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  • भारत ने सौर ऊर्जा विस्तार में अमेरिका को छोड़ा पीछे, दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ी से बढ़ता बाजार बना

    भारत ने सौर ऊर्जा विस्तार में अमेरिका को छोड़ा पीछे, दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ी से बढ़ता बाजार बना

    नई दिल्ली ।भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए वैश्विक सौर ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। वर्ष 2025 के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर नई सौर क्षमता स्थापित करने के बाद भारत अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे तेजी से बढ़ने वाला सोलर एनर्जी मार्केट बन गया है। यह उपलब्धि देश की ऊर्जा सुरक्षा, हरित विकास और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता केवल 3 गीगावाट थी, जो 30 जून 2026 तक बढ़कर 162.15 गीगावाट पहुंच गई है। पिछले एक दशक में हुई यह तेज वृद्धि दर्शाती है कि भारत ने सौर ऊर्जा क्षेत्र में योजनाबद्ध निवेश, नीतिगत सुधार और तकनीकी विस्तार के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2025 में अकेले 37 गीगावाट नई क्षमता जोड़ने के कारण भारत ने वार्षिक क्षमता वृद्धि के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया।

    सौर ऊर्जा क्षेत्र की इस सफलता के पीछे बिजली उत्पादन की लागत में आई बड़ी कमी भी अहम कारण रही है। प्रतिस्पर्धी ई-रिवर्स ऑक्शन प्रणाली लागू होने के बाद डेवलपर्स के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे सौर बिजली की दरों में लगातार गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2010 में जहां सौर बिजली की कीमत लगभग 18 रुपये प्रति यूनिट थी, वहीं समय के साथ यह घटकर 2.44 रुपये प्रति यूनिट के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गई। इससे उद्योगों, राज्यों और उपभोक्ताओं के लिए सौर ऊर्जा अधिक किफायती विकल्प बन गई।

    कम लागत का लाभ वैश्विक स्तर पर भी दिखाई दिया है। वर्ष 2025 में भारत में यूटिलिटी स्तर के सोलर फोटोवोल्टिक संयंत्रों से बिजली उत्पादन की लेवलाइज्ड कॉस्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी 35 डॉलर प्रति मेगावाट रही, जबकि वैश्विक औसत 44 डॉलर प्रति मेगावाट था। इससे भारत दुनिया के सबसे कम लागत वाले सौर ऊर्जा बाजारों में अपनी मजबूत पहचान बनाने में सफल रहा है।

    हाल ही में मंजूर की गई प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना से भी सौर ऊर्जा क्षेत्र को नई गति मिलने की उम्मीद है। इस योजना के तहत ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 5,000 मेगावाट क्षमता वाले फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक प्रोजेक्ट विकसित किए जाएंगे। इसके साथ कम से कम 10,000 मेगावाट घंटे की ऊर्जा भंडारण क्षमता तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे बिजली की अधिक मांग के समय राज्यों को बेहतर सहायता मिल सकेगी। जलाशयों और औद्योगिक तालाबों का उपयोग होने से भूमि पर अतिरिक्त दबाव भी कम होगा और बिजली ग्रिड की विश्वसनीयता में सुधार आएगा।

    देश में बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापित क्षमता 118.79 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। राजस्थान का भादला सोलर पार्क, कर्नाटक का पावगाडा सोलर पार्क और मध्य प्रदेश का रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पार्क देश की प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त रूफटॉप सोलर सिस्टम से 27.88 गीगावाट क्षमता प्राप्त हो रही है, जबकि हाइब्रिड और ऑफ-ग्रिड परियोजनाएं भी ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत बना रही हैं।

    भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता अब 283.46 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, जिसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त हो रही है। देश ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता विकसित करने और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सौर ऊर्जा क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति इन राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भारत की बढ़ती क्षमता, तकनीकी दक्षता और वैश्विक नेतृत्व की मजबूत तस्वीर प्रस्तुत करती है।

  • स्यूटा सीमा पर अचानक बढ़ी प्रवासियों की भीड़ ने बढ़ाई यूरोप की चिंता, आर्थिक संकट और अफवाहों की भी चर्चा

    स्यूटा सीमा पर अचानक बढ़ी प्रवासियों की भीड़ ने बढ़ाई यूरोप की चिंता, आर्थिक संकट और अफवाहों की भी चर्चा

