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  • बलूचिस्तान ने 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने का किया ऐलान, अंतरराष्ट्रीय समर्थन की भी अपील

    बलूचिस्तान ने 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने का किया ऐलान, अंतरराष्ट्रीय समर्थन की भी अपील


    नई दिल्ली ।
    बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी संगठनों ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस आयोजित करने की औपचारिक घोषणा की है, साथ ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से समर्थन की अपील की है। इस रणनीतिक घोषणा के सामने आने के बाद बलूचिस्तान का संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर वैश्विक कूटनीतिक मंचों पर सुर्खियों में आ गया है। बलोच नेतृत्व का तर्क है कि 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान को संप्रभु घोषित किया गया था, इसलिए उसी ऐतिहासिक संदर्भ में हर साल इस तिथि को स्वाधीनता दिवस के रूप में याद किया जाएगा।

    राष्ट्रवादी गुटों की ओर से जारी सार्वजनिक बयान में नागरिकों से अपने आवासों, व्यावसायिक केंद्रों और प्रमुख स्थलों पर प्रस्तावित रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का ध्वज फहराने का आह्वान किया गया है। इसके अतिरिक्त, दुनिया भर के अलग-अलग मुल्कों में निवास करने वाले बलोच प्रवासियों से भी इस दिन विशेष जागरूकता कार्यक्रम और रैलियां आयोजित करने का आग्रह किया गया है। बलोच प्रतिनिधियों का मानना है कि यह आयोजन उनकी ऐतिहासिक अस्मिता और दीर्घकालिक राजनीतिक आकांक्षाओं को मजबूती से रेखांकित करेगा।

    अपने आधिकारिक वक्तव्य में बलोच नेताओं ने इस्लामाबाद की शासन नीतियों की सख्त आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि यह क्षेत्र दशकों से मानवाधिकारों के उल्लंघन और गंभीर सुरक्षा संकट से जूझ रहा है। उनका तर्क है कि केंद्रीय नीतियों के चलते बलूचिस्तान का बुनियादी ढांचागत और सामाजिक विकास पूरी तरह बाधित रहा है। इस पूरी कवायद का मुख्य ध्येय संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व के प्रमुख देशों का ध्यान इस मानवीय व राजनीतिक संकट की ओर आकर्षित करना है।

    इस वैश्विक रणनीति के तहत प्रवासी बलोच समुदाय 11 अगस्त को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय राजधानियों में विशेष सभाओं का आयोजन करेगा। बलोच रणनीतिकारों का मानना है कि अपने अधिकारों की आवाज को अधिक सशक्त बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करना बेहद अनिवार्य हो गया है। मध्य प्रदेश समेत भारत और वैश्विक मीडिया में भी इस भू-राजनीतिक घटनाक्रम और इसके भावी प्रभावों पर गहन समीक्षा शुरू हो गई है।

    ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का हवाला देते हुए राष्ट्रवादी नेताओं ने कहा कि 1947 में विभाजन काल के दौरान 11 अगस्त को बलूचिस्तान की स्वायत्त स्थिति को स्वीकार किया गया था। यद्यपि इस ऐतिहासिक दावे पर विभिन्न इतिहासकारों और विशेषज्ञों के अलग-अलग मत रहे हैं। पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान को अपना अखंड और अभिन्न अंग मानती है तथा किसी भी प्रकार की अलगाववादी गतिविधियों को पूरी तरह खारिज करती रही है।

    दक्षिण एशिया में बलूचिस्तान का मामला अत्यंत संवेदनशील सुरक्षा चिंताओं से जुड़ा हुआ है। वहां सक्रिय स्वाधीनता समर्थक समूहों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच अक्सर गतिरोध की स्थिति उत्पन्न होती रही है। ताजा घोषणा के पश्चात क्षेत्र में राजनीतिक और कूटनीतिक सुगबुगाहट का तेज होना स्वाभाविक माना जा रहा है। फिलहाल 11 अगस्त को होने वाले कार्यक्रमों और उस पर आने वाली आधिकारिक प्रतिक्रियाओं पर वैश्विक पर्यवेक्षकों की नजरें टिकी हुई हैं।

  • US : ट्रंप का शवोन के CEO पर तीखा हमला….. तेल कंपनी से की पेट्रोल-डीजल के रेट घटाने की मांग

    US : ट्रंप का शवोन के CEO पर तीखा हमला….. तेल कंपनी से की पेट्रोल-डीजल के रेट घटाने की मांग


    वॉशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने तेल कंपनी शवोन (Oil company Chevron) के चेयरमैन और सीईओ माइक वर्थ (Mike Wirth) पर तीखा हमला बोला है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि वर्थ ने कंपनी की सफलता का श्रेय अपनी नीतियों को दिया, लेकिन यह भूल गए कि उनकी सरकार की नीतियों के बिना अमेरिकी तेल उद्योग और देश दोनों मुश्किल में पड़ जाते। साथ ही उन्होंने तेल कंपनियों से उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें तुरंत कम करने की मांग भी की।


    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर क्या कहा?

