Category: International

  • ट्रंप-ईरान आमने-सामने: ‘गेंद अमेरिका के पाले में’, शांति प्रस्ताव के साथ तेहरान की दो टूक, युद्ध भी मंजूर

    ट्रंप-ईरान आमने-सामने: ‘गेंद अमेरिका के पाले में’, शांति प्रस्ताव के साथ तेहरान की दो टूक, युद्ध भी मंजूर


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के रिश्ते एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। तेहरान ने जहां शांति की पहल करते हुए 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजा है, वहीं सख्त लहजे में यह भी साफ कर दिया है कि अब फैसला वॉशिंगटन को करना है कूटनीति या टकराव। पाकिस्तान के जरिए भेजे गए इस प्रस्ताव को लेकर दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है और हालात फिर से टकराव की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं।

    ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि “गेंद अब अमेरिका के पाले में है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि तेहरान ने शांति का रास्ता खोल दिया है, लेकिन अगर अमेरिका टकराव चाहता है तो ईरान भी हर स्थिति के लिए तैयार है। उनका कहना है कि देश अपने हितों और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और जरूरत पड़ी तो जवाब भी उसी अंदाज में दिया जाएगा।

    दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव पर संदेह जताते हुए साफ संकेत दिए हैं कि इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। ट्रंप ने कहा कि वह प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह अमेरिका के लिए स्वीकार्य होगा। उन्होंने ईरान पर पिछले कई दशकों के व्यवहार को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तेहरान ने अभी तक “पर्याप्त कीमत” नहीं चुकाई है।

    दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता बार-बार विफल हो रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत की कोशिशें भी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी हैं। अमेरिका का रुख साफ है कि वह तब तक युद्ध खत्म नहीं करेगा जब तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ठोस और विश्वसनीय नियंत्रण सुनिश्चित नहीं हो जाता। वहीं ईरान की प्राथमिकता है कि पहले युद्ध पूरी तरह खत्म हो, नाकेबंदी हटे और उसके बाद ही अन्य मुद्दों पर चर्चा हो।

    ईरान के 14 सूत्रीय प्रस्ताव में कई अहम मांगें शामिल हैं। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से अमेरिकी नाकेबंदी हटाने, क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, जब्त ईरानी संपत्तियों की रिहाई, युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा और भविष्य में हमले न करने की गारंटी जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। इसके अलावा लेबनान समेत सभी मोर्चों पर संघर्ष समाप्त करने और होर्मुज में नया तंत्र लागू करने की बात भी कही गई है।

    इसी बीच अमेरिका ने शिपिंग कंपनियों को चेतावनी दी है कि यदि वे होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए ईरान को किसी भी रूप में भुगतान करती हैं, तो उन्हें कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इस चेतावनी में नकद के साथ डिजिटल और अनौपचारिक लेन-देन भी शामिल हैं, जिससे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

    कुल मिलाकर, एक तरफ शांति प्रस्ताव है तो दूसरी ओर सख्त बयानबाजी—ऐसे में मिडिल ईस्ट का माहौल अभी भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि हालात बातचीत की मेज तक पहुंचते हैं या फिर टकराव और गहराता है।

  • डच राजकुमारियों पर ‘खून की साजिश’ का साया, नाजी कनेक्शन से हिला यूरोप

    डच राजकुमारियों पर ‘खून की साजिश’ का साया, नाजी कनेक्शन से हिला यूरोप


    नई दिल्ली। यूरोप में शाही सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा अलर्ट सामने आया है। नीदरलैंड की राजकुमारियों को निशाना बनाकर रची गई खौफनाक साजिश ने पूरे महाद्वीप को हिला दिया है। जानकारी के मुताबिक 22 वर्षीय राजकुमारी कैथरीना अमालिया और 20 वर्षीय राजकुमारी एलेक्सिया के खिलाफ हत्या की योजना बनाई जा रही थी, जिसे समय रहते विफल कर दिया गया। पुलिस ने इस मामले में एक संदिग्ध को गिरफ्तार किया है, जिसके तार कट्टरपंथी और नाजी विचारधारा से जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी को फरवरी में द हेग से पकड़ा गया था। उसके पास से दो कुल्हाड़ियां बरामद हुईं, जिन पर ‘एलेक्सिया’, ‘मोसाद’ और नाजी काल का कुख्यात नारा ‘सीग हेल’ उकेरा गया था। इतना ही नहीं, उसके पास से एक हाथ से लिखा नोट भी मिला, जिसमें दोनों राजकुमारियों के नाम के साथ ‘ब्लडबाथ’ जैसे शब्द लिखे थे। इन सबूतों ने इस साजिश की गंभीरता को और बढ़ा दिया है, हालांकि अब तक हमले के पीछे की ठोस मंशा स्पष्ट नहीं हो सकी है। मामले को लेकर द हेग के अभियोजन कार्यालय ने पुष्टि की है कि आरोपी को अदालत में पेश किया जाएगा और उससे पूछताछ जारी है।