    नई दिल्ली । स्पेन के उत्तर अफ्रीका स्थित स्वायत्त क्षेत्र स्यूटा में बड़ी संख्या में प्रवासियों के एक साथ पहुंचने की घटना ने पूरे यूरोप का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सीमावर्ती क्षेत्र में अचानक बढ़ी भीड़ के कारण सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया और प्रशासन को स्थिति नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर अवैध प्रवासन, सीमा प्रबंधन और मानवीय चुनौतियों को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है।

    स्यूटा भौगोलिक रूप से अफ्रीका महाद्वीप में स्थित स्पेन का एक क्षेत्र है, जिसकी सीमा सीधे मोरक्को से लगती है। यही कारण है कि यह लंबे समय से यूरोप पहुंचने की कोशिश करने वाले प्रवासियों के लिए प्रमुख प्रवेश बिंदु माना जाता रहा है। समुद्र और भूमि दोनों मार्गों से यहां पहुंचना अपेक्षाकृत आसान होने के कारण समय-समय पर बड़ी संख्या में लोग इस रास्ते का उपयोग करने का प्रयास करते हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार, इस बार अचानक बड़ी संख्या में लोगों के सीमा की ओर बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ सक्रिय रहे। इनमें कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर फैली गलत जानकारियां भी शामिल हैं। बताया गया कि स्पेन की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कुछ खबरों को मानव तस्करी से जुड़े नेटवर्क ने गलत तरीके से प्रचारित किया। इसके बाद यह अफवाह फैल गई कि समुद्री मार्ग से स्पेन पहुंचने वाले लोगों को तुरंत वापस नहीं भेजा जाएगा। ऐसी सूचनाओं ने कई लोगों को जोखिम उठाकर सीमा पार करने के लिए प्रेरित किया।

    दूसरा महत्वपूर्ण कारण मोरक्को की आर्थिक परिस्थितियों को माना जा रहा है। बेरोजगारी, महंगाई और सीमित रोजगार अवसरों के चलते बड़ी संख्या में युवा बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश जाने की कोशिश कर रहे हैं। कई प्रवासियों का मानना है कि यूरोप में उन्हें रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन स्तर के अधिक अवसर मिल सकते हैं। यही उम्मीद उन्हें कठिन और जोखिम भरी यात्रा के लिए भी तैयार कर देती है।

    भौगोलिक स्थिति भी इस पूरी घटना में अहम भूमिका निभाती है। स्यूटा और मेलिला अफ्रीका में स्थित स्पेन के दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहां से यूरोपीय संघ की सीमा तक पहुंच संभव है। इसी वजह से ये इलाके लंबे समय से अवैध प्रवासन के प्रमुख मार्ग माने जाते रहे हैं। कई प्रवासी समुद्र तैरकर, रबर ट्यूब या अन्य अस्थायी साधनों की मदद से स्यूटा के तट तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। अचानक बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से सीमा सुरक्षा एजेंसियों के सामने स्थिति को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो गया।

    घटना के बाद स्पेन सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करते हुए अतिरिक्त बलों की तैनाती की और सीमा पर निगरानी बढ़ा दी। प्रशासन ने मानवीय सहायता के साथ-साथ आव्रजन नियमों के अनुसार कार्रवाई शुरू की। जिन लोगों के पास वैध दस्तावेज नहीं थे, उनके मामलों की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच की गई तथा कई प्रवासियों को वापस भेजने की कार्रवाई भी की गई। वहीं, अस्थायी शिविरों और राहत व्यवस्थाओं पर भी प्रशासन को अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़े।

    इस घटनाक्रम ने पूरे यूरोप में सीमा सुरक्षा, मानव तस्करी और अवैध प्रवासन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सीमा सुरक्षा कड़ी करने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। इसके लिए मानव तस्करी के नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई, प्रवासन से जुड़े भ्रम फैलाने वाली अफवाहों पर रोक और मूल देशों में रोजगार एवं आर्थिक अवसरों को बढ़ाने जैसे दीर्घकालिक उपाय भी आवश्यक होंगे।

  • नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन पर दुनिया की नजर, शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से बढ़ सकती है कूटनीतिक सक्रियता

    नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन पर दुनिया की नजर, शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से बढ़ सकती है कूटनीतिक सक्रियता

    नई दिल्ली । सितंबर 2026 में आयोजित होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत करेगा और इस वैश्विक आयोजन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सम्मेलन से पहले सबसे अधिक चर्चा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को लेकर हो रही है। यदि उनका दौरा तय होता है, तो यह कोविड-19 महामारी और वर्ष 2020 के गलवान सीमा विवाद के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। ऐसे में इस संभावित दौरे को भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार BRICS शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होगा। सम्मेलन में सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की संभावना है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भी इसमें भाग लेने की उम्मीद जताई जा रही है। रूस की ओर से पहले ही उनकी भारत यात्रा के संकेत दिए जा चुके हैं। वहीं BRICS के नए सदस्य देशों में शामिल ईरान भी सम्मेलन में भाग लेगा, हालांकि उसकी ओर से किस स्तर का प्रतिनिधिमंडल आएगा, इस पर अंतिम निर्णय अभी शेष है।

    यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषय इस बैठक के प्रमुख एजेंडे में शामिल हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत बनाने के साथ-साथ वैश्विक चुनौतियों पर साझा रणनीति तैयार करने की दिशा में भी यह सम्मेलन अहम भूमिका निभा सकता है।

    BRICS सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले महीने किर्गिस्तान में आयोजित होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना भी जताई जा रही है। इस बैठक के दौरान रूस, चीन और ईरान सहित कई सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं के साथ उनकी द्विपक्षीय मुलाकातें हो सकती हैं। माना जा रहा है कि इन बैठकों में क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, संपर्क परियोजनाओं और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों पर विस्तृत चर्चा होगी।

    यदि शी जिनपिंग नई दिल्ली पहुंचते हैं, तो इसे भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद और अन्य मुद्दों को लेकर दोनों देशों के संबंधों में तनाव देखने को मिला था। हालांकि हाल के समय में विभिन्न स्तरों पर संवाद जारी रहा है और संभावित शीर्षस्तरीय मुलाकात से द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद जताई जा रही है।

    इस बीच वर्ष 2027 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित SCO शिखर सम्मेलन को लेकर भी चर्चा तेज है। पाकिस्तान के अध्यक्षता संभालने के बाद सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों को औपचारिक निमंत्रण भेजा जाएगा। ऐसे में भविष्य के क्षेत्रीय कूटनीतिक कार्यक्रमों को लेकर भी गतिविधियां बढ़ने की संभावना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंच वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रहेंगे। नई दिल्ली में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों, क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने का अवसर भी प्रदान कर सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें सदस्य देशों की आधिकारिक भागीदारी और संभावित द्विपक्षीय बैठकों पर टिकी हुई हैं।

  • सऊदी के प्रिंस ने ट्रंप को लगाया फोन…. ईरान पर अमेरिकी सेना के हमले के प्लान पर जताई चिंता

    सऊदी के प्रिंस ने ट्रंप को लगाया फोन…. ईरान पर अमेरिकी सेना के हमले के प्लान पर जताई चिंता


    नई दिल्ली।
    सऊदी अरब (Saudi Arabia) के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Crown Prince Mohammed bin Salman) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) से फोन पर बात की है. इस दौरान उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना की बड़े पैमाने पर नए हमले करने के प्लान पर चिंता जताई है।

    दो अमेरिकी अधिकारियों और इस फोन कॉल की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने इस बातचीत की पुष्टि की है. सूत्र ने ‘एक्सियोस’ को बताया, ‘सऊदी अरब ने अमेरिका की इस प्लानिंग पर गंभीर चिंता जताई है और पूरे प्लान पर सफाई मांगी है।

    दरअसल, जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए ईरानी मिसाइल हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही में हो रही रुकावटों के जवाब में ट्रंप बेहद सख्त रुख अपना रहे हैं. वो आने वाले दिनों में ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर जोरदार हमले करने के बारे में सोच रहे हैं।

    बातचीत की जानकारी रखने वाले दूसरे सूत्र ने बताया कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से हमलों को रोकने की अपील की है. हालांकि व्हाइट हाउस और वॉशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास ने इस मामले में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।


    सऊदी रक्षा मंत्री ने भी दिया शांति का संदेश

    इससे पहले, बुधवार को ट्रंप ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान से मुलाकात की थी. सूत्रों के मुताबिक, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ हुई बैठक में सऊदी रक्षा मंत्री ने बताया था कि उनका देश ईरान के साथ मामले को सुलझाने और तनाव घटाने के पक्ष में है।


    ईरान ने दी धमकी

    दूसरी तरफ, ईरान ने धमकी दी है कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो वो इजरायल और खाड़ी देशों के ऊर्जा और बुनियादी ठिकानों पर पलटवार करेगा. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शनिवार को सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्रियों से बात की।

    अपने टेलीग्राम चैनल पर जारी बयान के मुताबिक अराघची ने सऊदी विदेश मंत्री से कहा, ‘अमेरिका या इजरायल की किसी भी कार्रवाई या उसमें क्षेत्रीय देशों की भागीदारी का ईरान के सशस्त्र बल करारा और बराबर का जवाब देंगे।


