Category: International

  • ईरान-इजरायल तनाव पर पूर्व सुरक्षा अधिकारी का बड़ा दावा, कहा- युद्ध बढ़ा तो दुनिया दो धड़ों में बंट सकती है

    ईरान-इजरायल तनाव पर पूर्व सुरक्षा अधिकारी का बड़ा दावा, कहा- युद्ध बढ़ा तो दुनिया दो धड़ों में बंट सकती है

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं को एक बार फिर बढ़ा दिया है। दोनों देशों के बीच हाल के हमलों और जवाबी कार्रवाइयों के बाद क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को लेकर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसी बीच पूर्व सुरक्षा अधिकारी और पूर्व एनएसजी कमांडो लकी बिष्ट के कुछ बयानों ने भू-राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

    लकी बिष्ट ने दावा किया है कि वर्तमान संघर्ष भविष्य में और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। उनके अनुसार यदि क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ता रहा तो इसमें अन्य वैश्विक शक्तियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी भी देखने को मिल सकती है। उन्होंने यह आशंका भी व्यक्त की कि दुनिया की प्रमुख शक्तियां अलग-अलग पक्षों में खड़ी हो सकती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय तनाव और बढ़ सकता है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के दावे फिलहाल विश्लेषण और व्यक्तिगत आकलन की श्रेणी में आते हैं। किसी संभावित युद्ध, सैन्य गठबंधन की भागीदारी या भविष्य की सैन्य कार्रवाई को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए ऐसे दावों को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    पश्चिम एशिया में हालिया घटनाक्रमों ने निश्चित रूप से वैश्विक चिंता बढ़ाई है। ईरान और इजरायल के बीच मिसाइल हमलों और जवाबी कार्रवाई के बाद कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए यात्रा संबंधी एडवाइजरी जारी की हैं। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी इन घटनाओं का प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान स्थिति का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, शेयर बाजारों में अस्थिरता और निवेशकों की बढ़ती चिंता पहले से दिखाई देने लगी है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर दुनिया के कई देशों की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।

    चीन और ताइवान को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों द्वारा संभावित तनाव की आशंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं। हालांकि मौजूदा समय में किसी बड़े सैन्य संघर्ष की आधिकारिक घोषणा या पुष्टि नहीं हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार संवाद और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

    इस बीच कई वैश्विक नेता संयम बरतने और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देने की अपील कर रहे हैं। विभिन्न देशों की सरकारें स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और संभावित जोखिमों का आकलन कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी तनाव कम करने और संघर्ष को व्यापक रूप लेने से रोकने पर जोर दिया है।

    भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता तथ्यों और आधिकारिक सूचनाओं पर आधारित विश्लेषण की है। युद्ध और वैश्विक संघर्षों को लेकर सामने आने वाले दावों और अनुमानों के बीच सत्यापित जानकारी को प्राथमिकता देना जरूरी है, ताकि अनावश्यक भ्रम और आशंकाओं से बचा जा सके।

    पश्चिम एशिया की स्थिति फिलहाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण विषय बनी हुई है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय घटनाक्रम, कूटनीतिक प्रयास और वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रियाएं यह तय करेंगी कि हालात किस दिशा में आगे बढ़ते हैं। फिलहाल दुनिया की नजरें इसी क्षेत्र पर टिकी हुई हैं।

  • Rosneft के Igor Sechin का अनुमान: भारत की तेज़ ग्रोथ और तेल खपत के चलते अगले दशक में वैश्विक ऊर्जा पर भारत का दबदबा

    Rosneft के Igor Sechin का अनुमान: भारत की तेज़ ग्रोथ और तेल खपत के चलते अगले दशक में वैश्विक ऊर्जा पर भारत का दबदबा

    नई दिल्ली । वैश्विक तेल बाजार में भारत की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है और विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में देश इस क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी बन जाएगा। हाल ही में रूसी तेल कंपनी Rosneft के सीईओ इगोर सेचिन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि साल 2035 तक वैश्विक तेल मांग में भारत का हिस्सा लगभग आधा होगा। उनका अनुमान है कि वैश्विक तेल की बढ़ती मांग में भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक रहेगी।

    इगोर सेचिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में कहा कि भारत की तेल खपत अगले दशक में करीब आठ मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच जाएगी, जो 44 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। उनका कहना था कि जबकि वैश्विक मांग में कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत की वृद्धि होगी, भारत अकेले वैश्विक मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा संभालेगा। इससे स्पष्ट होता है कि भारत तेल बाजार में रणनीतिक महत्व रखता है।

