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  • ईरान के खिलाफ अमेरिका ने बदली चाल, नए हमले से पीछे हटे रुबियो; होर्मुज में नौसैनिक दबाव और प्रतिबंधों पर फोकस

    ईरान के खिलाफ अमेरिका ने बदली चाल, नए हमले से पीछे हटे रुबियो; होर्मुज में नौसैनिक दबाव और प्रतिबंधों पर फोकस


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच वॉशिंगटन की रणनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कई सहयोगी देशों के विदेश मंत्रियों को बताया है कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर नए सैन्य हमले शुरू करने की तैयारी नहीं कर रहा है। रुबियो के इस बयान से संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका तत्काल सैन्य कार्रवाई बढ़ाने के बजाय आर्थिक प्रतिबंधों समुद्री दबाव और रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही को सामान्य करने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। हालांकि ईरान की तरफ से किसी हमले की स्थिति में अमेरिका ने सैन्य विकल्प को पूरी तरह बंद नहीं किया है।

    अमेरिका की बदली रणनीति में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा बन गया है। अमेरिकी नौसेना इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है और समुद्री रास्ते को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि सैन्य अभियान के चलते ईरान की उस क्षमता को काफी कमजोर किया गया है जिसके जरिए वह वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना सकता था। होर्मुज में बारूदी सुरंगों को हटाने की कोशिश भी की जा रही है और कुछ तेल टैंकरों ने दक्षिणी समुद्री रास्ते से आवाजाही शुरू कर दी है। इसके बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

    अमेरिका की ओर से ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए नए प्रतिबंधों का सहारा लिया जा रहा है। वॉशिंगटन ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले दूसरे देशों और कंपनियों को भी चेतावनी दी है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इस रणनीति का मकसद ईरान की आर्थिक ताकत को कमजोर करना और उसे सीधे सैन्य टकराव के बजाय दबाव के जरिए बातचीत की मेज पर लाना बताया जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह नीति नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव तक जारी रह सकती है।

    दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिकी दबाव और समुद्री कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए खारिज किया है। ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल जहाजों की आवाजाही पर फीस लगाने की योजना को भी लगभग अंतिम रूप दिए जाने की बात सामने आई है। संसदीय समिति की ओर से कहा गया है कि जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से मेंटेनेंस और नेविगेशन फीस ली जा सकती है। हालांकि यह व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है। अगर ऐसा कदम उठाया जाता है तो वैश्विक तेल कारोबार पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

    इसी बीच ईरान और ओमान ने होर्मुज में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए अस्थायी समुद्री कॉरिडोर बनाने पर चर्चा की है। दोनों देश जलमार्ग से बारूदी सुरंगें हटाने की दिशा में भी काम करने की बात कर चुके हैं। हालांकि तनाव के बीच एक तेल टैंकर पर प्रोजेक्टाइल से हमला होने की खबर ने समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच दबाव की स्थिति बनी हुई है।

    इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान भी अहम भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के ईरान दौरे और वहां नेताओं के साथ बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की संभावना को लेकर चर्चा तेज हुई है। फिलहाल अमेरिका की रणनीति को सीधे नए हमले की बजाय आर्थिक और समुद्री दबाव के रूप में देखा जा रहा है। रुबियो के बयान से इतना जरूर साफ है कि वॉशिंगटन तत्काल सैन्य कार्रवाई को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं है लेकिन ईरान पर दबाव कम करने की भी उसकी कोई तैयारी नहीं दिख रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में होर्मुज और अमेरिकी प्रतिबंध इस टकराव की अगली दिशा तय कर सकते हैं।

  • पुतिन का ‘फ्लाइंग चेरनोबिल’ फिर तैयार? बुरेवेस्टनिक के संभावित टेस्ट से बढ़ी दुनिया की चिंता

    पुतिन का ‘फ्लाइंग चेरनोबिल’ फिर तैयार? बुरेवेस्टनिक के संभावित टेस्ट से बढ़ी दुनिया की चिंता


    नई दिल्ली।
    रूस की परमाणु क्षमता से लैस नई पीढ़ी की क्रूज मिसाइल बुरेवेस्टनिक (9M730 Burevestnik) एक बार फिर चर्चा में है। आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और विमानों की बढ़ती आवाजाही से ऐसी अटकलें तेज हुई हैं कि रूस इस परमाणु-संचालित मिसाइल का नया फ्लाइट टेस्ट कर सकता है। हालांकि, रूस ने संभावित परीक्षण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    बुरेवेस्टनिक को रूस लंबे समय से ऐसी मिसाइल के रूप में पेश करता रहा है जिसकी मारक क्षमता बेहद लंबी बताई जाती है। इसे परमाणु वॉरहेड ले जाने में सक्षम बताया गया है और इसकी खासियत इसका कथित परमाणु-ऊर्जा आधारित प्रोपल्शन सिस्टम है।