    कतर कर रहा मध्यस्थता की कोशिश

    बता दें कि मिडिल-ईस्ट की जंग रोकने के लिए सऊदी अरब के साथ-साथ कतर, UAE, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश भी अमेरिका और ईरान पर दबाव बना रहे हैं. शनिवार को कतर ने ईरानी विदेश मंत्री, व्हाइट हाउस के दूत स्टीव विटकॉफ और ओमान के अधिकारियों से अलग-अलग बातचीत की, ताकि होर्मुज को फिर से खोलने पर सहमति बन सके।

  • अवैध घुसपैठ से निपटने के लिए समुद्र में 1600 फीट की दीवार बनाएगा स्पेन

    अवैध घुसपैठ से निपटने के लिए समुद्र में 1600 फीट की दीवार बनाएगा स्पेन


    मैड्रिड।
    मोरक्को (Morocco) से घुस आए अवैध प्रवासियों (Illegal Immigrants) के चलते स्पेन (Spain) में काफी समस्या हुई है। अब स्पेन ने इससे निपटने के लिए नया तरीका इस्तेमाल करने का फैसला किया है। स्पेन (Spain) ने घोषणा की है कि वह अपने उत्तरी अफ़्रीकी क्षेत्र स्यूटा और पड़ोसी मोरक्को के बीच समुद्री सीमा (Maritime border.) पर 500 मीटर लंबा (1,600 फीट) बैरियर बनाएगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, सेउटा के तटीय इलाके में ताराजल ब्रेकवॉटर के पास एक तैरता हुआ अवरोध लगाया गया था। गौरतलब है कि मोरक्को के साथ लगती स्पेन के सेउटा सीमा पर मरने वालों की संख्या बढ़कर 67 हो गई है। स्पेन सरकार ने शनिवार को यह जानकारी दी।


    ब्रेकवॉटर बैरियर को पार कर गए

    स्पेन सरकार ने कहाकि मृतकों में कुछ ऐसे लोग शामिल हैं जो डूब गए और कुछ ‘ब्रेकवॉटर बैरियर’ को पार करने की भगदड़ में मारे गए। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने सेउटा की घटनाओं पर यूरोपीय संघ के कुछ नेताओं की प्रतिक्रिया की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहाकि स्पेन को यूरोपीय संघ के सीमा-रहित शेंगेन क्षेत्र से निलंबित करने की मांग पूर्वाग्रह, फर्जी खबरों, अज्ञानता या राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित है। शनिवार सुबह तैरकर सेउटा के ताराजल तट पर पहुंचे कुछ थके-हारे प्रवासियों को सैनिकों ने सीमा के पार वापस भेज दिया।


    गृह मंत्रालय ने क्या कहा

    स्पेन के गृह मंत्रालय का कहना है कि उत्तरी अफ्रीका में स्पेन के इलाके में दाखिल होने वालों में ज्यादातर लोग पहले ही मोरक्को लौट चुके हैं। स्पेन के गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का ने शनिवार को सेउटा में पत्रकारों से कहाकि हम कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आते हैं। जब यह सवाल पूछा गया कि दोनों तरफ कड़ी सुरक्षा के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोग सीमा कैसे पार कर पाए और क्या मोरक्को से सेउटा को कोई खतरा है, तो मार्लास्का ने रबात में मौजूद सरकार का बचाव किया। उन्होंने कहाकि इन घटनाओं का स्पेन और मोरक्को को मिलकर जायजा लेने की जरूरत है। लेकिन पड़ोसी देशों के साथ सहयोग की वजह से ही स्पेन 24 घंटे में हालात को सामान्य कर पाया।


    इटनी ने शुरू की यात्रियों की जांच

    उधर, इटली ने स्पेन से आने वाले यात्रियों पर अस्थायी रूप से सीमा पर जांच शुरू कर दी है। फ्रांस ने भी अपनी सीमाओं पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री सांचेज ने यूरोपीय संघ के गृह मंत्रियों की आपातकालीन बैठक बुलाने का भी आह्वान किया है। करीब 84,000 की आबादी वाले सेउटा शहर पर इस अचानक आए दबाव के कारण स्पेन और पूरे यूरोप में राजनीतिक बहस छिड़ गई है। इटली ने हवाई और समुद्री मार्ग से स्पेन से आने वाले गैर-यूरोपीय संघ के नागरिकों की जांच शुरू कर दी है। इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने कहा कि यूरोपीय सीमाओं की सुरक्षा के लिए यह कदम आवश्यक था।