    यह पहली बार नहीं है जब राजकुमारी अमालिया को निशाना बनाया गया हो। इससे पहले भी ड्रग गिरोहों पर उनके अपहरण की साजिश रचने के आरोप लग चुके हैं। बढ़ते खतरों के चलते उन्हें 2022 में एम्स्टर्डम स्थित छात्रावास छोड़कर द हेग के शाही महल में शिफ्ट होना पड़ा था। सुरक्षा एजेंसियां लगातार उनकी निगरानी बढ़ाती रही हैं।

    सुरक्षा के इस साए का असर राजकुमारी के निजी जीवन पर भी साफ दिखाई देता है। अमालिया ने खुद माना है कि वह एक सामान्य छात्र जीवन जीने की इच्छा रखती हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से ऐसा संभव नहीं हो पा रहा। उनकी मां रानी मैक्सिमा ने भी स्वीकार किया है कि लगातार मिल रही धमकियों ने उनकी बेटी की आजादी को सीमित कर दिया है।

    इस ताजा घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यूरोप में बढ़ती कट्टरपंथी गतिविधियां किस हद तक शाही परिवारों और सार्वजनिक हस्तियों के लिए खतरा बन रही हैं। सुरक्षा एजेंसियां अब इस मामले को केवल एक आपराधिक साजिश नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा चुनौती के तौर पर देख रही हैं।

  • नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द

    नेपाल में ‘सिस्टम क्लीनअप’: PM बालेंद्र शाह ने एक झटके में 1594 राजनीतिक नियुक्तियां रद्द


    नई दिल्ली। नेपाल की राजनीति में एक बड़े फैसले ने हलचल मचा दी है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने एक झटके में देशभर में की गई 1594 राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द कर दिया है। कैबिनेट की मंजूरी और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की स्वीकृति के बाद यह फैसला लागू होते ही करीब 150 सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में बैठे पदाधिकारी तत्काल प्रभाव से पदमुक्त हो गए।

    सरकार ने इस कदम को “सिस्टम सुधार” और पारदर्शिता की दिशा में बड़ा बदलाव बताया है। अध्यादेश के जरिए करीब 110 कानूनों में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया गया कि पहले की सभी राजनीतिक नियुक्तियां, चाहे उनकी अवधि या शर्त कुछ भी रही हो, स्वतः समाप्त मानी जाएं। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, एविएशन, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थानों समेत कई अहम क्षेत्रों पर पड़ा है।

    सबसे बड़ा झटका देश के विश्वविद्यालयों को लगा है, जहां उपकुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी हटाए गए हैं। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिकल कॉलेजों, काउंसिल्स और रिसर्च संस्थानों के प्रमुख पदाधिकारी भी पदमुक्त कर दिए गए हैं। नेपाल मेडिकल काउंसिल, नेपाल पर्यटन बोर्ड और नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण जैसे बड़े संस्थान भी इस फैसले की जद में आए हैं।

    यह कार्रवाई केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं रही, बल्कि शांति प्रक्रिया से जुड़े आयोगों तक पहुंच गई। माओवादी संघर्ष के बाद गठित सत्य निरूपण और बेपत्ता व्यक्तियों की जांच से जुड़े निकायों के पदाधिकारी भी हटा दिए गए हैं, जिससे इस फैसले की व्यापकता और भी साफ हो जाती है।

    सरकार का दावा है कि इससे राजनीतिक दखल कम होगा और संस्थानों की कार्यप्रणाली अधिक पेशेवर बनेगी। हालांकि विपक्ष इसे सत्ता का केंद्रीकरण और संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश बता रहा है। ऐसे में यह फैसला नेपाल की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बनने की पूरी संभावना है।

  • नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी

    नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी


    नई दिल्ली। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में एक अनोखा और दिलचस्प आयोजन देखने को मिला, जहां लोगों को सोने के लिए आमंत्रित किया गया। ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ नाम की इस प्रतियोगिता का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देश में बढ़ती नींद की कमी की गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचना था। सियोल मेट्रोपॉलिटन गवर्नमेंट द्वारा आयोजित इस इवेंट में हजारों युवा हान नदी किनारे स्थित पार्क में पहुंचे और खुले आसमान के नीचे सुकून की नींद लेने की कोशिश की।

