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  • ‘बांग्लादेश की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं’, भारतीय उच्चायुक्त के बयान के विरोध में नाहिद इस्लाम और जमात का सख्त रुख

    ‘बांग्लादेश की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं’, भारतीय उच्चायुक्त के बयान के विरोध में नाहिद इस्लाम और जमात का सख्त रुख


    नई दिल्ली ।
    भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों के बीच एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी ने नई चर्चा को जन्म दे दिया है। बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख नेता नाहिद इस्लाम ने भारत के नवनियुक्त उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी की एक टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि भारत और बांग्लादेश की पहचान, संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्तित्व अलग-अलग हैं तथा दोनों देशों को इसी आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाना चाहिए।

    यह विवाद उस समय सामने आया जब हाल ही में ढाका में कार्यभार संभालने वाले भारतीय उच्चायुक्त ने दोनों देशों के लोगों के बीच गहरे संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और बांग्लादेश एक ही आसमान और हवा साझा करते हैं। उनका उद्देश्य दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक निकटता और सहयोग को रेखांकित करना था, लेकिन इस बयान को लेकर बांग्लादेश के कुछ राजनीतिक दलों ने अलग दृष्टिकोण अपनाया।

    चट्टोग्राम में आयोजित एक राजनीतिक रैली के दौरान नाहिद इस्लाम ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बांग्लादेश एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है तथा उसकी राष्ट्रीय पहचान किसी भी अन्य देश से अलग है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश सभी देशों के साथ सम्मान और समानता के आधार पर संबंध चाहता है, लेकिन किसी भी प्रकार के प्रभाव या वर्चस्व की धारणा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनके बयान को वहां मौजूद समर्थकों ने भी समर्थन दिया।

    नाहिद इस्लाम ने अपने संबोधन में भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े कुछ पुराने मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने सीमा सुरक्षा, सीमा पर होने वाली घटनाओं और जल संसाधनों से जुड़े मामलों को दोनों देशों के संबंधों में संवेदनशील विषय बताया। उनका कहना था कि इन मुद्दों का समाधान आपसी विश्वास और संवाद के माध्यम से होना चाहिए ताकि द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक वातावरण बना रहे।

    इस मुद्दे पर केवल एनसीपी ही नहीं, बल्कि जमात-ए-इस्लामी ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पार्टी नेतृत्व ने भारतीय उच्चायुक्त की टिप्पणी को लेकर स्पष्टीकरण की मांग उठाई है। इससे स्पष्ट है कि बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में भारत से जुड़े विषय अभी भी महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों के रूप में मौजूद हैं और विभिन्न दल इन पर अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश में बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच भारत से जुड़े मुद्दों पर बयानबाजी का प्रभाव आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब दोनों देशों के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार संवाद जारी है, राजनीतिक बयान संबंधों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे रहे हैं।

    भारत और बांग्लादेश के संबंध दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय साझेदारियों में गिने जाते हैं। दोनों देशों ने पिछले वर्षों में कई क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत किया है। हालांकि समय-समय पर राजनीतिक बयान और घरेलू मुद्दों से जुड़ी प्रतिक्रियाएं सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करती रही हैं। मौजूदा घटनाक्रम भी इसी क्रम की एक कड़ी माना जा रहा है, जिस पर दोनों देशों के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है।

  • होर्मुज संकट के बीच मानवीय त्रासदी: ओमान के पास खड़े जहाज पर भारतीय नाविक की मौत, पार्थिव शरीर को लेकर इंतजार जारी

    होर्मुज संकट के बीच मानवीय त्रासदी: ओमान के पास खड़े जहाज पर भारतीय नाविक की मौत, पार्थिव शरीर को लेकर इंतजार जारी

    नई दिल्ली । ओमान के डुक्म पोर्ट के निकट खड़े एक व्यापारी जहाज पर तैनात भारतीय अधिकारी की मृत्यु के बाद समुद्री क्षेत्र में उत्पन्न मानवीय चुनौतियां एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। जहाज पर मौजूद भारतीय सेकंड ऑफिसर निशांत उर्थनाथन की बीमारी के कारण मौत हो गई, जिसके बाद उनके पार्थिव शरीर को सुरक्षित रखने और स्वदेश वापस भेजने को लेकर गंभीर स्थिति पैदा हो गई है।

    करीब 35 वर्षीय निशांत उर्थनाथन तमिलनाडु के निवासी थे और एमटी सेलेस्टियल नामक जहाज पर सेकंड ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे। जानकारी के अनुसार 11 जून को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध न होने और परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के बीच उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद से उनका शव जहाज पर ही रखा गया है, जबकि जहाज अभी भी ओमान के तट के पास खड़ा हुआ है।

