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  • लिपुलेख विवाद फिर गरमाया: नेपाल का ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ या कूटनीतिक दबाव? बालेन शाह के बयान से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल रिश्तों पर नई चुनौती

    लिपुलेख विवाद फिर गरमाया: नेपाल का ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ या कूटनीतिक दबाव? बालेन शाह के बयान से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल रिश्तों पर नई चुनौती


    नई दिल्ली। नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से चले आ रहे लिपुलेख सीमा विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर तनाव बढ़ा दिया है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से उठे नए बयान के बाद यह मुद्दा फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है।

    नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि Lipulekh Pass के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और चीन द्वारा किए जा रहे उपयोग पर उसे आपत्ति है। काठमांडू का दावा है कि यह क्षेत्र नेपाल की संप्रभु भूमि का हिस्सा है और किसी भी गतिविधि के लिए उसकी सहमति जरूरी है।

    नेपाल का सख्त रुख
    नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों को औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति भेजते हुए कहा है कि लिपुलेख और उससे जुड़े क्षेत्र नेपाल की सीमाओं के भीतर आते हैं। सरकार ने यह भी साफ किया है कि वह इस मामले को कूटनीतिक तरीके से आगे बढ़ाएगी।

    नेपाल में इस मुद्दे को लेकर जनता की भावनाएं भी तेजी से जुड़ रही हैं, जिससे सरकार के लिए इसे राजनीतिक रूप से नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है।

    ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ की चर्चा
    इसी बीच काठमांडू के मेयर और युवा नेता Balen Shah (बालेन शाह) के बयानों ने इस विवाद को और हवा दे दी है। माना जा रहा है कि उन्होंने इस मुद्दे को “राष्ट्रवादी भावना” के तौर पर उठाकर घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।

    विवाद की ऐतिहासिक जड़ें
    इस पूरे विवाद की जड़ें 1816 की Treaty of Sugauli से जुड़ी हैं, जिसमें भारत (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) और नेपाल के बीच सीमाएं तय हुई थीं। नेपाल का दावा है कि काली नदी का उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है, जिससे लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र नेपाल का हिस्सा बनते हैं।वहीं भारत का तर्क है कि वास्तविक उद्गम स्थल पूर्व की ओर है, और इस आधार पर यह क्षेत्र भारतीय प्रशासन के अंतर्गत आता है।

    भारत का पक्ष और रणनीतिक महत्व
    भारत इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानता है, क्योंकि यह चीन सीमा के करीब स्थित है और सैन्य दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से इस इलाके में भारतीय चौकियां मौजूद हैं।

    भारत ने हाल के वर्षों में यहां सड़क और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट भी विकसित किए हैं, जिससे कैलाश मानसरोवर यात्रा आसान हो सके और सीमा तक पहुंच मजबूत हो।

    2020 का तनाव और नया नक्शा
    2020 में भारत द्वारा लिपुलेख रोड के उद्घाटन के बाद नेपाल ने कड़ा विरोध जताया था। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र में दिखाया था, जिसे संसद से भी मंजूरी मिली थी।विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद फिलहाल आसान समाधान की ओर नहीं बढ़ रहा है। भारत, नेपाल और चीन के रणनीतिक हित इस क्षेत्र में जुड़े होने के कारण यह मुद्दा लंबे समय तक कूटनीतिक तनाव का कारण बना रह सकता है।

    फिलहाल दोनों देश अपने-अपने रुख पर कायम हैं नेपाल कूटनीतिक बातचीत की बात कर रहा है, जबकि भारत इसे अपने प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है।

  • समुद्र में मौत का साया: क्रूज जहाज पर फैला रहस्यमयी हंतावायरस, 3 की मौत के बाद अफ्रीका तट पर मचा हड़कंप

    समुद्र में मौत का साया: क्रूज जहाज पर फैला रहस्यमयी हंतावायरस, 3 की मौत के बाद अफ्रीका तट पर मचा हड़कंप


