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  • बांग्लादेश की राजनीति में फिर उबाल, जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की मांग तेज, शेख हसीना की वापसी के ऐलान से बढ़ी सियासी हलचल

    बांग्लादेश की राजनीति में फिर उबाल, जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की मांग तेज, शेख हसीना की वापसी के ऐलान से बढ़ी सियासी हलचल

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में एक बार फिर राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। संसद में कट्टरपंथी राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी पर दोबारा पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग ने देश की सियासत को गरमा दिया है। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इसी वर्ष बांग्लादेश लौटने का सार्वजनिक ऐलान कर राजनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। इन दोनों घटनाक्रमों ने देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और भविष्य के सत्ता समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

    संसद में यह मुद्दा उस समय प्रमुखता से उठा जब सत्तारूढ़ गठबंधन से जुड़े सांसद ने जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका तर्क था कि जिन संगठनों या राजनीतिक दलों का संबंध 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के विरोध से रहा है अथवा जो धर्म का राजनीतिक उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं, उन्हें लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बने रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने धार्मिक स्थलों को भी राजनीतिक गतिविधियों से पूरी तरह अलग रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    इस मांग के सामने आते ही जमात-ए-इस्लामी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। पार्टी के नेताओं ने संसद के भीतर सरकार पर विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यदि प्रमुख विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की जाएगी तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी और देश में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी। पार्टी ने यह भी सवाल उठाया कि क्या सरकार एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था की दिशा में बढ़ रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब वर्ष 2024 के राजनीतिक आंदोलन के बाद बने नए सत्ता संतुलन की लगातार परीक्षा हो रही है। पूर्व सरकार के पतन के बाद जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटाया गया था, जिसके बाद हुए आम चुनाव में पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए संसद में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद से वह सरकार के सामने प्रभावी विपक्ष के रूप में उभरी है।

    विवाद के बीच जमात-ए-इस्लामी ने सरकार पर अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का भी आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि सरकार प्रशासनिक और संवैधानिक चुनौतियों का समाधान करने के बजाय राजनीतिक टकराव को बढ़ावा दे रही है। वहीं सत्तारूढ़ पक्ष का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा के लिए ऐसे मुद्दों पर स्पष्ट नीति अपनाना आवश्यक है।

    इसी दौरान पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के हालिया बयान ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह इसी वर्ष अपने देश लौटेंगी और राजनीतिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाएंगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा सरकार के साथ किसी प्रकार की गुप्त बातचीत या समझौते की खबरों में कोई सच्चाई नहीं है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक अधिकार किसी भी राजनीतिक सौदेबाजी का विषय नहीं हो सकते।

    शेख हसीना की संभावित वापसी और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध की मांग ने बांग्लादेश की राजनीति को एक नए दौर में पहुंचा दिया है। आने वाले समय में संसद के भीतर होने वाली बहस, सरकार के निर्णय और विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति यह तय करेगी कि देश की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन घटनाक्रमों पर नजर बनी हुई है, क्योंकि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिरता का प्रभाव पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर पड़ सकता है।

  • तीस्ता नदी परियोजना पर चीन का दोटूक संदेश, भारत की आपत्तियों के बीच बोला- बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

    तीस्ता नदी परियोजना पर चीन का दोटूक संदेश, भारत की आपत्तियों के बीच बोला- बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

    नई दिल्ली । बांग्लादेश की तीस्ता नदी से जुड़ी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना को लेकर भारत की रणनीतिक चिंताएं एक बार फिर चर्चा में हैं। चीन और बांग्लादेश के बीच इस परियोजना पर बढ़ते सहयोग ने भारत की सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामान्य तौर पर ‘चिकन-नेक’ कहा जाता है, के आसपास संभावित चीनी प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस बीच चीन ने स्पष्ट किया है कि उसका बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और इसे बाहरी प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए।

    चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बीजिंग और ढाका के बीच सहयोग पूरी तरह विकास आधारित है। चीन का कहना है कि दोनों देश अपनी विकास रणनीतियों में बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं और आर्थिक सहयोग, व्यापार, जल संरक्षण, बुनियादी ढांचा तथा आजीविका जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाया जाएगा। चीन ने यह भी दोहराया कि उसके सभी सहयोगात्मक प्रयास किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाने के उद्देश्य से नहीं हैं।

