों के कारण आने वाले समय में भारत की खरीद में कुछ गिरावट की संभावना है. भारत ने अब तक पश्चिमी दबाव को दरकिनार कर सस्ते रूसी तेल के दम पर अपनी अर्थव्यवस्था को महंगाई से बचाया है, लेकिन यदि ट्रंप ने इस 500% टैरिफ के चाबुक को सच में चला दिया, तो भारत को अपने ऊर्जा विकल्पों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है.


    वैश्विक बाजार में अनिश्चितता का दौर

    क्या दुनिया वास्तव में रूस से पूरी तरह किनारा कर पाएगी? या ट्रंप का यह विधेयक केवल एक रणनीतिक दबाव है? फिलहाल पूरी दुनिया ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है. लेकिन एक बात तय है कि वैश्विक ऊर्जा की शतरंज पर अब अगली चाल वाशिंगटन की होगी, और उसकी गूंज नई दिल्ली से लेकर बर्लिन तक सुनाई देगी. आने वाले महीने यह तय करेंगे कि दुनिया की अर्थव्यवस्था तेल की चमक से रोशन होगी या टैरिफ की आग में झुलसेगी।

  • दिल्ली की मस्जिद के पास बुलडोजर चला तो पाकिस्तान बोला-'भारत में निशाने पर मुस्लिम इमारतें'

    दिल्ली की मस्जिद के पास बुलडोजर चला तो पाकिस्तान बोला-'भारत में निशाने पर मुस्लिम इमारतें'

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के मामले में नाक घुसाते हुए नई दिल्ली पर अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का आरोप लगाया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने दिल्ली के तुर्कमेनिस्तान गेट के पास स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के आस-पास चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे मुस्लिम विरासत के खिलाफ अभियान बताया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि हमने दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास चलाए गए अभियान पर नजर रखी है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अतिक्रमण विरोधी अभियान के बहाने मस्जिदों को निशाना बनाने के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित अभियान का हिस्सा है।

    पाकिस्तान फैलाने लगा प्रोपेगैंडा
    पाकिस्तानी प्रवक्ता ने कहा कि हम फैज-ए-इलाही मस्जिद के आस-पास मौजूद प्रॉपर्टी को गिराए जाने से चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि फैज-ए-इलाही मस्जिद सदियों पुरानी है और मुस्लिम सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती है। अंद्राबी ने पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा फैलाते हुए अतिक्रमण विरोधी अभियान को भारत में मुस्लिमों के खिलाफ RSS के बड़े अभियान का हिस्सा बता दिया। यही नहीं पाकिस्तानी प्रवक्ता ने संयुक्त राष्ट्र से भारत में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की अपील कर डाली।

    क्या है पूरा मामला?
    दिल्ली के तुर्कमेनिस्तान गेट के पास स्थित सैयद फैज-ए-इलाही से सटे इलाके में अतिक्रमण के खिलाफ बुधवार सुबह तड़के अभियान चलाया गया था। यह अभियान दिल्ली नगर निगम (MCD) ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद चलाया था।

    पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा के उलट एमसीडी के एक अधिकारी ने बताया था कि अभियान के दौरान मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।

    इस पूरी कार्रवाई के दौरान मस्जिद के पास इलाके में अवैध घोषित प्रॉपर्टी को ही ढहाया गया। दिल्ली पुलिस ने बताया था कि मस्जिद के पास की जमीन एमसीडी की है और उसने अभियान चलाने से पहले पुलिस को सूचना दी थी। वहीं, एमसीडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अभियान के दौरान 36,000 वर्ग फुट क्षेत्र से अतिक्रमण हटाया गया। इसमें एक मैरिज हॉल और औषधालय और दो मंजिला चहारदीवारी भी शामिल थी। अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान कुछ उपद्रवियों ने पथराव करके अशांति फैलाने का प्रयास किया जिसके बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा था।

  • राज्यपाल सीवी आनंद बोस को बम से उड़ाने की धमकी! पश्चिम बंगाल में हाई अलर्ट

    राज्यपाल सीवी आनंद बोस को बम से उड़ाने की धमकी! पश्चिम बंगाल में हाई अलर्ट

    पश्चिम बंगाल । पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस को ईमेल के जरिए जान से मारने की धमकी मिलने के बाद राज्य और केंद्र की सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हो गई हैं। ‘बम से उड़ा देंगे’ जैसे गंभीर शब्दों वाली इस धमकी के बाद पूरे सुरक्षा तंत्र को हाई अलर्ट पर रखा गया है। राज्य पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त तैनाती के बीच राज्यपाल की जेड-प्लस सुरक्षा को और मजबूत किया गया है, जबकि धमकी देने वाले की पहचान और गिरफ्तारी के लिए साइबर और तकनीकी जांच तेज कर दी गई है।

