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  • Nobel Prize 2026: कार्ल डेसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को मेडिसिन का नोबेल

    Nobel Prize 2026: कार्ल डेसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को मेडिसिन का नोबेल


    नई दिल्ली: चिकित्सा के क्षेत्र में 2026 के नोबेल पुरस्कार की घोषणा 5 अक्टूबर को की गई। इस वर्ष फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार कार्ल डेसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को दिया गया है। तीनों वैज्ञानिकों को लाइट-गेटेड आयन चैनल और ऑप्टोजेनेटिक्स से संबंधित उनकी खोजों और योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।
    उनके काम ने वैज्ञानिकों के लिए प्रकाश की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित करना संभव बनाया। इससे मस्तिष्क में अलग-अलग न्यूरॉन्स की गतिविधि को समझने और नियंत्रित करने के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक उपलब्ध हुई है। कार्ल डेसेरोथ अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं, जबकि पीटर हेगेमैन बर्लिन की हंबोल्ट यूनिवर्सिटी और जॉर्ज नागेल जर्मनी की वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं।

    इस शोध की शुरुआत क्लैमाइडोमोनस नामक एकल-कोशिका वाले शैवाल पर पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल के काम से हुई। दोनों वैज्ञानिकों ने शैवाल की सतह पर चैनलरोडोप्सिन नामक प्रोटीन की पहचान की। जब इस प्रोटीन पर नीली रोशनी पड़ती है तो यह एक चैनल खोलता है, जिसके जरिए आवेशित कण कोशिका के भीतर प्रवाहित होते हैं और विद्युत संकेत पैदा होता है।

    इसके बाद कार्ल डेसेरोथ ने चैनलरोडोप्सिन के जीन को चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में पहुंचाया। इससे नीली रोशनी की मदद से इन तंत्रिका कोशिकाओं में संकेत पैदा करना संभव हुआ। डेसेरोथ ने इस सफलता को 2005 में प्रकाशित किया और 2007 में यह दिखाया कि प्रकाश से नियंत्रित यह स्विच जीवित चूहे के मस्तिष्क में भी काम कर सकता है। आगे चलकर इसी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स के नाम से जाना गया।

    ऑप्टोजेनेटिक्स ने न्यूरोसाइंस में शोध के तरीके को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक प्रकाश के जरिए विशेष तंत्रिका कोशिकाओं को सक्रिय या निष्क्रिय कर सकते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि मस्तिष्क की अलग-अलग तंत्रिका कोशिकाएं याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार में क्या भूमिका निभाती हैं।

    नोबेल समिति के अनुसार, यह तरीका अब दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में मस्तिष्क के रहस्यों को समझने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक के संभावित चिकित्सकीय इस्तेमाल पर भी शोध जारी है और वैज्ञानिक दृष्टिबाधित लोगों में दृष्टि बहाल करने के लिए इसके उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं।

    फिजियोलॉजी या मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत से स्थापित मूल नोबेल पुरस्कारों में से एक है और मानवता के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान के लिए इसे 1901 से दिया जा रहा है। मेडिसिन नोबेल के लिए नामांकन का मूल्यांकन नोबेल समिति करती है और पुरस्कार का अंतिम निर्णय करोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल असेंबली लेती है, जिसमें 50 प्रोफेसर शामिल हैं।

    2026 में मेडिसिन नोबेल की घोषणा स्टॉकहोम के पास सोलना स्थित करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के नोबेल फोरम में की गई। यह इस वर्ष घोषित होने वाला पहला नोबेल पुरस्कार है। 2026 के नोबेल पुरस्कार की राशि तीनों विजेताओं के बीच समान रूप से बांटी जाएगी। अन्य पुरस्कारों की घोषणा 6 अक्टूबर को भौतिकी, 7 अक्टूबर को रसायन विज्ञान, 8 अक्टूबर को साहित्य, 9 अक्टूबर को शांति और 12 अक्टूबर को आर्थिक विज्ञान के लिए की जाएगी।
  • स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन भारत पहुंचे, राष्ट्रपति भवन में द्रौपदी मुर्मू और नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में औपचारिक स्वागत

    स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन भारत पहुंचे, राष्ट्रपति भवन में द्रौपदी मुर्मू और नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में औपचारिक स्वागत

    नई दिल्ली ।स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन सोमवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे। उनके आगमन के बाद राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद रहे। स्विस राष्ट्रपति को राष्ट्रपति भवन में गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया। गाइ पार्मेलिन का यह दौरा भारत और स्विट्जरलैंड के बीच संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर जोर रहेगा। भारत और स्विट्जरलैंड के बीच लंबे समय से राजनयिक और आर्थिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के साथ शिक्षा, विज्ञान और तकनीक सहित विभिन्न क्षेत्रों में भी संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाता रहा है। ऐसे में गाइ पार्मेलिन का तीन दिवसीय दौरा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद को आगे बढ़ाने का अवसर माना जा रहा है।