  • अमेरिका ने बढ़ाया रक्षा खर्च का दांव, 1.5 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक डिफेंस बजट की तैयारी

    अमेरिका ने बढ़ाया रक्षा खर्च का दांव, 1.5 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक डिफेंस बजट की तैयारी


    वाशिंगटन: अमेरिका अपनी सैन्य ताकत को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट को सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर काम कर रहा है। यह प्रस्ताव मंजूर होने पर अमेरिका के इतिहास के सबसे बड़े रक्षा बजटों में से एक होगा और इसका उद्देश्य सेना का आधुनिकीकरण, रक्षा उत्पादन क्षमता में विस्तार तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को और मजबूत करना है।

    कैंप डेविड में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कैबिनेट बैठक के दौरान हेगसेथ ने कहा कि सरकार केवल रक्षा बजट बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि पेंटागन की कार्यप्रणाली, खरीद प्रक्रिया और सैन्य ढांचे में भी व्यापक सुधार कर रही है। उन्होंने कहा कि रक्षा विभाग को पहले की तुलना में अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

    रक्षा सचिव ने बताया कि प्रशासन रक्षा कंपनियों को केवल सरकारी फंडिंग पर निर्भर रहने के बजाय निजी निवेश के जरिए अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। उनके अनुसार, अब तक रक्षा उद्योग में लगभग 75 अरब डॉलर का निजी निवेश हो चुका है। इस निवेश का उपयोग नए उत्पादन संयंत्र, आधुनिक उपकरण और नई असेंबली लाइनों की स्थापना में किया जा रहा है, जिससे भविष्य के हथियारों का निर्माण पहले की तुलना में अधिक तेजी से किया जा सकेगा।

    हेगसेथ का कहना है कि इस मॉडल से सरकारी खर्च का बोझ कम होगा और रक्षा कंपनियां अपनी क्षमता बढ़ाने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएंगी। उन्होंने इसे अमेरिकी रक्षा उद्योग को आत्मनिर्भर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

    उन्होंने सेना में भर्ती को लेकर भी सकारात्मक तस्वीर पेश की। उनके अनुसार, हाल के महीनों में अमेरिकी सशस्त्र बलों में भर्ती का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा है। उन्होंने दावा किया कि प्रशासन द्वारा योग्यता आधारित व्यवस्था पर जोर देने और सैन्य नेतृत्व को अधिक अधिकार देने के कारण युवाओं का सेना की ओर आकर्षण बढ़ा है।

    हेगसेथ ने यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में सेना के कई महत्वपूर्ण अभियान संचालित किए गए हैं। इनमें यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई, ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाने वाले सैन्य अभियान तथा अंतरराष्ट्रीय ड्रग कार्टेल के खिलाफ अभियान शामिल हैं। उन्होंने इन अभियानों को राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बैठक के दौरान रक्षा क्षेत्र में बड़े निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका अगले वर्ष 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट की उम्मीद कर रहा है और इसका बड़ा हिस्सा देश में निर्मित सैन्य उपकरणों पर खर्च किया जाएगा। ट्रंप के अनुसार, रक्षा निर्माण से जुड़ी कंपनियां पूरे अमेरिका में नए उत्पादन संयंत्र स्थापित कर रही हैं ताकि सैन्य जरूरतों को तेजी से पूरा किया जा सके।

    व्हाइट हाउस का मानना है कि वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों, आधुनिक युद्ध तकनीकों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए अमेरिकी सैन्य क्षमता को लगातार मजबूत करना आवश्यक है। प्रशासन का कहना है कि बढ़ा हुआ रक्षा बजट सैन्य आधुनिकीकरण, घरेलू रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा।

    हालांकि, प्रस्तावित 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट को लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी। रक्षा खर्च में इतनी बड़ी बढ़ोतरी को लेकर कांग्रेस में व्यापक चर्चा होने की संभावना है, क्योंकि इसका सीधा असर संघीय बजट और अन्य सरकारी खर्चों पर भी पड़ सकता है।

  • दक्षिणी लेबनान में गहराया जल संकट, 7 लाख से अधिक लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित; UN ने जताई गंभीर चिंता

    दक्षिणी लेबनान में गहराया जल संकट, 7 लाख से अधिक लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित; UN ने जताई गंभीर चिंता