    दरअसल, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस को गुरुवार देर रात एक ईमेल के जरिए जान से मारने की धमकी मिलने से प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है। धमकी भरे ईमेल में साफ शब्दों में लिखा गया कि राज्यपाल को बम से उड़ा दिया जाएगा। इस गंभीर मामले के सामने आते ही पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट कर दिया गया और आधी रात को उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठक बुलाई गई।

    लोक भवन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह ईमेल रात करीब 11 बजे प्राप्त हुआ, जिसके तुरंत बाद राज्यपाल की सुरक्षा में तैनात एजेंसियों ने स्थिति की समीक्षा की। मामले की जानकारी पश्चिम बंगाल के डीजीपी, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी दे दी गई है।

    ईमेल में मोबाइल नंबर, जांच तेज

    इस मामले में एक अधिकारी ने बताया, धमकी देने वाले व्यक्ति ने ईमेल में अपना मोबाइल नंबर भी दिया है। इससे जांच एजेंसियों को तकनीकी तौर पर बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है। पुलिस का साइबर सेल ईमेल की आईपी ट्रैकिंग, मोबाइल नंबर की लोकेशन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड खंगालने में जुटा है। आरोपी को जल्द गिरफ्तार करने के लिए विशेष टीमें गठित कर दी गई हैं और यह भी जांच की जा रही है कि धमकी किसी संगठित साजिश या आतंकी नेटवर्क से तो जुड़ी नहीं है। धमकी के बाद राज्यपाल सीवी आनंद बोस की सुरक्षा को और मजबूत कर दिया गया है। उन्हें पहले से ही जेड-प्लस श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन अब इसमें अतिरिक्त केंद्रीय बल जोड़े गए हैं।

    अधिकारियों के मुताबिक, राज्य पुलिस और सीआरपीएफ के बीच समन्वय के तहत राज्यपाल की सुरक्षा में लगभग 60 से 70 केंद्रीय पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया है। राजभवन परिसर में अतिरिक्त सीसीटीवी कैमरे, ड्रोन निगरानी और प्रवेश बिंदुओं पर सख्त चेकिंग की जा रही है। राज्यपाल के आवागमन के दौरान बुलेटप्रूफ वाहनों और एस्कॉर्ट की संख्या भी बढ़ा दी गई है।

    राज्य और केंद्र सतर्क

    इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय लगातार राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में है। केंद्र ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि राज्यपाल की सुरक्षा में किसी भी स्तर पर कोई चूक न हो। राज्य पुलिस को भी अतिरिक्त संसाधन और बल मुहैया कराए गए हैं।

    राजनीतिक घमासान तेज

    राज्यपाल को मिली धमकी के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर तीखा हमला बोला है। बीजेपी नेताओं ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति भी सुरक्षित नहीं हैं।

    भाजपा नेताओं का कहना है कि यह घटना राज्य में बढ़ते अपराध और राजनीतिक हिंसा का प्रमाण है। पार्टी ने मांग की है कि राज्य सरकार कानून-व्यवस्था पर तुरंत नियंत्रण करे और इस मामले में पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित करे। वहीं, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भाजपा के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि राज्य पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है और आरोपी को जल्द पकड़ लिया जाएगा।

    पहले भी मिल चुकी हैं धमकियां

    आपको बतादें कि यह पहली बार नहीं है जब राज्यपाल सीवी आनंद बोस को धमकी मिली हो। पिछले कुछ वर्षों में उन्हें ईमेल और फोन के जरिए धमकियां मिलती रही हैं, जिसके चलते उनकी सुरक्षा को क्रमशः बढ़ाया गया था। मौजूदा घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था की दोबारा व्यापक समीक्षा की जा रही है। गौरतलब है कि इस धमकी ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • जिनपिंग बनने जा रहे 'शांति दूत'; चीन की मदद से सुधरेंगे उत्तर और दक्षिण कोरिया के रिश्ते?

    जिनपिंग बनने जा रहे 'शांति दूत'; चीन की मदद से सुधरेंगे उत्तर और दक्षिण कोरिया के रिश्ते?