    नोवाया जेमल्या में बढ़ी हलचल

    हालिया सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक, रूस के आर्कटिक क्षेत्र स्थित नोवाया जेमल्या में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, रोगाचेवो एयरबेस पर दो Il-976 SKIP विमान पहुंचे हैं। इन विमानों का इस्तेमाल मिसाइल परीक्षण के दौरान उसके रास्ते और उड़ान से जुड़े आंकड़े जुटाने के लिए किया जाता है।

    बेस पर एक A-50U एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग विमान, चार An-26 परिवहन विमान, एक An-74 और कई हेलिकॉप्टर भी दिखाई दिए हैं। इसके अलावा पिछले बुरेवेस्टनिक परीक्षणों से जुड़े कुछ नागरिक जहाजों की भी बैरेंट्स और कारा सागर में मौजूदगी बताई गई है।

    नॉर्वे के रक्षा विश्लेषक थोर्ड अरे इवरसेन के मुताबिक, सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई दे रही गतिविधियां बुरेवेस्टनिक के पिछले परीक्षणों से मिलती-जुलती हैं। उनके अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि रूस मिसाइल के फ्लाइट टेस्ट की तैयारी कर रहा हो सकता है।

    14 परीक्षणों में कितनी बार सफल हुई?

    रिपोर्टों के मुताबिक, बुरेवेस्टनिक का अब तक करीब 14 बार परीक्षण किया जा चुका है, लेकिन इनमें सफलता सीमित रही है। रूस ने 2022 और 2025 के परीक्षणों को सफल बताया था।

    रूसी जनरल वैलेरी गेरासिमोव ने दावा किया था कि 2025 के कथित सफल परीक्षण के दौरान मिसाइल ने करीब 15 घंटे में 14,000 किलोमीटर की दूरी तय की। रूस का दावा है कि उड़ान के दौरान मिसाइल ने अलग-अलग ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दिशाओं में निर्धारित गतिविधियां कीं और उसकी एयर डिफेंस से बचने की क्षमता का प्रदर्शन हुआ।

    इसके मुकाबले 2022 में हुआ परीक्षण महज करीब दो मिनट तक चला था।

    इसे ‘फ्लाइंग चेरनोबिल’ क्यों कहा जाता है?

    बुरेवेस्टनिक की सबसे असामान्य विशेषता इसका कथित न्यूक्लियर पावर प्रोपल्शन सिस्टम है। इसी वजह से पश्चिमी विश्लेषकों में इसे लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं।

    इसे कभी-कभी ‘फ्लाइंग चेरनोबिल’ कहा जाता है। यह नाम 1986 की चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना से जुड़ी आशंकाओं को दर्शाता है। चिंता यह है कि परमाणु रिएक्टर से संचालित इस तरह की मिसाइल के परीक्षण या दुर्घटना की स्थिति में रेडियोधर्मी सामग्री के फैलने का जोखिम पैदा हो सकता है।

    नाटो ने बुरेवेस्टनिक के लिए ‘Skyfall’ नाम इस्तेमाल किया है। अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व अधिकारी थॉमस कंट्रीमैन ने भी इस हथियार प्रणाली को लेकर बेहद तीखी टिप्पणी की थी।

    MIT के शोधकर्ताओं ने कैसे समझा डिजाइन?

    मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के शोधकर्ताओं ने रूसी मीडिया में उपलब्ध तस्वीरों और वीडियो का विश्लेषण कर बुरेवेस्टनिक के आकार और संभावित डिजाइन का अनुमान लगाने की कोशिश की।

    प्रोफेसर जेक हेक्ला और उनके सहयोगी आर. स्कॉट केम्प के विश्लेषण के मुताबिक, मिसाइल रूस की बड़ी क्रूज मिसाइलों से बड़ी है, लेकिन अत्यधिक विशाल नहीं है।

    एयरोडायनामिक मॉडलिंग के आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इसे हवा में बनाए रखने के लिए करीब Mach 0.75, यानी लगभग 575 मील प्रति घंटे की गति की जरूरत हो सकती है। यह गति करीब-करीब किसी आधुनिक यात्री विमान की क्रूजिंग स्पीड के आसपास है।

    न्यूक्लियर रिएक्टर से कैसे मिलती है ताकत?

    शोधकर्ताओं के अनुसार, बुरेवेस्टनिक में डायरेक्ट-साइकिल एयर-ब्रीदिंग न्यूक्लियर प्रोपल्शन जैसी तकनीक इस्तेमाल होने की संभावना है।

    सरल शब्दों में समझें तो इस अवधारणा में हवा को इंजन के भीतर मौजूद परमाणु रिएक्टर से सीधे गुजारा जाता है। रिएक्टर की ऊर्जा हवा को बेहद गर्म करती है और गर्म हवा को पीछे की ओर तेजी से निकालकर थ्रस्ट पैदा किया जाता है।

    यह सामान्य परमाणु रिएक्टरों से अलग अवधारणा है, जहां रिएक्टर की गर्मी को एक अलग कूलेंट सिस्टम के जरिए दूसरे चरण में पहुंचाया जाता है।

    हेक्ला के मुताबिक, अप्रत्यक्ष सिस्टम की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती, लेकिन उसका अतिरिक्त वजन और जटिलता इसे कम संभावित विकल्प बनाती है।

    ‘असीमित रेंज’ का दावा कितना अहम?