    स्थिति को और जटिल बनाने वाली बात यह है कि जहाज पर शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कोल्ड स्टोरेज या विशेष सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में क्रू सदस्यों ने उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से पार्थिव शरीर को सुरक्षित रखने का प्रयास किया है। बताया जा रहा है कि ठंडे पानी की बोतलों और अस्थायी उपायों के जरिए शव को संरक्षित रखने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक कारगर नहीं रह सकती।

    जहाज के कप्तान ने एक वीडियो संदेश जारी कर अंतरराष्ट्रीय समुद्री एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों से तत्काल सहायता की मांग की है। उन्होंने बताया कि जहाज पर मौजूद कर्मचारी बेहद कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और पार्थिव शरीर को सम्मानजनक ढंग से सुरक्षित रखने के लिए तत्काल मदद की आवश्यकता है। कप्तान ने यह भी कहा कि समय बीतने के साथ स्थिति और चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

    इस बीच भारतीय अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आवश्यक कदम शुरू कर दिए हैं। संबंधित एजेंसियां जहाज के प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर पार्थिव शरीर को जल्द से जल्द भारत लाने की प्रक्रिया पर काम कर रही हैं। परिवार तक भी स्थिति की जानकारी पहुंचाई गई है और आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है।

    यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब पश्चिम एशिया के समुद्री क्षेत्रों में तनाव और अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है। क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अनेक समुद्री कर्मियों को लंबे समय तक समुद्र में ही रहना पड़ रहा है। कई जहाज निर्धारित समय से अधिक अवधि तक विभिन्न बंदरगाहों और समुद्री मार्गों में फंसे हुए हैं, जिससे कर्मचारियों के सामने मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर पड़ने वाले प्रभावों के साथ-साथ ऐसे घटनाक्रम मानवीय दृष्टिकोण से भी गंभीर चिंता का विषय हैं। समुद्र में फंसे कर्मचारियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और आपातकालीन सहायता व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता बन गया है।

    फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता निशांत उर्थनाथन के पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक स्वदेश पहुंचाना और उनके परिजनों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना है। साथ ही यह घटना समुद्री क्षेत्र में कार्यरत हजारों कर्मचारियों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़े व्यापक प्रश्न भी सामने ला रही है।

  • भारत और केन्या ने मजबूत आर्थिक सहयोग का खाका तैयार किया, व्यापार, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष फोकस

    भारत और केन्या ने मजबूत आर्थिक सहयोग का खाका तैयार किया, व्यापार, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष फोकस

    नई दिल्ली । भारत और केन्या के बीच आर्थिक, व्यापारिक और विकास सहयोग को नई दिशा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली है। दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच हालिया बैठकों में कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल, ऊर्जा और निवेश जैसे प्रमुख क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाने पर व्यापक चर्चा की गई। इस दौरान भविष्य में सहयोग के नए अवसरों की पहचान करने और निवेश को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।

    भारत और केन्या के बीच लंबे समय से मजबूत राजनयिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। हाल के संवादों में दोनों देशों ने इस संबंध को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। विशेष रूप से कृषि और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्र को सहयोग का प्रमुख आधार माना गया, जहां भारतीय तकनीक, विशेषज्ञता और निवेश के माध्यम से स्थानीय उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

    स्वास्थ्य क्षेत्र भी चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। दोनों पक्षों ने गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, चिकित्सा अवसंरचना के विकास और स्वास्थ्य तकनीकों के आदान-प्रदान की संभावनाओं पर विचार किया। भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र की विशेषज्ञता और दवा उद्योग की वैश्विक पहचान को देखते हुए इस क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं काफी व्यापक मानी जा रही हैं।

    शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने साझेदारी को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की। आधुनिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। दोनों देशों का मानना है कि मानव संसाधन विकास भविष्य की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    खेल क्षेत्र में भी सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। खेल प्रशिक्षण, खेल अवसंरचना और प्रतिभा विकास कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देशों के बीच अनुभवों और संसाधनों के आदान-प्रदान की संभावनाएं तलाशने पर सहमति बनी। इससे युवाओं के लिए नए अवसर तैयार हो सकते हैं और खेल संबंधों को भी मजबूती मिल सकती है।

    इस बीच, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के प्रयास भी जारी हैं। व्यापारिक बैठकों के दौरान बाजार पहुंच को बेहतर बनाने, व्यापारिक बाधाओं को कम करने और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक संबंधों को अधिक संतुलित, विविधतापूर्ण और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए।

    ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल रहा। स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं, तकनीकी सहयोग और निवेश के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इसके अलावा डिजिटल अवसंरचना, फिनटेक, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण और बुनियादी ढांचा विकास जैसे क्षेत्रों को भी भविष्य की साझेदारी के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में देखा जा रहा है।

    दोनों देशों ने व्यापार को सुगम बनाने और संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी सकारात्मक कदम उठाए हैं। सीमा शुल्क और व्यापारिक सूचनाओं के आदान-प्रदान से जुड़े समझौतों को द्विपक्षीय व्यापार की पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और केन्या के बीच बढ़ता सहयोग न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचाएगा, बल्कि अफ्रीका और एशिया के बीच आर्थिक संपर्क को भी नई मजबूती देगा। आने वाले वर्षों में निवेश, व्यापार और विकास साझेदारी के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध और अधिक गहरे होने की संभावना है।

  • ओमान तट पर भारतीय नाविकों की मौत की अफवाह निकली झूठी, विदेश मंत्रालय ने बताया सुरक्षित है पूरा क्रू

    ओमान तट पर भारतीय नाविकों की मौत की अफवाह निकली झूठी, विदेश मंत्रालय ने बताया सुरक्षित है पूरा क्रू


    नई दिल्ली ।
    ओमान के तट के निकट संचालित एक व्यापारी जहाज पर कथित हमले और भारतीय नाविकों के हताहत होने की खबरों को लेकर फैली आशंकाओं के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जहाज पर मौजूद सभी चालक दल के सदस्य पूरी तरह सुरक्षित हैं। इस स्पष्टीकरण के बाद सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर चल रही अफवाहों पर विराम लग गया है।

    हाल के दिनों में समुद्री सुरक्षा और पश्चिम एशिया क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच एक जहाज को लेकर कई तरह के दावे सामने आए थे। कुछ रिपोर्टों में कहा गया था कि ओमान के तट के पास जहाज पर हमला हुआ है और उसमें सवार भारतीय नाविकों को नुकसान पहुंचा है। इन खबरों के प्रसारित होने के बाद नाविकों के परिवारों और समुद्री क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच चिंता का माहौल बन गया था।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संबंधित अधिकारियों ने तत्काल तथ्यों की पुष्टि की प्रक्रिया शुरू की। जांच और प्रत्यक्ष संपर्क के बाद यह स्पष्ट हुआ कि जहाज पर किसी प्रकार का हमला नहीं हुआ है और चालक दल के सभी सदस्य सुरक्षित हैं। अधिकारियों ने बताया कि जहाज के संचालन और क्रू की स्थिति सामान्य है तथा किसी भी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।

    जानकारी के अनुसार, भ्रम की स्थिति तब पैदा हुई जब जहाज से संपर्क स्थापित करने में अस्थायी तकनीकी कठिनाई सामने आई। संचार व्यवस्था में आई रुकावट के कारण कुछ समय तक जहाज से नियमित संपर्क नहीं हो सका। इसी दौरान विभिन्न माध्यमों पर कई अपुष्ट दावे सामने आने लगे, जिन्हें बाद में तथ्यों के आधार पर गलत पाया गया।

    समुद्री क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी दूरी तक संचालित होने वाले जहाजों में संचार संबंधी तकनीकी समस्याएं असामान्य नहीं हैं। कई बार रेडियो या अन्य संचार उपकरणों में अस्थायी बाधा आने से संपर्क प्रभावित हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ किसी दुर्घटना या सुरक्षा संकट से नहीं होता। ऐसे मामलों में आधिकारिक पुष्टि का इंतजार करना आवश्यक माना जाता है।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि जहाज की स्थिति पर लगातार नजर रखी गई और उपलब्ध सभी माध्यमों से उसकी गतिविधियों की निगरानी की गई। संबंधित अधिकारियों ने जहाज के जिम्मेदार कर्मियों से संपर्क कर वास्तविक स्थिति की पुष्टि की, जिसके बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि जहाज और उस पर मौजूद सभी लोग सुरक्षित हैं।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और सुरक्षा संबंधी मामलों में अपुष्ट सूचनाओं का प्रसार कितनी तेजी से भ्रम पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाली किसी भी जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना आवश्यक है, विशेषकर तब जब मामला मानव जीवन और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हो।

    सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे समुद्री सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं और भारतीय नागरिकों से संबंधित किसी भी संवेदनशील सूचना पर भरोसा करने से पहले आधिकारिक पुष्टि का इंतजार करें। साथ ही भ्रामक और अप्रमाणित खबरों को आगे बढ़ाने से बचें ताकि अनावश्यक डर और भ्रम की स्थिति पैदा न हो।

  • छोटे स्टार्टअप को बनाया टेक दिग्गज, भारतीय मूल की जयश्री अमेरिका की शीर्ष सेल्फ-मेड महिलाओं में शामिल