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि माइक वर्थ ने एक इंटरव्यू में शवोन की सफलता के कई कारण गिनाए, लेकिन उन्होंने ट्रंप प्रशासन की भूमिका का जिक्र नहीं किया। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सरकार की दूरदर्शिता, मजबूती और स्थिर नीतियों की वजह से ही अमेरिकी तेल उद्योग आज मजबूत स्थिति में है। उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार नहीं होती, तो तेल उद्योग लगभग खत्म हो चुका होता।


    वेनेजुएला का भी किया जिक्र

    ट्रंप ने कहा कि उनके कार्यकाल में वेनेजुएला पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने अमेरिकी रणनीति को मजबूती दी। उनके मुताबिक, शवोन को पहले वेनेजुएला से बाहर होना पड़ा था, लेकिन अब कंपनी पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में वहां लौट रही है और बड़ा मुनाफा कमाने की उम्मीद कर रही है।


    तेल कंपनियों को दी सीधी चेतावनी

    ट्रंप ने सिर्फ शवोन ही नहीं, बल्कि अन्य तेल कंपनियों को भी खुदरा ईंधन कीमतें तुरंत कम करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आम उपभोक्ताओं को राहत मिलनी चाहिए और कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के दाम घटाने चाहिए।


    शवोन CEO ने क्या कहा था?

    इससे पहले शवोन के सीईओ माइक वर्थ ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ईरान से जुड़े युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अब भी अस्थिर बना हुआ है। उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में जारी संकट के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, जबकि लाल सागर में जारी व्यवधान के कारण भी वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ा है।


    ईंधन कीमतों पर बढ़ा दबाव

    रिपोर्टों के अनुसार, ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में पेट्रोल की औसत कीमत 4.10 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जो संघर्ष शुरू होने के समय की तुलना में एक डॉलर से अधिक ज्यादा है।


    ट्रंप पर भी बढ़ रहा राजनीतिक दबाव

    ईंधन की बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर ट्रंप विपक्ष के निशाने पर हैं। अमेरिका में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले बढ़ती लागत उनके लिए राजनीतिक चुनौती बनती दिख रही है। हालांकि ट्रंप का दावा है कि यदि ईरान के साथ संघर्ष समाप्त हो जाता है, तो ईंधन की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। वहीं, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि युद्ध के आर्थिक प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं और कीमतों में तत्काल बड़ी गिरावट की संभावना सीमित है।

  • BLF का दावा…. बलूचिस्तान में 48 अभियानों में मार गिराए पाकिस्तान के 97 सैनिक….

    BLF का दावा…. बलूचिस्तान में 48 अभियानों में मार गिराए पाकिस्तान के 97 सैनिक….


    क्वेटा।
    बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) (Balochistan Liberation Front – BLF) ने दावा किया है कि उसने पिछले महीने बलूचिस्तान (Balochistan) में 48 अभियानों के दौरान 97 पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों ( Pakistani Army 97 Soldiers) और पांच कथित मुखबिरों को मार गिराया, जबकि 15 अन्य सैनिक घायल हुए। स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।


    क्या बीएलएफ ने किन ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया?

    द बलूचिस्तान पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन की मासिक ऑपरेशनल रिपोर्ट में बीएलएफ के प्रवक्ता मेजर ग्वहराम बलूच ने कहा कि अभियानों के दौरान पाकिस्तानी सेना, अन्य सरकारी सुरक्षा बलों, सैन्य और आर्थिक ठिकानों, संचार नेटवर्क तथा निगरानी ढांचे को निशाना बनाया गया।

    बीएलएफ के अनुसार, ये अभियान काहान, चागई, खारन, कलात, मस्तुंग, खुजदार, बासिमा, मांड, टुम्प, गोमाजी, झाओ, क्वेटा, जमुरान, सुराब, मशकेल, बुलेदा, कराची, पासनी, राखनी, नाल, खुदान, बालनेगवार और मशके में चलाए गए। संगठन का कहना है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य बलूचिस्तान में पाकिस्तानी राज्य की उस व्यवस्था को कमजोर करना है, जिसे वह औपनिवेशिक ढांचा बताता है। साथ ही उसने दावा किया कि उसका मकसद संसाधनों के दोहन को रोकना और क्षेत्र पर सेना के नियंत्रण को कमजोर करना है।


    क्या मस्तुंग हमला सबसे घातक कार्रवाई थी?