    रूस और भारत के आर्थिक संबंधों पर बात करते हुए सेचिन ने बताया कि अप्रैल 2022 से रूस की तेल आपूर्ति से भारत और चीन को लगभग 40 अरब डॉलर का लाभ हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और चीन के साथ रूस की साझेदारी ने स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से रूस को अलग करना संभव नहीं है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा की बढ़ती मांग ने देश को वैश्विक तेल बाजार में निर्णायक स्थिति दे दी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.7 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अनुमान से बेहतर रही। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है।

    इगोर सेचिन ने होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) की संवेदनशीलता पर भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि इस स्ट्रेट के जरिए तेल और गैस की आपूर्ति में व्यवधान आने से फर्टिलाइजर्स और फूड प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ सकती हैं। उनका कहना था कि इस प्रभाव के प्रति भारत सबसे अधिक संवेदनशील देशों में शामिल है, जबकि अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है।

    रूस और भारत के बीच ऊर्जा साझेदारी से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक तेल के खेल में भारत की भूमिका आने वाले दशक में और मजबूत होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बढ़ती मांग न केवल घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि वैश्विक बाजार पर भी इसका असर होगा।

  • भारत-नेपाल संबंधों में नई चुनौतियां: नेपाली विदेश मंत्री ने दोहराया ‘कालापानी-लिपुलेख हमारा अधिकार’

    भारत-नेपाल संबंधों में नई चुनौतियां: नेपाली विदेश मंत्री ने दोहराया ‘कालापानी-लिपुलेख हमारा अधिकार’

    नई दिल्ली । नेपाल के विदेश मंत्री Shishir Khanal इन दिनों भारत की तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर हैं। इस दौरे के दौरान उन्होंने भारत के शीर्ष नेतृत्व के साथ विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद से जुड़े कई मुद्दे फिर से चर्चा में हैं। इस दौरान उन्होंने भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत करने पर भी जोर दिया, लेकिन सीमा विवाद को लेकर उनका पुराना रुख एक बार फिर सामने आया है।

    यात्रा के दौरान शिशिर खनाल ने भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval से अलग-अलग मुलाकात की। इन बैठकों में द्विपक्षीय सहयोग, सीमा प्रबंधन, सांस्कृतिक संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। दोनों देशों ने आपसी रिश्तों को आगे बढ़ाने और संवाद के माध्यम से सभी संवेदनशील विषयों को सुलझाने की आवश्यकता पर बल दिया।

    हालांकि, मीडिया से बातचीत के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री ने एक बार फिर भारत-नेपाल सीमा विवाद से जुड़े Kalapani और Lipulekh क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि नेपाल लंबे समय से इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है और यह मुद्दा ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक संदर्भों से जुड़ा हुआ है। उनके इस बयान ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को सुर्खियों में ला दिया है।

    शिशिर खनाल ने साथ ही यह भी कहा कि नेपाल इस मुद्दे को किसी भी प्रकार की उग्र राष्ट्रवादी बयानबाजी के बजाय शांतिपूर्ण और कूटनीतिक बातचीत के माध्यम से सुलझाना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देशों को आपसी सम्मान और समझ के आधार पर बातचीत की मेज पर बैठकर समाधान तलाशना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और रिश्तों में विश्वास और मजबूत हो सके।

    उन्होंने कैलाश मानसरोवर यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि कई श्रद्धालु नेपाल के मार्ग से इस यात्रा पर जाते हैं, इसलिए सीमा क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। साथ ही उन्होंने भारत और चीन के बीच हुए कुछ समझौतों को लेकर भी नेपाल की चिंता व्यक्त की और कहा कि इस तरह के निर्णयों में नेपाल की सहमति और भागीदारी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा विषय है।

    भारत की प्रगति और आर्थिक विकास की सराहना करते हुए शिशिर खनाल ने कहा कि भारत ने वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान बनाई है और यह क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। उन्होंने नेपाल में चल रहे जन-आंदोलनों और सामाजिक परिस्थितियों का भी जिक्र किया। साथ ही भारत में हाल के एक आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वे इस विषय पर अधिक टिप्पणी नहीं करना चाहते, जिससे उनके बयान को लेकर विभिन्न राजनीतिक चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं।

