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  • सऊदी टैंकरों पर हमले के बाद पाकिस्तान की सिर्फ बयानबाजी, रक्षा समझौते के बावजूद किया किनारा

    सऊदी टैंकरों पर हमले के बाद पाकिस्तान की सिर्फ बयानबाजी, रक्षा समझौते के बावजूद किया किनारा


    नई दिल्‍ली । पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (PM Shehbaz Sharif) के सामने जब सऊदी अरब (Saudi Arabia) को दिया वादा निभाने की जिम्मेदारी आई तो उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया. लाल सागर में जब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल टैंकर पर हमला किया तो पाकिस्तान ने जी भरकर इसकी आलोचना की. शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस (Crown Prince) को फोन लगाकर उनके साथ सॉलिडरिटी जताई, सऊदी को बिरादर मुल्क बताया, हूतियों की निंदा की. लेकिन असल एक्शन के नाम पर पाकिस्तान के पास जुबानी जमा खर्च करने के अलावा कुछ नहीं था.

    सवाल है कि शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के साथ कौन सा कमिटमेंट किया है. बताना चाहेंगे कि सऊदी अरब और पाकिस्तान ने डिफेंस डील किया है. इसके तहत दोनों देशों ने कहा है कि एक के ऊपर हमला दूसरे पर भी अटैक माना जाएगा और दोनों देश मिलकर इस हमले का जवाब देंगे.

    यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने गुरुवार तड़के लाल सागर में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमला किया. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते के मुताबिक पाकिस्तान को ऐसे किसी सिचुएशन में सऊदी अरब की तरफ से हूती विद्रोहियों को जवाब देकर अपना सिक्योरिटी कमिटमेंट पूरा करना चाहिए था.

    कहां गया सऊदी-पाकिस्तान का डिफेंस डील
    लेकिन इस दौरान पाकिस्तान खामोश रहा. यहां अहम यह है कि पाकिस्तान ईरान का भी हितैषी होने का गेम खेल रहा है. ईरान के गृह मंत्री ने हाल ही में पाकिस्तान का दौरा खत्म किया है. इस दौरान ईरान-पाकिस्तान ने दोस्ती को नई ऊंचाई पर ले जाने का वादा किया.

    पाकिस्तान के सामने समस्या यह है कि हूती विद्रोही ईरान के इशारे पर ही चलते हैं. अगर पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ कुछ करता है तो वह ईरान की दुश्मनी मोल लेगा. जिसके साथ उसकी लंबी सीमा है. लेकिन अगर पाकिस्तान लाल सागर में सऊदी अरब के टैंकरों पर हमला कर रहे हूती विद्रोहियों पर कोई एक्शन नहीं लेता है तो इससे सऊदी अरब को उसकी असलियत समझ आ जाएगी.

    ऐसी हरकतें मंज़ूर नहीं
    फिलहाल इस बार जब हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी अरब के दो टैंकरों को ब्लास्ट कर आग के हवाले कर दिया तो पाकिस्तान ने क्राउन प्रिंस सलमान को फोन कर एक बार फिर से बड़े बड़े वादे किए.

    पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी टैंकरों पर हूतियों के हमले की निंदा की है और उन्हें चेतावनी दी है. शहबाज ने एक्स पर लिखा, “आज सुबह मैंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री, महामहिम प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से टेलीफ़ोन पर बातचीत की. मैंने लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों पर हूतियों के हमलों की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की. ऐसी हरकतें मंज़ूर नहीं हैं; ये अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करती हैं, समुद्री आवाजाही की आज़ादी के लिए खतरा हैं और क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं.”

    पाक विदेश मंत्रालय की चेतावनी
    बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी देकर जरूर भड़ास निकाली. हालांकि पाकिस्तान की ये चेतावनी उसके जहाजों पर हमलों की आशंका को लेकर थी. पाकिस्तान ने कहा कि लाल सागर में उसके झंडे वाले जहाजों या समुद्री हितों के खिलाफ किसी भी हमले का तुरंत जवाब दिया जाएगा. उसने चेतावनी दी कि ऐसी हरकतों को उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “गंभीर खतरा” माना जाएगा.