    बुरेवेस्टनिक को लेकर रूस का सबसे बड़ा दावा इसकी बेहद लंबी या लगभग असीमित रेंज है। पारंपरिक क्रूज मिसाइलों में ईंधन की सीमा सबसे बड़ी बाधाओं में से एक होती है। परमाणु प्रोपल्शन का उद्देश्य इसी सीमा को काफी हद तक कम करना है।

    अगर यह तकनीक व्यावहारिक और भरोसेमंद तरीके से काम करती है, तो मिसाइल लंबे समय तक हवा में रह सकती है और अप्रत्याशित दिशा से लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता हासिल कर सकती है। यही वजह है कि पश्चिमी देशों में इसके संभावित परीक्षणों पर नजर रखी जा रही है।

    हालांकि, बुरेवेस्टनिक की वास्तविक क्षमता, विश्वसनीयता और संचालन संबंधी दावों को लेकर स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी सीमित है। रूस की ओर से संभावित नए परीक्षण की भी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

  • US वीजा पर बड़े एक्शन की तैयारी….. 2 लाख लोगों पर लटकी देश निकाला की तलवार!

    US वीजा पर बड़े एक्शन की तैयारी….. 2 लाख लोगों पर लटकी देश निकाला की तलवार!


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) का प्रशासन देश में शरण पाने के लिए आवेदन कर चुके या फिलहाल आवेदन की प्रक्रिया में शामिल दो लाख तक विदेशी नागरिकों के कारोबारी और पर्यटन वीजा (Tourist Visa) रद्द करने की तैयारी कर रहा है। यदि ऐसा होता है, तो यह अमेरिकी इतिहास (American History) में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में वीजा रद्द किए जाने की सबसे बड़ी कार्रवाई होगी और इसे लेकर कानूनी चुनौतियां सामने आने की संभावना है।

    अमेरिकी विदेश विभाग के दस्तावेजों और दो अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यदि इस फैसले को चुनौती नहीं दी गई या इसमें बदलाव नहीं किया गया, तो विदेश विभाग आने वाले हफ्तों में 2016 से 2026 के बीच जारी किए गए बी1 और बी2 वीजा रद्द करने की घोषणा कर सकता है। इसमें ऐसे वीजा धारक शामिल होंगे, जिन्होंने अमेरिका में शरण के लिए आवेदन किया है या वर्तमान में शरण मांग रहे हैं। यह कार्रवाई गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के समन्वय से की जाएगी।


    क्या है बी1 और बी2 वीजा

    बी1 वीजा आम तौर पर कारोबारी यात्राओं के लिए जारी किए जाते हैं, जबकि बी2 वीजा पर्यटन, परिवार से मिलने या चिकित्सा उपचार के लिए जारी किए जाते हैं। विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा, ‘हम डीएचएस के साथ समन्वय कर ऐसे विदेशी नागरिकों की पहचान करने और उनके गैर-आप्रवासी वीजा रद्द करने का काम कर रहे हैं, जो अमेरिका में अल्पकालिक आगंतुक के रूप में आए थे, लेकिन बाद में यहां स्थायी रूप से रहने के लिए शरण का आवेदन दाखिल कर देते हैं।’

    उन्होंने वीजा रद्द किए जाने की संभावित संख्या पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा, ‘चूंकि यह प्रक्रिया जारी रहेगी, इसलिए रद्द किए जाने वाले वीजा की संख्या लगातार बदलती रहेगी और यह कार्रवाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी।’


    क्या तुरंत देश से निकाल दिए जाएंगे 2 लाख लोग

    अधिकारियों ने कहा कि वीजा रद्द होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि संबंधित लोगों को तुरंत अमेरिका से निर्वासित कर दिया जाएगा। अधिकारियों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि फिलहाल जिन लोगों के शरण संबंधी मामले लंबित हैं, उनमें से अधिकांश की श्रेणी बदली जा सकती है, लेकिन वे कारोबारी या पर्यटन यात्री के रूप में अपना वीजा दर्जा खो देंगे।


    वीजा पर जारी हैं पाबंदियां

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पिछले साल दूसरी बार कार्यभार संभालने के बाद से उनके प्रशासन ने वीजा आवेदकों पर लगातार पाबंदियां कड़ी की हैं। इनमें आवेदकों से उनके सोशल मीडिया इतिहास के बारे में अधिक जानकारी मांगना, वीजा प्रक्रिया के लिए महंगे बॉन्ड जमा करने की अनिवार्यता और कुछ देशों के नागरिकों को वीजा जारी करने पर पूरी तरह रोक लगाना शामिल है।

    उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ऐसे लोगों को निशाने पर लिया, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे अमेरिका में प्रवेश करने के लिए पर्यटक और कारोबारी वीजा का इस्तेमाल करते हैं और फिर शरण के लिए आवेदन कर देते हैं।