    ग्वहराम बलूच ने 22 जुलाई को मस्तुंग के खादकोचा इलाके में मैक्रो स्टॉप के पास पाकिस्तानी सैन्य काफिले पर हुए हमले को महीने की सबसे बड़ी और सबसे घातक कार्रवाई बताया।संगठन ने दावा किया कि इस हमले में 17 सैनिक मारे गए, 10 अन्य घायल हुए और सैन्य काफिले को भी भारी नुकसान पहुंचा।

    क्या बीएलएफ ने सप्लाई लाइन बाधित करने का दावा किया?
    बीएलएफ का कहना है कि उसके लड़ाकों ने जुलाई के दौरान प्रमुख राजमार्गों पर नौ स्थानों पर नाकेबंदी कर नियंत्रण स्थापित किया, ताकि सेना की सप्लाई लाइनों को बाधित किया जा सके और इलाके में अपनी पकड़ मजबूत की जा सके। संगठन के बयान के अनुसार, सात पाकिस्तानी सैन्य काफिलों पर घात लगाकर हमले किए गए, जिससे सैनिकों और सैन्य सामग्री को नुकसान पहुंचा। इसके अलावा छह बड़े सैन्य शिविरों और सात चेकपोस्टों पर समन्वित हमले करने का भी दावा किया गया।

    क्या ड्रोन और निगरानी उपकरण भी नष्ट किए गए?
    बीएलएफ ने दावा किया कि उसने हवाई निगरानी में इस्तेमाल होने वाले दो ड्रोन और जमीन पर लगे तीन निगरानी कैमरे नष्ट कर दिए। संगठन के मुताबिक, उसकी कार्रवाइयों और विस्फोटों में 15 सैन्य वाहन तबाह हुए और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों से पांच आधुनिक हथियार भी कब्जे में लिए गए।


    क्या अलग-अलग गुरिल्ला रणनीतियों का इस्तेमाल किया गया?

    संगठन के बयान में कहा गया कि जुलाई के दौरान किए गए अभियानों में अलग-अलग गुरिल्ला रणनीतियों का इस्तेमाल किया गया। इनमें भारी हथियारों से 16 हमले, आठ घात लगाकर हमले, पांच खुफिया जानकारी आधारित गुप्त अभियान, चार स्नाइपर हमले, दो ग्रेनेड लॉन्चर हमले, दो आईईडी हमले और एक हैंड ग्रेनेड हमला शामिल था। बीएलएफ का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान में सुरक्षा बलों को निशाना बनाने वाले हमलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है, खासकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे सीमावर्ती प्रांतों में।

  • अफ्रीकन देश Ethiopia में भूस्खलन से 14 मौतें…. कई लोग मलबे में दबे, कई लापता

    अफ्रीकन देश Ethiopia में भूस्खलन से 14 मौतें…. कई लोग मलबे में दबे, कई लापता


    अदीस अबाबा।
    पूर्वी अफ्रीका (East Africa) के देश इथियोपिया (Ethiopia) के अमहारा क्षेत्र (Amahara region) में सोमवार सुबह भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन (Landslide) में 14 लोगों की मौत हो गई, जबकि सात लोग घायल हो गए। कई लोगों के अब भी मलबे में दबे होने की आशंका है और राहत-बचाव अभियान लगातार जारी है।


    क्या धार्मिक अनुष्ठान के दौरान हुआ हादसा?

    यह हादसा त्सादकाने देब्रे मिटमाक सेंट मैरी मठ में हुआ, जहां सैकड़ों श्रद्धालु पवित्र जल से शुद्धिकरण के धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने पहुंचे थे। यह अनुष्ठान लंबे समय से बीमारियों से राहत और आध्यात्मिक उपचार की मान्यता से जुड़ा माना जाता है।


    कई लोग अब भी मलबे में फंसे

    डायोसीज के महाप्रबंधक मेगाबे हादिस नेका तिबेब अबाबू के अनुसार, हादसा सुबह करीब सात बजे हुआ। उन्होंने बताया कि मृतकों में से 11 का अंतिम संस्कार मठ परिसर में कर दिया गया है, जबकि अन्य के शव उनके गृह नगर भेजे गए हैं। कुछ शवों की पहचान करना भी मुश्किल हो रहा है। उन्होंने कहा कि कई लोगों के अब भी मलबे में दबे होने की आशंका है।


    राहत-बचाव अभियान जारी

    गंभीर रूप से घायल लोगों को नॉर्थ शेवा प्रशासनिक क्षेत्र की राजधानी देब्रे बिरहान के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि आपदा प्रबंधन विभाग की विशेषज्ञ टीम मौके पर पहुंचकर राहत और बचाव अभियान में जुटी हुई है।


    लगातार बढ़ रही हैं ऐसी प्राकृतिक आपदाएं?