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तानी झंडे वाले जहाजों या उसके कमर्शियल जहाजों पर किसी भी हमले को “पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और उसका तुरंत जवाब दिया जाएगा.”

    हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की है. उन्होंने कहा था कि वे बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में सऊदी जहाजों को रोकेंगे. यह कदम उन्होंने यमन में बंदरगाहों और हवाई अड्डों की रियाद द्वारा की गई नाकेबंदी के जवाब में उठाया है.

  • CJP आंदोलन पर पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया, बोला- यह भारत का आंतरिक मामला, टिप्पणी से किया इनकार

    CJP आंदोलन पर पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया, बोला- यह भारत का आंतरिक मामला, टिप्पणी से किया इनकार


    नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन पर पहली बार पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

    साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी से CJP आंदोलन और उससे जुड़े घटनाक्रम पर सवाल किया गया। इस पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह भारत का घरेलू विषय है और पाकिस्तान ऐसे मामलों पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

    पांचवें सप्ताह में पहुंचा आंदोलन
    CJP का प्रदर्शन अब पांचवें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। प्रदर्शनकारी NEET-UG पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और कथित अनियमितताओं के लिए जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।

    ‘संसद चलो’ मार्च के बाद बढ़ा तनाव
    20 जुलाई को आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच झड़प हुई थी। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, जबकि दिल्ली पुलिस का कहना है कि बैरिकेड तोड़ने की कोशिश के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बल प्रयोग किया गया।

    पेपर लीक मामलों पर सरकार का सख्त रुख
    इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और दोषियों के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

    सरकार ने फिर दिया बातचीत का प्रस्ताव
    केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों से संवाद की पहल भी दोहराई है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के अनुसार सरकार चार बार CJP को बातचीत का प्रस्ताव दे चुकी है और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के साथ वार्ता के लिए तैयार है। हालांकि, CJP ने नड्डा के आवास या कार्यालय में बैठक करने से इनकार करते हुए किसी तटस्थ स्थान पर बातचीत की मांग रखी है।

    सोनम वांगचुक ने समाप्त किया अनशन
    इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 25 दिन से जारी अपना अनशन समाप्त कर दिया है। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की संभावना को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।

  • तिमाही नतीजों के बाद इंडसइंड बैंक के शेयरों में बड़ी गिरावट, मजबूत मुनाफे के बावजूद निवेशकों ने दिखाई सतर्कता

    तिमाही नतीजों के बाद इंडसइंड बैंक के शेयरों में बड़ी गिरावट, मजबूत मुनाफे के बावजूद निवेशकों ने दिखाई सतर्कता

    नई दिल्ली । पहली तिमाही के वित्तीय नतीजों के बाद निजी क्षेत्र के इंडसइंड बैंक के शेयरों में गुरुवार को शुरुआती कारोबार के दौरान छह प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। बैंक ने मुनाफे और परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार के आंकड़े पेश किए, लेकिन इसके बावजूद बाजार की प्रतिक्रिया नकारात्मक रही। निवेशकों ने बैंक से जुड़े व्यापक जोखिमों और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए सतर्क रुख अपनाया, जिसका असर शेयर की कीमत पर साफ दिखाई दिया।

    कारोबार के दौरान बैंक का शेयर तेज दबाव में आ गया और छह प्रतिशत से अधिक गिरकर दिन के निचले स्तर तक पहुंच गया। शुरुआती सत्र में ही स्टॉक में लगातार बिकवाली देखी गई, जिससे यह प्रमुख गिरावट वाले शेयरों में शामिल हो गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वित्तीय नतीजे ही नहीं, बल्कि निवेशकों की धारणा और बैंक से जुड़े अन्य मुद्दों ने भी इस गिरावट में भूमिका निभाई।

    वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बैंक का समेकित शुद्ध लाभ पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। प्रावधान और आकस्मिक खर्चों में कमी आने से बैंक के मुनाफे को मजबूती मिली। इसके साथ ही बैंक की नेट इंटरेस्ट इनकम में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई, जो मुख्य बैंकिंग कारोबार की स्थिरता का संकेत देती है।