    गाइ पार्मेलिन 7 अक्टूबर को दूसरे भारत-ईएफटीए समृद्धि शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह सम्मेलन भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी ईएफटीए के बीच व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते यानी टीईपीए के लागू होने की पहली वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में भारत और ईएफटीए के बीच आर्थिक साझेदारी तथा कारोबारी संबंधों को आगे बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। समझौते के लागू होने के बाद दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है।

    भारत और स्विट्जरलैंड के आर्थिक संबंधों में ईएफटीए की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ईएफटीए देशों में स्विट्जरलैंड भारत का सबसे बड़ा व्यापार और निवेश साझेदार है। दोनों देशों के बीच नियमित उच्चस्तरीय संपर्क और लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को भी महत्वपूर्ण माना गया है। आर्थिक मामलों के अलावा शिक्षा, विज्ञान और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में भी दोनों देशों के बीच लगातार संपर्क रहा है।

    गाइ पार्मेलिन का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और ईएफटीए के बीच आर्थिक साझेदारी से जुड़े सहयोग का नया चरण आगे बढ़ रहा है। टीईपीए के लागू होने की पहली वर्षगांठ के मौके पर होने वाला समृद्धि शिखर सम्मेलन दोनों पक्षों को समझौते की प्रगति और भविष्य के आर्थिक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का अवसर देगा। राष्ट्रपति भवन में हुआ औपचारिक स्वागत और इसके बाद होने वाले उच्चस्तरीय कार्यक्रम भारत और स्विट्जरलैंड के बीच राजनीतिक संवाद तथा आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण गतिविधियों के रूप में देखे जा रहे हैं।

  • ट्रंप ने ब्राजील चुनाव पर पोस्ट में भारत का नाम लिखा, 125 मिलियन वोट का दावा कर अमेरिकी चुनाव प्रणाली पर साधा निशाना

    ट्रंप ने ब्राजील चुनाव पर पोस्ट में भारत का नाम लिखा, 125 मिलियन वोट का दावा कर अमेरिकी चुनाव प्रणाली पर साधा निशाना

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट में ब्राजील की जगह भारत का नाम लिख दिया। ट्रंप ने दावा किया कि भारत के राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में 125 मिलियन लोगों ने मतदान किया और मतदान खत्म होने के उसी दिन परिणाम भी सामने आ गए। हालांकि, उनकी पोस्ट में जिस चुनाव का जिक्र किया गया, वह वास्तव में ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर था। इस गलती के बाद उनकी पोस्ट चर्चा में आ गई और सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे लेकर प्रतिक्रिया दी।

    ट्रंप ने अपनी पोस्ट में ब्राजील के चुनाव में मतदान और नतीजों की तेजी की तुलना अमेरिका की चुनाव प्रक्रिया से की। उन्होंने कहा कि डेट्रॉयट, फिलाडेल्फिया, कैलिफोर्निया और अमेरिका के कई अन्य शहरों तथा राज्यों में कम संख्या में वोटों की गिनती में भी अक्सर हफ्तों लग जाते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में अमेरिकी वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे भ्रष्ट बताया। पोस्ट के अंत में उन्होंने अपने नाम के साथ इसे प्रकाशित किया।

    ट्रंप की पोस्ट में 125 मिलियन लोगों के मतदान का आंकड़ा भी ब्राजील के चुनाव से जुड़ा हुआ था। ब्राजील में 4 अक्टूबर को राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर की वोटिंग हुई थी। भारत में उस दिन इस तरह का कोई प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव नहीं हुआ था। भारत में राष्ट्रपति का चुनाव देशभर में सीधे मतदाताओं के मतदान से नहीं होता है। ट्रंप की पोस्ट में भारत का उल्लेख होने के कारण ब्राजील और भारत के चुनावी सिस्टम को लेकर उनका यह बयान विशेष रूप से चर्चा में रहा।

    ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो और मौजूदा राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा सबसे आगे रहे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 98.81 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी होने तक बोल्सोनारो को 47.24 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि लूला को 44.91 प्रतिशत वोट हासिल हुए। हालांकि, पहले दौर में किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले, इसलिए सीधे तौर पर चुनाव का फैसला नहीं हो सका।

    अब दोनों उम्मीदवारों के बीच 25 अक्टूबर को राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में मुकाबला होगा। पहले दौर में जीत के लिए 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना जरूरी था, लेकिन दोनों उम्मीदवार इस आंकड़े तक नहीं पहुंच सके। इसी वजह से चुनाव दूसरे दौर में पहुंच गया। ट्रंप की पोस्ट ब्राजील के पहले दौर के चुनाव परिणाम आने के बाद सामने आई, जिसमें उन्होंने तेजी से नतीजे आने का उल्लेख करते हुए अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाया था। उनकी पोस्ट में ब्राजील की जगह भारत का नाम लिखे जाने को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई।