    नई दिल्ली। दक्षिणी लेबनान में संघर्ष के कारण बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान ने मानवीय संकट को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जल आपूर्ति प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से लाखों लोगों के सामने स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में लौट रहे विस्थापित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।
    दक्षिणी लेबनान में संघर्ष के कारण बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान ने मानवीय संकट को और गंभीर बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि जल आपूर्ति प्रणाली के क्षतिग्रस्त होने से लाखों लोगों के सामने स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। संघर्ष प्रभावित इलाकों में लौट रहे विस्थापित परिवारों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय (ओसीएचए) के अनुसार, दक्षिण लेबनान जल प्राधिकरण द्वारा किए गए प्रारंभिक आकलन में सामने आया है कि दक्षिण और नबातियेह गवर्नरेट्स में जल आपूर्ति प्रणाली को हुए व्यापक नुकसान के कारण 7 लाख से अधिक लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच बाधित हो गई है।

    यूएन का कहना है कि तालाबों, पंपिंग स्टेशनों, बोरहोल और अन्य जल सुविधाओं को हुए नुकसान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। इसके कारण न केवल पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ गया है। कृषि गतिविधियां बाधित होने से हजारों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है।

    संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, संघर्ष के बाद अब तक 8.21 लाख से अधिक लोग अपने घरों और समुदायों में लौट चुके हैं, लेकिन करीब 3.60 लाख लोग अब भी विस्थापित हैं। इनमें लगभग 27 हजार लोग सामूहिक राहत शिविरों में रह रहे हैं और उन्हें भोजन, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की जरूरत बनी हुई है।

    मानवीय एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि लोगों का अपने घर लौट आना इस बात का संकेत नहीं है कि उनकी समस्याएं समाप्त हो गई हैं। बड़ी संख्या में घर क्षतिग्रस्त हैं, जल और बिजली जैसी बुनियादी सेवाएं पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी हैं और कई क्षेत्रों में आजीविका के साधन भी प्रभावित हुए हैं। ऐसे में राहत और पुनर्वास कार्यों में निरंतर निवेश की आवश्यकता है, ताकि प्रभावित समुदाय सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।

    इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने भी लेबनान में आम नागरिकों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बेरूत में अपने दौरे के समापन पर कहा कि संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के गंभीर उल्लंघन के आरोप सामने आए हैं और इनमें से कुछ मामलों को युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।

    टर्क के अनुसार, घनी आबादी वाले इलाकों में लगातार हवाई हमलों, गोलाबारी और विस्फोटक हथियारों के इस्तेमाल से बड़ी संख्या में आम नागरिकों की मौत हुई है, हजारों लोग घायल हुए हैं और व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि एक स्वतंत्र आकलन मिशन कथित उल्लंघनों से जुड़े साक्ष्य और जानकारियां एकत्र कर रहा है।

    लेबनानी अधिकारियों के हवाले से संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि 2 मार्च से शुरू हुए संघर्ष में 4,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 12,200 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मृतकों में 135 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी तथा कई पत्रकार और मीडिया कर्मी भी शामिल हैं।

    संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि प्रभावित क्षेत्रों में मानवीय सहायता, जल आपूर्ति व्यवस्था की बहाली और पुनर्निर्माण कार्यों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल और आवश्यक सेवाएं दोबारा उपलब्ध कराई जा सकें।

  • कैलिफोर्निया में क्रैश हुआ अमेरिका का एफ-35बी स्टील्थ फाइटर जेट, पायलट सुरक्षित; हादसे की जांच शुरू

    कैलिफोर्निया में क्रैश हुआ अमेरिका का एफ-35बी स्टील्थ फाइटर जेट, पायलट सुरक्षित; हादसे की जांच शुरू


    नई दिल्ली। अमेरिका के अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल एफ-35बी स्टील्थ फाइटर जेट कैलिफोर्निया में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अमेरिकी नौसेना और मरीन कॉर्प्स अधिकारियों ने हादसे की पुष्टि करते हुए बताया कि यह दुर्घटना सैन डिएगो स्थित मरीन कॉर्प्स एयर स्टेशन मिरामार के पास हुई। राहत और बचाव दल तुरंत मौके पर पहुंचा और पायलट को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

    अधिकारियों के अनुसार, यह हादसा शुक्रवार को स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 10 बजे हुआ। विमान में मौजूद पायलट ने खतरा भांपते हुए समय रहते इजेक्ट कर लिया, जिसके कारण उसकी जान बच गई। प्राथमिक उपचार के बाद उसे चिकित्सकीय जांच के लिए मेडिकल सुविधा में भेजा गया है। अधिकारियों ने बताया कि पायलट की स्थिति सुरक्षित है।