    तेज-रफ्तार जिंदगी और काम के भारी दबाव के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया में युवाओं के बीच नींद की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यही वजह है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए प्रतिभागियों को थका हुआ और पेट भरकर आने की शर्त दी गई थी, ताकि वे गहरी नींद ले सकें। कई प्रतिभागी मजेदार वेशभूषा में पहुंचे। कोई ‘स्लीपिंग ब्यूटी’ बना तो कोई ‘स्लीपिंग प्रिंस’।

    प्रतियोगिता में शामिल 20 वर्षीय छात्र पार्क जून-सियोक पारंपरिक शाही पोशाक पहनकर आए और बताया कि पढ़ाई और पार्ट-टाइम जॉब के कारण उन्हें रोजाना सिर्फ 3-4 घंटे ही नींद मिल पाती है। वहीं, अनिद्रा से जूझ रही एक शिक्षिका कोआला की ड्रेस में नजर आईं, ताकि वह इस मौके पर सुकून से सो सकें।

    इस अनोखे मुकाबले में प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता को मापने के लिए उनकी हार्ट रेट मॉनिटर की गई, जिससे पता चल सके कि कौन सबसे गहरी और शांत नींद ले रहा है। प्रतियोगिता की शुरुआत दोपहर में हुई और कुछ ही देर में पूरे पार्क में सन्नाटा छा गया, मानो शहर की भागदौड़ थम गई हो।

    सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस ‘नींद की जंग’ में 80 वर्षीय बुजुर्ग ने बाजी मार ली, जबकि दूसरे स्थान पर एक 37 वर्षीय ऑफिस वर्कर रहे, जो नाइट शिफ्ट और काम के दबाव से बेहद थके हुए थे।

    यह प्रतियोगिता सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है कि आधुनिक जीवनशैली में नींद की अनदेखी किस हद तक बढ़ चुकी है। OECD देशों में सबसे कम सोने वाले देशों में शामिल दक्षिण कोरिया अब इस समस्या को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ उसी दिशा में एक अनोखी पहल बनकर सामने आया है।

  • ब्राज़ील में बारिश का कहर: बाढ़-भूस्खलन से 6 मौतें, हजारों लोग बेघर

    ब्राज़ील में बारिश का कहर: बाढ़-भूस्खलन से 6 मौतें, हजारों लोग बेघर


    नई दिल्ली। दक्षिण अमेरिका के ब्राज़ील के पूर्वोत्तर हिस्से में भारी बारिश ने तबाही मचा दी है। लगातार दो दिनों तक हुई मूसलाधार वर्षा के चलते बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई, जबकि हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि कई इलाकों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है।

    सबसे ज्यादा असर पेर्नंबुको राज्य में देखने को मिला, जहां बाढ़ और लैंडस्लाइड के कारण चार लोगों की जान चली गई। वहीं पड़ोसी पैराइबा में भी दो लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। तेज बारिश के चलते नदियां उफान पर हैं और निचले इलाकों में पानी भर जाने से हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।

    अधिकारियों के मुताबिक करीब डेढ़ हजार परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है, जबकि कई इलाकों में राहत और बचाव कार्य तेजी से जारी है। प्रशासन ने आपात अलर्ट जारी करते हुए लोगों को सतर्क रहने और अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलने की सलाह दी है।

    मौसम विभाग ने भले ही आने वाले दिनों में बारिश की तीव्रता कम होने की संभावना जताई है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। प्रशासन का कहना है कि जमीन में नमी बढ़ने से भूस्खलन का जोखिम बना हुआ है, ऐसे में लोगों को सावधानी बरतनी होगी। यह आपदा एक बार फिर दिखाती है कि चरम मौसम की घटनाएं किस तरह बड़े पैमाने पर जन-धन का नुकसान कर रही हैं।

  • ईरान का ट्रंप को 14 सूत्रीय अल्टीमेटम: ‘युद्ध खत्म करो, प्रतिबंध हटाओ, मुआवजा दो’

    ईरान का ट्रंप को 14 सूत्रीय अल्टीमेटम: ‘युद्ध खत्म करो, प्रतिबंध हटाओ, मुआवजा दो’