    दूसरी ओर भारत इस परियोजना को केवल जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि तीस्ता नदी का क्षेत्र देश के पूर्वोत्तर हिस्से से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील इलाका है। यदि इस क्षेत्र में चीन की तकनीकी, वित्तीय या बुनियादी ढांचा संबंधी उपस्थिति बढ़ती है तो इसका असर भारत की सुरक्षा रणनीति पर पड़ सकता है।

    तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर पहले सिक्किम और पश्चिम बंगाल से गुजरती है तथा इसके बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी का भौगोलिक मार्ग भारत और बांग्लादेश के बीच साझा जल संसाधनों के साथ-साथ सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण इस क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति की सक्रिय भूमिका पर भारत लगातार सतर्क नजर बनाए हुए है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशिया में अपनी आर्थिक और आधारभूत संरचना संबंधी परियोजनाओं के माध्यम से प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। बांग्लादेश के साथ परिवहन, ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क और जल संसाधन जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग भी उसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब तीस्ता परियोजना के जरिए जल संसाधन प्रबंधन में भी चीन की भागीदारी भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा भी लंबे समय से लंबित है। ऐसे में इस नदी से जुड़ी किसी भी बड़ी अंतरराष्ट्रीय परियोजना पर भारत की विशेष नजर बनी रहती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नदी प्रबंधन से जुड़े ढांचागत विकास का प्रभाव केवल जल संसाधनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क, लॉजिस्टिक्स और सामरिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

    चीन की ओर से दिए गए ताजा बयान ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि उसका उद्देश्य केवल विकास सहयोग को आगे बढ़ाना है, लेकिन भारत के लिए इस परियोजना का महत्व कहीं अधिक व्यापक है। आने वाले समय में यह विषय भारत, बांग्लादेश और चीन के बीच कूटनीतिक संवाद तथा क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रह सकता है। भारत की प्राथमिकता इस पूरे घटनाक्रम पर सतत निगरानी रखते हुए अपनी सुरक्षा, सीमाई हितों और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंधों को बनाए रखने की होगी।

  • G7 विवाद के बाद ट्रंप और मेलोनी आमने-सामने, इटली की प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा- राष्ट्रीय सम्मान किसी भी रिश्ते से ऊपर

    G7 विवाद के बाद ट्रंप और मेलोनी आमने-सामने, इटली की प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा- राष्ट्रीय सम्मान किसी भी रिश्ते से ऊपर

    नई दिल्ली । अमेरिका और इटली के बीच कूटनीतिक रिश्तों को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया दावों पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया है कि उनकी सरकार राष्ट्रीय सम्मान और संप्रभुता के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी। दोनों नेताओं के बयानों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस विवाद पर नजर रखी जा रही है।

    विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान जॉर्जिया मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए कई बार आग्रह किया था। उन्होंने यह भी कहा कि इटली में मेलोनी की लोकप्रियता घट रही है और वह अमेरिका के साथ अपनी नजदीकी दिखाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती हैं। ट्रंप के इन बयानों के बाद इटली की राजनीति और कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई।

    एक मीडिया साक्षात्कार में जॉर्जिया मेलोनी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी सरकार अमेरिका विरोधी नहीं है, लेकिन इटली के राष्ट्रीय हित और संप्रभुता सर्वोपरि हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी विदेशी नेता के सामने झुकना उनकी कार्यशैली का हिस्सा नहीं है। उनके अनुसार मजबूत अंतरराष्ट्रीय संबंध बराबरी, आपसी सम्मान और स्पष्ट संवाद पर आधारित होने चाहिए, न कि व्यक्तिगत दावों या सार्वजनिक टिप्पणियों पर।

    मेलोनी ने अपनी लोकप्रियता को लेकर भी ट्रंप की टिप्पणी का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनता ही सरकार का मूल्यांकन करती है और उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता इस बात पर निर्भर करती है कि वह इटली के हितों की कितनी प्रभावी ढंग से रक्षा करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी दूसरे देश के नेता को इटली की आंतरिक राजनीति पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