    छोटे स्टार्टअप को बनाया टेक दिग्गज, भारतीय मूल की जयश्री अमेरिका की शीर्ष सेल्फ-मेड महिलाओं में शामिल

    नई दिल्ली । भारतीय मूल की कारोबारी नेता जयश्री उल्लाल ने वैश्विक तकनीकी जगत में एक ऐसी सफलता की कहानी लिखी है, जो दूरदर्शिता, नेतृत्व क्षमता और निरंतर मेहनत का प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है। एक समय बेहद छोटे स्तर पर काम करने वाली कंपनी की कमान संभालने वाली जयश्री आज अमेरिका की सबसे सफल सेल्फ-मेड महिलाओं में शामिल हैं। उनकी उपलब्धि न केवल भारतीय समुदाय के लिए गर्व का विषय है, बल्कि दुनिया भर की महिला उद्यमियों और पेशेवरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

    जयश्री उल्लाल का शुरुआती जीवन भारत से गहराई से जुड़ा रहा। तकनीक और इंजीनियरिंग के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका पहुंचाया, जहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और इंजीनियरिंग मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की। तकनीकी क्षेत्र में मजबूत शैक्षणिक आधार ने उनके करियर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत उन्होंने सेमीकंडक्टर और तकनीकी कंपनियों में विभिन्न जिम्मेदारियों के साथ की। इसके बाद नेटवर्किंग उद्योग की अग्रणी कंपनियों में काम करते हुए उन्होंने तकनीकी नवाचार, उत्पाद विकास और वैश्विक व्यवसाय संचालन की गहरी समझ विकसित की। यही अनुभव आगे चलकर उनके लिए नेतृत्व की मजबूत नींव साबित हुआ।

    करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने एक उभरती हुई नेटवर्किंग कंपनी की कमान संभाली। उस समय कंपनी सीमित संसाधनों और बेहद कम बाजार हिस्सेदारी के साथ संघर्ष कर रही थी। अधिकांश विशेषज्ञों को उसके भविष्य पर संदेह था, लेकिन जयश्री ने बदलती तकनीकी दुनिया में नए अवसरों को समय रहते पहचान लिया। उन्होंने अनुमान लगाया कि क्लाउड कंप्यूटिंग और बड़े डेटा सेंटर आने वाले वर्षों में पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा बदल देंगे।

    इस सोच के आधार पर कंपनी ने अपने उत्पादों और सेवाओं को आधुनिक क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना शुरू किया। जैसे-जैसे दुनिया डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड सेवाओं और बाद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर बढ़ी, कंपनी के समाधान तेजी से लोकप्रिय होते गए। परिणामस्वरूप कंपनी ने वैश्विक तकनीकी बाजार में मजबूत पहचान बनाई और निवेशकों का भरोसा भी हासिल किया।

    जयश्री के नेतृत्व में कंपनी ने न केवल कारोबार का विस्तार किया बल्कि नवाचार और गुणवत्ता के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान स्थापित की। आज उसके उत्पाद दुनिया भर के बड़े डेटा सेंटरों, क्लाउड सेवा प्रदाताओं और तकनीकी संस्थानों में उपयोग किए जाते हैं। कंपनी की यह सफलता सीधे तौर पर जयश्री की रणनीतिक सोच और नेतृत्व क्षमता से जुड़ी मानी जाती है।

    जयश्री उल्लाल की उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उन्होंने यह मुकाम किसी पारिवारिक कारोबारी विरासत के सहारे नहीं बल्कि अपनी योग्यता, तकनीकी समझ और पेशेवर अनुभव के दम पर हासिल किया है। उनकी सफलता इस बात का उदाहरण है कि सही दृष्टिकोण, जोखिम उठाने का साहस और लगातार सीखते रहने की क्षमता किसी भी व्यक्ति को वैश्विक स्तर पर पहचान दिला सकती है।

    वैश्विक मंच पर भारतीय मूल की कई महिलाएं आज तकनीक, वित्त, स्वास्थ्य सेवा, मनोरंजन और कॉरपोरेट नेतृत्व के क्षेत्र में प्रभावशाली भूमिका निभा रही हैं। जयश्री उल्लाल की कहानी इसी नई पीढ़ी की सफलता का प्रतीक है, जिसने अपनी प्रतिभा और नेतृत्व के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को और मजबूत किया है।

  • पुतिन की सुरक्षा पर हाईटेक पहरा, एआई ट्रैकिंग की आशंका के बीच बढ़ाई गई गोपनीयता