  • हूतियों के खिलाफ सक्रिय होगा मक्का डिफेंस पैक्ट? सऊदी में पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य अधिकारियों की अहम बैठक आज

    हूतियों के खिलाफ सक्रिय होगा मक्का डिफेंस पैक्ट? सऊदी में पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य अधिकारियों की अहम बैठक आज

    नई दिल्ली ।सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य गठबंधन की अहम बैठक सोमवार को रियाद में हो रही है। तीनों देशों की स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की इस बैठक में मक्का रक्षा समझौते के भविष्य पर चर्चा होगी। बैठक ऐसे समय हो रही है जब सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में मक्का रक्षा समझौते को सक्रिय किया जाएगा और क्या पाकिस्तान तथा तुर्की सऊदी अरब के समर्थन में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होंगे।

    रियाद में होने वाली बैठक में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री तथा सेना प्रमुख शामिल होंगे। बैठक के दौरान सऊदी अरब पर हूतियों की ओर से किए जा रहे हमलों से निपटने के तरीकों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा तीनों देशों के बीच हुए सैन्य समझौते के काम करने के तरीके और गठबंधन को भविष्य में अधिक संस्थागत रूप देने के लिए उठाए जाने वाले अगले कदमों पर भी विचार किया जाएगा। बैठक को इस समझौते की आगे की दिशा तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते पर 7 अगस्त को तीनों देशों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते में सामूहिक रक्षा से जुड़ा एक प्रावधान शामिल है। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर होने वाले सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। समझौते के बाद से पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब इसके संस्थागत और सैन्य ढांचे को विकसित करने पर काम कर रहे हैं। हाल के दिनों में हूतियों की ओर से सऊदी अरब को ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बनाए जाने के कारण इस समझौते की भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ गई है।

    सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। दूसरी ओर, ईरान समर्थित हूती विद्रोही राजधानी सना सहित उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। हूतियों और सऊदी अरब के बीच जारी टकराव ने मक्का रक्षा समझौते के सामूहिक रक्षा प्रावधान को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब रियाद में होने वाली बैठक में यह देखा जाएगा कि मौजूदा स्थिति में तीनों देशों के बीच हुआ सैन्य समझौता किस तरह आगे बढ़ता है और सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़े मामलों में इसकी भूमिका क्या होगी।

    पाकिस्तान ने सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों की निंदा की है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि उनका देश समझौते के तहत सऊदी अरब की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करेगा। तुर्की के नेताओं ने भी सऊदी अरब पर हुए हूती हमलों की कई मंचों पर आलोचना की है। हालांकि, पाकिस्तान और तुर्की की ओर से हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के सैन्य अभियानों में सीधे तौर पर शामिल होने की पुष्टि नहीं की गई है। इसी वजह से यह सवाल बना हुआ है कि मक्का रक्षा समझौते के तहत किए गए वादे को व्यवहार में किस तरह लागू किया जाएगा और क्या दोनों देश सऊदी अरब के लिए चल रही सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल होंगे।

  • ईरान के तेल मंत्री मोहसिन पाकनेजाद ने दिया इस्तीफा, राष्ट्रपति ने स्वीकार किया, हमीद बोवार्ड को मिली कार्यवाहक जिम्मेदारी

    ईरान के तेल मंत्री मोहसिन पाकनेजाद ने दिया इस्तीफा, राष्ट्रपति ने स्वीकार किया, हमीद बोवार्ड को मिली कार्यवाहक जिम्मेदारी

    नई दिल्ली ।ईरान के तेल मंत्री मोहसिन पाकनेजाद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। पाकनेजाद अगस्त 2024 से ईरान के तेल मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके इस्तीफे के बाद सरकारी स्वामित्व वाली नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी के प्रमुख हमीद बोवार्ड को कार्यवाहक तेल मंत्री नियुक्त किया गया है। इस बदलाव की जानकारी सरकारी मीडिया के माध्यम से सामने आई है। हालांकि, शुरुआत में इस्तीफे के पीछे किसी विशेष वजह की जानकारी नहीं दी गई थी।