    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कूटनीतिक हल की कोशिशें तेज हो गई हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के 9 सूत्रीय शांति फ्रेमवर्क के जवाब में ईरान ने नया 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजकर साफ संकेत दिया है कि वह अपने शर्तों पर समझौता चाहता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाए गए इस प्रस्ताव में तेहरान ने युद्ध खत्म करने से लेकर प्रतिबंध हटाने और मुआवजे तक की सख्त मांगें रख दी हैं, जिससे वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ गई है।

    ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस प्रस्ताव में सबसे अहम शर्त यह है कि अमेरिका सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत रोके, लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में युद्ध खत्म किया जाए और अमेरिकी सेना को वापस बुलाया जाए। इसके अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लिए नई व्यवस्था बनाने, नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने की भी बात कही गई है। ईरान ने साफ तौर पर आर्थिक प्रतिबंध खत्म करने, जब्त संपत्तियां लौटाने और युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा देने की मांग भी शामिल की है।

    तेहरान ने अमेरिका के 2 महीने के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज करते हुए 30 दिन में सभी मुद्दों के समाधान की समयसीमा सुझाई है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि अब फैसला अमेरिका को करना है या तो कूटनीति का रास्ता चुने या फिर टकराव के लिए तैयार रहे। उनका कहना है कि ईरान दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार है और अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।

    वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने इस 14 सूत्रीय प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका इसकी समीक्षा कर रहा है, लेकिन इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ईरान ने आक्रामक रुख जारी रखा तो सैन्य कार्रवाई दोबारा हो सकती है। ट्रंप के मुताबिक, “ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन नेतृत्व और शर्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है।”

    इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि एक तरफ बातचीत के दरवाजे खुले हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि अमेरिका और ईरान कूटनीति की राह पकड़ते हैं या फिर मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ता है।

  • हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी

    हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी


    नई दिल्ली। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और नाकेबंदी के बीच भारत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिका-ईरान तनातनी के कारण जहां इस अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है, वहीं भारत से जुड़ा एलपीजी टैंकर ‘सर्व शक्ति’ सफलतापूर्वक इस खतरनाक मार्ग को पार कर आगे बढ़ गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर संकट गहराता जा रहा है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए हर शिपमेंट बेहद अहम बन चुका है।

    मरीन ट्रैफिक डेटा के मुताबिक करीब 45 हजार टन एलपीजी लेकर चल रहा यह टैंकर ईरान के लारक और क़ेश्म द्वीप के पास से तय मार्ग का पालन करते हुए ओमान की खाड़ी में दाखिल हुआ। जहाज पर 18 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद हैं और यह विशाखापत्तनम की ओर बढ़ रहा है। इस पूरे ऑपरेशन को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी के बाद यह भारत से जुड़ा पहला बड़ा एलपीजी टैंकर है जिसने हॉर्मुज का रास्ता पार किया है।

    इस कार्गो को सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने खरीदा है, हालांकि कंपनी ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि इस शिपमेंट का सुरक्षित पहुंचना भारत के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता है, क्योंकि मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने के कारण देश में एलपीजी की उपलब्धता पर दबाव बना हुआ है।

    दरअसल, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है। ऐसे में हॉर्मुज जैसे संवेदनशील मार्ग पर रुकावट का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल के दिनों में सप्लाई में कमी के चलते कई जगहों पर घबराहट, लंबी कतारें और सीमित वितरण जैसी स्थिति देखने को मिली। यही वजह है कि सरकार ने एलपीजी टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर ईरान से बातचीत तेज की और वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी शुरू कीं।

    बताया जा रहा है कि भारत अब तक इस संकट के बीच कम से कम आठ एलपीजी जहाजों को सुरक्षित निकालने में सफल रहा है। साथ ही घरेलू उत्पादन को भी तेजी से बढ़ाया गया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के मुताबिक देश में उत्पादन बढ़ाकर करीब 54 हजार टन प्रतिदिन कर दिया गया है, जबकि खपत को संतुलित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

    हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना तकनीकी रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। सामान्य हालात में यह सफर 10 से 14 घंटे का होता है, लेकिन मौजूदा तनाव के बीच इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप, लोकेशन गड़बड़ी और सुरक्षा जोखिमों के कारण यह और जटिल हो गया है। कई जहाज ट्रैकिंग से बचने के लिए अपने ट्रांसपोंडर तक बंद कर देते हैं।