    इथियोपिया में जून से सितंबर तक चलने वाले बारिश के मौसम के दौरान भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं आम हो गई हैं। जुलाई 2024 में दक्षिणी इथियोपिया में हुए भूस्खलन में कम से कम 257 लोगों की मौत हुई थी, जबकि इसी वर्ष की शुरुआत में गामो क्षेत्र में भी ऐसे ही हादसे में 100 से अधिक लोगों की जान गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण देश में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

  • होर्मुज पर ईरान की दोटूक चेतावनी, दूसरा समुद्री रास्ता बना तो अमेरिकी युद्धपोत होंगे निशाने पर

    होर्मुज पर ईरान की दोटूक चेतावनी, दूसरा समुद्री रास्ता बना तो अमेरिकी युद्धपोत होंगे निशाने पर


    नई दिल्ली। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में वैकल्पिक समुद्री मार्ग बनाने के लिए अमेरिकी युद्धपोत तैनात किए गए तो उन्हें मिसाइलों से निशाना बनाया जाएगा। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत जारी होने का दावा किया है, लेकिन तेहरान ने किसी भी तरह की वार्ता से इनकार कर दिया है।

    ईरान के सर्वोच्च नेता के वरिष्ठ सलाहकार और एक्सपीडियेंसी काउंसिल के सदस्य जनरल मोहसिन रेजाई ने सरकारी मीडिया से बातचीत में कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में दूसरा समुद्री मार्ग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका इस उद्देश्य से युद्धपोत भेजता है तो ईरान सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।

    अमेरिका को व्यवहार बदलने की नसीहत
    रेजाई ने कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता की प्राथमिकता यह है कि अमेरिका अपने रवैये में वास्तविक बदलाव दिखाए। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका कुछ अहम शर्तों पर आगे बढ़ता है तो इसे सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका समुद्री नाकेबंदी जारी रखता है तो उसके जहाजों और सैन्य ठिकानों को गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

    ओमान से सुरक्षा पर चर्चा, अमेरिका से नहीं
    ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ किसी प्रकार की बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि फिलहाल केवल ओमान के साथ होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और प्रबंधन को लेकर चर्चा चल रही है। बघाई ने कहा कि निकट भविष्य में न तो कोई विदेशी प्रतिनिधिमंडल ईरान आएगा और न ही ईरानी वार्ताकार विदेश जाएंगे।

    ट्रंप बोले- बातचीत जारी है
    दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में कहा कि ईरान के साथ वार्ता जारी है और जल्द ही औपचारिक बातचीत शुरू हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य देशों के अनुरोध पर यह संवाद आगे बढ़ रहा है। ट्रंप ने कहा कि उनकी कोशिश होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समाधान निकालने की है।

    ट्रंप का नया दावा
    बाद में ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व को “दोहरे रवैये वाला” बताते हुए कहा कि ईरान ने ही बैठक की इच्छा जताई है और निकट भविष्य में वार्ता तय है। उन्होंने यह भी दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नौसेना का पूरा नियंत्रण है और अमेरिका की अनुमति के बिना वहां कोई गतिविधि संभव नहीं है।

    तेल बाजार पर पड़ा असर
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता की अटकलों के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में राहत देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतों में करीब 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। माना जा रहा है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव कम होता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होने से ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है।

  • पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के नेटवर्क पर बड़ा वार? 30 से ज्यादा आतंकियों की टारगेट किलिंग का पहली बार कबूलनामा

    पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के नेटवर्क पर बड़ा वार? 30 से ज्यादा आतंकियों की टारगेट किलिंग का पहली बार कबूलनामा


    नई दिल्ली।
    पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के नेटवर्क को लेकर बड़ा दावा सामने आया है। संगठन से जुड़े भारत के वांटेड आतंकी रिजवान हनीफ का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह पिछले कुछ वर्षों के दौरान लश्कर के 30 से ज्यादा प्रमुख सदस्यों की टारगेट किलिंग का दावा करता नजर आ रहा है। वीडियो के मुताबिक, ये घटनाएं पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoJK) के अलग-अलग इलाकों में हुई हैं।

    दावे के अनुसार, पिछले 3 से 4 वर्षों में पेशावर, कराची, रावलपिंडी, रावलाकोट और मुजफ्फराबाद जैसे इलाकों में लश्कर से जुड़े कई लोगों को अज्ञात हमलावरों ने निशाना बनाया। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि किए जाने की बात कही है।