    परिसंपत्ति गुणवत्ता के मोर्चे पर भी बैंक ने सुधार दिखाया। सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात में कमी दर्ज की गई, जबकि नए फंसे हुए ऋणों की मात्रा भी पिछले वर्ष की तुलना में घटी। आम तौर पर ऐसे संकेत बैंक की वित्तीय स्थिति को बेहतर मानने के लिए सकारात्मक माने जाते हैं, लेकिन इस बार निवेशकों ने इन आंकड़ों के बावजूद सतर्कता बनाए रखी।

    बाजार विश्लेषकों का कहना है कि हाल के महीनों में बैंक से जुड़ी कुछ घटनाओं ने निवेशकों के भरोसे को प्रभावित किया है। जून में बैंक को लेकर विभिन्न स्तरों पर कथित कॉरपोरेट गवर्नेंस संबंधी शिकायतों की खबरें सामने आई थीं। इन रिपोर्टों में इनसाइडर ट्रेडिंग, वित्तीय रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं, ऑडिट प्रक्रियाओं और प्रबंधन से जुड़े कुछ आरोपों का उल्लेख किया गया था। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है, लेकिन ऐसी खबरों का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ता है।

    इसी कारण बेहतर वित्तीय प्रदर्शन के बावजूद बाजार ने अपेक्षित सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी। निवेशक केवल तिमाही लाभ पर नहीं, बल्कि बैंक की दीर्घकालिक विश्वसनीयता, प्रबंधन की पारदर्शिता और नियामकीय स्थिति पर भी नजर बनाए हुए हैं। आने वाले समय में इन पहलुओं पर स्पष्टता मिलने के बाद ही बाजार का रुख अधिक स्थिर हो सकता है।

    शेयर बाजार में किसी भी बैंक के मूल्यांकन पर वित्तीय नतीजों के साथ-साथ निवेशकों का भरोसा, जोखिम प्रबंधन और कॉरपोरेट गवर्नेंस का भी बड़ा प्रभाव होता है। इंडसइंड बैंक के मामले में पहली तिमाही के नतीजों ने परिचालन प्रदर्शन में सुधार का संकेत जरूर दिया है, लेकिन बाजार फिलहाल व्यापक तस्वीर को देखते हुए सावधानी बरत रहा है। अब निवेशकों की निगाह बैंक के आगामी तिमाही प्रदर्शन, नियामकीय घटनाक्रम और प्रबंधन की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर रहेगी, जो आगे शेयर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • देशभर में चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि, पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने याद किया अमर बलिदान और राष्ट्रसेवा

    देशभर में चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि, पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने याद किया अमर बलिदान और राष्ट्रसेवा

    नई दिल्ली । महान क्रांतिकारी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी चंद्रशेखर आजाद की जयंती पर गुरुवार को पूरे देश में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनके साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति को याद करते हुए उन्हें नमन किया। नेताओं ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद का जीवन आज भी देशवासियों, विशेषकर युवाओं के लिए राष्ट्रसेवा, स्वाभिमान और समर्पण का प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

    नई दिल्ली से जारी अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में चंद्रशेखर आजाद के निडर साहस और अटूट देशभक्ति का गौरवपूर्ण स्थान है। उन्होंने कहा कि आजाद ने अनगिनत युवा भारतीयों को देश के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा दी और उनका संकल्प आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता के लिए उनका संघर्ष और राष्ट्र के प्रति समर्पण सदैव स्मरणीय रहेगा।

    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया और भारतीयों के मन में स्वाभिमान, आत्मविश्वास तथा राष्ट्रचेतना का संचार किया। उन्होंने कहा कि आजाद ने अपने अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान से स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की तथा युवाओं के हृदय में मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना जगाई। उनका बलिदानी जीवन देशवासियों के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेगा।

    केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धासुमन अर्पित किए। उन्होंने कहा कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए आजाद ने त्याग, संघर्ष और बलिदान की जो अमर गाथा लिखी, वह आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने उन्हें भारत माता का अनन्य उपासक और महान क्रांतिकारी बताते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।