    वीजिंग। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से एक महत्वपूर्ण अपील की है। उत्तर कोरिया के परमाणु संकट को सुलझाने और दोनों कोरियाई देशों के बीच बढ़ती शत्रुता को कम करने के लिए उन्होंने चीन से शांति मध्यस्थ की भूमिका निभाने का आग्रह किया है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्योंग ने बुधवार को कहा कि उन्होंने उत्तर कोरियाई परमाणु संकट के समाधान और दोनों कोरियाई देशों के बीच शत्रुता कम करने में मदद के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मध्यस्थता करने का अनुरोध किया है।
    म्योंग ने कहा कि उन्होंने यह अनुरोध दोनों नेताओं के इस सप्ताह की शुरुआत में बीजिंग में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान किया था।

    दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ने अपने बयान में कहा कि हम प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उत्तर कोरिया के साथ हमारे सभी संपर्क चैनल पूरी तरह से बंद हैं, इसलिए हम बिल्कुल संवाद नहीं कर पा रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि चीन का शांति के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाना अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हमारे प्रयासों की सराहना की और कहा कि धैर्य रखने की जरूरत है।

    चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और प्रमुख कूटनीतिक समर्थक है। दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने बार-बार चीन से अपने प्रभाव का उपयोग करके उत्तर कोरिया को लंबे समय से ठप पड़ी कूटनीति को फिर से शुरू करने या परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए मनाने का आग्रह किया है।

    चीन ने उत्तर कोरिया से जुड़े मुद्दों में शामिल सभी पक्षों से संयम बरतने का आह्वान किया है। उसने हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत प्रतिबंधित हथियारों के परीक्षणों के बावजूद उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध कड़े करने के अमेरिका और अन्य देशों के प्रयासों को रोक दिया है।

    उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया और अमेरिका के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया है और 2019 में उसके नेता किम जोंग उन की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उच्च स्तरीय परमाणु कूटनीति विफल होने के बाद से अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार करने के कदम उठाए हैं।

  • कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश

    कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश


    वाशिंगटन । हाल ही में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के ‘अपहरण’ के बाद लैटिन अमेरिका में तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब कोलंबिया, क्यूबा और मैक्सिको को भी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि यदि ये देश अपना रवैया नहीं सुधारते हैं तो अमेरिका कार्रवाई करेगा। उन्होंने इस रुख को मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कदम और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी हितों की सुरक्षा से जोड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन देशों की सेनाएं दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का सामना करने में सक्षम हैं?

    सैन्य शक्ति में भारी असमानता
    इन बयानों ने लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दखल को लेकर पुराने तनावों को फिर जीवित कर दिया है।

    जिन देशों को चेतावनी दी गई है, वे वॉशिंगटन के हस्तक्षेप के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन उनकी सेनाओं की क्षमता अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है। अमेरिका की सैन्य ताकत दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। 2025 में उसका रक्षा बजट 895 अरब डॉलर रहा- जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.1 प्रतिशत है। 2025 की ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग के अनुसार ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे शक्तिशाली सेना है और वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है। सक्रिय सैनिकों की संख्या, लड़ाकू विमान, टैंक, नौसैनिक संसाधन और सैन्य बजट- हर पैमाने पर ये देश अमेरिका से काफी पीछे हैं। पारंपरिक युद्ध में अमेरिकी बढ़त स्पष्ट है। लैटिन अमेरिकी सेनाएं अमेरिकी हस्तक्षेप का प्रभावी मुकाबला करने में असमर्थ हैं। हालांकि, कुछ देशों में पैरामिलिट्री फोर्सेस (अर्द्धसैनिक बल) मजबूत हैं, जो असममित युद्ध (गुरिल्ला टैक्टिक्स) में इस्तेमाल हो सकते हैं।

    अर्धसैनिक बल: लैटिन अमेरिका का गुप्त हथियार
    ऊपर कुछ प्रमुख लैटिन अमेरिकी देशों के नाम दिए गए हैं। लेकिन मुख्य खतरा केवल चार देशों- क्यूबा, कोलंबिया, वेनेजुएला और मेक्सिको पर मंडरा रहा है। इनमें वेनेजुएला पर अमेरिका पहले ही हमला कर उसके राष्ट्रपति को पकड़ लाया है। हालांकि एक क्षेत्र ऐसा है जहां इन देशों के पास तुलनात्मक बढ़त मानी जाती है और वे अमेरिका को नाकों चने चबा सकते हैं।