    इस विवाद के बीच इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने अपनी प्रस्तावित अमेरिका यात्रा स्थगित कर दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले को रोम की ओर से एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि दोनों देशों ने आधिकारिक रूप से अपने रणनीतिक सहयोग को जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने दोनों पक्षों के संबंधों पर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    मेलोनी ने दोनों देशों के बीच रक्षा और सैन्य सहयोग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इटली ने अमेरिका के साथ हुए सभी रक्षा समझौतों का सम्मान किया है, लेकिन किसी भी समझौते में एकतरफा बदलाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार इटली एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है तथा उसकी विदेश नीति का निर्धारण राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल दो नेताओं के व्यक्तिगत बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरोप और अमेरिका के बीच बदलते कूटनीतिक समीकरणों का भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों ने अपनी स्वतंत्र भूमिका को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखना शुरू किया है। ऐसे में मेलोनी का रुख इस व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है।

    फिलहाल दोनों देशों के बीच औपचारिक संबंध सामान्य बने हुए हैं, लेकिन इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सार्वजनिक बयानों की संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों सरकारें इस विवाद को संवाद के माध्यम से सुलझाती हैं या यह मुद्दा भविष्य के द्विपक्षीय संबंधों और बहुपक्षीय मंचों पर भी प्रभाव डालता है।

  • यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    नई दिल्ली । यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, जहां कई देशों में रिकॉर्ड स्तर का तापमान दर्ज किया जा रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी ने स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली व्यवस्था और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर गंभीर दबाव पैदा कर दिया है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कई स्थानों पर अत्यधिक तापमान के कारण सामान्य जनजीवन भी प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का स्पष्ट संकेत है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। संगठन के अनुसार महाद्वीप का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। वर्तमान हीटवेव से लगभग 15 करोड़ लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है और बिजली की मांग अचानक बढ़ने से ऊर्जा प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।

    जर्मनी में अत्यधिक गर्मी का असर परिवहन व्यवस्था पर भी दिखाई दिया। लीपज़िग में तेज तापमान के कारण ट्राम की पटरियों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं, जिससे सेवाएं प्रभावित हुईं। वहीं राजधानी बर्लिन में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पानी का छिड़काव किया गया। कई शहरों में प्रशासन ने लोगों से दोपहर के समय घरों में रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

    फ्रांस में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह के दौरान सामान्य से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। अंतिम संस्कार से जुड़े संस्थानों पर भी काम का दबाव बढ़ा है। पेरिस सहित कई क्षेत्रों में श्मशान और कब्रिस्तानों की क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात सामने आई है। स्थानीय प्रशासन स्थिति पर लगातार निगरानी रखे हुए है और आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

    युद्धग्रस्त यूक्रेन में यह हीटवेव नई चुनौती बनकर उभरी है। पहले से क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे पर बढ़ती बिजली मांग का दबाव बढ़ गया है। कई इलाकों में बिजली आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए आपातकालीन कटौती लागू की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध और भीषण गर्मी का संयुक्त प्रभाव देश की बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो रहा है।

    यूरोप के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। कई स्थानों पर सड़कें, रेल ढांचा और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं भीषण गर्मी से प्रभावित हुई हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक तापमान से जुड़ी अनेक तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, हालांकि प्रशासन लोगों से अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा न करने और केवल आधिकारिक सलाह का पालन करने की अपील कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती हीटवेव केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है। अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, ऊर्जा, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए दीर्घकालिक स्तर पर जलवायु अनुकूल नीतियों, हरित ऊर्जा के विस्तार और शहरी ढांचे को अत्यधिक तापमान के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में इस तरह की चरम मौसमी घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।

  • व्यापार से लेकर रक्षा और तकनीक तक नई ऊंचाइयों पर भारत-अमेरिका संबंध, पूर्व अमेरिकी राजदूत ने बताया लोगों के रिश्तों को सबसे बड़ी शक्ति

    व्यापार से लेकर रक्षा और तकनीक तक नई ऊंचाइयों पर भारत-अमेरिका संबंध, पूर्व अमेरिकी राजदूत ने बताया लोगों के रिश्तों को सबसे बड़ी शक्ति

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की सबसे बड़ी ताकत दोनों देशों के नागरिकों के बीच गहरा विश्वास और लंबे समय से बना मानवीय जुड़ाव है। भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ आई. जस्टर ने कहा कि सरकारी स्तर पर समय-समय पर परिस्थितियां बदलती रही हैं, लेकिन दोनों देशों के लोगों के बीच विकसित रिश्तों ने हमेशा इस साझेदारी को स्थिर और मजबूत बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि यही भरोसा आज भारत-अमेरिका संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला बन चुका है।