    वर्तमान में बी1 और बी2 वीजा के लिए आवेदन करने वाले लोगों से यह पुष्टि करने को कहा जाता है कि वे अमेरिका में शरण के लिए आवेदन नहीं करेंगे। साथ ही, उन्हें यह भी साबित करना होता है कि वे अपने देश लौटने का इरादा रखते हैं।


    करीब 2 लाख हो चुके हैं रद्द

    पिछले 18 महीनों में विदेश विभाग करीब 1.75 लाख वीजा रद्द कर चुका है। इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें नशे में वाहन चलाने से लेकर दुष्कर्म और लूट जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है या जिन पर ऐसे अपराधों के आरोप हैं। इसके अलावा अमेरिका की नीतियों, खासकर पश्चिम एशिया से जुड़ी नीतियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलने वाले कुछ लोगों के वीजा भी रद्द किए गए हैं।

    ट्रंप प्रशासन ने गर्भवती महिलाओं द्वारा अमेरिका आकर यहां बच्चे को जन्म देकर उसे यहां की नागरिकता दिलाने के उद्देश्य वाले विदेशियों के ‘बर्थ टूरिज्म’ (जन्म पर्यटन) पर भी कार्रवाई तेज कर दी है।

  • बांग्लादेश में हिंदू परिवार की हत्या पर बड़ा सवाल: क्या हत्या से पहले महिलाओं से हुआ था दुष्कर्म? पुलिस जांच पर उठे सवाल

    बांग्लादेश में हिंदू परिवार की हत्या पर बड़ा सवाल: क्या हत्या से पहले महिलाओं से हुआ था दुष्कर्म? पुलिस जांच पर उठे सवाल


    ढाका।
    बांग्लादेश के रंगपुर में हिंदू परिवार के चार सदस्यों की हत्या का मामला गंभीर विवाद में बदल गया है। पुलिस ने हत्या के मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है, लेकिन स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों ने जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि कुछ अहम साक्ष्य सामने नहीं लाए जा रहे हैं।

    सबसे गंभीर सवाल परिवार की महिला सदस्यों से कथित दुष्कर्म को लेकर उठ रहा है। हालांकि, दुष्कर्म के आरोप की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस की रिपोर्ट में महिलाओं के साथ दुष्कर्म का उल्लेख नहीं किया गया है।

    शवगृह कर्मचारी के दावे से बढ़ा विवाद

    स्थानीय मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन में शवगृह के एक कर्मचारी ने महिलाओं के शवों से कथित तौर पर वीर्य मिलने का दावा किया। इस दावे के बाद मामले में दुष्कर्म की आशंका को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र फॉरेंसिक या आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। ऐसे में यह कहना कि हत्या से पहले निश्चित तौर पर दुष्कर्म हुआ था, फिलहाल जल्दबाजी होगी।

    चारों की गला घोंटकर हत्या

    पुलिस रिपोर्ट के अनुसार स्कूल शिक्षक गणपति चक्रवर्ती, उनकी पत्नी, बेटी और बेटे की गला घोंटकर हत्या की गई। मामले में गणपति के रिश्तेदार मुग्धो दास और सिद्धार्थ दास को गिरफ्तार किया गया है।

    स्थानीय लोगों और हिंदू संगठनों का आरोप है कि हत्या में और लोग भी शामिल हो सकते हैं और पुलिस उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, इन आरोपों की भी अभी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    जांच डिटेक्टिव ब्रांच को सौंपी गई

    विवाद बढ़ने के बाद मामले की जांच स्थानीय पुलिस से हटाकर डिटेक्टिव ब्रांच को सौंप दी गई है। जांच एजेंसी हत्या की परिस्थितियों के साथ-साथ घटनास्थल से मिले साक्ष्यों और आरोपियों की भूमिका की जांच कर रही है।

    इस बीच हिंदू संगठनों का विरोध जारी है। संगठनों ने मामले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विरोध प्रदर्शन की तैयारी की है।

    फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या फॉरेंसिक जांच में दुष्कर्म के आरोप की पुष्टि होती है और क्या हत्या में गिरफ्तार आरोपियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की भी भूमिका थी। इन दोनों सवालों का जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

  • ईरान से तेल-पेट्रोकेमिकल डील पर US की बड़ी कार्रवाई: इंडिया-बेस्ड 4 कंपनियों पर प्रतिबंध, 3 भारतीय भी निशाने पर

    ईरान से तेल-पेट्रोकेमिकल डील पर US की बड़ी कार्रवाई: इंडिया-बेस्ड 4 कंपनियों पर प्रतिबंध, 3 भारतीय भी निशाने पर


    नई दिल्ली। ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। अमेरिकी ट्रेजरी ने 4 इंडिया-बेस्ड कंपनियों और 3 भारतीय नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन कंपनियों पर ईरानी पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के कारोबार में शामिल होने का आरोप है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित लेनदेन की कुल कीमत करीब 119 मिलियन डॉलर है।

    यह कार्रवाई ईरान के वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका की ओर से चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है। अमेरिकी ट्रेजरी का कहना है कि इसका उद्देश्य उन आर्थिक रास्तों को निशाना बनाना है, जिनका इस्तेमाल ईरान राजस्व जुटाने और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए करता है।

