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  • ट्रंप के पूर्व NSA जॉन बोल्टन पर बड़ा एक्शन, गोपनीय दस्तावेज रखने के मामले में दोष स्वीकार

    ट्रंप के पूर्व NSA जॉन बोल्टन पर बड़ा एक्शन, गोपनीय दस्तावेज रखने के मामले में दोष स्वीकार


    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन ने गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को अवैध रूप से अपने पास रखने के मामले में अदालत के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। इस मामले में अमेरिकी न्याय विभाग के साथ हुए समझौते के बाद बोल्टन ने दोषी होने की बात मानी है। हालांकि उनकी सजा पर अंतिम फैसला अदालत सुनाएगी लेकिन इस समझौते के चलते उन्हें जेल की अवधि में कुछ राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है।

    77 वर्षीय जॉन बोल्टन ने मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट स्थित अमेरिकी जिला अदालत में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील दस्तावेजों को अपने पास रखने के आरोप को स्वीकार किया। अमेरिकी कानून के तहत इस अपराध में अधिकतम 10 वर्ष तक की जेल की सजा का प्रावधान है। अदालत ने इस मामले में सजा सुनाने की तारीख 28 अक्टूबर तय की है।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार जॉन बोल्टन पर पिछले वर्ष कुल 18 आरोप लगाए गए थे। जांच में आरोप लगाया गया कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहते हुए तैयार किए गए निजी नोट्स और कई गोपनीय दस्तावेज अपने पास सुरक्षित रखे। इतना ही नहीं उन्होंने इनमें से कुछ संवेदनशील जानकारियां अपने परिवार के सदस्यों के साथ भी साझा की थीं। जांच एजेंसियों का दावा है कि बोल्टन ने अपने कार्यकाल से जुड़े एक हजार से अधिक पन्नों की गोपनीय जानकारी अपने परिवार को भेजी थी।

    अदालती दस्तावेजों के अनुसार बोल्टन ने कुछ गोपनीय दस्तावेज अपनी पत्नी और बेटी के साथ साझा किए थे। एक दस्तावेज भेजने के बाद उन्होंने संदेश में यह भी लिखा था कि इस विषय पर कोई चर्चा नहीं करेंगे। हालांकि जांच में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि उनके परिवार ने इन दस्तावेजों को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा किया हो। लेकिन सरकारी सेवा छोड़ने के बाद उनके निजी ईमेल खाते को ईरान से जुड़े एक हैकर द्वारा निशाना बनाए जाने के कारण सुरक्षा एजेंसियों ने गोपनीय सूचनाओं के लीक होने की आशंका भी जताई थी।

    न्याय विभाग के साथ हुए समझौते के तहत बोल्टन ने 22.5 लाख अमेरिकी डॉलर का जुर्माना भरने पर सहमति जताई है। इसके अलावा उन्हें संघीय सेवा से मिलने वाली सेवानिवृत्ति संबंधी कुछ सुविधाएं छोड़नी होंगी। समझौते में यह भी शामिल है कि वे खुफिया अधिकारियों के साथ पूछताछ में सहयोग करेंगे और 100 घंटे की सामुदायिक सेवा भी करेंगे। अभियोजन पक्ष ने अदालत से जेल की सजा अधिकतम पांच वर्ष तक सीमित रखने की सिफारिश की है लेकिन अदालत इस सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

    जॉन बोल्टन और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रिश्ते वर्ष 2019 में काफी खराब हो गए थे जब बोल्टन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने द रूम व्हेयर इट हैपन्ड नामक पुस्तक लिखी जिसमें ट्रंप प्रशासन की कार्यशैली और कई फैसलों की खुलकर आलोचना की गई थी। ट्रंप प्रशासन ने इस पुस्तक के प्रकाशन को रोकने की कोशिश की लेकिन अदालत से राहत नहीं मिल सकी। तब से दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक रूप से कई बार तीखी बयानबाजी होती रही है।