    ये हैं उनके अर्धसैनिक (पैरामिलिट्री) बल। ये समूह अक्सर नियमित सेनाओं के समानांतर काम करते हैं और असममित युद्ध व अपरंपरागत रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

    क्यूबा के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल बताया जाता है- करीब 11.4 लाख सदस्य। इनमें देश-नियंत्रित मिलिशिया और पड़ोस आधारित रक्षा समितियां शामिल हैं। सबसे बड़ा संगठन ‘टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया’ है, जो बाहरी खतरों या आंतरिक संकट में नियमित सेना की सहायता के लिए नागरिक रिजर्व के रूप में काम करता है।

    वेनेजुएला में सरकार समर्थक नागरिक सशस्त्र समूह- जिन्हें “कोलेक्टिवोस” कहा जाता है पर राजनीतिक नियंत्रण लागू करने और विरोधियों को डराने के आरोप लगते रहे हैं। औपचारिक रूप से ये सशस्त्र बलों का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि राष्ट्रपति मादुरो के शासन में इन्हें राज्य का संरक्षण मिलता रहा है।

    कोलंबिया में 1980 के दशक में दक्षिणपंथी अर्धसैनिक समूह उभरे थे, जिनका उद्देश्य वामपंथी विद्रोहियों से लड़ना था। 2000 के दशक के मध्य में इनके औपचारिक विमोचन के बावजूद, कई समूह बाद में आपराधिक या नियो-पैरामिलिट्री संगठनों के रूप में फिर सक्रिय हो गए। शुरुआती दौर में इनका गठन शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी काउंटर-इंसर्जेंसी सलाहकारों के मार्गदर्शन में कोलंबियाई सेना की भागीदारी से हुआ था।

    मेक्सिको में भारी हथियारों से लैस ड्रग कार्टेल- जैसे जेटास व्यवहार में अर्धसैनिक ताकत की तरह काम करते हैं।

    पूर्व सैनिकों द्वारा बनाए गए इन समूहों के पास सैन्य-स्तरीय हथियार हैं और वे कई इलाकों में क्षेत्रीय नियंत्रण रखते हैं, जिससे स्थानीय पुलिस पर भारी पड़ते हैं। इसी कारण मैक्सिकन सेना को कानून-व्यवस्था में तैनात करना पड़ा है।
    किस देश के पास कितने अर्द्धसैनिक बल?
    क्यूबा, वेनेजुएला, कोलंबिया और मैक्सिको दुनिया के कुछ सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बलों (पैरामिलिट्री फोर्सेस) वाले देशों में शामिल हैं। ग्लोबल फायरपावर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फोर्सेस इस प्रकार हैं: सबसे ज्यादा बांग्लादेश में 68 लाख, भारत में 25.27 लाख, क्यूबा में 11.45 लाख, चीन में 6.25 लाख, सर्बिया में 6 लाख, पाकिस्तान में 5 लाख, मिस्र में 3 लाख, इंडोनेशिया में 2.5 लाख, रूस में 2.5 लाख, वियतनाम में 2.5 लाख, ईरान में 2.2 लाख, वेनेजुएला में 2.2 लाख, ब्राजील में 2 लाख, अल्जीरिया में 1.5 लाख, कोलंबिया में 1.5 लाख, फ्रांस में 1.5 लाख, सऊदी अरब में 1.5 लाख, तुर्की में 1.5 लाख, लाओस में 1.2 लाख और मैक्सिको में 1.2 लाख सदस्य हैं। इनमें क्यूबा की टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया जैसी इकाइयां, वेनेजुएला के प्रो-गवर्नमेंट कोलेक्टिवोस, कोलंबिया के विभिन्न पैरामिलिट्री ग्रुप्स और मैक्सिको की सुरक्षा बल प्रमुख हैं, जो आंतरिक सुरक्षा और रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    अमेरिकी हस्तक्षेप का लंबा इतिहास
    पिछले दो सौ वर्षों में अमेरिका ने कई बार लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप किया है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में ‘बनाना वॉर्स’ के दौरान अमेरिकी सेनाएं मध्य अमेरिका में कॉरपोरेट हितों की सुरक्षा के लिए तैनात रहीं।
    1934 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने ‘गुड नेबर पॉलिसी’ के तहत गैर-हस्तक्षेप का वादा किया।