    सदाशिव ओवरसीज पर 69 मिलियन डॉलर के आयात का आरोप
    अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, इंडिया-बेस्ड सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड ने फरवरी 2024 से जून 2025 के बीच करीब 69 मिलियन डॉलर के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया। इनमें कुछ शिपमेंट ऐसी कंपनी से जुड़े बताए गए हैं, जिस पर अमेरिका पहले ही प्रतिबंध लगा चुका है।

    इसके अलावा PP सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड और प्रकृतिस इंफ्रा इम्पेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड पर करीब 25-25 मिलियन डॉलर के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का आरोप लगाया गया है। इन तीनों कंपनियों के कारोबार को मिलाकर कुल रकम करीब 119 मिलियन डॉलर बताई गई है।

    चौथी कंपनी पर पेट्रोकेमिकल शिपमेंट में मदद का आरोप
    अमेरिका ने पोर्टईज पार्टनर्स LLP पर भी कार्रवाई की है। आरोप है कि कंपनी ने ईरान से पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कई खेप भारत लाने में मदद की। अमेरिका ने कंपनियों के अलावा तीन भारतीय नागरिकों को भी प्रतिबंध सूची में शामिल किया है। इनमें PP सॉफ्टटेक के निदेशक प्रशांत गर्ग, पोर्टईज पार्टनर्स से जुड़े इदरीसमिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी शामिल हैं।

    अमेरिका ने देशों को दी चेतावनी
    अमेरिका पहले ही विभिन्न देशों को चेतावनी दे चुका है कि वे ईरान को समर्थन देने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए तय समयसीमा का पालन करें। ऐसा नहीं करने पर संबंधित कंपनियों और संस्थाओं को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, इस अभियान का मकसद ईरान के उन आर्थिक रास्तों को बंद करना है, जिनके जरिए वह राजस्व हासिल करता है और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने की कोशिश करता है।

  • ऑपरेशन सिंदूर में ईरान ने किसका साथ दिया? पाकिस्तान के दावे से बढ़ा सवाल, तेहरान की भूमिका को लेकर तस्वीर अब भी अलग

    ऑपरेशन सिंदूर में ईरान ने किसका साथ दिया? पाकिस्तान के दावे से बढ़ा सवाल, तेहरान की भूमिका को लेकर तस्वीर अब भी अलग

    नई दिल्ली ।भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए सैन्य संघर्ष के दौरान ईरान ने किसका साथ दिया था, इसे लेकर अब नया दावा सामने आया है। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि भारत के साथ मई 2025 में हुए टकराव के दौरान ईरान ने पाकिस्तान को मजबूत समर्थन दिया था। हालांकि, इस दावे में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि समर्थन किस रूप में दिया गया था।

    ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत 7 मई 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद हुई थी। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में स्थित आतंकी ढांचे को निशाना बनाते हुए सैन्य कार्रवाई की थी।

    भारत ने इस अभियान को आतंकवाद के खिलाफ लक्षित कार्रवाई के तौर पर पेश किया था। अभियान के शुरुआती चरण में आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया और बाद में भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया। कुछ दिनों तक दोनों देशों के बीच हमले और जवाबी कार्रवाई का सिलसिला चला।

    इसी घटनाक्रम को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार का नया बयान सामने आया है। उन्होंने पाकिस्तान और ईरान के संबंधों पर दिए गए लिखित जवाब में कहा कि दोनों देशों के रिश्तों में पिछले दो वर्षों के दौरान सुधार हुआ है। इसी संदर्भ में उन्होंने मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान ईरान के समर्थन का उल्लेख किया।

    पाकिस्तानी पक्ष के अनुसार, ईरान ने उस समय पाकिस्तान को मजबूत राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन दिया था। हालांकि, डार के बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस समर्थन में सैन्य सहायता, खुफिया सहयोग, हथियार या किसी अन्य प्रकार की प्रत्यक्ष मदद शामिल थी या नहीं। इसलिए केवल इस बयान के आधार पर ईरान की सैन्य भूमिका को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    ईरान की भूमिका को समझने के लिए उस समय उसके सार्वजनिक रुख को भी ध्यान में रखना जरूरी है। मई 2025 के भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ईरान ने दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने पर जोर दिया था। ईरान के शीर्ष नेतृत्व की ओर से क्षेत्र में शांति और तनाव कम करने की कोशिशों का उल्लेख भी सामने आया था।

    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी मई 2025 में ईरानी नेतृत्व के साथ बातचीत के दौरान क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए ईरान के प्रयासों का आभार जताया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी उस दौरान क्षेत्रीय स्तर पर संपर्क और कूटनीतिक प्रयास किए थे।

    यही वजह है कि पाकिस्तान का ताजा दावा और उस समय ईरान की सार्वजनिक कूटनीतिक भूमिका अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं। पाकिस्तान इसे अपने पक्ष में मिले मजबूत समर्थन के रूप में देख रहा है, जबकि उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह साफ नहीं होता कि यह समर्थन सैन्य स्तर पर था या मुख्य रूप से राजनीतिक और कूटनीतिक।