    उन्होंने अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम के लीडरशिप समिट को संबोधित करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका की निकटता केवल आधुनिक रणनीतिक समझौतों का परिणाम नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क कई सदियों पुराने हैं। उन्होंने कहा कि भौगोलिक दूरी के बावजूद दोनों देशों के संबंध दुनिया के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक साझेदारों में शामिल हैं।

    केनेथ जस्टर ने बताया कि अमेरिका ने अपने शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशनों में भारत को विशेष महत्व दिया था। अमेरिका ने वर्ष 1792 में तत्कालीन कलकत्ता और 1794 में मद्रास में अपने शुरुआती राजनयिक मिशन स्थापित किए थे। उन्होंने कहा कि यह तथ्य दर्शाता है कि भारत लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता आया है।

    उन्होंने भारत की स्वतंत्रता से पहले के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के समर्थन में ब्रिटेन पर दबाव बनाया था। इसके अलावा अमेरिका ने सितंबर 1946 में भारत की अंतरिम सरकार के साथ औपचारिक संबंध स्थापित कर दिए थे, जबकि भारत की स्वतंत्रता में तब भी लगभग 11 महीने का समय शेष था।

    पूर्व राजदूत ने कहा कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत के आर्थिक सुधारों ने दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दी। हालांकि वर्ष 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद संबंधों में कुछ समय के लिए तनाव पैदा हुआ, लेकिन दोनों देशों के वरिष्ठ नेतृत्व के बीच लगातार संवाद ने इस दूरी को कम किया। इसी प्रक्रिया ने बाद में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा का मार्ग भी प्रशस्त किया और द्विपक्षीय संबंधों को नई गति मिली।

    उन्होंने कहा कि इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव आया। उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग और असैन्य परमाणु समझौता इस परिवर्तन के प्रमुख आधार बने। आगे चलकर बराक ओबामा प्रशासन ने भारत को प्रमुख रक्षा साझेदार का दर्जा दिया, जबकि ट्रंप प्रशासन के दौरान 2+2 मंत्रीस्तरीय संवाद और क्वाड सहयोग को नई मजबूती मिली। इसके बाद जो बाइडेन प्रशासन ने क्वाड को शीर्ष नेतृत्व के स्तर तक पहुंचाकर रणनीतिक सहयोग को और व्यापक बनाया।

    जस्टर ने कहा कि हाल के वर्षों में रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, निवेश और व्यापार जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 19 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर करीब 250 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। दोनों देश इस दशक के अंत तक इसे 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    पूर्व अमेरिकी राजदूत ने कहा कि भारतवंशी समुदाय ने भी दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई देने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अमेरिका में रहने वाले 50 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोगों ने आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। उन्होंने 2019 के “हाउडी मोदी” और 2020 के “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कार्यक्रम दोनों देशों के नागरिकों के बीच बढ़ते विश्वास और आपसी सद्भाव के प्रतीक हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में यही जनसंपर्क भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को और अधिक व्यापक तथा मजबूत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रहेगा।

  • ट्रंप की नीतियों पर रो खन्ना का तीखा हमला, बोले- भारत-अमेरिका साझेदारी की असली ताकत साझा लोकतंत्र, स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों में है

    ट्रंप की नीतियों पर रो खन्ना का तीखा हमला, बोले- भारत-अमेरिका साझेदारी की असली ताकत साझा लोकतंत्र, स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों में है

    नई दिल्ली। भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को केवल रक्षा, व्यापार और निवेश तक सीमित रखने के बजाय साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय आदर्शों पर आधारित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी तभी अधिक मजबूत और प्रभावी बन सकती है, जब उसका आधार लोकतंत्र, स्वतंत्रता, बहुलवाद और आत्मनिर्णय जैसे साझा सिद्धांत हों।

    अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम के नेतृत्व सम्मेलन को संबोधित करते हुए रो खन्ना ने अमेरिकी विदेश नीति, वैश्विक सहयोग और इमिग्रेशन से जुड़े कई मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति और आव्रजन संबंधी दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा कि एकतरफा फैसलों और व्यापारिक नीतियों ने अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। उनके अनुसार, अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने सहयोगी देशों के साथ विश्वास और साझेदारी को दोबारा मजबूत करने की आवश्यकता है।