    लेकिन शीत युद्ध के दौरान स्थिति बदली। 1947 में स्थापित अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के समन्वय से अमेरिका ने कई निर्वाचित सरकारों को गिराने के अभियानों को फंड किया। पनामा एकमात्र लैटिन अमेरिकी देश है, जहां अमेरिका ने औपचारिक रूप से सैन्य हमला किया। इसने 1989 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के नेतृत्व में Operation Just Cause चलाया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा को हटाना था, जिन्हें बाद में ड्रग तस्करी सहित अन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पूर्ण युद्ध होता है, तो लैटिन अमेरिकी देशों की नियमित सेनाएं अमेरिकी तकनीक और वायु सेना का मुकाबला नहीं कर पाएंगी। हालांकि, इन देशों में मौजूद विशाल अर्धसैनिक नेटवर्क और छापामार लड़ाके अमेरिका के लिए किसी भी जमीनी कार्रवाई को बेहद जटिल और खूनी बना सकते हैं।

  • ड्रीम मिलिट्री बनाने ट्रंप का 1.5 ट्रिलियन बजट का ऐलान; भारत भी पीछे नहीं

    ड्रीम मिलिट्री बनाने ट्रंप का 1.5 ट्रिलियन बजट का ऐलान; भारत भी पीछे नहीं

    वाशिंगटन। अमेरिका 2027 में रक्षा पर पहले से ज्यादा खर्च करने पर विचार कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रक्षा बजट बढ़ाने की बात कही है। साथ ही उन्होंने ज्यादा खर्च करने की क्षमता की वजह टैरिफ से होने वाली कमाई को बताया है। डिफेंस बजट बढ़ाए जाने की तैयारी ऐसे समय पर हो रही है, जब ट्रंप ने हाल ही में वेनेजुएला पर ऐक्शन लिया है और कई देशों पर कार्रवाई के संकेत दे रहे हैं।
    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘सीनेटर्स, कांग्रेसमैन, सेक्रेटरी और अन्य राजनेताओं से लंबी और मुश्किल बातचीत के बाद, मैंने तय किया है कि हमारी देश की भलाई के लिए 2027 के लिए सैन्य बजट 1 ट्रिलियन डॉलर की जगह 1.5 ट्रिलियन डॉलर होगा। खासतौर से ऐसे मुश्किल भरे और खतरनाक समय में।’

    उन्होंने कहा कि ज्यादा खर्च के जरिए अमेरिका ऐसी सेना तैयार कर सकता है, जो किसी भी दुश्मन से देश को सुरक्षित रख सके। अमेरिकी राष्ट्रपति इसे ‘ड्रीम मिलिट्री’ बता रहे हैं।
    टैरिफ को बताया वजह

    ट्रंप ने टैरिफ से होने वाली कमाई का हवाला देते हुए खर्च बढ़ाने की बात कही है। उन्होंने कहा, ‘अगर अन्य देशों से टैरिफ (सीमा शुल्क) के माध्यम से इतनी बड़ी मात्रा में राशि प्राप्त न हो रही होती, जिनमें से कई देशों ने अतीत में संयुक्त राज्य अमेरिका को ऐसे स्तरों पर ‘लूटा’ है जो पहले कभी नहीं देखे गए, तो मैं 1 ट्रिलियन डॉलर की संख्या पर ही टिका रहता।’

    भारत का कितना था 2025 का बजट

    साल 2025-26 के लिए रक्षा मंत्रालय को 6.81 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था। खास बात है कि आंकड़े में 2024-25 की तुलना में 9.53 प्रतिशत का इजाफा किया गया था।

    रक्षा मंत्रालय की 1 फरवरी 2025 को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, सशस्त्र बलों के पूंजीगत बजट के तहत 1.80 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। साथ ही घरेलू रक्षा उद्योगों से खरीद के लिए 1.12 लाख करोड़ रुपये निर्धारित हुए। रक्षा अनुसंधान और विकास बजट में 12% की बढ़त हुई थी। भारतीय तटरक्षक बल के पूंजी बजट में 43% की उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई थी।