    इन सभी चुनौतियों के बीच ‘सर्व शक्ति’ का सुरक्षित पारगमन न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए राहत भरी खबर है, बल्कि यह भी दिखाता है कि संकट के दौर में कूटनीति, रणनीति और लॉजिस्टिक्स के दम पर देश अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है। आने वाले दिनों में हॉर्मुज की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • अमेरिका-चीन टकराव तेज: ईरानी तेल पर 5 चीनी कंपनियों पर बैन, बीजिंग का पलटवार कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंध मानने से रोका

    अमेरिका-चीन टकराव तेज: ईरानी तेल पर 5 चीनी कंपनियों पर बैन, बीजिंग का पलटवार कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंध मानने से रोका

    नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीति में अमेरिका और चीन के बीच तनाव एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान के तेल कारोबार से जुड़े आरोपों के तहत अमेरिका द्वारा पांच चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बीजिंग ने कड़ा रुख अपनाते हुए अपनी कंपनियों को इन प्रतिबंधों का पालन न करने का निर्देश दिया है। इसे दोनों महाशक्तियों के बीच बढ़ते टकराव का बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    अमेरिका के इस कदम के जवाब में चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने पहली बार अपने ‘ब्लॉकिंग स्टैच्यूट’ का इस्तेमाल किया है। यह एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जिसके जरिए चीन विदेशी प्रतिबंधों को अपने देश में लागू होने से रोकता है। इस आदेश के तहत चीनी कंपनियों को साफ कहा गया है कि वे अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करें और अपने व्यापारिक हितों को जारी रखें।

    दरअसल, अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के तहत Office of Foreign Assets Control (OFAC) ने जिन कंपनियों पर कार्रवाई की है, उन्हें “स्पेशली डिज़िग्नेटेड नेशनल्स” (SDN) सूची में शामिल किया गया है। इस सूची में आने के बाद इन कंपनियों की अमेरिकी संपत्तियां फ्रीज की जा सकती हैं और वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर भी असर पड़ता है।

    जिन प्रमुख कंपनियों को इस विवाद के केंद्र में माना जा रहा है, उनमें हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान), शेडोंग लुकिंग, जिनचेंग पेट्रोकेमिकल, हेबेई शिनहाई और शेंगशिंग केमिकल शामिल हैं। अमेरिका का आरोप है कि ये कंपनियां ईरान से कच्चा तेल खरीदकर उसके ऊर्जा क्षेत्र को आर्थिक समर्थन दे रही हैं।

    चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अमेरिकी कदम को ‘एकतरफा प्रतिबंध’ बताया है। वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ है। चीन का यह भी कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना लगाए गए प्रतिबंध वैध नहीं माने जा सकते।

    इस पूरे विवाद में शेडोंग प्रांत की तथाकथित ‘टीपॉट रिफाइनरियां’ भी चर्चा में हैं। ये छोटी लेकिन प्रभावशाली स्वतंत्र रिफाइनरियां हैं, जो वैश्विक तेल बाजार में अहम भूमिका निभाती हैं। अमेरिका का मानना है कि ये इकाइयां ईरानी तेल के आयात और प्रोसेसिंग में बड़ी भूमिका निभा रही हैं, जिससे प्रतिबंधों का असर कमजोर पड़ रहा है।

    गौरतलब है कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लंबे समय से लागू हैं और इनका उद्देश्य उसके तेल निर्यात को सीमित करना है। लेकिन चीन जैसे बड़े खरीदार देशों की भूमिका इस रणनीति को चुनौती देती रही है। ऐसे में यह ताजा टकराव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन द्वारा ‘ब्लॉकिंग स्टैच्यूट’ का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि वह अब अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय कानूनी और रणनीतिक तरीके से जवाब देने को तैयार है। आने वाले समय में यह विवाद वैश्विक बाजारों और तेल कीमतों पर भी असर डाल सकता है।

  • पहली बार कनाडा की सख्ती: खालिस्तानी चरमपंथ पर खुलकर बोली एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बताया खतरा

    पहली बार कनाडा की सख्ती: खालिस्तानी चरमपंथ पर खुलकर बोली एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बताया खतरा


    नई दिल्ली। कनाडा ने पहली बार आधिकारिक तौर पर खालिस्तानी चरमपंथ को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए इसे अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना है। देश की खुफिया एजेंसी Canadian Security Intelligence Service (CSIS) की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि कनाडा में सक्रिय कुछ खालिस्तानी चरमपंथी तत्व लगातार हिंसक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं, जो न सिर्फ देश के भीतर बल्कि उसके वैश्विक हितों के लिए भी जोखिम पैदा करते हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में चरमपंथी गतिविधियों में युवाओं की भागीदारी को लेकर भी चिंता बढ़ी है। जांच एजेंसियों का कहना है कि कई मामलों में नाबालिगों तक को कट्टरपंथी नेटवर्क के जरिए प्रभावित किया जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि आतंकवाद से जुड़ी जांचों में अब कम उम्र के लोगों की संलिप्तता भी सामने आ रही है, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बन रही है।