    बोल्टन के दोष स्वीकार करने के बाद यह मामला अमेरिकी प्रशासन में गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा और संवेदनशील सूचनाओं के प्रबंधन को लेकर एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। अब सभी की नजर 28 अक्टूबर को होने वाले अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है।

  • वेनेजुएला के बाद पाकिस्तान में भूकंप से हिली धरती, डेरा गाजी खान के पास 5.4 तीव्रता का झटका

    वेनेजुएला के बाद पाकिस्तान में भूकंप से हिली धरती, डेरा गाजी खान के पास 5.4 तीव्रता का झटका


    नई दिल्ली । दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंपों के बीच अब पाकिस्तान में भी धरती कांपने से लोगों में दहशत फैल गई। शनिवार सुबह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के डेरा गाजी खान क्षेत्र के पास 5.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। झटके महसूस होते ही लोग एहतियातन घरों और इमारतों से बाहर निकल आए। हालांकि शुरुआती जानकारी के अनुसार किसी बड़े जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं मिली है। स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    भूकंप शनिवार सुबह पाकिस्तान के स्थानीय समयानुसार करीब 8 बजकर 53 मिनट पर आया। रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 5.4 दर्ज की गई जबकि इसका केंद्र डेरा गाजी खान के आसपास जमीन से लगभग 75 किलोमीटर की गहराई में था। विशेषज्ञों के अनुसार अपेक्षाकृत अधिक गहराई में केंद्र होने के कारण सतह पर नुकसान सीमित रहने की संभावना रहती है लेकिन इसके बावजूद झटके कई इलाकों में महसूस किए गए।

    भूकंप के बाद लोगों में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कई लोग सुरक्षा के लिहाज से अपने घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आए। प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए राहत दलों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। फिलहाल किसी इमारत के गिरने या जनहानि की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    पाकिस्तान भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है जहां समय-समय पर मध्यम और तेज तीव्रता के भूकंप आते रहते हैं। हाल के दिनों में भी देश के कई हिस्सों में धरती कांप चुकी है। शुक्रवार को बलूचिस्तान के विभिन्न इलाकों में भी भूकंप के झटके महसूस किए गए थे। विशेषज्ञ लगातार लोगों को भूकंप के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन करने और अफवाहों से बचने की सलाह देते रहे हैं।

    पाकिस्तान में आया यह भूकंप ऐसे समय दर्ज किया गया है जब वेनेजुएला हाल ही में आए शक्तिशाली भूकंपों से उबरने की कोशिश कर रहा है। वहां 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो बड़े भूकंपों ने भारी तबाही मचाई थी। कई इमारतें ढह गईं और हजारों लोग प्रभावित हुए। राहत और बचाव अभियान अभी भी जारी है तथा कई इलाकों में मलबे के नीचे फंसे लोगों की तलाश की जा रही है।

    वेनेजुएला में अस्पतालों और राहत शिविरों में बड़ी संख्या में घायलों का इलाज चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां भी प्रभावित क्षेत्रों में सहायता पहुंचा रही हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई इलाकों तक पहुंचने में अब भी चुनौतियां बनी हुई हैं।

    दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लगातार आ रहे भूकंप यह याद दिलाते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था और लोगों में जागरूकता बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंप संभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को हमेशा आपातकालीन तैयारियों और सुरक्षा उपायों के प्रति सतर्क रहना चाहिए।

  • भारत-ब्रिटेन रिश्तों को नई मजबूती देने पर पीयूष गोयल सम्मानित, UK-India Awards 2026 में मिला विशेष अवॉर्ड

    भारत-ब्रिटेन रिश्तों को नई मजबूती देने पर पीयूष गोयल सम्मानित, UK-India Awards 2026 में मिला विशेष अवॉर्ड