    पहली बार कैमरे के सामने संगठन के नुकसान का दावा

    लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े किसी बड़े चेहरे की ओर से इतने बड़े पैमाने पर अपने नेटवर्क के सदस्यों की मौत का सार्वजनिक दावा सामने आना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वीडियो में रिजवान हनीफ कथित तौर पर इन घटनाओं के लिए भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराता दिखाई देता है।

    हालांकि, भारत सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियां पाकिस्तान में होने वाली ऐसी कथित टारगेट किलिंग में अपनी भूमिका के आरोपों से लगातार इनकार करती रही हैं। इसलिए वीडियो में लगाए गए आरोपों को संगठन से जुड़े व्यक्ति का दावा माना जाना चाहिए।

    पेशावर से मुजफ्फराबाद तक हुईं हत्याएं

    रिजवान हनीफ के दावे के मुताबिक, लश्कर के जिन सदस्यों को निशाना बनाया गया, उनमें संगठन के प्रमुख और महत्वपूर्ण पदों से जुड़े लोग भी शामिल थे। इन घटनाओं के लिए जिन जगहों का उल्लेख किया गया है, उनमें पेशावर, कराची, रावलपिंडी, रावलाकोट और मुजफ्फराबाद प्रमुख हैं।

    अगर यह दावा सही साबित होता है तो यह पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के नेटवर्क और उसके सुरक्षित ठिकानों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    हमलों के पीछे कौन? अब तक साफ नहीं

    वीडियो में मौतों के लिए भारतीय एजेंसियों पर आरोप लगाया गया है, लेकिन इन हत्याओं के पीछे वास्तव में कौन है, इसका कोई स्वतंत्र और सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है। इसी वजह से अज्ञात हमलावरों और उनके मकसद को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

    दूसरी ओर, संगठन से जुड़े व्यक्ति का कैमरे पर अपने नेटवर्क के 30 से अधिक सदस्यों के मारे जाने की बात स्वीकार करना पाकिस्तान में आतंकी संगठनों के भीतर सुरक्षा और आपसी खौफ की स्थिति की ओर संकेत जरूर करता है।

    वीडियो में फिर दिखी कट्टरपंथी भाषा

    वीडियो में रिजवान हनीफ ने कथित तौर पर इन घटनाओं को लेकर भारत पर आरोप लगाने के साथ हिंदू धर्म के खिलाफ भी आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल किया। ऐसे बयानों को आतंकी संगठनों द्वारा अपनी गतिविधियों और नेटवर्क के नुकसान के बीच समर्थकों को कट्टरपंथ की ओर धकेलने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

    फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के 30 से ज्यादा सदस्यों की कथित टारगेट किलिंग के पीछे कौन है और क्या ये घटनाएं वास्तव में किसी सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा थीं। वीडियो सामने आने के बाद यह मामला सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी खासा महत्वपूर्ण हो गया है।

  • चीन बना रहा पाताल में परमाणु मिसाइलें, भारत से करीब 1100 किमी दूर तक फैला जखीरा

    चीन बना रहा पाताल में परमाणु मिसाइलें, भारत से करीब 1100 किमी दूर तक फैला जखीरा


    नई दिल्ली।
    चीन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसने हाल के वर्षों में परमाणु मिसाइलों की तैनाती के लिए बड़ी संख्या में भूमिगत साइलो तैयार किए हैं। चीन के सरकारी टीवी नेटवर्क सीसीटीवी पर प्रसारित एक डॉक्यूमेंट्री में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) रॉकेट फोर्स के अधिकारियों ने इस निर्माण कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी साझा की। चीन का यह कबूलनामा ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान लंबे समय से सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर उसके परमाणु हथियारों के विस्तार का दावा करते रहे हैं।

    अमेरिका के दावे की हुई पुष्टि

    पीएलए की 99वीं वर्षगांठ के मौके पर प्रसारित ‘Securing Victory’ नाम की डॉक्यूमेंट्री में रॉकेट फोर्स के इंजीनियरिंग अधिकारी कुई दाओहू ने भूमिगत मिसाइल ठिकानों के निर्माण का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने मिसाइलों के लिए ऐसे ठिकाने तैयार किए हैं, जिन्हें चीन की रणनीतिक क्षमता का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

    कुई के मुताबिक, इन साइलो को इस तरह तैयार किया गया है कि निर्माण पूरा होते ही वहां मिसाइलों की तैनाती की जा सके। उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया और कई इंजीनियर तथा सैनिक लंबे समय तक निर्माण स्थलों पर तैनात रहे।

    300 से ज्यादा साइलो बनाने का दावा

    अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक वर्ष 2021 से ही सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर चीन के परमाणु मिसाइल साइलो निर्माण का दावा करते रहे हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ने 300 से अधिक मिसाइल साइलो तैयार किए हैं।

    इन ठिकानों को चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में शिनजियांग के हामी, गांसू के यूमेन और इनर मंगोलिया के यूलिन में बनाए जाने की बात कही गई थी।

    चीन ने इससे पहले इन दावों की न तो पुष्टि की थी और न ही स्पष्ट रूप से खंडन किया था। बीजिंग लगातार यह कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति रक्षात्मक है और उसके परमाणु खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

    भारत से कितनी दूर हैं चीन के ये परमाणु ठिकाने?