    मरीन कॉर्प्स एयर स्टेशन मिरामार के प्रवक्ता ने कहा कि एफ-35बी लड़ाकू विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की पुष्टि की गई है। उन्होंने बताया कि पायलट ने सफलतापूर्वक इजेक्शन किया और बचाव दल ने उसे सुरक्षित निकाल लिया। फिलहाल दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुर्घटनाग्रस्त विमान थर्ड मरीन एयरक्राफ्ट विंग के मरीन एयरक्राफ्ट ग्रुप-11 को आवंटित था। यह विमान नियमित सैन्य गतिविधियों के तहत उड़ान पर था। शुरुआती जानकारी में किसी तकनीकी खराबी या अन्य कारण की पुष्टि नहीं की गई है।

    एफ-35बी दुनिया के सबसे आधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत शॉर्ट टेकऑफ और वर्टिकल लैंडिंग क्षमता है। यही कारण है कि अमेरिकी मरीन कॉर्प्स इसका इस्तेमाल उन इलाकों में भी कर सकती है, जहां सामान्य लड़ाकू विमान आसानी से संचालन नहीं कर सकते। स्टील्थ तकनीक से लैस यह विमान दुश्मन के रडार से बचने, आधुनिक सेंसर और अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों के कारण अमेरिका की सैन्य ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    मरीन कॉर्प्स एयर स्टेशन मिरामार अमेरिका के प्रमुख सैन्य एयरबेस में से एक है। यहां अमेरिकी सेना की विभिन्न शाखाओं के लगभग 15 हजार सैन्यकर्मी तैनात रहते हैं और यह बेस कई महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों तथा प्रशिक्षण गतिविधियों का केंद्र है।

    हाल के महीनों में अमेरिका में सैन्य विमानों से जुड़े कई हादसे सामने आए हैं। जून की शुरुआत में वाशिंगटन राज्य में एक सैन्य लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिससे जंगल में आग लग गई थी। उस हादसे में भी पायलट समय रहते विमान से बाहर निकलने में सफल रहा था और उसे केवल मामूली चोटें आई थीं।

    इसी तरह मई में पश्चिमी अलबामा के फेयेट काउंटी में अमेरिकी वायुसेना का टी-38 टैलोन-2 प्रशिक्षण विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। उस घटना में भी दोनों पायलट सुरक्षित बच गए थे। हादसे के बाद एयर फोर्स सेफ्टी इन्वेस्टिगेशन बोर्ड ने जांच शुरू की थी।

    एफ-35बी के ताजा हादसे ने एक बार फिर अमेरिका के उन्नत सैन्य विमानों की सुरक्षा और रखरखाव को लेकर चर्चा तेज कर दी है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता विस्तृत तकनीकी जांच पूरी होने के बाद ही चल सकेगा।

  • ईरान के सत्ता गलियारों में बढ़ी हलचल, मोजतबा खामेनेई की लोकेशन पर सस्पेंस बरकरार

    ईरान के सत्ता गलियारों में बढ़ी हलचल, मोजतबा खामेनेई की लोकेशन पर सस्पेंस बरकरार


    नई दिल्ली। ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई पिछले कई महीनों से सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं और इसी वजह से उनकी मौजूदगी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चाएं तेज हो गई हैं। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषणों में दावा किया जा रहा है कि उनकी लोकेशन को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं लेकिन अब तक कोई आधिकारिक और स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी सामने नहीं आई है। यही कारण है कि यह मामला दुनिया की सबसे चर्चित भू राजनीतिक पहेलियों में शामिल होता जा रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार मोजतबा खामेनेई ने अपने पिता अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता की जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद से उन्होंने कुछ लिखित संदेश जरूर जारी किए हैं लेकिन किसी सार्वजनिक कार्यक्रम टेलीविजन संबोधन या आधिकारिक समारोह में दिखाई नहीं दिए। उनकी अनुपस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

    कई विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिका और इजरायल की खुफिया एजेंसियां उनकी गतिविधियों पर नजर रखने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई आधुनिक डिजिटल माध्यमों का बहुत सीमित उपयोग करते हैं या उनसे पूरी तरह दूरी बनाए हुए हैं। यदि ऐसा है तो इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के जरिए उनकी लोकेशन का पता लगाना स्वाभाविक रूप से अधिक कठिन हो सकता है।