    नई दिल्ली । केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को भारत और ब्रिटेन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए लंदन में आयोजित यूके-इंडिया अवॉर्ड्स 2026 में ‘भारत-ब्रिटेन संबंधों को बेहतर बनाने में उत्कृष्ट नेतृत्व’ के विशेष सम्मान से नवाजा गया।

    सम्मान प्राप्त करने के बाद 300 से अधिक नीति-निर्माताओं, उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं को संबोधित करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि भारत और ब्रिटेन के बीच रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है और दोनों देशों की साझेदारी का सबसे बेहतरीन दौर अभी आना बाकी है।

    उन्होंने बताया कि भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई से लागू होने जा रहा है। उनके अनुसार यह समझौता व्यापार, निवेश, नवाचार और आर्थिक सहयोग को नई गति देगा तथा दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत बनाएगा।

    पीयूष गोयल ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों का है जिन्होंने सरकार, उद्योग, शिक्षा, संस्कृति और भारतीय प्रवासी समुदाय के माध्यम से भारत और ब्रिटेन के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में योगदान दिया है।

    उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है। यह विकास यात्रा व्यापार, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, नवाचार और उभरते क्षेत्रों में भारत और ब्रिटेन के बीच सहयोग के अभूतपूर्व अवसर पैदा कर रही है।

    केंद्रीय मंत्री ने समारोह में सम्मानित अन्य विजेताओं को भी बधाई दी और विश्वास जताया कि उनके प्रयासों से भारत-ब्रिटेन रणनीतिक साझेदारी और अधिक मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बढ़ता व्यापार, मजबूत होते कारोबारी संबंध और लोगों के बीच गहरे होते संपर्क भविष्य में सहयोग के नए आयाम स्थापित करेंगे।

    अपने संबोधन के अंत में उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि “भारत-ब्रिटेन साझेदारी की सबसे बेहतरीन पारी अभी बाकी है।” यह संदेश दोनों देशों के बीच भविष्य में और व्यापक आर्थिक, तकनीकी तथा रणनीतिक सहयोग की संभावनाओं को रेखांकित करता है।

  • भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, 'ऑपरेशन अमिस्ताद' के तहत वेनेजुएला भेजे डॉक्टर, भीष्म क्यूब और राहत सामग्री

    भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, 'ऑपरेशन अमिस्ताद' के तहत वेनेजुएला भेजे डॉक्टर, भीष्म क्यूब और राहत सामग्री


    नई दिल्ली । उत्तरी वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने एक बार फिर वैश्विक मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए राहत और चिकित्सा सहायता के लिए ‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ शुरू किया है। इस विशेष अभियान के तहत भारतीय सेना की मेडिकल टीम, आधुनिक चिकित्सा उपकरण और बड़ी मात्रा में राहत सामग्री वेनेजुएला भेजी गई है, ताकि आपदा प्रभावित लोगों को तत्काल इलाज और जरूरी सहायता मिल सके।

    भारतीय सेना के 60 पैरा फील्ड हॉस्पिटल से 41 सदस्यीय विशेषज्ञ दल भारतीय वायुसेना के दो सी-17 परिवहन विमानों के जरिए वेनेजुएला रवाना हुआ है। इस टीम में नौ अनुभवी सैन्य चिकित्सक भी शामिल हैं, जो प्रभावित इलाकों में आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं, ट्रॉमा केयर, गंभीर घायलों का इलाज, सर्जरी और गहन चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।

    भारतीय सेना के अनुसार राहत दल अपने साथ लगभग छह टन चिकित्सा सामग्री और मानवीय सहायता लेकर गया है। इसके अलावा मिशन में 35 टन से अधिक राहत सामग्री, दवाइयां और चिकित्सा उपकरण भी भेजे गए हैं। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता ‘भीष्म क्यूब’ है, जिसे भारत की आरोग्य मैत्री परियोजना के तहत विकसित किया गया है। यह अत्याधुनिक मॉड्यूलर फील्ड हॉस्पिटल बेहद कम समय में स्थापित किया जा सकता है और लगभग 200 मरीजों को एक साथ जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधा देने में सक्षम है।

    विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत भारतीय वायुसेना के दो सी-17 विमान राहत सामग्री और चिकित्सा दल के साथ वेनेजुएला रवाना हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत इस कठिन समय में वेनेजुएला की सरकार और वहां के नागरिकों के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है तथा हरसंभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है।

    भीष्म क्यूब को विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकट वाले क्षेत्रों में तेजी से चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह उन्नत ट्रॉमा केयर, आपातकालीन सर्जरी और गहन चिकित्सा सुविधाओं से लैस है, जिससे बड़ी संख्या में घायलों का तत्काल उपचार संभव हो पाता है।

    भारत का यह मिशन केवल राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मित्र देशों के साथ संकट की घड़ी में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की उसकी विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण का भी मजबूत संदेश देता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर आधारित यह अभियान वैश्विक सहयोग, करुणा और मानवता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को फिर से रेखांकित करता है।

    वेनेजुएला में चलाया जा रहा ऑपरेशन अमिस्ताद हजारों प्रभावित लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण साबित हो सकता है। साथ ही यह अभियान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और मानवीय शक्ति की छवि को भी और मजबूत करेगा।

  • मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत अलर्ट तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा फिलहाल ईरान की यात्रा न करें

    मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत अलर्ट तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा फिलहाल ईरान की यात्रा न करें


    नई दिल्ली । भारत ने ईरान में मौजूद सुरक्षा हालात को देखते हुए अपने नागरिकों के लिए नई ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने साफ कहा है कि परिस्थितियों में कुछ सुधार के संकेत जरूर मिले हैं लेकिन स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं मानी जा सकती। ऐसे में भारतीय नागरिक अगली सूचना तक ईरान की सभी गैर जरूरी यात्राओं से बचें और केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही वहां जाने का निर्णय लें।

    दूतावास ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के लिए ईरान की यात्रा बेहद जरूरी है वे पूरी सतर्कता बरतें और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी सभी सुरक्षा निर्देशों का पालन करें। भारतीय मिशन लगातार वहां की बदलती परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर नई एडवाइजरी जारी की जाएगी।

    भारतीय दूतावास ने ईरान में रह रहे भारतीय नागरिकों से भी विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। उन्हें सलाह दी गई है कि वे बिना आवश्यकता के यात्रा करने से बचें और किसी भी प्रकार की अफवाह या अपुष्ट जानकारी पर भरोसा न करें। केवल विश्वसनीय समाचार स्रोतों और स्थानीय प्रशासन की आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर ही निर्णय लें।

    दूतावास ने कहा कि सुरक्षा हालात में सुधार के बावजूद जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मौजूदा एडवाइजरी को फिलहाल वापस नहीं लिया गया है। हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और आवश्यकता के अनुसार आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।

    भारतीय नागरिकों से यह भी कहा गया है कि यदि वे ईरान में रह रहे हैं तो अपने संपर्क विवरण भारतीय दूतावास के पास अवश्य दर्ज कराएं ताकि किसी भी आपात स्थिति में उनसे तुरंत संपर्क किया जा सके। दूतावास ने आपातकालीन सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत संपर्क करने की सलाह दी है।

    यह एडवाइजरी ऐसे समय जारी की गई है जब मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। हालांकि क्षेत्र में हालात अभी भी संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी समय स्थिति बदल सकती है। इसी वजह से भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है।

    भारतीय दूतावास ने भरोसा दिलाया है कि वह ईरान में रह रहे प्रत्येक भारतीय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है। साथ ही नागरिकों से अपील की गई है कि वे धैर्य बनाए रखें और किसी भी आपात स्थिति में दूतावास द्वारा जारी हेल्पलाइन नंबरों का उपयोग करें।