    बाद में राष्ट्रपति कार्यालय के संचार उप प्रमुख मेहदी तबताबाई ने सरकारी टेलीविजन को बताया कि पाकनेजाद ने व्यक्तिगत कारणों से काफी पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया था। उनके अनुसार, यह इस्तीफा हाल में लिया गया अचानक फैसला नहीं था। हालांकि, पाकनेजाद के पद छोड़ने के बारे में आधिकारिक तौर पर किसी अन्य विशेष कारण का खुलासा नहीं किया गया है। इस तरह फिलहाल सामने आई जानकारी में उनके इस्तीफे को व्यक्तिगत कारणों से जोड़ा गया है और किसी दूसरे कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    मोहसिन पाकनेजाद ने अगस्त 2024 में ईरान के तेल मंत्री का पद संभाला था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने देश के तेल राजस्व को लेकर भी बयान दिए थे। इस्तीफा देने से पहले उन्होंने कहा था कि ईरान की ओर से बेचे जा रहे तेल से प्राप्त होने वाली आय देश को मिल रही है और भविष्य में भी इसके जारी रहने की उम्मीद है। ईरान तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक का सदस्य है और उसकी अर्थव्यवस्था में तेल से होने वाली आय का महत्वपूर्ण स्थान है। पाकनेजाद के इस्तीफे के बाद अब मंत्रालय की जिम्मेदारी फिलहाल हमीद बोवार्ड संभालेंगे।

    हमीद बोवार्ड इससे पहले सरकारी स्वामित्व वाली नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी के प्रमुख के रूप में काम कर रहे थे। उन्हें अब कार्यवाहक तेल मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। इस नियुक्ति के साथ वह फिलहाल तेल मंत्रालय का कामकाज संभालेंगे। पाकनेजाद के इस्तीफे को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह प्रशासनिक बदलाव हुआ है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कार्यवाहक व्यवस्था कितने समय तक जारी रहेगी या आगे तेल मंत्री के पद पर स्थायी नियुक्ति को लेकर क्या फैसला लिया जाएगा।

    पाकनेजाद का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है, जब ईरान की अर्थव्यवस्था पर अमेरिका के साथ सात महीने से जारी युद्ध और उससे जुड़े दबावों का असर बताया जा रहा है। देश की आर्थिक स्थिति पर इन परिस्थितियों के प्रभाव के बीच तेल मंत्रालय में यह बदलाव हुआ है। हालांकि, इस्तीफे और ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच किसी सीधे संबंध की आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सरकार की ओर से पाकनेजाद के पद छोड़ने की वजह के तौर पर व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया गया है। फिलहाल हमीद बोवार्ड कार्यवाहक तेल मंत्री के रूप में मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे।

  • को-पायलट हमाम अल-हम्मामी ने जुलाई में ही इजरायल में विमान क्रैश करने की योजना बनाई थी, आखिरी वक्त पर किया रद्द

    को-पायलट हमाम अल-हम्मामी ने जुलाई में ही इजरायल में विमान क्रैश करने की योजना बनाई थी, आखिरी वक्त पर किया रद्द

    नई दिल्ली ।फ्लाईदुबई से इजरायल जा रहे विमान में हमला करने के आरोपी को-पायलट हमाम अल-हम्मामी को लेकर जांच में एक और अहम जानकारी सामने आई है। जानकारी के मुताबिक, हम्मामी ने जुलाई में ही इजरायल के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर एक विमान को क्रैश करने की योजना बनाई थी। हालांकि, उसने आखिरी समय में अपनी इस योजना को रद्द कर दिया था। मौजूदा मामले में पूछताछ के दौरान सामने आई जानकारी के अनुसार, हम्मामी पहले से ही इजरायल में विमान के जरिए हमला करने की योजना पर काम कर रहा था।

    बताया गया है कि हम्मामी ने जून में ही बेन गुरियन एयरपोर्ट से जुड़ी जानकारी जुटाना शुरू कर दी थी। इसके बाद जुलाई में उसने विमान को क्रैश करने की पूरी योजना तैयार की। हालांकि, जिस विमान को वह निशाना बनाने की योजना बना रहा था, उसके क्रू में उसका एक दोस्त भी शामिल था। इसी वजह से उसने कथित तौर पर आखिरी वक्त पर अपनी योजना बदल दी और हमले को रद्द कर दिया। इस जानकारी से पता चलता है कि जुलाई में ही उसने इजरायल में विमान के जरिए हमला करने की तैयारी शुरू कर दी थी।

    इसके बाद फ्लाईदुबई की इजरायल जाने वाली उड़ान को लेकर भी हम्मामी की कथित योजना सामने आई है। जानकारी के मुताबिक, उसने जानबूझकर तेल अवीव जाने वाली उड़ान को चुना था। उसकी योजना कॉकपिट का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की थी। इसके बाद वह विमान को सामान्य तरीके से उड़ाता रहता और लैंडिंग के समय आखिरी पल में विमान को किसी इमारत या दूसरे विमान से टकराने की कोशिश करता। इस तरह विमान को दुर्घटनाग्रस्त करने की योजना बनाई गई थी।