    रो खन्ना ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंधों की वास्तविक शक्ति केवल रणनीतिक या आर्थिक सहयोग में नहीं, बल्कि उन साझा मूल्यों में है जो दोनों लोकतंत्रों को एक-दूसरे के करीब लाते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को मानव स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और वैश्विक शांति जैसे मुद्दों पर मिलकर आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, साझेदारी का उद्देश्य केवल व्यावसायिक लाभ नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों को ऐसी विश्व व्यवस्था के निर्माण में योगदान देना चाहिए, जहां मानवाधिकारों, आत्मनिर्णय और सभ्यतागत मूल्यों का सम्मान सुनिश्चित हो। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी साझेदारी का उद्देश्य अंध समर्थन नहीं होना चाहिए, बल्कि उन देशों के साथ सहयोग होना चाहिए जो समान मूल्यों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हों।

    अपने संबोधन में रो खन्ना ने अमेरिका की ऐतिहासिक भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने लंबे समय तक स्वतंत्रता, लोकतंत्र और उपनिवेशवाद से मुक्ति जैसे सिद्धांतों का समर्थन किया है। उनके अनुसार, इन्हीं आदर्शों ने दुनिया भर के लाखों प्रवासियों को अमेरिका में अवसर तलाशने के लिए प्रेरित किया और यही मूल्य भविष्य में भी अमेरिका की वैश्विक पहचान को मजबूत बनाए रख सकते हैं।

    इमिग्रेशन नीति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान नीतियों के कारण दुनिया की प्रतिभाओं को आकर्षित करने की अमेरिका की क्षमता प्रभावित हो रही है। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अत्याधुनिक तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अमेरिका को योग्य और प्रतिभाशाली पेशेवरों के लिए अधिक अनुकूल वातावरण तैयार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि नवाचार और अनुसंधान में वैश्विक प्रतिभा की भागीदारी किसी भी देश की तकनीकी प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

    रो खन्ना ने अमेरिकी राजनीति पर भी अपने विचार व्यक्त किए और विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में डेमोक्रेटिक पार्टी फिर से मजबूत स्थिति में लौटेगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका में समय-समय पर चुनौतियां जरूर आई हैं, लेकिन देश ने हमेशा लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक मूल्यों के बल पर स्वयं को मजबूत किया है। उनके अनुसार, यही क्षमता अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है।

    भारतीय मूल के सांसद ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार की प्रेरणा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय विरासत और अमेरिकी लोकतांत्रिक परंपराओं ने उनके सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक सोच को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत और अमेरिका भविष्य में रक्षा, व्यापार, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी अपनी साझेदारी का केंद्रीय आधार बनाए रखेंगे।

  • भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्तों को नई उड़ान देने की तैयारी, बोइंग समझौते पर तेजी, ट्रंप प्रशासन ने निवेश और तकनीकी सहयोग पर दिया बड़ा संकेत

    भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्तों को नई उड़ान देने की तैयारी, बोइंग समझौते पर तेजी, ट्रंप प्रशासन ने निवेश और तकनीकी सहयोग पर दिया बड़ा संकेत

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक आर्थिक साझेदारी को नई गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति के संकेत मिले हैं। अमेरिका के भारत स्थित राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं भारत के साथ व्यावसायिक संबंधों को मजबूत करने के प्रयासों का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच एक नई बोइंग डील लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, जिससे विमानन क्षेत्र के साथ-साथ व्यापक आर्थिक सहयोग को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम के नेतृत्व सम्मेलन को संबोधित करते हुए सर्जियो गोर ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हालिया बातचीत में बोइंग समझौता प्रमुख विषयों में शामिल रहा। उन्होंने इसे दोनों देशों के बढ़ते आर्थिक रिश्तों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि अमेरिका इस समझौते को जल्द अंतिम रूप तक पहुंचाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहा है।

    गोर ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि दुनिया के विभिन्न देश अत्याधुनिक और उच्च गुणवत्ता वाले विमानों का उपयोग करें तथा बोइंग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि भारत के साथ प्रस्तावित नया समझौता दोनों देशों के लिए दीर्घकालिक आर्थिक और औद्योगिक सहयोग का मजबूत आधार बनेगा। उनके अनुसार अमेरिका भारत को केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक आर्थिक सहयोगी के रूप में देखता है।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से उभरती हुई शक्ति बन चुका है और अमेरिका इस विकास यात्रा का सहभागी बनना चाहता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत तकनीक, विमानन, रक्षा और अन्य आधुनिक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। उनका कहना था कि दोनों देशों की क्षमताओं का समन्वय भविष्य में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को नई दिशा दे सकता है।