    चीन के इन परमाणु मिसाइल साइलो की लोकेशन भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चीन का गांसू क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश के सबसे करीब पड़ता है और दोनों के बीच दूरी करीब 1100 किलोमीटर बताई गई है।

    वहीं, लद्दाख के लेह से शिनजियांग के हामी क्षेत्र की दूरी करीब 1600 किलोमीटर बताई जाती है। ऐसे में चीन के परमाणु हथियारों और मिसाइल साइलो का विस्तार भारत की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    साइलो बनाने में आईं बड़ी चुनौतियां

    चीनी अधिकारी के मुताबिक, भूमिगत मिसाइल साइलो का निर्माण बेहद चुनौतीपूर्ण था। भारी-भरकम उपकरणों और हिस्सों को सही तरीके से जोड़ना और उन्हें निर्धारित समय में स्थापित करना मुश्किल काम था। इसके बावजूद इंजीनियरों और सैनिकों ने तय समयसीमा के भीतर निर्माण पूरा किया।

    हालांकि चीन ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन नए साइलो में कौन-कौन सी मिसाइलें तैनात की जाएंगी। लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि इनमें DF-5 सीरीज की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) को रखा जा सकता है।

    दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंच सकती है DF-5C

    DF-5C को चीन की सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली परमाणु मिसाइलों में शामिल किया जाता है। चीन के मुताबिक, इसकी क्षमता दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंचने की है। इस तरह की मिसाइलों को भूमिगत साइलो से लॉन्च करने के लिए तैयार किया जाता है।

    नए साइलो को लेकर चीनी अधिकारी ने दावा किया कि इन्हें दुश्मन के हमले को झेलने और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करने के लिहाज से डिजाइन किया गया है।

    चीन की ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति के बीच बढ़ता परमाणु जखीरा

    चीन आधिकारिक तौर पर ‘नो फर्स्ट यूज’ परमाणु नीति की बात करता है। यानी उसका दावा है कि वह किसी देश के खिलाफ पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा। हालांकि, परमाणु हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता बनाए रखने की बात वह लगातार कहता रहा है।

    नए भूमिगत साइलो का निर्माण इसी रणनीतिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। चीन का यह आधिकारिक खुलासा इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे उसके परमाणु हथियारों के विस्तार को लेकर अमेरिका के वर्षों पुराने दावों को पहली बार चीन की ओर से सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किए जाने का संकेत मिलता है।

  • बलूचिस्तान में सेना के सामने चुनौती बरकरार, लगातार हमलों और स्थानीय असंतोष से पाकिस्तान की बढ़ी चिंता

    बलूचिस्तान में सेना के सामने चुनौती बरकरार, लगातार हमलों और स्थानीय असंतोष से पाकिस्तान की बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सुरक्षा स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। हाल के महीनों में सुरक्षा बलों पर हुए कई हमलों और उसके बाद शुरू किए गए सैन्य अभियानों के बावजूद क्षेत्र में स्थिरता पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी है। बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान के लिए सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल रहा है, जहां अलगाववादी गतिविधियां, सुरक्षा अभियान और स्थानीय असंतोष लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने हाल में कई बड़े अभियान चलाए हैं। इनमें जुलाई के दौरान सुरक्षा बलों पर हुए हमलों के बाद शुरू किए गए अभियान भी शामिल हैं। पाकिस्तान की सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और कार्रवाई बढ़ाई है, लेकिन इसके बावजूद समय-समय पर हिंसक घटनाएं सामने आती रही हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

    बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक गैस, खनिज तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाता है। इसके बावजूद यह क्षेत्र लंबे समय से विकास, रोजगार, बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों के वितरण जैसे मुद्दों को लेकर विवादों का केंद्र रहा है। कई स्थानीय समूहों का आरोप है कि उन्हें संसाधनों का पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा, जबकि पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह विकास परियोजनाओं और सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना आसान नहीं होगा। उनका कहना है कि सुरक्षा उपायों के साथ-साथ राजनीतिक संवाद, आर्थिक विकास और स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने के प्रयास भी आवश्यक हैं। यदि स्थानीय स्तर पर असंतोष बना रहता है तो सुरक्षा एजेंसियों के लिए खुफिया जानकारी जुटाना और हिंसक घटनाओं को रोकना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    बलूचिस्तान का सामरिक महत्व भी काफी अधिक है। ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान की प्रमुख रणनीतिक परियोजनाओं में शामिल है और इसे क्षेत्रीय व्यापार तथा समुद्री गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा यहां पाकिस्तान की सेना, नौसेना, वायुसेना, कोस्ट गार्ड और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों की व्यापक तैनाती है। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर समय-समय पर चुनौतियां सामने आती रही हैं।