    उड़ान के दौरान हम्मामी ने को-पायलट स्मित मछार पर हमला किया और विमान में आपात स्थिति के लिए रखी गई कुल्हाड़ी से उन पर वार किया। इसके बाद विमान के कैप्टन कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाब रहे। विमान में मौजूद कई यात्रियों ने हम्मामी को काबू में कर लिया। इसके बाद विमान में मौजूद ड्यूटी से बाहर के पायलटों ने विमान का नियंत्रण संभाला और उसे सुरक्षित रूप से उतार लिया। इस घटना के बाद हम्मामी से पूछताछ की जा रही है और उसके पहले से तैयार किए गए कथित हमले के बारे में भी जानकारी जुटाई जा रही है।

    जांच से जुड़ी जानकारी के अनुसार, इजरायली जांचकर्ताओं ने अब तक हम्मामी से सीधे पूछताछ नहीं की है। उसके बारे में सामने आई जानकारी संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में हुई जांच के दौरान सामने आने की बात कही गई है। मामले में अब यह भी जांच की जा रही है कि हम्मामी ने इजरायल जाने वाली उड़ान को क्यों चुना और उसके हमले की योजना कितनी पहले से तैयार थी। वहीं, संयुक्त अरब अमीरात में उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है। उसे मौत की सजा दिए जाने की संभावना की बात सामने आई है, लेकिन अभी तक उसके खिलाफ कोई औपचारिक सजा सुनाई नहीं गई है। मामले की जांच जारी है।

  • भारत की मदद से कंबोडिया का गांव हुआ बारूदी सुरंगों से मुक्त, 134 परिवारों को मिली सुरक्षित जमीन

    भारत की मदद से कंबोडिया का गांव हुआ बारूदी सुरंगों से मुक्त, 134 परिवारों को मिली सुरक्षित जमीन

    नोम पेन्ह। भारत ने कंबोडिया में मानवीय सहायता और पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। भारत सरकार की क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट (क्यूआईपी) योजना के तहत बारूदी सुरंगों और बिना फटे गोला-बारूद से मुक्त कराई गई जमीन को कंबोडिया के कोह कोंग प्रांत के काओ पाओ गांव के लोगों को सौंप दिया गया है। सुरक्षित की गई इस जमीन से करीब 134 परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा।

    जमीन समुदाय को सौंपने के लिए आयोजित विशेष कार्यक्रम में कंबोडिया में भारतीय दूतावास की डिप्टी चीफ ऑफ मिशन तनु प्रिया, कोह कोंग प्रांत के डिप्टी गवर्नर वाई. नियरिनेट और कंबोडिया माइन एक्शन एंड विक्टिम असिस्टेंस अथॉरिटी (सीएमएए) के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल टेप कल्याण मौजूद रहे।

    भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि डिप्टी चीफ ऑफ मिशन डॉ. तनु प्रिया ने सीएमएए के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल टेप कल्याण और कोह कोंग प्रांत के डिप्टी गवर्नर के साथ मेकांग-गंगा सहयोग की क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट योजना के तहत साफ की गई जमीन को समुदाय को सौंपने के कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

    करीब 1.98 लाख वर्ग मीटर जमीन सुरक्षित

    कंबोडिया के अखबार द नोम पेन्ह पोस्ट के मुताबिक, कार्यक्रम के दौरान गांववालों को करीब 1,97,810 वर्ग मीटर जमीन सौंपी गई। बारूदी सुरंगों और बिना फटे गोला-बारूद से मुक्त कराई गई इस जमीन का अब ग्रामीण खेती, आवास निर्माण और रोजगार से जुड़ी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे।

    भारतीय दूतावास ने कहा कि जमीन को समुदाय को वापस सौंपे जाने से स्थानीय लोगों को आजीविका, कृषि, आवास और अन्य सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों के लिए सुरक्षित पहुंच उपलब्ध होगी।

    1990 के दशक से कंबोडिया की मदद कर रहा भारत

    भारत का कंबोडिया के मानवीय बारूदी सुरंग हटाने के प्रयासों में लंबे समय से सहयोग रहा है। भारतीय दूतावास के अनुसार, 1990 के दशक की शुरुआत से भारत कंबोडिया को क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण के साथ-साथ तकनीकी सहायता, बारूदी सुरंग हटाने के उपकरण और माइन डिटेक्शन डॉग उपलब्ध कराता रहा है। इसके अलावा भारत बारूदी सुरंगों से प्रभावित लोगों को भी सहायता देता रहा है।

    भारत की यह मदद ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब कंबोडिया में लंबे समय से मौजूद बारूदी सुरंगों की समस्या ग्रामीण आबादी की जमीन, खेती और आजीविका के लिए चुनौती बनी हुई है। जमीन को साफ कर स्थानीय समुदाय को लौटाने से न केवल सुरक्षा बढ़ी है, बल्कि लोगों के लिए आर्थिक गतिविधियों के नए रास्ते भी खुले हैं।