    आपातकालीन संपर्क नंबर

    +989128109115

    +989128109109

    +989128109102

    +989932179359

  • होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ा संकट, ड्रोन हमले के बाद 11 हजार नाविकों की निकासी पर लगी रोक

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ा संकट, ड्रोन हमले के बाद 11 हजार नाविकों की निकासी पर लगी रोक

    नई दिल्ली ।  होर्मुज जलडमरूमध्य में एक कार्गो जहाज पर हुए ड्रोन हमले के बाद पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिका ने इस हमले के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं सुरक्षा हालात बिगड़ने के चलते अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन आईएमओ ने 11 हजार से अधिक फंसे नाविकों को सुरक्षित निकालने के लिए चलाया जा रहा विशेष रेस्क्यू अभियान अस्थायी रूप से रोक दिया है। इस फैसले के बाद हजारों नाविक अब भी समुद्र में फंसे हुए हैं और उनकी सुरक्षित वापसी को लेकर चिंता बढ़ गई है।

    अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगेज ने बताया कि गुरुवार को जिस मालवाहक जहाज पर ड्रोन हमला हुआ वह संगठन की आधिकारिक निकासी योजना का हिस्सा नहीं था। इसके बावजूद इस घटना ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक निकासी सूची में शामिल जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती तब तक बचाव अभियान को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

    जानकारी के अनुसार संयुक्त राष्ट्र ओमान और कई सदस्य देशों के सहयोग से पिछले कुछ दिनों से फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का अभियान चला रहे थे। इस विशेष ऑपरेशन का उद्देश्य युद्ध और बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के कारण समुद्र में फंसे जहाजों और उनके चालक दल को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना था।

    इसी दौरान ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले कार्गो जहाज एवर लवली पर ड्रोन हमला हुआ। शुरुआती जानकारी के मुताबिक इस हमले में किसी नाविक की मौत या गंभीर रूप से घायल होने की खबर नहीं है लेकिन घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया गया है।

    आईएमओ प्रमुख आर्सेनियो डोमिंगेज ने कहा कि निकासी अभियान को फिलहाल अस्थायी रूप से स्थगित किया गया है और सुरक्षा स्थिति की दोबारा समीक्षा की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी जहाज को तब तक आगे नहीं बढ़ाया जाएगा जब तक सभी संबंधित देशों और एजेंसियों की ओर से सुरक्षित मार्ग की गारंटी नहीं मिल जाती।

    बताया जा रहा है कि हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद लगभग 11 हजार नाविकों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाई गई थी। हालांकि ताजा ड्रोन हमले ने इस पूरी प्रक्रिया को झटका दिया है और अब निकासी अभियान अनिश्चितकाल के लिए टल सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के अनुसार इस पूरे क्षेत्र में अभी भी करीब 20 हजार से अधिक नाविक विभिन्न मालवाहक और वाणिज्यिक जहाजों पर फंसे हुए हैं। इनमें से लगभग 11 हजार लोगों को पहले चरण में सुरक्षित निकालने की योजना तैयार की गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक समुद्री व्यापार तथा ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है।

    अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए आरोपों के बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि ईरान ने अब तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि सुरक्षा हालात कब सामान्य होंगे और हजारों फंसे नाविकों का रेस्क्यू अभियान दोबारा कब शुरू किया जाएगा।

  • तीस्ता पर चीन-बांग्लादेश समझौता, भारत के लिए बढ़ी टेंशन? सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास नई रणनीतिक हलचल

    तीस्ता पर चीन-बांग्लादेश समझौता, भारत के लिए बढ़ी टेंशन? सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास नई रणनीतिक हलचल


    नई दिल्ली । चीन और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी परियोजना को लेकर सहयोग का नया अध्याय शुरू हो गया है। दोनों देशों ने तीस्ता सहित अन्य नदियों के जल प्रबंधन, तकनीकी सहयोग और संभावित वित्तीय सहायता को लेकर सहमति जताई है। इस फैसले को भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि तीस्ता नदी परियोजना भारत के बेहद संवेदनशील सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के निकट स्थित है। यही संकरा भूभाग पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला सबसे अहम संपर्क मार्ग है।