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने भी स्पष्ट किया था कि अभियान का मुख्य उद्देश्य आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाना था। भारत का कहना रहा कि कार्रवाई पहलगाम हमले के जिम्मेदार आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ की गई और सैन्य कार्रवाई को लक्षित तथा नियंत्रित रखा गया।

    भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 का संघर्ष बाद में युद्धविराम के साथ थमा। इस पूरे घटनाक्रम में कई देशों ने तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए थे। अब ईरान की भूमिका को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्री का बयान सामने आने के बाद उस समय के क्षेत्रीय समीकरणों पर फिर चर्चा शुरू हो गई है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान ने ईरान के समर्थन का दावा जरूर किया है, लेकिन समर्थन की प्रकृति और सीमा को लेकर स्पष्ट आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ईरान ने पाकिस्तान को किसी प्रत्यक्ष सैन्य अभियान में सहायता दी थी।

  • भारतीय IT प्रोफेशनल्स को एक और झटका देने की तैयारी में ट्रंप…. H-1B वीजा पर बढ़ेगी फीस

    भारतीय IT प्रोफेशनल्स को एक और झटका देने की तैयारी में ट्रंप…. H-1B वीजा पर बढ़ेगी फीस


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में काम करने का सपना देख रहे भारतीय IT प्रोफेशनल्स (Indian IT Professionals) के लिए H-1B वीजा (H-1B Visa) को लेकर मुश्किलें बढ़ सकती हैं. ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वर्कर वीजा पर 1 लाख डॉलर से ज्यादा की फीस लगाने का प्रस्ताव पेश किया है. प्रस्ताव के तहत यह फीस 1,03,265 डॉलर तय की जा सकती है. खास बात यह है कि नई फीस सिर्फ विदेश से आवेदन करने वालों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि ज्यादातर नए H-1B आवेदकों पर लागू हो सकती है>

    अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (U.S. Department of Homeland Security) ने इस प्रस्ताव को फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया है. अगर इसे अंतिम मंजूरी मिल जाती है तो यह फीस स्थायी तौर पर लागू हो सकती है. प्रशासन इसे साल के अंत तक अंतिम रूप देने की तैयारी में है।


    पहले भी लगाई गई थी भारी फीस

    ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल H-1B वीजा पर अस्थायी तौर पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाई थी. हालांकि, जून में एक फेडरल जज ने इस फीस को गैरकानूनी बताते हुए प्रशासन को इसे वसूलने से रोक दिया था. अब अमेरिकी प्रशासन उस फैसले के खिलाफ अपील कर रहा है. एक अपीलीय अदालत इस मामले की सुनवाई कर रही है, जबकि एक दूसरी अदालत में भी फीस को चुनौती देने से जुड़ा मामला चल रहा है।


    H-1B वीजा क्या है?

    H-1B वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां खास तकनीकी और विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखती हैं. टेक्नोलॉजी, शिक्षा और रिसर्च जैसे सेक्टर में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. हर साल 65 हजार सामान्य H-1B वीजा जारी किए जाते हैं. एडवांस डिग्री वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए 20 हजार अतिरिक्त वीजा का प्रावधान है. आम तौर पर ये वीजा 3 से 6 साल तक के लिए मंजूर किए जाते हैं. ट्रंप के प्रस्ताव से पहले H-1B वीजा से जुड़ी फीस आमतौर पर करीब 2 हजार से 5 हजार डॉलर के बीच होती थी. ऐसे में 1,03,265 डॉलर की प्रस्तावित फीस कई गुना ज्यादा है।


    सभी पर नहीं पड़ेगा असर

    हालांकि, प्रस्तावित फीस हर H-1B वीजा पर लागू नहीं होगी. अमेरिका में पहले से स्टूडेंट वीजा पर मौजूद विदेशी नागरिकों को मिलने वाले नए H-1B वीजा इससे बाहर रखे जाएंगे. मौजूदा H-1B वीजा के रिन्यूअल पर भी यह फीस लागू नहीं होगी। फिर भी अगर यह नियम स्थायी होता है तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेश से नए हाई-स्किल्ड कर्मचारियों को हायर करना काफी महंगा हो सकता है. इसका असर भारत जैसे देशों के IT प्रोफेशनल्स पर पड़ने की आशंका है, जिनकी बड़ी संख्या H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में काम करती है।

  • पुतिन ने PM मोदी की जमकर की तारीफ, भारतीय किसानों के लिए रूस देगा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक

    पुतिन ने PM मोदी की जमकर की तारीफ, भारतीय किसानों के लिए रूस देगा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक

    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत और रूस के रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की है। सोमवार को मॉस्को में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान पुतिन ने कहा कि दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में पीएम मोदी की व्यक्तिगत भूमिका अहम रही है। उन्होंने जयशंकर से प्रधानमंत्री मोदी तक अपना गर्मजोशी भरा अभिवादन पहुंचाने को भी कहा।