    नई दिल्ली। अटलांटिक महासागर में एक क्रूज शिप पर हंतावायरस संक्रमण का संदिग्ध मामला सामने आया है। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई है और कम से कम तीन लोग बीमार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और दक्षिण अफ्रीका स्वास्थ्य विभाग ने रविवार को इसकी पुष्टि की।

    MV होंडियस नाम के इस क्रूजशिप को फिलहाल अफ्रीकी देश केप वर्डे की राजधानी प्राया में रोका गया है। अभी यात्रियों को उतरने की अनुमति नहीं मिली है। यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि संक्रमण फैलने के खतरे को नियंत्रित किया जा सके।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जहाज पर 6 लोगों में संक्रमण जैसे लक्षण मिले हैं। इनमें से एक मामले की पुष्टि लैब में हो चुकी है। एक मरीज दक्षिण अफ्रीका के अस्पताल में आईसीयू में भर्ती है, जबकि दो को जहाज से निकालने की तैयारी की जा रही है।

    यह भी अभी पता नहीं है कि सभी बीमार लोग हंतावायरस से संक्रमित हैं या नहीं। यह बीमारी आखिर कैसे और कहां से फैली है, इसकी जांच चल रही है।
    7 हफ्ते में कई देशों से गुजरा क्रूज

    नीदरलैंड के झंडे वाला यह क्रूज शिप 20 मार्च को अर्जेंटीना के उशुआइया से रवाना हुआ था। इसके बाद यह दक्षिणी ध्रुव के आसपास के इलाकों में गया और फिर अटलांटिक पार करते हुए यूरोप की ओर बढ़ रहा था। इसे सबसे आखिर में स्पेन के कैनरी द्वीप तक पहुंचना था, जो अफ्रीका के पास अटलांटिक में स्थित एक प्रमुख पर्यटन क्षेत्र है।

    जहाज में कुल 170 यात्री और 71 क्रू सदस्य मौजूद हैं। इनमें एक डॉक्टर भी शामिल है। पहला मृतक 70 साल का एक व्यक्ति था, जिसकी मौत जहाज पर ही हो गई थी। वह अपनी पत्नी के साथ इस यात्रा पर था। इसके बाद उसका शव दक्षिण अटलांटिक में स्थित सेंट हेलेना में उतारा गया।

    उसकी पत्नी बाद में दक्षिण अफ्रीका पहुंचीं, जहां से उन्हें अपने देश नीदरलैंड लौटना था। लेकिन एयरपोर्ट पर ही उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, वह बेहोश हो गईं और बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई। क्रूज चलाने वाली कंपनी ओशनवाइड एक्सपेडिशंस ने बताया कि तीसरे मृतक का शव अभी भी जहाज पर केप वर्डे में मौजूद है।

    संक्रमण कैसे फैला, इसकी जांच की जा रही

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि संक्रमण आया कहां से। अर्जेंटीना के जिस इलाके से जहाज रवाना हुआ, वहां हंतावायरस का कोई मामला दर्ज नहीं है। जहाज ऐसे क्षेत्रों में भी नहीं गया जहां यह वायरस आम है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि संक्रमण जहाज के अंदर हो सकता है।

    चूहों के संपर्क में आने से फैलता है हंतावायरस

    सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल के मुताबिक, हंतावायरस व्यक्ति के चूहे या गिलहरी के संपर्क में इंसान के आने से फैलता है। यह मुख्य रूप से चूहों में होता है। इसके कारण चूहों में कोई बीमारी नहीं होती, लेकिन इंसानों की मौत हो जाती है।

    हंतावायरस का 1993 में पहली बार पता चला था। तब अमेरिका में एक कपल संक्रमित होने के कारण मर गया था। इसके बाद कुछ ही महीनों में इस बीमारी से 600 लोगों की मौत हो गई थी।

    चूहे के यूरिन, मल और लार के संपर्क में आने पर इंसान संक्रमित हो जाते हैं। इसकी वजह से पल्मोनरी सिंड्रोम नाम की बीमारी होती है।
    3 तरीके से फैलता है हंतावायरस

    पहला: अगर वायरस का वाहक चूहा किसी इंसान को काट ले, हालांकि ऐसे मामले कम ही सामने आते हैं।