    देश के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी अपने संदेशों में चंद्रशेखर आजाद के जीवन और योगदान को याद किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके प्रसिद्ध उद्घोष का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन राष्ट्रहित में कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उनके साहस, स्वाभिमान और सर्वोच्च बलिदान को प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया।

    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने चंद्रशेखर आजाद को प्रदेश की माटी का गौरव बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने अदम्य साहस और मातृभूमि के प्रति समर्पण से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा दी। वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि उनका त्याग, पराक्रम और राष्ट्रभक्ति देशवासियों को हमेशा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देते रहेंगे। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी उनके बलिदान और क्रांतिकारी जीवन को नमन करते हुए कहा कि उनका संघर्ष और राष्ट्रप्रेम आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

    चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान सेनानियों में शामिल हैं जिन्होंने अपने अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान से देश की आजादी की लड़ाई को नई गति दी। उनका जीवन केवल इतिहास का गौरवशाली अध्याय नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और देश के प्रति समर्पण का ऐसा संदेश है, जो आज भी देश के युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा देता है।

  • मनीला में जयशंकर की कूटनीतिक सक्रियता, श्रीलंका-बांग्लादेश समेत कई देशों के नेताओं से अहम मुलाकातें

    मनीला में जयशंकर की कूटनीतिक सक्रियता, श्रीलंका-बांग्लादेश समेत कई देशों के नेताओं से अहम मुलाकातें

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने फिलीपींस की राजधानी मनीला में आयोजित आसियान से जुड़ी उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान कई देशों के विदेश मंत्रियों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ व्यापक कूटनीतिक संवाद किया। इस दौरान उन्होंने श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान तथा यूरोपीय संघ की वरिष्ठ प्रतिनिधि काजा कैलास से अलग-अलग मुलाकात कर द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की। इन बैठकों को भारत की सक्रिय विदेश नीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक भागीदारी के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    दो दिवसीय मनीला दौरे के दौरान विदेश मंत्री ने आसियान-इंडिया, ईस्ट एशिया समिट और आसियान रीजनल फोरम की विदेश मंत्री स्तरीय बैठकों में हिस्सा लिया। इन बैठकों का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना, सुरक्षा चुनौतियों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करना तथा आर्थिक और समुद्री साझेदारी को नई दिशा देना रहा। भारत ने इन मंचों पर अपने सहयोगी देशों के साथ बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    श्रीलंका और बांग्लादेश के विदेश मंत्रियों के साथ मुलाकात के दौरान आपसी संबंधों, क्षेत्रीय विकास और सहयोग के विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई। भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ पारस्परिक विश्वास और सहयोग को आगे बढ़ाने की नीति पर जोर दिया। इसके साथ ही यूरोपीय संघ की वरिष्ठ प्रतिनिधि काजा कैलास के साथ हुई बैठक में भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी, वैश्विक चुनौतियों तथा साझा हितों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

    मनीला प्रवास के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने कई अन्य प्रमुख देशों के विदेश मंत्रियों से भी द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। इनमें फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, चीन, अमेरिका, रूस, सिंगापुर, कनाडा, थाईलैंड और न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री शामिल रहे। इसके अलावा उन्होंने आसियान के महासचिव से भी मुलाकात कर क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की। इन बैठकों का उद्देश्य विभिन्न देशों के साथ भारत के रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को नई गति देना था।

    विदेश मंत्री ने क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी भाग लिया। इस दौरान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वर्तमान स्थिति, क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री सहयोग और हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में नई दिल्ली में पहले हुई क्वाड वार्ता के निर्णयों की समीक्षा की गई और स्वतंत्र, समावेशी तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई गई। साथ ही आसियान की केंद्रीय भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