    पुतिन की सुरक्षा पर हाईटेक पहरा, एआई ट्रैकिंग की आशंका के बीच बढ़ाई गई गोपनीयता

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल निगरानी तकनीकों के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए हैं। आधुनिक तकनीक के माध्यम से संभावित ट्रैकिंग, निगरानी और सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए क्रेमलिन ने कई अतिरिक्त सावधानियां लागू की हैं। इन कदमों को वैश्विक स्तर पर बदलते सुरक्षा परिदृश्य और हाईटेक खतरों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    रूस की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि वर्तमान समय में एआई आधारित विश्लेषण प्रणालियां विशाल मात्रा में उपलब्ध डिजिटल डेटा का बेहद कम समय में अध्ययन कर सकती हैं। सीसीटीवी फुटेज, सार्वजनिक गतिविधियों, यात्रा पैटर्न और अन्य डिजिटल संकेतों के आधार पर किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की गतिविधियों का आकलन करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। इसी कारण सुरक्षा व्यवस्था में तकनीकी जोखिमों को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

    जानकारों के अनुसार राष्ट्रपति से जुड़े कई संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी प्रणालियों की समीक्षा की गई है। कुछ स्थानों पर डिजिटल नेटवर्क को सीमित करने तथा सुरक्षा ढांचे को बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त उपाय अपनाए गए हैं। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रकार की साइबर घुसपैठ या डेटा विश्लेषण के माध्यम से संवेदनशील जानकारी तक पहुंच न बनाई जा सके।

    राष्ट्रपति की सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य सहयोगियों के लिए भी नए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। सुरक्षा कारणों से उनके आवागमन, संचार माध्यमों और डिजिटल उपकरणों के उपयोग को लेकर अधिक सतर्कता बरती जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि किसी भी उच्च पदस्थ व्यक्ति की जानकारी तक पहुंच उसके आसपास मौजूद लोगों के माध्यम से भी संभव हो सकती है, इसलिए संपूर्ण सुरक्षा श्रृंखला को मजबूत करना आवश्यक है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियां अब केवल पारंपरिक खतरों तक सीमित नहीं रह गई हैं। पहले जहां सुरक्षा का केंद्र भौतिक हमलों, जासूसी गतिविधियों या सैन्य जोखिमों पर होता था, वहीं अब डेटा, एल्गोरिदम और डिजिटल विश्लेषण भी सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। एआई आधारित प्रणालियां सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं को जोड़कर व्यवहारिक पैटर्न और संभावित गतिविधियों का अनुमान लगाने में सक्षम होती जा रही हैं।

    हाल के वर्षों में दुनिया के कई देशों ने साइबर सुरक्षा और डिजिटल गोपनीयता को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रमुख स्तंभों में शामिल किया है। रूस भी इसी दिशा में अपने सुरक्षा ढांचे को लगातार अपडेट कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में उच्च पदस्थ नेताओं की सुरक्षा केवल हथियारबंद सुरक्षा कर्मियों या सुरक्षित परिसरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि डिजिटल डेटा की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

    तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार एआई, सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन तकनीक और साइबर इंटेलिजेंस ने सुरक्षा की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। ऐसे में विश्व की प्रमुख शक्तियां अपने नेतृत्व, सैन्य प्रतिष्ठानों और संवेदनशील ढांचों की सुरक्षा के लिए नई रणनीतियां विकसित कर रही हैं। रूस द्वारा उठाए गए हालिया कदम इसी व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

  • होर्मुज संकट के बीच ‘डार्क फ्लीट’ रणनीति चर्चा में, तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए चला विशेष अभियान

    होर्मुज संकट के बीच ‘डार्क फ्लीट’ रणनीति चर्चा में, तेल आपूर्ति बनाए रखने के लिए चला विशेष अभियान

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने दावा किया है कि क्षेत्रीय चुनौतियों के बावजूद बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में सफलता हासिल की गई है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा व्यापार की रणनीतियों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचता है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी प्रकार का तनाव सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों, तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है। हाल के महीनों में इसी मार्ग को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच अमेरिका ने वैकल्पिक संचालन व्यवस्था अपनाकर तेल परिवहन जारी रखने का प्रयास किया।

    जानकारी के अनुसार तेल परिवहन की प्रक्रिया को कई चरणों में अंजाम दिया गया। शुरुआती चरण में खाड़ी क्षेत्र के तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल को टैंकरों के माध्यम से निर्धारित समुद्री क्षेत्रों तक पहुंचाया गया। इसके बाद समुद्र में ही एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल स्थानांतरित करने की व्यवस्था अपनाई गई। इस प्रक्रिया का उद्देश्य संवेदनशील समुद्री मार्गों पर जोखिम को कम करना और आपूर्ति श्रृंखला को बाधित होने से बचाना बताया जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की रणनीति केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। समुद्र में जहाज-से-जहाज तेल हस्तांतरण लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा उद्योग का हिस्सा रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका उपयोग अधिक व्यापक स्तर पर देखने को मिला है। इससे तेल परिवहन करने वाली कंपनियों को वैकल्पिक विकल्प उपलब्ध हुए और संभावित अवरोधों के बावजूद आपूर्ति जारी रखी जा सकी।