    दूसरा : किसी जगह या चीज पर मौजूद चूहे का मल-मूत्र या लार के संपर्क में इंसान आता है और अपने नाक-मुंह को छूता है।

    तीसरा : अगर इंसान ऐसी चीज खाता है जिस पर चूहे का मल-मूत्र या लार मौजूद हो।

    हंतावायरस कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, हंतावायरस हवा के जरिए नहीं फैलता फिरभी कोरोना वायरस के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है। इस बीमारी का कोई खास इलाज नहीं है, सिर्फ लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता है। गंभीर मरीजों को सांस लेने में मदद के लिए वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है।

    इस बीमारी में करीब 38% मरीजों की मौत हो जाती है। अगर मरीज बुजुर्ग हो या पहले से कमजोर हो, तो खतरा और बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों ने अब तक हंतावायरस के 5 स्ट्रेन खोजे हैं, इनमें से सबसे ज्यादा खतरनाक अराराक्वॉरा वायरस है जिसका इन्फेक्शन होने पर डेथ रेट 54% पाया गया है।

    वही, एक दूसरा स्ट्रेन सिन नॉम्ब्रे वायरस है जिसके केस में डेथ रेट 40% है। तीसरा स्ट्रेन हंतान वायरस होता है। इसका डेथ रेट 5-10% के बीच है। इन तीनों में से किसी से इन्फेक्शन होने पर मौत का खतरा कोरोना की तुलना में कहीं ज्यादा हो सकता है।

    अब तक इसकी वैक्सीन तैयार नहीं हो सकी है और न ही कोई तय इलाज है। ऐसे मरीजों को विशेष केयर की जरूरत होती है और ऑक्सीजन थैरेपी दी जाती है। जितनी जल्दी मामला पकड़ में आता है उतना ही बेहतर है। अगर बीमारी गंभीर हो जाए, तो करीब 7–10 दिनों के अंदर मरीज की मौत हो सकती है।

    पिछले साल अमेरिकी अभिनेता की पत्नी की मौत हुई थी

    यह बीमारी पिछले साल भी चर्चा में आई थी, जब अमेरिकी अभिनेता जीन हैकमैन की पत्नी बेट्सी अराकावा की इससे मौत हुई थी। दोनों 26 फरवरी को अपने घर सांता फे में मृत पाए गए थे। उनके घर के आसपास चूहों के निशान भी मिले थे।

    बाद में पता चला कि 95 साल के हैकमैन की मौत 18 फरवरी को दिल की बीमारी से हुई थी। वहीं अराकावा का शव बाथरूम में मिला। अराकावा अपनी मौत से पहले लगातार इंटरनेट पर फ्लू जैसे लक्षण, सांस लेने के तरीके और कोविड जैसी बीमारियों के बारे में जानकारी खोज रही थीं।

    अमेरिका में 1993 से लेकर 2023 तक सिर्फ 890 मामले सामने आए हैं। ज्यादातर केस न्यू मेक्सिको राज्य में मिले हैं, जहां जीन हैकमैन और उनकी पत्नी रहते थे।

  • होर्मुज में बड़ा खेल? अमेरिका ने ईरानी जहाज छोड़कर पाकिस्तान को क्यों सौंपा, ट्रम्प के ‘रेस्क्यू मिशन’ से बढ़ा समुद्री तनाव

    होर्मुज में बड़ा खेल? अमेरिका ने ईरानी जहाज छोड़कर पाकिस्तान को क्यों सौंपा, ट्रम्प के ‘रेस्क्यू मिशन’ से बढ़ा समुद्री तनाव


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में तनाव के बीच एक बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सेना ने जब्त किए गए ईरानी जहाज ‘टूस्का’ को अब पाकिस्तान को सौंप दिया है। यह जहाज पहले चीन से लौटते समय अमेरिकी कार्रवाई में पकड़ा गया था।

    यह जानकारी अमेरिकी सेंट्रल कमांड United States Central Command (CENTCOM) के प्रवक्ता ने दी है। बताया जा रहा है कि जहाज को उसके क्रू के साथ आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत ईरान वापस भेजने की तैयारी की जा रही है।