    कुल मिलाकर यह यात्रा भारत-नेपाल संबंधों में संवाद और सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के रुख में अंतर एक बार फिर स्पष्ट दिखाई दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, आगे की बातचीत ही इन संवेदनशील मामलों के समाधान का रास्ता तय करेगी।

  • सिंगापुर ने भारतीयों के खिलाफ नस्लीय नफरत फैलाने वाली 14 सोशल मीडिया पोस्ट पर रोक लगाई

    सिंगापुर ने भारतीयों के खिलाफ नस्लीय नफरत फैलाने वाली 14 सोशल मीडिया पोस्ट पर रोक लगाई

    नई दिल्ली। सिंगापुर सरकार ने भारतीयों के खिलाफ नस्लीय नफरत फैलाने वाली 14 सोशल मीडिया पोस्ट को ब्लॉक कर दिया है। यह कार्रवाई ‘ऑनलाइन क्रिमिनल हार्म्स एक्ट 2023’ (OCHA) के तहत की गई। अधिकारियों ने कहा कि ये पोस्ट जानबूझकर भारतीय समुदाय को निशाना बनाकर भड़काऊ सामग्री फैलाने के लिए बनाई गई थीं।

    सिंगापुर के गृह मंत्रालय (MHA) ने YouTube, Facebook और X को निर्देश दिए कि वे इन पोस्टों तक स्थानीय उपयोगकर्ताओं की पहुंच रोकें। सरकार ने इसे विदेशी कनेक्शन वाले गलत जानकारी फैलाने के अभियान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त कार्रवाई बताया। इस कदम का उद्देश्य सिंगापुर जैसे बहुसांस्कृतिक शहर-राज्य में सामाजिक सद्भाव बनाए रखना और नस्लीय तनाव को रोकना है।

    पोस्टों में क्या था कंटेंट
    अधिकारियों ने बताया कि आपत्तिजनक सामग्री पिछले महीने चीन के ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर शुरू हुई थी। शुरुआत में यह सिंगापुर की सांस्कृतिक पहचान और जातीय राजनीति पर केंद्रित थी। बाद में पोस्ट और अधिक भड़काऊ हो गई, जिसमें दावा किया गया कि भारतीयों की बढ़ती आबादी सिंगापुर के लिए खतरा है और देश के कई संस्कृतियों वाले ढांचे को कमजोर कर रही है।

    कुछ पोस्टों में कहा गया कि सिंगापुर की सामाजिक स्थिरता उसके बहुसांस्कृतिक ढांचे की वजह से नहीं, बल्कि चीनी बहुल आबादी की वजह से बनी हुई है। इसके साथ ही कुछ पोस्टों ने भारतवंशी नेताओं के प्रभाव को लेकर आलोचना की और भारतीय प्रवासियों के बढ़ते प्रभाव को देश के हितों के लिए हानिकारक बताया।

    कंटेंट को विश्वसनीय दिखाने के लिए ‘लिटिल इंडिया’ की व्यस्त सड़कों और पगोडा स्ट्रीट पर भारतीय त्योहारों के वीडियो का इस्तेमाल किया गया। पोस्ट में अपमानजनक भाषा का भी इस्तेमाल हुआ, जैसे भारतीय आबादी की तुलना “करी (curry) के जमावड़े” से करना।

    कानूनी आधार और जांच
    MHA ने कहा कि ये पोस्ट सिंगापुर के दंड संहिता (Penal Code) की धारा 298A के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं। यह धारा उन गतिविधियों को अपराध मानती है जो जानबूझकर नस्लीय या धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना को बढ़ावा देती हैं।

    जांच में पता चला कि यह सामग्री संभवतः चीन स्थित प्लेटफ़ॉर्म से शुरू हुई और फिर अन्य सोशल मीडिया चैनलों पर फैल गई। अधिकारियों ने यह भी कहा कि सामग्री फैलाने के प्रयास सुनियोजित और जानबूझकर किए गए थे।

    सिंगापुर पुलिस ने प्लेटफ़ॉर्मों को निर्देश दिए कि वे सभी ज़रूरी कदम उठाएं ताकि स्थानीय उपयोगकर्ताओं को इन भड़काऊ पोस्टों तक पहुंच न मिले। अधिकारियों ने कहा कि यह कार्रवाई बहुसांस्कृतिक समाज में सद्भाव बनाए रखने और नस्लीय नफरत फैलाने वाली सामग्री से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी थी।