    मुलाकात के दौरान पुतिन ने भारत के कृषि क्षेत्र को लेकर भी अहम भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि रूस भारत को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक यानी खाद उपलब्ध कराने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है। इससे भारतीय किसानों के लिए खाद की उपलब्धता को लेकर राहत की उम्मीद बढ़ी है।

    भारत-रूस व्यापार में फिर दिख रही तेजी

    पुतिन ने कहा कि 2025 में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में कुछ गिरावट आई थी, लेकिन अब इसमें सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने व्यापारिक रिश्तों में दोबारा तेजी आने के पीछे कई वजहों का जिक्र किया और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत ध्यान को खास तौर पर रेखांकित किया।

    रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि पीएम मोदी भारत-रूस संबंधों के विकास में व्यक्तिगत रुचि लेते हैं और यही दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    मोदी से जल्द मुलाकात की उम्मीद

    पुतिन ने जयशंकर के सामने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की इच्छा भी जाहिर की। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों नेताओं की मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (SCO) से जुड़े कार्यक्रम के दौरान हो सकती है। इसके अलावा कार्यक्रम और समय-सारिणी के अनुसार साल के अंत में भी दोनों नेताओं की मुलाकात की संभावना जताई गई।

    भारतीय किसानों के लिए रूस का बड़ा भरोसा

    बैठक में उर्वरक आपूर्ति का मुद्दा भी अहम रहा। पुतिन ने कहा कि रूस भारत की कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए खाद की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है।

    भारत के लिए यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि उर्वरकों की उपलब्धता सीधे खेती की लागत और उत्पादन से जुड़ी है। खासकर बुवाई के मौसम में खाद की समय पर उपलब्धता किसानों के लिए बेहद अहम होती है।

    सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है सहयोग

    पुतिन ने भारत और रूस के बीच सहयोग को केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं बताया। दोनों देश परमाणु ऊर्जा, हाईटेक, रक्षा और रणनीतिक तकनीक समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं।

    भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत साझेदारी रही है। अब दोनों देश व्यापार और आर्थिक सहयोग को भी नए क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

    मोदी की तारीफ का क्या है मतलब?

    जयशंकर के साथ मुलाकात के दौरान पुतिन की ओर से पीएम मोदी की व्यक्तिगत भूमिका का उल्लेख ऐसे समय हुआ है, जब भारत और रूस अपने पारंपरिक रणनीतिक रिश्तों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग के नए क्षेत्रों में विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

    ऐसे में एक तरफ पुतिन का मोदी की नेतृत्वकारी भूमिका की तारीफ करना और दूसरी तरफ भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा देना, दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

  • ट्रंप के अचानक बदलते रवैये से सतर्क था भारतीय प्रतिनिधिमंडल, मीडिया सवालों को लेकर अमेरिका के दावे पर भारत ने दी सफाई

    ट्रंप के अचानक बदलते रवैये से सतर्क था भारतीय प्रतिनिधिमंडल, मीडिया सवालों को लेकर अमेरिका के दावे पर भारत ने दी सफाई

    नई दिल्ली । जी-7 बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद मीडिया बातचीत को लेकर नया विवाद सामने आया है। अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने दावा किया कि बैठक के बाद पत्रकारों को सवाल पूछने से रोकने का अनुरोध भारत की तरफ से किया गया था। इस दावे के बाद भारत की ओर से भी अपना पक्ष सामने रखा गया है।

    सर्जियो गोर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात के बाद भारत की ओर से मीडिया को लेकर विशेष अनुरोध किया गया था। उनका दावा है कि विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया था कि पत्रकारों को बैठक के बाद बुलाया जा सकता है, लेकिन पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होनी चाहिए। साथ ही पत्रकारों को सवाल पूछने की अनुमति नहीं देने की बात भी कही गई थी।

    गोर के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस व्यवस्था पर सहमति जताई थी। हालांकि, बैठक समाप्त होने के बाद ट्रंप ने कैमरे की ओर देखकर पत्रकारों से सवाल करने की बात कह दी। इसके बाद मीडिया बातचीत का स्वरूप पहले तय किए गए तरीके से अलग हो गया।

    भारत की ओर से सामने आए सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रतिनिधिमंडल ने किसी असामान्य स्थिति से बचने के लिए पहले से तैयारी की थी। सूत्रों का कहना है कि ट्रंप के साथ बैठकों के दौरान सावधानी बरतना जरूरी माना जाता है, क्योंकि वह बातचीत के दौरान अचानक कोई नया मुद्दा उठा सकते हैं या चर्चा का रुख बदल सकता है।

    भारतीय पक्ष के अनुसार, ट्रंप के साथ पहले हुई कुछ बैठकों में भी बातचीत के दौरान अप्रत्याशित मुद्दे सामने आए हैं। दक्षिण अफ्रीका और यूक्रेन के नेताओं के साथ उनकी बातचीत के दौरान भी ऐसी स्थिति देखने को मिलने का हवाला दिया गया है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकात के दौरान मीडिया बातचीत को लेकर भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने पहले से तैयारी की थी।