    क्यों पकड़ा गया था जहाज?
    अमेरिकी अधिकारियों का दावा था कि यह जहाज ऐसे सामान लेकर जा रहा था जो हथियार निर्माण से जुड़े हो सकते हैं। इसी आधार पर 21 अप्रैल को इसे जब्त किया गया था। हालांकि ईरान ने इस कार्रवाई को “समुद्री डकैती” बताते हुए कड़ी आलोचना की थी।

    होर्मुज स्ट्रेट में नया अभियान
    इसी बीच अमेरिका ने Donald Trump के नेतृत्व में होर्मुज स्ट्रेट में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए एक नया रेस्क्यू अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। यह इलाका वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद अहम माना जाता है।

    ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि कई देशों के जहाज वहां फंस गए हैं और अमेरिका उन्हें सुरक्षित रास्ता देगा ताकि वे बिना खतरे के अपना संचालन जारी रख सकें।

    ईरान को चेतावनी
    अमेरिकी प्रशासन ने साफ किया है कि यह रेस्क्यू ऑपरेशन सोमवार सुबह से शुरू होगा। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि ईरान ने इस अभियान में कोई बाधा डाली तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

    बढ़ता तनाव
    जहाज को पाकिस्तान को सौंपे जाने और रेस्क्यू मिशन की घोषणा के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान संबंधों पर बड़ा असर डाल सकता है।

  • एक ही मां, एक ही जन्म… फिर भी अलग-अलग पिता! DNA टेस्ट ने खोला अनोखा राज

    एक ही मां, एक ही जन्म… फिर भी अलग-अलग पिता! DNA टेस्ट ने खोला अनोखा राज

    नई दिल्ली। यूनाइटेड किंगडम से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने मेडिकल साइंस को भी हैरान कर दिया। 49 वर्षीय जुड़वा बहनों ने जब अपना डीएनए टेस्ट कराया, तो खुलासा हुआ कि एक ही मां की कोख से जन्म लेने के बावजूद उनके बायोलॉजिकल पिता अलग-अलग हैं।

    यह दुर्लभ घटना विज्ञान में हेटरोपैटरनल सुपरफेकंडेशन (Heteropaternal Superfecundation) कहलाती है, जिसमें एक महिला के दो अंडों का निषेचन अलग-अलग पुरुषों के शुक्राणुओं से होता है।

    कैसे सामने आई सच्चाई?
    मिशेल और लवीनिया ऑस्बॉर्न नाम की इन बहनों को लंबे समय से अपने पिता की पहचान को लेकर संदेह था। मिशेल को शक था कि जिन जेम्स को वह अपना पिता मानती हैं, उनसे उनकी शक्ल नहीं मिलती। इसी संदेह को दूर करने के लिए उन्होंने घर पर डीएनए टेस्ट कराया।

    रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया—जेम्स उनके बायोलॉजिकल पिता नहीं हैं। इसके बाद लवीनिया ने भी टेस्ट कराया, जिससे पता चला कि दोनों बहनों के पिता अलग-अलग व्यक्ति हैं।

    49 साल तक छुपा रहा सच
    दोनों बहनों की मां ने यह राज जीवनभर छुपाए रखा। साल 2022 में जब डीएनए रिपोर्ट सामने आई, उसी दौरान उनकी मां का निधन हो गया। बाद में BBC Radio 4 के कार्यक्रम “The Gift” में बहनों ने अपनी कहानी साझा की।

    मिशेल के असली पिता एलेक्स निकले, जबकि लवीनिया के पिता आर्थर हैं। दोनों बहनों ने अपने-अपने जैविक पिताओं को खोज लिया है और उनसे मुलाकात भी कर चुकी हैं।

    ‘हम किसी चमत्कार से कम नहीं’
    इस अनोखे खुलासे के बाद भी बहनों के रिश्ते में कोई बदलाव नहीं आया। उनका कहना है कि भले ही उनके पिता अलग हों, लेकिन उनके बीच का प्यार और जुड़ाव पहले जैसा ही मजबूत है।