    एक रिपोर्ट में “राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक चरमपंथ” (PMVE) को एक उभरता खतरा बताया है। इसके तहत ऐसे समूहों का जिक्र किया गया है, जो मौजूदा राजनीतिक ढांचे को बदलने या नए ढांचे स्थापित करने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं। एजेंसी के अनुसार, कुछ अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए युवाओं को निशाना बना रहे हैं, जिससे स्थिति और जटिल होती जा रही है।

    रिपोर्ट में 1985 की Air India Flight 182 bombing का भी उल्लेख किया गया है, जिसे आज भी कनाडा के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला माना जाता है। इस हमले में 329 लोगों की जान गई थी, जिनमें अधिकांश कनाडाई नागरिक थे। जांच में उस समय खालिस्तानी चरमपंथी तत्वों की भूमिका सामने आई थी।

    हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि 2025 के दौरान कनाडा में इस तरह के समूहों से जुड़ा कोई बड़ा आतंकी हमला दर्ज नहीं हुआ, लेकिन उनकी गतिविधियां और नेटवर्क अब भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। एजेंसी का कहना है कि कुछ चरमपंथी तत्व स्थानीय संस्थाओं और सामाजिक नेटवर्क का दुरुपयोग कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं, जिसमें फंडिंग जुटाने जैसे तरीके भी शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा का यह रुख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण संकेत है, खासकर भारत जैसे देशों के लिए, जो लंबे समय से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।

    कुल मिलाकर, CSIS की यह रिपोर्ट न केवल कनाडा की आंतरिक सुरक्षा चिंताओं को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि वैश्विक स्तर पर चरमपंथ से निपटने के लिए अधिक सतर्क और समन्वित रणनीति की जरूरत है।

  • आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल

    आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल


    नई दिल्ली। गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में एक ओर जहां सरकार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से राहत पैकेज पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर देश का रक्षा खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले एक दशक में पाकिस्तान का सैन्य बजट करीब ढाई गुना बढ़कर 2.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये के पार पहुंच गया है, जिसने वित्तीय प्राथमिकताओं और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2016 के आसपास जहां रक्षा बजट करीब 1.08 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये था, वहीं हाल के वर्षों में इसमें तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था उच्च महंगाई, विदेशी कर्ज और कमजोर राजस्व ढांचे जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।

    इस बीच International Monetary Fund और World Bank जैसी संस्थाएं पाकिस्तान के वित्तीय अनुशासन पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा खर्च के वास्तविक आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य पेंशन, रणनीतिक कार्यक्रम और कुछ उच्च-मूल्य परियोजनाओं को अलग मदों में दर्शाया जाता है, जिससे कुल रक्षा व्यय की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।

    रक्षा आधुनिकीकरण के मोर्चे पर पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में कई परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इनमें नौसेना के बुनियादी ढांचे का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को मजबूत करना और नई सैन्य तकनीकों में निवेश शामिल है। साथ ही चीन के सहयोग से पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों की खरीद भी चर्चा में रही है।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान की रक्षा फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा बाहरी सहयोग पर आधारित है। चीन से दीर्घकालिक ऋण और रक्षा सहयोग के जरिए महंगी परियोजनाओं की लागत को लंबी अवधि में बांटा जाता है। इसके अलावा सऊदी अरब के साथ हुए समझौते के तहत ऊर्जा और वित्तीय सहायता भी पाकिस्तान की आर्थिक जरूरतों को सहारा देती है।

    हालांकि, इन व्यवस्थाओं के बावजूद सवाल यह उठता है कि आर्थिक दबाव के बीच बढ़ता रक्षा बजट देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर क्या असर डालेगा। कुछ विशेषज्ञ इसे सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से जरूरी बताते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि सामाजिक और विकास क्षेत्रों की कीमत पर रक्षा खर्च बढ़ाना संतुलित नीति नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और रक्षा प्राथमिकताओं के बीच यह असंतुलन आने वाले समय में और गहन समीक्षा की मांग करता है खासतौर पर तब, जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं देश की नीतियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।