    पाकिस्तान की पश्चिमी सीमाओं पर भी सुरक्षा स्थिति जटिल बनी हुई है। अफगानिस्तान सीमा पर तनाव, विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी घटनाएं और बलूचिस्तान में जारी अभियान सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक साथ कई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और सैन्य रणनीति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बलूचिस्तान में दीर्घकालिक शांति के लिए केवल सुरक्षा अभियानों पर निर्भर रहने के बजाय राजनीतिक भागीदारी, सामाजिक विकास, रोजगार सृजन और स्थानीय समुदायों के साथ संवाद को भी समान महत्व देना होगा। आने वाले समय में क्षेत्र की स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि सुरक्षा उपायों के साथ विकास और विश्वास बहाली के प्रयास कितने प्रभावी साबित होते हैं।

  • राष्ट्रीय सम्मान और सांस्कृतिक पहचान के लिए ऐतिहासिक फैसला, द्वीपीय देश अब नए आधिकारिक नाम से जाना जाएगा

    राष्ट्रीय सम्मान और सांस्कृतिक पहचान के लिए ऐतिहासिक फैसला, द्वीपीय देश अब नए आधिकारिक नाम से जाना जाएगा


    नई दिल्ली । 
    प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया के सबसे छोटे स्वतंत्र गणराज्यों में शामिल नाउरू ने अपनी राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए अपना आधिकारिक नाम बदल दिया है। अब यह देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “रिपब्लिक ऑफ नाओरो” के नाम से जाना जाएगा। सरकार का कहना है कि नया नाम देश की मूल भाषा, पारंपरिक उच्चारण और सांस्कृतिक विरासत के अधिक अनुरूप है। इस बदलाव को राष्ट्रीय सम्मान और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    राष्ट्रपति डेविड एडियांग ने कहा कि लंबे समय से विदेशों में देश के नाम का उच्चारण वास्तविक स्थानीय उच्चारण से अलग किया जाता रहा है। उनके अनुसार, नया नाम स्थानीय भाषा की वर्तनी और उच्चारण को सही रूप में प्रस्तुत करता है तथा देश की सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करता है। उन्होंने इसे नए राष्ट्रीय गौरव की शुरुआत बताते हुए कहा कि यह परिवर्तन केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की विरासत को उचित स्थान दिलाने का प्रयास भी है।

    नाम परिवर्तन के साथ देश के अंतरराष्ट्रीय पहचान कोड में भी बदलाव किया गया है। पहले जहां आधिकारिक कोड “एनआरयू” था, अब इसे “एनआरओ” किया जाएगा। वहीं, देश के नागरिकों की पहचान भी अब पहले की बजाय नए आधिकारिक नाम के अनुरूप होगी। सरकार का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की वास्तविक पहचान अधिक स्पष्ट रूप से स्थापित होगी।

    सरकार ने बताया कि यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया। इस विषय पर पहले संसद में प्रस्ताव रखा गया, जिस पर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आवश्यक चरणों में चर्चा और मतदान कराया गया। संसद से मंजूरी मिलने के बाद सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से लागू करने की प्रक्रिया शुरू की। प्रारंभिक स्तर पर जनमत संग्रह कराने की संभावना भी जताई गई थी, लेकिन व्यापक विचार-विमर्श के बाद संसद ने माना कि यह नाम पहले से ही देश की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है और इसके लिए अलग जनमत संग्रह की आवश्यकता नहीं है।

    सरकारी बयान में कहा गया कि “नाओरो” नाम कभी समाप्त नहीं हुआ था, बल्कि वर्षों से स्थानीय समुदाय, राष्ट्रीय प्रतीकों और सांस्कृतिक परंपराओं में उपयोग होता रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “नाउरू” नाम केवल उच्चारण की सुविधा के कारण अधिक प्रचलित हो गया था। अब सरकार ने उसी पारंपरिक नाम को आधिकारिक मान्यता देकर अपनी ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित किया है।