    यह मामला न सिर्फ इंसानी रिश्तों की जटिलता को दिखाता है, बल्कि विज्ञान के उन दुर्लभ पहलुओं को भी सामने लाता है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

  • 5 चीनी कंपनियों पर US ने लगाया बैन, चीन की दो टूक….. कहा-हम नहीं करेंगे प्रतिबंध का पालन

    5 चीनी कंपनियों पर US ने लगाया बैन, चीन की दो टूक….. कहा-हम नहीं करेंगे प्रतिबंध का पालन


    बीजिंग।
    चीन (China) के वाणिज्य मंत्रालय ने शनिवार को स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि वह ईरान (Iran) से तेल (Oil) खरीदने के कारण अपनी पांच कंपनियों पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों (US Sanctions) का पालन नहीं करेगा। चीन हमेशा से ईरानी तेल का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण ग्राहक रहा है। चीन में ईरान से यह तेल मुख्य रूप से स्वतंत्र ‘टीपॉट’ रिफाइनरियों के माध्यम से खरीदा जाता है। ये छोटी और स्वतंत्र रिफाइनरियां होती हैं जो इस्लामिक गणराज्य (ईरान) से भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदती हैं। दूसरी तरफ, अमेरिका (America) का मुख्य लक्ष्य ईरान की अर्थव्यवस्था और उसकी आय के स्रोतों को पूरी तरह से बंद करना है, इसीलिए उसने इस तरह की तेल खरीद करने वाली रिफाइनरियों पर प्रतिबंध कड़े कर दिए हैं।


    चीन का कड़ा रुख और तर्क

    चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने पिछले साल से अलग-अलग समय पर घोषित हुए इन अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ एक आधिकारिक आदेश जारी किया है। प्रतिबंधों को अस्वीकार करना: चीन ने साफ कहा है कि अमेरिकी उपायों को चीन द्वारा “मान्यता नहीं दी जाएगी, लागू नहीं किया जाएगा या उनका पालन नहीं किया जाएगा।”

    अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला: मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका के ये प्रतिबंध अनुचित रूप से चीनी कंपनियों को तीसरे देशों के साथ सामान्य आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियां करने से रोकते हैं। चीन का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी नियमों का सीधा उल्लंघन है।

    एकतरफा कार्रवाई का विरोध: चीन ने यह भी स्पष्ट किया कि वह हमेशा से उन एकतरफा प्रतिबंधों का कड़ा विरोध करता रहा है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र (UN) की मंजूरी प्राप्त नहीं है।


    किन कंपनियों पर है अमेरिका का निशाना?

    चीनी मंत्रालय के इस आदेश के तहत जिन पांच प्रमुख कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचाया जा रहा है, वे हैं:
    शेडोंग प्रांत की तीन कंपनियां:
    शेडोंग जिनचेंग पेट्रोकेमिकल ग्रुप
    शेडोंग शौगुआंग ल्यूकिंग पेट्रोकेमिकल
    शेडोंग शेंगक्सिंग केमिकल
    चीन के अन्य हिस्सों की दो कंपनियां
    हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान) रिफाइनरी
    हेबेई सिन्हुआ केमिकल ग्रुप


    अमेरिका की ताजा कार्रवाई

    इसी बीच, शुक्रवार को अमेरिका ने एक और चीनी फर्म पर नए प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिका का दावा है कि इस फर्म ने ईरानी कच्चे तेल के “करोड़ों बैरल” का आयात किया है, जिससे तेहरान को अरबों डॉलर की कमाई हुई है। इस फर्म का नाम किंगदाओ हैये ऑयल टर्मिनल कं, लिमिटेड है। हालांकि, चीनी वाणिज्य मंत्रालय के हालिया आदेश में इस कंपनी का जिक्र नहीं किया गया था।


    भू-राजनीतिक स्थिति और आगामी कूटनीति

    यह प्रतिबंध और विवाद ऐसे तनावपूर्ण माहौल में सामने आए हैं।अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह से ठप है। फरवरी के अंत में ईरान पर हुए अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद से शुरू हुए इस विवाद का फिलहाल कोई स्थायी समाधान नजर नहीं आ रहा है।