    व्यापार बढ़ाने पर भी दोनों देशों में सहमति

    भारत और कंबोडिया के बीच सहयोग का दायरा केवल मानवीय सहायता तक सीमित नहीं है। इससे पहले 24 अगस्त को दोनों देशों ने आपसी व्यापार बढ़ाने पर भी सहमति जताई थी।

    नोम पेन्ह में ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट पर जॉइंट वर्किंग ग्रुप की तीसरी बैठक के दौरान दोनों देशों ने पारंपरिक चिकित्सा, ई-गवर्नेंस, भारतीय फार्माकोपिया को मान्यता देने और डिजिटल पेमेंट सिस्टम को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर चर्चा की थी।

    दोनों देशों के बीच व्यापार में भी 36 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है और यह वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 406.78 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

  • रूस के साइबेरिया की लैब में बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब टूटी! शोधकर्ता की मौत, करीब 200 लोग क्वारंटाइन

    रूस के साइबेरिया की लैब में बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब टूटी! शोधकर्ता की मौत, करीब 200 लोग क्वारंटाइन


    नई दिल्ली। रूस के साइबेरिया में एक एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की 28 वर्षीय महिला कर्मचारी की गंभीर निमोनिया से मौत के बाद करीब 200 लोगों को मेडिकल निगरानी में रखा गया है। रिपोर्टों में दावा है कि महिला ने अस्पताल में बताया था कि काम के दौरान जीवित बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब टूट गई थी, हालांकि रूसी अधिकारियों ने अभी यह पुष्टि नहीं की है कि मौत प्लेग संक्रमण से हुई।

    मामला इरकुत्स्क के शेलेखोव स्थित इरकुत्स्क एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़ा है। मृतका की पहचान रिपोर्टों में दार्या शिपिलोवा के तौर पर हुई है। उन्हें 29 सितंबर को गंभीर निमोनिया के लक्षणों के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन दो दिन बाद उनकी मौत हो गई।

    टेस्ट ट्यूब टूटने की बात सामने आई

    स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, शिपिलोवा ने चिकित्सकों को बताया था कि एक टेस्ट ट्यूब दुर्घटनावश टूट गई थी, जिसमें जीवित बैक्टीरिया मौजूद थे। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह घटना 25 सितंबर के आसपास हुई थी। हालांकि, इस घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्टों के मुताबिक, वह मंगोलिया की सीमा के पास बुर्यातिया में काम से जुड़ी यात्रा पर भी गई थीं। वहीं उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें शेलेखोव अस्पताल लाया गया था। इसलिए उनके संक्रमण के संभावित स्रोत को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

    करीब 200 लोग मेडिकल निगरानी में

    शोधकर्ता की मौत के बाद उनके संपर्क में आए लोगों की पहचान शुरू की गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 200 लोगों को मेडिकल निगरानी या आइसोलेशन में रखा गया है। इनमें शेलेखोव अस्पताल से जुड़े लोग भी शामिल हैं। कुछ अस्पतालों में एहतियाती क्वारंटीन उपाय लागू किए गए हैं।

    इरकुत्स्क के गवर्नर इगोर कोबजेव ने कहा कि पहचाने गए सभी संपर्कों को मेडिकल निगरानी में रखा गया है। उनके मुताबिक, अब तक संपर्क में आए लोगों में बीमारी के लक्षण नहीं मिले हैं और उनके टेस्ट भी निगेटिव आए हैं। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान नहीं देने और आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है।

    शेलेखोव के पास स्थित एक एल्युमिनियम प्लांट ने भी कर्मचारियों के लिए मास्क पहनने जैसे एहतियाती कदम उठाए हैं। प्लांट प्रबंधन ने क्षेत्र में फैल रही अफवाहों और अपुष्ट खबरों से बचने की अपील की है।

    बुर्यातिया के प्रमुख ने कहा- मौत प्लेग से हो सकती है

    बुर्यातिया के प्रमुख अलेक्सेई सिदेनोव ने महिला की मौत को प्लेग से जोड़ा, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि बुर्यातिया में प्लेग का कोई प्रकोप नहीं है। वहीं रूस की स्वास्थ्य निगरानी एजेंसी रोस्पोट्रेबनादजोर ने क्षेत्र में प्लेग के प्रकोप की पुष्टि नहीं की है।

    रूस के पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी गेन्नादी ओनिश्चेंको ने भी कहा कि संक्रमण के प्लेग होने की संभावना कम है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर प्लेग की पुष्टि होती भी है, तो ठंडे मौसम में इसके फैलने की संभावना कम हो सकती है।