    इस कदम से सिंगापुर ने दिखा दिया कि वह नस्लीय और धार्मिक सद्भाव बनाए रखने में कड़ा रुख अपनाने के लिए तत्पर है, और विदेशों से आई किसी भी भड़काऊ सामग्री को रोकने के लिए कानूनी और तकनीकी माध्यमों का प्रयोग कर रहा है।

  • तेलंगाना के 28 वर्षीय अंशुल कुंचा की अमेरिका में हत्या, परिवार मांग रहा शव का जल्द भारत भेजा जाना

    तेलंगाना के 28 वर्षीय अंशुल कुंचा की अमेरिका में हत्या, परिवार मांग रहा शव का जल्द भारत भेजा जाना

    नई दिल्ली। अमेरिका के फिलाडेल्फिया में तेलंगाना के 28 वर्षीय भारतीय युवक अंशुल कुंचा की हत्या कर दी गई। अंशुल अमेरिका में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे और अतिरिक्त आय के लिए वीकेंड पर पिज्जा डिलीवरी का पार्ट-टाइम काम भी करते थे।

    शनिवार रात को अंशुल को एक सुनसान इलाके में फर्जी पिज्जा ऑर्डर मिला। जब वह उस स्थान पर पिज्जा डिलीवरी देने गए, तो दो नकाबपोश हमलावरों ने उन पर हमला किया। हमलावरों ने अंशुल के सिर में कई गोलियां मारी और वहां से फरार हो गए। पुलिस के अनुसार जिस मकान में ऑर्डर दिया गया था वह खाली था।

    अंशुल की बहन तन्वी ने बताया कि यह कोई लूटपाट की घटना नहीं थी। हमलावरों ने उनसे न तो पैसे लिए और न ही कोई सामान छीना। यह पूरी घटना पूर्व नियोजित हत्या का संकेत देती है। अंशुल पहले भी लूटपाट का शिकार हो चुके थे, लेकिन इस बार का हमला सुनियोजित और घातक था।

    सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, फिलाडेल्फिया हाउसिंग अथॉरिटी के सीसीटीवी कैमरों में अंशुल को पिज्जा डिलीवरी करते हुए देखा गया, और उनके पीछे दो संदिग्धों को चलते हुए कैद किया गया। दोनों संदिग्ध गहरे रंग के कपड़े पहने थे और उनके पास बैकपैक था।

    परिवार ने अमेरिकी अधिकारियों और भारतीय वाणिज्य दूतावास से अंशुल का पार्थिव शरीर जल्द से जल्द भारत भेजने की अपील की है। न्यूयॉर्क स्थित भारतीय महावाण्यसदास ने सोशल मीडिया पर अंशुल की असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और बताया कि वे परिवार के संपर्क में हैं तथा हर संभव मदद प्रदान की जा रही है।

    अंशुल लगभग चार साल पहले नौकरी के सिलसिले में अमेरिका गए थे। परिवार के अनुसार, वे मेहनती और जिम्मेदार व्यक्ति थे, जो वीकेंड में अतिरिक्त आय के लिए पिज्जा डिलीवरी का काम करते थे। उनका परिवार इस घटना से गहरे सदमे में है।

    पुलिस ने कहा कि फिलहाल मामले की जांच जारी है और संदिग्धों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है। प्रारंभिक जांच से यह संकेत मिल रहा है कि यह हत्या व्यक्तिगत रूप से अंशुल को निशाना बनाने के लिए की गई थी।

    अंशुल की बहन ने कहा, “भाई की हत्या केवल हमारी परिवारिक दुख की वजह नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि विदेश में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर ध्यान देना कितना जरूरी है। हम चाहते हैं कि उनके हत्यारों को जल्द गिरफ्तार किया जाए और उनका शव भारत लाया जाए।”

    यह घटना फिलाडेल्फिया में भारतीय समुदाय और परिवार को हिला कर रख दी है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा और जांच टीमों को तैनात किया गया है।

    अंशुल की असामयिक मौत से भारतीय समुदाय में चिंता और सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है। फिलहाल जांच जारी है, और परिवार तथा दूतावास दोनों यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि शव को भारत लाने की प्रक्रिया जल्द पूरी हो।

  • महिला किसानों की मेहनत को मिला अंतरराष्ट्रीय बाजार, झारखंड से आमों का पहला निर्यात ब्रिटेन रवाना