  • अमेरिकी सेना ने रूसी तेल टैंकर को किया जब्त, हो सकता है महासंग्राम

    अमेरिकी सेना ने रूसी तेल टैंकर को किया जब्त, हो सकता है महासंग्राम

    वाशिंगटन। अमेरिका ने उत्तरी अटलांटिक और कैरिबियन में एक के बाद एक की गई कार्रवाइयों में वेनेजुएला से जुड़े दो प्रतिबंधित तेल टैंकरों को जब्त कर लिया है।
    अमेरिकी यूरोपीय कमान ने “अमेरिकी प्रतिबंधों के उल्लंघन” के आरोप में व्यापारिक पोत बेला 1 को जब्त करने की घोषणा की। तटरक्षक बल के एक कटर ने टैंकर का पीछा करते हुए उसे स्कॉटलैंड और आइसलैंड के बीच के जलक्षेत्र में धकेल दिया, जब उसने वेनेजुएला के आसपास प्रतिबंधित तेल जहाजों पर अमेरिकी नाकाबंदी से बचने की कोशिश की।

    इसके बाद, गृह सुरक्षा सचिव क्रिस्टी नोएम ने खुलासा किया कि अमेरिकी सेना ने कैरिबियन में टैंकर सोफिया पर भी नियंत्रण कर लिया है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि दोनों जहाज “या तो आखिरी बार वेनेजुएला में रुके थे या उसकी ओर जा रहे थे।”

    जानें अमेरिकी अधिकारी ने क्या कहा

    यूरोप की ओर मुड़ने के बाद बेला 1 को रूसी ध्वज के तहत पंजीकृत किया गया और उसका नाम बदलकर मरीनरा कर दिया गया।

    एक अमेरिकी अधिकारी ने, जिन्होंने संवेदनशील सैन्य अभियानों पर चर्चा करने के लिए नाम न छापने की शर्त पर बुधवार को एसोसिएटेड प्रेस से बात की, बताया कि अमेरिकी सेना ने इसे जब्त करने के बाद कानून प्रवर्तन अधिकारियों को इसका नियंत्रण सौंप दिया। ईरान समर्थित लेबनानी आतंकवादी समूह हिज़्बुल्लाह से जुड़ी एक कंपनी के लिए माल की तस्करी करने के आरोप में इस जहाज पर 2024 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था।

    एसोसिएटेड प्रेस ने अमेरिकी सेना के हवाले से बताया कि बुधवार को संयुक्त राज्य अमेरिका ने अटलांटिक महासागर में दो सप्ताह से अधिक समय तक चले पीछा करने के बाद वेनेजुएला से जुड़े एक रूसी ध्वज वाले तेल टैंकर को जब्त कर लिया, जबकि एक रूसी पनडुब्बी और युद्धपोत भी पास ही थे।

    रूसी विदेश मंत्रालय ने क्या कहा

    रूसी विदेश मंत्रालय ने जहाज़ ज़ब्त किए जाने से पहले कहा था कि वह रूसी तेल टैंकर मेरिनेरा के आसपास पैदा हुई असामान्य स्थिति पर नज़र रख रहा है। आधिकारिक समाचार एजेंसी तास द्वारा प्रकाशित मंत्रालय के बयान में आगे कहा गया कि “पिछले कई दिनों से अमेरिकी तटरक्षक बल का एक जहाज़ मेरिनेरा का पीछा कर रहा है, जबकि हमारा जहाज़ अमेरिकी तट से लगभग 4,000 किलोमीटर दूर है।” बुधवार को सार्वजनिक समुद्री ट्रैकिंग साइटों ने जहाज़ की स्थिति स्कॉटलैंड और आइसलैंड के बीच उत्तर की ओर बढ़ते हुए दिखाई। अमेरिकी अधिकारी ने भी पुष्टि की कि जहाज़ उत्तरी अटलांटिक में था।

    रूस के परिवहन मंत्रालय ने बुधवार को एक बयान में कहा कि अमेरिकी नौसेना बलों ने “किसी भी देश के क्षेत्रीय जलक्षेत्र के बाहर” मरीनरा टैंकर पर कब्जा कर लिया और “जहाज से संपर्क टूट गया।” मंत्रालय ने कहा कि 24 दिसंबर, 2025 को जहाज को “रूसी कानून और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार जारी रूसी संघ का ध्वज फहराने का अस्थायी परमिट प्राप्त हुआ था।”

    जब्ती की खबर के तुरंत बाद, परिवहन मंत्रालय के बयान में कहा गया कि “किसी भी देश को अन्य देशों के अधिकार क्षेत्र में विधिवत पंजीकृत जहाजों के खिलाफ बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है,” और इसके लिए 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन का हवाला दिया गया।