    जी-7 बैठक के दौरान मोदी और ट्रंप के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, वहां मौजूद भारतीय नाविकों की सुरक्षा और भारत-अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े विषय प्रमुख रहे। होर्मुज क्षेत्र में जारी परिस्थितियों को देखते हुए वहां काम कर रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा रही।

    प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और उनकी सुरक्षित स्थिति सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया। बातचीत के दौरान ट्रंप की ओर से भी भारत के साथ खड़े रहने का भरोसा दिए जाने की बात सामने आई है। इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग के महत्व को भी रेखांकित किया गया।

    भारत और अमेरिका के बीच व्यापार का मुद्दा भी दोनों नेताओं की बातचीत में शामिल रहा। दोनों देशों के संबंधों में व्यापार और आर्थिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं। ऐसे में जी-7 बैठक के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात को कई स्तरों पर अहम माना गया।

    सर्जियो गोर के बयान के बाद अब प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भारत और अमेरिका के पक्षों में अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राजदूत ने मीडिया सवालों को लेकर भारत के अनुरोध का जिक्र किया, जबकि भारतीय पक्ष ने इसे प्रतिनिधिमंडल की पूर्व तैयारी और ट्रंप के अप्रत्याशित रवैये को ध्यान में रखकर बरती गई सावधानी से जोड़ा है। इस घटनाक्रम ने मोदी-ट्रंप मुलाकात से जुड़े राजनीतिक और कूटनीतिक पहलुओं को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

  • जवायदा और नुसेइरात में इजरायली कार्रवाई से गाजा में फिर बिगड़े हालात, नागरिकों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

    जवायदा और नुसेइरात में इजरायली कार्रवाई से गाजा में फिर बिगड़े हालात, नागरिकों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल


    नई दिल्ली ।गाजा में इजरायल और हमास के बीच जारी तनाव के बीच ताजा इजरायली सैन्य हमलों में कम से कम दो लोगों की मौत होने की खबर है। मृतकों में चार साल का एक बच्चा भी शामिल बताया गया है। हमलों में सात अन्य लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। फिलिस्तीनी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, घायलों का इलाज अस्पतालों में कराया जा रहा है।

    ताजा घटनाक्रम ने गाजा में लागू युद्धविराम की स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, मध्य गाजा के जवायदा शहर में एक इमारत को निशाना बनाया गया, जिससे उसे काफी नुकसान पहुंचा। हमले से पहले इलाके के नागरिकों को अपनी संपत्ति और क्षेत्र खाली करने की चेतावनी दिए जाने की बात भी सामने आई है।

    स्वास्थ्यकर्मियों के मुताबिक, हमले के बाद घटनास्थल से मलबा और छर्रे काफी दूरी तक फैल गए। इस घटना में कई लोग घायल हुए। घायलों में चार वर्षीय मोहम्मद अब्देल सलाम ताहा भी शामिल था। बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस घटना में अन्य घायल लोगों का उपचार जारी रहने की जानकारी है।

    गाजा के स्थानीय निवासी अबू अहमद ने मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि जमीन पर हालात युद्धविराम जैसे दिखाई नहीं दे रहे हैं। उनके मुताबिक, क्षेत्र के लोग ऐसा स्थायी समाधान चाहते हैं जिससे उन्हें लगातार हिंसा और असुरक्षा के बीच जीवन न बिताना पड़े। लंबे समय से जारी संघर्ष के कारण गाजा में बड़ी संख्या में लोग विस्थापन और मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं।

    स्वास्थ्य अधिकारियों ने एक अन्य हमले की जानकारी नुसेइरात शरणार्थी शिविर से भी दी है। बताया गया कि यहां भी हवाई हमला हुआ। नुसेइरात शिविर गाजा में लंबे समय से विस्थापित लोगों की आबादी का प्रमुख क्षेत्र रहा है। ऐसे में वहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर आम नागरिकों पर पड़ने की आशंका रहती है।

    ताजा हमलों से पहले भी इजरायली सेना और हमास के बीच युद्धविराम के उल्लंघन को लेकर आरोप लगते रहे हैं। इजरायली पक्ष की ओर से कहा गया है कि हमास से जुड़े लोग सैन्य गतिविधियां जारी रख रहे हैं। दूसरी ओर, फिलिस्तीनी क्षेत्रों में नागरिकों की मौत और विस्थापन को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है।

    इजरायली सेना ने इससे पहले देर अल-बलाह में हमास के एक वरिष्ठ सशस्त्र सदस्य शरीफ अल हसनत को मार गिराने का दावा किया था। सेना के मुताबिक, वह हमास के भूमिगत बुनियादी ढांचे को दोबारा तैयार करने के प्रयासों का नेतृत्व कर रहा था। इजरायली पक्ष ने उस पर युद्धविराम का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था।

    गाजा में ताजा हिंसा ऐसे समय सामने आई है जब क्षेत्र में संघर्ष को नियंत्रित करने और युद्धविराम को बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं। आम नागरिकों की मौत और घायल होने की घटनाओं ने मानवीय स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। लगातार सामने आ रही हिंसा के बीच स्थायी शांति और सुरक्षित माहौल स्थापित करना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।