    महिला किसानों की मेहनत को मिला अंतरराष्ट्रीय बाजार, झारखंड से आमों का पहला निर्यात ब्रिटेन रवाना


    नई दिल्ली ।
    भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए झारखंड से पहली बार ताजे आमों का वाणिज्यिक निर्यात शुरू हो गया है। राज्य के सिमडेगा जिले में उत्पादित आम्रपाली किस्म के आमों की पहली खेप यूनाइटेड किंगडम के लिए रवाना की गई है। इस पहल को किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और भारतीय कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    झारखंड के सिमडेगा जिले के बानो प्रखंड में कार्यरत महिला किसान उत्पादक कंपनी द्वारा उत्पादित आम्रपाली आमों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी की गई। लगभग 1.5 मीट्रिक टन आमों की पहली खेप को कोलकाता के माध्यम से यूनाइटेड किंगडम भेजा गया। इस उपलब्धि ने राज्य के बागवानी क्षेत्र और स्थानीय किसानों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं।

    इस निर्यात की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें महिला किसानों की सक्रिय भागीदारी रही है। किसान उत्पादक कंपनी से जुड़े समूहों ने गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, फसल प्रबंधन और निर्यात मानकों के अनुरूप खेती को अपनाकर यह उपलब्धि हासिल की है। इससे न केवल महिला किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिला नेतृत्व वाले कृषि उद्यमों को भी नई पहचान मिलेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय आमों की लगातार बढ़ती मांग का लाभ अब उन राज्यों को भी मिलने लगा है, जो अब तक निर्यात गतिविधियों में अपेक्षाकृत पीछे रहे हैं। झारखंड से शुरू हुआ यह निर्यात राज्य के किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद करेगा और उन्हें घरेलू बाजार पर पूरी तरह निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होगी।

    इस सफलता के पीछे किसानों को निर्यात संबंधी जानकारी, गुणवत्ता मानकों और वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं से परिचित कराने के लिए किए गए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। किसानों और निर्यातकों के बीच समन्वय स्थापित कर उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था तैयार की गई, जिसका प्रत्यक्ष परिणाम पहली निर्यात खेप के रूप में सामने आया है।

    कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि इसी प्रकार गुणवत्ता, पैकेजिंग और आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान दिया जाए तो झारखंड के अन्य फल एवं कृषि उत्पाद भी वैश्विक बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। इससे राज्य में कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

    सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से क्षेत्र के किसान आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। साथ ही फसल कटाई के बाद की प्रक्रियाओं, भंडारण और गुणवत्ता नियंत्रण पर भी अधिक ध्यान दिया जाएगा। इससे कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उनकी स्वीकार्यता मजबूत होगी।

    झारखंड से आमों का यह पहला निर्यात केवल एक व्यापारिक उपलब्धि नहीं बल्कि ग्रामीण किसानों, विशेषकर महिला कृषकों की क्षमता और संभावनाओं का प्रमाण भी है। यह पहल राज्य के कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने के साथ भारत के बढ़ते कृषि निर्यात अभियान को भी मजबूती प्रदान करेगी। आने वाले समय में इससे राज्य के अन्य किसान समूहों को भी वैश्विक बाजारों से जुड़ने की प्रेरणा मिलने की उम्मीद है।

  • ‘असल दुनिया में सोचिए’, खामेनेई से मुलाकात की ट्रंप की इच्छा पर ईरान का तीखा जवाब

    ‘असल दुनिया में सोचिए’, खामेनेई से मुलाकात की ट्रंप की इच्छा पर ईरान का तीखा जवाब


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बयानबाजी और सैन्य तनाव की स्थिति के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के हालिया बयान पर ईरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।

    गुरुवार को ट्रंप ने कहा था कि वह ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के साथ बैठक करने के लिए तैयार हैं, यदि इससे किसी समझौते का रास्ता निकलता है। उन्होंने यह भी कहा था कि खामेनेई उनके पसंदीदा व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन ऐसी मुलाकात होने पर वह इसे सम्मान की बात मानेंगे।

    इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ट्रंप पर सीधा तंज कसा। उन्होंने कहा कि सभी लोगों को “असली दुनिया में जीने और सोचने” की जरूरत है। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, अराघची ने कहा कि ट्रंप का यह बयान वास्तविकता से दूर है और मौजूदा परिस्थितियों को समझने की जरूरत है।