    ट्रंप का चीन दौरा: इस बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस महीने के अंत में चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत के लिए चीन का दौरा करने वाले हैं। इस बैठक में व्यापार और प्रतिबंधों का मुद्दा अहम होने की उम्मीद है।

  • गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग

    गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग


    नई दिल्ली।
    दुनिया (World) तेजी से एक ऐसे जलवायु संकट (Climate Crisis) की ओर बढ़ रही है, जहां भीषण गर्मी और सूखा (Extreme heat and Drought)मिलकर अभूतपूर्व खतरा पैदा कर रहे हैं। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक नई स्टडी के अनुसार अगर मौजूदा जलवायु नीतियों में ठोस बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक वैश्विक आबादी का करीब 28 फीसदी यानी लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में होंगे।

    अध्ययन के अनुसार इसका असर आज की तुलना में करीब पांच गुना तक बढ़ सकता है। अध्ययन के अनुसार 2001 से 2020 के बीच हर साल औसतन चार बार ऐसे हालात बने, जब भीषण गर्मी और सूखा एक साथ पड़े। यह आंकड़ा औद्योगिक काल 1850 से 1900 की तुलना में दोगुना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2090 तक ऐसी घटनाएं साल में करीब 10 बार तक हो सकती हैं और हर घटना करीब दो हफ्ते तक असर डाल सकती है।


    इसे कहते हैं कंपाउंड एक्सट्रीम

    जब कई चरम मौसम घटनाएं एक साथ मिलकर प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं तब इसे वैज्ञानिक भाषा में कंपाउंड एक्सट्रीम कहा जाता है। इससे फसलें तेजी से सूखती हैं, जल स्रोत सिकुड़ते हैं और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ खाद्य कीमतों में उछाल और लू से मौतों का जोखिम भी बढ़ता है। यह स्थिति वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा दबाव डाल सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो खुले में काम करते हैं।


    सही नीतियों से कम हो सकता है खतरा

    अगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने जलवायु वादों को प्रभावी ढंग से लागू करें तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि आने वाले दशकों में अरबों लोगों के जीवन को सुरक्षित या असुरक्षित बना सकते हैं।


    अध्ययन का आधार और वैज्ञानिक निष्कर्ष

    अध्ययन के अनुसार 8 जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का विश्लेषण किया गया, जिसमें जनसंख्या वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के विभिन्न परिदृश्यों को शामिल किया गया। ये परिदृश्य इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी वैज्ञानिक संस्था (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट पर आधारित हैं। इसके लिए 1961 से 1990 की अवधि को आधार बनाया गया।

  • पाकिस्तान का बड़ा ऐलान: अफगानिस्तान संग खत्म हुआ सीजफायर, सीमा पर फिर जंग के आसार तेज

    पाकिस्तान का बड़ा ऐलान: अफगानिस्तान संग खत्म हुआ सीजफायर, सीमा पर फिर जंग के आसार तेज


    नई दिल्ली। पाकिस्तान और Afghanistan के बीच एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। Pakistan ने साफ कर दिया है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच कोई सीजफायर लागू नहीं है, जिससे क्षेत्र में नई सैन्य कार्रवाई की आशंका तेज हो गई है।

    इससे पहले मार्च में ईद से ठीक पहले दोनों देशों ने अस्थायी युद्धविराम पर सहमति जताई थी, लेकिन पाकिस्तान का कहना है कि वह सिर्फ सीमित अवधि के लिए था और अब खत्म हो चुका है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब सीमा पर हालात पहले से ही तनावपूर्ण बने हुए हैं।