    निवेश के मुद्दे पर बोलते हुए अमेरिकी राजदूत ने कहा कि नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने इस वर्ष अमेरिका में निवेश आकर्षित करने के मामले में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। उन्होंने बताया कि लगभग 20.5 अरब डॉलर के नए निवेश को बढ़ावा देने में दूतावास की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके अनुसार यह उपलब्धि भारत में कार्यरत अमेरिकी कंपनियों के बढ़ते विश्वास और स्थिर कारोबारी वातावरण का परिणाम है।

    गोर ने कहा कि अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश से पहले बौद्धिक संपदा की सुरक्षा, नियामकीय स्थिरता और कारोबारी माहौल जैसे विषयों पर जानकारी प्राप्त करती हैं। उन्होंने कहा कि भारत के प्रति बढ़ते भरोसे ने निवेशकों का विश्वास मजबूत किया है और दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। उन्होंने उद्योग जगत को भरोसा दिलाया कि यदि किसी व्यावसायिक परियोजना के दौरान प्रशासनिक या प्रक्रियागत कठिनाइयां आती हैं तो अमेरिकी दूतावास हर संभव सहयोग के लिए उपलब्ध रहेगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप विदेशी बाजारों में अमेरिकी कंपनियों के हितों को बढ़ावा देने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार यदि किसी व्यावसायिक समझौते से अमेरिका में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं तो राष्ट्रपति स्वयं भी उस दिशा में पहल करने से पीछे नहीं हटते। इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिकी प्रशासन अंतरराष्ट्रीय आर्थिक साझेदारियों को रोजगार और औद्योगिक विकास से जोड़कर देख रहा है।

    भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में शामिल है और आने वाले वर्षों में हजारों नए विमानों की आवश्यकता का अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में प्रस्तावित बोइंग समझौता केवल विमान खरीद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत-अमेरिका संबंधों में निवेश, तकनीक, रक्षा, ऊर्जा, एयरोस्पेस और औद्योगिक सहयोग के नए अवसर भी पैदा कर सकता है। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है, जिसके लिए व्यापक आर्थिक सहयोग को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है।

  • भारत के प्रति ट्रंप का विशेष लगाव, पीएम मोदी से व्यक्तिगत रिश्तों के सहारे मजबूत होगी द्विपक्षीय साझेदारी; अमेरिकी राजदूत गोर का बड़ा बयान

    भारत के प्रति ट्रंप का विशेष लगाव, पीएम मोदी से व्यक्तिगत रिश्तों के सहारे मजबूत होगी द्विपक्षीय साझेदारी; अमेरिकी राजदूत गोर का बड़ा बयान

    नई दिल्ली । भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा मित्र मानते हैं और भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने दोनों नेताओं के बीच मजबूत व्यक्तिगत विश्वास को द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि आने वाले वर्षों में दोनों देश व्यापार, रक्षा, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर सकते हैं।

    अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम के नेतृत्व सम्मेलन को संबोधित करते हुए गोर ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत के प्रति विशेष सम्मान रखते हैं और अक्सर अपने भारत दौरे तथा यहां के अनुभवों का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ दीर्घकालिक और भरोसेमंद साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए गंभीरता से काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते केवल औपचारिक कूटनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साझा हितों और आपसी विश्वास पर आधारित हैं।

    राजदूत गोर ने बताया कि हाल ही में वाशिंगटन में राष्ट्रपति ट्रंप के साथ हुई उनकी मुलाकात के दौरान भारत को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि भारत में अपने अनुभवों और वहां मिले सकारात्मक माहौल को लेकर राष्ट्रपति बेहद संतुष्ट दिखाई दिए। ट्रंप के मन में भारत की कई सुखद यादें हैं और उनका पिछला भारत दौरा उनके सबसे यादगार विदेशी दौरों में शामिल रहा है। गोर ने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान एक बार फिर भारत का दौरा कर सकते हैं।