    भारत सरकार का मानना है कि यह दौरा एक्ट ईस्ट नीति के तहत आसियान देशों के साथ बढ़ते सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारत और आसियान के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से दोनों पक्ष व्यापार, संपर्क, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को लगातार विस्तार दे रहे हैं। वर्ष 2026 को आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, जिससे समुद्री संपर्क, ब्लू इकोनॉमी और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच सहयोग को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। मनीला में हुई ये बैठकें भारत की सक्रिय कूटनीति और बहुपक्षीय मंचों पर उसकी बढ़ती भूमिका को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं।

  • अफ्रीकी देश कांगो में इबोला का कहर…. अब तक 1,031 लोगों की हो चुकी है मौत

    अफ्रीकी देश कांगो में इबोला का कहर…. अब तक 1,031 लोगों की हो चुकी है मौत


    घाना।
    अफ्रीकी देश कांगो (Congo) में इबोला (Ebola) के प्रकोप से 1,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. यह इतिहास का सबसे तेजी से फैलने वाला इबोला प्रकोप माना जा रहा है।

    बुधवार को घाना में एक स्वास्थ्य सम्मेलन में बोलते हुए, ‘अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ के महानिदेशक डॉ. जीन कासेया (Dr. Jean Casey) ने बताया कि अब तक 1,031 मौतों की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा, ‘ये लोग मर रहे हैं. वे इसलिए मर रहे हैं क्योंकि हमारे पास वैक्सीन नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं और फंड नहीं है।

    कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा जानकारी के अनुसार, सोमवार तक इस प्रकोप में 2,473 मामले दर्ज किए गए थे. मंत्रालय ने बताया कि कम से कम 737 मरीज आइसोलेशन में थे या अस्पताल में भर्ती थे।

    इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि इबोला प्रकोप का वास्तविक दायरा आधिकारिक आंकड़ों की तुलना में दो से चार गुना बड़ा हो सकता है. WHO के मुताबिक, 15 मई से शुरू हुआ यह प्रकोप इतनी तेजी से फैल रहा है कि स्वास्थ्य अधिकारी इसकी रफ्तार को पकड़ने में सफल नहीं हो पा रहे हैं.

    अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि 80% नए मामले संक्रमण की ज्ञात चेन के बाहर सामने आए हैं. यह इस बात का संकेत है कि प्रकोप स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा ट्रैक किए जा सकने की गति से भी तेजी से फैल रहा है.

    बता दें, इबोला एक बहुत खतरनाक वायरस से होने वाली बीमारी है. यह संक्रमण दुर्लभ जरूर है, लेकिन काफी गंभीर और कई मामलों में जानलेवा साबित हो सकता है.

    यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों जैसे खून, उल्टी, पसीना या वीर्य के संपर्क में आने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है. इसका कोई पक्का इलाज अभी तक नहीं है।

  • ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का पलटवार, बोला- हमारा तेल रुका तो दुनिया की सप्लाई भी ठप होगी

    ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का पलटवार, बोला- हमारा तेल रुका तो दुनिया की सप्लाई भी ठप होगी


    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के प्रमुख वार्ताकार और संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने कहा कि यदि ईरान को अपना तेल निर्यात करने से रोका गया, तो क्षेत्र में कोई भी देश आसानी से तेल नहीं बेच पाएगा। साथ ही उन्होंने दोहराया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में हालात अब युद्ध से पहले जैसे नहीं होंगे।

    ‘या सब बेचेंगे, या कोई नहीं’
    मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मौजूदा हालात का संदेश बिल्कुल साफ है—”या तो सभी तेल बेचेंगे या फिर कोई नहीं।” उन्होंने कहा कि यदि ईरान की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो क्षेत्र के अन्य देशों की तेल आपूर्ति भी सुरक्षित नहीं रह पाएगी।

    उन्होंने यह भी कहा कि अगर ईरान की सुरक्षा खतरे में होगी तो किसी अन्य देश का महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा भी सुरक्षित नहीं रहेगा। गालिबाफ ने यह भी दोहराया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के बिना ही संभव है और यह समुद्री मार्ग अब पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगा।

    ट्रंप ने दी थी सख्त चेतावनी
    इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में किसी जहाज पर मिसाइल, ड्रोन, रॉकेट या अन्य हथियार से हमला किया गया, तो अमेरिका ईरान के अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाएगा।