    बीजिंग में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान और चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक में नदी प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, जल संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास पर व्यापक सहयोग को लेकर चर्चा हुई। बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना के लिए चीन से आधुनिक तकनीक और वित्तीय सहयोग की मांग भी की है। चीन लंबे समय से इस परियोजना में रुचि दिखाता रहा है और अब दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकियों ने इस सहयोग को नई गति दे दी है।

    तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला आधिकारिक चीन दौरा माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने जल संसाधन प्रबंधन के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि तीस्ता परियोजना से सिंचाई व्यवस्था मजबूत होगी, बाढ़ नियंत्रण में मदद मिलेगी और लाखों लोगों की आजीविका बेहतर होगी।

    हालांकि इस समझौते को भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों के नजरिए से भी देखा जा रहा है। तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से गुजरते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। परियोजना का स्थान सिलिगुड़ी कॉरिडोर के काफी निकट होने के कारण विशेषज्ञ इसे सामरिक दृष्टि से संवेदनशील मानते हैं। यही कारण है कि चीन की बढ़ती मौजूदगी पर भारत की नजर बनी हुई है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। पश्चिम बंगाल की सहमति नहीं बनने के कारण दोनों देशों के बीच व्यापक जल समझौता अब तक नहीं हो सका है। ऐसे में बांग्लादेश द्वारा चीन के साथ बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह सहयोग जल संसाधन प्रबंधन और विकास परियोजनाओं तक सीमित बताया जा रहा है, लेकिन भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परियोजना का वास्तविक स्वरूप क्या होता है और इसका क्षेत्रीय सुरक्षा तथा कूटनीतिक संबंधों पर कितना प्रभाव पड़ता है।

  • डेनमार्क में अजान पर बैन की तैयारी! सरकार बोली- ऐसा न लगे कि इस्लामाबाद में हैं

    डेनमार्क में अजान पर बैन की तैयारी! सरकार बोली- ऐसा न लगे कि इस्लामाबाद में हैं


    नई दिल्ली । यूरोप में प्रवासन और धार्मिक पहचान को लेकर जारी बहस के बीच डेनमार्क ने एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। देश की सरकार मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर दी जाने वाली अजान पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की संभावना की समीक्षा कर रही है। सरकार का कहना है कि यह फैसला देश की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक वातावरण को बनाए रखने के उद्देश्य से लिया जा रहा है। हालांकि अभी यह केवल प्रस्ताव के स्तर पर है और इसे अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।

    डेनमार्क के इमिग्रेशन मंत्री मोर्टेन बोडस्कोव ने कहा कि सरकार यह जांच कर रही है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के प्रावधानों के तहत अजान पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि डेनमार्क की छतों के ऊपर लाउडस्पीकर से अजान की आवाज नहीं सुनाई देनी चाहिए और लोगों को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि वे किसी दूसरे देश के धार्मिक माहौल में हैं। उनके इस बयान ने पूरे यूरोप में नई बहस छेड़ दी है।

    सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक उद्घोषणाओं को नियंत्रित करना देश की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए जरूरी हो सकता है। वहीं दूसरी ओर इस प्रस्ताव के विरोध में यह दलील दी जा रही है कि डेनमार्क का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और सार्वजनिक रूप से धार्मिक गतिविधियां करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक परंपरा पर रोक लगाने का फैसला कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

    डेनमार्क में लगभग 2.7 लाख मुस्लिम आबादी रहती है और पूरे देश में करीब 100 मस्जिदें हैं। हाल के वर्षों में यूरोप के कई देशों में प्रवासन हिजाब धार्मिक पहचान और सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज हुई है। कई देशों ने पहले भी धार्मिक प्रतीकों और सार्वजनिक आयोजनों को लेकर नए नियम लागू किए हैं।