    करीब 12 हजार की आबादी वाला यह द्वीपीय देश क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों के लिहाज से दुनिया के सबसे छोटे देशों में गिना जाता है। वर्ष 1968 में स्वतंत्र गणराज्य बनने से पहले यह विदेशी शासन के अधीन रहा था। फॉस्फेट खनन के कारण एक समय इसकी अर्थव्यवस्था बेहद समृद्ध हुई, लेकिन खनन गतिविधियां घटने के बाद देश को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर जैसी समस्याएं भी इसके सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

    हाल के वर्षों में कई देशों ने अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से आधिकारिक नामों में बदलाव किए हैं। नाओरो का यह निर्णय भी उसी क्रम का हिस्सा माना जा रहा है, जहां देश अपनी स्थानीय भाषा, परंपरा और राष्ट्रीय अस्मिता को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। सरकार अब विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों के साथ समन्वय कर नए नाम को सभी आधिकारिक अभिलेखों और दस्तावेजों में लागू कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।

  • अटारी-वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तानी रेंजर की सलामी बनी चर्चा, भारतीय अधिकारी के जवाब ने क्यों खींचा सबका ध्यान

    अटारी-वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तानी रेंजर की सलामी बनी चर्चा, भारतीय अधिकारी के जवाब ने क्यों खींचा सबका ध्यान

    नई दिल्ली । अटारी-वाघा सीमा पर आयोजित समारोह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक पाकिस्तानी रेंजर भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी को सलामी देता दिखाई देता है। इसके जवाब में भारतीय अधिकारी सलामी लौटाने के बजाय सिर हिलाकर अभिवादन करते नजर आते हैं। इसी दृश्य को लेकर सोशल मीडिया पर विभिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं और सैन्य परंपराओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    वीडियो सामने आने के बाद कुछ पाकिस्तानी सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने सवाल उठाया कि भारतीय अधिकारी ने औपचारिक रूप से सलामी का जवाब क्यों नहीं दिया। उनका कहना था कि सैन्य परंपराओं के अनुसार सलामी का जवाब सलामी से ही दिया जाना चाहिए। हालांकि, इस बहस के बीच कई लोगों ने सैन्य प्रोटोकॉल और वरिष्ठ अधिकारियों की परंपराओं का हवाला देते हुए अलग दृष्टिकोण भी रखा।

    एक पाकिस्तानी सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वरिष्ठ सैन्य अधिकारी हर परिस्थिति में सलामी लौटाने के लिए बाध्य नहीं होते। कई अवसरों पर वे सिर हिलाकर, मुस्कुराकर या मौखिक अभिवादन के माध्यम से भी सम्मान व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार यह तरीका भी सैन्य शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है और इससे अधीनस्थ जवानों के प्रति सम्मान तथा सौहार्द का संदेश जाता है।

    सैन्य मामलों के जानकारों का भी मानना है कि विभिन्न देशों की सेनाओं में सलामी देने और उसका जवाब देने से जुड़े नियम परिस्थितियों, पद और आयोजन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। हर औपचारिक कार्यक्रम में दोनों पक्षों के अधिकारियों द्वारा एक जैसी प्रतिक्रिया देना अनिवार्य नहीं होता। कई बार निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत केवल सम्मान प्रकट करना ही पर्याप्त माना जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच आयोजित सीमा समारोहों, ध्वज बैठक, कमांडर स्तर की वार्ता या अन्य आधिकारिक आयोजनों में दोनों देशों की सेनाएं तय सैन्य परंपराओं और प्रोटोकॉल का पालन करती हैं। इनका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में अनुशासन बनाए रखना और औपचारिक संवाद के दौरान पेशेवर माहौल कायम रखना होता है।

    अटारी-वाघा सीमा पर होने वाला बीटिंग रिट्रीट समारोह वर्षों से दोनों देशों के बीच सैन्य अनुशासन और औपचारिक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। इसमें दोनों देशों के सुरक्षा बल निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। ऐसे आयोजनों में व्यक्तिगत व्यवहार भी सैन्य प्रोटोकॉल और पदानुक्रम के अनुरूप होता है।

    वायरल वीडियो ने भले ही सोशल मीडिया पर बहस को जन्म दिया हो, लेकिन सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसे किसी असामान्य घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार भारतीय अधिकारी द्वारा सिर हिलाकर अभिवादन करना भी सम्मान प्रकट करने का एक स्वीकृत तरीका माना जाता है और यह सैन्य शिष्टाचार के दायरे में आता है।

    इस घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि सैन्य परंपराएं केवल सलामी तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनमें अनुशासन, पदानुक्रम, औपचारिक प्रोटोकॉल और पारस्परिक सम्मान जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल होते हैं। यही कारण है कि अलग-अलग परिस्थितियों में अधिकारियों की प्रतिक्रिया भी निर्धारित नियमों और प्रचलित सैन्य परंपराओं के अनुरूप अलग हो सकती है।