    दरअसल, हालिया टकराव की शुरुआत तब हुई जब Taliban से जुड़ी ताकतों ने सीमा पार हमले किए, जिन्हें पाकिस्तान ने अपने हवाई हमलों का जवाब बताया। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई दिनों तक भारी सैन्य झड़पें हुईं, जिन्हें दशकों का सबसे बड़ा संघर्ष माना जा रहा है।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, सीजफायर के बावजूद अफगानिस्तान की तरफ से हमले जारी रहे, जिनमें दर्जनों नागरिकों के मारे जाने और कई लोगों के घायल होने का दावा किया गया है। इस्लामाबाद लगातार यह आरोप भी दोहरा रहा है कि अफगान जमीन का इस्तेमाल Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) जैसे आतंकी संगठनों द्वारा किया जा रहा है, हालांकि काबुल और नई दिल्ली दोनों ही इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दे दिया है कि हालात फिर से सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकते हैं। पाकिस्तान के सख्त रुख के बाद यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या आने वाले दिनों में सीमा पर फिर बड़े स्तर पर कार्रवाई देखने को मिलेगी।

  • पाकिस्तान-अफगानिस्तान फिर आमने-सामने: ‘कोई सीजफायर नहीं’, सीमा पर बढ़ा युद्ध का खतरा

    पाकिस्तान-अफगानिस्तान फिर आमने-सामने: ‘कोई सीजफायर नहीं’, सीमा पर बढ़ा युद्ध का खतरा


    नई दिल्ली। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक बार फिर हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। हालिया घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच तनाव अभी थमा नहीं है, बल्कि किसी बड़े टकराव की आशंका फिर से गहराने लगी है।

    इस्लामाबाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अफगानिस्तान के साथ फिलहाल कोई सीजफायर लागू नहीं है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि ईद के दौरान जो युद्धविराम हुआ था, वह सिर्फ तीन दिन का अस्थायी समझौता था, जो अब समाप्त हो चुका है। इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या पाकिस्तान फिर से सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।

    दरअसल, फरवरी और मार्च के दौरान दोनों देशों के बीच जबरदस्त सैन्य टकराव देखने को मिला था। तालिबान और पाकिस्तानी सेना के बीच सीमा पर कई दिनों तक भीषण झड़पें हुईं। यह संघर्ष तब भड़का, जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर एयर स्ट्राइक की, जिसके जवाब में तालिबान ने सीमा पार हमले किए। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया था।

    हालात को देखते हुए ईद से पहले अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी थी, लेकिन अब पाकिस्तान के ताजा बयान ने उस समझौते को पूरी तरह खत्म मान लिया है। इस्लामाबाद का आरोप है कि अफगान जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान विरोधी आतंकी संगठनों, खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, द्वारा किया जा रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि इन हमलों में उसके नागरिकों को भारी नुकसान हुआ है।

    हालांकि, अफगानिस्तान की ओर से इन आरोपों को लगातार खारिज किया जाता रहा है। वहीं भारत पर लगाए गए आरोपों को भी नई दिल्ली ने सिरे से नकार दिया है।

    कुल मिलाकर, पाकिस्तान के ‘नो सीजफायर’ वाले बयान ने यह संकेत दे दिया है कि सीमा पर शांति फिलहाल दूर की बात है। अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो दोनों देशों के बीच फिर से बड़े सैन्य टकराव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

  • भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर असम की सियासत का साया, बयानबाजी से बढ़ा तनाव

    भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर असम की सियासत का साया, बयानबाजी से बढ़ा तनाव


    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। एक ओर नई दिल्ली कूटनीतिक स्तर पर संबंधों को सुधारने की कोशिश में जुटी है, वहीं असम से उठ रही राजनीतिक बयानबाजी ने माहौल में तल्खी घोल दी है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि चुनावी सियासत कहीं दोनों देशों के बीच बनी नई समझ को फिर से नुकसान न पहुंचा दे।

    दरअसल, बांग्लादेश ने हाल ही में भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह कदम हिमंत बिस्वा सरमा की उन टिप्पणियों के बाद उठाया गया, जिन्हें ढाका ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए नुकसानदायक बताया। बांग्लादेशी अधिकारियों ने साफ कहा कि इस तरह के बयान दोनों देशों के बीच विश्वास को कमजोर करते हैं, खासकर ऐसे समय में जब रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है।