  • अब ट्रंप भारतीय छात्रों से बोले- आपको अमेरिका से कभी भी निकाला जा सकता है

    अब ट्रंप भारतीय छात्रों से बोले- आपको अमेरिका से कभी भी निकाला जा सकता है

    वॉशिंगटन । भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में पिछले कुछ महीनों में दरार देखने को मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विभिन्न फैसलों और बयानों से दोनों देशों में तनाव और बढ़ा है। इस बीच, अमेरिका ने बुधवार को अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को चेतावनी दी है। भारत में अमेरिकी दूतावास ने दो टूक कहा है कि अमेरिकी कानूनों को तोड़ने से स्टूडेंट वीजा रद्द हो सकता है और यहां तक कि आपको देश से भी निकाला जा सकता है।

    भारत में अमेरिकी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”अमेरिकी कानूनों को तोड़ने पर आपके स्टूडेंट वीजा के लिए गंभीर नतीजे हो सकते हैं।

    अगर आपको गिरफ्तार किया जाता है या आप कोई कानून तोड़ते हैं, तो आपका वीजा रद्द किया जा सकता है, आपको देश से निकाला जा सकता है, और आप भविष्य में अमेरिकी वीजा के लिए अयोग्य हो सकते हैं। नियमों का पालन करें और अपनी यात्रा को खतरे में न डालें। अमेरिकी वीजा एक सुविधा है, अधिकार नहीं।”

    अमेरिकी दूतावास समय-समय पर सोशल मीडिया के जरिए चेतावनियां जारी करता रहता है। पिछले दिनों उसने भारत से अमेरिका जाने वाले अवैध अप्रवासियों को एक सख्त पब्लिक चेतावनी जारी की थी।

    चेतावनी में साफ कहा गया कि इमिग्रेशन कानूनों का उल्लंघन करने पर ‘बड़ी क्रिमिनल सजा’ हो सकती है। चेतावनी का यह मैसेज सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, और यह यूनाइटेड स्टेट्स के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन में इमिग्रेशन पर बढ़ती सख्ती के दौरान आया।

    अमेरिकी दूतावास ने एक्स पर लिखा था कि अगर आप अमेरिकी कानून तोड़ते हैं, तो आपको कड़ी क्रिमिनल सजा मिलेगी। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन अमेरिका में गैर-कानूनी इमिग्रेशन को खत्म करने और हमारे देश की सीमाओं और हमारे नागरिकों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। वीजा नियमों के सख्त होने के कारण, पिछले साल नए इंटरनेशनल एनरोलमेंट में अमेरिका में स्टूडेंट वीजा पर आने वालों की संख्या में 17% की गिरावट आई है। इस बीच, H-1B वीजा आवेदकों को, जो कुशल इंटरनेशनल कर्मचारियों को अमेरिका में रोजगार खोजने की अनुमति देता है, अभूतपूर्व इंतजार का सामना करना पड़ रहा है।

  • वेनेजुएला अब अमेरिका में बने उत्पाद ही खरीद सकता है … ट्रंप ने जारी किया नया फरमान

    वेनेजुएला अब अमेरिका में बने उत्पाद ही खरीद सकता है … ट्रंप ने जारी किया नया फरमान


    वॉशिंग्टन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को बड़ी घोषणा करते हुए वेनेजुएला (Venezuela) के लिए नया फरमान जारी कर दिया है। ट्रंप ने कहा है कि वेनेजुएला अब नए तेल सौदे से मिलने वाले पैसे से सिर्फ अमेरिकी-निर्मित उत्पाद (American-Made Products) ही खरीदेगा। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने देश के राष्ट्रपति मादुरो को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं देश की उपराष्ट्रपति ने फिलहाल यह जिम्मेदारी संभालते हुए अमेरिका के साथ सहयोग की बात कही है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा, “मुझे अभी-अभी बताया गया है कि वेनेजुएला हमारे साथ हुए नए तेल सौदे से मिलने वाले पैसे से सिर्फ अमेरिकी-निर्मित उत्पाद खरीदने जा रहा है। इनमें अमेरिकी कृषि उत्पाद, अमेरिका में बनीं दवाएं, मेडिकल उपकरण, और वेनेजुएला के इलेक्ट्रिक ग्रिड और ऊर्जा सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए उपकरण शामिल होंगे।”

    ट्रंप ने आगे कहा, “दूसरे शब्दों में वेनेजुएला अमेरिका को अपना मुख्य भागीदार बनाकर व्यापार करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह एक समझदारी भरा फैसला है और वेनेजुएला और अमेरिका के लोगों के लिए बहुत अच्छी बात। इस मामले पर आपके ध्यान के लिए धन्यवाद!”