    ट्रंप ने लिखा कि यदि ईरान समुद्री मार्ग में जहाजों पर हमला करता है, तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई में पुलों, बिजली संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को निशाना बनाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि ऐसे हमलों के दायरे में तेहरान के आसपास स्थित महत्वपूर्ण ठिकाने भी आ सकते हैं।

    तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बना हॉर्मुज स्ट्रेट
    अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है। शुरुआती युद्धविराम समझौता टूटने के बाद दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों का दौर जारी है। अमेरिका कई बार ईरानी ठिकानों पर कार्रवाई कर चुका है, जबकि ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर जवाब दिया है।

    दुनिया की तेल सप्लाई पर पड़ सकता है असर
    हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया के कुल तेल निर्यात का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान इस क्षेत्र को अपनी रणनीतिक सुरक्षा का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग बताते हुए निर्बाध आवाजाही बनाए रखने की वकालत करता है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक तेल बाजार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर डाल सकता है।

  • नेतन्याहू की गिरफ्तारी पर ममदानी का यू-टर्न, कानूनी अधिकार न होने की बात स्वीकार, फिर भी ICC वारंट लागू करने की उठाई मांग

    नेतन्याहू की गिरफ्तारी पर ममदानी का यू-टर्न, कानूनी अधिकार न होने की बात स्वीकार, फिर भी ICC वारंट लागू करने की उठाई मांग

    नई दिल्ली । न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर अपने पहले के चुनावी रुख में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए कहा है कि उनके प्रशासन के पास नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कई बार दावा किया था कि यदि नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, लेकिन अब कानूनी समीक्षा के बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि स्थानीय प्रशासन के अधिकार सीमित हैं और इस प्रकार की कार्रवाई उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।

    ममदानी ने एक वीडियो संदेश जारी कर बताया कि उनके प्रशासन ने लागू कानूनों का विस्तृत अध्ययन किया और यह जांचने का प्रयास किया कि क्या न्यूयॉर्क शहर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी किसी गिरफ्तारी वारंट को स्वयं लागू कर सकता है। समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि नगर प्रशासन के पास ऐसा करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय में अंतिम अधिकार संघीय सरकार के पास है।

    हालांकि कानूनी सीमाओं को स्वीकार करने के बावजूद ममदानी ने अपने राजनीतिक रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने दोहराया कि उनकी राय में बेंजामिन नेतन्याहू पर लगे आरोप गंभीर हैं और यदि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिका की संघीय सरकार से अपील की कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रियाओं के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाए और संबंधित वारंट के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए।

    ममदानी ने यह भी कहा कि जब सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए नेतन्याहू के न्यूयॉर्क आने की संभावना हो, तब संघीय प्रशासन को आवश्यक कानूनी विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के साथ सहयोग बढ़ाने की भी वकालत की। हालांकि अमेरिका वर्तमान में आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर कानूनी और कूटनीतिक जटिलताएं बनी हुई हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि नेतन्याहू की अमेरिका यात्रा के दौरान किसी प्रकार की गिरफ्तारी नहीं होगी। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अमेरिकी भूमि पर रहते हुए इजरायली प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। उनके इस बयान के बाद ममदानी की नई टिप्पणी को राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ममदानी ने यह भी दोहराया कि वह नेतन्याहू की नीतियों के आलोचक बने हुए हैं और उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आईसीसी ने आरोप तय किए हैं तो न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि न्यूयॉर्क ऐसे किसी व्यक्ति का स्वागत नहीं करता जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ रहा हो।

    दूसरी ओर, नेतन्याहू के कार्यालय ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की वैधता पर सवाल उठाए हैं। इजरायल की ओर से कहा गया कि आईसीसी का इजरायली नागरिकों या अमेरिकी नागरिकों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और उसके निर्णयों को स्वीकार नहीं किया जाता। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय न्याय, राष्ट्रीय संप्रभुता और स्थानीय प्रशासन के अधिकारों को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • CJP प्रदर्शन पर पाकिस्तान में छिड़ी बहस, भारत की कवरेज और PoK पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तानी मीडिया पर सवाल