    उन्होंने दोनों नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों का उदाहरण देते हुए मियामी में आयोजित एक यूएफसी कार्यक्रम का उल्लेख किया। गोर ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करने की इच्छा जताई थी। समय का अंतर देखते हुए बातचीत अगले दिन के लिए तय की गई, लेकिन इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को एक करीबी मित्र के रूप में देखते हैं और उनके साथ नियमित संवाद बनाए रखना चाहते हैं।

    गोर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच विकसित व्यक्तिगत विश्वास ने पिछले वर्षों में भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को नई गति दी है। उन्होंने कहा कि दोनों सरकारें व्यापार, निवेश, रक्षा उत्पादन, अत्याधुनिक तकनीक और नवाचार जैसे क्षेत्रों में ठोस परिणाम हासिल करने के लिए मिलकर काम कर रही हैं। उनका मानना है कि अगले दो वर्ष दोनों देशों के संबंधों की दिशा तय करने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होंगे और इस अवधि में लिए गए निर्णय आने वाले दशकों तक सहयोग की नींव मजबूत करेंगे।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका के संबंधों को लेकर समय-समय पर उठने वाले संदेह वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते। उनके अनुसार दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और लोगों के बीच बढ़ते संपर्क लगातार रिश्तों को मजबूत बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में अपने पिछले छह महीनों के कार्यकाल के दौरान उन्होंने लगभग हर क्षेत्र में सहयोग की नई संभावनाएं देखी हैं और दोनों देशों के बीच साझेदारी लगातार विस्तार की ओर बढ़ रही है।

    राजदूत गोर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत प्रौद्योगिकी, रक्षा, निवेश और नवाचार को भविष्य के सहयोग के प्रमुख क्षेत्र बताते हुए कहा कि भारत और अमेरिका मिलकर वैश्विक स्तर पर नई उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक हितों और रणनीतिक दृष्टिकोण के आधार पर दोनों देशों की साझेदारी आने वाले समय में और अधिक मजबूत होगी तथा वैश्विक स्तर पर स्थिरता और विकास को भी नई दिशा देगी।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील को मिलेगी जल्द मंजूरी! अमेरिकी राजदूत का दावा- 18 महीने की बातचीत निर्णायक मोड़ पर, 500 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य पर जोर

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील को मिलेगी जल्द मंजूरी! अमेरिकी राजदूत का दावा- 18 महीने की बातचीत निर्णायक मोड़ पर, 500 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य पर जोर

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि दोनों देशों के बीच इस समझौते का अधिकांश हिस्सा तय हो चुका है और अब केवल अंतिम एक से दो प्रतिशत मुद्दों पर सहमति बननी बाकी है। उन्होंने विश्वास जताया कि करीब 18 महीने से चल रही बातचीत जल्द ही सफल निष्कर्ष तक पहुंचेगी और इससे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलेगी।

    अमेरिका-रणनीतिक साझेदारी फोरम के नेतृत्व सम्मेलन में संबोधित करते हुए सर्जियो गोर ने कहा कि हाल के सप्ताहों में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत की गति तेज हुई है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर हाल ही में नई दिल्ली पहुंचे थे, जहां लंबी चर्चा के बाद समझौते के शेष बिंदुओं पर भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई। उनके अनुसार अधिकांश प्रावधानों पर सहमति बन चुकी है और अब अंतिम औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है।

    राजदूत ने कहा कि इतने व्यापक और जटिल व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में समय लगना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े व्यापार समझौतों में कई वर्षों तक बातचीत चलना सामान्य बात है। इसी संदर्भ में उन्होंने यूरोपीय व्यापार समझौतों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां ऐसे समझौतों को पूरा होने में दो दशक तक लग गए थे, जबकि भारत और अमेरिका अपेक्षाकृत कम समय में निर्णायक स्थिति तक पहुंच गए हैं।

    सर्जियो गोर ने इस प्रस्तावित समझौते को दोनों देशों के लिए समान रूप से लाभकारी बताया। उनका कहना था कि यह किसी एक पक्ष के हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार की जा रही है जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि समझौते के लागू होने से निवेशकों और व्यापारिक संस्थानों को अधिक स्पष्टता और स्थिरता मिलेगी, जिससे द्विपक्षीय व्यापार को नई गति प्राप्त होगी।