    उनकी गैरमौजूदगी को लेकर अलग अलग तरह की अटकलें भी सामने आती रही हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि वह सुरक्षा कारणों से किसी सुरक्षित स्थान पर रह रहे हैं जबकि कुछ अन्य रिपोर्टों में उनके स्वास्थ्य को लेकर भी दावे किए गए हैं। हालांकि इन दावों की पुष्टि ईरानी सरकार या किसी विश्वसनीय आधिकारिक स्रोत की ओर से नहीं की गई है। इसलिए इन खबरों को केवल अपुष्ट रिपोर्टों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय तनाव और सुरक्षा चुनौतियों के बीच किसी भी शीर्ष नेतृत्व के लिए सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सख्त बनाया जाना असामान्य नहीं है। ईरान लंबे समय से पश्चिमी देशों और इजरायल के साथ तनावपूर्ण संबंधों का सामना करता रहा है। ऐसे माहौल में शीर्ष नेतृत्व की सार्वजनिक गतिविधियों को सीमित करना सुरक्षा रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। हालांकि इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं इसका स्पष्ट उत्तर फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईरान की सरकार अपने प्रशासनिक और राजनीतिक कामकाज को सामान्य रूप से जारी रखने का दावा करती रही है। कुछ सरकारी अधिकारियों ने यह भी कहा है कि सर्वोच्च नेतृत्व आवश्यक निर्णय ले रहा है लेकिन उनके सार्वजनिक कार्यक्रम सीमित हैं। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार इस विषय पर नजर बनाए हुए हैं और किसी आधिकारिक तस्वीर या सार्वजनिक उपस्थिति का इंतजार कर रहे हैं।

    फिलहाल मोजतबा खामेनेई की मौजूदगी को लेकर कई तरह की चर्चाएं जरूर हैं लेकिन उनके ठिकाने या स्वास्थ्य संबंधी किसी भी दावे की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में इस मामले को लेकर सामने आ रही अपुष्ट जानकारियों के बजाय आधिकारिक बयानों और विश्वसनीय स्रोतों पर ही भरोसा करना उचित होगा। आने वाले समय में यदि ईरान की ओर से कोई सार्वजनिक उपस्थिति या आधिकारिक जानकारी जारी की जाती है तो इस रहस्य से जुड़ी कई अटकलों पर विराम लग सकता है।

  • अमेरिका-ईरान के बीच फिर गहराया तनाव, नए सैन्य हमले के संकेत, व्हाइट हाउस ने तेहरान को दी चेतावनी

    अमेरिका-ईरान के बीच फिर गहराया तनाव, नए सैन्य हमले के संकेत, व्हाइट हाउस ने तेहरान को दी चेतावनी


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव गहराता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि ईरान के खिलाफ नए सैन्य हमले किए जा सकते हैं। व्हाइट हाउस का आरोप है कि तेहरान ने युद्धविराम समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और क्षेत्र में आक्रामक गतिविधियां जारी रखीं।

    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा पूरी तरह खोले और पिछले महीने हुए सीजफायर समझौते का सम्मान करे। उन्होंने आरोप लगाया कि समझौते पर हस्ताक्षर के बावजूद ईरान ने उस पर अमल नहीं किया, व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाया और अमेरिकी सैनिकों की जान ली। उनके अनुसार, ऐसे कदम आतंकवादी गतिविधियों जैसे हैं और अमेरिका इसका जवाब देगा।

    हालांकि बीती रात ईरान पर कोई अमेरिकी हमला नहीं हुआ, लेकिन ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया कि उसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दो और तेल टैंकरों को निशाना बनाया। वहीं कुवैत ने भी अपने हवाई क्षेत्र में घुसे ड्रोन को मार गिराने की जानकारी दी।

    ‘ईरान को कीमत चुकानी होगी’
    कैरोलिन लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ऐसी गतिविधियों को नजरअंदाज नहीं करेंगे। उनका कहना था कि जब तक ईरान अमेरिका की शर्तों के अनुसार बातचीत के लिए तैयार नहीं होता, तब तक उसे अपने कदमों की कीमत चुकानी पड़ेगी।

    ट्रंप बोले- जोरदार कार्रवाई करेंगे
    मैरीलैंड स्थित कैंप डेविड में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने भी ईरान पर सख्त कार्रवाई के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर “बहुत जोरदार हमला” करेगा और अंततः ईरान को पीछे हटना पड़ेगा। ट्रंप ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल जीत हासिल करना है।

    भारत-पाकिस्तान का भी किया जिक्र
    बातचीत के दौरान ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान तनाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने दोनों देशों के बीच संघर्ष रुकवाने में भूमिका निभाई और टैरिफ का हवाला देकर संभावित परमाणु टकराव टालने की बात कही। हालांकि भारत सरकार पहले भी ट्रंप के इस दावे को स्पष्ट रूप से खारिज कर चुकी है।