    सरकार फिलहाल कानूनी विशेषज्ञों की राय ले रही है ताकि यह तय किया जा सके कि प्रस्ताव संविधान और मानवाधिकार संबंधी कानूनों के अनुरूप है या नहीं। यदि कानूनी समीक्षा सकारात्मक रहती है तो सरकार संसद में नया विधेयक ला सकती है। हालांकि इसके लिए राजनीतिक सहमति और संसदीय मंजूरी भी जरूरी होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल अजान तक सीमित नहीं है बल्कि यूरोप में राष्ट्रीय पहचान धार्मिक स्वतंत्रता और प्रवासन नीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में डेनमार्क सरकार की कानूनी समीक्षा और राजनीतिक निर्णय पर पूरे यूरोप की नजर रहेगी क्योंकि इसका असर अन्य देशों की नीतियों पर भी पड़ सकता है।

  • भारत-सेशेल्स रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती, स्वर्ण जयंती समारोह में शामिल होंगे प्रधानमंत्री मोदी

    भारत-सेशेल्स रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती, स्वर्ण जयंती समारोह में शामिल होंगे प्रधानमंत्री मोदी


    नई दिल्ली । सेशेल्स की आजादी की 50वीं वर्षगांठ भारत और सेशेल्स के रिश्तों को नई ऊंचाई देने का अवसर बनने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 से 29 जून 2026 तक सेशेल्स की राजकीय यात्रा पर रहेंगे, जहां वह राष्ट्रीय दिवस के स्वर्ण जयंती समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी के निमंत्रण पर होने वाली यह यात्रा दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे भरोसेमंद संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    प्रधानमंत्री के आगमन को लेकर सेशेल्स में उत्साह का माहौल है। स्थानीय नागरिकों से लेकर भारतीय समुदाय तक सभी इस यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहद अहम मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि भारत और सेशेल्स के बीच पिछले कुछ वर्षों में सहयोग लगातार बढ़ा है और प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा इस साझेदारी को नई गति देगी। उनका मानना है कि व्यापार, निवेश, समुद्री सुरक्षा और विकास परियोजनाओं में सहयोग और मजबूत होगा।

    सेशेल्स में रहने वाले भारतीय समुदाय ने भी प्रधानमंत्री के दौरे का गर्मजोशी से स्वागत किया है। समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बेहद मजबूत हैं। बड़ी संख्या में भारतीय सेशेल्स की अर्थव्यवस्था, व्यापार और विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। ऐसे में शीर्ष स्तर की यह यात्रा दोनों देशों के लोगों के बीच रिश्तों को और गहरा करेगी तथा नए अवसरों के द्वार खोलेगी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले वर्ष 2015 में सेशेल्स की यात्रा कर चुके हैं। इस बार उनका दौरा कई मायनों में खास माना जा रहा है क्योंकि यह सेशेल्स की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर हो रहा है। समारोह में भारतीय सशस्त्र बलों की एक टुकड़ी और भारतीय नौसेना के दो युद्धपोत भी हिस्सा लेंगे, जो दोनों देशों के बीच मजबूत रक्षा और समुद्री सहयोग का प्रतीक होंगे।

    दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी के बीच व्यापक द्विपक्षीय वार्ता होगी। दोनों नेता व्यापार, निवेश, विकास सहयोग, समुद्री सुरक्षा, क्षमता निर्माण, जलवायु परिवर्तन और हिंद महासागर क्षेत्र में साझेदारी सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया जाएगा। प्रधानमंत्री सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करेंगे और वहां रह रहे भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी मुलाकात करेंगे।