    रूस की शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी साइबेरिया पहुंचीं

    मामले की गंभीरता को देखते हुए रूस की चीफ स्टेट सैनिटरी डॉक्टर अन्ना पोपोवा मॉस्को से साइबेरिया पहुंचीं। गवर्नर कोबजेव के मुताबिक, उन्होंने क्षेत्रीय आपात बैठक में हिस्सा लिया। यह बैठक एक बेहद खतरनाक संक्रामक बीमारी के संदिग्ध मामले की सूचना के बाद बुलाई गई थी।

    रूसी अधिकारियों ने फिलहाल क्षेत्र की सैनिटरी और महामारी संबंधी स्थिति को स्थिर बताया है। वहीं, शेलेखोव प्रशासन ने लोगों से अंतिम निष्कर्ष निकलने तक आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने को कहा है।

    टेस्ट ट्यूब टूटने के दावे पर भी सवाल

    मामला इसलिए ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि संबंधित संस्थान खतरनाक संक्रामक रोगों के अध्ययन और निगरानी से जुड़ा है। कुछ विशेषज्ञों ने टेस्ट ट्यूब टूटने की घटना के दावे पर सवाल उठाए हैं। रूसी महामारी विशेषज्ञ मिखाइल फावोरोव ने इसे असामान्य बताया और कहा कि इस तरह की प्रयोगशालाओं में खतरनाक बैक्टीरिया के साथ काम करते समय कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाए जाते हैं।

    इसी वजह से सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्टों में घटना को लेकर कई तरह के दावे सामने आए हैं। कुछ गुमनाम टेलीग्राम चैनलों ने इसे कोविड-19 की उत्पत्ति से जुड़े शुरुआती विवादों से भी जोड़ने की कोशिश की है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें फिलहाल अटकलों के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    अमेरिका भी रख रहा नजर

    अमेरिकी प्रशासन भी रूस में सामने आए इस मामले पर नजर रख रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी विदेश विभाग स्थिति से अवगत है और CDC समेत संबंधित एजेंसियों के साथ घटनाक्रम की निगरानी कर रहा है। हालांकि, अमेरिका की ओर से भी अभी यह पुष्टि नहीं की गई है कि रूस में प्लेग का प्रकोप हुआ है।

    फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि 28 वर्षीय शोधकर्ता की मौत का वास्तविक कारण क्या था और क्या उसका संबंध प्रयोगशाला में कथित तौर पर टूटी टेस्ट ट्यूब से था। रूसी स्वास्थ्य एजेंसियों की जांच और संपर्क में आए लोगों की निगरानी के बाद ही स्थिति की वास्तविक तस्वीर साफ हो सकेगी।

  • रियाद में अरामको की सुविधा पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला, हूतियों ने सऊदी कार्रवाई का जवाब बताया

    रियाद में अरामको की सुविधा पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला, हूतियों ने सऊदी कार्रवाई का जवाब बताया


    नई दिल्ली ।सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच जारी तनाव के बीच शनिवार को राजधानी रियाद में सऊदी अरामको की एक सुविधा को निशाना बनाकर हमला किए जाने का दावा किया गया। यमन के हूती विद्रोहियों के मुताबिक, इस कार्रवाई में बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। हमले के बाद अरामको की सुविधा से आग की लपटें और काले धुएं का गुबार उठता दिखाई दिया। हूतियों ने इस हमले को यमन में सऊदी अरब की ओर से किए गए हमलों की जवाबी कार्रवाई बताया है।

    हूती विद्रोहियों का कहना है कि रियाद स्थित अरामको की सुविधा पर किया गया हमला यमन की राजधानी सना और देश के दूसरे प्रांतों में हुई सऊदी कार्रवाई के जवाब में किया गया। उनके अनुसार, इस हमले में मिसाइलों और ड्रोन दोनों का इस्तेमाल किया गया। हूतियों ने इसे बदले की कार्रवाई के तौर पर पेश किया है। हालांकि, इस हमले से अरामको की संबंधित सुविधा को कितना नुकसान हुआ, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है।

    हमले के बाद रियाद में अरामको की सुविधा के आसपास आग और धुएं का असर दिखाई देने की बात सामने आई। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, शनिवार को सुविधा के पास धुएं और आग का गुबार उठता हुआ देखा गया। घटना के बाद इलाके में हलचल भी देखी गई। हालांकि, सऊदी अधिकारियों की ओर से अरामको की सुविधा को निशाना बनाए जाने की तत्काल पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में हमले से हुए नुकसान की वास्तविक स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

    यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। इससे पहले पिछले सप्ताह हूतियों ने यानबू में भी अरामको की सुविधाओं पर हमले का दावा किया था। उस घटना के संबंध में सऊदी अरब की ओर से छह मिसाइलों को रोकने की बात कही गई थी। दोनों पक्षों के बीच जारी टकराव के बीच अरामको की सुविधाओं को लेकर सामने आ रहे हमलों के दावों ने तनाव की स्थिति को और सामने ला दिया है।

    रियाद में हुए ताजा हमले को लेकर हूतियों ने स्पष्ट रूप से इसे यमन में सऊदी हमलों की प्रतिक्रिया बताया है। विद्रोहियों के दावे के अनुसार, बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के जरिए अरामको की सुविधा को निशाना बनाया गया। दूसरी ओर, सऊदी अधिकारियों की ओर से तत्काल हमले की पुष्टि नहीं की गई है। फिलहाल घटना के बाद सुविधा को हुए नुकसान का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। प्रत्यक्षदर्शी द्वारा आग और धुएं के गुबार देखे जाने की जानकारी सामने आई है, जबकि हमले की पूरी स्थिति और उसके प्रभाव को लेकर आधिकारिक जानकारी का इंतजार है।

  • UN महासभा के बाद भी न्यूयॉर्क में रुके दो ईरानी राजनयिकों को अमेरिका ने देश छोड़ने के आदेश की अनदेखी पर निकाला

    UN महासभा के बाद भी न्यूयॉर्क में रुके दो ईरानी राजनयिकों को अमेरिका ने देश छोड़ने के आदेश की अनदेखी पर निकाला


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के लिए न्यूयॉर्क पहुंचे ईरान के दो राजनयिकों को देश से बाहर कर दिया है। दोनों राजनयिक महासभा का सत्र समाप्त होने के बाद भी न्यूयॉर्क में रुके हुए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, उन्हें पहले ही अमेरिका छोड़ने के लिए कहा गया था, लेकिन दोनों ने इन निर्देशों का पालन नहीं किया। इसके बाद उनके खिलाफ देश से निष्कासन की कार्रवाई की गई।

    बताया गया कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के दोनों सदस्य संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए अमेरिका आए थे। अमेरिकी विदेश विभाग ने सोमवार को न्यूयॉर्क स्थित ईरानी मिशन को निर्देश दिया था कि महासभा में शामिल होने आए प्रतिनिधिमंडल के सभी सदस्य अमेरिका से रवाना हो जाएं। इसके बावजूद प्रतिनिधिमंडल के दो सदस्य महासभा समाप्त होने के काफी समय बाद तक न्यूयॉर्क में मौजूद रहे। इसी वजह से उन्हें अमेरिका से बाहर भेजने की कार्रवाई की गई।

    अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, दोनों राजनयिकों में से एक शुक्रवार रात न्यूयॉर्क से रवाना हुआ, जबकि दूसरा शनिवार सुबह वहां से गया। अधिकारियों ने बताया कि अमेरिका की ओर से दिए गए रवाना होने के आदेश की अनदेखी के कारण दोनों के खिलाफ कार्रवाई हुई। इस मामले में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के निर्देशों का भी उल्लेख किया गया है। अधिकारी ने कहा कि विदेश मंत्री अपने फैसले पर कायम हैं और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के दोनों सदस्यों को अब अमेरिका से निकाल दिया गया है।

    यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बना हुआ है और पश्चिम एशिया में सैन्य टकराव का खतरा बढ़ने की बात सामने आ रही है। दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका की ओर से ईरानी राजनयिकों को देश से बाहर करना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कार्रवाई का तत्काल कारण महासभा समाप्त होने के बाद भी दोनों राजनयिकों का न्यूयॉर्क में मौजूद रहना और अमेरिका छोड़ने के निर्देश का पालन नहीं करना था।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस घटनाक्रम के बीच ईरान को लेकर कड़ा रुख जाहिर किया है। उन्होंने ईरान की सैन्य और आर्थिक स्थिति को बेहद कमजोर बताया और संघर्ष जल्द खत्म होने का दावा किया। इसके साथ ही उन्होंने ईरान के लिए सख्त चेतावनी भी दी। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ईरानी प्रतिनिधिमंडल के दोनों सदस्यों को पहले ही देश छोड़ने का निर्देश दिया गया था, लेकिन उनके न्यूयॉर्क में बने रहने के कारण उन्हें अब अमेरिका से बाहर कर दिया गया है।

    अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा ईरानी मिशन को दिए गए निर्देश और उसके बाद हुई निष्कासन की कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। महासभा में भाग लेने के बाद ईरानी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों की अमेरिका में मौजूदगी को लेकर दिए गए निर्देशों के पालन पर कार्रवाई की गई। दोनों राजनयिकों के अमेरिका से रवाना होने के साथ यह घटनाक्रम समाप्त हुआ, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है।