    समुद्री गतिविधियों की निगरानी करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ जहाजों ने अपनी लोकेशन संबंधी सार्वजनिक सूचनाओं को सीमित रखा, जिसके कारण उनकी गतिविधियों पर सामान्य निगरानी प्रणालियों की पकड़ कम रही। ऐसी गतिविधियों को अक्सर ‘डार्क ट्रांजिट’ की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों और सुरक्षा मानकों के संदर्भ में लगातार बहस का विषय बनी रहती है।

    ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बनाए रखना था। यदि तेल आपूर्ति बाधित होती तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता था, जिसका असर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता। इसलिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा और वैकल्पिक लॉजिस्टिक नेटवर्क तैयार करना ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक शक्तियां केवल सैन्य क्षमता ही नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा को भी अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल रखेंगी। होर्मुज क्षेत्र से जुड़ी ताजा गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक हित अब पहले से कहीं अधिक गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में होने वाला प्रत्येक घटनाक्रम वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • समुद्र की 7,000 मीटर गहराई में छिपा है रहस्य, जहां लाखों व्हेलों के अवशेषों ने बसाई नई दुनिया

    समुद्र की 7,000 मीटर गहराई में छिपा है रहस्य, जहां लाखों व्हेलों के अवशेषों ने बसाई नई दुनिया


    नई दिल्ली ।
    हिंद महासागर की अथाह गहराइयों में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है जिसने समुद्री जीवन और पृथ्वी के जैविक इतिहास को लेकर नई जिज्ञासाएं पैदा कर दी हैं। शोधकर्ताओं को समुद्र की तलहटी में एक विशाल क्षेत्र मिला है, जहां लाखों वर्षों से व्हेल मछलियों के अवशेष जमा होते रहे हैं। वैज्ञानिक इसे दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी व्हेल-फॉल साइट या व्हेल कब्रिस्तान मान रहे हैं।

    यह खोज समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह क्षेत्र न केवल प्राचीन व्हेल प्रजातियों के जीवाश्मों का विशाल भंडार है, बल्कि यहां एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित हो चुका है जो पूरी तरह व्हेलों के अवशेषों पर निर्भर है। समुद्र की अत्यधिक गहराई में मौजूद यह दुनिया जीवन और मृत्यु के अनोखे संबंध को दर्शाती है।

    वैज्ञानिकों ने समुद्र की लगभग 7,000 मीटर गहराई तक जाकर अध्ययन किया। इस दौरान उन्हें सैकड़ों ऐसे स्थान मिले जहां व्हेलों के कंकाल, जीवाश्म और अन्य अवशेष मौजूद थे। जांच में कई प्राचीन प्रजातियों के प्रमाण मिले, जिनमें कुछ जीवाश्म लाखों वर्ष पुराने बताए जा रहे हैं। शोधकर्ताओं को एक ऐसी विलुप्त व्हेल प्रजाति के अवशेष भी मिले, जिसके बारे में पहले कोई वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी।

    सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में व्हेलों के अवशेष इसी क्षेत्र में क्यों जमा हुए। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे दो प्रमुख कारण हो सकते हैं। पहला, यह इलाका अतीत में व्हेलों के लिए भोजन का समृद्ध स्रोत रहा होगा, जिससे बड़ी संख्या में व्हेल यहां आती रही होंगी। दूसरा, समुद्र की तलहटी की विशेष भौगोलिक संरचना मृत व्हेलों के अवशेषों को इसी क्षेत्र में इकट्ठा होने के लिए अनुकूल बनाती है।

    शोध के दौरान यह भी सामने आया कि व्हेलों के सड़ते हुए शरीर समुद्र की गहराइयों में जीवन का नया आधार बन जाते हैं। सामान्य तौर पर इतनी गहराई वाले क्षेत्रों में भोजन की भारी कमी होती है, लेकिन यहां व्हेलों के अवशेषों से निकलने वाले पोषक तत्व अनेक समुद्री जीवों के लिए ऊर्जा का स्रोत बन गए हैं। कंकालों के आसपास विभिन्न प्रकार के समुद्री जीव, कीड़े, झींगे, केकड़े और अन्य सूक्ष्म जीव बड़ी संख्या में पाए गए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से कई जीव प्रजातियां विज्ञान के लिए पूरी तरह नई हो सकती हैं। इस कारण यह क्षेत्र केवल जीवाश्म अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि जैव विविधता और समुद्री विकासक्रम को समझने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है। वैज्ञानिक अब यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि इस तरह के पारिस्थितिकी तंत्र समुद्र की गहराइयों में जीवन को कैसे बनाए रखते हैं।

    पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह खोज काफी अहम मानी जा रही है। व्हेलों के अवशेषों में बड़ी मात्रा में कार्बन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है, जिससे समुद्री कार्बन चक्र और वैश्विक जलवायु संतुलन पर प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन भविष्य में समुद्री संरक्षण और जलवायु अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध करा सकता है।

    यह खोज एक बार फिर साबित करती है कि पृथ्वी के महासागरों की गहराइयों में अभी भी ऐसे अनेक रहस्य छिपे हुए हैं, जिनके बारे में मानव ज्ञान बेहद सीमित है। समुद्र की अंधेरी दुनिया में मिला यह विशाल व्हेल कब्रिस्तान वैज्ञानिकों के लिए आने वाले वर्षों तक शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहेगा।

  • मस्क की दौलत में उछाल, दुनिया के हर इंसान को बांटे तो मिल सकते हैं 10 हजार रुपये, बने पहले ट्रिलियनेयर

    मस्क की दौलत में उछाल, दुनिया के हर इंसान को बांटे तो मिल सकते हैं 10 हजार रुपये, बने पहले ट्रिलियनेयर


    नई दिल्ली। दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने एक नया इतिहास रच दिया है। स्पेसएक्स के शेयर बाजार में शानदार प्रदर्शन के बाद उनकी कुल संपत्ति 1.1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 92 लाख करोड़ रुपये) से अधिक पहुंच गई है। इसके साथ ही वह दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन गए हैं। उनकी संपत्ति इतनी विशाल है कि यदि इसे दुनिया की पूरी आबादी में बराबर बांट दिया जाए तो हर व्यक्ति को लगभग 122 डॉलर यानी करीब 10,300 रुपये मिल सकते हैं।

    फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को स्पेसएक्स के मूल्य में आई बड़ी तेजी के बाद एलन मस्क की कुल संपत्ति 1.1 ट्रिलियन डॉलर के स्तर को पार कर गई। यह उपलब्धि उन्हें वैश्विक स्तर पर सबसे अलग और प्रभावशाली आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

    एक ट्रिलियन डॉलर की राशि का अनुमान लगाना आम इंसान के लिए आसान नहीं है। यह रकम 1 बिलियन डॉलर से एक हजार गुना और 1 मिलियन डॉलर से दस लाख गुना अधिक होती है। यही वजह है कि मस्क की संपत्ति को दुनिया की सबसे बड़ी व्यक्तिगत संपत्तियों में गिना जा रहा है।

    अगर एक ट्रिलियन डॉलर की नकदी को नोटों के रूप में एक सीधी लाइन में बिछाया जाए तो इसकी लंबाई करीब 9.7 करोड़ मील (15.6 करोड़ किलोमीटर) तक पहुंच जाएगी। यह दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच की लगभग 9.3 करोड़ मील की दूरी से भी ज्यादा है। वहीं, नासा के आंकड़ों के अनुसार, इतनी लंबी कतार से पृथ्वी और चंद्रमा के बीच 200 से अधिक चक्कर लगाए जा सकते हैं।

    यूएस सेंसस ब्यूरो के अनुसार वर्तमान में दुनिया की आबादी लगभग 8.2 बिलियन है। यदि मस्क की एक ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति को सभी लोगों में समान रूप से बांटा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में करीब 122 अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 10,300 रुपये आएंगे।

    इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के 2026 के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका की पूरी अर्थव्यवस्था का आकार करीब 480 बिलियन डॉलर है। यह वही देश है जहां एलन मस्क का जन्म हुआ था। उनकी कुल संपत्ति दक्षिण अफ्रीका के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से दोगुने से भी अधिक है। दुनिया में केवल 21 देशों की अर्थव्यवस्था ही ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर सकी है।

    फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ सेंट लुइस के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में एक घर की औसत कीमत करीब 4,03,200 डॉलर है। इस हिसाब से मस्क की संपत्ति से अमेरिका में लगभग 25 लाख घर खरीदे जा सकते हैं। यह संख्या कई देशों की आवासीय जरूरतों के बराबर मानी जा सकती है।

    वहीं, AAA के अनुसार अमेरिका और इजरायल-ईरान संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 4.11 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। इस दर पर एक ट्रिलियन डॉलर से 243 अरब गैलन से ज्यादा ईंधन खरीदा जा सकता है, जो पिछले वर्ष अमेरिका में उपभोग किए गए कुल 137 अरब गैलन ईंधन से कहीं अधिक है।