    ट्रंप की ओर से यह भी कहा गया था कि उन्होंने सीधे तौर पर बैठक का प्रस्ताव नहीं दिया, बल्कि कुछ व्हाइट हाउस अधिकारियों की ओर से इस तरह की बातचीत की संभावना पर चर्चा हुई थी।

    ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनावपूर्ण हालातों में हाल के समय में टकराव और बढ़ा है। दोनों पक्षों के बीच कई मोर्चों पर असहमति बनी हुई है और किसी ठोस समझौते की दिशा में अभी तक कोई निर्णायक प्रगति नहीं हुई है।

    इसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। हालांकि ट्रंप ने दावा किया कि पहले जिन आशंकाओं में तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की बात कही जा रही थी, वे वास्तविकता में 96 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर बनी हुई हैं।

    ईरान की ओर से भी साफ किया गया है कि बातचीत की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है और दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर कायम हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए यह टकराव फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है।

  • ग्लोबल फाइनेंस में डॉलर की बादशाहत को झटका, पुतिन का दावा- ब्रिक्स देशों की बढ़ती ताकत के आगे पस्त हो रहा पश्चिमी देशों का दबदबा

    ग्लोबल फाइनेंस में डॉलर की बादशाहत को झटका, पुतिन का दावा- ब्रिक्स देशों की बढ़ती ताकत के आगे पस्त हो रहा पश्चिमी देशों का दबदबा

    नई दिल्ली । वैश्विक वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़ा और तीखा बयान जारी किया है। सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम (SPIEF) के मुख्य सत्र को संबोधित करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने दावा किया है कि दुनिया भर में अब डॉलर और यूरो जैसी पारंपरिक पश्चिमी मुद्राओं के प्रति अविश्वास तेजी से बढ़ रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जा रहे एकतरफा प्रतिबंधों, आर्थिक नाकेबंदी और अन्य देशों की वैध संपत्तियों को फ्रीज करने की नीतियों के कारण दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाएं, विशेषकर ब्रिक्स (BRICS) गठबंधन के सदस्य देश अब अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं की ओर रुख कर रहे हैं।

    इस महत्वपूर्ण आर्थिक सत्र के दौरान, जिसकी कमान भारतीय मीडिया जगत से जुड़ी वरिष्ठ पत्रकार के हाथों में थी, राष्ट्रपति पुतिन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की बदलती दिशा का विस्तृत खाका पेश किया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की वित्तीय नीतियां बेहद अदूरदर्शी और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं, जो मध्य पूर्व से लेकर यूरोप तक अस्थिरता पैदा कर रही हैं। यूक्रेन विवाद के बाद रूस के राष्ट्रीय आरक्षित कोष (रिजर्व फंड) को फ्रीज किए जाने की कार्रवाई को उन्होंने खुले तौर पर एक अंतरराष्ट्रीय ‘चोरी’ करार दिया। पुतिन ने चेतावनी दी कि इस कदम ने वैश्विक बैंकिंग और भुगतान प्रणालियों की निष्पक्षता पर एक ऐसा दाग लगा दिया है जिसे मिटाना अब मुमकिन नहीं है।

    रूसी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि दुनिया का हर संप्रभु राष्ट्र अब यह भली-भांति समझ चुका है कि यदि वे पश्चिमी देशों के भू-राजनीतिक हितों के आड़े आते हैं, तो पलक झपकते ही उनकी भी अंतरराष्ट्रीय संपत्तियां जब्त की जा सकती हैं और उन्हें वैश्विक भुगतान नेटवर्क से बाहर किया जा सकता है। इसी डर और असुरक्षा के माहौल ने वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों के विकास को गति दी है। वर्तमान में विभिन्न देश आपस में व्यापारिक लेन-देन के लिए अपनी स्थानीय मुद्राओं का उपयोग बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही सेंट्रल बैंकों की डिजिटल करेंसी (CBDC) और डिजिटल वित्तीय संपत्तियों की भूमिका अंतरराष्ट्रीय व्यापार में तेजी से मुख्यधारा का हिस्सा बनती जा रही है।

    रूस की अपनी आर्थिक स्थिति का उदाहरण देते हुए पुतिन ने बताया कि आज उनका देश अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ रूबल और अन्य राष्ट्रीय मुद्राओं में रिकॉर्ड स्तर पर व्यापार कर रहा है। रूस के कुल निर्यात व्यापार का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा अब सीधे तौर पर उनकी अपनी मुद्रा रूबल में निष्पादित हो रहा है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद स्थिरता प्रदान की है। उन्होंने आंकड़ों के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया कि विकसित देशों का समूह यानी जी7 (G7) अब ब्रिक्स देशों के आर्थिक उभार के सामने लगातार अपनी चमक खोता जा रहा है।