    पिछले कुछ समय में ढाका और नई दिल्ली के बीच रिश्तों में सुधार के संकेत मिले थे, लेकिन असम में बांग्लादेश को लेकर लगातार हो रही बयानबाजी ने इस प्रक्रिया को झटका दिया है। सीमा पार घुसपैठ, अवैध प्रवास और सुरक्षा जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं, लेकिन इन्हें लेकर सार्वजनिक मंचों से दिए जा रहे तीखे बयान अब कूटनीतिक तनाव का कारण बनते जा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध सिर्फ सीमा विवाद या राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश दुनिया की सबसे संवेदनशील और घनी आबादी वाली सीमाओं में से एक साझा करते हैं, जहां नदियों के जल बंटवारे से लेकर तस्करी और सुरक्षा तक कई मुद्दे आपसी सहयोग पर निर्भर करते हैं।

    नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में यह समझ बढ़ी है कि बांग्लादेश भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का अहम स्तंभ है। इसी सोच के तहत केंद्र सरकार रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दे रही है और कूटनीतिक स्तर पर बड़े कदम भी उठा रही है। लेकिन राज्य स्तर की राजनीति अगर लगातार विपरीत संकेत देती रही, तो इससे भारत की क्षेत्रीय छवि और रणनीतिक हितों को नुकसान हो सकता है।

    फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र और राज्य की अलग-अलग राजनीतिक लाइनें इस रिश्ते को फिर से कमजोर कर देंगी? क्योंकि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत के लिए अपने पड़ोसियों के साथ स्थिर और सहयोगपूर्ण संबंध बनाए रखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

  • मिडिल ईस्ट में जंग की आहट तेज: अमेरिका ने 82 हजार करोड़ के हथियार उतारे, ईरान पर बड़ा घेराव तैयार

    मिडिल ईस्ट में जंग की आहट तेज: अमेरिका ने 82 हजार करोड़ के हथियार उतारे, ईरान पर बड़ा घेराव तैयार


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच हालात एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को अरबों डॉलर के हथियार देकर साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं। ईरान के साथ टकराव के बीच यह सैन्य तैयारी सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि संभावित बड़े संघर्ष की आहट भी मानी जा रही है।

    अमेरिका ने इजरायल, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को करीब 8.6 अरब डॉलर (करीब 82 हजार करोड़ रुपये) के हथियार और सैन्य सिस्टम देने की मंजूरी दी है। इस फैसले को अमेरिकी विदेश विभाग ने ‘आपात राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मामला बताते हुए तेजी से आगे बढ़ाया। इसमें एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम (APKWS), पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और बैटल कमांड सिस्टम जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं, जो मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में बेहद अहम माने जाते हैं।

    दरअसल, हाल के महीनों में ईरान की ओर से इजरायल और खाड़ी देशों पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद इन देशों के डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ा है। ऐसे में अमेरिका अपने सहयोगियों के हथियारों के स्टॉक को फिर से मजबूत कर रहा है, ताकि किसी बड़े हमले की स्थिति में वे तैयार रहें।

    इस बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का रुख भी सख्त बना हुआ है। अमेरिका और इजरायल दोनों ही ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को खत्म करने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं है और वह अपने प्रॉक्सी समूहों तथा मिसाइल कार्यक्रम के जरिए जवाबी रणनीति मजबूत कर रहा है।

    स्थिति को और संवेदनशील बनाता है हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां अमेरिका की नौसेना की मौजूदगी और नाकेबंदी के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। यह इलाका दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है और यहां किसी भी सैन्य टकराव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

    अभी भले ही सीजफायर लागू है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों पक्ष लगातार अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं। इजरायल हाई अलर्ट पर है, अमेरिका लगातार हथियारों की सप्लाई बढ़ा रहा है और ईरान भी अपने नेटवर्क के जरिए दबाव बनाए हुए है।

    कुल मिलाकर, शांति की कोशिशों के बीच हथियारों का यह बड़ा खेल साफ संकेत दे रहा है कि मिडिल ईस्ट में हालात बेहद नाजुक हैं। अगर बातचीत में प्रगति नहीं हुई, तो यह टकराव किसी भी वक्त बड़े युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को झटका दे सकता है।