    उन्होंने यह भी बताया कि हाल के सप्ताहों में दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के बीच लगातार उच्च स्तरीय बैठकें हुई हैं। भारत और अमेरिका के प्रतिनिधियों ने एक-दूसरे के देशों का दौरा कर लंबित मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की है। उनका मानना है कि इसी सक्रिय संवाद के कारण बातचीत अब अंतिम चरण तक पहुंच सकी है।

    राजदूत ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में पिछले दो दशकों के दौरान आई उल्लेखनीय वृद्धि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय व्यापार लगभग 20 अरब डॉलर से बढ़कर 220 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जो दोनों देशों के मजबूत आर्थिक सहयोग का प्रमाण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रस्तावित व्यापार समझौते के बाद यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ेगा।

    सर्जियो गोर ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निर्धारित 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य दोनों देशों की साझा आर्थिक सोच और भविष्य की रणनीतिक साझेदारी को दर्शाता है। उनके अनुसार व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी।

    उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर सामने आने वाली नकारात्मक अटकलों को भी खारिज किया। उनका कहना था कि व्यापार, रक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, निवेश और लोगों के बीच बढ़ते संपर्क इस बात का प्रमाण हैं कि दोनों देशों के संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित व्यापार समझौता केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह दोनों लोकतांत्रिक देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत आधार प्रदान करेगा।

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    FATF में पाकिस्तान पर भारत का बड़ा दांव ऑपरेशन सिंदूर के साक्ष्यों से ग्रे लिस्ट में भेजने की तैयारी


    नई दिल्ली। अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की कथित घुसपैठ और पैतृक जमीन पर कब्जे के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। सीमावर्ती क्षेत्र में सक्रिय एक स्थानीय संगठन की शिकायत के बाद राज्य सरकार ने पूरे मामले की जांच कराने का फैसला किया है। हालांकि भारतीय सेना ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें गलत और निराधार बताया है।

    ताकसिंग इलाके की नाह वेलफेयर सोसाइटी ने जिला प्रशासन को भेजे पत्र में आरोप लगाया है कि चीन पिछले कई वर्षों से भारतीय सीमा के भीतर अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है। संगठन के अनुसार स्थानीय लोगों की पैतृक जमीन पर कथित रूप से सैन्य शिविर बनाए गए हैं और वहां सड़क तथा पुल जैसी आधारभूत संरचनाएं भी तैयार की गई हैं।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन इलाकों में पहले वे शिकार करने जाते थे और जहां उनके मवेशी चरते थे अब वे क्षेत्र चीन के नियंत्रण में बताए जा रहे हैं। संगठन का दावा है कि पिछले 10 से 15 वर्षों के दौरान सीमा पर चीन की गतिविधियों में तेजी आई है और स्थानीय समुदाय धीरे धीरे अपनी पारंपरिक जमीन खो रहा है। संगठन ने इसे गंभीर सुरक्षा और आजीविका का मुद्दा बताते हुए सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

    इन आरोपों के बाद अरुणाचल प्रदेश के गृह मंत्री मामा नटुंग ने कहा कि सरकार मामले को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने बताया कि पहले जिला प्रशासन से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। यह रिपोर्ट स्थानीय प्रशासन जनप्रतिनिधियों पंचायतों और क्षेत्र के लोगों से मिली जानकारी के आधार पर तैयार की जाएगी। यदि जांच में अतिक्रमण के दावे सही पाए जाते हैं तो सरकार विशेष जांच समिति गठित कर आगे की कार्रवाई करेगी।

    दूसरी ओर भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि अरुणाचल प्रदेश में हालिया चीनी घुसपैठ और सैन्य शिविर स्थापित किए जाने संबंधी मीडिया रिपोर्ट तथ्यहीन हैं। सेना ने कहा कि ऐसे दावों का कोई प्रमाण नहीं है और इन्हें गलत तथा आधारहीन माना जाना चाहिए।

    गौरतलब है कि पिछले महीने भारत और चीन के बीच बीजिंग में सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय तंत्र की 35वीं बैठक हुई थी। दोनों देशों ने सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिति की समीक्षा करते हुए शांति और स्थिरता बनाए रखने की दिशा में हुई प्रगति पर संतोष जताया था। ऐसे समय में अरुणाचल से सामने आए इन दावों ने सीमा सुरक्षा को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। फिलहाल राज्य सरकार जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रही है जबकि भारतीय सेना का कहना है कि घुसपैठ के दावों की पुष्टि नहीं होती।