    आर्थिक विकास के वैश्विक आंकड़ों को साझा करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले पांच वर्षों के दौरान वैश्विक जीडीपी विकास में अकेले ब्रिक्स देशों का योगदान 49 प्रतिशत रहा है, जबकि इसके मुकाबले जी7 देशों की हिस्सेदारी मात्र 18 फीसदी पर सिमट कर रह गई है। क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर देखें तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स की हिस्सेदारी अब बढ़कर 40 प्रतिशत हो चुकी है, जबकि जी7 देश अब 20 प्रतिशत से भी नीचे खिसक गए हैं। पुतिन ने अनुमान जताया कि आने वाले वर्षों में ब्रिक्स देशों की आर्थिक विकास दर चार प्रतिशत से अधिक रहेगी, जबकि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं बमुश्किल एक प्रतिशत की दर से आगे बढ़ पाएंगी।

    अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों के संबंध में बात करते हुए पुतिन ने कहा कि वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स का केंद्र अब पूरी तरह से पूर्व और दक्षिण की ओर स्थानांतरित हो रहा है। ‘नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर’ और ‘ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्टेशन रूट’ जैसे नए व्यापारिक रास्ते अब पश्चिमी नियंत्रण वाले पारंपरिक जलमार्गों और हब को पूरी तरह से दरकिनार कर रहे हैं। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) पर भी दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि जब तक पश्चिमी देशों को इन वैश्विक संस्थाओं से लाभ मिल रहा था, तब तक उन्होंने नियमों की दुहाई दी, लेकिन जैसे ही उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलने लगी, वे खुद ही इन नियमों से पीछे हट गए हैं।

  • पाकिस्तान में आटे का संकट! कीमत 100 किलो, रोटी के लिए हाहाकार?

    पाकिस्तान में आटे का संकट! कीमत 100 किलो, रोटी के लिए हाहाकार?

    इस्लामाबाद/कराची। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में गेहूं की कमी और बढ़ती महंगाई ने सरकार की खाद्य प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी खरीद लक्ष्य से काफी पीछे रहने के कारण खुले बाजार में गेहूं और आटे की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

    लक्ष्य का 8 प्रतिशत भी नहीं खरीद सकी सरकार

    सिंध सरकार ने इस वर्ष 10 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था, लेकिन 4 जून तक खाद्य विभाग केवल 79,835 मीट्रिक टन गेहूं ही खरीद पाया। यह कुल लक्ष्य का 8 प्रतिशत से भी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य बाजार दर से कम होने के कारण किसानों ने सरकारी एजेंसियों को गेहूं बेचने के बजाय निजी व्यापारियों को प्राथमिकता दी।

    खुले बाजार में बढ़े दाम

    सरकारी खरीद कमजोर रहने और निजी कारोबारियों की सक्रियता के चलते गेहूं की कीमतों में करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कराची में गेहूं का भाव 11,100 पाकिस्तानी रुपये प्रति 100 किलोग्राम तक पहुंच गया है, जबकि हैदराबाद में यह लगभग 10,900 रुपये प्रति 100 किलोग्राम बिक रहा है।

    गेहूं महंगा होने का असर आटे पर भी दिखाई दे रहा है। कई क्षेत्रों में आटा 135 से 140 पाकिस्तानी रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है, जो सरकार द्वारा निर्धारित 107 रुपये प्रति किलो की दर से काफी अधिक है। इसका सबसे ज्यादा असर निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है।

    मुख्यमंत्री ने बुलाई आपात बैठक

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सिंध के मुख्यमंत्री सैयद मुराद अली शाह ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाकर अधिकारियों को बाजार पर निगरानी बढ़ाने और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि गेहूं केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि प्रदेश की खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा महत्वपूर्ण संसाधन है।

    मुख्यमंत्री ने खाद्य विभाग और संबंधित एजेंसियों से नियमित रिपोर्ट प्रस्तुत करने को भी कहा है, ताकि कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके।

    संकट से उबरने की चुनौती

    हालांकि सरकारी दावों और निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात में विशेष सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बाजार में जमाखोरी और आपूर्ति संबंधी समस्याएं बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सिंध में खाद्य सुरक्षा संकट और गहरा सकता है।