    CJP प्रदर्शन पर पाकिस्तान में छिड़ी बहस, भारत की कवरेज और PoK पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तानी मीडिया पर सवाल

    नई दिल्ली । भारत में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों को लेकर पाकिस्तान के मीडिया में लगातार कवरेज देखने को मिल रही है। इस बीच पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार कुर्रत-उल-ऐन शिराज़ी ने अपने देश के मीडिया की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत की घटनाओं को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है, जबकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रही गतिविधियों और वहां के हालात को पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान के मीडिया कवरेज को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    कुर्रत-उल-ऐन शिराज़ी ने कहा कि समाचार माध्यमों का दायित्व केवल पड़ोसी देशों की घटनाओं को दिखाना नहीं, बल्कि अपने देश और उससे जुड़े क्षेत्रों की महत्वपूर्ण घटनाओं को भी समान प्राथमिकता देना है। उन्होंने सवाल उठाया कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई महीनों से सामने आ रहे घटनाक्रमों और स्थानीय लोगों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मीडिया में अपेक्षित स्थान क्यों नहीं मिल रहा है। उनके अनुसार संतुलित पत्रकारिता के लिए सभी महत्वपूर्ण विषयों पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

    दूसरी ओर, पाकिस्तान के कई प्रमुख समाचार माध्यमों ने भारत में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रमों को विस्तार से प्रकाशित और प्रसारित किया है। विभिन्न रिपोर्टों में प्रदर्शन, विपक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक माहौल का उल्लेख किया गया है। कई विश्लेषणों में यह भी कहा गया कि छात्र आंदोलन ने देश की राजनीतिक चर्चा को नई दिशा दी है और विभिन्न दलों की सक्रियता बढ़ी है।

    कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी भारत में जारी विरोध प्रदर्शनों को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। इन रिपोर्टों में प्रदर्शन, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और प्रशासनिक कदमों का उल्लेख किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया कि शिक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर देशभर में बहस तेज हुई है। हालांकि अलग-अलग मीडिया संस्थानों ने घटनाक्रम को अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।

    इधर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न दावे और रिपोर्ट सामने आती रही हैं। स्थानीय परिस्थितियों, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और जनभावनाओं को लेकर अलग-अलग पक्ष अपनी राय रखते रहे हैं। इसी संदर्भ में कुर्रत-उल-ऐन शिराज़ी ने कहा कि यदि मीडिया अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को विस्तार से दिखा सकता है तो उसे अपने क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को भी समान गंभीरता के साथ सामने लाना चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका निष्पक्ष और संतुलित सूचना उपलब्ध कराने की होती है। जब किसी एक विषय को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और दूसरे महत्वपूर्ण विषय अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं, तो मीडिया की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जाता है। यही कारण है कि पाकिस्तान में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज होती दिखाई दे रही है।

    भारत में जारी छात्र प्रदर्शनों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी निगरानी की जा रही है और विभिन्न विदेशी मीडिया संस्थान अपने-अपने दृष्टिकोण से घटनाक्रम का विश्लेषण कर रहे हैं। वहीं पाकिस्तान के भीतर मीडिया कवरेज को लेकर उठे सवाल यह संकेत देते हैं कि समाचार प्रस्तुति और संपादकीय प्राथमिकताओं पर बहस केवल एक देश तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इन विषयों को किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं तथा दोनों देशों से जुड़े घटनाक्रमों को किस संतुलन के साथ स्थान दिया जाता है।

  • जहां जन्मा था एडोल्फ हिटलर, उसी ऐतिहासिक इमारत में खुला पुलिस स्टेशन, चरमपंथी गतिविधियों पर लगेगी रोक

    जहां जन्मा था एडोल्फ हिटलर, उसी ऐतिहासिक इमारत में खुला पुलिस स्टेशन, चरमपंथी गतिविधियों पर लगेगी रोक