    अमेरिका ही लेगा फैसले

    वहीं बुधवार को वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिना लेविट ने एक ब्रीफिंग के दौरान कहा था कि ट्रंप प्रशासन वेनेजुएला के अंतरिम नेताओं के साथ संपर्क में है। लेविट ने बताया, “ट्रंप सरकार वेनेजुएला में अंतरिम अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में है। अभी वेनेजुएला में अंतरिम अधिकारियों पर हमारा सबसे ज्यादा कंट्रोल है… उनके फैसले अमेरिका ही लेगा।”


    5 करोड़ बैरल तेल खरीदेगा अमेरिका

    इससे पहले मंगलवार को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वेनेजुएला की अंतरिम सरकार अमेरिका को बाजार मूल्य पर तीन से पांच करोड़ बैरल ‘उच्च गुणवत्ता’ वाला तेल उपलब्ध कराएगा। ट्रंप ने लिखा था कि तेल जहाजों द्वारा सीधे अमेरिका पहुंचाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि राष्ट्रपति के रूप में इस पैसे पर उनका नियंत्रण होगा लेकिन इसका उपयोग वेनेजुएला और अमेरिका के लोगों की भलाई के लिए किया जाएगा।

  • अमेरिकी दस्तावेजों से खुलासा: ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका में की 60 बार लॉबिंग

    अमेरिकी दस्तावेजों से खुलासा: ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका में की 60 बार लॉबिंग


    नई दिल्ली । पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की संभावित सैन्य कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान की बेचैनी अमेरिकी दस्तावेजों में उजागर हुई है। FARA के तहत दाखिल रिकॉर्ड बताते हैं कि पाकिस्तान ने भारत के सैन्य अभियान को रोकने के लिए अमेरिका में बड़े स्तर पर कूटनीतिक और राजनीतिक लॉबिंग की। इस दौरान पाकिस्तानी राजनयिकों और लॉबिंग फर्मों ने अमेरिकी प्रशासन सांसदों पेंटागन और विदेश विभाग के अधिकारियों से करीब 60 बार संपर्क किया।दस्तावेजों के मुताबिक यह अभियान अप्रैल के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर भारत के चार दिवसीय सैन्य अभियान के बाद तक जारी रहा। पाकिस्तान का उद्देश्य स्पष्ट था-वॉशिंगटन के जरिए भारत पर दबाव बनाना ताकि किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई को रोका जा सके। इसके लिए ईमेल फोन कॉल और आमने-सामने की बैठकों का सहारा लिया गया।

    लॉबिंग पर करोड़ों का खर्च

    FARA रिकॉर्ड के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिका में छह लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लीं और इस पर करीब 45 करोड़ रुपये खर्च किए। रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल और मई के दौरान पाकिस्तान का लॉबिंग खर्च भारत की तुलना में कहीं अधिक रहा। पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रशासन तक अपनी पहुंच बढ़ाने और व्यापार एवं कूटनीतिक फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश की।सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान ने भारत की सैन्य तैयारी को क्षेत्रीय अस्थिरता के रूप में पेश किया और अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग की। हालांकि इन लॉबिंग प्रयासों का भारत की रणनीति पर कोई असर नहीं पड़ा। भारत ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को प्राथमिकता देते हुए कदम उठाए।

    भारत का रुख स्पष्ट

    भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका में लॉबिंग एक कानूनी और स्थापित प्रक्रिया है। विदेशी सरकारें दूतावास निजी कंपनियां और व्यावसायिक संगठन लॉबिंग फर्मों के माध्यम से अपनी बात रखते हैं। भारत का दूतावास भी दशकों से जरूरत के अनुसार ऐसी सेवाओं का इस्तेमाल करता रहा है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि FARA के तहत सभी लॉबिंग गतिविधियों का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और इसे गुप्त या असामान्य गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए।

    रणनीतिक संदेश और आगे की तस्वीर

    विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान की आक्रामक लॉबिंग यह दर्शाती है कि वह भारत की सैन्य क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति को लेकर गंभीर दबाव में था। इसके बावजूद भारत ने किसी भी दबाव में समझौता नहीं किया। अमेरिकी दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट हुआ कि आतंकवाद और सुरक्षा मामलों में भारत का रुख अब पहले से अधिक सख्त और निर्णायक है।