    भारत और सेशेल्स के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोगों के बीच गहरे संपर्क पर आधारित रहे हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में सेशेल्स भारत का एक महत्वपूर्ण समुद्री साझेदार है। भारत के ‘महासागर’ विजन और ग्लोबल साउथ को मजबूत करने की नीति में भी सेशेल्स की अहम भूमिका है। यही वजह है कि यह यात्रा केवल एक औपचारिक राजकीय दौरा नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण अवसर मानी जा रही है। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा और व्यापक होगा तथा हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास के साझा लक्ष्य को नई मजबूती मिलेगी।

  • संयुक्त राष्ट्र में भारत की दमदार पैरवी शांति निर्माण के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और समान साझेदारी पर दिया जोर

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की दमदार पैरवी शांति निर्माण के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और समान साझेदारी पर दिया जोर


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा में आयोजित उच्चस्तरीय बहस के दौरान भारत ने वैश्विक शांति निर्माण को लेकर अपना स्पष्ट और दूरदर्शी दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने कहा कि किसी भी देश में स्थायी शांति तभी स्थापित की जा सकती है जब उसकी अगुवाई स्वयं उस देश के नेतृत्व के हाथों में हो और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बराबरी सम्मान तथा विश्वास के आधार पर आगे बढ़े। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब पारंपरिक दाता और प्राप्तकर्ता वाले मॉडल से आगे बढ़ने का समय आ गया है।

    पी हरीश ने संयुक्त राष्ट्र में पहले पीसबिल्डिंग वीक के दौरान आयोजित शांति निर्माण आयोग के वार्षिक सत्र और संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्चस्तरीय बहस में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि शांति निर्माण की पूरी प्रक्रिया मांग आधारित होनी चाहिए। इसका उद्देश्य संबंधित देशों की वास्तविक जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप समाधान तैयार करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका सहयोगी की होनी चाहिए न कि निर्णय थोपने वाले पक्ष की।

    उन्होंने कहा कि किसी भी शांति निर्माण अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब वह संबंधित देश की संस्थागत क्षमता को मजबूत करे और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए उसे आत्मनिर्भर बनाए। मजबूत संस्थाएं और सक्षम प्रशासन ही दीर्घकालिक शांति की सबसे बड़ी गारंटी हैं।

    भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना के बीस वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अवधि में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुई हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण व्यवस्था की चौथी समीक्षा पहली राष्ट्रीय शांति निर्माण रणनीति की प्रस्तुति और पीसबिल्डिंग फंड के साथ पहला वार्षिक रणनीतिक संवाद शामिल है। उन्होंने इन पहलों को वैश्विक शांति प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया।

    उन्होंने यह भी चिंता जताई कि पिछले तीन वर्षों में पीसबिल्डिंग फंड के लिए स्वैच्छिक योगदान में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा वित्तीय स्थिति का भी शांति निर्माण कार्यक्रमों पर असर पड़ा है। भारत का मानना है कि सीमित संसाधनों का उपयोग सबसे अधिक उन देशों में किया जाना चाहिए जो संघर्ष के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। इससे उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

    पी हरीश ने कहा कि इस वर्ष आयोजित पीसबिल्डिंग वीक की थीम नवाचार समावेशन और प्रभाव के लिए साझेदारी वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में बेहद प्रासंगिक है। भारत भरोसे और समानता पर आधारित साझेदारी को शांति निर्माण की सबसे मजबूत नींव मानता है। उन्होंने कहा कि ऐसी साझेदारी तभी सफल होगी जब राष्ट्रीय स्वामित्व हर प्रक्रिया का मूल सिद्धांत बना रहेगा।

    भारत ने महिलाओं की भूमिका को भी शांति निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बताया। पी हरीश ने हाल ही में भारत की मेजर अभिलाषा बराक को वर्ष 2025 का मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर सम्मान मिलने का उल्लेख करते हुए कहा कि यह महिलाओं शांति और सुरक्षा के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्र निर्माण के अनुभव और विकास मॉडल को दुनिया के साथ साझा करने के लिए पूरी तरह तैयार है तथा वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करता रहेगा।