    नई दिल्ली । ऑस्ट्रिया ने इतिहास के सबसे विवादित और कुख्यात तानाशाह एडोल्फ हिटलर के जन्मस्थान को नई पहचान देते हुए वहां आधिकारिक तौर पर पुलिस स्टेशन शुरू कर दिया है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य उस इमारत को नव-नाजी समर्थकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने से रोकना और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करना है। वर्षों तक विवादों में रही इस इमारत का व्यापक पुनर्निर्माण करने के बाद इसे पुलिस प्रशासन के उपयोग के लिए तैयार किया गया है।

    यह ऐतिहासिक भवन ऑस्ट्रिया के ब्राउनाउ-एम-इन शहर में स्थित है, जहां 20 अप्रैल 1889 को एडोल्फ हिटलर का जन्म हुआ था। 17वीं सदी में बने इस भवन को लंबे समय तक लेकर यह बहस चलती रही कि इसका भविष्य क्या होना चाहिए। कई विशेषज्ञों का मानना था कि यदि इसे ऐतिहासिक स्मारक का रूप दिया जाता है तो यह चरमपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिए प्रतीकात्मक स्थल बन सकता है। इसी आशंका को देखते हुए सरकार ने इसे सार्वजनिक प्रशासन के उपयोग में लाने का निर्णय लिया।

    इमारत के पुनर्निर्माण पर लगभग 20 मिलियन यूरो, यानी भारतीय मुद्रा में करीब 220 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह परियोजना तय समय से लगभग तीन वर्ष की देरी से पूरी हुई। बाहरी स्वरूप में भी बदलाव किए गए हैं ताकि भवन की पुरानी पहचान कम दिखाई दे और उसे सामान्य सरकारी भवन जैसा रूप दिया जा सके। अब मुख्य प्रवेश द्वार पर पुलिस स्टेशन का आधिकारिक चिन्ह लगाया गया है।

    हालांकि भवन के बाहर स्थित स्मारक पत्थर को यथावत रखा गया है। इस स्मारक पर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का संदेश अंकित है तथा फासीवाद की पुनरावृत्ति न होने की चेतावनी दी गई है। सरकार का मानना है कि यह स्मारक इतिहास की त्रासदी को याद रखने और भविष्य के लिए सीख लेने का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहेगा।

    इतिहास के अनुसार, हिटलर के शासनकाल में लाखों लोगों ने उत्पीड़न और नरसंहार का सामना किया। ऑस्ट्रिया भी उस दौर की घटनाओं को लेकर लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं का सामना करता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि आधुनिक ऑस्ट्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून के शासन और मानवाधिकारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

    इस भवन का स्वामित्व कई दशकों तक एक निजी परिवार के पास रहा। बाद में सरकार इसे लीज पर लेकर सामाजिक कार्यों के लिए इस्तेमाल करती रही, लेकिन भविष्य को लेकर विवाद लगातार बना रहा। निजी मालिक और सरकार के बीच कानूनी प्रक्रिया भी चली, जिसके बाद सरकार ने कानून के तहत भवन का अधिग्रहण किया और मुआवजा देकर इसे अपने नियंत्रण में लिया।

    भवन के उपयोग को लेकर कई विकल्पों पर विचार किया गया था। कुछ लोगों ने इसे संग्रहालय बनाने का सुझाव दिया, जबकि कुछ ने भवन को पूरी तरह ध्वस्त करने की वकालत की। हालांकि इतिहासकारों और विशेषज्ञों की राय थी कि भवन को मिटाने के बजाय उसका ऐसा उपयोग किया जाए जिससे चरमपंथी विचारधारा को किसी प्रकार का प्रतीकात्मक लाभ न मिले। विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर अंततः इसे पुलिस स्टेशन में बदलने का निर्णय लिया गया।

    सरकार का मानना है कि भवन में स्थायी पुलिस उपस्थिति यह स्पष्ट संदेश देगी कि नाजी विचारधारा या उसके किसी भी प्रकार के महिमामंडन के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। साथ ही यह कदम इतिहास की संवेदनशील विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास भी माना जा रहा है।