    बढ़ती कीमतों और कमजोर सरकारी खरीद व्यवस्था ने पाकिस्तान में खाद्यान्न प्रबंधन को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जबकि आम नागरिक महंगाई की मार झेलने को मजबूर हैं।

  • US में सख्त होंगे H-1B वीजा के नियम…. रिपब्लिकन MP ने संसद में पेश किया नया Bill

    US में सख्त होंगे H-1B वीजा के नियम…. रिपब्लिकन MP ने संसद में पेश किया नया Bill


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में एच-1बी वीजा (H-1B Visa) को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी कांग्रेस (US Congress) में रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय (Republican Congressman Chip Roy) ने एक नया विधेयक पेश किया है, जिसमें एच-1बी वीजा प्रणाली में बड़े बदलाव की मांग की गई है। इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा असर भारतीय पेशेवरों और छात्रों पर पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय आईटी और तकनीकी क्षेत्र में इसी वीजा के जरिए अमेरिका जाते हैं। विधेयक में एच-1बी वीजा को ग्रीन कार्ड तक पहुंचने का रास्ता खत्म करने, वीजा अवधि घटाने और विदेशी छात्रों के लिए काम करने वाले ओपीटी कार्यक्रम को बंद करने जैसे बड़े प्रस्ताव शामिल हैं।


    एच-1बी वीजा को लेकर नया प्रस्ताव क्या है?

    रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट नाम से यह विधेयक पेश किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले करीब 40 वर्षों में एच-1बी वीजा प्रणाली का गलत इस्तेमाल हुआ है। उनके मुताबिक, अमेरिकी कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देकर अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों को पीछे कर रही हैं। इस विधेयक में कहा गया है कि अब वीजा प्रणाली को मेरिट यानी योग्यता और ज्यादा वेतन के आधार पर चलाया जाना चाहिए। अभी एच-1बी वीजा का आवंटन लॉटरी सिस्टम के जरिए होता है।


    ग्रीन कार्ड और ओपीटी पर क्या असर पड़ेगा?

    इस विधेयक का सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड का रास्ता लगभग बंद कर दिया जाए। अभी तक एच-1बी वीजा पर काम करने वाले लोग अमेरिका में स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते थे। लेकिन नए प्रस्ताव में ड्यूल इंटेंट नीति खत्म करने की बात कही गई है। यानी वीजा धारक को यह साबित करना होगा कि वह अमेरिका में स्थायी रूप से बसने का इरादा नहीं रखता। इसके अलावा विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद सीमित समय तक काम करने की अनुमति देने वाले ओपीटी कार्यक्रम को भी खत्म करने का प्रस्ताव है। इसका असर हजारों भारतीय छात्रों पर पड़ सकता है।


    वीजा अवधि और फीस में क्या बदलाव होंगे?

    प्रस्तावित कानून के तहत एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह साल से घटाकर सिर्फ दो साल करने की बात कही गई है। साथ ही अब लॉटरी सिस्टम की जगह ज्यादा वेतन देने वाली कंपनियों को प्राथमिकता दी जा सकती है। ट्रंप प्रशासन पहले ही कानूनी माइग्रेशन कार्यक्रमों पर सख्ती बढ़ा चुका है। नई एच-1बी याचिकाओं पर एक लाख डॉलर तक की फीस लगाने और सख्त नियम लागू करने की दिशा में कदम उठाए जा चुके हैं। इस विधेयक को अमेरिकी टेक वर्कर्स और इमिग्रेशन से जुड़े कुछ संगठनों का समर्थन भी मिला है।


    भारतीय पेशेवरों और छात्रों पर क्या असर होगा?

    भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां से सबसे ज्यादा लोग एच-1बी वीजा पर अमेरिका जाते हैं। आईटी, इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाले हजारों भारतीय पेशेवर और छात्र इस प्रणाली पर निर्भर हैं। अगर यह विधेयक आगे बढ़ता है तो भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका में नौकरी और स्थायी बसने का रास्ता मुश्किल हो सकता है। हालांकि यह अभी सिर्फ प्रस्तावित कानून है और इसे लागू होने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की कई प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। फिर भी इस प्रस्ताव ने भारतीय छात्रों और आईटी सेक्टर में चिंता बढ़ा दी है।