    फोर्ब्स की सूची के अनुसार दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति गूगल के सह-संस्थापक लैरी पेज हैं, जिनकी कुल संपत्ति 295 बिलियन डॉलर है। वह मस्क से 705 बिलियन डॉलर पीछे हैं। दिलचस्प बात यह है कि लैरी पेज, सर्गेई ब्रिन (272 बिलियन डॉलर), जेफ बेजोस (247 बिलियन डॉलर) और लैरी एलिसन (228 बिलियन डॉलर) की संयुक्त संपत्ति भी मस्क की कुल दौलत के बराबर ही पहुंचती है।

  • Maldives में खसरे का प्रकोप….. मुसीबत में फिर संकटमोचक बना भारत…. वैक्सीन-दवाएं भेजी

    Maldives में खसरे का प्रकोप….. मुसीबत में फिर संकटमोचक बना भारत…. वैक्सीन-दवाएं भेजी


    माले।
    भारत (India) ने अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति (‘Neighbourhood First’ policy) को दोहराते हुए, मालदीव (Maldives) में फैले खसरे (Measles) के प्रकोप से निपटने के लिए उसे बड़ी मात्रा में चिकित्सा सहायता (Medical Assistance) भेजी है। भारत ने मालदीव में खसरे के बढ़ते मामलों से निपटने और वहां टीकाकरण को मजबूत करने में मदद के लिए खसरे के टीके की 20,000 खुराक और लगभग तीन टन मेडिकल आपूर्ति भेजी है।

    विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बात की पुष्टि की है कि भारत सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा और टीकाकरण को मजबूत करने के लिए मालदीव की मदद कर रही है। भेजी गई सहायता में शामिल हैं:

    – 20,000 एमआर (Measles-Rubella) वैक्सीन की खुराकें: ताकि बीमारी के प्रसार को तुरंत रोका जा सके।
    – 3 टन का मेडिकल कंसाइनमेंट: इसमें आवश्यक दवाइयां, सिरिंज, डायग्नोस्टिक किट और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री शामिल हैं।
    – विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, यह समय पर दी गई सहायता मालदीव सरकार को खसरे के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करने और उनकी प्रतिक्रिया क्षमताओं को बढ़ाने में काफी मदद करेगी।


    कूटनीतिक संबंध और ‘विजन महासागर’

    मालदीव का भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और ‘विजन महासागर’ में एक विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। दोनों देशों के लोगों के आपसी लाभ और साझा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए भारत, मालदीव सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहा है। संकट के समय में सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाना भारत की इसी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है।


    मालदीव में खसरे की वापसी: एक चिंता का विषय

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2021 में इस बात की पुष्टि की थी कि मालदीव ने खसरे का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया है। एक बार बीमारी को खत्म करने के बाद, देश में इस नए प्रकोप का सामने आना एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है, जिससे निपटने के लिए अब तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।


    खसरा क्या है और इसके लक्षण क्या हैं?

    खसरा एक बेहद संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से बच्चों को अपना शिकार बनाती है। यह संक्रमित व्यक्ति की नाक, मुंह या गले से निकलने वाली बूंदों के जरिए हवा में फैलता है। संक्रमण के 10-12 दिन बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इनमें तेज बुखार, नाक बहना, आंखें लाल होना और मुंह के अंदर छोटे सफेद धब्बे पड़ना शामिल हैं। कुछ दिनों के बाद शरीर पर लाल दाने उभरने लगते हैं, जो चेहरे और ऊपरी गर्दन से शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे शरीर में नीचे की ओर फैल जाते हैं।


    खसरा उन्मूलन का वैश्विक महत्व

    WHO और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खसरे के उन्मूलन से व्यापक स्तर पर जीवन रक्षक प्रभाव पड़ते हैं। इस क्षेत्र में उन्मूलन रणनीतियों से हर साल खसरे के कम से कम 11 लाख मामलों को रोका जा सकता है। रोके गए हर एक मामले से व्यक्ति के लगभग 2 सप्ताह के ‘विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष’ (DALYs) को बचाया जा सकता है।


    मृत्यु दर में कमी

    2020-2023 के दौरान विभिन्न रणनीतियों के संयोजन से खसरे के कारण होने वाली लगभग 11 लाख मौतों को टाला गया है। प्रति मृत्यु को टालने के लिए औसत खर्च मात्र 1,373 अमेरिकी डॉलर आंका गया है, जो इस बीमारी के खिलाफ टीकाकरण को सबसे प्रभावी और जरूरी स्वास्थ्य निवेश बनाता है।